भारत के पुलिस तंत्र में व्यापक सुधारों की आवश्यकता

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विभिन्न राज्यों में जनता का आक्रोश और असंतोष स्थानीय पुलिस बल के खिलाफ बढ़ता जा रहा है। स्वतंत्रता के बाद से ही मांग हो रही है कि पुलिस व्यवस्था में भ्रष्टाचार, जवाबदेही की कमी और अक्षमता के दीर्घकालिक मुद्दों को संबोधित करने के लिए कठोर सुधारों की प्रक्रिया तत्काल प्रारंभ की जाए मगर ये बदलाव अभी भी लंबित है। पुराने 1861 के पुलिस अधिनियम से प्रेरित वर्तमान ढांचा आधुनिक समय के अपराध से निपटने के लिए अपर्याप्त है और इसने पुलिस और जनता के बीच विश्वास को खत्म कर दिया है।

पुलिस बल में कर्मचारियों की कमी, कौशल और प्रशिक्षण की कमी, अत्यधिक कार्यभार और खराब कार्य स्थितियों से जूझना पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप जनता और पुलिस के बीच विश्वास की कमी होती है। पुलिस को भ्रष्ट, सांप्रदायिक और राजनीतिक रूप से पक्षपाती मानने की धारणा व्यापक हो गई है। मामले को बदतर बनाने के लिए, पुलिस बल में सुधार के उद्देश्य से 2006 के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश कई राज्यों में अभी भी लागू नहीं हुए हैं।

पुलिस मामलों में राजनीतिक हस्तक्षेप बंद होना चाहिए और पुलिस कर्मियों के कौशल और व्यावसायिकता को बढ़ाने के लिए बेहतर प्रशिक्षण बुनियादी ढांचा प्रदान किया जाना चाहिए। निष्पक्षता और दक्षता सुनिश्चित करने के लिए जांच और कानून-व्यवस्था को अलग-अलग रखना बहुत ज़रूरी है।

पुलिस शिकायत प्राधिकरण की स्थापना और सामुदायिक पुलिसिंग पहलों को लागू करने से पुलिस और जनता के बीच विश्वसनीयता की खाई को पाटने में मदद मिल सकती है। मानवाधिकार उल्लंघन और पुलिस की बर्बरता गंभीर चिंताएँ हैं जिन्हें सुधारों के ज़रिए संबोधित किया जाना चाहिए।

एक सभ्य, लोकतांत्रिक समाज में, पुलिस को विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों के पक्ष में दिखने के बजाय, लोगों और व्यवस्था के पक्ष में होना चाहिए। कई लोगों का मानना है कि पुलिस पर अभी भी औपनिवेशिक विरासत का बोझ है, जिसे व्यापक सुधारों के ज़रिए खत्म किया जाना चाहिए।

दक्षता, जवाबदेही और जनता के भरोसे को बढ़ाने के लिए कठोर पुलिस सुधारों को लागू करना समय की मांग है। सरकार को मौजूदा व्यवस्था में कमियों और खामियों को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए और एक ज़्यादा पारदर्शी, जवाबदेह और कुशल कानून प्रवर्तन प्रणाली स्थापित करनी चाहिए जो कानून के शासन को बनाए रखे और सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे।

आगरा की पर्यटन क्षमता को बढ़ाने के लिए नागरिक सुविधाओं का आधुनिकीकरण जरूरी

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पर्यटन के क्षेत्र में भारत का चमकता सितारा आगरा सितंबर में नए पर्यटन सत्र का इंतजार कर रहा है। हालांकि, शहर को कई नागरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिन्हें आगंतुकों के अनुभव को बेहतर बनाने और सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए तुरंत संबोधित करने की आवश्यकता है। बुनियादी सुविधाओं में सुधार के अलावा, आगंतुकों को एक समग्र अनुभव प्रदान करने के लिए आगरा के कम प्रसिद्ध आकर्षण और सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित करने पर जोर दिया जाना चाहिए।

