Habitat International Film Festival 2025 celebrates Italian Cinema and Cultural Heritage

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New Delhi – The Habitat International Film Festival (HIFF) 2025 proudly announces Italy as the Focus Country, presenting a rich cinematic showcase in collaboration with the Italian Embassy Cultural Centre, Cineteca di Bologna, and L’Immagine Ritrovata. The festival will highlight contemporary Italian films alongside meticulously restored classics, offering Indian audiences a deep dive into Italy’s remarkable film legacy.

The Italian Focus at the HIFF 2025 also brings back the Italian Screens. Roberto Stabile, Head of the International Department at Cinecittà, stated, “We are delighted to return to New Delhi for the fourth edition of Italian Screens to showcase the best of contemporary Italian cinema and promote tax incentives for distribution and co-productions. Supported by the Italian Ministry of Culture and the Ministry of Foreign Affairs and International Cooperation, this initiative also aims to strengthen Indo-Italian creative collaboration and present our funding opportunities.

Andrea Anastasio, Director of the Italian Embassy Cultural Centre, expressed enthusiasm about the initiative: “Italy as the Focus Country at HIFF 2025 is a wonderful opportunity to share our deep-rooted passion for cinema with Indian audiences. Our approach has been twofold—showcasing outstanding contemporary films and highlighting the exceptional film restoration work done by Cineteca di Bologna and L’Immagine Ritrovata. These institutions have preserved cinematic heritage for future generations, ensuring that masterpieces are not lost to time.”

Curated by Stefano Francia di Celle, the Italian Focus program features two major segments: a selection of contemporary Italian films from 2024 and a retrospective dedicated to the legendary Marcello Mastroianni on his centenary.

“The Italian Focus at HIFF 2025 is divided into two segments—a selection of 2024’s finest contemporary films and a tribute to the legendary Marcello Mastroianni on his centenary. We aim to offer a broad spectrum of genres, from thrillers and dramas to romantic comedies and socially conscious films, reflecting the evolution of Italian cinema across generations,” Stefano explains.

He further adds, “We also pay special tribute to Marco Tullio Giordana, whose latest film, The Life Apart, a psychological thriller, will open the festival. The meticulously restored classics will allow audiences to relive the grandeur of Italian cinema’s golden age, particularly through the works of Federico Fellini and Vittorio De Sica. A highlight will be the restored Apu Trilogy by Satyajit Ray, whose work was deeply influenced by De Sica’s neorealism.”

“Additionally, Celine Pozzi from L’Immagine Ritrovata will conduct a workshop on film restoration, while our collaboration with the Aga Khan Trust for Culture will extend the discussion to preserving archaeological heritage. We are thrilled to bring these cinematic gems to India and celebrate the power of film as a cultural bridge,” Stefano rejoices.

“Cinema, like literature, nurtures creativity, fosters community, and keeps storytelling alive. In an era dominated by screens on our smartphones and laptops, it is vital to come together and experience the magic of the big screen. We are grateful to Cineteca di Bologna, the Italian Ministry of Culture, and all our collaborators for making this vision a reality. Special thanks to the India Habitat Centre for their unwavering support in bringing this festival to life,” sums up Andrea.

With a carefully curated selection of films and expert-led discussions, the Italian Focus at HIFF 2025 promises to be an unmissable celebration of cinema, bridging the past and present while strengthening Indo-Italian cultural ties.

राणा सांगा पर चल रहा है बकवास

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मनोज श्रीवास्तव

मैंने पहले ही कहा था कि औरंगजेबों को बचाने के लिए ये लोग जयसिंह का नाम भले ले रहे हों लेकिन न ये मराठों के सगे हैं न राजपूतों के, ये तो बस एक से दूसरे को भिड़ाकर अपना उल्लू सीधा करने वाले लोग हैं। सो औरंगजेब को जस्टिफ़ाई करने के चक्कर में तब ये परशुराम को उतार लाये और अब राणा सांगा को।

