हिंदुओं की घटती जनसँख्या, खतरे का संकेत है!

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कांग्रेस सहित इंडी गठबंधन दलों का कहना है कि जनमानस के असली मुददों से ध्यान भटकाने के लिए यह झूठी रिपोर्ट जारी की गई है

लोकसभा चुनावों के चौथे चरण के पूर्व प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की, भारत में जनसँख्या वितरण पर आयी एक रिपोर्ट ने राजनैतिक वातावरण को मानों आग पर रख दिया है, जनसँख्या वितरण पर राजनैतिक बयानबाजी तेज हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में 1950 से 2015 के बीच कुल जनसँख्या में हिंदुओं की जनसँख्या 7.82 प्रतिशत घट गई है जबकि मुस्लिम आबादी 43.15 प्रतिशत बढ़ गई है। हिन्दुओं के लिए ये अत्यंत चिंताजनक है।

रिपोर्ट के अनुसार हिंदू जनसँख्या के तीव्रता से घटने का सिलसिला पड़ोसी इस्लामिक देशों पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश में तो चल ही रहा है, पूर्व के एकमात्र हिंदू राष्ट्र नेपाल में भी हिन्दुओं की जनसँख्या उसी तीव्रता के साथ कम हो रही हे जो अत्यंत चिंताजनक है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के अधिकतर मुस्लिम बाहुल्य देशों में भी मुस्लिम हिस्सेदारी में बढ़ोत्तरी हुई हैव हीं हिंदू, ईसाई और अन्य धर्म बहुल देशों में बहुसंख्यक हिससेदारी में कमी आई है। परिषद ने दुनिया के 167 देशों में 1950 से 2015 के बीच आए जनसांख्यिकीय बदलाव का अध्ययन किया है। इन देशों में बहुसंख्यक उन्हें माना गया है जिनकी आबादी 75 प्रतिशत से अधिक है।रिपोर्ट के अनुसार इन देशों में 65 वर्षों में बहुसंख्यकों की हिस्सेदारी में 22 प्रतिशत की कमी आई है लेकिन यह मुस्लिम बहुसंख्यक देशों पर लागू नहीं होता। मुस्लिम बहुल 38 देशों में भी मुस्लिम आबादी बढ़ी है। पड़ोसी राष्ट्र म्यांमार में बहुसंख्यक बौद्ध आबादी भी 78.53 प्रतिशत से घटकर 70.80 प्रतिशत रह गई है। श्रीलंका में बौद्ध आबादी बढ़ी है जहां बौद्धों की आबादी 64.28 प्रतिशत से बढ़कर 67.65 प्रतिशत हो गई है। भूटान में भी बौद्धों की हिस्सेदारी में वृद्धि हुई है। प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद की यह रिपोर्ट हिन्दुओं के लिए बहुत ही चौकाने वाली तथा चिंताजनक तथा दुखद है।

स्वतंत्रता के बाद हिन्दुओं की घटती आबादी के लिए ,आखिर कौन जिम्मेदार है? निश्चय ही इसके लिए कांग्रेस व उसके गर्भ से निकलने वाले प्रधानमंत्रियों का शासनकाल व उनकी एकपक्षीय मुस्लिम तुष्टिकरण की नीतियों को ही सवार्धिक दोषी माना जाएगा। विकृत राजनैतिक कारणों से भारत में बांग्लादेशी घुसपैठियों की बाढ़ आ गई है, सुदूर पूर्व से लेकर उत्तर के कठिन क्षेत्रों तक बड़ी संख्या में अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या बस्तियां हैं। तुष्टिकरण की घृणित राजनीति के कारण भारत के पूर्वोत्तर सहित नौ राज्यों में हिन्दू अल्पसंख्यक हो गये हैं जबकि एक दर्जन से अधिक जिले ऐसे हैं जहां हिन्दू अल्पसंख्यक हो गये हैं। बंगाल के मुर्शिदाबाद में हिंदू आबादी तो मात्र 30 प्रतिशत ही रह गई है और केरल का हाल तो सर्वविदित है। पाकिस्ताऩ़, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में भी हिन्दुओं की घटती आबादी के लिए भी कांग्रेस शासनकाल की लचर नीतियां ही जिम्मेदार हैं क्योंकि जब इन देशों में हिन्दू व अन्य अल्पसंखक समाज के लोगों पर अत्याचार हो रहे थे और उन पर जघन्य अपराध करके उनका धर्मान्तरण किया जा रहा था तब भारत में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारें मुस्लिम तुष्टीकरण के कारण अपना मुंह बंद कर लेती थीं।

कांग्रेस सहित इंडी गठबंधन दलों का कहना है कि जनमानस के असली मुददों से ध्यान भटकाने के लिए यह झूठी रिपोर्ट जारी की गई है। इन लोगों का यह भी कहना है कि भाजपा के हाथ से यह चुनाव फिसलता जा रहा है जिसके कारण यह रिपोर्ट जारी की गई है । वास्तविकता यह है कोई भी सचेत और सतर्क व्यक्ति स्वयं अनुभव कर सकता है कि हिन्दू आबादी कम हो रही है और मुस्लिम आबादी तीव्रता के साथ बढ़ रही है।

