आगरा का मेडिकल कॉलेज पहचान के संकट के लिए संघर्षरत

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क्या 1854 से निरंतर सेवा दे रहा आगरा मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल अपने अतीत के गौरव को पुन प्राप्त कर सकेगा, या अपनी पहचान के संकट से जूझता रहेगा? ये प्रश्न इसलिए पूछा जा रहा है क्योंकि आगरा के अधिकतर वासिंदे इसकी सेवाओं और व्यवस्थाओं से संतुष्ट नहीं हैं और जो पढ़कर डॉक्टर निकलते हैं वो विश्व पटल पर कोई विशिष्ट कामयाबी के झंडे नहीं गाड़ सके हैं।
१९८० के दशक से पूर्व आगरा मेडिकल कॉलेज के चिकिसकों का एक रूतवा और दबदबा था। आज डेढ़ सौ वर्षों बाद ये संस्थान चौराहे पर अनिश्चितता के साए में खड़ा दिखता है !!

पचास लाख की आबादी को सेवा प्रदान करने वाले आगरा जिले में सरकारी स्वास्थ्य सेवाएँ प्रणालीगत विफलताओं और उपेक्षा की एक निराशाजनक तस्वीर पेश करती हैं। कभी चिकित्सा शिक्षा और सेवा का प्रतीक रहा एस.एन. मेडिकल कॉलेज अब एक कलंकित विरासत से जूझ रहा है, जो कई मुद्दों से ग्रस्त है जो इसकी वर्तमान स्थिति को परिभाषित करते हैं।

मिनी-एम्स की छवि के बावजूद, संस्थान अक्सर गलत कारणों से सुर्खियों में रहता है – अपर्याप्त बुनियादी ढाँचे और उदासीन चिकित्सा कर्मियों से लेकर भ्रष्टाचार, बेकार कर्मचारियों, विभागीय अव्यवस्था और घटिया दवाओं के प्रसार की रिपोर्ट तक।

आगरा जिले में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति देश के कई हिस्सों में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में प्रणालीगत विफलताओं और उपेक्षा का एक मार्मिक प्रतिबिंब है। एस.एन. मेडिकल कॉलेज, जो कभी चिकित्सा शिक्षा और सेवा का प्रतीक था, अपनी गरिमा खो चुका है, इसकी विरासत कई मुद्दों के कारण धूमिल हो गई है, जो इसकी वर्तमान स्थिति को परिभाषित करते हैं। 1860 के दशक में थॉम्पसन स्कूल ऑफ मेडिसिन के रूप में स्थापित, कॉलेज का एक समृद्ध इतिहास है, जो दुखद रूप से इसकी वर्तमान दुर्दशा से प्रभावित है। मिनी-एम्स के रूप में नामित होने के बावजूद, संस्थान अब अक्सर गलत कारणों से खबरों में रहता है। अपर्याप्त बुनियादी ढांचे, चिकित्सा कर्मियों के बीच उदासीन रवैया, भ्रष्टाचार के आरोप, बेकार कर्मचारी, विभागों के बीच समन्वय की कमी और नकली और घटिया दवाओं की मौजूदगी की रिपोर्टें बहुत आम हो गई हैं। कभी एक मातृ संस्थान जिसने प्रशिक्षित चिकित्सा पेशेवरों की एक सतत धारा तैयार की, जो उत्तर भारत के अन्य प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेजों में संकाय के रूप में सेवा करने गए, आगरा मेडिकल कॉलेज अब प्रतिभा को बनाए रखने के लिए संघर्ष करता है। निजी क्षेत्र में अवसरों की तलाश में कुशल चिकित्सा पेशेवरों का पलायन सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों को प्रभावित करने वाली बड़ी अस्वस्थता का एक लक्षण है। निजी क्षेत्र भी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के सामने आने वाली नई चुनौतियों का समुचित समाधान करने में असमर्थ है, और उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया है।

आगरा मेडिकल कॉलेज का पतन न केवल संस्थान के लिए बल्कि पूरे समुदाय के लिए नुकसान का प्रतिनिधित्व करता है। राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित डॉक्टरों जैसे राजदान, नवल किशोर, अवस्थी, मल्होत्रा, नागरथ और कई अन्य जिन्होंने कभी संस्थान को गौरवान्वित किया था, अब एक बीते युग की दूर की प्रतिध्वनि की तरह लगते हैं। उनकी विशेषज्ञता और समर्पण आगरा में स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की विशेषता वाली उदासीनता और अव्यवस्था की मौजूदा भावना से प्रभावित है।

