एशियाई खेलों में भारत का शानदार प्रदर्शन जारी, अब तक कुल 69 पदक जीते

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हांगचोओ एशियाई खेलों में भारत का शानदार प्रदर्शन जारी है। खेलों के दसवें दिन कल भारत को दो स्वर्ण, दो रजत और पांच कांस्‍य पदक मिले हैं। पदक तालिका में भारत 15 स्वर्ण, 26 रजत और 28 कांस्य पदकों के साथ कुल 69 पदक लेकर चौथे स्थान पर है।

एथलेटिक्स में महिलाओं की जेवलिन थ्रो में अनुरानी ने और पांच हजार मीटर दौड में पारुल चौधरी ने स्‍वर्ण पदक जीता। पुरूषों के डेक्‍थोलॉन में तेजस्विन शंकर ने और आठ सौ मीटर दौड में मोहम्‍मद अफसल ने रजत पदक अपने नाम किया। पुरुषों के ट्रिपल जंप में प्रवीण चित्रावेल ने कांस्‍य पदक जीता। महिलाओं की चार सौ मीटर बाधा दौड में विध्‍या ने कांस्‍य पदक हासिल किया। मुक्केबाजी में प्रीति और नरेंद्र ने कांस्य पदक हासिल किया। कैनोइंग डबल में अर्जुन सिंह और सुनील सिंह ने कांस्य पदक जीता।

तीरंदाजी में कंपाउंड मिक्स्ड टीम स्पर्धा के क्वार्टर फाइनल में आज ज्योति वेन्नम और ओजस देवताले मलेशिया की जोड़ी को हराकर सेमी फाइनल में प्रवेश किया। पुरुष कबड्डी टीम ने आज अपने ग्रुप मैच में थाईलैंड को 63-26 से हराया। अगला मुकाबला कल चीनी ताइपेई होगा।एशियाई खेलों में आज भारत को एथलेटिक्स में ज्यादा पदकों की उम्मीदें रहेंगी। सबकी निगाहें पुरूषों के जेवलिन थ्रो में ओलंपिक और विश्‍व चैंपियन नीरज चोपड़ा तथा किशोर कुमार पर होंगी।

दिल्ली पुलिस ने ‘न्यूजक्लिक’ के कार्यालय को सील किया

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दिल्ली पुलिस ने चीन के समर्थन में प्रचार करने के लिए धन लेने के आरोप में आतंकवाद निरोधी कानून गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम के तहत दर्ज एक मामले की जांच के सिलसिले में समाचार पोर्टल ‘न्यूज़क्लिक’ के कार्यालय को सील कर दिया है। दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ ने मंगलवार को समाचार पोर्टल और उसके पत्रकारों से जुड़े 30 ठिकानों की तलाशी ली।

पुलिस ने कहा कि दिल्ली-एनसीआर में केंद्रित तलाशी के दौरान अब तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है। संस्थापक और प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ को समाचार पोर्टल के दक्षिणी दिल्ली स्थित कार्यालय ले जाया गया, जहां एक फॉरेंसिक टीम मौजूद थी।

पत्रकारों से पूछताछ की गई उनमें उर्मिलेश, अनिंद्यो चक्रवर्ती, अभिसार शर्मा, परंजॉय गुहा ठाकुरता के साथ-साथ इतिहासकार सोहेल हाशमी भी शामिल हैं। सूत्रों ने बताया कि पुलिस ने उन्हें उनकी विदेश यात्रा, दिल्ली के शाहीन बाग में संशोधित नागरिकता अधिनियम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के साथ-साथ किसानों के आंदोलन सहित विभिन्न मुद्दों से संबंधित 25 प्रश्न पूछे।

