महाराजा हरिसिंह जी के साथ न्याय नहीं किया गया?

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26 अक्तूबर, 1947 का दिन भारत वर्ष के लिए ऐतिहासिक महत्त्व रखता है। इसी दिन जम्मू-कश्मीर रियासत के महाराजा हरिसिंह ने आपातकालीन परिस्थितियों में अधिमिलन-पत्र यानी ”इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन” पर हस्ताक्षर किए थे। यह सर्वविदित है कि 22 अक्तूबर 1947 को कबायलियों के वेश में पाकिस्तानी हथियारबंद सेना कश्मीर में दाख़िल हुई और सीमावर्त्ती प्रजा के साथ लूट-मार, महिलाओं के साथ दुराचार जैसी बर्बरता करती हुई बड़ी तेज़ी से श्रीनगर की ओर बढ़ने लगी। इन परिस्थितियों में महाराजा के पास अविलंब विलय के अलावा अन्य कोई विकल्प बचा ही नहीं था। ध्यातव्य हो कि जब महाराजा हरिसिंह ने अधिमिलन-पत्र पर हस्ताक्षर किए, उन्होंने अपनी ओर से विलय के लिए कोई शर्त्त नहीं रखी थी। न ही उन्होंने बाद में भारत सरकार पर किसी प्रकार का दबाव बनाया था। उन्होंने विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करने में जो समय लिया उसके पीछे भी स्थानीय कारण एवं प्रजा-हित का भाव था, न कि उनकी निजी-सत्ताकामी महत्त्वाकांक्षा। विलंब से विलय का भी हौआ अधिक खड़ा किया जाता रहा, क्योंकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर के विलय के पश्चात 12 अन्य रियासतों का भारतीय संघ में विलय हुआ था। महाराजा के पास यह विकल्प था कि वे भारत या पाकिस्तान में से जिसके साथ जाना चाहें, जा सकते हैं। वे चाहते तो इस स्थिति का लाभ उठाकर विलय के लिए तमाम शर्त्तें लाद सकते थे, सौदेबाज़ी कर सकते थे। पर उन्होंने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया। लॉर्ड माउंटबेटन ने पाकिस्तान में विलय के लिए उन पर प्रकारांतर से दबाव भी बनाया था। बल्कि 16 से 21 जून को वे घाटी में डेरा डाले बैठे रहे कि किसी तरह महाराजा को जम्मू-कश्मीर का विलय पाकिस्तान में करने के लिए तैयार कर सकें। महाराजा ने तीन दिनों तक उन्हें यह कहकर टाला कि अभी तो वे रियासत के राजकीय मेहमान बनकर घाटी की वादियों का लुफ़्त लें, वे उनके दिल्ली लौटने से एक दिन पूर्व रात्रि-भोज पर उनसे इस संदर्भ में वार्त्ता करेंगें। और जैसा कि लॉर्ड माउंटबेटन की पुत्री ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि आखिरी दिन महाराजा ने अपनी तबीयत खराब का बहाना बनाकर उनसे होने वाली भेंट टाल दी और माउंटबेटन को मन मारकर दिल्ली खाली हाथ वापस लौटना पड़ा।