एस.एन. मेडिकल कॉलेज और इसी तरह के संस्थानों को पुनर्जीवित और पुनर्जीवित करने के प्रयासों को उनके क्षय के मूल कारणों को संबोधित करना चाहिए। इसमें बुनियादी ढांचे के मुद्दों को संबोधित करना, शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना, चिकित्सा कर्मियों के बीच सहानुभूति और व्यावसायिकता की संस्कृति को बढ़ावा देना और भ्रष्टाचार और कदाचार को रोकने के लिए मजबूत तंत्र स्थापित करना शामिल है। अनुसंधान, प्रशिक्षण और अन्य संस्थानों के साथ सहयोग पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने से कॉलेज को उसके पूर्व गौरव को बहाल करने में मदद मिल सकती है।

इसके अलावा, जनसंख्या की उभरती जरूरतों को पूरा करने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में अधिक निवेश और स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में व्यापक बदलाव की सख्त जरूरत है। सरकार को सभी नागरिकों के लिए गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा के प्रावधान को प्राथमिकता देनी चाहिए, चाहे उनकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो, और आगरा और उसके बाहर की मौजूदा स्थिति को जन्म देने वाली स्पष्ट कमियों को दूर करने की दिशा में काम करना चाहिए।

सभी स्तरों पर हितधारकों – सरकारी अधिकारियों, स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों, नागरिक समाज संगठनों और आम जनता – के लिए एक साथ आना और आगरा जिले और उसके बाहर स्वास्थ्य सेवा वितरण के लिए एक नया मार्ग तैयार करना महत्वपूर्ण है। केवल सामूहिक कार्रवाई और समानता, पहुंच और गुणवत्ता के सिद्धांतों को बनाए रखने की साझा प्रतिबद्धता के माध्यम से ही हम स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों को दूर करने और हर व्यक्ति को वह देखभाल और सहायता प्रदान करने की उम्मीद कर सकते हैं जिसका वह हकदार है।

अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने के लिए, एस.एन. मेडिकल कॉलेज को संस्थान को पुनर्जीवित करने और चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में उत्कृष्टता के केंद्र के रूप में अपनी प्रतिष्ठा को बहाल करने के उद्देश्य से कई व्यापक उपाय करने चाहिए।

सुधारात्मक उपायों को लागू करके और उत्कृष्टता, नवाचार और अखंडता की संस्कृति को बढ़ावा देकर, आगरा मेडिकल कॉलेज अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने और चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा वितरण के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित संस्थान के रूप में अपना सही स्थान पुनः प्राप्त करने की दिशा में यात्रा शुरू कर सकता है।

10 सितंबर 1915 : क्राँतिकारी जतिन्द्र नाथ मुखर्जी का बलिदान

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भारतीय स्वाधीनता संग्राम में कुछ ऐसी प्रतिभाओं ने अपने जीवन का बलिदान दिया जो यदि अंग्रेजों की आधीनता स्वीकार कर लेते तो उन्हें उचचतम प्रसिद्धि मिल जाती । ऐसे ही बलिदानी थे बाघा जतिन ।

उनका नाम जतिनन्द्र नाथ मुखर्जी था लेकिन वे बाघा जतिन के नाम से भी जाने जाते हैं । उनका जन्म 7 दिसम्बर 1879 को जैसोर क्षेत्र में हुआ था । यह क्षेत्र अब बंगलादेश में है । जब पाँच वर्ष के हुये, तभी पिता का देहावसान हो गया था। माँ ने बड़ी कठिनाई से लालन-पालन किया। वे शरीर से बहुत हृष्ट-पुष्ट थे । किशोर वय में वे जंगल घूमने गये तो बाघ सामने आ गया। वे बाघ से भिड़ गये । बाघ भाग गया । तब से उनका नाम बाघा जतिन पड़ गया । वे जितने शरीर से सुदृढ़ थे उतने ही पढ़ने में भी बहुत कुशाग्र थे । उन्होंने 18 वर्ष की आयु में मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी । फिर स्टेनोग्राफी सीखी और कलकत्ता विश्वविद्यालय में स्टेनोग्राफर की नौकरी कर ली । अपनी सेवा काल में भी पढ़ाई जारी रखी । लेकिन वे अधिक नौकरी न कर सके ।

