नाजुक है शांति की पनघट की डगर, पाकिस्तान करे अमन की पहल वरना हूरों का टोटा पड़ जाएगा

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अगर भारत ने पाकिस्तान पर अपनी पूरी परमाणु क्षमता का इस्तेमाल करके खुली जंग छेड़ी, तो इसके नतीजे पाकिस्तान, इस पूरे क्षेत्र, बल्कि मुमकिन है कि पूरी दुनिया के लिए क़यामत से कम नहीं होंगे।

अगले राउंड में, खुदा बचाए, जैसे ही भारत के मिसाइल रात के आसमान को चीरते हुए आगे बढ़ेंगे, पाकिस्तान के बड़े शहरों—इस्लामाबाद, लाहौर, कराची—में खतरे के सायरन बेअसर होकर चीख़ेंगे। मिनटों के अंदर, परमाणु हथियार अपने लक्ष्यों पर बरसना शुरू कर देंगे: सैन्य ठिकाने, हवाई अड्डे, कमांड सेंटर और घनी आबादी वाले शहर।

क्षितिज पर मशरूम के बादल उठेंगे, जो सूरज की रोशनी को ढक लेंगे। लाहौर और रावलपिंडी में, आग के बवंडर पूरे मोहल्लों को अपनी लपेट में ले लेंगे। ज़ीरो पॉइंट पर तापमान हज़ारों डिग्री तक पहुँच जाएगा, जिससे लोग और इमारतें पल भर में राख हो जाएँगे। बाहरी इलाकों में रहने वाले लोग तीसरी डिग्री की जलन और विकिरण बीमारी से पीड़ित होंगे। धमाकों की लहरें कई किलोमीटर तक सब कुछ तबाह कर देंगी।

धमाकों की लहरें संचार नेटवर्क को तबाह कर देंगी। पाकिस्तान के कमांड और कंट्रोल सिस्टम लड़खड़ा जाएँगे। आपातकालीन सेवाएँ या तो पूरी तरह से नष्ट हो जाएँगी या फिर बुरी तरह से चरमरा जाएँगी। कुछ ही घंटों में फॉलआउट फैलना शुरू हो जाएगा, जो हवाओं के साथ पंजाब, सिंध और दूर तक जाएगा। काली बारिश होगी, जो पानी के स्रोतों को ज़हर देगी। कृषि क्षेत्र विकिरणित हो जाएँगे—ज़हरीली मिट्टी में फसलें सड़ जाएँगी। कुछ ही दिनों में, हज़ारों और लोग तीव्र विकिरण बीमारी से मर जाएँगे। ज़िंदा लोग मुर्दों से ईर्ष्या करेंगे।

शरणार्थियों के जत्थे ईरान, अफ़गानिस्तान और भारत की अपनी सीमाओं की ओर उमड़ पड़ेंगे—जहाँ बाड़ और सैनिक रास्ता रोकेंगे। वैश्विक समुदाय लकवाग्रस्त हो जाएगा। सहायता न्यूनतम होगी, जो विकिरण, बुनियादी ढांचे के पतन और जारी भू-राजनीतिक डर से बाधित होगी।

भारतीय उपमहाद्वीप का ये समूचा विवादित क्षेत्र, जो कभी जीवन से भरपूर था, एक कब्रिस्तान बन जाएगा। परमाणु आदान-प्रदान से वातावरण में भारी मात्रा में कालिख फैल जाएगी। एक “परमाणु सर्दी” शुरू हो जाएगी—वैश्विक तापमान गिर जाएगा, मानसून विफल हो जाएगा, और दुनिया भर में कृषि को नुकसान होगा। दक्षिण एशिया से दूर के देश भी आर्थिक और जलवायु झटकों को महसूस करेंगे।