ब्रिटिश शासन निहित हितों एवं जम्मू-कश्मीर की सामरिक-भौगोलिक महत्ता के कारण यह चाहता था कि उसका विलय पाकिस्तान में ही हो। ब्रिटिश सरकार भारत की तुलना में पाकिस्तानी सरकार के मनमाने इस्तेमाल को लेकर अधिक आश्वस्त थी। परंतु महाराजा हरिसिंह किसी भी क़ीमत पर पाकिस्तान के साथ नहीं जाना चाहते थे। उन्होंने सब प्रकार के दबावों एवं प्रलोभनों को ठुकराकर भारत वर्ष में स्वेच्छा से रहना स्वीकार किया था।
यदि स्वतंत्र भारत के इतिहास में सर्वाधिक अन्याय या अपमान किसी के साथ हुआ है तो वह महाराजा हरिसिंह के साथ हुआ है। किसी को नायक, किसी को खलनायक सिद्ध करने की सुनियोजित, सुविधावादी, क्षद्म धर्मनिरपेक्षतावादी सोच के कारण इसे जान-बूझकर बिना किसी विशेष ऐतिहासिक पड़ताल के अत्यधिक प्रचारित किया गया कि महाराजा हरिसिंह जम्मू-कश्मीर को एक स्वतंत्र राष्ट्र तथा स्वयं को उसके राष्ट्राध्यक्ष के रूप में देखना चाहते थे। क्या यह संभव है कि जो बात सामान्य मानवी को साफ-साफ़ समझ आती हो, उसकी समझ महाराजा हरिसिंह को नहीं होगी? उस महाराजा हरिसिंह को जो द्वितीय विश्वयुद्ध में ‘वॉर कौंसिल’ के सदस्य के रूप में देश-दुनिया की राजनीतिक स्थिति-परिस्थिति की बेहतर समझ रखते थे। क्या यह कल्पना की जा सकती है कि उन्हें अपनी भौगोलिक एवं जनसंख्या संबंधी वास्तविकता का बोध न हो? सच तो यह है कि उन्हें भली-भाँति मालूम था कि उनकी भौगोलिक एवं जनसांख्यकीय स्थिति उन्हें एक स्वतंत्र राष्ट्र एवं शासक के रूप में अधिक दिनों तक अस्तित्व में रहने ही नहीं देगी। ऐसा संभव नहीं कि वे जिन्ना व पाकिस्तान की छिपी हुई मंशा तथा चीन के संभावित ख़तरे से परिचित न हों। पढ़े-लिखे, शिक्षित व्यक्ति के रूप में वे संपूर्ण देश में व्याप्त राष्ट्रीय चेतना एवं तदनुसार बदलाव का भी सहज ही अनुमान लगा पा रहे होंगें। उन्हें निश्चित आभास रहा होगा कि राजतंत्र अधिक दिनों तक टिकने वाला नहीं है। उनके तमाम निर्णय भी उन्हें उस दौर के एक उदार, प्रगतिशील एवं प्रजा-हितैषी शासक अधिक सिद्ध करते हैं।

महाराजा हरिसिंह ने लंदन के गोलमेज़ सम्मेलन में न केवल दृढ़ता से भारत का पक्ष रखा था, अपितु स्पष्ट तौर पर यह भी कहा था कि जब भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र बनेगा तो वे उसका हिस्सा बनेंगें। उन्होंने अपने राज्य में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए अनेक कार्य किए। आर्यसमाजी होने के कारण उन्होंने अपने राज्य में दलितों के लिए मंदिरों के द्वार उस समय खोल दिए थे, जब अन्य रियासतों में इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। बल्कि तथ्य तो यह बताते हैं कि अपनी ग़ैर मुस्लिम प्रजा की सुरक्षा एवं भविष्य को लेकर उनकी कुछ आशंकाएँ एवं चिंताएँ थीं। उन्हें नेहरू जी की ओर से विलय के बाद उन सबकी सुरक्षा एवं भविष्य को लेकर कोई ठोस आश्वासन भी नहीं मिल पा रहा था।

महाराजा काँग्रेस की तमाम नीतियों से पहले से ही असहमत एवं क्षुब्ध थे। नेहरू जी का शेख़ अब्दुल्ला के प्रति एकतरफा प्रेम एवं झुकाव उन्हें दुविधा और अनिर्णय में डाल रहा था। बल्कि शेख़ अब्दुल्ला के प्रति महाराजा का संदेह व आशंकाएँ भविष्य में सत्य और नेहरू जी का विश्वास मिथ्या साबित हुई। काल की कसौटी पर अब्दुल्ला को लेकर उनका आकलन यथार्थवादी और नेहरू जी का भावुक एवं वायवीय सिद्ध हुआ। अतः तर्कों एवं तथ्यों के आलोक में जम्मू-कश्मीर की जटिल समस्या के लिए महाराजा हरिसिंह को इकलौता जिम्मेदार या खलनायक ठहराना सरलीकृत एवं एकपक्षीय निष्कर्ष होगा। बल्कि अधिक तर्कसंगत एवं तथ्यपरक तो यह होता कि उनका नाम इतिहास के अग्रणी नायकों में गिना जाता।