कि बाबर को राणा सांगा ने आमंत्रित किया था।

एक बार पहले भी ये बकवास किन्हीं मूर्खों ने फ़ेसबुक पर की थी तब भी मैंने इस पर उनकी वाल पर जाकर उन्हें विस्तृत उत्तर दिया था।

अब फिर राणा सांगा की बात होने लगी।

राणा सांगा जो लोदी शासन के विरुद्ध राजपूतों का महासंघ बनाने वाले अद्वितीय वीर थे, उन्हें कितनी चतुराई से देश के दीर्घकालिक हितों के प्रति असावधान बताया गया, यह एक और उदाहरण है भारत के इतिहास लेखन की अनंत बदमाशियों का।

यह सिर्फ भारत में चलता है कि इसके बारे में शत्रु क्या कहते हैं, वही प्रमाण मान लिया गया।
यह ऐसा ही है जैसे पाकिस्तानी से भारत के बारे में चरित्र प्रमाणपत्र लिया जाये। राणा सांगा के बारे में बाबर ने बाबरनामा में क्या कहा, वही मान लिया गया।

किन्तु बाबर ने भी राणा सांगा के निमंत्रण का उल्लेख नहीं किया था। वह दौलत खान के निमंत्रण के बारे में अवश्य कहता है और उसके साथ हुए समझौते का विस्तृत उल्लेख भी करता है। तो आया वह दौलत खान के निमंत्रण पर था। राणा सांगा के बारे में वह वादाखिलाफी का आरोप अवश्य लगाता है कि उन्होंने मदद करने का वादा नहीं निभाया। बाबरनामा में भी यह उल्लेख पानीपत की लड़ाई के पहले नहीं आया बल्कि जब बाबर और राजपूत सेनाओं के बीच लड़ाई होने को थी, तब आया है।

पर जिस तरह से वह दौलत खान लोदी और आलम खान के साथ हुए समझौतों का विस्तृत वर्णन करता है, राणा साँगा के साथ हुए ऐसे किसी समझौते का विस्तृत उल्लेख नहीं करता। दौलत खान लोदी के निमंत्रण के अन्य स्रोतों से भी प्रमाण मिलते हैं पर राणा के नहीं।अलाउद्दीन और इब्राहीम के चाचा भी उसे आमंत्रित कर चुके थे।

और ऐसा क्यों है कि बाबर के इस राणा संबंधी कथन का समर्थन किसी समकालीन राजपूत लेखक छोड़िये, किसी समकालीन हिंदू लेखक छोड़िये किसी मुस्लिम लेखक तक से नहीं होता।

What value an assertion without a corroborative evidence has?

Nil. लेकिन हमारी पाठ्यपुस्तकों में इसका उल्लेख करना आवश्यक समझा गया। जिस चीज़ का एक भी स्वतंत्र स्रोत से समर्थन नहीं होता था, उस पर इतनी निर्भरता।

चलो सभी material particulars में न सही, कुछ अंशों में ही सही, कोई तो स्वतंत्र पुष्टि होती।

बल्कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य तो विरोध में हैं।इस हद तक कि गोपीनाथ शर्मा अपनी पूरी पुस्तक में बाबर के कथन की अविश्वसनीयता सिद्ध करते हुए यह भी कहने पर बाध्य हुए कि It was a pity that all later writers have uncritically accepted Babur’s version.

और याद रहे, हम परिणाम की बात नहीं कर रहे, प्रस्ताव की बात कर रहे हैं। यह तो स्वयं बाबर तक मानता है कि राणा से धेला भर मदद नहीं मिली। जी एन शर्मा और गौरीशंकर ओझा जैसे बहुत से इतिहासकारों का निष्कर्ष है कि उलटे बाबर ने राणा से मदद माँगी होगी क्योंकि उनके नेतृत्व में राजपूत संघ बहुत शक्तिशाली माना जाता था। राजपूत खतौली और धोलपुर के युद्ध में इब्राहीम लोदी की सेनाओं को पहले ही हरा चुके थे।

