नीरज चोपड़ा ने हंगरी के बुडापेस्‍ट में वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भारत का पहला स्वर्ण पदक जीता

64ec2d11d0bc7_file.jpg

भाला फेंक खिलाड़ी नीरज चोपड़ा ने हंगरी के बुडापेस्‍ट में वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भारत का पहला स्वर्ण पदक जीता। पुरुषों के भाला फेंक स्‍पर्धा के फाइनल में नीरज चोपड़ा ने 88 दशमलव 17 मीटर तक भाला फेंक कर स्‍वर्ण पदक जीता।

पाकिस्तान के अरशद नदीम ने 87 दशमलव 82 मीटर तक भाला फेंक कर रजत पदक जीता। चेक गणराज्‍य के खिलाडी जैकब वडलेजचगोट ने कांस्य पदक जीता। भाला फेंक स्‍पर्धा में किशोर जेना पांचवें और डी पी मनु छठे स्‍थान पर रहे।

महिलाओं की तीन हजार मीटर की स्टीपलचेज स्‍पर्धा में भारत की पारूल चौधरी 11वें स्‍थान पर रहीं लेकिन उन्‍होंने अपना श्रेष्‍ठ व्यक्तिगत प्रदर्शन किया। इसके साथ ही वे पेरिस ओलंपिक्‍स 2024 में अपनी जगह पक्‍की कर ली। महिलाओं की तीन हजार मीटर की स्टीपलचेज के फाइनल में उन्‍होंने 9:15:31 का समय लिया। इस प्रदर्शन के साथ पारुल ने महिलाओं की स्‍टीपलचेज स्‍पर्धा में एक नया राष्‍ट्रीय रिकॉर्ड बनाया।

जी-20 दिल्ली की सड़कों को फूलों के 6.75 लाख गमलों से सजाया जाएगा

2023_8img27_Aug_2023_PTI08_27_2023_000259A-scaled-1.jpg

राष्ट्रीय राजधानी में होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान 61 सड़कों और आयोजन स्थलों पर फूल-पत्तियों से सजे 6.75 लाख गमले लगाये जाएंगे।
जिन प्रमुख स्थानों को गमले में लगे पौधों से सजाया जा रहा है, उनमें सरदार पटेल मार्ग, मदर टेरेसा क्रिसेंट, तीन मूर्ति मार्ग, धौला कुआं-आईजीआई एयरपोर्ट रोड, पालम टेक्निकल एरिया, इंडिया गेट सी-हेक्सागोन, मंडी हाउस, अकबर रोड गोल चक्कर, दिल्ली गेट, राजघाट और आईटीपीओ शामिल हैं।.

अधिकारियों ने कहा कि उपराज्यपाल वीके सक्सेना की अध्यक्षता में एक बैठक के बाद उन एजेंसियों की पहचान करने के निर्देश जारी किये गये, जो इस अभियान का संचालन करेंगी और उन्हें विशिष्ट संख्या में अपनी ही नर्सरी से पौधे/गमले खरीदने का काम सौंपा गया है।

अधिकारी ने बताया कि यद्यपि वन विभाग और दिल्ली पार्क्स एंड गार्डन सोसाइटी ने 3.75 लाख गमले (1.25 लाख पत्तियों के गुच्छे और 2.5 लाख फूल), जबकि पीडब्ल्यूडी ने 50,000 गमले (35,000 पत्तियों के गुच्छे और 15,000 फूल), डीडीए ने एक लाख (85,000 पत्तियों के गुच्छे और 15,000 फूल) और एनडीएमसी ने एक लाख और एमसीडी ने फूलों और पत्तियों के 50,000 गमले लगाये हैं।.

