भगवान विठ्ठल और संत ज्ञानेश्वर के युवा पीढ़ी के लिए सबक

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(आषाढ़ एकादशी के निमित्त विशेष आलेख)

– गिरीश जोशी

हाल ही में स्टॅंडर्ड चार्टर्ड बँक के सीईओ बिल विंटर्स ने एक इंटरव्यू में कहा के आज टेक्नॉलॉजी खासकर AI वह सब कुछ कर रही है जो पहले इंसान करते थे, जैसे- कोड लिखना, प्रेजेंटेशन बनाना, डॉक्युमेंट तैयार करना, ऐसे में असली जरूर सॉफ्ट स्किल की है जो मशीन नहीं दे सकती। जैसे – करुणा, संवाद, लीडरशिप और नैतिक विवेक . विंटर्स ने युवाओं को सलाह दी है कि वे केवल तकनीकी योग्यता के पीछे भागने के अलावा करुणा, आलोचनात्मक सोच व जिज्ञासा को अपनी ताकत बनाये। आज कॉर्पोरेट ऐसे लोगो की तलाश मे है जो टीम का मनोबल समझ सके और सही दिशा मे निर्णय ले सके। विश्व की टॉप कंपनियों में से एक डेलाइट की 2024 की रिपोर्ट भी यही कहती है कि सर्वाधिक डिमांड (65%) टीमवर्क, कम्युनिकेशन स्किल (61%), लीडरशिप (56%) है।

विंटर्स ने युवाओं अनेक गुणों को अपने अंदर बढ़ाने के लिए कहा है। इन गुणों को बढ़ाने के लिए कोई एक आधार, उपास्य,आदर्श सामने होना आवश्यक होता है । आदर्श ऐसा हो जो पिछले अनेक वर्षों से असंख्य पीढ़ियों को प्रेरित कर रहा हो और भविष्य में भी अनेक वर्षों तक प्रेरित करता रहेगा।

ऐसा एक उपास्य,आदर्श भगवान श्री कृष्ण का वह रूप जिसे महाराष्ट्र एवं कर्नाटक के आराध्य भगवान विठ्ठल के नाम से भी जाना जाता है।गौरतलब है कि अपने देश के दोनों राज्य समृद्ध राज्यों में से है साथ ही आज करोड़ों युवाओं की महत्वकांक्षाओं को पूरा करने का जरिया भी बने हुए हैं।

महान संत कवि तुकाराम ने अपने एक अभंग में ‘विठोबा’ शब्द का अर्थ बताया है — ‘ज्ञान’ + ‘ठोबा’ अर्थात ‘रूप’; इस प्रकार विठोबा का अर्थ है ‘परम ज्ञान का रूप’ या ‘परम ज्ञान की मूर्ति’। एक मान्यता यह भी है कि ‘वी’ का अर्थ है गरुड़ पक्षी और ‘ठोबा’ का अर्थ है बैठने का स्थान, इसलिए विठोबा का अर्थ होता है ‘गरुड़ पर विराजमान देवता’।

विठोबा भगवान विष्णु का ही रूप हैं, जो ईंट पर पिछले 28 युग से अपने दोनों हाथ कमर पर रख कर खड़े है। भगवान श्रीकृष्ण को श्रीविष्णु का अवतार माना जाता है,जिनका अवतरण द्वापर युग के अंत में, बुधवार (श्रावण वद्य अष्टमी) के दिन हुआ था।
शास्त्रों में एक श्लोक है –

“वि करो विधातय, था करो नीलकंठाय । ला करो लक्ष्मीकांत, विठ्ठलाभिधिनीयमे।।
इसका अर्थ है – ‘वि’ का संबंध विधाता यानी ब्रह्मा से है,‘था’ का नीलकंठ भगवान शिव से,
और ‘ला’ का लक्ष्मीकांत भगवान विष्णु से। अर्थात ब्रह्मा, विष्णु और महेश ये तीनों देवता ‘विठ्ठल’ में समाहित हैं।
संत ज्ञानेश्वर ने भक्ति परंपरा में भगवान विट्ठल को आराध्य के रूप में स्थापित कर मनुष्य के सर्वांगीण उन्नति के लिए उसके भीतर छुपे गुणों का विकास किया।
संत ज्ञानेश्वर ने भगवान श्री कृष्ण के युगानुकूल संदेश भागवत गीता को सरल और सहज भाषा में लोक समाज के बीच पहुंचाने के लिए ’ज्ञानेश्वरी’ के रूप में उसका सरल भाष्य सबके सामने रखा ।