सच तो यह है कि ये रिपार्ट लोकसभा चुनावों में के मध्य विपक्ष और उसकी सहयोगी विदेशी ताकतों द्वारा चलाये जा रहे उस झूठे विमर्श को ध्वस्त कर रही है जिसमें जोर देकर कहा जा रहा था कि भारत में मुसलमान खतरे मे हैं और भारत में मुसलमानों पर अत्याचार हो रहा है। अभी हाल ही में अमेरिका से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव हो रहा है इस रिपोर्ट ने उस झूठ की धज्जियाँ उड़ा दी हैं ।आजकल लोकसभा चुनावों को लेकर हर संसदीय क्षेत्र की विभिन्न कोणों से रिपोर्टिंग की जा रही है जिनमें यह भी बताया जा रहा है कि कहां पर कितने मुस्लिम मतदाता हैं अगर इन रिपोर्ट्स को ही आधार मान लिया जाये तो स्थिति कुछ हद तक स्पष्ट हो रही है कि जमीनी सच्चाई कितनी बदल चुकी है और हिन्दू जनसंख्या को लेकर स्थितियां कितनी भयावह हो गई हैं। अधिकांश संसदीय सीटों पर मुसलमान मतदाताओं की संख्या 14 प्रतिशत से ऊपर जा चुकी है। कुछ इलाके जैसे बिहार का किशनंगज तो पूरी तरह से मुस्लिम बहुल हो चुके हैं।

मुस्लिम आबादी के तीव्रता से बढ़ने पर कांग्रेस, सपा, बसपा सहित भारत के अन्य क्षेत्रीय व परिवारवादी दलों का वोट बैंक भी बढ़ता है यही कारण है कि वे हिन्दू समाज से सम्बंधित सभी मुद्दों की अवहेलना करते हैं और मुस्लिम माफियाओं को सर पे बैठाते हैं । थोक मुस्लिम वोट के लिए राम को काल्पनिक बताना, ज्ञानवापी में मिले शिवलिंग को फव्वारा बताना, कांवड़ियों को गुंडा कहना, सनातन की तुलना डेंगू से करना इनके लिए सामान्य बात है । थोक मुस्लिम वोट पाने के लिए उत्तर प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र तक मतदान जैसे पवित्र कार्य के लिए “वोट जिहाद” का नारा दिया जा रहा है । मस्जिदों से मुसलमानों को बताया जा रहा है कि उन्हें किस सीट पर किस विरोधी दल के उम्मीदवार को जिताना है । कांग्रेस, सपा, बसपा सहित इंडी गठबंधन आजकल जो संविधान बचाओ संविधान बचाओ का हल्ला कर रहा है वह असल में मुस्लिम तुष्टिकरण की विकृत राजनीति ही है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी बांग्लादेशी घुसठियों व रोहिंग्याओं की सुरक्षा कवच बन गई हैं । मुस्लिम वोटबैंक के कारण विपक्ष इस ताजा रिपोर्ट को भी झूठा व ध्यान भटकाने वाला मुद्दा बता रहा है।

इंदिरा गाँधी ने देश में आपातकाल लगाया और जनसँख्या नियोजन के नाम पर हिन्दुओं की जबरदस्ती नसबंदी की गई। परिवार नियोजन कार्यक्रम को हिन्दुओं पर थोप दिया गया और मुसलमानों को उससे दूर रखा गया। ”हम दो, हमारे दो“ के नारे के तहत हिन्दुओं को ही टारगेट किया गया और विदेशों से धन लेकर इसके लिए कार्यक्रम चलाए गए जिसका कुप्रभाव अब दिखाई पड़ रहा है।

बढ़ती आबादी केवल धार्मिक आधार पर ही चिंता का विषय नहीं है अपितु प्राकृतिक, भौगोलिक और सामाजिक संतुलन के लिए भी चिंताजनक है। जनसंख्या वृद्धि के कारण ही बेरोजागारी की समस्या में भी तेजी से वृद्धि हो रही है जिसके कारण आपराधिक घटनाओं में वृद्धि हो रही है।

कांग्रेस, सपा, बसपा व अन्य इंडी गठबंधन में शामिल सभी भाजपा विरोधी दलों को भले ही घटती हुई हिन्दू आबादी की चिंता न हो किंतु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद व बजरंग दल सहित तमाम हिंदू संगठन इसको लेकर चिंतित हैं । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ हिन्दुओं की घटती आबादी पर अपनी चिंता व्यक्त करता रहा है और सरकार से धर्मांतरण की रोकथाम के लिए कड़े कानून, जनसंख्या नियंत्रण कानून लागू करने की बात करता रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी कार्यकारिणी में भी कई बार प्रस्ताव पारित कर चुका है जिसमें उसने सरकारों और देश वासियों से जानना चाहा है कि अगले 30 -40 वर्षों में भारत कितने लोगों का भार सह सकता है। वर्तमान समय में हमारी जनसंख्या नीति कैसी हो हम इसे कैसे लागू करें। घुसपैठियों के कारण बढ़ रहे सामाजिक व सांस्कृतिक परिवर्तनों से समाज को कैसे बचाया जाये। संघ सभी सरकारों से जनसंख्या नियंत्रण कानून व समान नागरिक संहिता कानून लागू करने की मांग करता रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लाल किले से अपने सम्बोधन में जनसंख्या नियंत्रण कानून की एक बार बात कर चुके हैं।

भारत के कट्टरपंथी मुसलमान, देश का विभाजन करा लेने के बाद भी उसी मानसिकता से चल रहे हैं जोव औरंगजेब के समय में थी और कांग्रेस सहित इंडी गठबंधन के दल इन्हीं मुसलमानों के विचारों का अनुपालन कर रहे हैं। कांग्रेस चुनाव में प्रतिबंधित पीएफआई का सहयेग लेती है और मुस्लिम लीग की छाप वाला घोषणापत्र बनाती है।