ऑपरेशन सिंदूर के साए में, परमाणु युद्ध का साया पश्चिमी बॉर्डर पार इलाकों पर मंडरा रहा है, जो कई करोड़ से ज़्यादा लोगों का घर है। दशकों के अविश्वास और हिंसा से भड़की भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया तनातनी, अकल्पनीय पैमाने की तबाही मचाने की ओर अग्रसर है। वैज्ञानिक मॉडल एक भयावह तस्वीर पेश करते हैं: एक पूर्ण पैमाने का परमाणु आदान-प्रदान कुछ ही घंटों में 50-125 मिलियन लोगों की जान ले सकता है, जिसमें आग के बवंडर और विकिरण शहरों को मिटा देंगे। इससे भी बदतर, एक “परमाणु सर्दी” दुनिया को अकाल में डुबो सकती हैं।
यह अतिशयोक्ति नहीं है—यह विनाश की भयावह गणना है। पाकिस्तान एक चौराहे पर अटका हुआ है। युद्ध का रास्ता अंधेरे में एक आत्मघाती छलांग हो सकती है, लेकिन शांति का रास्ता, हालाँकि संकरा है, अभी भी खुला है। इसके लिए पाकिस्तान को संयम, समझदारी और बातचीत के प्रति अटूट प्रतिबद्धता की ज़रूरत है। दुनिया के शांति समर्थक लोगों को इस प्रलयंकारी भाग्य को बदलने के लिए एकजुट होकर उठना होगा।
पाकिस्तान की आतंकवाद को एक राजकीय हथियार के तौर पर समर्थन करने की नीति ने लंबे समय से तनाव बढ़ाया है। छद्म युद्धों और सीमा पार हमलों ने अविश्वास को बढ़ाया है, जिससे दोनों देश खाई के और करीब पहुँच गए हैं। भारत की बढ़ती निराशा, उसकी अपनी सैन्य buildup के साथ मिलकर, एक ऐसी जवाबी कार्रवाई उस अंजाम तक पहुंचा सकती है जिसे कोई भी पक्ष नियंत्रित नहीं कर पाएगा। एक छोटी सी ग़लती भी चिंगारी भड़का सकती है।

आतंकवाद हिंसा के चक्र को बढ़ावा देता है, और इसे छोड़ना शांति के लिए एक ज़रूरी शर्त है। याद रहे जंग भारत ने शुरू नहीं की है, बल्कि भारत ने अदभुत संयम और धैर्य बरतते हुए, पाकिस्तानी की गुस्ताखियां को वर्षों तक माफ किया है। अब शांति की पहल पाकिस्तान को ही करनी होगी, वरना हूरों का टोटा पड़ना तय है।

पाकिस्तानी हुक्मरानों को जल्दबाजी के बजाय संयम, पागलपन के बजाय समझदारी और विनाश के बजाय शांति को चुनना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय निकायों को पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराना चाहिए, लेकिन दोनों देशों को विश्वास बनाने में भी समर्थन करना चाहिए। अभी आधी रात नहीं हुई है। आइए एक ऐसा भविष्य चुनें जहाँ हमारे बच्चे राख नहीं, बल्कि उम्मीद विरासत में पाएँ।