 

26 अगस्त 1303 : सोलह हजार क्षत्राणियों और बच्चों के साथ चित्तौड़ में रानी पद्मावती का जौहर

sati-devi.jpg

अलाउद्दीन खिलजी की कुटिलता और गोरा बादल के अद्भुत शौर्य की गाथा

— रमेश शर्मा

अपने स्वत्व और स्वाभिमान रक्षा के लिये क्षत्राणियों की अगुवाई में स्त्री बच्चों द्वारा स्वयं को अग्नि में समर्पित कर देने का इतिहास केवल भारत में मिलता है । इनमें सबसे अधिक शौर्य और मार्मिक प्रसंग है चित्तौड़ की रानी पद्मावती के जौहर का । जिसका उल्लेख प्रत्येक इतिहासकार ने किया है । इस इतिहास प्रसिद्ध जौहर पर सीरियल भी बने और फिल्में भी बनीं। राजस्थान की लोक गाथाओं में सर्वाधिक उल्लेख इसी जौहर का है ।

जौहर के विवरण भारत की अधिकांश रियासतों के इतिहास में मिलता है । जौहर की स्थिति तब बनती थी जब पराजय और समर्पण के अतिरिक्त सारे मार्ग बंद हो जाते थे । जौहर के सर्वाधिक प्रसंग राजस्थान के हैं । वहाँ कोई भी ऐसी रियासत नहीं जहाँ जौहर न हुआ हो । चित्तौड़ में सबसे पहला और सबसे बड़ा जौहर रानी पद्मावती का ही माना जाता है ।

रानी पद्मावती सिंहल द्वीप की राजकुमारी थीं। उनका मूल नाम पद्मिनी था जो विवाह के बाद पद्मावती हुआ । सिंहलद्वीप का नाम अब श्रीलंका है । उनके पिता राजा चन्द्रसेन सिंहलद्वीप के शासक थे । उन्होंने अपनी बेटी पद्मिनी के विवाह के लिये स्वयंवर का आयोजन किया । यह समाचार पूरे भारत में आया । चित्तौड़ के राजा रतन सिंह भी स्वयंवर में भाग लेने सिंहलद्वीप पहुँचे। वहाँ पद्मिनी से विवाह के इच्छुक राजाओं की बल बुद्धि और कौशल की परीक्षा के लिये वन में आखेट की एक स्पर्धा आयोजित की गई थी । जो राजा रतन सिंह ने जीती और राजकुमारी पद्मिनी से उनका विवाह हुआ । राजकुमारी पद्मिनी महारानी पद्मावती बनकर चितौड़ आ गईं।

उनके रूप गुण और राजा रतनसिंह के कौशल की चर्चा दूर दूर तक हुई यह दिल्ली के शासक अलाउद्दीन खिलजी तक भी पहुँची। दिल्ली सल्तनत के दो हमले चित्तौड़ पर हो चुके थे । पर सफलता नहीं मिली थी । बल्कि गुजरात जाती दिल्ली सल्तनत की फौज से अपने क्षेत्र से होकर निकलने के लिये कर भी वसूला था । किन्तु गागरौन की सहायता के लिये चित्तौड़ की सेना गई थी जिससे शक्ति में कुछ गिरावट आई और दिल्ली ने तोपखाने की वृद्धि कर अपनी शक्ति बढ़ा ली थी । स्थिति का आकलन करके दिल्ली की फौजों ने चित्तौड़ पर हमला बोला । लगभग एक माह तक घेरा पड़ा रहा । किन्तु सफलता नहीं मिली । अंततः अलाउद्दीन खिलजी ने एक कुटिल चाल चली । कुछ भेंट के साथ समझौता प्रस्ताव भेजा और आग्रह किया कि रानी पद्मावती का चेहरा एक बार देखकर लौट जायेगा । राजा ने प्रस्ताव मान लिया । सुल्तान अपने कुछ विश्वस्त सहयोगियों के साथ भोजन पर आया । उसने आइने में रानी को देखा और चलने लगा । राजा शिष्टाचार वस किले के द्वार तक छोड़ने आये । सुल्तान अलाउद्दीन बहुत कुटिल था । वह किले में भीतर जाते समय द्वार पर कुछ सुरक्षा सैनिक छोड़ गया था । उसके इरादों की किसी को भनक तक न थी । जैसे ही राजा द्वार पर आये उनपर हमला हुआ और बंदी बना लिये गये । बंदी बनाकर सुल्तान अपने शिविर में ले आया । और रानी को समर्पण करने का प्रस्ताव भेजा । रानी ने सभासदों से परामर्श किया । गोरा और बादल जो रिश्ते में राजा भतीजे थे ने संघर्ष का बीड़ा उठाया । राजा को मुक्त कराने की योजना बनी । योजनानुसार सुल्तान को समाचार भेजा कि रानी अपनी सखी सहेलियों और सेविकाओं के साथ समर्पण करने आना चाहतीं हैं। रानी पद्मावती को प्राप्त करने को आतुर अलाउद्दीन ने सहमति दे दी । तैयारी की सूचना भी सुल्तान को मिली । और रानी की ओर से यह आग्रह भी किया गया कि वह अंतिम बार राजा से मिलना चाहतीं है अतएव राजा के बंदी शिविर से होकर सुल्तान के दरबार में हाजिर होंगी। यह सहमति भी मिल गई। चित्तौड़ में दो सौ डोले तैयार हुये ।

