18 अप्रैल 1899 सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी दामोदर चाफेकर का बलिदान

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अंग्रेज अधिकारी चार्ल्स रैंड को गोली मारी थी : पूरा राष्ट्र संस्कृति और स्वत्व रक्षा केलिये समर्पित

–रमेश शर्मा

पुणे : दामोदर हरि चाफेकर एक ऐसे क्राँतिकारी थे जिनका पूरा परिवार राष्ट्र और संस्कृति रक्षा केलिये बलिदान हुआ तीन भाइयों को तो फाँसी हुई । उनका संघर्ष सत्ता केलिये नहीं था । समाज और संस्कृति की रक्षा के लिये था । इसी वातावरण में उनका जन्म हुआ और इसी में बलिदान
बलिदानी दामोदर हरि चाफेकर का जन्म 25 जून 1869 को पुणे के ग्राम चिंचवड़ में हुआ । पीढियों से उनका परिवार भारतीय सांस्कृतिक गौरव की प्रतिष्ठपना में समर्पित था । पिता हरिपंत चाफेकर एक सुप्रसिद्ध कीर्तनकार थे । दामोदर उनके ज्येष्ठ पुत्र थे । उनके दो छोटे भाई बालकृष्ण चाफेकर एवं वसुदेव चाफेकर थे। बचपन से ही तीनों भाइयों ने पिता के साथ संकीर्तन में जाना आरंभ किया और प्रसिद्धी भी मिली । इस परिवार के पूर्वजों ने शिवाजी महाराज के हिन्दु पद्पादशाही की स्थपना से लेकर बाजीराव पेशवा तक अनेक युद्धों में सहभागिता की थी, बलिदान भी हुये । पूर्वजों की वीरता की कहानियाँ तीनों भाई घर में बहुत चाव से सुनते थे । जिन्हे सुनकर तीनों के मन में परतंत्र शासन की ज्यादतियों के प्रति गुस्सा और स्वाभिमान संपन्न स्वशासन की ललक जाग्रत हो गई। ऐसी ही कहानियाँ सुनकर दामोदर के मन में भी सैनिक बनने की इच्छा जाग्रत हो गई। समय के साथ बड़े हुये और महर्षि पटवर्धन तथा लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के संपर्क में आये । उनके संपर्क से संकल्प शक्ति और कार्य योजना जाग्रत हुई ।

तिलकजी की प्रेरणा से दामोदर जी ने युवकों को संस्कारित और एक संगठित करने का बीड़ा उठाया और व्यायाम मंडल के नाम से एक संस्था तैयार की । दामोदर के मन में ब्रिटिश सत्ता के प्रति कितना गुस्सा था इसका अनुमान इस एक घटना से ही लगाया जा सकता है कि उन्होंने मुम्बई में रानी विक्टोरिया के पुतले पर तारकोल पोतकर गले में जूतों की माला पहना दी थी । समाज में स्वत्व और स्वाभिमान का भाव जाग्रत करने के लिये तीनों भाइयों ने बालवय में 1894 पूना में प्रति वर्ष शिवाजी एवं गणपति समारोह का आयोजन प्रारंभ कर दिया था। इन समारोहों में वे संस्कृत के श्लोकों में शिवाजी महाराज की गाथा सुनाया करते थे । इनमें शिवाजी महाराज की कीर्ति का तो गान होता ही साथ ही इन श्लोकों के माध्यम से समाज में ओज जाग्रत करने का काम करते थे । यह संदेश देते थे कि स्वाधीनता नाचने गाने से प्राप्त नहीं की जा सकती । स्वाधीनता प्राप्त करने के लिये आवश्यक है कि शिवाजी और पेशवा बाजीराव की भाँति काम किए जाएं| आज हर भले आदमी को तलवार और ढाल पकड़ने की आवश्यकता है भले इसमें प्राणों का उत्सर्ग हो जाये । एक श्लोक में तो यहाँ तक आव्हान था कि धरती पर उन दुश्मनों का ख़ून बहा देंगे, जो हमारे धर्म का विनाश कर रहे हैं। हम तो मारकर मर जाएंगे । ऐसे अनेक आव्हान थे । गणपतिजी के श्लोक में धर्म और गाय की रक्षा करने का आव्हान था । अधिकांश दामोदर और उनके पिता द्वारा रचित थे । एक श्लोक का अर्थ था कि “ये अंग्रेज़ कसाइयों की भाँति हमारी गायों और उनके बछड़ों को मार रहे हैं । गौमाता संकट से मुक्ति की पुकार लगा रही है” वीर बनों, वीरता दिखाओ धरती पर बोझ न बनो आदि । तभी 1897 में प्लेग की बीमारी फैली । पुणे भी उन नगरों में से था जहाँ इस बीमारी ने कोहराम मचा दिया । फिर भी अंग्रेजों की वसूली न रुकी ।

