भारतीय लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी एवं व्यापक हैं

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देश में लोकतंत्र की दिशा-दशा पर जारी विमर्श के मध्य यह जानना आवश्यक है कि भारत न केवल विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, अपितु वह लोकतंत्र की जननी है। लोकतंत्र भारत की आत्मा है। वह आम भारतीयों की साँसों और संस्कारों में रचा-बसा है। भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों एवं अवधारणाओं का विकास 1215 ई. में जारी किए गए इंग्लैंड के कानूनी परिपत्र मैग्ना कार्टा से नहीं, अपितु सहयोग, समन्वय एवं सह-अस्तित्व पर आधारित प्राचीन एवं सनातन सांस्कृतिक विचार-प्रवाह एवं  जीवन-दर्शन से हुआ है। इस देश में लोकतंत्र केवल शासन की एक प्रणाली मात्र नहीं, बल्कि वह सहस्त्राब्दियों के अनुभव और इतिहास से सिंचित-निर्मित भेद में एकत्व और विरुद्धों में सामंजस्य देखने वाली जीवन-शैली व दृष्टि है।
श्रुति, स्मृति, पुराण, इतिहास, महाकाव्य आदि ग्रंथों में विश, जन, प्रजा, गण, कुल, ग्राम, जनपद, सभा, समिति, परिषद, संघ, निकाय जैसे अनेक शब्दों एवं संस्थाओं के उल्लेख मिलते हैं, जिनसे पुष्टि होती है कि उस समय भारत में लोकतंत्र का अस्तित्व था। वैदिक वाङ्गमय पर दृष्टि डालने से दो प्रकार की गणतंत्रात्मक व्यवस्थाएँ सामने आती हैं, एक जिसमें राजा निर्वाचित किया जाता था और दूसरा जिसमें राज्य की शक्ति सभा या परिषद में निहित होती थी। इसे राजाधीन एवं गणाधीन शासन-तंत्र कहा जा सकता है। वैदिक राजा का निर्वाचन समिति में एकत्रित होने वाले लोगों द्वारा किया जाता था। समिति सार्वजनिक कार्यों को संपादित करने वाली संस्थाओं में सर्वप्रमुख थी। यह जनसामान्य का प्रतिनिधित्व करती थी। परिचर्चा और पारस्परिक सम्मति से निर्णय लिए जाते थे। वहीं सभा समिति के अधीन कार्य करती थी। इसमें वृद्ध एवं अनुभवी लोगों का विशेष स्थान प्राप्त होता था। यह चयनित लोगों की स्थायी संस्था थी। ब्राह्मण ग्रंथों में वर्णित राज्याभिषेक के आरंभ से अंत तक के कार्यव्यवहार से स्पष्ट होता है कि राजा को राजपद प्राप्त करने से पूर्व राष्ट्र के विभिन्न अंगों की अनुमति प्राप्त करनी पड़ती थी, वह राष्ट्र के भिन्न-भिन्न स्थानों की मिट्टी, जल, वर्ण, वायु, पर्वत और संपूर्ण प्रजा का प्रतिनिधित्व करता था। उसका निरंकुश होना संभव नहीं था। उसे मंत्रिपरिषद के परामर्श, स्वीकृति और प्रजा के कल्याण की भावना से कार्य संपादित करना होता था। यहाँ तक कि उसके पुनर्निर्वाचन की भी निश्चित प्रक्रिया और व्यवस्था थी। उल्लेखनीय है कि समिति और सभा की सदस्यता जन्म के बजाय कर्म पर आधारित थी। नीति, सैन्य एवं सार्वजनिक हितों से जुड़े महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर विमर्श एवं नियमन हेतु विदथ-सभा का भी उल्लेख मिलता है, जिसका प्रयोग ऋग्वेद में सौ से अधिक बार किया गया है।
रामायण और महाभारत में भी अनेक ऐसे प्रसंग हैं, जिनसे विदित होता है कि राजा निर्णय-प्रक्रिया में प्रजा के मत, जनपद-प्रतिनिधियों एवं अमात्यमंडल के परामर्श को विशेष महत्त्व प्रदान करता था। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के द्वारा माता सीता के परित्याग के कारुणिक वृत्तांत में भी राजा द्वारा जन-विचारों को वरीयता प्रदान करने की भावना ही दृष्टिगोचर होती है। राजा निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी नहीं होता था। वह नीति, धर्म, परंपरा एवं लोक-मर्यादा से बंधा होता था। राजा दशरथ और कुलगुरु वशिष्ठ भावी राजा राम को यह उपदेश देते दिखते हैं कि प्रजा के हिताहित की निरंतर चिंता, मंत्रियों-सेनापतियों-अधिकारियों से सतत विचार-विमर्श राजा के प्रमुख कर्त्तव्य होते हैं। रामायण के बालकांड के सातवें सर्ग में राजा दशरथ के यशस्वी होने का कारण राज्य के प्रमुख कार्यों में उनके