भारत के भीतर पाकिस्तान समर्थन की इस अंतर्धारा का स्त्रोत क्या हैं ?

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पहलगांव में आतंकी हमले के बाद पूरे भारत में पाकिस्तान को सबक सिखाने की आवाज उठ रही है। विपक्षी नेताओं के साथ मुस्लिम धर्मगुरु भी आगे आये हैं। कहीं कहीं तो आतंकवाद के विरुद्ध काली पट्टी बाँधकर नमाज अदा की गई। लेकिन विरोध के इन स्वरों के बीच आतंकवादियों और पाकिस्तान समर्थन के स्पष्ट दृश्य भी देखे गये। कहीं कोई पाकिस्तान के झंडे सहेजता दिखाई दिया तो कहीं पाकिस्तान जिन्दाबाद की ध्वनि भी सुनाई दी गई।

पहलगांव में यह आतंकी हमला साधारण नहीं था। यह पिछले लगभग सभी आतंकी हमलों से बहुत अलग था। अब तक हुये हमलों में आतंकवादी या तो घात लगाकर हमला करते थे अथवा ब्लास्ट करके लौट जाते थे। लेकिन इस हमले में ऐसा नहीं हुआ। आतंकवादी सीना तानकर पहलगांव के बैसरन मैदान में आये। उन्होंने पहले हिन्दुओं को कतारबद्ध खड़ा किया। फिर पहचान पूछकर गोली मारी। आतंकवादियों ने हिन्दुओं पहचान सामान्य रूप से नहीं पूछी। पहचान पूछने का यह तरीका क्रूर और निम्नतम था। पहले कलमा पढ़वाया फिर पेन्ट की जिप खुलवाकर पहचान सुनिश्चित करने की नौटंकी की गई। अब तक जो विवरण सामने आये हैं उनके अनुसार अप्रैल के प्रथम सप्ताह से आतंकवादी इस क्षेत्र में सक्रिय थे। कुछ खच्चरवालों से भी उनका संपर्क था। दो लोग तो खुलकर उनके साथ थे। उनके पास एक एक पर्यटक का विवरण था। फिर भी पहचान देखने केलिये पेन्ट की जिप खुलवाई गई। पेन्ट की जिप खुलवाना और कलमा पढ़वाना उनकी सुनियोजित कार्रवाई थी। इसके द्वारा वे भारत के कट्टरपंथी मुसलमानों का मानसिक समर्थन प्राप्त करना चाहते थे। इसमें वे बड़ी सीमा तक सफल भी रहे। इसकी झलक पूरे देश में देखी भी गई। एक ओर आतंकवादियों और पाकिस्तान पर निर्णयात्मक कार्रवाई की आवाज उठी तो वहीं वहीं कुछ लोग भी सामने आये जिनकी गतिविधि पाकिस्तान और आतंकवाद का समर्थन में मानी गई। आतंकवाद और पाकिस्तान के समर्थन में ये स्वर किसी एक प्रदेश या किसी एक क्षेत्र में नहीं, पूरे भारत में सुने गये। सुदूर असम में भी और मध्यप्रदेश में भी। कर्नाटक में भी और उत्तर प्रदेश में भी। दिल्ली में भी और केरल में भी। इस श्रंखला में विधायक, पार्षद, पत्रकार, विद्यार्थी, वकील और सेवानिवृत्त शिक्षक जैसे सभी स्तर के लोग देखे हैं। एक आश्चर्यजनक बात यह भी देखी गई महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तरप्रदेश में पाकिस्तान का झंडा सहेजते हुये महिलाएँ देखीं गईं।