राणा ने न तो पानीपत के युद्ध में भाग लिया और न अपनी सेना को तिल भर खिसकाया। राणा सांगा इब्राहीम लोदी के विरुद्ध लगातार सफल हो रहे थे तो उन्हें बाबर की सहायता की ज़रूरत ही नहीं थी। राणा सांगा ने तो राजपूत राजों को साथ लेकर खानवा का युद्ध बाबर से किया। 120 राजाओं को उन्होंने एकत्र किया और सिकंदर लोदी का लड़का महमूद लोदी जिसे अब नया सुल्तान घोषित किया जा चुका था, वह भी राणा सांगा से आकर मिल गया। राणा बार बार बाबर के द्वारा भेजी गयी टुकड़ियों को परास्त भी करते रहे। बयाना के युद्ध में भी उन्होंने बाबर की फ़ौजों को हराया।

बाबर तथाकथित निमंत्रण के पहले चार बार ( 1503, 1504, 1518, 1519) भारत पर असफल आक्रमण कर चुका था। इसलिए उसकी क्रेडिबिलिटी इतनी नहीं थी कि राजपूत संघ का नेता यानी राणा उसे इब्राहीम लोदी के विरुद्ध आहूत करता।

बाबर लोदियों तक को काफिर कह चुका था। उसे राणा के विरुद्ध युद्ध ही नहीं, जेहाद करना था जो उसने अपने सैनिकों को उकसाने के लिए कहा भी।

मुझे तो आश्चर्य है कि इन लोगों के पास अपनी दुकान चलाने के लिए कितनी कम पूँजी है।

अब कहाँ हैं वे लोग जो राजपूतों के विरुद्ध मराठों की पोजिशनिंग कर रहे थे? किसी वृद्धा लेखिका की रील वायरल करके।

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याद करें क्या लिखा था शिवाजी ने अपने पत्र में मिर्जा राजा जयसिंह को :

जय सिंह को लिखे एक लंबे पत्र में शिवाजी ने मिर्जा राजा को संदेश दिया: “यदि आप अपने लिए दक्कन जीतने आए हैं, तो मैं आपको अपनी सेवाएँ देना पसंद करूँगा। लेकिन चूँकि आप औरंगज़ेब की ओर से आए हैं, इसलिए मैं थोड़ा उलझन में हूँ कि आपसे कैसे निपटूँ। अगर हम दोनों लड़ेंगे, तो हिंदुओं का नुकसान दोनों तरफ़ से होगा। आपस में लड़ने में कोई बहादुरी नहीं मानी जाएगी और कोई वीरता नहीं होगी।” औरंगजेब की मंशा यह है कि हिंदुओं में कोई भी बहादुर आदमी जिंदा न बचे। शेर आपस में लड़कर खुद को खत्म कर लें, ताकि गिद्ध राज कर सकें। तुम मुगलों की रणनीति नहीं समझते… मैं तुम्हें कहता हूँ कि तुम हम जैसे शेरों से लड़कर हिंदुओं के मुंह पर कालिख न पोतो। अगर तुममें हिम्मत है तो हिंदू धर्म के दुश्मनों पर हमला करो और इस्लाम को खत्म करो। अगर दारा शिकोह इस देश का शासक होता तो वह हम पर प्यार और स्नेह बरसाता। लेकिन जब से तुमने जशवंत सिंह जैसे लोगों को छोड़ दिया है, तुम अच्छे और बुरे में फर्क नहीं कर सकते। तुम अब तक छोटे लोगों से लड़ते रहे हो और अब जब से तुम्हें मेरे जैसे शेरों से लड़ना है, तब से तुम्हें पता चलेगा कि तुम कहां खड़े हो। तुम मृगतृष्णा के पीछे भाग सकते हो। यह ऐसा है जैसे इतनी मेहनत करने के बाद तुम एक खूबसूरत महिला को पकड़कर हमारे दुश्मन को सौंप सकते हो। क्या तुम इतने घटिया इंसान हो? क्या तुम ऐसे दुष्टों का एहसान पाकर गर्व महसूस करते हो? क्या तुम जुजार सिंह के प्रयासों के परिणाम से वाकिफ नहीं हो? कुछ मुसलमानों ने हमारे महान देश पर कब्ज़ा कर लिया, यह देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। लेकिन यह उनके कारनामों की वजह से नहीं हुआ है। अगर आप समझने की कोशिश करें तो वे हमसे अच्छी तरह से बात करते हैं और हमें गुलाम बनाते हैं। अगर आपकी आँखें देख सकती हैं, तो आप इसे महसूस कर सकते हैं। हमें यह समझने की ज़रूरत है कि वे कैसे हमारे पैरों में बेड़ियाँ बाँध रहे हैं और हमारी ही तलवारों से हमारे सिर काट रहे हैं। हमें हिंदुओं, हिंदुस्तान और हिंदू धर्म की रक्षा के लिए बहुत प्रयास करने की ज़रूरत है। हमें जैसे को तैसा की नीति अपनानी चाहिए। तुर्कों को हमारी तलवारों की ताकत दिखानी चाहिए। अगर आप मारवाड़ के राजा जसवंत सिंह और मेवाड़ के राणा राज सिंह के साथ हाथ मिला सकें, तो यह बहुत मददगार होगा।