यह बहत ही चिंताजनक है कि भारत जो हिन्दुओं तथा सनातन की धरती है वही कम होती हिन्दू जनसँख्या की समस्या से जूझ रहा है। यदि जनसांख्यिकी परिवर्तन ऐसा ही चला तो 2050 में भारत का क्या होगा यह चिचार करने का समय आ चुका है। वामपंथी विचारधारा के वशीभूत पड़ोसी राष्ट्र नेपाल अपना हिन्दू स्वरूप को खो चुका है। हिन्दू जनसँख्या को कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र चलाये जा रहे हैं जिसमें चर्च व इस्लामिक राष्ट्र दोनों शामिल हैं। जनसँख्या असंतुलन के तीनों प्रमुख कारकों – धर्मान्तरण, घुसपैठ और जनसँख्या नियंत्रण के लिए परिवार नियोजन का पूरा बोझ हिन्दुओं पर डालना तीनों के लिए ही भारत के अन्दर बैठी और भारत के बाहर कार्यरत हिन्दू विरोधी शक्तियां जी जान से लगी हैं।

बढ़ती मुस्लिम आबादी के प्रति हिन्दू जनमानस में जागृति लानी होगी तथा गम्भीरता पूर्वक विचार करना होगा कि आने वाले समय में यदि हिन्दू समाज को सुरक्षित रखना है तो क्या करना होगा क्योकि लोकतंत्र में जनसँख्या ही महत्वपूर्ण होगी । इस तथ्य को ध्यान में रखना होगा कि जब -जब हिन्दू घटा है, बंटा है और कमजोर हुआ है तब तब देश विभाजित हुआ है ।

शिवाजी महाराज के शासनकाल की आर्थिक नीतियां

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आज भी यह माना जाता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिससे संप्रभु और शक्तिशाली हिंदू साम्राज्य की नींव पड़ी थी

इतिहास के किसी भी खंडकाल में भारतीय सनातन संस्कृति का अनुपालन करते हुए किए गए समस्त प्रकार के कार्यों में सफलता निश्चित मिलती आई है। ध्यान में आता है कि भारतीय आर्थिक दर्शन भी सनातन संस्कृति के अनुरूप ही रहा है। छत्रपति शिवाजी महाराज भी हमारे वेदों एवं पुराणों में वर्णित नियमों के अनुसार ही अपने राज्य में आर्थिक नीतियों का निर्धारण करते थे। अपनी रियासत के नागरिकों को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं हो और वे परिवार सहित अपने लिए दो जून की रोटी की व्यवस्था आसानी से कर सकें, इसका विशेष ध्यान आपके शासनकाल में रखा जाता था। उस खंडकाल में नागरिकों के लिए रोजगार हेतु कृषि क्षेत्र ही मुख्य आधार था। कृषि गतिविधियों के साथ साथ पशुपालन कर ग्रामों में निवासरत नागरिक अपने एवं अपने परिवार का भरण पोषण सहज रूप से कर पाते थे एवं अति प्रसन्नचित तथा संतुष्ट रहते थे, हालांकि कालांतर में व्यापार एवं उद्योग को भी बढ़ावा दिया जाने लगा था।

विश्व के कई भागों में सभ्यता के उदय से कई सहस्त्राब्दी पूर्व, भारत में उन्नत व्यवसाय, उत्पादन, वाणिज्य, समुद्र पार विदेश व्यापार, जल, थल एवं वायुमार्ग से बिक्री हेतु वस्तुओं के परिवहन एवं तत्संबंधी आज जैसी उन्नत नियमावलियां, व्यवसाय के नियमन एवं करारोपण के सिद्धांतों का अत्यंत विस्तृत विवेचन भारत के प्राचीन वेद ग्रंथों में प्रचुर मात्रा में मिलता है। प्राचीन भारत में उन्नत व्यावसायिक प्रशासन व प्रबंधन युक्त अर्थतंत्र के होने के भी प्रमाण मिलते हैं। हमारे प्राचीन वेदों में कर प्रणाली के सम्बंध में यह बताया गया है कि राजा को अत्यधिक कराधान रूपी अत्याचार से विरत रहना चाहिए। कौटिल्य के अनुसार करों की अधिकता से प्रजा में दरिद्रता, लोभ, असंतोष, विराग आदि भाव उपजते हैं। राजा द्वारा, स्मृतियों द्वारा निर्धारित, कर के अतिरिक्त अन्य कर लगाया जाना निछिद्ध था। कर की मात्रा वस्तुओं के मूल्य एवं समय पर निर्भर होती थी। राजा सामान्यतया उपज का छठा भाग ले सकता था। हां आपत्ति के समय अतिरिक्त कर लगाने की केवल एक बार की छूट रहती थी। अनुर्वर भूमि पर भारी कर नहीं लगाया जाता था। कर सदैव करदाता को हल्का लगे, जिसे वह बिना किसी कठिनाई व कर चोरी के चुका सके। जिस प्रकार मधुमक्खी पुष्पों से बिना कष्ट दिए मधु लेती है, उसी प्रकार राजा को प्रजा से बिना कष्ट दिए कर लेना चाहिए। कर प्रणाली के माध्यम से आर्थिक असमानता एवं घाटे की वित्त व्यवस्था पर अंकुश लगाया जाता था। चुंगी को भी कर की श्रेणी में शामिल किया जाता था, जो क्रेताओं एवं विक्रेताओं द्वारा राज्य के बाहर या भीतर ले जाने या लाए जाने वाले सामानों पर लगती थी। राजा के पास राजकोष के लिए तीन साधन थे – उपज पर राजा का भाग, चुंगी एवं दंड। इस प्रकार राजकोष पर प्राचीन ग्रंथों में अत्यंत विस्तृत व व्यावहारिक विमर्श पाया जाता है।