एक अंधेरा लाख सितारे, एक निराशा लाख सहारे

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डॉ शोभा विजेन्द्र

मीरा, कई दिनों से लगातार घर में रहने और आसपास में घटित असामान्य कारणों से दुखी रहने लगी थी। उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। यहाँ तक की खाने और सोने में भी उसे दिक्क़तें आने लगी थी। हमेशा मन बेचैन रहता था । यह दुख कभी-कभी तो इतना बढ़ जाता था कि वह लगातार रोती रहती थी। उसे लग रहा था कि उसको जैसे डिप्रेशन ने घेर लिया है। उसको अपनी समस्या का कोई समाधान नहीं मिल रहा था। मन भटका सा रहता था । मीरा को ऐसा लगता था जैसे उसके जीवन में अंधेरा-ही-अंधेरा है । अकेलापन उसके ऊपर हावी होता जा रहा था । तभी एक दिन उसकी पुरानी सहेली सामाजिक कार्यकर्ता आशा जो सामाजिक संस्था सम्पूर्णा में पेशेवर कार्यकर्ता के रूप में काम करती है उसके घर आ पहुँची। आशा सादगी की प्रतिमूर्ति लग रही थी। मीरा को देखते ही उसको भान हो गया था कि मीरा की तबियत ठीक नहीं है। उन्होंने मीरा का हाल-चाल पूछा। मीरा, आशा जी के वात्सल्य से भरे वचनों को सुनकर अपने को रोक नहीं पाई। वह बोली कि कुछ दिनों से उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। रात को नींद नहीं आती और दिन में भूख नहीं लगती है। आशा जी ने उसे गले से लगाते हुए बातचीत का सिलसिला शुरू किया और बताया कि डिप्रेशन से पीड़ित लोगों से उनकी लगातार बातचीत होती रहती है। मीरा ने आशा जी ओर देखते हुए फिर प्रश्न किया कि आपको दिन-रात बहनों की समस्या से जूझने में क्या मिलता है ? आशा जी ने बताया कि जब वह किसी को परामर्श देती हैं और उसके समाधान के लिए प्रयासरत होती हैं तो स्वतः ही दो लाभ मिलते हैं। एक ओर हम समस्या को समझने की स्थिति को विकसित करते हैं तो वहीं दूसरे व्यक्ति की समस्या का समाधान भी करते हैं।

आशा जी ने मीरा की ओर देखते हुए कहा कि प्लीज़ आप अकेले मत रहिए। अपने कमरे में हर वक्त बंद रहना भी डिप्रेशन को जन्म देता है। कई बार ऐसा लगता है कि यदि हम अपनी समस्या किसी दूसरे को बताएँगे तो सामने वाला हमारे बारे में क्या सोचेगा ? और यही सोच संवादविहीनता की ओर ले जाती है। हम एकाकी हो जाते हैं जो सर्वथा अनुचित है। यह एक ऐसा चक्रव्यू है जो हमें स्वयं ही तोड़ना है अन्यथा हम अवसाद मे घिरते चले जाते हैं । अपने मन की भावनाओं को दूसरे के साथ अवश्य बाँटे। यदि कोई व्यक्ति आपको जज़ भी करे तो उसका कोई संज्ञान नहीं लेना चाहिए। हम इस पूरी कायनात में सूक्ष्म इकाई हैं। हमारी छोटी-छोटी बातें या कहा जाए तो हमारे इस भौतिक स्वरूप की कोई पहचान नहीं है। यह संसार चराचर है। कुंठित मन अपने आप में ही अनेकों कहानियाँ गढ़ लेता है और अपने को इस धरा पर अकेला महसूस करता है। जिसकी वज़ह से वह जीवन से पूर्णतः निराश हो जाता है। इसके विपरीत जब हम अपने मन के अंदर यह बात बैठा लेंगे कि किसी अपने के साथ कोई बात साझा करने में कोई बुराई नहीं है तो आपको शायद कोई संकोच नहीं होगा। कभी-कभी हमारा अहम भी किसी को अपना समझने में आड़े आ जाता है।

आशा जी ने मीरा को बताया कि अपने को कमज़ोर या शक्तिशाली समझना ही व्यक्ति की भूल है। संतुलित व्यवहार ही व्यक्ति को सफल जीवन जीने की ओर अग्रसर करता है। अतएव हम सबको प्रतिदिन अवश्य ही इस बात को आँकने, जाँचने और परखने की आवश्यकता है कि दिनभर में हमने कितनी बार असंतुलित व्यवहार किया। धीरे-धीरे संतुलित व्यवहार करने का अभ्यास हो जाएगा और यही प्रक्रिया हमें कुंठा और बड़बोलेपन से बचाएगी।
जीवन, एक खुली किताब की तरह सत्य, स्वतंत्र और रंगीला ही होना चाहिए। ऐसे कार्य करें ही क्यों जो हर किसी से छिपाने पड़े। गलतियाँ हो जाती हैं तो उन्हें भी स्वीकार करें। यदि हम ऐसी शख़्सियत बन जाएँ जिसकी पर्सनैलिटी में कुछ छिपाने के लिए है ही नहीं, जैसा है सबके सामने है तो ऐसे व्यक्ति की डिप्रेशन होने की संभावनाएँ कम हैं। ड्यूल पर्सनैलिटी की अवधारणा भी जीवन में कई बार अवसाद का कारण बन जाती है।