अपनी सेवा काल में जब भी अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के साथ अपमानजनक व्यवहार देखते तो खून खौल उठता उसका प्रतिकार भी करते । लेकिन परिवार की जरूरत को ध्यान में रखकर समझौता करके नौकरी करते रहे । तभी 1905 आया । अंग्रेज सरकार ने बंगाल विभाजन की घोषणा कर दी । इसका विरोध आरंभ हुआ । यतींद्र नाथ मुखर्जी ने बंगाल विभाजन का विरोध किया । उन्होंने नौकरी छोड़कर कर आन्दोलन की राह पकड़ी। उन्होने युवकों की टोली बनाई और अंग्रेज अधिकारियों की घेराबंदी शुरू की । इस आँदोलन में उनकी आगे की पढ़ाई छूट गई। आँदोलन इतना तीव्र हुआ कि अंग्रेज सरकार को बंगाल विभाजन का निर्णय वापस लेना पड़ा। लेकिन बाघा जतिन ने राह न बदली । उन्हे दोवारा नौकरी पर आने का प्रस्ताव भी आया पर सरकारी नौकरी में न गये और क्राँतिकारी आंदोलन से सीधे जुड़ गये । वे 1910 में ‘हावड़ा षडयंत्र केस’ में गिरफ्तार हुये । एक साल का कारावास मिला ।

जेल से मुक्त होने पर’अनुशीलन समिति’ और ‘युगान्तर’ से जुड़ गये । वे दोनों प्रकार से कार्य करते थे एक तो क्रांति की गतिविधियों में सीधे भागीदारी और दूसरे आलेख लिखकर जन जागरण करना । क्रांतिकारियों के पास आन्दोलन के लिए धन जुटाने के लिये दुलरिया नामक स्थान पर अपने ही सहयोगी अमृत सरकार घायल हो गए थे । समस्या यह थी कि धन लेकर भागा जाये या साथी के प्राणों की रक्षा । स्वयं अमृत सरकार ने जतींद्र नाथ से कहा कि धन लेकर चले जाओ । पर जतींद्र तैयार न हुए तो अमृत सरकार ने आदेश दिया- ‘मेरा सिर काट कर ले जाओ ताकि अंग्रेज पहचान न सकें।’ पर जतिन ने अपने साथी को वहाँ न छोड़ा और साथ लेकर ही चले । क्रान्तिकारियो के ऐसे जज्वे से मिली है स्वतंत्रता।

कलकत्ता में उन दिनों एक राडा कम्पनी बंदूक-कारतूस का व्यापार करती थी। क्रान्तिकारियो ने इस कम्पनी की एक गाडी पर धावा बोला, जिसमें ५२ माउजर पिस्तौलें और ५० हजार गोलियाँ प्राप्त हुई । कुछ विश्वास घातियों ने सरकार को य। अवगत करा दिया था कि ‘बलिया घाट’ तथा ‘गार्डन रीच’ घटनाओ में यतींद्र नाथ का हाथ था। पुलिस पीछे लगी । कयी मुखबिर छोड़ दिये गये । अंततः सितंबर 1915 को पुलिस ने जतींद्र नाथ के अड्डा ‘काली पोक्ष’ स्थित गुप्त निवास पर पहुंच गयी । यतींद्र अपने साथियों के साथ वह जगह छोड़ने ही वाले थे कि पुलिस ने घेर लिया । यतींद्र नाथ ने गोली चला दी । मुखबिर राज महन्ती वहीं ढेर हो गया। यतीश नामक एक क्रांतिकारी बीमार था। जतींद्र उसे अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे। चित्तप्रिय नामक क्रांतिकारी उनके साथ था। दोनों तरफ़ से गोलियाँ चली। चित्तप्रिय भी बलिदान हो गये। वीरेन्द्र तथा मनोरंजन नामक अन्य क्रांतिकारी मोर्चा संभाले हुए थे। इसी बीच यतींद्र नाथ का शरीर गोलियों से छलनी हो गया था । वे जमीन पर गिर पड़े। मनोरंजन ने उन्हें उठा कर भागने का प्रयत्न किया । किंतु अंग्रेज अफसर किल्वी ने घेर लिया । सामान्यतः ऐसी स्थिति में क्राँतिकारी में स्वयं को गोली मार लिया करते हैं पर मनोरंजन के कंधे पर जतिन थे इसलिये पकड़े गये । उनका बलिदान अगले दिन 10 सितंबर को हुआ । यद्धपि अंग्रेज रिकार्ड में घायल होने के कारण उनकी मौत हुई पर कुछ लोगों का मानना है कि पुलिस प्रताड़ना से उनका बलिदान हुआ । जो भी सत्य हो 10 सितंबर 1915 को इस महान क्राँतिकारी का बलिदान हो गया ।
शत शत नमन्’