कहीं कहीं डोलों की यह संख्या 800 भी लिखी है । कुछ में तो दिखावे के विये महालाएँ थीं पर अधिकांश में लड़ाके नौजवान थे जो अपने राजा को कैद से छुड़ाने का संकल्प लेकर जा रहे थे । अंततः शिविर के कैदखाने के समीप जैसे ही ये डोले पहुँचे सभी सैनिक डोले पालकी से बाहर आये । यह छापामार लड़ाई थी जो गोरा बादल के नेतृत्व में लड़ी गई । किसी को अपने प्राणों का मोह न था वस राजा को मुक्त कराने का संकल्प था । इन सभी का बलिदान हो गया पर राजा मुक्त होकर सुरक्षित किले में पहुँच गये । यह 22 अगस्त 1303 का दिन था । राजा मुक्त होकर किले में आ तो गये थे । पर किले में राशन और सैन्य शक्ति दोनों का संकट था । सेना के अधिकांश प्रमुख सरदार राजा को मुक्त कराने की छापामार लड़ाई में बलिदान हो गये थे । इस घटना से बौखलाए अलाउद्दीन खिलजी का तोपखाना गरजने लगा । अंततः रानी द्वारा जौहरषऔर राजा रतनसिंह द्वारा शाका करने का निर्णय हुआ । 25 अगस्त 1303 से जौहर की तैयारी आरंभ हुई और रात को ज्वाला धधक उठी ।

पूरी रात किले के भीतर की सभी स्त्रियों ने अपने छोटे बच्चों को गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश कर लिया । 26 अगस्त के सूर्योदय तक किले के भीतर सभी नारियाँ अपने छोटे बच्चों को लेकर अग्नि में समा गईं इनकी संख्या सोलह हजार बताई जाती है । 26 अगस्त को ही किले के द्वार खोल दिये गये । जितने सैनिक किले में थे वे सब राजा रतनसिंह के नेतृत्व में केशरिया पगड़ी बाँधकर निकल पड़े। भीषण युद्ध हुआ पर यह युद्ध दिन के तीसरे तक ही चल पाया । राजा रतनसिंह का बलिदान हो गया । इस प्रकार 26 अगस्त को राजा ने अपने स्वत्व और स्वाभिमान रक्षा केलिये अंतिम श्वाँस तक युद्ध किया वहीं रानी पद्मावती ने सोलह हजार स्त्री और बच्चों के साथ स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया । इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी किले में घुसा उसे चारों ओर जल्ती अग्नि और राख के ढेर मिले । उसने किले में कत्लेआम का आदेश दिया । अलाउद्दीन खिलजी के इस अभियान का वर्णन अमीर खुसरो की रचना ‘खजाईन-उल-फुतूह’ (तारीखे अलाई) में मिलता है । इस विवरण के अनुसार खिलजी की फौज ने एक ही दिन में लगभग 30,000 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था । अलाउद्दीन खिलजी ने अपने बेटे खिज्र खाँ को चित्तौड़ का शासक नियुक्त किया और चित्तौड़ नाम ‘खिज्राबाद’ कर दिया था ।

रानी पद्मावती का जौहर स्थल आज भी चित्तौड़ में स्थित है । वहाँ लोग जाते हैं। श्रृद्धा सै शीश झुकाते हैं तथा रानी को सती देवी मानकर अपनी इच्छा पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।