ज्ञानेश्वरी अध्याय 12 में संत ज्ञानेश्वर ने लिखा है – “करुणा हाचि धर्म” – करुणा ही सच्चा धर्म है। इसे विंटर्स ने युवाओं के लिए प्रथम आवश्यक गुण बताया है।
करुणा को आवश्यक माना गया है। ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं कि करुणा से ही मानव को अपना इष्ट मिलता हैं। करुणा एक ऐसा गुण है जो व्यक्ति को नम्र, समझदार और स्नेह करने वाला बनाता है। करुणा से व्यक्ति तथा समाज की बुरी बातें कम होती हैं और अच्छे गुण बढ़ते हैं।करुणा की वजह से हम दूसरों का दुःख समझते हैं और उनकी मदद करने की इच्छा होती है।

करुणा से व्यक्ति में क्षमा करने की क्षमता आती है और वह दूसरों को आसानी से क्षमा कर पाता है।
संत ज्ञानेश्वर द्वारा स्थापित वारकरी संप्रदाय की परंपराओं का पालन कर साधारण परिस्थिति में जन्मे अनेक लोग संत बने है, इसी कड़ी में संत नामदेव का नाम बहुत बड़ा है।
संत नामदेव की एक कथा बड़ी प्रसिद्ध है एक बार वे भोजन की तैयारी कर रहे थे तभी एक कुत्ता उनकी थाली से रोटी लेकर दौड़ पड़ा लेकिन संत नामदेव के मन में करुणा का भाव प्रबल था। वे घी की कटोरी लेकर कुत्ते के पीछे दौड़े और कहने लगे कि प्रभु अभी रोटी पर घी नहीं लगा है, कृपया घी लगवाकर खाइए। यह भाव इसलिए जागा क्योंकि प्रत्येक प्राणी मात्र में उस ईश्वरीय चैतन्य का दर्शन उन्हें होने लगा था यह करुणा के भाव का सर्वोच्च शिखर है।
अध्याय 4 में ज्ञानेश्वर कहते है –

“विवेकेंवीणें ज्ञान, तेथें अज्ञानचि प्रमाण” अर्थात ज्ञान के साथ यदि विवेक (समझ) नहीं है, तो वहाँ अज्ञान ही अधिक प्रभावी हो जाता है।
“विवेकेंवीणें भजन, तेथें अभिमानचि प्रमाण” अर्थात अगर भजन या केवल भाषण विवेक के बिना किया जाए, तो उसमें अहंकार ही ज़्यादा होता है।अगर कर्म विवेक के बिना किया जाए, तो वह बंधन का कारण बनता है।

“विवेके देहबुद्धी जाये, मग स्वरूपचि होये” (अध्याय 5)विवेक के कारण देह (शरीर) यानी मैं की भावना मिटती है और हम अपने वास्तविक स्वरूप को अपनी शक्ति को जान पाते हैं।

“विवेकेचि आपण, आपणपेंचि जाणे” (अध्याय 6)विवेक के माध्यम से ही हम स्वयं को पहचान सकते हैं।
“विवेकेवीण संसार, तोचि केवळ विकार” (अध्याय 8)विवेक के बिना संसार सिर्फ दोषों और विकारों से भरा होता है।
“विवेकेवीणें देह, तोचि केवळ देह” (अध्याय 10) विवेक के बिना शरीर, केवल एक शरीर ही रह जाता है – उसकी कोई सार्थकता शेष नहीं रहती है।
‘अध्याय 12’ के अनुसार, सच्चा लीडर वही होता है जो ईश्वर को पूरी तरह समर्पित होकर अपना काम करता है।
‘अध्याय 18’ के अनुसार, हर व्यक्ति को अपने काम पर ध्यान देना चाहिए और फल की इच्छा किए बिना अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।ज्ञानेश्वरी समानता और न्याय पर ज़ोर देती है।
आज के विद्यार्थियों को कोई भी बड़ी योजना बनाते समय SWOT एनालिसिस करना सिखाया जाता है। जिसमें S का अर्थ होता है Strength यानी शक्ति, W – Weakness यानी हमारी कमजोरी O – Opportunity यानी हमारे सामने संभावित अवसर तथा T – Threat यानी मार्ग में आने वाली बाधाएं।
संत ज्ञानेश्वर ने ज्ञानेश्वरी के माध्यम से आत्म निरीक्षण करते हुए आज से 800 वर्ष पूर्व SWOT एनालिसिस कर स्वयं का विकास करने का युगानूकूल मार्ग बताया था।