जीवन के आठ वर्ष जेल में बिताये : हर जेल यात्रा में एक ग्रंथ तैयार

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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम विविधता से भरा है । क्राँतिकारी और अहिसंक आँदोलन के साथ अन्य धाराओं में एक ऐसी धारा भी रही जिसने प्रत्यक्ष आँदोलनों में सहभागिता के साथ ऐसी साहित्य रचना भी की जिसने जन सामान्य को झकझौरा और एक पूरी पीढ़ी को आँदोलन के लिये आगे आई । रामवृक्ष बेनीपुरी ऐसी ही प्रतिभा थे जिन्होंने सतत साहित्य रचना की और असहयोग आंदोलन से लेकर भारत छोड़ो आँदोलन तक हर संघर्ष में हिस्सा लिया और जेल गये ।

ऐसे ओजस्वी साहित्यकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म 23 दिसम्बर 1899 को बिहार प्राँत के मुज़फ़्फ़रपुर जिला अंतर्गत ग्राम बेनीपुरी में हुआ था । पिता फूलवंत सिंह जी एक साधारण किसान और माता तुलसी देवी साधारण गृहिणी थीं । इनके माता-पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था। पालन पोषण मौसी ने किया था। मौसी का परिवार शिक्षा से जुड़ा था उन्होंने शिक्षा पर ध्यान दिया और आरंभिक शिक्षा केलिये बेनीपुर के स्थानीय विद्यालय में ही भर्ती कर दिया । आरंभिक शिक्षा के मैट्रिक करने ननिहाल पहुँचे । यह वह समय था जब देश में स्वाधीनता आँदोलन के मानो बादल घुमढ़ रहे थे । युवा रामवृक्ष भी दूर न रह सके और 1920 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में प्रारंभ हुए असहयोग आंदोलन से जुड़ गये । गिरफ्तार हुये जेल भेजे गये और जेल से लौटकर मुजफ्फर महाविद्यालय से आगे पढ़ाई की और हिंदी साहित्य से ‘विशारद ‘ की परीक्षा उत्तीर्ण की।

साहित्य और पत्रकारिता से उनकी रुचि बचपन से थी । वे किशोर वय से ही लेखन करते थे पर उनका लेखन ओजस्वी और समाज की कुरीतियों के निवारण संबंधी होता था इसलिए स्थानीय समाचार पत्रों में स्थान नहीं मिल पाता था । उन्होंने 1929 से पत्रकारिता आरंभ की ‘युवक’ नामक समाचारपत्र से जुड़ गये । वे इसके न केवल संपादक थे अपितु प्रकाशन में भी सहभागी थे । उन्होंने अपने नाम रामवृक्ष के आगे अपने गाँव का नाम बेनीपुरी जोड़ा और वे इसी नाम से प्रसिद्ध हुये । बेनीपुरी जी ने इस समाचार पत्र “युवक” के माध्यम से युवाओं में ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों की ओर ध्यान खींचा तथ राष्ट्रवाद जगाने का अभियान छेड़ा। इसी बीच उनका संपर्क सुप्रसिद्ध समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण से बना 1931 में ‘समाजवादी दल’ की स्‍थापना हुई । इसके संस्थापकों में जयप्रकाश नारायण, फूलन प्रसाद वर्मा के साथ रामवृक्ष बेनीपुरी भी थे । उन्होंने समाज में कुरीतियों के विरुद्ध भी अनेक आँदोलन छेड़े। अपने लेखन और आदोलनों के चलते अनेक बार बंदी बनाये गये । विभिन्न आँदोलनों में उन्होंने अपने जीवन के कुल आठ वर्ष जेल में बिताये । लेकिन उन्होने अपनी जेल अवधि का उपयोग लिखने में किया । वे जब भी जेल से बाहर आते उनके हाथ में कोई नया ग्रंथ होता जो आगे चलकर साहित्य की अमर कृतियाँ बनीं।