आज के युग की सबसे बड़ी बीमारी डिप्रेशन यानि अवसाद है। अवसाद किसी को, कभी भी, कहीं भी हो सकता है। इस शताब्दी की महामारी कोरोना के वायरस ने एक से दूसरे को संक्रमित कर लाखों परिवारों को काल का ग्रास बना दिया, ठीक उसी प्रकार अवसाद भी संक्रमित करता है। जब परिवार का एक सदस्य अवसाद का शिकार हो जाता है तो धीरे-धीरे परिवार के अन्य सदस्य भी जागरूकता के अभाव में इसके शिकार हो जाते हैं। 21 वीं शताब्दी में अवसाद के मरीज बढ़ते जा रहे हैं। संसार भर में डिप्रेशन के शिकार मानव बौख़लाए से सड़कों पर नज़र आ जाते हैं। चाहें न्यूयॉर्क की सड़कें हों या टोरंटो की गलियाँ, यूरोप की पगडंडियाँ हों या किसी भी देश की राजधानी, हर जगह आपको यह दृश्य देखने को मिल जाएँगे। हर व्यक्ति को इस व्याधि के बारे में जानने और समझने की आवश्यकता है।

यहाँ पर यह भी बताना आवश्यक है कि डिप्रेशन का एक कारण अपने विचारों, भावनाओं, संवेदनाओं, शारीरिक और मानसिक वेगों को प्रकट न कर पाना भी होता है। अतः यह आवश्यक है कि आप किसी-न -किसी के साथ अपनी बात को अवश्य साझा करें। वह व्यक्ति आपका मित्र, माता-पिता, गुरु या कोई भी ऐसा व्यक्ति हो सकता है, जिसके साथ आप निर्बाध रूप से अपनी बात रख सकते हैं। किंतु यदि उसके बाद भी स्थिति नहीं सुधरती है तो भी घबराएँ नहीं, मनोचिकित्सक को अवश्य दिखाएँ और घर पर अकेले न रहे। अकेले रहना घातक सिद्ध हो सकता है।

हमें कोरोना ने सिखाया है कि यह जीवन श्रण भंगुर है कोई भी बीमारी इस जीवन लीला को समाप्त कर सकती है । हमें, हमारे महापुरुष भी बहुत कुछ सिखाकर जा चुके हैं और लगातार आज भी हम ज्ञानवान लोगों के द्वारा जीवन जीने की कला को सीख ही रहे हैं । उन्होने हमें सिखाया है कि हम आडंबरों से दूर रहें। अपनी बाहरी शक्ल को सुंदर बनाने का प्रयास करते-करते हम मेकअप की दुनिया में गुम हो रहे हैं। जिससे बाहर निकलना हमारे लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो गया है। हम पर दिखावा हावी हो गया है, मासूमियत जैसे खो सी गई है। मीरा को आज भी याद है कि बचपन में मेहमानों के आने पर किसी पड़ोसी के घर से कुर्सी माँग लेना, चीनी माँग लेना या अन्य कोई वस्तु माँग लेना कितना सहज था। मासूमियत की वह दुनिया अलग ही थी। आज हम अपने माता-पिता, सगे संबंधियों से भी अपनी परेशानियों को कहते हुए कतराते हैं। झूठ बोलते हैं। पर्दा रखते हैं और अंत में अपने आपको समस्या से घिरा पाते हैं।

आप कल्पना कीजिए लेकिन सत्य को भी पहचानिए। अपनी बात को सशक्त तरीके से परिवार के लोगों से अवश्य कहिए। जिस घर में एक व्यक्ति अवसाद का शिकार होता है, धीरे-धीरे उस परिवार में इस प्रकार के विकार आने की संभावना रहती है। अतः परिवार के सभी सदस्यों में परस्पर प्रेम रहना चाहिए। यदा-कदा लड़ाई भी करें। केवल चुप होकर बैठ जाना अवसाद को जन्म देता है।
आइए! आज हम निश्चय करें कि हमारे आस-पास यदि कोई मानसिक रूप से कमज़ोर व्यक्ति है और वह अवसाद का शिकार हो सकता है तो तुरंत उसको अपना मित्र बना लें। आपकी यह पहल उसको अपनी बात साझा करने की हिम्मत देगी। मित्र बनाएँ। प्रेम करें। यही जीवन का मंत्र है।