ज्ञानेश्वर महाराज ने वारकरी संप्रदाय के माध्यम से यह सिद्ध करके भी दिखाया। संत ज्ञानेश्वर महाराज के मार्ग पर चल कर विभिन्न समाज से अत्यंत साधारण पृष्ठभूमि से निकले महापुरुष इसका प्रमाण है।

कुछ प्रमुख संत है तुकाराम महाराज, संत एकनाथ महाराज, संत नामदेव महाराज, संत सेना महाराज(सेन समाज), संत नरहरी महाराज(सोनी समाज),संत गाडगे महाराज(रजक समाज), संत सावता महाराज(माली समाज) संत चोखामेळा महाराज (महार समाज)आदि।

आषाढ़ एकादशी के अवसर पर इन संतों के अलावा अनेक संतों के मूल स्थान से उनकी चरण पादुकाओं को लेकर लाखों की संख्या में भक्त भगवान विट्ठल के दर्शन के लिए पंढरपुर पहुंचते हैं। और भगवान विट्ठल के चरणों में अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

आज की युवा पीढ़ी को भी अपने शास्त्रों में लिखें कालजयी और युगानुकूल शाश्वत मूल्यों के प्रकाश में भविष्य का मार्ग देख कर अपना और अपने राष्ट्र का भवितव्य गढ़ने की आवश्यकता है।

गिरीश जोशी
संस्कृति अध्येता और अकादमिक प्रशासक
9425062332
girish.joshi0909@gmail.com

Ganda Hai Par Dhandha Hai: The Market of Desire

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Sumeet Mehta

Because there is a demand (not even a latent demand) for this type of product and content. Why abuse a person who is exploiting the market opportunity and making money?

This is how things are working. Leaving morality and immorality aside, we have chosen to question only one side of the market participants – supply, without delving on the issue of other two sides of market participants – demand and intermediaries.

Till there is demand, intermediaries will come up and supply will get created. It is not just YouTube that allows content creators i.e. supply side make money. Look at platforms like onlyfans. In 2024, onlyfans generated a gross revenue of US$ 6.3 bn from 210 mn subscribers out of which US$ 5.3 bn was payout to 2.2 mn content creators.

That is an average of 100 subscribers per content creator. The per employee revenue of onlyfans is US$ 31 mn, which is way more than Apple, Google, and Amazon! Imagine! So there exists a market that ensures such astronomically high numbers! Even intermediaries will keep getting created if there is a market and demand. From video parlours and corny mags in 1980s to digital platforms in this era of mobile internet, we have gone a long way in making this kind of content available easily. This has also made the supply side feel comfortable with this business because they are able to generate income sitting in the confines of their rooms.

Intermediaries have made it easy for supply side to access the market place with much required privacy and safety. So why question only the supply side. Ofcourse morality is an issue, which applies even to demand side and intermediaries and that too equally as supply side. But when the market is so big who looks at morality!

 Ganda hai par dhandha hai yeh! And till there are tharki pajeets who are ready to pay, this market will thrive. Let girls who chose this earn money their way. Let others earn money the harder way. Also these girls come with a shelf life and expiry date. After a particular age the market value and demand falls. They need to earn more money more quickly before the sun sets. Its like making hay while the sun shines. Against that all others who chose a difficult path, have a career that keeps growing with age and experience. That’s a solace. Think about that!

नया खुलासा: केरल सरकार के खर्चे पर घूमी यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा

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कोच्चि: हरियाणा की यूट्यूबर और ट्रैवल व्लॉगर ज्योति मल्होत्रा को पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किए जाने के बाद एक नया खुलासा सामने आया है। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेजों से पता चला है कि ज्योति मल्होत्रा ने केरल सरकार के पर्यटन विभाग के निमंत्रण पर जनवरी 2024 से मई 2025 तक कन्नूर, कोझीकोड, कोच्चि, अलपुझा और मुन्नार की यात्रा की थी। विभाग ने उनके यात्रा खर्च और वेतन का भुगतान किया था, क्योंकि वह सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के रूप में केरल पर्यटन को बढ़ावा देने वाली सूची में शामिल थीं।