सामान्यतः उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक के समाज जीवन में बहुत भिन्नता है। भाषा और भूषा ही नहीं भोजन में भी अंतर है फिर भी इन तीनों प्रदेशों में पाकिस्तान का झंडा सहेजते हुये महिलाएँ देखी गई। वस्तुतः पहलगांव में हुये आतंकी हमले के विरुद्ध देशभर में प्रदर्शन हुये और पाकिस्तान का झंडा फाड़कर फेका गया। कहीं कहीं बीच सड़क पर चिपकाया भी गया ताकि लोग उसके ऊपर से निकले। ऐसा करके प्रदर्शनकारी पाकिस्तान को अपना कड़ा विरोध संदेश देना चाहते थे। ऐसा उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में भी हुआ। बजरंग दल ने प्रदर्शन करके पाकिस्तान का झंडा जलाया था। प्रदर्शनकारी तो चले गये लेकिन पाकिस्तानी झंडे के टुकड़े सड़क पर बिखरे रहे। लोग उनके ऊपर गाड़ियों से अथवा पैर रखकर निकल रहे थे। उस सड़क से एक मुस्लिम छात्रा स्कूटी से निकल रही थी। उसने अपनी स्कूटी रोकी और पाकिस्तानी झंडे को सड़क से हटाने लगी । लोगों ने रोका तो उसने छुपाया भी नहीं और झंडे के टुकड़े उठाने केलिये रुकना स्वीकार किया।

दूसरी घटना मुम्बई के विले पारले स्टेशन की है। महाराष्ट्र की राजधानी मुम्बई में भी अनेक स्थानों पर पाकिस्तान के विरुद्ध प्रदर्शन हुये। पाकिस्तान के झंडे जलाये गये अथवा कागज के झंडों को फाड़कर फेका गया। ऐसा ही प्रदर्शन विले पारले स्टेशन क्षेत्र में हुआ। वहाँ स्टेशन के बाहर सीढ़ियों पर पाकिस्तानी झंडा लगा दिया गया। लोग उसपर पैर रखकर निकल रहे थे। तभी एक मुस्लिम महिला वहाँ पहुंची उसने झंडे पर इस प्रकार पैर रखकर निकलने का कड़ा विरोध जताया और उन टुकड़ों को वहाँ से हटाया भी। यही दृश्य कर्नाटक में भी देखा गया। वहाँ भी सड़क पर विखरे पाकिस्तानी झंडे के टुकड़ों को दो महिलाएँ सहेजते देखी गई। यदि किसी ने टोका तो दोनों महिलाओं ने कड़क कर उत्तर भी दिया। ये तीन घटनाएँ वे हैं जिनके वीडियो और बातचीत मीडिया और सोशल मीडिया पर वायरल हुई। ऐसी और कितने स्थान होंगे जहाँ लोग खुलकर पाकिस्तानी झंडे को अपमान से बचाने केलिये सामने आये होंगे। इन तीनों घटनाओं में महिलाओं का होना इस संदेह को भी जन्म देता है कि पाकिस्तानी झंडे के टुकड़े सहेजने की कोई अंतर्धारा देशभर में समान रूप से बह रही है। जिसने महिलाओं को आगे किया। चूँकि भारतीय जन मानस महिलाओं का सम्मान करता है। यह रणनीति वर्ष 2019 में दिल्ली के शाहीनबाग के प्रदर्शन में भी देखी गई थी जिसमें महिलाओं को आगे करके प्रदर्शन को आक्रामक बनाया गया था। अब पुनः भारत के विभिन्न स्थानों में पाकिस्तानी झंडे के टुकड़े सहेजने के लिये महिलाएँ ही सामने आईं। जिन तीन स्थानों के वीडियो वायरल हुये इन तीनों स्थानों पर झंडे के टुकड़े सहेजने वाली महिलाओं के तेवर भी समान रूप से तीखे थे। हो सकता है वीडियो वाली तीनों घटनाओं में कोई योजना न हो। यदि योजना नहीं है और केवल संयोग है तो बहुत आश्चर्यजनक संयोग। सड़क पर पाकिस्तानी झंडा सहेजने की ऐसी घटनाओं के समाचार दिल्ली, बंगाल और मध्यप्रदेश से भी आये। लेकिन प्राँतों में सड़क पर झंडे के टुकड़े उठाने केलिये किशोर वय के विद्यार्थी सामने आये।