जैसे-जैसे पूरा विश्व विकास की चरम सीमा पर पहुँच रहा है, तैसे-तैसे मानव, दुख और अवसाद से भी घिरता जा रहा है। चीन के अंदर आत्महत्या की दर विश्व के विकसित राष्ट्रों में सर्वाधिक है। यहाँ पर यह भी बताना आवश्यक है कि चीन में अधिकतर नास्तिक प्रवृति के लोग हैं और इस संसार से आगे, जहान और भी है जिस कारण वे अपनी किसी भी असफलता का जब कोई स्पष्ट कारण नही ढूंढ पाते तो अवसाद से घिर जाते हैं। सनातन धर्म, पूर्वजन्म के कर्मों और प्रारब्ध को इंगित करता है और हम अपनी किसी सफलता या असफलता को पूर्व-जन्म के कर्मों का परिणाम मान कर सहज ही स्वीकार कर लेते है । हर व्यक्ति को जो सुख-दुख मिलता है, ऐसी मान्यता है कि वह हमारे पूर्वजन्मों से जुड़ा प्रारब्ध है। श्रीमदभगवतगीता का संदेश भी तो हमें जीवन में संतुष्ट रहना और संतोष करना सिखाता है। आइए! हम छोटी-छोटी परेशानियों पर मुस्कुराना सीखें। दुख और अवसाद को अपने पास नहीं फटकने दे।

जब भी हम अवसाद की स्थिति में आने वाले होते हैं, तो इससे पहले कहीं-न-कहीं हमको इसका पूर्वाभास होने लगता है। चिड़चिड़ाहट, कुंठाएँ, बहुत अधिक बोलना या कम बोलना, पलायन करना, सामान्य नींद की प्रक्रिया में विघ्न, अथवा नींद न आना, भूख में कमी, लगातार वज़न कम होना,थकान महसूस होना, अपच, मुँह सूखना, क़ब्ज़, अतिसार, सिर, पेट, सीने, पैरों, जोड़ों में दर्द, भारीपन, पैरों में पसीना, साँस लेने में दिक्कत, चिंता ये भी डिप्रेशन के लक्षण हो सकते हैं। किंतु इसका अर्थ यह भी नहीं है कि ये लक्षण आने पर हम अवश्य ही अवसाद के शिकार होंगे। यदि हम पूर्व में ही सतर्क हो जाएँ और सकारात्मक विचारों के सहारे सामाजिक कार्यों में लग जाएँ तो अवसाद पर शुरू में ही काबू पाया जा सकता है। जब तक सामान्य नींद और भोजन का आनंद आप ले रहें हैं तब तक कोई डरने की बात नहीं है। जैसे ही आपकी नींद और भोजन में विघ्न आने लगे तो समझ लें कि अब आपको उठना पड़ेगा या यूँ कहें कि जैसे ही अवसाद का प्रभाव हमारे दैनिक जीवन पर भी पड़ने लगे तो हमें तुरंत मनोचिकित्सक को दिखाना चाहिए।

ऑपरेशन सिंदूर पर प्रधानमंत्री का राष्ट्र को संबोधन

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चंडीगढ़: पहलगाम की वीभत्स घटना और आपरेशन सिंदूर के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 मई –बुद्ध पूर्णिमा के दिन देश को पहली बार संबोधित किया । पूरा देश इस संबोधन की सांस थामे प्रतीक्षा कर रहा था क्योंकि अचानक सीज फायर सुनकर सब हतप्रभ थे – ये क्या हुआ ? हम तो पाकिस्तान को जीत रहे थे? देश में अजीब सी छटपटाहट फ़ैल गई थी। प्रधानमंत्री आए, भारतवासियों से बात की और सब कुछ शीशे की तरह स्पष्ट हो गया। प्रधानमंत्री ने आतंकवाद व पाकिस्तान पर भारत की रणनीति स्पष्ट करते हुए अपने देशवासियों के साथ साथ वैश्विक समुदाय को भी संबोधित किया और कुछ राष्ट्रों को उनके दोहरे रवैये पर कड़ा संदेश दिया।