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क्या वही कोशिश आज भी जारी नहीं है कि शेर आपस में लड़ के एक दूसरे को नष्ट कर लें ताकि गिद्ध राज कर सकें।

Prophetic words थे शिवाजी के।

बात-बात पे जंग : व्यंग्य और हास्य के बदलते रंग

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मुंबई: पिछले दो दशकों में हमने एक पूरी जमात को गुम होते देखा है। वो जमात जो हमें हंसाती थी, गुदगुदाती थी, और सोचने पर मजबूर करती थी। व्यंग्यकार, कार्टूनिस्ट, और हास्य के बादशाह अब धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं।

उनकी जगह यूट्यूबर्स और स्टैंड-अप कॉमेडियन ने ले ली है, जिनके चुटकुलों में गालियों और अश्लीलता का बोलबाला है। ये वो दौर है जब हंसी की जगह चीखने-चिल्लाने, मार-पीट, और नफरत भरे संवादों ने ले ली है। क्या यही है आज की लोकतांत्रिक हकीकत?

एक जमाना था जब अखबारों की पहचान लक्ष्मण, रंगा, सुधीर धर, विजयन और शंकर जैसे कार्टूनिस्टों के उम्दा कार्टूनों से होती थी। उनके कार्टून सिर्फ हंसाते ही नहीं थे, बल्कि समाज और राजनीति पर गहरी चोट करते थे। आर.के. लक्ष्मण के “कॉमन मैन” ने हर भारतीय को अपनी छवि दिखाई, और शंकर के कार्टून ने नेताओं की पोल खोल दी।

मगर आज? अखबारों में कार्टून गायब हैं, और राजनीति से हास्य गायब हो गया है। ऐसा लगता है कि अखबार डरते हैं, कार्टूनिस्ट डरते हैं, और हम सब डरते हैं। क्या यही है आजादी का मतलब? चो रामास्वामी की तमिल में तुगलक पत्रिका, शरद जोशी के व्यंग, खुशवंत सिंह के कटाक्ष, काका हाथरसी की कविताएं, अब कहां गायब हो गए इस परंपरा के वारिस! फिल्मों से जॉनी वॉकर, महमूद, देवेन वर्मा, जौहर, ॐ प्रकाश टाइप कॉमेडियंस गायब हुए, टीवी से कॉमेडी के सीरियल्स।

राजनीति और हास्य का रिश्ता हमेशा से जटिल रहा है। एक जमाने में संसद में मजाक, शेर-ओ-शायरी, और हंसी-मजाक का दौर था। पीलू मोदी और राज नारायण जैसे नेता खूब हंसाते थे। मगर आज? संसद हो या विधानसभा, सभी जगह मान्यवर गंभीर मुद्रा में बैठे रहते हैं। हंसी-मजाक की जगह गंभीरता ने ले ली है। क्या यही है लोकतंत्र की परिभाषा?