Source: PTI

भारत के विकास में दीनदयाल जी के जीवनदर्शन

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प्रवीण कुमार झा
 

दीनदयाल जी के द्वारा निर्मित राजनैतिक जीवनदर्शन का पहला सुत्र है – “भारत में रहनेवाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन हैं। उनकी जीवन प्रणाली, कला, साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है। इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है। इस संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा।” “वसुधैव कुटुम्बकम” हमारी सभ्यता से प्रचलित है। इसी के अनुसार भारत में सभी धर्मो को समान अधिकार प्राप्त हैं। दुनिया की नजर भारत की विशाल जनसंख्या और उसके बाजार पर है। इस बाजार के बल पर भारत का विकास तेजी से हो सकेगा और भारत विकसीत देशों की श्रेणी में खड़ा होगा। ग्रामीण विकास से ही भारत के विकसीत होने की कल्पना नहीं की जा सकती। भारत कृषि प्रधान देश आज भी है। अधिकांश आबादी कृषि या उससे संबंधित रोजगार से जुड़ी है। पंचवर्षीय योजनाओं में गांवों को ध्यान में रखकर नीतियां तय की गयीं है। सम्पूर्ण भारत के गांवों में गरीबी, सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सम्मानजनक जीवन स्तर आदि के लिए आज मोदी सरकार प्रयासरत भी हैं। मोदी सरकार ने स्मार्ट शहरों के साथ ही स्मार्ट गांव बनाने का निर्णय लिया है। जो एक नई पहल है। दीन दयाल उपाध्याय जी के विचार और दर्शन आज भी प्रासंगिक है। जनसंघ के राष्ट्रजीवन दर्शन के निर्माता दीनदयाल जी का उद्देश्य स्वतंत्रता की पुर्नरचना के प्रयासों के लिए विशुद्ध भारतीय तत्व-दृष्टी प्रदान करना था। उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को एकात्म मानववाद जैसी प्रगतिशील विचारधारा दी। वैश्वीकरण के दौर तथा बदले हुए परिवेश में मीडिया एक उद्योग के रूप में स्थापित हो चुका है। हिन्दी का विशाल बाजार निवेशकों को लुभाता रहा है। तमाम देशी-विदेशी निवेशक हिन्दी मीडिया में निवेश को उत्सुक दिख रहे हैं। मीडिया के व्यवसाय की दृष्टि से यह अच्छा कहा जा सकता है लेकिन बाजार की शक्तियां वही कार्य करेंगी जिससे उनके उत्पाद की बिक्री बढ़ जाए। दीनदयालजी को जनसंघ के आर्थिक नीति के रचनाकार बताया जाता है। आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य समान्य मानव का सुख है या उनका विचार था। विचार–स्वातंत्रय के इस युग में मानव कल्याण के लिए अनेक विचारधारा को पनपने का अवसर मिला है। इसमें साम्यवाद, पूंजीवाद , अन्त्योदय, सर्वोदय आदि मुख्य हैं। किन्तु चराचर जगत को सन्तुलित, स्वस्थ व सुंदर बनाकर मनुष्य मात्र पूर्णता की ओर ले जा सकने वाला एकमात्र प्रक्रम सनातन धर्म द्वारा प्रतिपादित जीवन – विज्ञान, जीवन–कला व जीवन–दर्शन है।” “वसुधैव कुटुम्बकम” हमारी सभ्यता से प्रचलित है। इसी के अनुसार भारत में सभी धर्मो को समान अधिकार प्राप्त हैं। संस्कृति से किसी व्यक्ति ,वर्ग , राष्ट्र आदि की वे बातें जो उनके मन,रुचि, आचार, विचार, कला-कौशल और सभ्यता का सूचक होता है पर विचार होता है। दो शब्दों में कहें तो यह जीवन जीने की शैली है। भारतीय सरकारी राज्य पत्र (गज़ट) इतिहास व संस्कृति संस्करण में यह स्पष्ट वर्णन है कि हिन्दुत्व और हिंदूइज़्म एक ही शब्द हैं तथा यह भारत के संस्कृति और सभ्यता का सूचक है। उपाध्यायजी पत्रकार तो थे ही चिन्तक और लेखक भी थे। उनकी असामयिक मृत्यु से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि जिस धारा में वह भारतीय राजनीति को ले जाना चाहते थे वह धारा हिन्दुत्व की थी जिसका संकेत उन्होंने अपनी कुछ कृतियों में ही दे दिया था। तभी तो कालीकट अधिवेशन के बाद विश्व भर के मीडिया का ध्यान उनकी ओर गया।

दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन शाश्वत विचारधारा से जुड़ता है। इसके आधार पर वह राष्ट्रभाव को समझने का प्रयास करते हैं। समस्याओं पर विचार करते हैं। उनका समाधान निकालते हैं। यह तथ्य ही भारत के अनुकूल प्रमाणित होता है। ऐसे में पहली बात यह समझनी होगी कि अन्य विचारों के भांति दीनदयाल उपाध्याय ने कोई वाद नहीं बनाया। एकात्म मानव, अन्त्योदय जैसे विचार वाद की श्रेणी में नहीं आते। यह दर्शन है। जो हमारी ऋषि परंपरा से जुड़ता है। इसके केंद्र में व्यक्ति या सत्ता नहीं है। जैसा कि पश्चिम या वामपंथी विचारों में कहा गया है। इसके विपरीत व्यक्ति, मन, बुद्धि, आत्मा सभी का महत्व है। प्रत्येक जीव में आत्मा का निवास होता है। आत्मा को परमात्मा का अंश माना जाता है। यह एकात्म दर्शन है। इसमें समरसता का विचार है। इसमें भेदभाव नहीं है। व्यक्ति का अपना हित स्वभाविक है। लेकिन यही सब कुछ नहीं है। उपभोगवाद से लोक कल्याण संभव नहीं है। इसमें व्यक्ति का भी कल्याण नहीं है। यदि ऐसा होता तो भौतिकवाद की दौड़ में कभी तो व्यक्ति को संतोष मिलता। लेकिन ऐसा नहीं होता। मन कभी संतुष्ट नहीं होता। व्यक्ति प्रारंभिक इकाई मात्र है। लेकिन वह परिवार का हिस्सा मात्र है। परिवार का हित हो तो व्यक्ति अपना हित छोड़ देता है। समाज का हित हो तो परिवार का हित छोड़ देना चाहिये। देश का हित हो तो समाज का हित छोड़ देना चाहिये। राष्ट्रवाद का यह विचार प्रत्येक नागरिक में होना चाहिये। मानव जीवन का लक्ष्य भौतिक मात्र नहीं है। जीवन यापन के साधन अवश्य होने चाहिए। ये साधन हैं। साध्य नहीं है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का विचार भी ध्यान रखना चाहिये। सभी कार्य धर्म से प्रेरित होने चाहिये। अर्थात लाभ की कामना हो, लेकिन का शुभ होना अनिवार्य है।

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दीनदयाल उपाध्याय

दीनदयाल उपाध्याय की अवधारणा थी कि आजादी के बाद भारत का विकास का आधार अपनी भारतीय संस्कृति हो न की अंग्रेजों द्वारा छोड़ी गयी पश्चिमी विचारधारा। हालांकि भारत में लोकतंत्र आजादी के तुरंत बाद स्थापित कर दिया गया था, परंतु दीनदयाल उपाध्याय के मन में यह आशंका थी कि लम्बे वर्षों की गुलामी के बाद भारत ऐसा नहीं कर पायेगा। उनका विचार था कि लोकतंत्र भारत का जन्मसिद्ध अधिकार है न की पश्चिम (अंग्रेजों) का एक उपहार। वे इस बात पर भी बल दिया करते थे कि कर्मचारियों और मजदूरों को भी सरकार की शिकायतों के समाधान पर ध्यान देना चाहिए। उनका विचार था कि प्रत्येक व्यक्ति का सम्मान करना प्रशासन का कर्तव्य होना चाहिए। उनके अनुसार लोकतंत्र अपनी सीमाओं से परे नहीं जाना चाहिए और जनता की राय उनके विश्वास और धर्म के आलोक में सुनिश्चित करना चाहिए। दीनदयाल द्वारा स्थापित ‘एकात्म मानववाद’ की अवधारणा पर आधारित राजनितिक दर्शन भारतीय जनसंघ (वर्तमान भारतीय जनता पार्टी) की देन है। उनके अनुसार ‘एकात्म मानववाद’ प्रत्येक मनुष्य के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का एक एकीकृत कार्यक्रम है। उन्होंने कहा कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत पश्चिमी अवधारणाओं जैसे- व्यक्तिवाद, लोकतंत्र, समाजवाद, साम्यवाद और पूंजीवाद पर निर्भर नहीं हो सकता है। उनका विचार था कि भारतीय मेधा पश्चिमी सिद्धांतों और विचारधाराओं से घुटन महसूस कर रही है, परिणामस्वरूप मौलिक भारतीय विचारधारा के विकास और विस्तार में बहुत बाधा आ रही है। वर्तमान सन्दर्भ में देखा जाए तो मोदी सरकार ने विकासवाद के सिद्धांत पर “सबका साथ और सबका विकास” का नारा दिया है। साथ ही ग्रामीण विकास और सामाजिक समरसता के सम्बन्ध में भारतीय संविधान में सबको सामान अधिकार प्राप्त है। वर्तमान सरकार ने ग्रामीण विकास के संदर्भ में पंडित दीन दयाल उपाध्याय के नाम से ग्राम ज्योति योजना, अन्त्योदय योजना, ग्रामीण कौशल विकास योजना आदि का शुभारम्भ कर ग्रामीण विकास के संदर्भ सभी को स्वास्थ्य, शिक्षा, भोजन, आवास, रोजगार आदि को गावों में उपलब्ध कराने का प्रयास कर रही है।