प्रधानमंत्री मोदी ने सर्वप्रथम ऑपरेशन सिंदूर की अभूतपूर्व सफलता पर देशवासियों व सेना के सभी अंगों को बधाई दी। इस ऑपरेशन के तहत 100 से अधिक आतंकवादी मारे गए, बुहवालपुर और मुरीदके जैसे 9 आतंकी ठिकाने तबाह किये गए और पाकिस्तान के हमलों की जवाबी कार्यवाही करते हुए पाकिस्तान के 11 एयर बेस को भरी नुकसान पहुँचाया गया। प्रधानमंत्री ने अमेरिका और ब्रिटेन को याद दिलाया कि उनके देशों में हुए बड़े आतंकी हमले वाले भी इन्हीं स्थानों पर प्रशिक्षित किये गए थे। प्रधानमंत्री ने कहा कि आतंकियों ने हमारी बहनों का सिंदूर उजाड़ा था इसीलिए भारत ने आतंकवादियों के हेडर्क्वाटस को ही उजाड़ दिया। आतंकवादियों और उनके आकाओं को ऐसी सजा मिली है जिसके बारे में उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था। पाकिस्तान ने हमारी सीमा पर वार किया तो भारत ने उसके सीने पर वार किया है। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि अब ऑपरेशन सिन्दूर ही भारत की नीति है, भविष्य में होने वाले किसी भी आतंकी हमले को अब भारत के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के सामान माना। प्रधानमंत्री ने कहा, अभी हमने सैन्य कार्यवाही केवल स्थगित की है। हमारी सेनाएं लगातार सतर्क व तैयार हैं तथा कहीं भी किसी भी समय हमला करने के लिए तैयार व तत्पर हैं।

प्रधानमंत्री ने वैश्विक समुदाय को भी स्पष्ट रूप से कह दिया है – अब अगर पाकिस्तान से कोई बात होगी तो वह केवल और केवल आतंकवाद और पीओके पर ही होगी और साथ ही अब भारत किसी भी प्रकार की परमाणु धमकी से नहीं डरने वाला है। भविष्य में भी यदि कोई आतंकी हमला होता है तो उसका इसी प्रकार मुहतोड़ जवाब दिया जायेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में पाकिस्तान के लिए लक्ष्मण रेखा खींच दी है। आपरेशन सिंदूर ने आतंक के खिलाफ लड़ाई में न्यू नार्मल तय कर दिया है। अब भारत का मत एकदम स्पष्ट है कि टेरर, ट्रेड और टाक एक साथ नहीं चलेंगे। पानी और खून भी एक साथ नहीं बह सकते। प्रधानमंत्री ने पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों द्वारा आतंकियों के अंतिम संस्कार में भाग लेने का स्मरण कराते हुए खा कहा कि भारत आतंक की सरपरस्त सरकार और आतंक के आकाओं को अलग- अलग करके नहीं देखेगा।

पाकिस्तान को चेतावनी देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा यदि पाकिस्तान को रहना है तो उसे आतंकी इंफ्रास्ट्रक्चर का सफाया करना ही पड़ेगा । पाकिस्तान की सरकार जिस तरह आतंकवाद को खाद पानी दे रही है वह एक दिन पाकिस्तान को ही समाप्त कर देगा। प्रधानमंत्री ने बताया कि आतंकी तीन दशक से पाकिस्तान में घूम रहे थे और पाकिस्तान ने आतंकियों पर कार्यवाही के बजाए भारत पर ही हमले करना शुरू कर दिया। पाकिस्तान ने हमारे स्कूल- कालेज गुरुद्वारों और आम नागरिकों के घरों को निशाना बनाया लेकिन इससे वह खुद बेनकाब हो गया। दुनिया ने देखा कि किस प्रकार से पाकिस्तानी ड्रोन, मिसाइलें व विमान आदि तबाह हो रहे थे। हमारे डिफेंस सिस्टम ने उनके हर हमले को नाकाम कर दिया। आज हर आतंकी संगठन जान चुका है कि भारत की बेटियों के माथे से सिंदूर हटाने का अंजाम क्या होता है। देश को संबोधित करते हुए भारत ने स्वदेशी आयुधों की भी जम कर प्रशंसा की।