सड़क पर पड़े पाकिस्तानी झंडा सहेजने की इन घटनाओं के अतिरिक्त सोशल मीडिया पर पाकिस्तान और आतंकवादियों के समर्थन में पोस्ट डालने की सौ से अधिक घटनाएँ सामने आईं। इनमें सबसे अधिक असम प्राँत से आईं। असम में अबतक 42 एफआईआर दर्ज हो चुकीं हैं। इनमें ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के विधायक अमीनुल इस्लाम भी हैं। विधायक अमीनुल इस्लाम ने सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट में पहलगांव हमले को भी पुलवामा हमले की भाँति “सरकार की साजिश” बताया था। इसके अतिरिक्त कश्मीर से लेकर केरल तक कुछ स्वर ऐसे भी सुनाई दिये जिनमें भारत सरकार से पहलगांव आतंकी हमले का बदला लेने केलिये पाकिस्तान पर आक्रमण न करने की अपील की गई। इसे मानवीयता से जोड़कर कहा गया कि इससे सामान्य नागरिकों को कष्ट होगा। ऐसी अपील करने वाले अधिकांश राजनेता और कथित सामाजिक कार्यकर्ता रहे।

पहलगांव में हुये आतंकी हमले के बाद के इन तीन सप्ताहों में सामने आई ये घटनाएँ तीन प्रकार की हैं लेकिन तीनों का स्वर पाकिस्तान का बचाव ही है। पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकवादियों द्वारा हिन्दुओं पर यह हमला पहला नहीं है। जो पाकिस्तान बनने के बाद आरंभ नहीं हुये अपितु पाकिस्तान बनने की प्रक्रिया से ही शुरु हो गये थे। इसे 1921 की मालाबार में हुई हिन्दुओं के सामूहिक नरसंहार से लेकर लगातार हुये दंगों, मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन और कश्मीर में कबाइलियों के नाम पर कई गई हिंसा कश्मीरी पंडितों की हत्याओं, कश्मीर में श्रमिकों की हत्या से लेकर देशभर हो रहे आतंकी हमलों से समझा जा सकता है। फिर भी पाकिस्तानी झंडे को अपमान से बचाना, सोशल मीडिया पर निसंकोच आतंकवादियों तथा लश्कर को बधाई लिखना और लोगों का ध्यान पाकिस्तान से हटाने केलिये भारत सरकार की साजिश लिखने का आशय क्या है और लगातार भारत विरोधी गतिविधियों के बाद भी पाकिस्तान के समर्थन अथवा सद्भाव की मानसिकता का कारण क्या है ?

इसके दो कारण हैं। एक तो पहलगांव में आतंकवादियों द्वारा अपनाई गई हिंसा की शैली में स्पष्ट दीख रहा है। और दूसरा पाकिस्तान निर्माण की मानसिकता में है। पहलगांव में आतंकवादियों ने पर्यटकों को सीधे गोली नहीं मारी। पहले पेन्ट की जिप खुलवाई, कलमा बुलवाया फिर गोली मारी। पहचान पूछने और कलमा पढ़वाने की यह नौटंकी आतंकी हिंसा को धर्म की चादर से ढँकने का षड्यंत्र है। ताकि धर्मभीरू मुसलमानों का समर्थन मिल सके अथवा उन्हें तटस्थ किया जा सके। यह वही शैली है जो सैकड़ों सालों से मध्य ऐशिया के लुटेरे अपना रहे हैं। भारत पर पहले हमले सत्ता के लिये नहीं बल्कि लूट केलिये ही हुये थे। सामूहिक नरसंहार, लूट और निर्दोष स्त्री बच्चों पर अत्याचार करने की अनुमति कोई धर्म नहीं देता। लेकिन सैकड़ों सालों से ऐसे अमानवीय कृत्यों को ढँकने केलिये धार्मिक नारा लगाने का खेल सैकड़ों सालों से चल रहा है। वही पहलगांव में खेला गया।