 

दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्र की आत्मा से लेकर जैविक खाद व व्यापार तक पर चिंतन करते हैं। उनके अध्ययन व मनन का दायरा कितना व्यापक था, इसकी कल्पना की जा सकती है। वह लिखते हैं कि अर्थव्यवस्था सदैव राष्ट्रीय जीवन के अनुकूल होनी चाहिये। भरण, पोषण, जीवन के विकास, राष्ट्र की धारणा व हित के लिये जिन मौलिक साधनों की आवश्यकता होती है, उनका उत्पादन अर्थव्यवस्था का लक्ष्य होना चाहिये। पाश्चात्य चिंतन इच्छाओं को बराबर बढ़ाने और आवश्यकताओं की निरंतर पूर्ति को अच्छा समझता है। इसमें मर्यादा का कोई महत्व नहीं होता। उत्पादन सामग्री के लिये बाजार ढूंढना या पैदा करना अर्थनीति का प्रमुख अंग है। लेकिन प्रकृति की मर्यादा को नहीं भूलना चाहिये। प्रकृति के साथ उच्छृंखलता का व्यवहार नहीं होना चाहिये। खाद्य सुरक्षा की बात अब सामने आई। खाद्य सुरक्षा भारत ही नहीं वरन् वैश्विक समस्या है। जिसको जड़ से समाप्त करना एक बड़ी चुनौती है। गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा, काम के समान अवसर की कमी, किसानों की समस्यायें, आत्महत्या, बिचौलियों के कारण किसानों के लाभ पर डाका, प्रशासनिक उपेक्षा, हल्की राजनीतिक बयानबाजी आदि अनेकों ऐसे विषय हैं जिन पर गंभीरतापूर्वक विचार किया मोदी सरकार कर रही है। सरकार संसदीय कार्यप्रणाली के द्वारा खाद्य सुरक्षा कानून बनाकर एक रास्ता खोल दिया है। दीनदयाल जी ने इस पर बहुत पहले ही विचार कर लिया था। उनके अनुसार हमारा नारा यह होना चाहिये कि कमाने वाला खिलायेगा तथा जो जन्मा सो खायेगा। अर्थात खाने का अधिकार जन्म से प्राप्त होता है। बच्चे, बूढ़े, रोगी, अपाहिज सबकी चिंता समाज को करनी पड़ती है। इस कर्तव्य के निर्वाह की क्षमता पैदा करना ही अर्थव्यवस्था का काम है। अर्थशास्त्र इस कर्तव्य की प्रेरणा का विचार नहीं कर पाता। भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी अर्थव्यवस्था का न्यूनतम स्तर है।