यह खुलासा सुरक्षा एजेंसियों और राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाता है।ज्योति पर आरोप है कि उन्होंने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के लिए संवेदनशील जानकारी साझा की, जिसमें जम्मू-कश्मीर के पहलगाम आतंकी हमले से जुड़ी जानकारियां शामिल हो सकती हैं।

जांच में पाया गया कि वह दिल्ली में पाकिस्तान उच्चायोग के एक अधिकारी, अहसान-उर-रहीम उर्फ दानिश, के संपर्क में थीं, जिसे भारत ने मई 2025 में निष्कासित कर दिया था। ज्योति ने अपने यूट्यूब चैनल ‘ट्रैवल विद जो’ पर पाकिस्तान से संबंधित कई वीडियो पोस्ट किए, जो उनकी संदिग्ध गतिविधियों का आधार बने।इस मामले ने केरल सरकार की जांच प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं। आलोचकों का कहना है कि पर्यटन विभाग ने बिना पृष्ठभूमि जांच के ज्योति को प्रचार के लिए चुना, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा साबित हुआ। हिसार पुलिस और केंद्रीय एजेंसियां अब उनके बैंक खातों, डिजिटल उपकरणों और अन्य इन्फ्लुएंसर्स के साथ संबंधों की जांच कर रही हैं। यह मामला सोशल मीडिया के दुरुपयोग और जासूसी नेटवर्क की गहराई को उजागर करता है।

सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लक्ष्मी बाई केलकर का जन्म

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राष्ट्रसेविका समिति की संस्थापक भी

भारतीय स्वाधीनता संघर्ष की सफलता में उस भावना की भूमिका महत्वपूर्ण है जिसने समाज में स्वत्व का वोध कराया । यदि हम केवल आधुनिक संघर्ष का ही स्मरण करें तो हम पायेंगे कि आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती से लेकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डा केशव हेडगेवार तक ऐसे असंख्य हुतात्माएं हुईं हैं जिन्होंने दोहरा संघर्ष किया । एक तो भारत की स्वाधीनता संघर्ष केलिये सेनानी तैयार किये और दूसरा समाज में स्वत्व और सांस्कृतिक जागरण का अभियान चलाया। लक्ष्मीबाई केलकर ऐसी ही एक महाविभूति थीं जिनका पूरा जीवन भारत राष्ट्र, समाज और सांस्कृतिक जागरण के लिये समर्पित रहा।