कम-से-कम उनका नाम हैदराबाद के उस निज़ाम की शृंखला में तो कदापि नहीं लिया जाना चाहिए, जिसने दुनिया के दस से भी अधिक देशों को पत्र लिखकर हैदराबाद को स्वतंत्र मुल्क़ का दर्ज़ा देने का अनुरोध किया, स्वतंत्र भारत से लड़ने के लिए हथियारों के ज़खीरे इकट्ठे किए, शाही खज़ाने को ब्रिटेन में रह रहे तत्कालीन पाकिस्तानी उच्चायुक्त हबीब रहमतुल्ला के खाते में जमा करवा पैसों का भारी हेर-फेर किया। महाराजा हरिसिंह अपनी रियासत के भारत में विलय को लेकर किसी प्रकार के विभ्रम या महत्त्वाकांक्षा से ग्रसित थे, इसका कोई ठोस एवं पुष्ट प्रमाण उनके विरोधी भी आज तक प्रस्तुत नहीं कर सके हैं।

महाराजा के बरक्स तमाम इतिहासकार शेख़ अब्दुल्ला को ऐसे नायक की तरह प्रस्तुत करते हैं, जैसे वे सभी कश्मीरी की लड़ाई लड़ रहे थे। इसके बावजूद कि उनके माथे महान देशभक्त एवं बलिदानी श्यामाप्रसाद मुखर्जी की रहस्यमय परिस्थितियों में हुई मौत का कलंक लगा है, इसके बावजूद कि पाक अधिकृत हिस्सों को दुबारा हासिल करने के लिए पहल और प्रयत्न न करने के वे दोषी हैं। दरअसल तथ्यों की कसौटी पर कसने पर अब्दुल्ला के घोषित नायकत्व से कुछ भिन्न ही निष्कर्ष सामने आते हैं। उस समय जम्मू-कश्मीर मुख्यतः पाँच भागों में विभाजित था- जम्मू, कश्मीर, लद्दाख, गिलगिट और बाल्टिस्तान। इन सभी क्षेत्रों को एकता के सूत्र में बाँधकर एक राज्य बनाने का श्रेय डोगरा राजपूतों को ही जाता है। यह शोध का विषय है कि शेख़ अब्दुल्ला की स्वीकार्यता इनमें से केवल घाटी तक सीमित होने के बावजूद नेहरू उन्हें बिना किसी चुनावी प्रक्रिया के प्रधानमंत्री बनाने की हठधर्मिता क्यों पाले बैठे थे? ध्यान देने वाली बात यह भी है कि जिस शेख अब्दुल्ला को कतिपय इतिहासकार आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले महानायकों में शुमार करते हैं उनके द्वारा महाराजा के विरुद्ध छेड़े गए आंदोलन में मज़हब के आधार पर ही घाटी के मुसलमानों को लामबंद किया गया था। प्रारंभ में उनका आंदोलन लोकतंत्र या समस्त भूभाग के निवासियों के लिए न होकर सिर्फ़ मज़हब विशेष तक सीमित था। जिस आंदोलन के मूल में ही सांप्रदायिक सोच हो, उसे स्वतंत्रता-आंदोलन कहकर महिमामंडित करना कितना उचित होगा?