दूसरा पाकिस्तान की मानसिकता को सजीव रखना है। पाकिस्तान आज भले एक देश के रूप में स्थित है। लेकिन वह एक मानसिकता है। जिसका प्रकटीकरण अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के जनक सर सैय्यद अहमद ने अपने लेखन और व्याख्यानों में तब किया था जब न तो मुस्लिम लीग अस्तित्व में आई थी और न पाकिस्तान का स्वरूप स्पष्ट हुआ था। फिर भारत के मुसलमानों को भावनात्मक रूप से पाकिस्तान से जोड़ने का अभियान चला। जो अक्सर पर सड़कों पर दिखाई देता है। कभी क्रिकेट में पाकिस्तान की जीत पर मिठाई बँटते हुये कभी पाकिस्तानी झंडा फहराने के रूप में दिखाई देता है। इन्हें पाकिस्तान से जोड़ने केलिये धार्मिक आवरण ही दिया जाता है। जिस प्रकार युवाओं का ब्रेनवाॅश करके आतंकवादी बनाने का खेल चल रहा है ठीक उसी प्रकार समाज को किसी धार्मिक नारे से जोड़कर भारत के भीतर पाकिस्तान से भावनात्मक जुड़े रहने का अभियान चल रहा है। जो पहलगांव हमले के बाद देशभर में हुये विरोध प्रदर्शन के बीच पाकिस्तानी झंडे के टुकड़े सहेजने में, मानवता केलिये पाकिस्तान पर हमला न करने की सलाह अथवा कलमा पढ़वाने का समाचार सुनकर लश्कर को वधाई संदेश भेजने में झलक रहा है।

सोशल मीडिया का धर्मयुद्ध: एलन मस्क के विरुद्ध महामंच

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अनुराग पुनेठा

जब भी इतिहास नई करवट लेता है, वह अक्सर शोर से नहीं, एक असहज ख़ामोशी से शुरू होता है। ठीक वैसे ही जैसे आज की दुनिया में सबसे बड़ा युद्ध—न हथियारों से, न सरहदों पर—बल्कि विचारों और विज्ञापन बजटों के ज़रिए लड़ा जा रहा है। यह वो युद्ध है जहाँ नायक और खलनायक की पहचान करना उतना आसान नहीं जितना पहले कभी था। इस युद्ध के केंद्र में है एलन मस्क—टेस्ला, स्पेसएक्स और अब X के मालिक—और उसके सामने खड़ी हैं 18 वैश्विक कंपनियाँ, जिनके पास लगभग 900 अरब डॉलर का संयुक्त वार्षिक विज्ञापन बजट है। Nestlé, Lego, Shell, Unilever, Pepsi, Colgate, Procter & Gamble—यह कोई साधारण नाम नहीं, बल्कि वो ताकतें हैं जो तय करती हैं कि एक आम इंसान इंटरनेट पर क्या देखेगा और क्या नहीं।

2022 में इन कंपनियों ने GARM नामक संगठन के ज़रिए X से सामूहिक रूप से विज्ञापन हटा लिए। कारण बताया गया: “ब्रांड सेफ्टी।” लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह सचमुच सिर्फ सुरक्षा का मामला था, या एक सोची-समझी रणनीति जिससे एक मंच को अपने हिसाब से मोड़ा जाए? उन्होंने X से कहा—कुछ शब्द हटाओ, कुछ विचारों को सीमित करो, कुछ चेहरों को मंच से बाहर करो। जब मस्क ने मंच को स्वतंत्र रखने की ज़िद की, तो पैसे का बहिष्कार शुरू हो गया। यह आज के दौर की ‘अभिव्यक्ति की कीमत’ है—और चुप्पी का मूल्य उससे भी ज़्यादा।

एलन मस्क ने चुप नहीं बैठने का फैसला किया। उसने मुकदमा ठोका—सिर्फ बदले की भावना से नहीं, बल्कि एक वैचारिक सवाल के साथ: क्या कॉरपोरेट जगत को यह अधिकार है कि वह इंटरनेट पर विचारों की सीमा तय करे? क्या एक समूह, अपने धनबल के ज़रिए, तय कर सकता है कि किसकी बात सुनी जाएगी और किसे खामोश किया जाएगा? और जब अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट में यह सामने आया कि ये कंपनियाँ एकजुट होकर X की नीतियों को प्रभावित कर रही थीं, तो यह मुकदमा सिर्फ एक कानूनी मामला नहीं रह गया, यह बन गया स्वतंत्रता बनाम नियंत्रण की लड़ाई।

इस कहानी की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहाँ कोई नायक पूरी तरह से मासूम नहीं है, और कोई खलनायक पूरी तरह से दानवी नहीं। मस्क की अराजकता, उसका अहंकार, कभी-कभी सीमाओं से खेलने की उसकी आदत, उसे संदेह के घेरे में लाती है। लेकिन फिर भी, क्या कोई दूसरा इतना बड़ा जोखिम उठाने को तैयार होता? यह लड़ाई उसके लिए सिर्फ पैसे की नहीं, मंच की आत्मा की है। वह पूछ रहा है: क्या किसी विचार को उसकी असहजता के कारण दबा देना सही है? क्या अभिव्यक्ति का मंच एक कॉरपोरेट हैंडबुक से चलना चाहिए?