पीड़ित और बेबस लोगों पर अंग्रेजों के अत्याचार कम न हुये । उन दिनों पुणे में वाल्टर चार्ल्स रैण्ड और आयर्स्ट नामक ये दो अधिकारी तैनात थे । इन दोनों लोगों को जबरन पुणे से निकाल कर बाहर करने लगे ताकि वहाँ रहने वाले अंग्रेज परिवारों में संक्रमण का खतरा न रहे । इनके आदेश पर पुलिस जूते पहनकर ही हिन्दुओं के घरों में घुसती न पूजा घर की मर्यादा बची न रसोई घर की । प्लेग पीड़ितों की सहायता की बजाय उन्हे और प्रताड़ित किया जाने लगा । ये तीनों चाफेकर बंधु परिस्थिति से आहत हुये और मन ही मन इसका उपचार खोजने लगे । समाधान समझने के लिये एक दिन तीनों भाई तिलक जी के पास पहुँचे। तिलक जी ने इन तीनों चाफेकर बन्धुओं से कहा- “शिवाजी महाराज ने अत्याचार सहा नहीं था पूरी शक्ति और युक्ति से विरोध किया था । किन्तु इस समय अंग्रेजों के अत्याचार के विरोध में कोई कुछ न कर रहा । वस इसी दिन से तीनों क्रांति के मार्ग पर चल पड़े। तीनों अपने शब्दों और स्वर से क्राँति की अलख तो जगा ही रहे थे । अब इसके बाद तीनों भाइयों ने स्वयं ही सशस्त्र क्रान्ति का मार्ग अपना लिया। संकल्प लिया कि समाज को अंग्रेजों के अत्याचार से मुक्ति दिलाकर रहेंगे ।

वह 22 जून 1897 का दिन था । पुणे के “गवर्नमेन्ट हाउस’ में महारानी विक्टोरिया की षष्ठि पूर्ति के अवसर पर राज्यारोहण की हीरक जयन्ती मनायी जा रही थी। इसमें वाल्टर चार्ल्स रैण्ड और आयर्स्ट भी शामिल हुए। दामोदर हरि चाफेकर और उनके भाई बालकृष्ण हरि चाफेकर भी एक दोस्त विनायक रानडे के साथ वहां पहुंच गए और इन दोनों अंग्रेज अधिकारियों के निकलने की प्रतीक्षा करने लगे। रात लगभग सवा बारह बजे रैण्ड और आयर्स्ट निकले । दोनों अपनी-अपनी बग्घी पर सवार होकर रवाना हुये । योजना के अनुसार तुरन्त दामोदर हरि चाफेकर रैण्ड की बग्घी के पीछे चढ़ गये और उसे गोली मार दी । उधर उनके छोटे भाई बालकृष्ण हरि चाफेकर ने भी आर्यस्ट पर गोली चला दी। आयर्स्ट तो तुरन्त मर गया, किन्तु रैण्ड घायल हुआ जिसने तीन दिन बाद अस्पताल में दम तोड़ा। इससे जहाँ पुणे की उत्पीड़ित जनता चाफेकर-बन्धुओं की जय-जयकार कर उठी। वहीं पूरी अंग्रेज सरकार बौखला गई। दोनों चाफेकर बंधुओं को पकड़ने के लिये एक एक घर की तलाशी हुई । इनसे संबंधित परिवारों पर अत्याचार हुये पर दोनों बंदी न बनाये जा सके । इन्हें पकड़ने के लिये गुप्तचर अधीक्षक ब्रुइन ने इनकी सूचना देने वाले को २० हजार रुपए का पुरस्कार देने की घोषणा कर दी । चाफेकर बन्धुओं के युवा संगठन में गणेश शंकर द्रविड़ और रामचंन्द्र द्रविड़ नामक दो भाई भी जुड़े थे । इन दोनों ने पुरस्कार के लोभ में आकर अधीक्षक ब्रुइन को चाफेकर बन्धुओं का पता दे दिया। इस सूचना के बाद दामोदर हरि चाफेकर तो पकड़ लिए गए, पर बालकृष्ण हरि चाफेकर निकलने में सफल हो गये और पुलिस के हाथ न लगे। सत्र न्यायाधीश ने दामोदर हरि चाफेकर को फांसी की सजा दी । उन्होंने मन्द मुस्कान के साथ यह सजा सुनी। कारागृह में उनसे मिलने जाने वालों में तिलक जी भी थे । तिलक जी ने उन्हें “गीता’ प्रदान की। उन्हें 18 अप्रैल 1898 को प्रात: फाँसी दी गई। वे “गीता’ पढ़ते हुए फांसी घर पहुंचे और गीता हाथ में लेकर ही फांसी के तख्ते पर झूल गए। दामोदर चाफेकर को बलिदान हुये आज सवा सौ साल हो गये तो पर वे पुणे के लोक जीवन में आज जीवन्त हैं।