ग़ौरतलब है कि शेख अब्दुल्ला अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट थे। वहाँ से लौटने के बाद उन्हें यह बात बहुत नागवार गुजरी की मुस्लिम बहुसंख्या वाली घाटी में अल्पसंख्यक हिंदू शासक हो। उन्होंने ‘ऑल जम्मू-कश्मीर मुस्लिम कॉंफ्रेंस’ का गठन कर राजशाही के विरुद्ध मुस्लिमों को भड़काना शुरू किया। बाद में जब उन्हें लगा कि कुछ अन्य धर्मों एवं जातियों को शामिल किए बिना उनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा पूरी नहीं हो सकती तब कुछ सालों बाद उन्होंने इसी संगठन का नाम बदलकर ‘नेशनल कांफ्रेंस’ कर दिया। हाँ, उन्हें इस बात का श्रेय अवश्य दिया जाना चाहिए कि वे जम्मू-कश्मीर का पाकिस्तान में विलय के प्रबल पैरोकार कभी नहीं रहे। उन्हें अच्छी तरह पता था कि जिन्ना के रहते मुस्लिम लीग में उनकी कोई विशेष पहचान नहीं बनेगी। न आज़ाद पाकिस्तान में वे बड़ी पहचान बना पाएँगें। क्योंकि पृथक पहचान एवं भिन्न राष्ट्रीयता (द्विराष्ट्रवाद) जैसे नारों की भावनात्मक लहर पर सवार होकर जिन्ना उस समय तक मुस्लिमों के सर्वमान्य नेता माने जा चुके थे। इधर अब्दुल्ला पाकिस्तान न जाने को बहुत बड़ा त्याग बता-जतलाकर नेहरू से अपनी हर जायज़-नाजायज़ माँग मनवाते रहे। उनकी माँगों को मिली अनवरत एवं अंधी स्वीकृति ने उनकी अदम्य महत्त्वाकांक्षाओं को परवान चढ़ाया और वे जम्मू-कश्मीर को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में ‘पूरब का स्विट्जरलैंड’ बनाने का ख़्वाब संजोने लगे।

सदरे रियासत बनने के थोड़े साल बीतते-बीतते वे जम्मू-कश्मीर को एक संप्रभु राष्ट्र और स्वयं को एक स्वतंत्र राष्ट्राध्यक्ष की तरह देखने-बरतने लगे। अब्दुल्ला-नेहरू मित्रता का परिणाम न केवल राष्ट्र के लिए त्रासद रहा, बल्कि उसकी परिणति भी त्रासद ही रही। जो नेहरू कभी बिना किसी चुनावी प्रक्रिया के शेख अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर का तख़्तो-ताज सौंप चुके थे, उन्हें स्वयं अब्दुल्ला को जेल में डालना पड़ा। अब्दुल्ला की ज़िद व जुनून तथा नेहरू से उनकी निकटता के कारण एक ओर कल तक के शासक महाराजा हरिसिंह निर्वासन की पीड़ा भोगने को अभिशप्त हुए तो दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर के निवासियों के भाग्य में भी तरक्की व अमन-चैन नहीं आया। अचरज़ यह कि जिस कश्मीरियत, जम्हूरियत एवं इंसानियत का ढ़ोल पीटा जाता रहा, उसमें भरत मुनि, पाणिनी, आनंदवर्धन, अभिनवगुप्त, वसुगुप्त, ललितादित्य, क्षेमेन्द्र, कल्हण, बिल्हण, रुद्रट, मम्मट, ललद्यद आदि की समृद्ध परंपराओं और लाखों कश्मीरी पंडितों के लिए कोई स्थान या अवसर नहीं छोड़ा गया!

उल्लेखनीय है कि शेख अब्दुल्ला और उनके उत्तराधिकारियों की ग्रंथियों में पैठे सत्ता की अदम्य एवं अनियंत्रित महत्त्वाकांक्षा को पालने-पोसने-सींचने में धारा 370 एवं अनुच्छेद 35 A ने आग में घी का काम किया। आज जब वर्तमान सरकार चिर-प्रतीक्षित राष्ट्रव्यापी आकांक्षाओं एवं अपेक्षाओं को पूरा करते हुए दोहरी राष्ट्रीयता एवं प्रावधानों वाले, देश की एकता एवं अखंडता को बाधित करने वाले- धारा 370 और अनुच्छेद 35 A को समाप्त करने का साहसिक निर्णय लेकर विकास की राह पर दृढ़ता से क़दम आगे बढ़ा चुकी है, तब कुछ लोग जान-बूझकर विभाजनकारी-पृथकतावादी मानसिकता को हवा देते हुए विभाजन की विषबेल को पुनः सींचने एवं संवर्द्धित-संपोषित करने की कुचेष्टा कर रहे हैं। उनकी व्यग्रता और व्याकुलता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वे भारत के शत्रु-राष्ट्र चीन तक से पूर्व की स्थिति बहाल कराने की सार्वजनिक अपील कर रहे हैं। यह जयचंद-मीरजाफ़र जैसी स्वार्थी-सत्तालोलुप मानसिकता नहीं तो और क्या है? ये वही लोग और घराने हैं जो सत्ता और सुविधाओं पर दशकों से कुंडली मारे बैठे रहे हैं और आज भी सत्ता का मोह त्यागने को तैयार नहीं हैं। काल-विशेष में मिली सुविधाओं और रियायतों को सार्वकालिक अधिकार समझ बैठना निर्लज्ज ढिठाई एवं कोरी हठधर्मिता है। उन्हें समझना होगा कि धारा 370 एवं अनुच्छेद 35 A अब अतीत का अध्याय बन चुका है। कालचक्र आगे की ओर बढ़ता है, पीछे नहीं। उदार, गतिशील एवं आधुनिक समाज स्मृतियों के शव को चिपकाए नहीं घूमता। वह अतीत से सीख लेकर, वर्तमान को सज़ा-सँवारकर भविष्य की बेहतर एवं मुकम्मल तस्वीर गढ़ता है।