मंत्रिमंडल की सहभागिता है, जिसमें आठ मंत्री होते थे। राजा दशरथ के राज्य संबंधी अथवा अन्य किसी भी योजना संबंधी विषयों में एक विशाल मंत्रिसमूह की भूमिका उनकी लोकतांत्रिक दृष्टि का बोध कराती है। महाभारत के शांति पर्व के अध्याय 107/108 में गणराज्यों (जिन्हें गण कहा जाता था) की विशेषताओं का विस्तृत विवरण मिलता है। इसमें कहा गया है कि जब एक गणतंत्र के लोगों में एकता होती है तो वह शक्तिशाली हो जाता है और उसके लोग समृद्ध हो जाते हैं तथा आंतरिक संघर्षों की स्थिति में वे नष्ट हो जाते हैं। इसी पर्व में पितामह भीष्म युधिष्ठिर को लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का उपदेश देते हुए कहते हैं कि राजा को  प्रजा के हित की रक्षा एवं धर्म का अनुसरण करना चाहिए तथा उसे सभासदों, प्रकृतिजनों एवं प्रजाजनों के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए। महाभारत में सभासदों की योग्यता, गणों की महत्ता, उसके गठन एवं निर्माण की रचना-प्रक्रिया, उनकी कार्यप्रणाली और उनके प्रशासनिक उत्तरदायित्वों आदि का भी पर्याप्त उल्लेख मिलता है।
बौद्ध एवं जैन ग्रंथों से भी ज्ञात होता है कि भगवान महावीर एवं भगवान बुद्ध के काल में भारत के उत्तर-पूर्वी भाग में अनेक गणराज्य विद्यमान थे। इनमें वैशाली के लिच्छवी, कपिलवस्तु के शाक्य, सुमसुमार पर्वत के भग्ग, केसपुत्त के कालाम, रामगाम के कोलिय, कुशीनारा के मल्ल, पावा के मल्ल, पिप्पलिवन के मोरिय, मिथिला के विदेह और अलकल्प के बुलि आदि प्रमुख थे। इनमें से लिच्छवी तो इतना शक्तिशाली एवं प्रतिष्ठित था कि वह तत्कालीन उदीयमान राज्य मगध के उत्कर्ष एवं विस्तार में मुख्य अवरोधक बनकर खड़ा था। लिच्छिवियों ने आसपास के अन्यान्य गणों को मिलाकर वज्जिसंघ नाम से एक संयुक्त संघ भी बनाया था। इन गणराज्यों की सर्वोच्च शक्ति एक गणसभा या संस्थागार में निहित होती थी, जो लगभग आज के संसद जैसी होती थी। गण की कार्यपालिका का अध्यक्ष एक निर्वाचित पदाधिकारी होता था, जिसे उस गणराज्य का प्रमुख नायक या राजा कहा जाता था। सामान्य प्रशासन की देखभाल के साथ-साथ गणराज्य में आंतरिक शांति एवं सामंजस्य बनाए रखना उसका कर्त्तव्य था। अन्य पदाधिकारियों में उपराजा, सेनापति, भांडागारिक, कोषाध्यक्ष, आसनपन्नापक आदि प्रमुख थे। कोरम की पूर्त्ति, प्रस्ताव रखने, मतगणना आदि के सुस्पष्ट एवं निश्चित नियम थे। विरोध या मतभेद आदि उपस्थित होने पर शलाकाओं द्वारा गुप्त मतदान की व्यवस्था थी। मतदान अधिकारी को शलाका-ग्राहक कहा जाता था। गणसभा के प्रत्येक कुलवृद्ध या सदस्य की संघीय उपाधि ‘राजा’ होती थी। एकपण्ण जातक के अनुसार लिच्छवी गणराज्य की केंद्रीय समिति में 7,707 राजा (सदस्य) थे तथा उपराजाओं, सेनापतियों एवं कोषाध्यक्षों की संख्या भी इतनी ही थी। वहीं एक अन्य स्थान पर शाक्यों के संस्थागार (गणसभा) के सदस्यों की संख्या 500 और यौधेय की केंद्रीय परिषद की सदस्य-संख्या 5000 बताई गई है। वर्तमान संसदीय सत्र की तरह ही परिषदों के अधिवेशन नियमित रूप से होते थे। सामान्यतया गणराज्यों की गतिविधियों पर गणसभा का पूर्ण नियंत्रण होता था। गणराज्यों में प्रायः एक मंत्रिपरिषद भी होती थी, जिसमें चार से लेकर बीस सदस्य होते थे। गणाध्यक्ष ही मंत्रिपरिषद का प्रधान होता था। राज्य के उच्च पदाधिकारियों, मंत्रियों तथा शासकों की नियुक्ति गणसभा द्वारा ही की जाती थी। यही केंद्रीय समिति (गणसभा) न्याय की सर्वोच्च संस्था के रूप में भी कार्य करती थी।