लक्ष्मी बाई केलकर का जन्म 6 जुलाई 1905 को नागपुर में हुआ था । उनके पिता दातेजी लोकमान्य तिलक जी के अनुयायी थे। इस नाते परिवार में राष्ट्र और सांस्कृतिक जागरण का वातावरण था, लक्ष्मीबाई इसी के बीच बड़ी हुईं । उनके बचपन का नाम कमल दाते था लेकिन विवाह के बाद वे लक्ष्मी बाई केलकर बनीं और वर्धा आ गईं । उनका विवाह चौदह वर्ष की आयु में विदर्भ के सुप्रसिद्ध अधिवक्ता पुरुषोत्तम राव केलकर से हुआ था । पुरुषोत्तम जी विदुर थे यह उनका दूसरा विवाह था । दोनों की आयु में अंतर भी था, लक्ष्मी बाई की आयु भले अभी कम थी पर वे मानसिक और बौद्धिक रूप से परिपक्व हो रहीं थीं । विवाह के बाद उन्होंने अपनी शिक्षा भी जारी रखी और पति के साथ समाजसेवा के कार्यो में भी सहभागी बनीं । यह वह काल-खंड था जब स्वाधीनता के लिये अहिसंक आँदोलन पूरे देश में प्रभावी हो रहा था । यह संयोग ही था कि लक्ष्मी बाई के मायके का दाते परिवार और ससुराल का केलकर परिवार दोनों इन गतिविधियों में बढ़ चढ़ कर भाग ले रहे थे । पूरा विदर्भ मानों इन अभियानों का हिस्सा था यही कारण था कि 1923 के झंडा सत्याग्रह का सर्वाधिक प्रभाव पुणे से लेकर विदर्भ तक रहा था । यह इस आँदोलन की व्यापकता का ही प्रभाव था कि आगे चलकर गाँधी जी ने नागपुर के समीप वर्धा को अपना एक प्रमुख केन्द्र बनाया। अधिवक्ता पुरुषोत्तम राव केलकर अपनी पत्नि लक्ष्मी बाई के साथ इन सभी गतिविधियों में हिस्सा लेते । गाँधीजी और तत्कालीन आंदोलनों का कितना प्रभाव इस परिवार पर था इसका अनुमान इसी बात से ही लगाया जा सकता है कि लक्ष्मी बाई ने अपने घर में एक चरखा केन्द्र स्थापित कर लिया था। वे सामाजिक जागरण के लिये तीन काम करतीं थीं। एक तो महिलाओं में चरखे के माध्यम से स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की प्रेरणा देतीं, दूसरा भारतीय वाड्मय के उदाहरणों से सामाजिक समरसता का वातावरण बनातीं थीं और तीसरा राम चरित्र मानस के प्रवचन से साँस्कृतिक एवं सामाजिक मूल्यों की स्थापना के संस्कार दे रहीं थीं। इसके लिये उन्होंने अपने घर में महिला कार्यकर्ताओं की टोली बनाई थी। जिसमें विशेषकर अनुसूचित समाज के बंधुओ को सहयोगी के रूप जोड़ा था। वे मानतीं थीं कि राष्ट्र की स्वायत्तता ही सर्वोपरि है। यदि राष्ट्र पराधीन है तो समाज कैसे स्वाधीन बनेगा। वे अक्सर गाँधीजी के वर्धा आश्रम भी जातीं थीं। एक बार गाँधीजी ने एक सभा में दान की आव्हान किया तो लक्ष्मीबाई केलकर ने उसी क्षण अपने गले से सोने की चैन उतारकर गाँधी जी को समर्पित कर दी थी ।
उनका वैवाहिक जीवन अधिक न चल सका। 1932 मे पति का देहान्त हो गया। तब वे मात्र 27 वर्ष की ही थीं। अब उनके पास दोहरा दायित्व आ गया था। परिवार और समाज दोनों का। उनकी एक विधवा नंद भी उनके रहतीं थीं । लक्ष्मीबाई ने अपने बच्चों के साथ उन्हें भी सहेजा । लक्ष्मीबाई ने अपनी आवश्यकताएं सीमित कीं पर न बच्चों का शिक्षण रोका और न अपनी सामाजिक गतिविधियाँ कम कीं। उन्होंने अपने घर का कुछ हिस्सा किराये पर उठाया इससे भी कुछ लाभ हुआ । अपनी सामाजिक सक्रियता के चलते वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा केशव हेडगेवार के संपर्क में आयीं। उन्होंने नमक सत्याग्रह में भी भाग हिस्सा लिया किंतु डा हेडगेवार की सलाह पर जेल नहीं गईं और बाहर रहकर सामाजिक जागरण एवं स्वतंत्रता आँदोलन के लिये टोली तैयार करने का काम यथावत रखा। यह काम वे पहले भी कर रहीं थीं जो अब और तेज कर दिया। उनके द्वारा तैयार टोलियों ने विदर्भ में चलने वाले हर आँदोलन में लिया । महिलाएं कीर्तन करते हुये प्रभात फेरी निकालतीं चरखा और खादी का संदेश देतीं थीं । उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ संस्थापक डा हेडगेवार की सलाह पर वर्धा में 1936 में स्त्रियों के लिए “राष्ट्र सेविका समिति” नामक संगठन की नींव रखी । इसके लिये भारत भर की यात्रा की और संगठन के कार्य को विस्तार दिया ।

1945 में राष्ट्र सेविका समिति का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ ।

यह वह समय था जब देश के विभाजन वादी शक्तियां प्रबल हो रहीं थीं । अंग्रेजी सरकार का उन्हें संरक्षण था इस नाते उनकी हिंसक गतिविधियाँ बढ़ गईं थीं । विशेषकर बंगाल पंजाब और सिंध में हिन्दु समाज की महिलाओं में एक भय का वातावरण बनने लगा था । लक्ष्मी बाई केलकर ने अपने संगठन के माध्यम में महिलाओं में संगठित रहने और आत्म विश्वास जगाने का अभियान चलाया देश की स्वतन्त्रता एवं विभाजन से समय वे सिंध में थीं । उन्होंने हिन्दू परिवारों को भारतीय सीमा में सुरक्षित पहुँचने के प्रबन्ध किये ।