धारा 370 और अनुच्छेद 35 A ने आतंक, अलगाव और कट्टरता को बढ़ावा देने के अतिरिक्त घाटी को और कुछ नहीं दिया है। यही कारण है कि जम्मू-कश्मीर-लद्दाख की आम जनता को 5 अगस्त 2019 को हुआ बदलाव रास आने लगा है। केंद्र की नीतियों, योजनाओं, कार्यक्रमों के लाभ उठाकर वे अमन, भाईचारा एवं तरक्की की नई इबारत लिखना चाहते हैं। अच्छा होता, विरोध की ज़िद और जुनून पाले दल और राजनेता विकास की राहों के यात्री और अन्वेषी बनते, न कि हिंसा, आतंक एवं अलगाव के अंधे-अँधेरे कूपों-खोहों-कंदराओं के।

सुरक्षा बलों ने लश्कर-ए-तैयबा के पाँच आतंकवादी मारकर ढेर किए

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जम्‍मू कश्‍मीर में आज कुपवाडा जिले के माचिल सेक्‍टर में नियंत्रण रेखा के समीप पुलिस और सेना के संयुक्‍त कार्रवाई में घुसपैठ की कोशिश विफल कर दी गई। इस कार्रवाई में पांच आतंकवादी मारे गये। खुफिया जानकारी मिलने के बाद सुरक्षा दल ने 25-26 की रात के दौरान आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई की।

संयुक्‍त दल को आज घने जंगल में आतंकवादियों की आवाजाही का सुराग मिला। मुठभेड के दौरान आतंकवादियों ने संयुक्‍त दल पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं। जवाबी कार्रवाई में आतंकवादी संगठन गुट लश्कर-ए-तैयबा के पांच आतंकवादी मारे गये, जिनकी पहचान नहीं हो पाई है। इनके पास से बडी संख्‍या में गोला-बारूद और अन्‍य हथियार बरामद किए गये।

जैसे ही घुसपैठ करने वाले समूह को सीमा बाड़ के पास सतर्क सैनिकों की तरफ से ट्रैक किया गया और चुनौती दी गई, आतंकवादियों ने जवानों पर गोलीबारी शुरू कर दी। इसके बाद मुठभेड़ हुई. जवानों की प्रारंभिक गोलीबारी में दो घुसपैठिए मार ग‍िराए गए जबकि अन्य ने कठिन इलाके का फायदा उठाया। आखिरकार 6 घंटे के लंबे ऑपरेशन के बाद 3 और आतंकवादियों को मार गिराया गया।

राजकुमार राव को निर्वाचन आयोग का राष्‍ट्रीय आइकन बनाया गया

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निर्वाचन आयोग, मतदाता सूचियों को अपडेट करने के लिए कल से एक अभियान शुरू कर रहा है। इसमें विशेष रूप से भावी युवा मतदाताओं पर अधिक ध्‍यान दिया जाएगा। यह अभियान उन पांच राज्‍यों में नहीं होगा, जहां इस वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं। फिल्‍म अभिनेता राजकुमार राव को निर्वाचन आयोग का राष्‍ट्रीय आइकन नियुक्‍त किए जाने के बाद मुख्‍य निर्वाचन आयुक्‍त राजीव कुमार ने कहा कि 17 वर्ष से अधिक आयु के युवा मतदाता सूची में अपने नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