द्वितीय शताब्दी ई. के बौद्ध ग्रंथ ‘अवदानशतक’ से पता चलता है कि दक्षिण भारत के कुछ राज्य गणों के अधीन थे और कुछ राजा के। जैन ग्रंथ ‘आचारांगसूत्र’ में भिक्षुओं को चेतावनी दी गई है कि उन्हें ऐसे स्थानों पर जाने से बचना चाहिए, जहाँ गणतंत्र का शासन हो। पाणिनी ने भी संघ को राजतंत्र से भिन्न बताते हुए गण को संघ का पर्याय बताया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी दो प्रकार के संघ राज्यों का उल्लेख मिलता है। एक ‘वार्ताशस्त्रोपजीवी’ – जो व्यापार, कृषि, पशुपालन तथा युद्ध पर आश्रित थे, दूसरा ‘राजशब्दोपजीवी’ जो राजा की उपाधि धारण करते थे। प्रथम वर्ग में कंबोज तथा सौराष्ट्र तथा दूसरे वर्ग में लिच्छिवियों, वृज्जियों, मल्लों, मद्रों, कुकुरों, पांचालों आदि की गणना की गई है। वस्तुतः ‘संघ’ और ‘गण’ दोनों समान अर्थों में प्रयुक्त राजनीतिक संस्थाएँ थीं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार राजा को प्रजा की भलाई के लिए अमात्यों (मंत्रियों) की सलाह पर कार्य करना चाहिए। मंत्रियों को लोगों को बीच से नियुक्त किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि प्रजा के सुख और लाभ में ही राजा का सुख और लाभ है।
यूनानी-रोमन लेखकों ने भी प्राचीन भारत में गणराज्यों के अस्तित्व को स्वीकार किया है। उनके अनुसार सिकंदर के आक्रमण के समय पंजाब और सिंध में कई गणराज्य थे, जो राजतंत्रों से भिन्न थे। सिकंदर को लौटते हुए मालव, अंबष्ठ और क्षुद्रक आदि गणराज्य मिले थे। मुद्रासक्ष्यों से भी गणराज्यों के बारे में जानकारी मिलती है। मालव, अर्जुनायन, यौधेय जैसे गणराज्यों के प्राप्त सिक्कों पर राजा का उल्लेख न होकर गण का ही उल्लेख मिलता है। मेगस्थनीज ने भी अपने यात्रा-वृत्तांत में लिखा है कि उस समय भारत के अनेक प्रांतों-नगरों में गणतंत्रात्मक शासन प्रचलित था।
इसी प्रकार तमिलनाडु में दसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में परांतक चोल प्रथम के शासन-काल में उत्कीर्णित कांचीपुरम के उत्तरमेरूर के शिलालेखों से तत्कालीन लोकतांत्रिक व्यवस्था के विविध आयामों एवं कार्य-पद्धत्तियों की विस्तृत एवं प्रामाणिक जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। इनमें उम्मीदवारों की योग्यता,   उनके चयन एवं मतदान की प्रक्रिया, कार्यों का निर्धारण एवं विभाजन, निर्वाचित उम्मीदवारों को वापस बुलाने के नियम आदि पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है।  तत्कालीन चुनाव-प्रक्रिया में शुचिता ऐसी थी कि उम्मीदवारों की अनिवार्य अर्हताओं में से एक संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा थी। स्मरण रहे कि इंग्लैंड के मैग्ना कार्टा से भी कई वर्ष पूर्व कर्नाटक के प्रसिद्ध कवि, दार्शनिक, समाज-सुधारक एवं लिंगायत संप्रदाय के संस्थापक संत बसवेश्वर द्वारा अनुभव मंडप की स्थापना की गई थी, जिसे भारत की पहली और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संसद के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह एक प्रकार का खुला एवं सार्वजनिक मंच था, जहाँ समाज के सभी वर्गों के लोग आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दों पर मुक्त विमर्श कर निष्कर्ष व समाधान तक पहुँचने का प्रयास करते थे। अनेकानेक पुष्ट प्रमाणों एवं ठोस तथ्यों के आधार पर निःसंदेह यह कहा जा सकता है कि प्राचीन भारत में न केवल लोकतंत्र का अस्तित्व था, अपितु कई गणराज्यों ने उसका आदर्श स्वरूप एवं ढाँचा भी खड़ा किया था। भिन्न-भिन्न धार्मिक मान्यताओं, दर्जनों भाषाओं तथा सैकड़ों बोलियों वाले देश में लोकतंत्र यदि सुदृढ़, जीवंत एवं गतिशील है तो उसका श्रेय भारत के इन प्राचीन गणराज्यों को ही जाता है। भारतीय लोकतंत्र की जड़ें इतनी गहरी और व्यापक हैं कि यूरोप-अमेरिका समेत संपूर्ण विश्व इससे प्रेरणा ग्रहण करता है। परंतु पश्चिम से प्रशंसा की प्रत्याशा एवं निहित राजनीतिक स्वार्थों की पूर्त्ति हेतु ऐसे गौरवशाली लोकतंत्र पर प्रश्न खड़े करना सर्वथा अनुचित एवं अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। अपनी समृद्ध लोकतांत्रिक विरासत पर गर्व करने के स्थान पर ऐसे प्रश्न कहीं-न-कहीं भारत में व्याप्त लोकतंत्र की गहरी जड़ों के प्रति अज्ञानता को प्रदर्शित करते हैं।