प्रधानमंत्री ने भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर को लेकर सोशल मीडिया व मीडिया जगत में चल रही तरह- तरह की चर्चाओं पर विराम लगाते हुए कहा चूंकि हमने मात्र तीन दिनों में ही पाकिस्तान को पूरी तरह से कमजोर कर दिया था जिसका उसे अंदाजा भी नहीं था तो वह बचने के रास्ते खोज रहा था और विश्व भर में गुहार लगा रहा था। बुरी तरह पिटने के बाद 10 मई को दोपहर में पाकिस्तान के डीजीएमओ ने हमारे डीजीएमओ से संपर्क किया और हमने अपनी शर्तों पर उसपे विचार किया । अभी जो युद्ध का स्थगन हुआ है वह केवल भारत और पाकिस्तान के बीच हुई वार्ता से ही हुआ है और इस मामले में किसी प्रकार की कोई मध्यस्थता नही हुई है। आगे भी किसी भी प्रकार की कोई मध्यस्थता स्वीकार्य नहीं होगी। प्रधानमंत्री ने परोक्ष रूप से सिन्धु जल संधि के निलंबित रहने का सन्देश भी दे दिया।

इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी की तुलना: एक गुमराह करने वाली कहानी

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दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार शाम अपने 30 मिनट के प्रसारित भाषण में आतंकवाद के खिलाफ भविष्य की दृष्टि और संचालन रणनीति को स्पष्ट और दृढ़ संदेश के साथ प्रस्तुत किया। उनका यह भाषण न केवल प्रेरणादायक था, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा के प्रति उनकी अटल प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है। मोदी जी ने आतंकवाद को जड़ से उखाड़ने के लिए ठोस कदमों और रणनीतिक दृष्टिकोण की बात की, जो देशवासियों में विश्वास जगाता है।

उनके शब्दों में स्पष्टता और आत्मविश्वास झलकता था, जब उन्होंने वैश्विक मंच पर भारत की मजबूत स्थिति और आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति को रेखांकित किया। यह संदेश न केवल आतंकवादियों के लिए कड़ा चेतावनी था, बल्कि नागरिकों को यह आश्वासन भी देता है कि सरकार उनकी सुरक्षा के लिए हर संभव प्रयास कर रही है।

मोदी जी ने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि देश की एकता और अखंडता सर्वोपरि है। उनकी यह स्पष्ट और साहसिक दृष्टि भारत को एक सुरक्षित और शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। यह भाषण हर भारतीय के लिए गर्व का क्षण था।

इस बीच, कुछ नासमझ और पूर्वाग्रहों से ग्रसित सोशल मीडिया सैनिकों ने आजकल सोशल मीडिया पर ये बहस गर्म है कि क्या नरेंद्र मोदी इंदिरा गांधी जैसे हैं। कुछ लोग कहते हैं कि इंदिरा गांधी ने 1971 की जंग में बांग्लादेश बनाकर जो किया, वो मोदी नहीं कर पाए। मगर ये तुलना ना सिर्फ इतिहास को गलत समझती है, बल्कि आज की जमीनी और अंतरराष्ट्रीय हकीकतों को भी नजरअंदाज़ करती है।