इस पूरे संघर्ष को कोई एक नाम देना मुश्किल है। कुछ इसे कॉरपोरेट सेंसरशिप कहेंगे, कुछ इसे डिजिटल युग की नई युद्ध नीति। लेकिन इसकी गूंज बहुत दूर तक जाएगी—यह मामला अदालत में भले ही कुछ हफ़्तों या महीनों में सुलझ जाए, पर इसका असर आने वाले दशकों तक महसूस किया जाएगा। क्योंकि यह सिर्फ एक मुकदमा नहीं, बल्कि वह सवाल है जो हर व्यक्ति को छूता है जो इंटरनेट पर बोलता, सोचता और जीता है।

क्या हम एक ऐसी दुनिया चाहते हैं जहाँ विज्ञापनदाता तय करें कि कौन बोले? क्या हम उस लोकतंत्र में यक़ीन रखते हैं जहाँ विचार स्वतंत्र हों, लेकिन अगर वो विचार किसी ब्रांड की “छवि” के खिलाफ हों, तो उन्हें दबा दिया जाए? या फिर हम एक ऐसी दुनिया चाहते हैं जहाँ असहमति, असुविधा और ईमानदारी—सभी को मंच मिले?

शायद इस लड़ाई का नतीजा ये बताएगा कि डिजिटल युग में लोकतंत्र का मूल्य क्या है। क्योंकि यहाँ बात केवल एलन मस्क या 18 कंपनियों की नहीं है—यह हमारी उस मौलिक स्वतंत्रता की है जिसे हम अक्सर अपनी स्क्रीन पर स्क्रॉल करते हुए हल्के में ले लेते हैं। यह वही क्षण है जहाँ ‘कैंसल कल्चर’ और ‘कॉरपोरेट सेंसरशिप’ का अंतर धुंधला हो जाता है। और यही वह धुंध है जिससे आगे की दिशा तय होगी।

बात सिंदूर के नाम पर पैदा किए जा रहे विवाद की

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कोई पिता या बड़ा भाई बनकर अपनी बेटी या छोटी बहन के लिए सिंदूर भेज रहा है तो इतना शोर क्यों मचाया जा रहा है?

भारतीय संस्कृति में, खासकर हिंदू विवाह परंपराओं में, सिंदूर को अक्सर ससुराल की तरफ से दुल्हन को भेजा जाता है। यह आमतौर पर विवाह के समय या उसके बाद की रस्मों में होता है, जैसे कि विदाई के बाद या गृह प्रवेश के दौरान। सिंदूर को सुहागिन स्त्री के लिए पति की लंबी उम्र और वैवाहिक जीवन की खुशहाली का प्रतीक माना जाता है।

कुछ समुदायों में, ससुराल पक्ष की ओर से सिंदूर, चूड़ियाँ, कपड़े और अन्य सुहाग की सामग्री दुल्हन को दी जाती है, जिसे “सिंदूर दान” या “सुहाग सामग्री” के रूप में जाना जाता है। यह प्रथा क्षेत्र और समुदाय के अनुसार थोड़ी भिन्न हो सकती है।

जबसे बीजेपी ने घर घर सिंदूर पहुंचाने के अभियान का संकल्प लिया है, इससे सबसे अधिक समस्या उन्हें हो रही है, जो नए नए कन्वर्टेड हुए है या जिन्होंने क्रिश्चियन मां या क्रिश्चियन पत्नी से सिंदूर का महत्व समझा है।

वैसे यह देश एक दूसरे की परंपराओं को सम्मान देकर महान बना है लेकिन जिन्हें अपनी पहचान को लेकर ही डाउट हो अथवा बच्चे का नाम रखते हुए पिता का सरनेम लगाना है या क्रिश्चियन ससुर का सरनेम लगाना है तक की समझ ना हो, वे सिंदूर का महत्व क्या समझेंगे और क्या समझा पाएंगे?