आज के दौर में राजनीतिक या धार्मिक हस्तियों पर व्यंग्य करना जानलेवा हो सकता है। कार्टूनिस्ट और कॉमेडियन धमकियों, ऑनलाइन उत्पीड़न, और कानूनी कार्रवाई का शिकार हो रहे हैं। उदाहरण के लिए, विवादास्पद धार्मिक हस्तियों को चित्रित करने वाले कार्टूनिस्टों को व्यापक विरोध और धमकियों का सामना करना पड़ा है। भारत में भी, राजनीतिक नेताओं या धार्मिक हस्तियों की आलोचना करने वाले कार्टूनिस्ट अक्सर ऑनलाइन ट्रोलिंग और कानूनी कार्रवाई का शिकार होते हैं।

मगर, यह सब इतना भी निराशाजनक नहीं है। भारत में कुछ बहुत ही मज़ेदार लोग हैं जो हंसी की मशाल जलाए रखते हैं। वीर दास, बस्सी, उपमन्यु, केनी , और कल्याण रथ जैसे कॉमेडियन ने हास्य को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। यूट्यूब पर कैरी, डॉली, भुवन, आशीष जैसे क्रिएटर्स ने हंसी को नया रंग दिया है। मगर, इनमें से ज्यादातर राजनीति से दूर भागते हैं।

कपिल शर्मा के शो में नेता नहीं आते, और वह खुद भी राजनीति से दूर रहते हैं। क्या यही है हास्य की आजादी? कुछ श्रोता और दर्शक टीवी न्यूज चैनल को मनोरंजन के लिए देखते हैं, जब एंकर चिल्लाता है या लड़वाता है तो बहुत मजा आता है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स अक्सर आपत्तिजनक समझे जाने वाले कंटेंट को हटा देते हैं, कभी-कभी स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बिना। इससे सेल्फ-सेंसरशिप की स्थिति पैदा हो जाती है। कॉमेडियन और क्रिएटर्स को अपने कंटेंट को लेकर सतर्क रहना पड़ता है। हिंसा की धमकियों के कारण कई कॉमेडियन के शो रद्द हुए हैं। इंटरनेट शटडाउन और सेंसरशिप का इस्तेमाल असहमति की आवाज़ों को दबाने के लिए किया जाता है, जिसमें हास्य कलाकार और ऑनलाइन क्रिएटर भी शामिल हैं।

मगर, यह सब इतना भी निराशाजनक नहीं है। भारत में कुछ बहुत ही मज़ेदार लोग हैं जो हंसी की मशाल जलाए रखते हैं। स्टैंड-अप कॉमेडियन, यूट्यूबर्स, और ब्लॉगर्स का उदय लचीलापन और रचनात्मकता की स्थायी मानवीय भावना को प्रदर्शित करता है। ये नई आवाज़ें राजनेताओं और सामाजिक मुद्दों का मज़ाक उड़ाती रहती हैं, यह साबित करते हुए कि हास्य को आसानी से चुप नहीं कराया जा सकता।

ह्यूमर टाइम्स की प्रकाशक मुक्ता गुप्ता कहती हैं, “राजनीतिक कार्टूनिंग का पतन एक बड़े सामाजिक बदलाव का प्रतीक है। ग्राफिक डिज़ाइन और एनिमेटेड पात्रों का उदय, तकनीकी रूप से उन्नत होते हुए भी, अक्सर पारंपरिक रेखाचित्रों की वैचारिक गहराई और सरलता नहीं रखता है।”

हास्य और व्यंग्य सिर्फ मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि सत्ता को जवाबदेह ठहराने, सामाजिक मानदंडों को चुनौती देने, और आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक तंत्र हैं। खुले समाजों में, हास्य और व्यंग्य स्वतंत्रता, सहिष्णुता, और उदार मूल्यों के महत्वपूर्ण बैरोमीटर के रूप में काम करते हैं। मगर, आज के दौर में हास्य और राजनीतिक व्यंग्य के लिए जगह कम होती जा रही है, जो बढ़ती असहिष्णुता, धार्मिक कट्टरता, और राजनीतिक शुद्धता से प्रभावित है।