उन्होंने महिलाओं में जाग्रति के लिये बाल मन्दिर, भजन मण्डली, योगाभ्यास केन्द्र, बालिका छात्रावास आदि अनेक प्रकल्प प्रारम्भ किये । वे राम चरित्र मानस पर बहुत सुन्दर प्रवचन देतीं थीं । जिनमें संतान के निर्माण, परिवार के निर्माण, समाज के निर्माण और सामाजिक एकत्व का संदेश होता था । वे आजीवन राष्ट्र और समाज की सेवा में लगीं रहीं । वे शरीर से भले 27 नवम्बर 1978 को नश्वर शरीर छोड़कर संसार से विदा हुईं पर उनकी आभा आज भी समाज में प्रतिबिंबित हो रही है ।

उनके द्वारा गठित राष्ट्र सेविका समिति राष्ट्र निर्माण में नारी शक्ति जागरण का प्रतीक बन गयी । जो समाज में संस्कार और पारिवारिक विमर्श का वातावरण बना रही है ।
उनका संकल्प आज बृहद और वैश्विक रूप ले रहा है । उनका संकल्प और विचार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ रहे हैं ।

यह भारत के इतिहास में स्त्रीशक्ति जागरण और सशक्तिकरण की बड़ी घटना थी । लक्ष्मी बाई केलकर ने महिलाओं को अनुशासित सेविका बनाने के लिए प्रशिक्षण अभियान आरंभ कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सिद्धांत, विचार एवं उद्देश्य के आधार पर नारी शाखा आरंभ की थी । वर्तमान में भारतवर्ष में राष्ट्र सेविका समिति की लगभग पाँच हजार से अधिक शाखाएं संचालित हो रहीं हैं ।

समिति का कार्य अपने ध्येय-सूत्र के साथ अल्प समय में ही प्रभावशाली उपलब्धियां अर्जित करने लगा । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भाँति राष्ट्र सेविका समिति के भी प्रतिवर्ष मई-जून में सामान्यतः पंद्रह दिनों के प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष के प्रशिक्षण शिविर आयोकित किए जाते हैं। इन शिविरों में बौद्धिक, शारीरिक और आत्म-रक्षा का प्रशिक्षण दिया जाता है। यह शिविर नागपुर तथा अन्य स्थानों पर आयोजित किये जाते हैं ।

जिस प्रकार संघ का अपना गणवेश है, उसी प्रकार समिति का भी अपना एक गणवेश है। जैसे संघ में प्रचारक होते हैं, वैसे ही समिति में भी प्रचारिकाएं होती हैं। वर्तमान में अड़तालीस प्रचारिकाएं भारतवर्ष के विभिन्न भागों में सेवा प्रदान कर रही हैं।

समिति में एक प्रावधान लघु अवधि की पूर्णकालिक कार्यकर्ता का भी है, जिन्हें विस्तारिका कहा जाता है। यह दो वर्ष की समयावधि के लिए होता है. जिसमे स्वयंसेविका अपना पूरा समय समिति के कार्य के लिए समर्पित करती हैं।

लक्ष्मी बाई केलकर ने अपने व्याख्यान में कई अवसर पर कहा है कि महिला, परिवार और राष्ट्र के लिए प्रेरक शक्ति के रूप में कार्य करती है । जब तक शक्ति को जागृत नहीं किया जाता तब तक परिवार समाज और राष्ट्र जाग्रत नहीं होगा ।उनके द्वारा दिखाया गया मार्ग और आव्हान आज भी अनुकरणीय हैं । अब समिति द्वारा बहुमुखी कार्य भी किए जा रहे हैं । समिति के अनेक सेवा प्रकल्प प्रारंभ किये हैं, जिनमें छात्रावास, चिकित्सालय, उद्योग, भजन मंडल आदि

राष्ट्र सेविका समिति का कार्य केवल भारत में ही नहीं अपितु विश्व के कई देशों में फैला हुआ है। ब्रिटेन, अमरीका, मलयेशिया, डर्बन, जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका में भी समिति की स्वयंसेविकाएं सक्रिय हैं ।

लक्ष्मी बाई केलकर का व्यक्तित्व और कृतित्व भारत में प्रत्येक परिवार और विशेष कर नारी शक्ति की क्षमता मेधा और प्रज्ञा शक्ति का एक अनुकरणीय उदाहरण है । जो सदैव स्मरणीय और वंदनीय है

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