शिवाजी महाराज के राज्य में प्रारम्भिक काल में व्यापार बहुत कम मात्रा में होता था और राज्य की अर्थव्यवस्था की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। इस राज्य में उस समय चौथ एवं सरदेशमुखी, यह दो प्रकार के कर प्रचलन में थे। नागरिकों को राज्य में सुरक्षा प्रदान करने के एवज में चौथ नामक कर लगाया जाता था। इस प्रकार का कर अन्य रियासतों द्वारा भी अपने नागरिकों से वसूला जाता था, उस खंडकाल में यह एक सामान्य कर था, जिसके अंतर्गत किसानों एवं श्रमिकों को यह आश्वासन दिया जाता था कि राज्य पर किसी भी बाहरी आक्रमण के समय इन नागरिकों को प्रशासन द्वारा सुरक्षा प्रदान की जावेगी।

दूसरी ओर, सरदेशमुखी नामक कर प्रचलन में था। इस कर प्रणाली के अन्तर्गत, राज्य द्वारा जमीन पर अर्जित की गई आय का 10 प्रतिशत हिस्सा कर के रूप में किसानों से वसूल किया जाता था। शिवाजी महाराज ने 1660 के दशक के शुरुआती वर्षों में ही उक्त वर्णित दोनों प्रकार के कर अपने नागरिकों से लेना शुरू कर दिए था। सरदेशमुखी कर वसूल करते समय प्रशासन द्वारा इस बात का ध्यान जरूर रखा जाता था कि जिन किसानों की जमीन कम उपजाऊ है, उनसे कर की वसूली कम दर पर की जाय ताकि इस श्रेणी के किसानों को अपने एवं परिवार के जीवन यापन में किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं हो। कौन सी जमीन अधिक उपजाऊ एवं कौन सी जमीन कम उपजाऊ है, यह जानने के लिए समय समय पर सर्वेक्षण भी कराए जाते थे और इस सर्वेक्षण के परिणामों के आधार पर ही विभिन्न किसानों के लिए कर की दर निर्धारित की जाती थी। साथ ही कर की अधिकतम राशि भी निर्धारित की जाती थी एवं यह कुल उपज के एक तिहाई से अधिक नहीं रखी जाती थी। सरदेशमुखी मानक कर केवल उपज पर ही लगाया जाता था।

शिवाजी महाराज के राज्य में खेती-बाड़ी ही राजस्व का मुख्य और लगभग इकलौता जरिया था, अतः शिवाजी महाराज का प्रशासन परती जमीन पर खेती करने वालों को उचित रियायतें भी प्रदान करता था। इन किसानों से कम दर पर कर लिया जाता था। कई बार तो पहले चार वर्षों के लिए प्रशासन द्वारा पट्टे पर दी गई जमीन पर किसानों से कोई किराया ही नहीं वसूला जाता था, पांचवें साल में आधा किराया वसूला जाता था और फिर उसके बाद पूरा किराया वसूला जाता था।

शिवाजी महाराज के प्रशासन द्वारा उस खंडकाल में जारी एक सर्कुलर से यह पता चलता है कि शिवाजी महाराज द्वारा किसानों को आवश्यकता पड़ने पर ब्याज मुक्त ऋण भी प्रदान किया जाता था, ताकि किसान अपने कृषि कार्य को सुचारू रूप से जारी रख सकें। प्रशासन के नियमों के अनुसार किसानों से केवल मूलधन की राशि ही वापिस ली जाती थी और वह भी किश्तों में।

शिवाजी महाराज के शासनकाल में कृषि क्षेत्र पर दबाव कम करने के उद्देश्य से नमक उद्योग को भी बढ़ावा दिया गया था एवं नमक उद्योग में राज्य ने भी अपना निवेश किया था। इससे किसानों के लिए यह आय का एक अतिरिक्त स्त्रोत बनकर उभरा था। शिवाजी महाराज के राज्य में प्रशासन द्वारा नमक उद्योग को बढ़ावा दिए जाने के पूर्व नमक का आयात पुर्तगाली व्यवसाईयों के माध्यम से होता था। राज्य में नमक के आयात को कम करने एवं अपने राज्य में उत्पादित नमक के उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पुर्तगाल से आयात किए जाने वाले नमक पर प्रशासन ने आयात कर को बढ़ा दिया था ताकि आयातित नमक की कीमत बाजार में अधिक हो जाए एवं राज्य के व्यापारी नमक आयात करने के लिए निरुत्साहित हों तथा स्थानीय नमक उत्पादनकर्ताओं के हित सुरक्षित हो सकें। इस प्रकार, आयात कर का चलन शिवाजी महाराज के शासन काल में ही प्रारम्भ हुआ था।