दीन दयाल जी देश की एकता और अखंडता के लिए सदैव समर्पित रहे। उनका मानता था कि राष्ट्र की निर्धनता और अशिक्षा को दूर किए बिना वास्तविक उन्नति संभव नहीं है। निर्धन और अशिक्षित लोगों की उन्नति के लिए उन्होने अंत्योदय की संकल्पना का सुझाव दिया। उनका कहना था “अनपढ़ और मैले कुचैले लोग हमारे नारायण हैं। हमे इनकी पूजा करनी है यह हमारा सामाजिक दायित्व और धर्म है। आज शिक्षा की व्यवस्था भी चिंता उत्पन्न करती है। एक तरफ महंगी शिक्षा है। इसका लाभ सीमित वर्ग उठा सकता है। दूसरी ओर जहां शिक्षा सस्ती है, उनकी दशा खराब है। वहां मूलभूत सुविधाएं भी नहीं हैं। शिक्षा व्यवसाय का रूप ले चुकी है। जिनका शिक्षा से कोई मतलब नहीं वह शिक्षण संस्थान के संचालक बन गये। दीनदयाल उपाध्याय को इसका भान था इसलिये उन्होंने लिखा था कि शिक्षा समाज का दायित्व है। बच्चों को शिक्षा देना समाज के अपने हित में है। आज शिक्षा की भांति चिकित्सा की दशा है। यह भी व्यवसाय का रूप धारण कर रही है। दीनदयाल जी निःशुल्क चिकित्सा का सुझाव देते हैं। वह मानते हैं कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था मानव का विकास करने में असमर्थ सिद्ध हुई है। इसके विरोध में समाजवादी अर्थव्यवस्था आई। यह भी विफल हुई। इसने पूंजी का स्वामित्व राज्य के हाथों में देकर संतोष कर लिया। दीनदयाल जी का अंत्योदय विचार आज भी प्रासंगिक है। भारत में अनेकवाद अपनाये गये। अब तो वैश्विकरण और उदारीकरण को भी लंबा समय हो गया। लेकिन अमीर व गरीब के बीच की खाई बढ़ी है। यह व्यक्तिवादी व उपभोगवादी चिंतन का भी परिणाम है। विकास हुआ, मगर असंतुलित है। सत्ता व समाज दोनों को जिम्मेदारी से काम करने की दीनदयाल उपाध्याय प्रेरणा देते हैं। समाज के सबसे निचले पायदान पर जो व्यक्ति है, उसके उत्थान का प्रयास प्राथमिकता से होनी चाहिये। दीनदयाल उपाध्याय के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। इन्हीं के माध्यम से देश की वर्तमान समस्याओं का समाधान हो सकेगा। समरसता समग्र तरक्की की अनिवार्य शर्त है. इसके लिए शिक्षा और प्रेरणा को हथियार बनाएं। ऐसी शिक्षा दें, जिससे लोग अच्छा इंसान बन सकें। ऐसे लोगों को समरस समाज और उसके लाभ के बारे में बताएं। इसके बाद इन लोगों को समाज को समरस बनाने के लिए प्रेरित करें। आपस में संवाद बढ़ाएं, प्रौद्योगिकी की प्रगति के साथ इसका कम होना दुखद और खतरनाक है। विश्व संवाद केंद्र की पहल सराहनीय है। यह सिलसिला जारी रहना चाहिए। विश्वविद्यालय प्रशासन ऐसे आयोजनों में हर संभव सहयोग करेगा।

25 सितंबर को तमिलनाडु भवन पर सनातन विरोधियों के विरुद्ध प्रदर्शन: स्वामी राघवानंद, महन्त नारायण गिरी

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शुक्रवार, 15 सितंबर शाम को सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा, दिल्ली के तत्वावधान में उदासीन आश्रम, आरामबाग, पहाड़गंज दिल्ली में एक विशाल सभा का आयोजन किया गया।

इस सभा की अध्यक्षता दिल्ली संत महामंडल एवं सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा के मार्गदर्शक महामंडलेश्वर पूज्य स्वामी राघवानंद जी महाराज ने की। अपने संबोधन में स्वामी राघवानंद जी महाराज ने तमिलनाडु सरकार के मंत्री उदय निधि, ए राजा तथा कर्नाटक के प्रियंक खड़गे द्वारा सनातन के ऊपर किए गये अभद्र टिपण्णी की निंदा की तथा सनातन धर्म के वसुधैव कुटुंबकम की चर्चा की।
उन्होंने इस आयोजन का उद्देश्य बताते हुए कहा कि जो सनातन धर्म के विरुद्ध गलत प्रचार करते हैं तथा इसको नष्ट करने की बात कर रहे हैं, उन्हें जानकारी नहीं है कि सनातन सदा से था, है और रहेगा।