भारत-यूएई व्यापार सम्मेलन और पुरस्कार समारोह

NPIC-2022513183623.jpg

MPIIF एवम् Dawn Media के सहयोग से इन्दौर में आयोजित भारत-यूएई व्यापार सम्मेलन और पुरस्कार समारोह की सफल समाप्ति की घोषणा करते हुए खुशी हो रही है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को मजबूत करना था और दोनों देशों से व्यापारों द्वारा किए गए उत्कृष्ट योगदानों को मान्यता देना था।

भारत-यूएई व्यापार सम्मेलन और पुरस्कार समारोह ने भारत और यूएई से प्रमुख सरकारी अधिकारियों, व्यापार नेताओं और उद्योग के विशेषज्ञों को एकत्रित किया। यह कार्यक्रम नेटवर्किंग, ज्ञान साझा करने और विभिन्न क्षेत्रों में नए व्यापार अवसरों की खोज करने के लिए एक मंच प्रदान करता है।

सम्मेलन के दौरान, महत्वपूर्ण पैनल चर्चाएं और सक्रिय सत्र आयोजित किए गए, जिनमें व्यापार नीतियों, निवेश अवसरों, नवाचार और सतत व्यापार प्रथाओं जैसे मुख्य क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया। प्रसिद्ध वक्ताओं ने अपनी विशेषज्ञता और अनुभव साझा करते हुए, भारत और यूएई के बीच सहयोग और विकास की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। मुख्य वक्ताओं का विवरण :-

1. हिज़ हाइनेस इन शेख़ मज़ीद अल मुअल्ला
2. डा. कबीरक के वी सी ओ ओ शेख़ मज़ीद अल मुअल्ला ग्रुप ऑफ़ कंपनीज़
3. माननीय कैलाश विजय वर्गीय जी नेशनल जनरल सेक्रेटरी भा. ज. प.
4. माननीय सांसद शंकर लालवानी जी
5. माननीय कैबिनेट मंत्री एम एस एमी श्री ओम प्रकाश सक्लेचा जी

सम्मेलन के तहत, भारत-यूएई व्यापार पुरस्कार प्रदान किए गए गए, जो दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने में उत्कृष्ट संगठनों और व्यक्तियों की मान्यता और सम्मान करने के लिए थे। पुरस्कार विभिन्न श्रेणियों में दिए गए थे, जिनमें शामिल थे:

1. व्यापार प्रशंसा में उत्कृष्टता – हिज़ हाइनेस इन शेख़ मज़ीद अल मुअल्ला
2. मध्यप्रदेश विशिष्ट सम्मान – क्रिकेटर आवेश ख़ान
3. महिला सशक्तिकरण एवम् जागरूकता सम्मान – श्रीमति जिया मंजरी जी
4. समाज सेवी सम्मान – एस्ट्रोलोजर श्री मीना सिंह चौहान जी
5. वरिष्ठ पत्रकार – महावीर जी

भारत-यूएई व्यापार पुरस्कारों के विजेता एक कठिन मूल्यांकन प्रक्रिया के माध्यम से चुने गए थे, जिसमें व्यापार की वृद्धि, बाजार प्रभाव, सततता प्रथाएं और सामाजिक योगदान जैसे कारकों को ध्यान में रखा गया था।
MPIIF भारत-यूएई व्यापार पुरस्कारों के सभी पुरस्कार विजेताओं को उनकी अद्भुत उपलब्धियों और भारत-यूएई आर्थिक संबंधों को मजबूत करने के लिए उनकी समर्पणशीलता और प्रयासों के लिए ह्रदय से बधाई देता है। उनका समर्पण और प्रयास अन्य व्यापार और व्यक्तियों के लिए प्रेरणा के रूप में सेवा करते हैं, जो दोनों देशों के विकास और समृद्धि में योगदान देना चाहते हैं।

हम भारत-यूएई व्यापार सम्मेलन और पुरस्कार समारोह को सफलतापूर्वक बनाने में सहयोग करने वाले सभी प्रतिभागियों, प्रायोजकों और साथियों का आभार व्यक्त करना चाहेंगे। उनका समर्थन और सक्रिय भागीदारी महत्वपूर्ण चर्चाओं को सुविधाजनक बनाने और मूल्यवान संपर्क बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

scroll to top