शिवाजी महाराज के प्रशासन द्वारा नमक उद्योग को प्रदान की गई विशेष सुविधाओं के चलते कुछ समय पश्चात तो राज्य से नमक का निर्यात भी होने लगा था जिससे धीरे धीरे पानी के जहाज बनाने का उद्योग भी राज्य में फलने फूलने लगा था। कालांतर में पानी के जहाजों का इस्तेमाल राज्य में नौ सेना के लिए भी किया जाने लगा था। विशेष रूप से अरब सागर को नियंत्रित करने और अपने साम्राज्य के तटीय क्षेत्रों को सुरक्षित करने के उद्देश्य से शिवाजी महाराज ने एक दुर्जेय नौसैनिक बेड़ा बनाया था। इस प्रकार शिवाजी महाराज ने समुद्री सुरक्षा के सामरिक महत्व को बहुत पहिले ही समझ लिया था। आपकी नौसेना ने न केवल कोंकण तट को समुद्री खतरों से बचाया था, बल्कि हिंद महासागर के व्यापार मार्गों में यूरोपीय शक्तियों के प्रभुत्व को भी चुनौती दी थी। इतिहासकार श्री जदुनाथ सरकार अपनी एक पुस्तक में लिखते हैं कि शिवाजी महाराज के राज्य में विभिन्न आकार के लगभग 400 पानी के जहाज थे। हालांकि उस समय के एक अन्य प्रतिवेदन में यह संख्या 160 की बताई गई है। शिवाजी महाराज की नौ सेना ने पुर्तगालियों, डच एवं अंग्रेजों की नौ सेना को निशाना बनाने में सफलता पाई थी। शिवाजी महाराज ने अपने राज्य एवं आज के महाराष्ट्र के पेन, पनवेल और कल्याण क्षेत्रों में पानी के जहाज बनाने के उद्योग प्रारम्भ किये थे। इन क्षेत्रों में पानी के जहाज बनाने के लिए पर्याप्त मात्रा में लकड़ी उपलब्ध थी। यहां पर निर्मित किए गए पानी के जहाज वजन में हलके होते थे एवं तेज गति से चलते थे। कुछ जहाज तो आकार में बहुत बड़े भी रहते थे, जिन पर आठ तोपें तक लादी जाती थीं। वर्ष 1663 आते आते शिवाजी महाराज के जहाज आज के यमन के शहरों तक जाने लगे थे। बाद के वर्षों में तो व्यापारिक जहाज आज के ईरान एवं ईराक के बसरा शहर तक भी गए थे।

छत्रपति शिवाजी महाराज के शासनकाल में सरल कर प्रणाली के चलते नागरिकों की आर्थिक स्थिति समय के साथ साथ काफी सुदृद्ध होती चली गई क्योंकि नागरिकों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का भी अच्छा उपयोग किया जाने लगा था। अधिकतम नागरिक ग्रामों में ही निवास करते थे एवं कृषि क्षेत्र पर ही निर्भर थे। विभिन्न प्रकार की फसलें उगाकर गाय एवं भेड़ें पालते थे, जानवरों का शिकार करते एवं भेड़ों की ऊन से कपड़े बनते थे। इस खंडकाल में लगभग समस्त ग्रामों में नागरिकों की यही जीवन शैली थी। शिवाजी महाराज के शासनकाल में व्यापार के भी बढ़ावा दिया जा रहा था। मुख्य रूप से कपास, चमड़े से निर्मित उत्पाद एवं मसालों का निर्यात अन्य देशों को किया जाता था। भारत के पश्चिमी तट पर सूरत के बंदरगाह के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय व्यापार किया जाता था। जबकि, सूती एवं रेशमी कपड़ों का घरेलू व्यापार भी किया जाता था।

आज भी यह माना जाता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिससे संप्रभु और शक्तिशाली हिंदू साम्राज्य की नींव पड़ी थी। यह साम्राज्य गुप्त, मौर्य, चोल, अहोम एवं विजयनगर साम्राज्य की ही तरह शक्तिशाली, सुसंगठित और सुशासित था। शिवाजी महाराज ने एक महान हिंदवी साम्राज्य की स्थापना कर न केवल हिंदुओं की सुप्त चेतना को जागृत किया था, बल्कि उन्हें संगठित करते हुए विभाजनकारी और दमनकारी इस्लामी शासन को खुली चुनौती भी दी। उन्होंने भारतीय अस्मिता, सनातन संस्कृति को पुनर्जीवित करने और मंदिरों के संरक्षण और निर्माण कार्य पर सर्वाधिक बल दिया। आज शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के 350 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष में पूरे देश में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाने के प्रयास हो रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा भी इसे एक पर्व के रूप में मनाए जाने का आह्वान किया है तथा संघ की देश भर में फैली शाखाओं द्वारा विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाने की योजना है।

वस्तु एवं सेवा कर संग्रहण में वृद्धि से गरीब वर्ग तक सहायता पहुंचाना हुआ आसान

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जन धन खाता योजना के अंतर्गत 52 करोड़ से अधिक खाते खोलकर नागरिकों को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली में लाया गया है। इससे गरीब वर्ग के नागरिकों के लिए वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिला है

आपको ध्यान होगा कि जब केंद्र सरकार वस्तु एवं सेवा कर को भारत में लागू करने के प्रयास कर रही थी तब कई विपक्षी दलों ने इस नए कर को देश में लागू करने के प्रति बहुत आशंकाएं व्यक्त की थीं। उस समय कुछ आलोचकों का तो यहां तक कहना था कि वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली देश में निश्चित ही असफल होने जा रही है एवं इससे देश के गरीब वर्ग पर कर के रूप में बहुत अधिक बोझ पड़ने जा रहा है। परंतु, केंद्र सरकार ने देश में पूर्व में लागू जटिल अप्रयत्यक्ष कर व्यवस्था को सरल बनाने के उद्देश्य से वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली को 1 जुलाई 2017 से पूरे देश में लागू कर दिया था तथा इस कर में लगभग 20 प्रकार के करों को सम्मिलित किया गया था। वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली को लागू करने के तुरंत उपरांत व्यापारियों को व्यवस्था सम्बन्धी कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ा था। परंतु, इन परेशानियों को केंद्र सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारों के सहयोग से धीरे धीरे दूर कर लिया गया है एवं आज वस्तु एवं सेवा कर के अन्तर्गत देश में कर व्यवस्था का तेजी से औपचारीकरण हो रहा है जिससे देश में वस्तु एवं सेवा कर संग्रहण कुलांचे मारता हुआ दिखाई दे रहा है।