उनकी गिरफ्तारी और रिहाई की एक घटना बहुत चर्चित रही । यह घटना 1942 के अंग्रेजो भारत छोड़ो आँदोलन की है । वे इस आँदोलन में जयप्रकाश नारायण जी के साथ गिरफ्तार हुये और हजारीबाग जेल में रखे गये । पर एक पूरे जत्थे ने भागने की योजना बनाई । रामवृक्ष जी इस योजना के सहभागी बने उनकी साहित्य प्रतिभा से जेल कर्मचारी प्रभावित थे ही । इसी का लाभ उठाकर जयप्रकाश नारायण जी, रामवृक्ष जी सहित पूरा जत्था जेल से भाग निकला । इस घटना की गूँज पूरे बिहार में हुई ।

रामवृक्ष जी महान् विचारक, चिन्तक, क्राँतिकारी, साहित्यकार और पत्रकार थे । उनकी हर रचना में देश प्रेम और समाज को विसंगतियों से मुक्ति का संदेश होता था । उनके दो प्रमुख उपन्यास “पतितों के देश में”और “आम्रपाली” बहुत मशहूर हुये तो “माटी की मूरतें” कहानी संग्रह तथा चिता के फूल, लाल तारा, कैदी की पत्नी, गेहूँ और गुलाब, जंजीरें और दीवारें
नाटक – सीता का मन, संघमित्रा, अमर ज्योति, तथागत, शकुंतला, रामराज्य, नेत्रदान, गाँवों के देवता, नया समाज, विजेता, बैजू मामा आदि आलेख आज साहित्य की अमर कृतियाँ हैं। इसमें “कैदी की पत्नि” रचना में उन्होने अपनी पत्नि रानी देवी की उस व्यथा का ही वर्णन किया । जब रामवृक्ष जी जेल जाते थे तब पत्नि की आँसू झरते थे । वही पीड़ा उस रचना में थी । उन्होंने उपन्यास, जीवनियाँ, कहानी संग्रह, संस्मरण आदि लगभग 80 साहित्यिक पुस्तकों की रचना की।

स्वतंत्रता संग्राम और साहित्य रचना के साथ वे सक्रिय राजनीति में भी आये । उन्होने जयप्रकाश नारायण जी कहने पर 1957 में हजारीबाग विधान सभा से चुनाव भी लड़ा और विजयी हुये । निरंतर संघर्ष और साहित्य रचना के साथ 9 सितम्बर 1968 को वे इस संसार से विदा हुये । उनके सम्मान में भारत सरकार ने वर्ष 1999 में ‘डाक टिकट जारी किया और बिहार सरकार ने ‘वार्षिक अखिल भारतीय रामवृक्ष बेनीपुरी पुरस्कार’ आरंभ किया ।

वीआईपी संस्कृति: भारत के लोकतंत्र पर एक धब्बा

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अनेकों बार आपके साथ ऐसा हुआ होगा। आप जल्दी में अपने गंतव्य पर पहुंचना चाहते हैं, लेकिन चौराहे पर ट्रैफिक रुका हुआ है क्योंकि किसी वीआईपी को उधर से गुजरना है। आप किसी बड़े मंदिर में दर्शन के लिए लाइन में लगे हैं तभी नेताजी अपने चमचों के साथ आगे बढ़ते चले जाते हैं, बिना रोक टोक के।

भारत की व्यापक वीआईपी संस्कृति देश की अलोकतांत्रिक और सामंती मानसिकता की एक कठोर याद दिलाती है। यह अभिजात्य घटना इस धारणा को कायम रखती है कि कुछ व्यक्ति दूसरों की तुलना में अधिक समान हैं, जो कानून के शासन और समाजवादी मूल्यों को नकारती है। यह वर्ग पूर्वाग्रह को मजबूत करता है, भेद-भाव और संपन्न एवं वंचितों के बीच मतभेदों को बढ़ाता है।