भारत के प्रति पश्चिमी मीडिया के नैरेटिव का पोस्टमार्टम

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बिजेंदर कुमार
              Western Media Narratives on India 
                           from Gandhi to Modi 
              Writer – Sh. Umesh Upadhayaa
दिल्ली। लेखक और वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय जी ने इस पुस्तक में पश्चिमी मीडिया  के   भारत के प्रति नैरेटिव जैसे गंभीर विषय पर अपनी बात रखने का साहस दिखाया है। इस विषय पर बहुत कम लिखा गया है। पुस्तक का महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि वामपंथ के अतिरिक्त भी मीडिया समीक्षा की एक राष्ट्रीयतापरक दृष्टि हो सकती है, ये स्थापना  इस पुस्तक के माध्यम से स्थापित हुई है।  पुस्तक भारत में औपनिवेशिक शासन के आरंभ से  लेकर वर्तमान समय तक लगभग दो सौ वर्ष के इतिहास के पश्चिमी मीडिया के पूर्वाग्रह की पड़ताल करती है, जिसकी पुष्टि यथास्थान विभिन्न घटनाओं, तथ्यों, विवरणों और बयानों से बहुत रोचक तरीके से होती चलती है।
      पुस्तक दो सौ साल से चले या रहे  पश्चिमी नैरेटिव के  न केवल भारत, बल्कि अफ्रीका,लैटिन अमेरिका और एशिया समेत तीसरी दुनिया के विभिन्न विकासशील और अविकसित देशों के प्रति उसकी हिकारत और भेदभाव पूर्ण दृष्टिकोण का सिलसिलेवार परत दर परत विवेचन ही नहीं करती, बल्कि मीडिया को समझने का देशज नैरेटिव बनाते दिखती है, जिसमें स्थानीयता, स्वाभिमान, आत्मसम्मान और स्व भाव का गौरव है। पश्चिमी मीडिया का एकांगी, एकाधिकारवादी और अधिनायकवादी रवैया इस पुस्तक में प्रमाण सहित उजागर किया गया है।
      उमेश उपाध्याय जी  1975 में सूरीनाम आजादी की घटना की पश्चिमी मीडिया में उपेक्षापूर्ण कवरेज से पुस्तक का  आरंभ करते हुए वर्तमान समय में  डिजिटल मीडिया के नए एकाधिकारवादी आयामों , नई विश्व सूचना व्यवस्था और उसमें भारत की भूमिका को लेकर गंभीर वैचारिकी प्रस्तुत करते हैं। पश्चिमी मीडिया के साथ दक्षिण अमेरिकी प्रेस ने भी सूरीनाम की आजादी को की बहुत कम कवरेज की । इसका कारण लैटिन अमेरिका ,अफ्रीका ,एशिया समेत विकासशील और अविकसित देशों का सूचनाओं के लिए पश्चिमी देशों पर निर्भरता थी जिसका मनमाना लाभ पश्चिमी मीडिया लेता रहा है । संसाधनों से लबरेज सूचना तंत्र के चलते विकसित देशों ने न  केवल सूचना एकाधिकारवादी दृष्टिकोण अपनाया बल्कि तमाम पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर अपने औपनिवेशिक राजनैतिक ,व्यावसायिक और सांस्कृतिक  हितों को भी साधा ।
        1970 के दशक में गुटनिरपेक्ष देशों ने सूचना साम्राज्यवाद को थोड़ी चुनौती अवश्य दी लेकिन आज भी ग्लोबल वित्तीय संस्थानों और सूचना तंत्र पर विकसित  देशों का आधिपत्य है। विश्व का अधिकांश सूचना प्रवाह इन देशों की न्यूज एजेंसियों के द्वारा नियंत्रित और संचालित है जिनमें ए पी ,रायटर ,ए एफ पी ,यू पी आई प्रमुख हैं। its an old story नामक प्रथम अध्याय में उमेश जी विस्तार से इनके वित्तीय हितों और नेरेटिव की पड़ताल करते हैं। इन एजेंसियों के निर्णय और प्राथमिकता की तहों में झाँककर देखने पर बाजार हितों और वैश्विक सत्ता समीकरणों की परतें खुलती हैं । उमेश जी इन परतों को खोलने में बहुत हद तक निष्पक्ष रहे हैं।