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए धन की आवश्यकता होती है और यह धन देश की जनता से ही करों के रूप में उगाहे जाने के प्रयास होते हैं। उस कर व्यवस्था को उत्तम कहा जा सकता है जिसके अंतर्गत नागरिकों को कर का आभास बहुत कम हो। जिस प्रकार मक्खी गुलाब के फूल से शहद कुछ इस प्रकार से निकालती है कि फूल को मालूम ही नहीं पड़ता है, ठीक इसी प्रकार की कर व्यवस्था केंद्र सरकार द्वारा, वस्तु एवं कर सेवा के माध्यम से, देश में लागू करने के प्रयास किये गए हैं। गरीब वर्ग द्वारा उपयोग की जाने वाली वस्तुओं पर कर की दर को या तो शून्य रखा गया है अथवा कर की दर बहुत कम रखी गई है। इसके विपरीत, धनाडय वर्ग द्वारा उपयोग की जाने वाली वस्तुओं पर कर की दर बहुत अधिक रखी गई है। वस्तु एवं सेवा कर की दर को शून्य प्रतिशत से लेकर 5 प्रतिशत, 12 प्रतिशत, 18 प्रतिशत एवं 28 प्रतिशत अधिकतम तक रखा गया है।

भारत में वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली को लागू किया हुए 6.5 वर्षों से अधिक का समय हो चुका है एवं आज देश में अप्रत्यक्ष कर संग्रहण में लगातार हो रही तेज वृद्धि के रूप में इसके सुखद परिणाम स्पष्टत: दिखाई देने लगे हैं। दिनांक 1 मई 2024 को अप्रेल 2024 माह में वस्तु एवं सेवा कर के संग्रहण से सम्बंधित जानकारी जारी की गई है। हम सभी के लिए यह हर्ष का विषय है कि माह अप्रेल 2024 के दौरान वस्तु एवं सेवा कर का संग्रहण पिछले सारे रिकार्ड तोड़ते हुए 2.10 लाख करोड़ रुपए के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया है, जो निश्चित ही, भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शा रहा है। वित्तीय वर्ष 2022 में वस्तु एवं सेवा कर का औसत कुल मासिक संग्रहण 1.20 लाख करोड़ रुपए रहा था, जो वित्तीय वर्ष 2023 में बढ़कर 1.50 लाख करोड़ रुपए हो गया एवं वित्तीय वर्ष 2024 में 1.70 लाख करोड़ रुपए के स्तर को पार कर गया। अब तो अप्रेल 2024 में 2.10 लाख करोड़ रुपए के स्तर से भी आगे निकल गया है। इससे यह आभास हो रहा है कि देश के नागरिकों में आर्थिक नियमों के अनुपालन के प्रति रुचि बढ़ी है, देश में अर्थव्यवस्था का तेजी से औपचारीकरण हो रहा है एवं भारत में आर्थिक विकास की दर तेज गति से आगे बढ़ रही है। कुल मिलाकर अब यह कहा जा सकता है कि भारत आगे आने वाले 2/3 वर्षों में 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की ओर मजबूती से आगे बढ़ रहा है। भारत में वर्ष 2014 के पूर्व एक ऐसा समय था जब केंद्रीय नेतृत्व में नीतिगत फैसले लेने में भारी हिचकिचाहट रहती थी और भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की हिचकोले खाने वाली 5 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल थी। परंतु, केवल 10 वर्ष पश्चात केंद्र में मजबूत नेतृत्व एवं मजबूत लोकतंत्र के चलते आज वर्ष 2024 में भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है और विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर तेजी से आगे बढ़ रही है।

वस्तु एवं सेवा कर के माध्यम से देश में कर संग्रहण में आई वृद्धि के चलते ही आज केंद्र एवं विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा गरीब वर्ग को विभिन्न विशेष योजनाओं का लाभ पहुंचाये जाने के भरसक प्रयास किए जा रहे हैं। पीएम गरीब कल्याण योजना के माध्यम से मुफ्त अनाज के मासिक वितरण से 80 करोड़ से अधिक परिवारों को लाभ प्राप्त हो रहा है। पीएम उज्जवल योजना के अंतर्गत 10 करोड़ से अधिक महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन प्रदान किये गए हैं। इन महिलाओं के जीवन में इससे क्रांतिकारी परिवर्तन आया है क्योंकि ये महिलाएं इसके पूर्व लकड़ी जलाकर अपने घरों में भोजन सामग्री का निर्माण कर पाती थीं और अपनी आंखों को खराब होते हुए देखती थीं। स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत भी 12 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण कर महिलाओं की सुरक्षा एवं गरिमा को कायम रखा जा सका है। जन धन खाता योजना के अंतर्गत 52 करोड़ से अधिक खाते खोलकर नागरिकों को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली में लाया गया है। इससे गरीब वर्ग के नागरिकों के लिए वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिला है। पूरे भारत में 11,000 से अधिक जनऔषधि केंद्र स्थापित किए गए हैं, जो 50-90 प्रतिशत रियायती दरों पर आवश्यक दवाएं प्रदान कर रहे हैं। साथ ही, जल जीवन मिशन ने पूरे भारत में 75 प्रतिशत से अधिक घरों में नल के पानी का कनेक्शन प्रदान करके एक बड़ा मील का पत्थर हासिल कर लिया गया है। लगभग 4 वर्षों के भीतर मिशन ने 2019 में ग्रामीण नल कनेक्शन कवरेज को 3.23 करोड़ घरों से बढ़ाकर 14.50 करोड़ से अधिक घरों तक पहुंचा दिया गया है। इसी प्रकार, पीएम आवास योजना के अंतर्गत, ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में 4 करोड़ से अधिक पक्के मकान बनाए गए हैं एवं सौभाग्य योजना के अंतर्गत देश भर में 2.8 करोड़ घरों का विद्युतीकरण कर लिया गया है। विश्व भर के सबसे बड़े सरकारी वित्तपोषित स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम – प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना – के अंतर्गत 55 करोड़ लाभार्थियों को माध्यमिक एवं तृतीयक देखभाल एवं अस्पताल में भर्ती के लिए प्रति परिवार 5 लाख रुपए का बीमा कवर प्रदान किया जा रहा है।