अभिजात्य संस्कृति न केवल आंखों में खटकती है, बल्कि प्रणालीगत असमानता के खिलाफ गहरी नाराजगी का प्रतिबिंब भी है। राजनेता और नौकरशाह विशेषाधिकार प्राप्त व्यवहार का आनंद लेते हैं, कारों के काफिले और कष्टप्रद सुरक्षा से घिरे रहते हैं, जबकि आम लोगों को छोटा और महत्वहीन महसूस कराया जाता है।

मोदी सरकार की सांकेतिक पहलों ने इस हानिकारक जनविरोधी संस्कृति को खत्म करने के लिए बहुत कम असर किया है। वर्तमान व्यवस्था के लिए सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक समीकरणों को बदलने के लिए प्रमुख समानता पहल शुरू करने का समय आ गया है। भारत को एक अधिक मानवीय, समतावादी समाज की आवश्यकता है जो सभी नागरिकों के नागरिक अधिकारों का सम्मान करे, न कि केवल कुछ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों का।

भारत में वीआईपी संस्कृति की जड़ें औपनिवेशिक युग में हैं, जब अंग्रेजों ने अपने हितों की सेवा के लिए अभिजात वर्ग का एक वर्ग बनाया था। स्वतंत्रता के बाद, यह संस्कृति जारी रही, जिसमें नए शासक वर्ग ने अपने औपनिवेशिक पूर्ववर्तियों के समान ही प्रथाओं और दृष्टिकोणों को अपनाया।

वीआईपी संस्कृति की सबसे स्पष्ट अभिव्यक्तियों में से एक है कारों पर लाल बत्ती का उपयोग, जो शक्ति और विशेषाधिकार का प्रतीक है। उन पर प्रतिबंध लगाने के प्रयासों के बावजूद, कई राजनेता और नौकरशाह उनका उपयोग करना जारी रखते हैं, जो उनके अधिकार की भावना और कानून के प्रति उपेक्षा को दर्शाता है।

राजनेताओं और नौकरशाहों के लिए व्यापक सुरक्षा व्यवस्था वीआईपी संस्कृति का एक और पहलू है। जबकि सुरक्षा उन लोगों के लिए आवश्यक है जो वास्तविक खतरों का सामना करते हैं, इसे अक्सर उन लोगों द्वारा स्टेटस सिंबल के रूप में उपयोग किया जाता है जो नहीं करते हैं।

वीआईपी संस्कृति का सार्वजनिक सेवाओं पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। वीआईपी की ज़रूरतें और हित आम लोगों की ज़रूरतों और हितों से ज़्यादा अहमियत रखते हैं, जिससे असमानता बढ़ती है और संस्थाओं में लोगों का भरोसा कम होता है।

वीआईपी संस्कृति को खत्म करने के लिए, अंतर्निहित सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को दूर करना ज़रूरी है। इसके लिए समावेशी विकास को बढ़ावा देने, संसाधनों और अवसरों तक समान पहुँच सुनिश्चित करने और धन और शक्ति का अधिक न्यायसंगत वितरण बनाने के लिए एक ठोस प्रयास की आवश्यकता है।

सरकार को वीआईपी संस्कृति के प्रतीकों और प्रथाओं को खत्म करने, यह सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए कि सार्वजनिक सेवाएँ सभी नागरिकों के लिए सुलभ और उत्तरदायी हों, और पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून के शासन के लिए प्रतिबद्ध हों।

भारत में वीआईपी संस्कृति देश के लोकतंत्र पर एक धब्बा है, जो समानता और निष्पक्षता के सिद्धांतों को कमज़ोर करती है, सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को बढ़ाती है, और आम लोगों में अलगाव और आक्रोश की भावना पैदा करती है। अधिक समावेशी और समतावादी समाज बनाने के लिए, वीआईपी संस्कृति को खत्म करना और समानता और सामाजिक न्याय की संस्कृति को बढ़ावा देना ज़रूरी है। बदलाव का समय अब आ गया है।

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