 दूसरे अध्याय में लेखक ने भारत में आजादी और उसके  बाद मीडिया के उभार और भारतीय राजनीति के प्रति पश्चिमी मीडिया के द्वारा की गई कवरेज के अनेक उदाहरणों से सिद्ध किया कि भारतीय नेताओं खासकर  गांधी ,नेहरू,अंबेडकर  और पटेल आदि के बारे की गई एजेंडा रिपोर्टिंग में निहित नेरेटिव न केवल भेदभावकारी है बल्कि भारत के प्रति हीनता का भाव रखने की पारंपरिक मंशा भी शरारत पूर्ण है।डा अंबेडकर ने तो अपने बारे में पश्चिमी प्रेस की संदिग्ध रिपोर्टिंग  और  गलतबयानी की पीड़ा को व्यक्त भी किया । चर्चिल ने आजादी को लेकर भारत पर जो सवाल और संदेह व्यक्त किए उनको पश्चिमी प्रेस ने हाथों -हाथ लेकर भारत के  राजनीतिक नेत्रत्व को कठघरे में रखा । पुस्तक इस नेरेटिव को ध्वस्त भी करती है और औपनिवेशिक सोच की संकीर्णता को उजागर भी करती है।आजादी के बाद  भारत  के  गुटनिरपेक्ष  रवैये की तुलना में पाकिस्तान का पिछलग्गू दृष्टिकोण पश्चिमी प्रेस का चहेता बनना बताता है कि पश्चिमी प्रेस शीत युद्ध के दौर में खेमेबाजी से मुक्त नहीं थी बल्कि वो खुद पश्चिमी  खेमे की  प्रतिनिधि की तरह व्यवहार कर रही थी ।
तीसरे अध्याय में पश्चिमी मीडिया के द्वारा इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और भारतीय राजनीति के विविध आयामों की एकतरफा और एजेंडा रिपोर्टिंग पर लेखक ने प्रकाश डाला  है। निक्सन के अशिष्ट व्यवहार को पश्चिमी मीडिया ने कोई तवज्जो नहीं दी हालांकि कालांतर में किसिंजर को इसके लिए माफी माँगनी पड़ी । अपनी रिपोर्टिंग के चलते बी बी सी को बैन का सामना भी करना पड़ा । एक बार आपातकाल में और एक बार और । भारत विरोधी एजेंडा भी पश्चिमी मीडिया का प्रिय शगल रहा है।
     लेखक के अनुसार बी बी सी की स्वायतता अपने आप में संदेह से परे नहीं रही है। जगजीत सिंह चौहान के साक्षात्कार में आपत्तिजनक कंटेन्ट को न हटाना इसका प्रमाण है। भारतीय  संसद पर हमले और ट्विन टॉवर पर हमले की पश्चिमी मीडिया द्वारा कवरेज में भी भेदभाव किया गया । जिस प्रकार का मीडिया अभियान पश्चिमी मीडिया ने अमेरिकी हमले को लेकर चलाया वैसा भारतीय संसद पर हुए हमले की कवरेज में देखने को नहीं मिला । पुस्तक सवाल उठाती है कि मंगल यान ,चंद्रयान ,पुलवामा और कारगिल जैसी अनेक घटनाओं में पश्चिमी मीडिया सिलेक्टिव क्यों हो जाती है और भ्रामक कवरेज क्यों करती है? इस अध्याय में लेखक कुछ गंभीर सवाल भी सामने रखते हैं कि कैसे  पश्चिमी मीडिया भारत का गरीबी के नाम पर उपहास करता है? लेखक भारत की गरीबी के पीछे उपनिवेशी शोषण और दमन को प्रमुख कारण मानते है और पिछले कुछ सालों में गरीबी के कम होने को सप्रमाण प्रस्तुत करते हैं।लेखक के अनुसार  इसरो और भारतीय सेटेलाइट मार्केट का उभार  पश्चिमी मीडिया सहन कर पा रहा है।
       पाँचवाँ  अध्याय कोविड और मोदी को लेकर है जिसे लेखक ने विस्तार से और मन से लिखा है। इसमें उन्होंने पश्चिमी प्रेस के द्वारा स्पेनिश फ्लू रिपोर्टिंग और उसमें उसके द्वारा गांधी जी बारे फैलाई गई निराधार खबरों का पर्दाफाश किया है। अवैज्ञानिक अफवाहें ,भ्रम पैदा करना ,अप्रमाणिक तथ्यों तथा यूरोप ,अमेरिका ,इंग्लैंड और भारत में कोविड रिपोर्टिंग के बारे जिस भेदभाव और एजेंडा भाषा का प्रयोग किया उसको लेकर लेखक ने परत दर परत पड़ताल की और पश्चिमी नेरेटिव को बेनकाब किया है।भारतीय वैक्सीन ,वैरियंट और फार्मा लॉबी के बारे में भी पुस्तक  प्रामाणिक  जानकारी प्रदान करके पश्चिमी मीडिया के   नेरेटिव की कलई खोलती है।
     छठा अध्याय भारत के बारे में पश्चिमी मीडिया के पुराने लेकिन निरंतर चलने वाले नेरेटिव के बारे में है जिसमे भारत को सपेरों का देश कहा जाता रहा है। सातवें अध्याय में लेखक ने पश्चिमी मीडिया के भारत के प्रति निरंतर जारी ओपनिवेशिक नेरेटिव की परतों को खंगाल कर उसके राजनीतिक ,आर्थिक और सांस्कृतिक आयामों के संदर्भ में डिजिटल मीडिया के वर्चस्व का विवेचन किया है। फेसबूक ,ट्विटर (अब एक्स )यूट्यूब आदि सोशल नेटवर्किंग साइट्स कैसे पश्चिमी नेरेटिव को आगे ले जाने का काम करती है,इसका वर्णन भी किया गया है। पुस्तक अंग्रेजी में है लेकिन लेखक ने भाषा की सरलता और सहजता का ध्यान रखा है। कुल मिलाकर पुस्तक मीडिया नेरेटिव को समग्रता में प्रस्तुत करती है और पश्चिमी मीडिया की एकतरफा एजेंडा कवरेज और नेरेटिव के साथ उसके निहित आर्थिक ,राजनीतिक और सांस्कृतिक हितों की वास्तविकता को सही मायने में सामने लाती है।