वस्तु एवं सेवा कर संग्रहण में आई तेजी के चलते केवल गरीब वर्ग के लिए विशेष योजनाएं ही नहीं चलाई गईं है बल्कि विशेष रूप से केंद्र सरकार के लिए अपने पूंजीगत खर्च में भी बढ़ौतरी करने में आसानी हुई है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में 11.11 लाख करोड़ रुपए के पूंजीगत खर्च का केंद्रीय बजट में प्रस्ताव किया गया है जो वित्तीय वर्ष 2023-24 के 10 लाख करोड़ रुपए का था एवं वित्तीय वर्ष 2022-23 में 7.5 लाख करोड़ रुपए का था। केंद्र सरकार द्वारा की जा रही इतनी भारी भरकम राशि के पूंजीगत खर्च के कारण ही आज देश में निजी क्षेत्र भी अपना निवेश बढ़ाने के लिए आकर्षित हुआ है। विदेशी वित्तीय संस्थान भी अब भारत में अपना विदेशी निवेश बढ़ा रहे हैं। इसके साथ ही, वस्तु एवं सेवा कर के संग्रहण में लगातार हो रही वृद्धि के कारण केंद्र सरकार के बजट में वित्तीय घाटे की राशि को लगातार कम किए जाने में सफलता मिलती दिखाई दे रही है, इससे केंद्र सरकार को अपने खर्चे चलाने के लिए बाजार से ऋण लेने की आवश्यकता भी कम होने जा रही है।

भारत सहित एशियाई देश वर्ष 2024 में विश्व की अर्थव्यवस्था में देंगे 60 प्रतिशत का योगदान

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भारत के स्टील उद्योग, सिमेंट उद्योग एवं ऑटोमोबाइल निर्माण के क्षेत्र ने 10 प्रतिशत से अधिक की विकास दर हासिल कर ली है। डिजिटल आधारभूत ढांचे के निर्माण के क्षेत्र में तो भारत विश्व गुरु बन गया है

वैश्विक स्तर पर आर्थिक क्षेत्र का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। अभी तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में विकसित देशों का दबदबा बना रहता आया है। परंतु, अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2024 में भारत सहित एशियाई देशों के वैश्विक अर्थव्यवस्था में 60 प्रतिशत का योगदान होने की प्रबल सम्भावना है। एशियाई देशों में चीन एवं भारत मुख्य भूमिकाएं निभाते नजर आ रहे हैं। प्राचीन काल में वैश्विक अर्थव्यस्था में भारत का योगदान लगभग 32 प्रतिशत से भी अधिक रहता आया है। वर्ष 1947 में जब भारत ने राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त की थी उस समय वैश्विक अर्थव्यस्था में भारत का योगदान लगभग 3 प्रतिशत तक नीचे पहुंच गया था क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था को पहिले अरब से आए आक्राताओं एवं बाद में अंग्रेजों ने बहुत नुक्सान पहुंचाया था एवं भारत को जमकर लूटा था। वर्ष 1947 के बाद के लगभग 70 वर्षों में भी वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारतीय अर्थव्यवस्था के योगदान में कुछ बहुत अधिक परिवर्तन नहीं आ पाया था। परंतु, पिछले 10 वर्षों के दौरान देश में लगातार मजबूत होते लोकतंत्र के चलते एवं आर्थिक क्षेत्र में लिए गए कई पारदर्शी निर्णयों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को तो जैसे पंख लग गए हैं। आज भारत इस स्थिति में पहुंच गया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में वर्ष 2024 में अपने योगदान को लगभग 18 प्रतिशत के आसपास एवं एशिया के अन्य देशों यथा चीन, जापान एवं अन्य देशों के साथ मिलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था में एशियाई देशों के योगदान को 60 प्रतिशत तक ले जाने में सफल होता दिखाई दे रहा है।

भारत आज अमेरिका, चीन, जर्मनी एवं जापान के बाद विश्व की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। साथ ही, भारत आज पूरे विश्व में सबसे तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था है। वित्तीय वर्ष 2023-24 में तो भारत की आर्थिक विकास दर 8 प्रतिशत से अधिक रहने की प्रबल सम्भावना बन रही है क्योंकि वित्तीय वर्ष 2023-24 की पहली तीन तिमाहियों में भारत की आर्थिक विकास दर 8 प्रतिशत से अधिक रही है, अक्टोबर-दिसम्बर 2023 को समाप्त तिमाही में तो आर्थिक विकास दर 8.4 प्रतिशत की रही है। इस विकास दर के साथ भारत के वर्ष 2025 तक जापान की अर्थव्यवस्था को पीछे छोड़ते हुए विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाने की प्रबल सम्भावना बनती दिखाई दे रही है। केवल 10 वर्ष पूर्व ही भारत विश्व की 11वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था और वर्ष 2013 में मोर्गन स्टैनली द्वारा किए गए एक सर्वे के अनुसार भारत विश्व के उन 5 बड़े देशों (दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, इंडोनेशिया, टर्की एवं भारत) में शामिल था जिनकी अर्थव्यवस्थाएं नाजुक हालत में मानी जाती थीं।