सच ये है कि 1971 में बांग्लादेश का बनना सिर्फ इंदिरा गांधी की जीत नहीं थी। ये ईस्ट पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) के लोगों की जद्दोजहद का नतीजा था, जो वेस्ट पाकिस्तान (आज का पाकिस्तान) की फौजी हुकूमत के जुल्म के खिलाफ उठ खड़े हुए थे। 1970 में शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग ने चुनाव जीता, लेकिन उन्हें हुकूमत नहीं सौंपी गई। इसके बाद बगावत शुरू हुई और पाकिस्तानी फौज के दमन से लाखों लोग हिंदुस्तान में शरण लेने आ गए।

3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने पहले हमला किया, जिससे भारत को जवाब देना पड़ा। इस जंग के नतीजे में बांग्लादेश आज़ाद हुआ। लेकिन ये सब हालात की वजह से हुआ, पहले से कोई फतह का प्लान नहीं था।

1972 के शिमला समझौते में भारत ने 90,000 पाकिस्तानी फौजियों को छोड़ दिया, मगर इससे कश्मीर मुद्दे का कोई पक्का हल नहीं निकल पाया। आज बांग्लादेश भारत का दोस्ताना मुल्क है, लेकिन वहां कट्टरपंथ और भारत-विरोधी सोच की चिंगारियाँ अभी भी कभी-कभी उठती हैं।
1971 की तुलना आज से करना गलत है। अब पाकिस्तान न्यूक्लियर ताक़त है, और सीधी जंग दोनों देशों के लिए खतरे की घंटी हो सकती है। मोदी सरकार ने जंग की बजाय पाकिस्तान के आतंक के ढांचे को तोड़ने की रणनीति अपनाई है। 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 का बालाकोट एयरस्ट्राइक इसी नीति की मिसाल हैं। इनसे दुनिया को भी ये पैगाम गया कि हिंदुस्तान डरता नहीं।

मोदी सरकार ने पाकिस्तान को दुनिया में अलग-थलग करने में भी कामयाबी पाई है। जहां 1971 में अमेरिका और चीन पाकिस्तान के साथ थे, आज वही पाकिस्तान दुनिया में बदनाम है। भारत ने FATF, UN और G20 जैसे मंचों पर पाकिस्तान की आतंकपरस्ती को उजागर किया है।
मोदी की एक बड़ी कामयाबी 2019 में अनुच्छेद 370 हटाना है, जिससे जम्मू-कश्मीर पूरी तरह भारत में शामिल हो गया। इंदिरा गांधी के दौर में ऐसा सोचना भी मुश्किल था। इससे पाकिस्तान की कश्मीर रणनीति को बड़ा झटका लगा।

मोदी की “पड़ोसी पहले” नीति ने नेपाल, भूटान और बांग्लादेश से रिश्ते मजबूत किए हैं। 2023 में भारत ने G20 की कामयाब मेज़बानी कर दुनिया को आतंकवाद के खिलाफ एकजुट किया। डिजिटल इंडिया, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और तेज़ आर्थिक विकास ने भारत को वैश्विक ताकत बना दिया है। क्वाड और I2U2 जैसे समूहों में भारत की मौजूदगी इसकी गवाही है।

इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी की तुलना करना ना सिर्फ गलत है, बल्कि दोनों के दौरों की सच्चाई को अनदेखा करना है। इंदिरा का नेतृत्व युद्धों और संकट से जुड़ा था, जबकि मोदी का नेतृत्व दूरदर्शिता, रणनीतिक समझ और शांतिपूर्ण ताकत पर आधारित है।

मोदी ने भारत को एक मजबूत, आत्मनिर्भर और दुनिया में सम्मानित राष्ट्र बनाने की ठोस कोशिश की है। IMF के मुताबिक 2024 में भारत की GDP 3.94 ट्रिलियन डॉलर हो गई है। रक्षा और डिजिटल सेक्टर में जो काम हुआ है, वो गांधी जी के दौर से बहुत आगे है।

सिर्फ 1971 की जंग से मोदी की उपलब्धियों की तुलना करना, नए भारत की तरक्की और बदलती ताक़त को समझने से इनकार करना है। आज की दुनिया को जहानदारी और होशमंदी चाहिए—और मोदी का विज़न उसी रास्ते पर भारत को आगे ले जा रहा है।

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