कोटिशः नमन बलिदानी वीर को

संकट के दौर में है सांस्कृतिक पत्रकारिता- डॉ. सच्चिदानंद जोशी

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– आईजीएनसीए में वरिष्ठ पत्रकार अजित राय की पुस्तक ‘दृश्यांतर’ का लोकार्पण हुआ
– लोकार्पण के साथ पुस्तक पर सार्थक चर्चा भी हुई

नई दिल्ली। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के उमंग सभागार में वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक अजित राय की पुस्तक ‘दृश्यांतर’ का लोकार्पण आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, आईजीएनसीए के डीन (प्रशासन) प्रो. रमेश चंद्र गौर और वरिष्ठ पत्रकार गिरिजाशंकर ने किया। इस अवसर पर पुस्तक के लेखक अजित राय, नाट्य समीक्षक व पत्रकार संगम पांडेय, वाणी प्रकाशन के अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक अरुण माहेश्वरी और कार्यकारी निदेशक अदिति माहेश्वरी गोयल भी उपस्थित थे। पुस्तक के लोकार्पण के साथ-साथ उस पर गंभीर चर्चा भी हुई। दरअसल, पुस्तक पर चर्चा के बहाने भारत में सांस्कृतिक पत्रकारिता के महत्त्व, दशा और दिशा पर सार्थक बातचीत हुई।

इस मौके पर अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ. सच्चिदानन्द जोशी ने कहा कि सभी को, खासकर विद्यार्थियों को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक पत्रकारिता के क्षेत्र में दस्तावेजीकरण का काम होना चाहिए। आज सांस्कृतिक पत्रकारिता बहुत खतरे के दौर में है। उन्होंने कहा कि हमारी जैसी सांस्कृतिक धरोहर है, विश्व में ऐसी सांस्कृतिक धरोहर कहीं नहीं है। उन्होंने चिंता जताई कि आज सांस्कृतिक पत्रकारिता हाशिये पर चली गई है और आज यह कमोबेश पेज-3 जर्नलिज्म तक सिमटकर रह गई है।