मुख्‍य निर्वाचन आयुक्‍त ने कहा कि मतदाता सूची प्रत्‍येक तिमाही में अपडेट की जाएगी और 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवा अगली तिमाही में अपना नाम पंजीकृत करा सकते हैं। राजीव कुमार ने बताया कि इस वर्ष देश में मतदाताओं की संख्‍या बढ़कर 95 करोड़ से अधिक हो जाएगी, जो वर्ष 1962 की तुलना में चार गुणा अधिक है।

पिछले लोकसभा चुनाव में लगभग 30 करोड़ मतदाताओं ने अपने मताधिकारों का उपयोग नहीं किया था।लोकतंत्र में आम लोगों की भागीदारी ज्‍यादा से ज्‍यादा करने के लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने के लिए निर्वाचन आयोग ने मतदाताओं को जागरुक और प्रेरित करने के लिए कई कार्यक्रम बनाए हैं।

 

अपने ही बोझ तले दबा I.N.D.I.A. गठबंधन, क्षेत्रीय क्षत्रपों में चल रहा शक्ति प्रदर्शन

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देश में होने जा रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान ही विपक्षी पार्टियों द्वारा बनाए गए  I.N.D.I.A.गठबंधन की विश्वसनीयता की पोल खोल कर रख दी है। पीएम मोदी को देश की सत्ता से हटाने और भाजपा नीत एनडीए गठबंधन को तीसरी बार सरकार बनाने से रोकने के लक्ष्य के साथ उतरा यह I.N.D.I.A.गठबंधन अपनी पहली परीक्षा में प्रश्नों के घेरे में आ गया है। इसका सबसे बड़ा आरंभ कांग्रेस तथा समाजवादी पार्टी के बीच मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में सीट बंटबारे को लेकर हुई रार के रूप में बाहर निकल कर आ गया है। जिसको लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव कांग्रेस को लेकर अपना आपा खोते दिखाई दिए । जिसके बाद उन्होंने I.N.D.I.A. गठबंधन के भविष्य को लेकर सार्वजनिक रूप से खुली चेतावनी भी जारी कर दी। इसके साथ-साथ अब

गठबंधन के एक अन्य साथी जेडीयू ने भी कांग्रेस को चौंकाते हुए मंगलवार 24 अक्टूबर 2023 को राज्य की 5 विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए। इस तरह I.N.D.I.A. गठबंधन के क्षेत्रीय क्षत्रपों द्वारा अपने इस कदम से लोकसभा चुनाव पूर्व बने इस अवसरवादी गठबंधन के ऊपर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं। इससे पहले देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस द्वारा गठबंधन की एक अन्य सहयोगी आम आदमी  पार्टी को किसी भी प्रकार की भाव न देते हुए अब तक अनदेखा किया है। जिसके कारण आम आदमी पार्टी राज्य की सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इस प्रकार यह I.N.D.I.A. गठबंधन अपने ही बोझ तले दबता दिखाई देने लगा है। 