मौजूदा नागरिक समस्याओं से निपटने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। शहर के अधिकारियों को सुरक्षा और सुविधा सुनिश्चित करने के लिए क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत, गड्ढों को ठीक करना, बंद नालियों को साफ करना और स्ट्रीट लाइटिंग में सुधार करना प्राथमिकता देनी चाहिए। सुगम आवागमन की सुविधा और सौंदर्य को बढ़ाने के लिए रास्तों पर अतिक्रमण को हटाया जाना चाहिए। सार्वजनिक शौचालयों को साफ और कार्यात्मक बनाए रखा जाना चाहिए, और स्वागत करने वाला वातावरण बनाने के लिए भिखारियों और दलालों को प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया जाना चाहिए।

बुनियादी सुविधाओं में सुधार के अलावा, बाजारों को सजाया जाना चाहिए और एक जीवंत खरीदारी अनुभव बनाने के लिए वाणिज्यिक क्षेत्रों को सुव्यवस्थित किया जाना चाहिए। स्थानीय आतिथ्य उद्योग को शाम के समय मनोरंजन के विविध विकल्प प्रदान करने चाहिए, जिसमें पारंपरिक सांस्कृतिक प्रदर्शन, संगीत कार्यक्रम और शहर की समृद्ध विरासत को प्रदर्शित करने वाले पाक अनुभव शामिल हैं।

तीन विश्व धरोहर स्मारकों का घर होने के बावजूद, आगरा में कई अन्य आकर्षण हैं, जिनका प्रचार-प्रसार कम किया गया है। पर्यटन विभाग और स्थानीय हितधारकों को इन छिपे हुए रत्नों का प्रभावी ढंग से विपणन करने और पर्यटक अनुभव में विविधता लाने के लिए सहयोग करने की आवश्यकता है। सूर सरोवर झील और पक्षी अभयारण्य जैसे स्थानों के साथ-साथ राम लीला और राम बारात जैसे स्थानीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों को अद्वितीय अनुभव चाहने वाले आगंतुकों को आकर्षित करने के लिए उजागर किया जाना चाहिए।

नागरिक सुविधाओं का आधुनिकीकरण करके और आगरा की विविध पेशकशों को बढ़ावा देकर, शहर खुद को एक व्यापक पर्यटन स्थल के रूप में स्थापित कर सकता है, जो विभिन्न प्रकार की रुचियों को पूरा करता है। बुनियादी ढांचे को बढ़ाना, स्वच्छता बनाए रखना और स्थानीय संस्कृति और विरासत को प्रदर्शित करना अधिक पर्यटकों को आकर्षित करेगा और क्षेत्र के आर्थिक विकास में योगदान देगा।

इसे प्राप्त करने के लिए, निम्नलिखित उपायों पर ध्यान दिया जाए:

– सड़क सुरक्षा: क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत करें, गड्ढों को भरें और उचित स्ट्रीट लाइटें लगाएं।
– बाजार का पुनरुद्धार: खरीदारी के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए बाजारों को सजाएँ और सुव्यवस्थित करें।
– विरासत संवर्धन: विश्व धरोहर स्मारकों और स्थानीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों सहित आगरा के अनेक आकर्षणों का विपणन करें।

– शाम का मनोरंजन: पर्यटकों को व्यस्त रखने के लिए विविध शाम के मनोरंजन विकल्प प्रदान करें।

– हवाई संपर्क: प्रमुख भारतीय और विदेशी गंतव्यों के साथ हवाई संपर्क में सुधार करें।

– सार्वजनिक शौचालय: स्वच्छ अनुभव सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक शौचालयों को साफ करें और उनका रखरखाव करें।

– अतिक्रमण हटाना: सुगम आवागमन सुनिश्चित करने के लिए मार्गों से अतिक्रमण हटाएं।

– भिखारी और दलालों पर नियंत्रण: उत्पीड़न को रोकने के लिए भिखारियों और लपकों, या दलालों की उपस्थिति को नियंत्रित करें।