चर्चा के दौरान वरिष्ठ पत्रकार गिरजाशंकर ने कहा कि अजित राय की पुस्तक का आना इस दौर में इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि जिस तरह से साहित्य और संस्कृति सत्ता के आखिरी पायदान पर रहते हैं, उसी तरह से मौजूदा समय की पत्रकारिता में भी साहित्य और संस्कृति की वही गति हो चुकी है। उन्होंने बताया कि पहले के अखबारों में साहित्य और संस्कृति के विशेष साप्ताहिक अंक निकलते थे। लेकिन आज के दौर में पत्रकारिता में साहित्य और संस्कृति लगभग खत्म हो चुकी है। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा, आज जब डाक्यूमेंटेशन की परम्परा हमारे समाज में धीरे धीरे खत्म हो रही है, तो इस तरह कि किताबों का आना अन्य लेखकों को भी ऐेसी पुस्तकें लिखने के लिए प्रोत्साहित करेगा।

वाणी प्रकाशन की अदिति माहेश्वरी ने अजित राय की लेखन यात्रा को रेखांकित करते हुए कहा कि ‘दृश्यांतर’ में विश्व सिनेमा का इतिहास भी और भारतीय सिनेमा का भविष्य भी। वहीं पुस्तक के लेखक अजित राय ने कहा कि सिनेमा के प्रति उनकी दीवानगी ने उन्हें दुनिया के सबसे बड़े फिल्म फेस्टिवल कान फिल्म फेस्टिवल के रेड कारपेट पर लाकर खड़ा कर दिया। यह कान फिल्म फेस्टिवल के 67 वर्षों के इतिहास में पहली बार था, जब कोई हिन्दी पत्रकार वहां तक पहुंचा। उन्होंने यह जोर देकर कहा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कारण विदेशों में हिन्दी को इतनी प्रतिष्ठा मिली है। उन्होंने दौरान उन्होंने कई रोचक किस्से भी सुनाए। वरिष्ठ पत्रकार व नाट्य समीक्षक संगम पांडेय ने अजित राय की पुस्तक ‘दृश्यांतर’ की रचना की पृष्ठभूमि के बारे में बताया। कार्यक्रम में आईजीएनसीए के जनपद सम्पदा प्रभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार, कला दर्शन प्रभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. ऋचा कम्बोज सहित कई गणमान्य लोग और साहित्यप्रेमी भी मौजूद रहे।

अमेरिका में मीडियाकर्मी बस्नेत को यूनेस्को युवा शांति राजदूत पुरस्कार

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शंकरराज

अमेरिका- मीडियाकर्मी मनोज बस्नेत को यूनेस्को युवा शांति दूत पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। अमेरिका के लॉस एंजिल्स में आयोजित 18वें युवा शांति राजदूत प्रशिक्षण कार्यशाला के विशेष समारोह में, बैस्नेट को एक गैर-लाभकारी संगठन, यूथ यूनेस्को क्लब, यूएसए, अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ सॉवरेन नेशंस, यूएसए, यूबियोस एथिक्स इंस्टीट्यूट (न्यूजीलैंड और) के रूप में मान्यता दी गई। जापान), फिलीपीन एसोसिएशन ऑफ एक्सटेंशन प्रोग्राम इम्प्लीमेंटर्स, इंक. (पीएईपीआई) फिलीपींस, सेंट। पॉल यूनिवर्सिटी क्यूज़ोन सिटी (एसपीयूक्यूसी) फिलीपींस, यूथ लुकिंग बियॉन्ड डिजास्टर (एलबीडी), यूथ पीस एंबेसडर इंटरनेशनल (वाईपीए), द वर्ल्ड इज जस्ट ए बुक अवे (विजाबा, यूएसए और इंडोनेशिया), मैरीटाइम एकेडमी ऑफ एशिया एंड द पैसिफिक (एमएएपी) संयुक्त रूप से 2024-25 के लिए यूनेस्को युवा शांति राजदूत पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ”राही बस्नेत ने मीडिया में युवाओं और शांति के लिए निभाई गई भूमिका की सराहना करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह पुरस्कार दिया है।” अमेरिकन यूनिवर्सिटी सॉवरेन नेशन यूएसए के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. डॉलर ने कहा, ‘वह इसके लिए और अधिक योगदान देंगी आने वाले दिनों में युवा और शांति।’