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती उत्पादों की मांग

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भारत में आज भी लगभग 60 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है एवं अपने जीवन यापन के लिए मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र पर ही आश्रित रहती है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार किये जा रहे विकास कार्यों के चलते इन क्षेत्रों में विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत व्यय की जाने वाली राशि में अतुलनीय वृद्धि दर्ज हुई है। इससे, ग्रामीण क्षेत्रों में भी रोजगार के नए अवसर निर्मित होने लगे हैं एवं ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन कुछ कम हुआ है। विशेष रूप से कोरोना महामारी के खंडकाल में शहरों से ग्रामीण इलाकों की ओर शिफ्ट हुए नागरिकों में से अधिकतर नागरिक अब ग्रामीण क्षेत्रों में ही बस गए हैं एवं अपने विशेष कौशल का लाभ ग्रामीण क्षेत्रों में नागरिकों को प्रदान कर रहे हैं।
हाल ही में जारी किए गए कुछ सर्वे प्रतिवेदनों के अनुसार, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोग की एक नई कहानी लिखी जा रही है क्योंकि अब विभिन्न उत्पादों की मांग ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से बढ़ती दिखाई दे रही है। उपभोक्ता वस्तुओं एवं ऑटो निर्माता कम्पनियों द्वारा प्रदान की गई जानकारी के अनुसार, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में हाल ही के समय में उपभोग की जाने वाली विभिन्न वस्तुओं एवं दोपहिया एवं चार पहिया वाहनों (ट्रैक्टर सहित) की मांग में तेजी दिखाई दे रही है, जो कि वर्ष 2023 में लगातार कम बनी रही थी। यह संभवत: रबी फसल के सफल होने के चलते भी सम्भव हो रहा है।
उक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने भी हाल ही में सम्पन्न अपनी द्विमासिक मोनेटरी पॉलिसी की बैठक में रेपो दर में किसी भी प्रकार की वृद्धि नहीं की है, ताकि बाजार, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के बाजार में, उत्पादों की मांग विपरीत रूप से प्रभावित नहीं हो, ताकि इससे अंततः वित्तीय वर्ष 2024-25 में देश के आर्थिक विकास की दर भी अच्छी बनी रहे।
भारत में पिछले कुछ समय से ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न उत्पादों की मांग, शहरी क्षेत्रों में उपलब्ध मांग की तुलना में कम ही बनी रही है। परंतु, वित्तीय वर्ष 2023-24 की तृतीय तिमाही के बाद से इसमें कुछ परिवर्तन दिखाई दिया है एवं अब ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादों की मांग में तेजी दिखाई देने लगी है। यह तथ्य विकास के कुछ अन्य सूचकांकों से भी उभरकर सामने आ रहा है। जनवरी-फरवरी 2024 माह में दोपहिया वाहनों की बिक्री में, पिछले वर्ष इसी अवधि के दौरान की बिक्री की तुलना में, 30.3 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल की गई है। वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान दोपहिया वाहनों की बिक्री में 9.3 प्रतिशत की वृद्धि दर रही है, जो हाल ही के कुछ वर्षों में अधिकतम वृद्धि दर मानी जा रही है। दोपहिया वाहनों की बिक्री ग्रामीण इलाकों (लगभग 10 प्रतिशत) में शहरी इलाकों (लगभग 7 प्रतिशत) की तुलना में अधिक रही है। महात्मा गांधी नरेगा योजना के अंतर्गत प्रदान किए जाने वाले रोजगार के अवसरों की मांग में भी फरवरी-मार्च 2024 माह के दौरान 9.8 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है क्योंकि ग्रामीण इलाकों में निवासरत नागरिकों को रोजगार के अवसर अन्य क्षेत्रों में उपलब्ध हो रहे हैं। इसी प्रकार, ट्रैक्टर की बिक्री में भी जनवरी-फरवरी 2024 माह के दौरान 16.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान भारत में कुल 892,313 ट्रैक्टर की बिक्री हुई है जो पिछले वित्तीय वर्ष 2022-23 की तुलना में 7.5 प्रतिशत अधिक है।