28 मई 1883 : दोहरा आजीवन कारावास, सर्वाधिक प्रताड़ना ..

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भारतीय स्वाभिमान और स्वातंत्र्य वोध जागरण केलिए यूँ तो करोड़ों महापुरुषों के जीवन का बलिदान हुआ है किन्तु उनमें कुछ ऐसे हैं जिनके जीवन की प्रत्येक श्वाँस राष्ट्र के लिये समर्पित रही । स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी ऐसे ही महान विभूति थे जिनके जीवन का प्रतिक्षण राष्ट्र और स्वत्व बोध कराने के लिये समर्पित रहा । वे संसार के एक मात्र ऐसे कैदी थे जिन्हें एक ही जीवन में दो आजीवन कारावास का दंड मिला । यह उनके संघर्ष और अंग्रेज सरकार द्वारा दी गई यातनाओं का ही कारण था कि उन्हें समाज ने “स्वातंत्र्यवीर” जैसे गौरवमयी उपाख्य से सम्मानित किया ।

उन्होंने अंडमान की काला-पानी जेल में कठोरतम यातनाएँ सहीं। उनकी कोठरी 7 X 11 आकार की थी । मौसम गर्मी का हो या सर्दी का उन्हें जमीन पर ही सोना होता था । इसी कोठरी कोने में शौच और पेशाब करना होती । और इसी में भोजन करना होता था । हाथ में हथकड़ी और पैरों में बेड़ियाँ लगी होती थीं। उसी स्थिति में जो और जैसा मिले, वही भोजन करना होता था । उन्हें प्रतिदिन बैल की भाँति कोल्हू में जोता जाता था । यदि तेल निकालने की मात्रा कम हो तो पिटाई होती थी । भोजन नहीं दिया जाता था । उसी जेल में उनके भाई भी थे पर दोनों भाई एक दूसरे से मिलना तो दूर देख भी नहीं सकते थे । पूरी जेल में सावरकर जी एकमात्र ऐसे कैदी थे, जिनके गले में अंग्रेजों ने एक पट्टी लटका रखी थी । इस पर “D” लिखा था । “D” अर्थात डेंजरस। यातनाएँ देने का यह चक्र चला लगभग ग्यारह वर्ष चला ।

इतनी यातनाएँ देने का कारण यह था कि पूना से लेकर लंदन तक उनके जीवन का कोई क्षण ऐसा नहीं बीता जब उन्होंने अंग्रेजों से भारत की मुक्ति का कोई उपक्रम न किया हो । स्वातंत्र्यवीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे जिन्होंने 1901 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर नासिक में आयोजित शोक सभा का विरोध किया था और कहा कि वो हमारे शत्रु देश की रानी थी, हम शोक क्यूँ करें? वीर सावरकर पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बकेश्वर में बड़े बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि दासता का उत्सव मत मनाओ..! उन्होंने 7 अक्टूबर 1905 को पूना में स्वदेशी अपनाओ आंदोलन छेड़ा और विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी ।

यह सावरकर जी द्वारा स्वाभिमान और स्वतव जागरण केलिए किये जाने वाले कार्यों का ही प्रभाव था कि तिलक जी ने अपने समाचार पत्र “केसरी” में सावरकर जी को छत्रपति शिवाजी महाराज के समान बताकर प्रशंसा की थी । सावरकर जी द्वारा विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के कारण उन्हे फर्म्युसन कॉलेज पुणे से निकाल दिया गया था । इसके विरोध में छात्रों ने हड़ताल की । इस समूची घटना पर तिलक जी ने ‘केसरी’ पत्र में सावरकर जी के पक्ष में सम्पादकीय लिखा । वे पहले ऐसे बैरिस्टर थे जिन्होंने ब्रिटेन में परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ब्रिटेन के राजा के प्रति वफ़ादार होने की शपथ लेने से इंकार कर दिया था । इस कारण उन्हें बैरिस्टर होने की उपाधि का पत्र कभी नहीं मिला । यह घटना 1909 की है । वीर सावरकर पहले ऐसे लेखक थे जिनकी पुस्तक “1857 का स्वातंत्र्य समर’ पर प्रकाशन के पहले ही प्रतिबंध लगा । वीर सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय आठ जुलाई 1910 को समुद्र में कूद पड़े थे और तैरकर फ्रांस पहुँच गए थे । लेकिन तट पर बंदी बना लिये गये । सावरकर जी पहले ऐसे क्रान्तिकारी थे जिनका मुकद्दमा अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में चला । वे भारत के पहले क्राँतिकारी थे जिन्हें अंग्रेजी काल में दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई गई। दो जन्म कारावास की सजा सुनते ही हंसकर बोले, “चलो, ईसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान लिया” । अपने काला पानी कारावास के दौरान उन्होंने कंकर और कोयले से कवितायें लिखीं और 6000 पंक्तियाँ याद रखीं ।