2011 से यह पुरस्कार हर साल विभिन्न क्षेत्रों में युवाओं और शांति के लिए योगदान देने वाले लोगों को दिया जाता है। अब तक 65 देशों के लोगों को यह उपाधि मिल चुकी है। यूथ यूनेस्को क्लब यूएसए के अध्यक्ष रिमेश खनाल ने कहा, “इस पुरस्कार के साथ, उन्हें अब अंतरराष्ट्रीय मंच मिलेंगे,” हमने उन्हें उन सैकड़ों लोगों से राजदूत पद दिया है जिन्होंने दुनिया भर के विभिन्न क्षेत्रों में युवाओं और शांति में योगदान दिया है। उसने कहा। रिपोर्टर से मीडिया मैनेजर बने बासनेट पिछले 17 साल से मीडिया से जुड़े हैं। वर्तमान में, वह कांतिपुर मीडिया समूह के बिक्री वितरण, प्रेस और क्षेत्रीय विभाग के प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं।

पूरी दुनिया में तेजी से फैल रहा है सनातन हिंदू धर्म

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पूरे विश्व में आज विभिन्न देशों के नागरिकों में शांति का अभाव दिखाई दे रहा है एवं परिवार के सदस्यों के बीच भी भाईचारे की कमी दिखाई दे रही है। शादी के तुरंत बाद तलाक लेना तो जैसे आम बात हो गई है, आज कई विकसित देशों में तलाक की दर 60 प्रतिशत से भी अधिक है। बुजुर्ग माता पिता की देखभाल करने वाला उनका अपना कोई साथ नहीं है। अमेरिका में तो लगभग 10 लाख बुजुर्ग नागरिक खुले में रहते हुए अपना जीवन यापन करने को मजबूर हैं। इन देशों में तो जैसे सामाजिक तानाबाना ही छिन्न भिन्न हो गया है। इसी प्रकार के अन्य कई कारणों के चलते आज सनातन हिंदू धर्म के प्रति विदेशी लोग आकर्षित हो रहे हैं, क्योंकि सनातन हिंदू धर्म का अपना एक अलग ही महत्व है। सनातन हिंदू धर्म में कुटुंब के प्रति वफादारी बचपन से ही सिखाई जाती है। भारत में आज भी संयुक्त परिवार की प्रथा प्रचलन में हैं, जिससे बच्चे अपने बचपन में ही अपने माता पिता की सेवा करने के संस्कार सीखते हैं और उन्हें पूरे जीवन भर अपने साथ रखने का संकल्प लेते हैं।

विश्व में कुछ अन्य धर्मों में बच्चों को बचपन में ही कट्टरता सिखाई जाती है एवं केवल अपने धर्म को ही सर्वश्रेष्ठ धर्म के रूप में पेश किया जाता है। इससे इन बच्चों में अन्य धर्मों के प्रति सद्भावना विकसित नहीं हो पाती है। कई बार तो अन्य धर्म को मानने वाले नागरिकों का धर्म परिवर्तन कर उन्हें अपना धर्म मानने को मजबूर भी किया जाता है। इसके ठीक विपरीत सनातन हिंदू धर्म किसी अन्य मजहब को मानने वाले व्यक्ति पर कभी भी कोई दबाव नहीं डालता है। सनातन हिंदू संस्कृति अन्य धर्मों के नागरिकों को किसी प्रकार का धर्म मानने की खुली स्वतंत्रता प्रदान करती है। ऐसा कहा जाता है कि जब इस दुनिया में कोई भी धर्म नहीं था तब इस धरा पर निवास करने वाले लोग केवल सनातन हिंदू धर्म का ही पालन करते थे। सनातन हिंदू धर्म बहुत ही ज़्यादा संयमित धर्म है जो किसी अन्य धर्म की ना तो उपेक्षा करता है और न ही वह अपने धर्म के वर्चस्व को सबके सामने रखने का प्रयास करता है। इसी कारण से कट्टरता के इस माहौल में आज पूरे विश्व में सनातन हिंदू धर्म के प्रति लोगों की आस्था एवं रुचि बढ़ रही है।