आज भारत के सकल घरेलू उत्पाद का आकार 3.7 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो गया है। साथ ही, वस्तु एवं सेवा कर के संग्रहण में लगातार तेज वृद्धि आंकी जा रही है, जिससे भारत के वित्तीय संसाधनों पर दबाव कम हो रहा है और भारत पूंजीगत खर्चों के साथ ही गरीब वर्ग के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के लिए वित्त की व्यवस्था आसानी से कर पा रहा है। केंद्र सरकार के बजट में न केवल वित्तीय घाटा कम हो रहा है बल्कि आने वाले समय में केंद्र सरकार को अपने सामान्य खर्च चलाने के लिए ऋण लेने की आवश्यकता भी कम पड़ने लगेगी। दूसरे, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपए की कीमत लगातार स्थिर बनी हुई है, जिससे विदेशी निवेशकों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्वास भी बढ़ रहा है और भारत में विदेशी निवेश भी लगातार बढ़ता जा रहा है। तीसरे, भारत में मुद्रा स्फीति पर भी तुलनात्मक रूप से नियंत्रण पाने में सफलता मिली है। अन्य देश अभी भी मुद्रा स्फीति की समस्या से जूझ रहे हैं। आर्थिक क्षेत्र में उक्त कारकों के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 8 प्रतिशत से अधिक बने रहने की प्रबल सम्भावनाएं बनी रहेंगी। इसके ठीक विपरीत, जापान एवं जर्मनी की आर्थिक विकास दर या तो मंदी के दौर से गुजर रहीं हैं अथवा विकास दर बहुत कम अर्थात एक-दो प्रतिशत से भी कम बनी हुई है।

भारत के स्टील उद्योग, सिमेंट उद्योग एवं ऑटोमोबाइल निर्माण के क्षेत्र ने 10 प्रतिशत से अधिक की विकास दर हासिल कर ली है। डिजिटल आधारभूत ढांचे के निर्माण के क्षेत्र में तो भारत विश्व गुरु बन गया है और इससे आज भारत में 13400 करोड़ से अधिक के डिजिटल व्यवहार हो रहे हैं जो पूरे विश्व के डिजिटल व्यवहारों का 46 प्रतिशत है। जन-धन योजना के अंतर्गत खोले गए 50 करोड़ से अधिक बैंक खातों में आज 2.32 लाख करोड़ रुपए से अधिक की राशि जमा हो चुकी है, जो देश के आर्थिक विकास में अपना योगदान दे रही है। वर्ष 2013-14 से वर्ष 2022-23 के दौरान मुद्रा स्फीति की औसत दर 5 प्रतिशत की रही है जो वर्ष 2003-04 से वर्ष 2013-14 के दौरान औसत 8.2 प्रतिशत की रही थी। मुद्रा स्फीति कम रहने का सीधा लाभ देश के गरीब वर्ग को मिलता है।

साथ ही, अब तो आर्थिक विकास के साथ ही भारत में रोजगार के भी पर्याप्त अवसर निर्मित होने लगे हैं। स्कोच नामक संस्थान द्वारा जारी एक प्रतिवेदन में बताया गया है कि भारत में वर्ष 2014 से वर्ष 2024 के दौरान 51.4 करोड़ व्यक्ति वर्ष के नए रोजगार निर्मित हुए हैं। इसमें केंद्र सरकार द्वारा किये गए सीधे प्रयासों के चलते 19.79 करोड़ व्यक्ति वर्ष के रोजगार के अवसर भी शामिल हैं। शेष 31.61 करोड़ व्यक्ति वर्ष रोजगार के अवसर अपने व्यवसाय प्रारम्भ करने के उद्देश्य से बैंकों से लिए गए ऋण के चलते निर्मित हुए हैं। स्कोच नामक संस्थान द्वारा उक्त प्रतिवेदन 80 संस्थानों पर की गई रिसर्च (केस स्टडी) के आधार पर जारी किया गया है। सूक्ष्म एवं लघु स्तर के ऋण लेने वाले व्यक्तियों ने रोजगार के करोड़ों नए अवसर निर्मित किए हैं। इस प्रतिवेदन के अनुसार औसतन प्रत्येक सूक्ष्म संस्थान 6.6 रोजगार के नए अवसर निर्मित करता है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक के बाद अब मूडीज ने भी भारत में आर्थिक विकास के संदर्भ में बताया है कि आने वाले कुछ वर्षों तक भारत की आर्थिक विकास दर विश्व में सबसे अधिक बने रहने की प्रबल सम्भावना बनी रहेगी। इस प्रकार, एक के बाद एक विभिन्न वैश्विक आर्थिक संस्थान भारत में आर्थिक विकास दर के मामले में अपने अनुमानों को लगातार सुधारते/बढ़ाते जा रहे हैं। इस प्रकार, आगे आने वाले समय में भारत का वैश्विक अर्थव्यवस्था में योगदान भी लगातार बढ़ता जाएगा और सम्भव है कि कालचक्र में ऐसा परिवर्तन हो कि भारत एक बार पुनः वैश्विक स्तर पर अपने आर्थिक योगदान को 32 प्रतिशत के स्तर तक वापिस ले जाने में सफल हो।

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