वे अंग्रेजी सत्ता काल में लगभग 30 वर्षों तक विभिन्न जेलों में रहे और स्वतंत्रता के बाद भी 1948 में गाँधी जी की हत्या के आक्षेप में पुनः गिरफ्तार हुये और न्यायालय द्वारा आरोप झूठे पाए जाने के बाद उन्हें ससम्मान रिहा किया गया ।

संक्षिप्त जीवन परिचय

ऐसे महान स्वातंत्र्यवीर विनायक सावरकर का जन्म महाराष्ट्र प्राँत के नासिक जिला अंतर्गत ग्राम भागुर में हुआ था। पिता दामोदर पंत सावरकर भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के लिये समर्पित ओजस्वी वक्ता थे और माता राधाबाई आध्यात्मिक विचारों और जीवन शैली की प्रबल पक्षधर थीं। इनके दो भाई गणेश दामोदर सावरकर उनसे बड़े थे और नारायण दामोदर सावरकर छोटे । एक बहन नैनाबाई थीं। जब विनायक केवल नौ वर्ष के थे तब महामारी में माता का देहान्त हो गया। और जब सोलह वर्ष के हुये तो पिता भी स्वर्ग सिधार गये । तब बड़े भाई गणेश सावरकर ने परिवार के पालन-पोषण का कार्य सँभाला। दुःख और कठिनाई की इस घड़ी में किशोरवय विनायक की संकल्प शक्ति और दृढ़ हुई । 1901 में नासिक के शिवाजी हाईस्कूल से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। बचपन से बहुत कुशाग्र बुद्धि और अति संवेदनशील स्वभाव के थे । पढ़ाई-लिखाई के साथ कविता कहानी और सामायिक विषयों पर आलेख लिखा करते थे । अपने छात्र जीवन में ही उन्होंने स्थानीय युवकों को साथ लेकर मित्र मेलों का आयोजन किया। इसी वर्ष1901 में विवाह हुआ । पत्नि यमुना बाई के पिता रामचन्द्र त्रयम्बक चिपलूणकर आर्थिक रूप से समृद्ध थे । इसलिये उन्होने अपने दामाद की उच्च शिक्षा का भार उठाया। अपने इन धर्म पिता की सहायता से उन्होंने पुणे के फर्ग्युसन कालेज से बी॰ए॰ किया। समय के साथ दो संतान उत्पन्न हुई पुत्र का नाम विश्वास सावरकर और पुत्री का नाम प्रभात सावरकर रखा ।

1904 में उन्होंने अभिनव भारत नामक संगठन की स्थापना की। यह संगठन युवकों अंग्रेजी शासन के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिकार करता था । अपने छात्र जीवन में भी वे राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत ओजस्वी भाषण दिया करते थे। सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाल गंगाधर तिलक जी उनसे बहुत प्रभावित हुये और उन्हीं के अनुमोदन पर सावरकर जी को श्यामजी कृष्ण वर्मा छात्रवृत्ति मिली। और 1906 में आगे की पढ़ाई के लिये लंदन गये ।