फिर भी, इन चुनौतियों के बीच, आशा की किरणें हैं। हंसी की जंग जारी है, क्योंकि, जब तक हंसी है, तब तक जिंदगी है। और जब तक जिंदगी है, तब तक हंसी है। शायद इंसान के अलावा कोई जीव हंसने की काबिलियत नहीं रखता है।

‘पानी पंचायत’ पुस्तक के पांच अध्यायों का लोकार्पण किया गया

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तभासं के स्वर्ण जयंती वर्ष  अवसर पर हिन्दू कॉलेज सांगानेरिया सभागार, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली में ‘‘पानी पंचायत’’ आयोजन किया गया। इस पंचायत का आयोजन राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर स्मृति न्यास और तरुण भारत संघ द्वारा किया गया,  जिसमें देश भर से विद्वानों, पर्यावरणविद्, सामाजिक कार्यकर्ता, विधायक, सांसद, मंत्री आदि ने भाग लिया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता भारत के पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ मुरली मनोहर जोशी जी ने की।

पानी पंचायत में जलपुरुष राजेंद्र सिंह जी द्वारा लिखित नालंदा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित तरुण भारत संघ के पांच दशकों के जमीनी कार्यों पर आधारित “पानी पंचायत“ पुस्तक के पांचों अध्यायों का विमोचन किया गया। इस पुस्तक का विमोचन पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री मुरली मनोहर जोशी जी, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री श्री भगत सिंह कोश्यारी जी, जलपुरुष राजेन्द्र सिंह जी, जनजातीय राज्य मंत्री श्री दुर्गा दास उइके जी, पूर्व केन्द्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे जी, दिल्ली विश्वविद्यालय के डीन प्रो. रंजन त्रिपाठी जी, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर स्मृति न्यास के अध्यक्ष नीरज कुमार जी, श्याम सहाय द्वारा किया गया।

पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री मुरली मनोहर जोशी जी ने कहा कि, ़हमारी मूल्यसंस्कृति, प्रकृति और संस्कार के अनुसार भारत का पुर्नगठन होना चाहिए। ऋषितुल्य जलपुरुष राजेन्द्र सिंह ने जो समाज की चेतना को जागृत करने का बेड़ा उठाया है, यह अद्भुत उपक्रम है। इसकी महत्ता इसमें है कि, बिना सरकार से पैसे लिए, मनुष्य उद्म से समाज की चेतना जागृत करना, भूमि और जल के प्रति मनुष्य का क्या कृतव्य है, इसको जगाना और भारत ही नहीं पूरे विश्व में ले जाना ऋषि तुल्य कार्य है। इसलिए जल ऋषि के तौर पर इनकी सराहना करता हूं। जैसे हमने महामना मालवीय जी को महामना शब्द का प्रयोग किया, ऐसे ही मेरी दृष्टि में राजेन्द्र सिंह को जल ऋषि शब्द का प्रयोग करता हूं।

आगे कहा कि, हमे यह समझना चाहिए कि, प्रथ्वी जल से आयी है। पृथ्वी और जल का संबंध माता-पुत्र की तरह है। लेकिन यह सत्य लग रहा है कि, आने वाला जो बड़ा युद्ध होगा, वह जल से ही होगा। जल संकट सारे विश्व के लिए सबसे बड़ा संकट है। इस संकट के मध्य में हमारा देश विद्मान है।
जनजातीय राज्य मंत्री श्री दुर्गा दास उइके ने कहा कि, हमारा सौभाग्य है कि, हमने भारत भूमि पर जन्म लिया। फिर जो वैदिक ग्रंथ हमे मिले है, उनसे लघु से विराट बनने की यात्रा की सीख मिली है। इसमें ही प्रकृति का मूल छिपा है। इस मूल को श्रद्धेय राजेन्द्र सिंह जी ने जन चेतना को ‘‘पानी पंचायत’’ के तौर पर प्रस्तुत किया है, इस शुभ कार्य के लिए हमे अभीनंदन करना चाहिए।

जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने पुस्तक के बारे में बताते हुए कहा कि, ब्रह्माण्ड का सृजन करने वाला ’पानी’ और उसके पंचपरमेश्वरों की पंचायत प्रक्रिया ही इस पुस्तक में है। इसमें पंचायत को शुरू करने की प्रक्रिया, साध्य, साधन, साधना और सिद्धि को समझ सकते हैं। पानी पंचायत जल संकट से जूझते, उजड़ते लोगों को सचेत और स्वावलंबी बनाने के लिए भारतीय ज्ञानतंत्र को ही मुख्य मानती है। इसमें पंच परमेश्वर सर्वोपरि हैं। पंच परमेश्वर के दिखाए रास्ते पर चलना निरापद माना जाता है। तभासं ने इसी रास्ते का अनुसरण किया है। पानी पंचायत प्रक्रिया में केवल वादी-प्रतिवादी और न्यायमूर्ति के निर्णय ही सभी कुछ नहीं है; यह तो समाज को समग्रता से जोड़कर समता की तरफ बढ़ाने वाली प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में लोगों को स्वयं अपनी समस्या का समाधान खोजना सिखाने का प्रयास किया गया है। देशज ज्ञान से काम करके स्वावलंबी एवं स्वाभिमानी बनकर श्रमनिष्ठा से काम करने की प्रक्रिया पानी पंचायत ने चलाई है। इस प्रक्रिया में समाज के सभी वर्गों को जोड़ा गया है। पानी पंचायत से तभासं ने उजड़े हुए लोगों को पुनः बसाया है। बंदूकधारियों को पानीदार, समझदार, इज्जतदार और सुसम्पन्न बनाया है। उस काम की जानकारी इस पानी पंचायत में है।

पानी पंचायत के पांचों अध्याय पढ़ने पर तभासं की संपूर्ण जानकारी मिलेगी। दूसरी पानी पंचायत के अध्याय में पंचायत में जमीनी अनुभव पढ़ने को मिलेंगे। यह अध्याय तो केवल जल, प्रदूषण, विकास का विस्थापन, बिगाड़ और विनाश से बचाव, भारतीय विद्या द्वारा समाधान खोजने के प्रयास की शुरूआत है। दूसरे अध्याय में समाधान और जमीनी स्तर पर समय सिद्धि से काम हुआ है। प्रकृति को बचाने की प्रत्यक्ष लड़ाई की जीत का अगला अध्याय है। तीसरा अध्याय तभासं और समाज के गंगा-यमुना नदी सत्याग्रह की सफलता को विस्तार देता है। राजस्थान से अपने काम को पूरे देश में जल बिरादरी द्वारा फैलाता है। यह अध्याय सामुदायिक जलाधिकार की लड़ाई में विजय दिलाने वाला रहा है। ‘लावा का वास’ सामुदायिक बाँध से जल स्वराज्य पाने में विजय मिली। नीमी गाँव जल क्रांति की सफलता है। चौथे अध्याय में सरकार व संयुक्त राष्ट्र की नीतियों को लोकोन्मुखी एवं प्रकृति अनुकूल बनवाने की संघर्ष-भरी कहानी है। इस काल में सामुदायिक जल संरक्षण, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और लोक विज्ञान से किए गए तभासं के कार्यों को वर्ष 2015 में ‘स्टॉकहोम वाटर प्राइज’ से सम्मानित किया गया। पाँचवाँ अध्याय तभासं के कार्यों को दुनिया में प्रयोग करके देखना और सफल सिद्ध होने पर उन्हें अपनाना है। यह कार्य विश्व जल शांति यात्रा द्वारा पूरी दुनिया में काम आ रहा है। सुखाड़-बाढ़ विश्व जन आयोग द्वारा तभासं का अनुभव दुनिया में पहुँचा है। विश्व शांति वर्ष 2024 में तीन हजार बागियों को विश्व शांति जल दूत पुरस्कार से सम्मानित करने का अध्याय है। प्राकृतिक शोषण के विरुद्ध एवं जल बाजारीकरण को रोकने के लिए निजीकरण के खिलाफ मोर्चा खोला गया है। पानी पंचायत के निर्णय से तभासं ने अपने काम का रास्ता चुना है।