सनातन हिंदू धर्म आज विश्व में तीसरा सबसे बड़ा धर्म है और भारत में अधिकतर लोग इस धर्म को मानते हैं। एक अनुमान के अनुसार सनातन हिंदू धर्म इस पृथ्वी पर 10,000 वर्षों से हैं। लेकिन यदि वेदों और उपनिषदों में लिखी बातों को माने तो सनातन हिंदू धर्म की उत्पति लाखों वर्ष पहिले हुई थी उस समय ये सनातन धर्म के नाम से जाना जाता था। हिंदू धर्म को मानने वाले लोग भारत में रहते थे। इस धर्म को बहुत प्रभावशाली माना गया है। अन्य कुछ धर्मों के संस्थापक रहे हैं, जैसे ईसाई धर्म के संस्थापक के रूप में प्रभु यीशू को माना जाता है तथा इस्लाम धर्म के लिए मोहम्मद साहिब को संस्थापक माना जाता है और बौद्ध धर्म के लिए गौतम बुद्ध को संस्थापक जाना जाता है। परंतु, हिंदू धर्म के बारे में कहा जाता है कि कुछ संतों एवं महापुरूषों ने एक होकर जीवन को सही तरीके से व्यतीत करने का तरीका विकसित किया था। सनातन हिंदू संस्कृति को, धर्म नहीं बल्कि यह, जीवन जीने का एक तरीका भी माना जाता था।

सनातन हिंदू धर्म का यह मानना है कि प्रभु परमात्मा ने इस धरा पर सबको खुलकर हंसने, उत्सव मनाने और मनोरंजन करने की योग्यता दी है। यही कारण है कि सनातन हिंदू धर्म में सबसे अधिक त्यौहार और संस्कार होते हैं। उत्सव, जीवन में सकारात्मक संदेश लेकर आते हैं और हमारे संस्कार मिलन सरिता को दर्शाते हैं। सनातन हिंदू धर्म की यही प्रक्रिया दुनिया पसंद करती है। तभी तो ब्रिज की होली और कुम्भ के मेले का अवलोकन करने के लिए पूरी दुनिया से लोग भारत में आते हैं। यही एक कारण है कि आज पूरी दुनिया के कोने कोने में लोग हिंदू धर्म में अपनी रुचि दिखा रहे हैं।

हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन के अनुसार, आबादी के लिहाज से दुनिया के तीसरे सबसे बड़े देश अमेरिका में अब हिंदूओं की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है और हिंदू वहां राजनैतिक रूप से भी सक्रिय हो रहे हैं। इसके अलावा, कोरोना महामारी के बाद से पूरे अमेरिका एवं विश्व के अन्य देशों में योग और ध्यान की ओर लोगों का आकर्षण बहुत बढ़ गया है। योग और ध्यान पूरे विश्व को सनातन हिंदू धर्म की ही देन है। सनातन हिंदू धर्म बिलकुल ही कट्टरपंथी धर्म नहीं है। अन्य धर्मों की तरह इसमें किसी भी प्रकार का सामाजिक दबाव नहीं हैं। इस धर्म में धार्मिक शिक्षा के लिए कोई भी जोर जबरदस्ती नहीं है जैसा कि कुछ अन्य धर्मों में होता है। हिंदू धर्म मानता है कि शिक्षा सभी तरह की होनी चाहिए केवल धार्मिक आधार पर शिक्षा देना उचित नहीं है। किसी भी बच्चे की शिक्षा में अगर संस्कार जुड़ जाए तो वह बच्चा बड़ा होकर एक जिम्मेदार नागरिक बनता है और वह एक अच्छा इंसान बनता है। सनातन हिंदू धर्म में परोपकार की भावना होती है। अन्य धर्मों की तरह यह केवल अपने वर्चस्व के बारे में नहीं सोचता है।