भारत के मौसम विभाग द्वारा जारी की गई भविष्यवाणी के अनुसार, वर्ष 2024 के मानसून मौसम के दौरान भारत में मानसून की बारिश के सामान्य से अधिक रहने की प्रबल सम्भावना है। इससे भारत के किसानों में हर्ष व्याप्त है क्योंकि मानसून के अच्छे होने से खरीफ की फसल के भी बहुत अच्छे रहने की सम्भावना बढ़ गई है। मौसम विभाग के सोचना है कि इस वर्ष अल नीनो के स्थान पर ला नीना का प्रभाव दिखाई देगा। अल नीनों के प्रभाव में देश में बारिश कम होती है एवं ला नीना के प्रभाव में देश में बारिश अधिक होती है। साथ ही, भारतीय किसान अब तिलहन, दलहन एवं बागवानी की फसलों की ओर भी आकर्षित होने लगे हैं। दालों, वनस्पति, फलों एवं सब्जियों के अधिक उत्पादन से किसानों की आय में वृद्धि दृष्टिगोचर है। केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न खाद्य उत्पादों की बिक्री के लिए ई-पोर्टल के बनाए जाने के बाद से तो भारतीय किसान अपनी फसलों को वैश्विक स्तर पर सीधे ही बेच रहे हैं और अपने मुनाफे में वृद्धि दर्ज कर रहे हैं। भारतीय खाद्य पदार्थों की मांग अब वैश्विक स्तर पर भी होने लगी है एवं खाद्य पदार्थों के निर्यात में भी नित नए रिकार्ड बनाए जा रहे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादों की मांग सामान्यतः अच्छे मानसून के पश्चात अच्छी फसल एवं विभिन्न सरकारों, केंद्र एवं राज्य सरकारों, द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों पर किए जा रहे खर्चो में बढ़ौतरी के चलते ही सम्भव होती है। केंद्र सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में लागू की गई विकास की विभिन्न योजनाओं पर व्यय में लगातार वर्ष दर वर्ष वृद्धि की जा रही है एवं इसके लिए केंद्रीय बजट में भी बढ़े हुए व्यय का प्रावधान प्रति वर्ष किया जा रहा है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर निर्मित हो रहे हैं एवं इन इलाकों में विभिन्न उत्पादों की मांग भी बढ़ती हुई दिखाई दे रही है।
नीलसन द्वारा किए गए एक सर्वे के यह बताया गया है कि जनवरी एवं फरवरी 2024 माह में भारत में विभिन्न उत्पादों की शहरी क्षेत्रों में मांग 1.5 प्रतिशत की दर से बढ़ी है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में मांग 2.5 प्रतिशत की दर से बढ़ी है। विशेष रूप से फरवरी 2024 के बाद से ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादों की मांग में वृद्धि लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है। रबी की फसल के भी अच्छे रहने की सम्भावना बलवती हुई है जिसके कारण किसानों की मनोदशा भी सकारात्मक बन रही है और यह वित्तीय वर्ष 2024-25 में देश की आर्थिक वृद्धि दर को बलवती करने के मुख्य भूमिका निभाने जा रही है। आज देश की लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है यदि ग्रामीण क्षेत्रों में निवासरत नागरिकों की मनोवृत्ति सकारात्मक हो रही है तो निश्चित ही वित्तीय वर्ष 2024-25, आर्थिक विकास की दृष्टि से अतुलनीय परिणाम देने वाला वर्ष साबित होने जा रहा है।

मुजम्मिल शेख, सलीम शेख, सद्दाम शेख, सज्जाद शेख को क्यों बचा रही है गौनाहा पुलिस

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एमएस डेस्क

आरटीआई एक्टिविस्ट आचार्य नितिन कुमार रवि  ने बिहार, डीजीपी को मुजम्मिल शेख, सलीम शेख, सद्दाम शेख,सज्जाद शेख (गम्हरिया, गौनाहा) पर एफआईआर और कार्रवाई ना होने के संबंध में पत्र लिखा है। आचार्य नितिन के अनुसार, उनका मामला कानून व्यवस्था से जुड़ा है। मुजम्मिल शेख, सलीम शेख, सद्दाम शेख, सज्जाद शेख के संबंध में बार बार शिकायत करने के बाद भी गौनाहा पुलिस मामले का सज्ञान नहीं ले रही।