इन उपायों को लागू करके, आगरा अपनी पूर्ण पर्यटन क्षमता को उजागर कर सकता है और आगंतुकों को विश्व स्तरीय अनुभव प्रदान कर सकता है।

Bollywood Retro Live Painting and Auction Event at Pacific Mall NSP-Pitampura Celebrates Art, Culture, and Charity

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New Delhi – Pacific Mall, NSP-Pitampura, in collaboration with ImageNation Street Art, hosted a spectacular live painting event on the theme of *Bollywood Retro*, bringing together 40 talented artists for an immersive cultural experience. From 2 to 5 pm, visitors were treated to the mesmerizing sight of artists creating vibrant masterpieces that paid homage to iconic moments in Bollywood history. The event concluded with a live auction of the works, with proceeds benefiting NGO Rahi.

The event, which was free and open to the public, attracted a large crowd, all captivated by the synergy of creativity, nostalgia, and live art. The artists skillfully brought retro Bollywood to life, recreating memorable cinematic moments through dynamic, bold, and visually striking interpretations. The live auction that followed saw art lovers and cinema enthusiasts bid enthusiastically, knowing their contributions would go toward a noble cause.

Ashwani Kumar Prithviwasi, Founder and Principal of the Delhi Collage of Art, was one of the esteemed guests at the event. Reflecting on the enduring appeal of Bollywood’s retro aesthetic, Prithviwasi remarked, “Bollywood retro style remains a vital source of inspiration for contemporary visual artists. Its vibrant aesthetic, iconic imagery, and timeless themes resonate with today’s audiences, offering a bridge between cultural heritage and modern expression.”

Film critic and historian Murtaza Ali Khan, who also graced the occasion, expressed his admiration for the event, stating, “Bollywood Retro is a celebration of the fusion between art and the timeless charm of retro Bollywood. Bringing together 40 talented artists, the live painting and auction not only showcased creative interpretations of iconic Bollywood moments but also offered a unique platform for art lovers and cinema enthusiasts alike. Aakshat Sinha’s passion for merging art with popular culture has truly elevated this event.”

The event was curated by Aakshat Sinha, the visionary behind ImageNation Street Art, whose dedication to blending art with popular culture was evident in every detail of the day. Under his guidance, the artists were able to capture the essence of Bollywood’s golden era, offering the audience a deeply nostalgic yet contemporary experience.

The live painting and auction were a testament to the power of art to connect people and support important causes. The event marked a perfect fusion of Bollywood’s timeless charm with the dynamic energy of live street art, leaving a lasting impression on all attendees.

पत्रकारिता का ये इंटरव्यू काल है

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ऋतेश मिश्र/ रायपुर

पत्रकारिता का नया दौर इंटरव्यू और पॉडकास्टर युग को माना जाय। यहां सोफे और मेकप आर्टिस्टों की उपयोगिता बढ़ गई है। इसमें सिर्फ गंभीर भाव में लच्छेदार लफ्फाजी है।

हर पत्रकार कोई इंटरव्यू लेना चाहता और हर आदमी चाहे वो पर्याप्त जाहिल क्यों न हो , इंटरव्यू देना है। हर जगह भरा पड़ा है इंटरव्यू वाला कंटेंट।

इस बीच टीवी एंकर्स बेचारे लाचार होते गए हैं। क्या करें। उनका जमाना ढलान पर है। अब उनका हाथ हिला हिला कर..चीखना चिल्लाना, थ्री पीस में नहर के पानी की तरह धारा प्रवाह बोलना दर्शकों को जमता नहीं है। लोग उबिया गए हैं।दर्शक मान चुके हैं कि टीवी उन्हें कुछ नया नहीं दे सकती। टीवी डब्बा बन चुका है। चावल, दाल, चीनी, नमक के डब्बे नुमा डब्बा, टीवी का डब्बा।