सावरकर जी ने लन्दन के ग्रेज इन्न लॉ कॉलेज में प्रवेश लिया और लंदन स्थित इण्डिया हाउस में रहने लगे । उन दिनों इण्डिया हाउस राजनितिक गतिविधियों का केन्द्र था जिसे श्यामाप्रसाद मुखर्जी चला रहे थे। सावरकर जी ने ‘फ़्री इण्डिया सोसायटी’ का गठन किया । इसके द्वारा वे भारतीय छात्रों के बीच स्वत्व और स्वाभिमान जागरण का अभियान चलाने में जुट गये । लंदन में ही उनकी भेंट लाला हरदयाल से हुई वे उन दिनों इण्डिया हाउस की देखरेख करते थे। 1 जुलाई 1909 को मदनलाल ढींगरा द्वारा विलियम हट कर्जन वायली को गोली मार दिये जाने के बाद उन्होंने लन्दन टाइम्स में एक लेख लिखा था। इसके लिये 13 मई 1910 को उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया । परन्तु 8 जुलाई 1910 को एम॰एस॰ मोरिया नामक जहाज से भारत ले जाते हुए सीवर होल के रास्ते ये भाग निकले । तैरकर फ्रांस के तट पर पहुँचे किन्तु बंदी बना लिये गये । 24 दिसम्बर 1910 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गयी। 31 जनवरी 1911 को इन्हें दोबारा आजीवन कारावास घोषित हुआ । ब्रिटिश शासन काल में दो-दो आजन्म कारावास की सजा सहने वाले सावरकर जी विश्व में अकेले क्रांतिकारी हैं । उन्हे काला पानी भेजा गया वहाँ वे लगभग ग्यारह वर्ष रहे ।

1920 में वल्लभ भाई पटेल और बाल गंगाधर तिलक के कहने पर ब्रिटिश कानून ना तोड़ने और विद्रोह ना करने की शर्त पर उनकी रिहाई हो गई। सावरकर जी जानते थे कि जेल जीवन से अच्छा समाज में समाज जागरण किया जाये ।

सावरकर जी काँग्रेस से जुड़े थे लेकिन मालाबार में हिंसा और असहयोग आँदोलन में खिलाफत आँदोलन को जोड़ देने के निर्णय से उनके मतभेद हुये और वे काँग्रेस छोड़कर हिन्दु महासभा से जुड़ गये । हिन्दु महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने ।

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ तब सावरकर जी ने दो ध्वज फहराये । एक भारतीय राष्ट्र ध्वज तिरंगा और दूसरा भारतीय संस्कृति का प्रतीक भगवा ध्वज । उन्होंने स्वतंत्र होने की प्रसन्नता व्यक्त की पर देश विभाजन पर दुःख व्यक्त किया । गाँधी जी हत्या के षड्यंत्र का आक्षेप उन पर भी लगा और 5 फरवरी 1948 गिरफ्तार किया गया। पर अदालत में आरोप सिद्ध न हुआ और वे सम्मान रिहा हुये । 19 अक्टूबर 1949 को उनके अनुज नारायणराव का देहान्त हुआ । 4 अप्रैल 1950 को पाकिस्तानी प्रधानमन्त्री लियाक़त अली ख़ान के दिल्ली आगमन पर पुनः उन्हें बेलगाम जेल में रोका गया। मई 1952 में पुणे की एक विशाल सभा में अभिनव भारत संगठन को भंग किया गया। 10 नवम्बर 1957 को नई दिल्ली में आयोजित भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम समारोह में वे मुख्य वक्ता रहे। 8 अक्टूबर 1949 को उन्हें पुणे विश्वविद्यालय ने डी०लिट० की मानद उपाधि से अलंकृत किया। 8 नवम्बर 1963 को उनकी पत्नी यमुनाबाई का निधन हुआ । सितम्बर, 1965 से उन्हें तेज ज्वर ने आ घेरा, जिसके बाद इनका स्वास्थ्य गिरने लगा। एक फरवरी 1966 को उन्होंने मृत्युपर्यन्त उपवास करने का निर्णय लिया और 26 फरवरी 1966 को बम्बई में प्रातः 10 बजे पार्थिव शरीर त्यागकर परमधाम को प्रस्थान किया ।

सावरकर जी ने भारत की आज की सभी राष्ट्रीय सुरक्षा सम्बन्धी समस्याओं को बहुत पहले ही भाँप लिया था । 1962 में चीन द्वारा आक्रमण करने के लगभग दस वर्ष पहले ही उन्होंने देश को सतर्क कर दिया था कि चीन भारत पर आक्रमण करने वाला है। भारत के स्वतंत्र हो जाने के बाद गोवा की मुक्ति की आवाज सबसे पहले सावरकर जी ने ही उठायी थी।

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