जांच की स्थिति यह है कि इस मामले को पूर्व में देख रहे एसआई विवेक कुमार बालेन्दू फोन पर मीडिया स्कैन से थाना प्रभारी बन कर बात करते हैं और बातचीत के दौरान वे बताते हैं कि उन्हें मामले की जानकारी नहीं है लेकिन इस बातचीत से पहले वे मामले पर रिपोर्ट लिख चुके होते हैं।

नितिन के अनुसार —थाने की लापरवाही या आरोपी को बचाने की मंशा बार बार दिखाई पड़ती है। नितिन पूछते हैं,
फसल की लूट में मुजम्मिल शेख, सद्दाम शेख और सज्जाद शेख शामिल हैं। अब तक लाखों रुपए की लूट हो चुकी है। लेकिन थाने की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की गई। बिना किसी जांच पड़ताल के थाना यह मान चुका है कि यह जमीन मुजम्मिल शेख, सलीम शेख, सद्दाम शेख, सज्जाद शेख का है? यदि इस निष्कर्ष पर गौनाहा थाना किसी जांच पड़ताल के बाद पहुंचा है तो अब तक उसकी डिटेल उन्होंने पीड़ित पक्ष को उपलब्ध क्यों नहीं कराई है? थाना और अंचल पूरे मामले में इतनी लापरवाही से काम कर रहे हैं कि जांच और आरोपी पर कार्रवाई की जगह,  एक ही मामले में अलग अलग रिपोर्ट पेश कर रहे हैं। पीड़ित पक्ष का थाने की लापरवाही की वजह से जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई कौन करेगा?

मुजम्मिल शेख के अनुसार, वह एक कन्स्ट्रक्शन कंपनी से जुड़ा है। कंपनी के मालिक के संबंध में वह बताता है कि उनके दामाद भारतीय प्रशासनिक सेवा में है। क्या वह इन नामों का इस्तेमाल थाना और अंचल में भी कर रहा है? संभव है कि वह इतने प्रभावशाली लोगों के नाम का इस्तेमाल करके थाना और अंचल पर दबाव बनाने में सफल हुआ हो।

मुजम्मिल शेख

मुजम्मिल से जुड़े कुछ दूसरे मामलों की जानकारी भी मीडिया स्कैन को प्राप्त हुई है। जिसमें पीड़ित पक्ष का आरोप है कि गौनाहा थाना और अंचल ने आरोपी की मदद की। अब गौनाहा में थाना प्रभारी और अंचलाधिकारी बदल चुके हैं। नए थाना प्रभारी और अंचलाधिकारी को इन मामलों की एक बार फिर से जांच करनी चाहिए। थाना और अंचल से स्थानीय लोगों को न्याय नहीं मिलेगा फिर स्थानीय आदमी न्याय के लिए कहां जाएगा? जबकि गौनाहा आदिवासी बहुल प्रखंड है और नेपाल से लगा हुआ होने की वजह से अधिक संवेदनशील भी है।

आरटीआई एक्टिविस्ट नितिन कुमार रवि  के अनुसार कोविड के दौरान जब उनका पूरा परिवार कोविड की चपेट में था। उस समय मुजम्मिल ने कब्जा का पहला प्रयास किया था। जिसकी शिकायत गौनाहा थाना में दर्ज की गई थी। लेकिन थाना ने कोई कार्रवाई नहीं की। थाना की तरफ से जो रिपोर्ट बनाई गई, उसमें भी साफ जल्दबाजी नजर आती है। जैसे बिना किसी जांच के थाने में बैठकर किसी ने रिपोर्ट लिखवाई हो क्योंकि अपनी रिपोर्ट को सपोर्ट करने वाला कोई डाक्यूमेंट गौनाहा थाना अब तक उपलब्ध नहीं करवा पाया है।

आचार्य नितिन कुमार रवि के अनुसार जितना कष्ट उनके परिवार को कोरोना की चपेट में आने के बाद नहीं हुआ, उससे अधिक पीड़ा वे गौनाहा थाना  और  अंचल की वजह से उठा चुके हैं। मुजम्मिल शेख, जिस कन्स्ट्रक्शन कंपनी के मालिक और कथित तौर पर उनके भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी दामाद का जिक्र इस जमीन कब्जा के मामले में कर रहा है। जांच उन सबकी भूमिका की भी होनी चाहिए और जांच तो इस बात की भी होनी चाहिए कि मुजम्मिल शेख पर कई सारी शिकायतों के बावजूद अब तक कोई कार्रवाई गौनाहा में क्यों नहीं हो पा रही है? कौन है जो बार बार उसे बचा रहा है?

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