पूर्व केन्द्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे जी ने कहा कि, जलपुरुष राजेन्द्र सिंह जी का लोक विज्ञान और देशज जीवन पद्धति, जीवन मूल्य बन गया है। जीवन को मूल्यवान बनाने में सदैव सभी कुछ स्मरण कराने हेतु महात्मा गांधी, जयप्रकाशनारायण का जीवन संदेश साथ रहता है। मुझे लगता है कि, यह पानी पंचायत पुस्तक पढ़ने से ही पाठक जल के कामों की भी सिद्धि प्राप्त कर सकेगा।

जम्मूकश्मीर की आयुक्त आईएएस रश्मि सिंह जी ने कहा कि, हमने जलपुरुष का काम समझा है;इन्होने जो काम किया है उसकी कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक जरूरत है। जलपुरुष ने इस जरूरत को पूरा करने के लिए गहन श्रमनिष्ठ बनकर साधन और तपस्या करके सूखी मरी नदियों को पुनर्जीवित किया है। इन्होने सबको इस काम को जोड़ा है।

प्रो. मधुलिका बनर्जी और प्रो. सोनाझारिया मिंज ने कहा कि, हमने इनका काम आंखों से देखा, अध्ययन और समझा है। अब यही समयसिद्ध कार्य का अनुभव है जिससे हम जल संकट का समाधान खोज सकते है। यह जलपुरुष प्रत्यक्ष तौर पर करके दिखाया है।

नालंदा प्रकाशन के अध्यक्ष नीरज कुमार जी के कहा कि, यह पानी पंचायत पुस्तक, जल संकट के सवालों का समाधान है। जलपुरुष जी के नेतृत्व में तभासं इस प्रक्रिया को आगे ले जाने वाला साधन मात्र है। तभासं लोक परम्परा में विश्वास रखता है। भारतीय ज्ञान तंत्र तभासं के काम का आधार है। इसलिए पानी पंचायत के निर्णय ही तभासं को रास्ता दिखाते हैं।

पानी पंचायत के अंतिम सत्र में नूह-मेवात, चंबल क्षेत्र धौलपुर, करौली से आए तभासं के कार्यकर्ता और बुन्देलखंड की जल सहेलियों को पूर्व केन्द्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे द्वारा जल नायक सम्मान से सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम में डॉ इंदिरा खुराना द्वारा लिखित पुस्तक Climate resilient socioeconomic growth through water conservation का विमोचन उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री श्री भगत सिंह कोश्यारी जी में किया।

इस कार्यक्रम में प्रो. अशोक कुमार, डॉ जी. अशोक कुमार (आईएएस), डॉ. आर. विश्वास, प्रेमनिवास शर्मा, श्री संजय सिंह, श्री रमेश शर्मा, डॉ. वी.एन. मिश्रा, डॉ. इंदिरा खुराना, कृष्ण गांधी, इलांगो , ईश्वरचन्द्र, अरविंद कुशवाहा, प्रो. पी.के.सिंह, प्रो. वी.के. विजय, श्रीमति शोभा विजेन्द्र , दीपक परवतियार , विक्रांत चौहान, अनिल साठे, डॉ हिमांशु सिंह, संजय राणा, मुकेश एंगल, अनिल शर्मा, अजय तिवारी, नेहपाल सिंह, राजा रंजन,  राहुल सिंह, रणवीर सिंह, छोटेलाल मीणा , पारस प्रताप सिंह आदि ने भी अपने विचारों को प्रस्तुत किया। इस कार्यक्रम में महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब, जम्मूकश्मीर, तमिलनाडु, हरियाणा, दिल्ली , राजस्थान आदि राज्यों से 500 से अधिक लोगों ने साझेदारी निभायी।

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