इंडोनेशिया जो कि एक मुस्लिम बहुल देश हैं वहां पर सनातन हिंदू धर्म से जुड़े संस्कार आज भी पाए जाते हैं जिससे यह सिद्ध होता है कि यह देश हिंदू धर्म से कितना प्रभावित रहा है। मुस्लिम बहुल देश होने के बावजूद हिंदू धर्म का बहुत बड़ा प्रभाव यहां आज भी दिखाई देता है। मुस्लिम लोग भी अपना नाम हिंदू देवी देवताओं के नाम पर रखना पसंद करते हैं। सनातन हिंदू धर्म कभी भी किसी नागरिक पर किसी भी प्रकार का दबाव नहीं डालता है। सनातन हिंदू धर्म कभी भी किसी को लालच देकर धर्म परिवर्तन नहीं करवाता है। परंतु, आज प्रत्येक वर्ष पूरे विश्व में बहुत से लोग अन्य धर्मों को छोड़कर स्वप्रेरणा से हिंदू धर्म अपना रहे हैं। सनातन हिंदू धर्म में स्त्रियों को जितना सम्मान दिया जाता है उतना किसी भी अन्य धर्म में नहीं दिया जाता है। सनातन हिंदू धर्म में स्त्रियों की पूजा की जाती है। सनातन हिंदू धर्म में आस्था का मतलब है कि जीवन में उमंग, उत्साह, उल्लास और मानवता की ओर झुकाव। जहां भारत में सनातन हिंदू धर्म को मिटाने की नाकाम कोशिश की जाती है वहीं रूस, ब्रिटेन, अमेरिका, घाना, सुरीनाम जैसे देशों में हिंदू धर्म तेजी से फैल रहा है। सनातन हिंदू धर्म पूरी दुनिया को शांति का संदेश देता है।

कई देशों में तो आज सनातन हिंदू संस्कारों का अनुपालन करते हुए विशेष गांव स्थापित किए जा रहे हैं। आयरलैंड में 22 एकड़ का एक हिंदू आइलैंड बन गया है। इसे हरे कृष्णा आइलैंड का नाम दिया गया है। यहां निवासरत समस्त नागरिकों द्वारा सनातन हिंदू धर्म के प्राचीन रीति रिवाजों का पालन बहुत ही सहजता के साथ किया जाता है। सनातन हिंदू धर्म के वैदिक नियमों को सदा सदा के लिए जीवित रखने के लिए यहां पर रहने वाले सनातनी हिंदू, मांस का परित्याग का शाकाहारी भोजन गृहण करते हैं। नशीले पदार्थों, शराब एवं सिगरेट आदि पदार्थों से भी दूर रहते हैं। सुबह एवं शाम मंदिरों में पूजा अर्चना करते हैं। उनका जीवन सादगी भरा रहता है तथा कृषि एवं गाय पालन करते हुए अपना जीवन यापन करते हैं। महिलाएं साड़ी पहनती है एवं पुरुष धोती कुर्ता धारण करते हैं। इसी प्रकार के गांव जहां हिंदू सनातन संस्कृति का अनुपालन किया जाता है अन्य कई देशों यथा घाना, फीजी एवं अन्य कई अफ्रीकी देशों, सुदूर अमेरिका, यूरोप के देशों, आदि में भी तेजी से फैलते जा रहे हैं।

इसी प्रकार, कजाकिस्तान एक मुस्लिम देश है क्योंकि यहां की 65 प्रतिशत से अधिक आबादी इस्लाम को मानने वाले लोगों की है। परंतु, हाल ही के समय में यहां भी एक बड़ा बदलाव देखने में आ रहा है और यहां नागरिक सनातन हिंदू धर्म के प्रति आकर्षित होते दिखाई दे रहे हैं। यहां सनातन हिंदू धर्म की लहर इतनी तेजी से उठी है कि हर तरफ हिंदू धर्म की आस्था एवं आध्यात्म का फैलाव दिखाई दे रहा है। यहां के युवा विशेष रूप से भगवत गीता पढ़ने की ओर आकर्षित हो रहे हैं और हिंदू धर्म को समझने का प्रयास कर रहे हैं। एक कजाकिस्तानी महिला मारीना टारगाकोवा की भगवत गीता को पढ़कर हिंदू धर्म के प्रति रुचि इतनी बढ़ी है कि अब उसने जैसे बीड़ा ही उठा लिया है कि वह कजाकिस्तान में सनातन हिंदू धर्म को फैलाने का प्रयास लगातार करती नजर आ रही है।

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