इस सभा में सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा, दिल्ली संत महामंडल के साथ विश्व हिंदू परिषद, दिल्ली के पदाधिकारी भी बड़ी संख्या में उपस्थित हुए एवं सभा में आए पूज्य संतों और अन्य हिंदू संगठनों के प्रतिनिधियों ने अपनी-अपनी बात रखी।

दिल्ली संत महामंडल के अध्यक्ष एवं दुधेश्वरनाथ पीठाधीश्वर , श्री महंत नारायण गिरी जी महाराज ने अपने संबोधन में इस विरोध कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सभी संतों से अधिक संख्या में भाग लेने का अनुरोध किया और उन्होंने जंतर-मंतर के बजाय तमिलनाडु भवन पर सनातन धर्म रक्षा मंच के बैनर तले विरोध प्रदर्शन का सुझाव रखा जो सर्व सम्मति से स्वीकार किया गया।

दिल्ली संत महा मंडल के महामंत्री महंत श्री नवल किशोर दास जी भी आगामी प्रदर्शन के लिए हर संभव सहयोग देने का निवेदन दिया।

विश्व हिन्दू परिषद के दिल्ली प्रांत अध्यक्ष श्री कपिल खन्ना ने भी विरोध के कारणों पर प्रकाश डाला। उनके साथ श्री सुरेन्दर गुप्ता जी, महामंत्री दिल्ली प्रांत, विश्व हिन्दू परिषद ने भी इस कार्यक्रम हेतु तन-मन, धन से पूरा सहयोग देने की बात की।

दिल्ली संत महामंडल के संगठन मंत्री महामंडलेश्वर स्वामी आचार्य कंचन गिरी जी ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म, प्राण और प्रतिष्ठा की तरह ही महत्वपूर्ण है। इसलिए हमारे सनातन धर्म को लेकर अभद्र टिपण्णी करने वालों के विरुद्ध ऐसा विरोध होना चाहिए जिससे इस प्रकार की टिपण्णियां की पुनरावृत्ति का कोई दुस्साहस न कर सके और हमारी अगली पीढ़ी में भी हमारे धर्म व संस्कृति के प्रति इज्जत और विश्वास कायम रहे।

इस सम्मेलन में हिन्दू धर्म को मानने वाले और किसी भी धर्म का अपमान न हो, ऐसे विचार धारा वाले सभी धार्मिक संगठनों को भी इस विरोध प्रदर्शन में शामिल करने का प्रस्ताव पारित किया गया।

सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा दिल्ली के अध्यक्ष श्री भूषण लाल पाराशर जी ने सभा का संचालन किया। श्री पाराशर जी ने अपने उद्बोधन में बताया कि सनातन धर्म का सृष्टि की रचना के साथ ही अविर्भाव हुआ जो लगभग दो अरब वर्ष पुराना है। यह अनादि है, अनंत है और साश्वत है। अन्य सभी धर्म मात्र दो हजार वर्ष पुराने हैं।

इस सभा में महन्त श्री धीरेन्द्र पुरी जी ,कोषाध्यक्ष दिल्ली सन्त महामण्डल, महन्त ओमप्रकाश गिरी जी,क़रोल बाग, महन्त गिरीशानन्द गिरी जी, देवी मंदिर, ग़ाज़ियाबाद, महन्त नारायण गिरी जी, गुप्ता कालोनी, महन्त अजब दास जी, लोनी, महन्त शिवचन्द्रानन्द गिरी जी, देवी मन्दिर मुखर्जी नगर, महन्त मंगल दास उदासीन, कोतवाल दिल्ली सन्त महामण्डल, महन्त कृष्णा दास जी, महन्त श्याम गिरी जी, दीक्षानंद जी महाराज, आचार्य राम मिलन शुक्ल जी, योगी उमेश्वरानंद गिरी जी, साध्वी ज्योति गिरी जी, साध्वी पार्वती गिरी जी, स्वामी चंद्रदेव जी महाराज, स्वामी विवेकानंद जी महाराज सहित अन्य पूज्य संतों सहित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के करोल बाग जिला के संघचालक श्री अशोक सचदेवा जी भी उपस्थित रहे।

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