I.N.D.I.A. गठबंधन में दिखने लगी दरार

बता दें मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2023 में समाजवादी पार्टी तथा कांग्रेस पार्टी के मध्य सीट बंटवारे को लेकर शीर्ष स्तर पर हुई जमकर बयानबाजी से I.N.D.I.A. गठबंधन की दरार खुलकर बाहर आ गई है। विगत सप्ताह गठबंधन की आपसी कलह तब निकल कर बाहर आ गई जब सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पत्रकारों से बात करते हुए यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय को सार्वजनिक रूप से चिरकुट नेता बता दिया था। इसके साथ ही कांग्रेस नेतृत्व पर जमकर बरसते हुए उसे धोखेबाज भी बता दिया था। उन्होंने बताया कि I.N.D.I.A.गठबंधन को लेकर कांग्रेस ने सपा के साथ धोखा किया है। इससे पहले अंदर ही अंदर सपा की कांग्रेस के साथ मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2023 में सीट बंटवारे को लेकर लगभग एक माह से बातचीत चल रही थी। जिसके लिए सपा की राज्य इकाई का एक प्रतिनिधिमंडल एमपी के 2 पूर्व मुख्यमंत्रियों कमलनाथ तथा दिग्विजय सिंह से जाकर मिला था। उसी प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य पू्र्व विधायक दीपनरायण सिंह यादव ने एक न्यूज चैनल से बात करते हुए खुलासा किया कि “मैं ही कई लोगों से बात किया हूं, मैं आदरणीय कमलनाथ जी से मिला 1 घंटे बात हुई बहुत सारी चीजों पर मैंने अपना पक्ष रखा…कि हम जो सीटें आपसे मांग रहे हैं उन सीटों पर हम कांग्रेस से लगभग 20 हजार सीटों से आगे हैं। उन सभी सीटों पर हम दूसरे नंबर पर हैं और कांग्रेस तीसरे नंबर पर है। हम कोई सीट ऐसी आपसे नहीं मांग रहे … जहां पर आप हम से आगे हैं। मेरी यही दिग्विजय सिंह जी से बात हुई, उन्होंने भी मुझे 1 घंटे समय दिया उनसे भी मैंने जो पक्ष रखा मैं यह कह सकता हूं और आप उनसे पूछ सकते हैं…वो सहमत थे हमारे पक्ष पर, लेकिन उसके बाद बात नहीं बनती है। तो क्या वजह है ये तो मैं नहीं कह सकता। वो तो वह बता सकते हैं कि वजह क्या रही ?” समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेस ने उनको सीट देने की बात कही थी। जिसके लिए उसको 1 महीने तक लटका कर रखा। लेकिन अंत में आते आते उन्होंने एक भी सीट नहीं दी और बिना बताए कांग्रेस ने सभी सीटों पर अपने प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी। सपा ने अपने आरोपों में कहा कि जो बात 29 सीटों से लेकर आरंभ हुई वो 13,12 और यहां तक कि 6 सीटों तक भी आई । लेकिन 4 सीटों के बाद भी कांग्रेस की तरफ से मना कर दिया गया। दीपनरायण सिंह के अनुसार इसके बाद ही सपा ने अब तक प्रदेश की 42 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारकर अपनी मंशा स्पष्ट कर दी । उनका कहना है कि अभी और 10-15 सीटों के लिए प्रत्याशियों के नाम तय करने की अंतिम चयन प्रक्रिया जारी है। 

अखिलेश ने बोला था कांग्रेस पर बड़ा हमला

बता दें इस घटनाक्रम के बाद ही सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने I.N.D.I.A.गठबंधन के भविष्य को लेकर कांग्रेस पर बड़ा हमला बोल दिया था। उन्होंने यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय को लेकर पत्रकारों के प्रश्न पर यहां तक कह दिया कि “किस नेता के बारे में आप बात कर रहे हैं ? (पत्रकारों के बताने पर कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के बारे में)…प्रदेश अध्यक्ष की कोई हैसियत नहीं है। न वो पटना की मीटिंग में थे और न ही वो जाकर के मुंबई की मीटिंग में थे। I.N.D.I.A.के बारे में क्या जानते हैं ?क्या जानते हैं वो गठबंधन के बारे में? उनकी क्या हैसियत है कि वो जो ये बोल रहे हैं इस तरह की बात। मैं आपके माघ्यम से कांग्रेस पार्टी को कहना चाहता हूं कि अपने चिरकुट नेताओं से हमारी पार्टी के बारे में न बुलवाएं। ” जिस पर अजय राय ने भी अखिलेश यादव पर पलटवार करते हुए कहा कि ‘जो अपने बाप का सम्मान नहीं कर  सका तो उससे और क्या उम्मीद की जा सकती है।’  साथ ही अपने  कहे की माफी मांगते हुए सपा से यूपी में भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस से साथ देने की भी अपील करते दिखाई दिए।