तो इसलिए अब पत्रकारिता के चौराहे पर इन्टरव्यू और पॉडकास्टिंग का नया नया उपक्रम शुरू हुआ है।
आप पूछेंगे कि इन्टरव्यू तो पहले भी हुआ करता था, हां होता था, पर पहले हुए साक्षात्कारों का कथ्य, विषय, और प्रारूप बेहद गंभीर विमर्श लिए होते थे। आज इंस्टाग्राम के रील्स से लोहा लेने के लिए इंटरव्यू किए जाते हैं। रील्स से लोहा मसलन गुड़ से खांड़ बन चुकी चाशनी की तरह वायरल होने की लसलसाहट से युक्त..।

लेकिन आपको नहीं मुझे तरस आता है उस पत्रकार पे और समूची पत्रकारिता पे। लेकिन मेरे तरस आने से कुछ होता नहीं है ।

तो साथियों अब के सेलिब्रिटी पत्रकार एंकरिंग के थ्री पीस सूट पर पड़ी धूल झाड़ सोफे पर आ बैठे हैं। उन्हें अपनी क्षमता का सार इंटरव्यू में ही अभिव्यक्त करना है। कोशिश करनी है कि स्क्रीनटाइम का औसत कायम रहे। सवालों जवाबों के क्लिप्स रील्स में परिवर्तित हो पाएं।

एक जमाना था जब पत्रकारिता जमीन पर जाकर कुछ नया खोजती थी, धरातल पर उसकी पकड़ सबसे अधिक थी। जमीन से ही भेद खुलते थे। नई परिघटनाओं का अन्वेषण होता था। वह जमाना ग्राउंड रिपोर्टरों का था। संस्थान में उनकी एक विशिष्ट जगह थी। महीनों खबरों के पीछे रहना, पड़ताल में जगह जगह भंछना, मोटर साइकिल, कार, बस, रेल, ट्रक जरूरत पर जो मिले बैठे, पहुंच गए। महीनों बाद उन्हें जो हासिल होता उससे राज्य की सरकारें हिल जाती थीं। नीतिगत निर्णय बदल जाते थे। ऐसे रिपोर्टर अब नहीं मिलते हैं। अंग्रेजी के कुछ अखबार थोड़ा बहुत प्रामाणिक देने की कोशिश भर करते हैं पर अब उनकी भी सीमा बांध दी गई है।तो अब हम सबने ये मान लिया है कि पत्रकारिता का ये काल महज इंटरव्यू करना, देखना रह गया है।

दरअसल सरकारें , चाहे जिस भी पार्टी की हों, यही चाहती है। सरकार पत्रकारों को सेलिब्रिटी बनते देखना चाहती है।लाखों फॉलोअर्स, असंख्य व्यूज। बस खबर नहीं आनी चाहिए। सरकार चाहती है खबरों के संस्थान रियल्टी शोज को हर शाम होस्ट करते रहें। लोग अपने घरों में पिनट्स खाते हुए बड़े चाव से देखें।

इस तरह खबरों, घटनाओं की पड़ताल करने वाली विधा क्यूरेटेड साक्षात्कार युग में धीरे धीरे शिफ्ट होती गई।

जैसे हिंदी साहित्य के बड़े आलोचकों में आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, नामवर सिंह जैसे नाम मिल जायेंगे। वैसे ही पत्रकारों को भी राज्य का आलोचक होना था। राज्य की एक एक नीति एक एक कदम की परख करने वाला पत्रकार आलोचक।इसीलिए मेरा मानना है कि पत्रकारों को हिंदी आलोचना से भी बहुत कुछ सीखना चाहिए। मैंने कई कवियों को भड़कते देखा है आलोचकों पर। रचनाओं के झूठ, कविताओं के पाखंड जब खुलते हैं तो आलोचकों को कविजन गाली देते हैं।

एक कायदे का पत्रकार अगर कायदे से भेद खोलने लगे तो सरकारी मुलाजिम से लेकर मंत्री मनसबदारों तक रोज भड़कते रहेंगे। और उनका भड़कना ही पत्रकारों का असली पुरस्कार होगा।

ख़ैर,
क्या किया जा सकता है।
जमाना नया है
सोफे पर बैठिए
चलिए इन्टरव्यू देखते हैं।

अश्लील है, सब पर हमारा किया धरा है ।

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