जदयू ने भी खड़ा किया कांग्रेस के लिए संकट

गठबंधन के दलों के मध्य हुए इस घटनाक्रम के बाद जदयू ने भी अपनी पार्टी का शक्ति प्रदर्शन करते हुए मध्य प्रदेश चुनाव 2023  में 24 अक्टूबर 2023 को राज्य की 5 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशियों के उतरने की घोषणा कर कांग्रेस के लिए संकट खड़ा कर दिया। पार्टी ने कांग्रेस और सपा के सामने ही अपने 5 प्रत्याशियों को पिछोर, राघवगढ़, थांदला, राजनगर तथा पेटलावाद सीट से उतारकर कांग्रेस के सामने संकट खड़ा कर दिया। अब इस पर जेडीयू नेता नीरज कुमार ने इस पर सफाई देते हुए स्पष्ट कर दिया कि ‘कि विपक्षी I.N.D.I.A.गठबंधन का गठन लोकसभा चुनाव 2024 के संदर्भ में किया गया है। सीएम नीतीश कुमार ने विपक्षी नेताओं से सबसे पहले ही कहा था कि कांग्रेस के बिना विपक्षी एकता की बात नहीं की जा सकती। क्षेत्रीय पार्टी ने क्षेत्रीय स्तर पर ही निर्णय लिया । ऐसे में किसी राज्य में 2-4 सीटों पर चुनाव लड़ने से I.N.D.I.A.गठबंधन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला ।’

I.N.D.I.A.गठबंधन और उनके क्षत्रपों का शक्ति प्रदर्शन 

बता दें वास्तव में लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर जिस I.N.D.I.A. गठबंधन का गठन किया गया। उसमें सम्मलित सभी पार्टियां भारी विरोधाभासों के बीच अपनी -अपनी दावेदारी को मजबूत करना चाहती हैं। इन 5 विधानसभा चुनावों को क्षेत्रीय पार्टियां लोकसभा चुनाव 2024 के पूर्व सेमीफाइनल के रूप में लेकर चल रही हैं। जिसके माध्यम से अपनी अपनी पार्टी के जनाधार को अधिक से अधिक राज्यों में बढ़ाकर I.N.D.I.A.गठबंधन में होने वाली सीटों की अधिक से अधिक सौदेबाजी करने का शक्तिप्रदर्शन करना चाहती हैं। क्यों कि इस समय I.N.D.I.A.गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस पार्टी ही है। जिसकी इस समय देश के 5 राज्यों में अपनी सरकार है। कांग्रेस भी जानती है कि गठबंधन में अपनी पकड़ बनाने के लिए उसे अपने जनाधार को किसी भी मूल्य पर बचाए रखना होगा। इसीलिए वह कांग्रेस शासित राज्यों में I.N.D.I.A.गठबंधन के सहयोगी दलों से कोई भी बड़ा जमीनी समझौता करने से बच रही है। इसी शक्ति प्रदर्शन का परिणाम है कि गठबंधन में निजी हित के स्वार्थपूर्ति हेतु रार बढ़ना आरंभ हो चुकी है। जिसकी चेतावनी अखिलेश ने यूपी के लिए कांग्रेस के सामने जारी कर दी।  

अब इन्हीं विरोधाभासों के बीच कांग्रेस के रवैये को देखते हुए गठबंधन के अन्य क्षेत्रीय क्षत्रप दावेदारों जैसे ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे, शरद पवार, तेजस्वी यादव तथा एमके स्टालिन की भी रणनीति देखना रोचक होगा। कि वह भी अपने अपने राज्यों में कांग्रेस के लिए कितनी जगह छोड़ने के लिए तैयार होते हैं? या फिर जहां कांग्रेस सीधे सीधे वामपंथी, टीएमसी जैसी सत्ताधारी सहयोगियों के विपक्ष में है। जिस प्रकार सपा प्रमुख ने कांग्रेस को धोखेबाज बताया और कांग्रेस ने दिल्ली के सीएम तथा आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के बार बार राहुल गांधी से मिलने के आग्रह को ठुकराया गया। उससे सभी गठबंधन क्षत्रपों की अपनी-अपनी निजी महत्वाकांक्षाएं I.N.D.I.A. गठबंधन के भविष्य पर अभी से बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा कर रही है।

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