पत्रकार के घर हुई चोरी

115.jpg

एक वरिष्ठ पत्रकार के घर चोरी की वारदात बिहार के लखीसराय के बड़हिया थाना क्षेत्र में सामने आई है। चोरों ने तकरीबन 60 लाख की संपत्ति पर अपना हाथ साफ किया है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक, यह चोरी पत्रकार कल्याण सिंह के बड़हिया स्थित घर में हुई है। वे नोएडा स्थित सहारा समय में कार्यकारी संपादक के पद पर कार्यरत हैं।

घटना दो दिन पहले की बताई जा रही है। सोमवार को पहुंचे पीड़ित परिवार ने चोरी की गई संपत्ति का आंकलन किया और पुलिस को बताया कि चोरो ने करीब 60 लाख से ज्यादा के जेवरात, कैश और चांदी के बर्तन उड़ा लिए। इस बीच पुलिस ने खोजी कुत्ते की मदद से तफ्तीश शुरू कर दी है।

जानकारी के अनुसार, वारदात के वक्त घर में कोई भी नहीं था, क्योंकि घर के सभी सदस्य दिल्ली और बेगूसराय में थे। घर पर रहने वाली मां बहू के साथ तीन माह से बेगूसराय में बेटी के घर रह रही थी। घर के साथ ही कृषि कार्यों की देखरेख के लिए पास के ही ललित साव को जिम्मेदारी दी गई थी। शनिवार की दोपहर ललित भी किसी काम से बाहर चला गया था और जब अगले दिन रविवार की शाम वापस लौटा तो मुख्य दरवाजे पर लगा ताला टूटा पाया। अंदर जाकर देखा तो पाया कि मकान के अंदर स्थित सभी कमरों के ताले टूटे पड़े थे। संदूक और अलमीरा का सारा सामान कमरे में फैला हुआ था। घटना की सूचना तत्काल गृहस्वामी को दी गई, इसके बाद थाने में शिकायत दर्ज कराई गई।

गृहस्वामी की मां और पत्नी रविवार की सुबह बेगूसराय से वापस बड़हिया पहुंची। उन्होंने बताया कि मां के पुश्तैनी समेत दोनों बहू के सारे जेवरात संदूक के ही अंदर थे, जिसमें 80 तोले सोने के जेवरात, 10 किलो चांदी के बर्तन और 2 लाख रुपए नकद पड़े थे, जोकि गायब थे। इसके अलावा कुछ जरूरी दस्तावेज भी चोर ले गए।

पुलिस ने डॉग स्क्वायड की टीम के साथ ही घटना के बाद अपनी जांच शुरू कर दी। एक ही नहीं बल्कि आसपास के कुल तीन घरों में चोरी हुई है। इन एक घर में हुई चोरी का आकलन पूर्व में ही कर लिया गया था, लेकिन दो घरों में हुई चोरी के मामले में गृहस्वामी की अनुपस्थिति में आकलन नहीं हो सका था, जिस जगह पीड़ित कल्याण सिंह का घर है, वह एनएच 80 से महज 10 फीट की दूरी पर है। एक-दो नहीं बल्कि दस-दस कमरों के दरवाजे का ताला तोड़कर चोरों ने आसानी से पूरी घटना को अंजाम दे डाला और किसी को कुछ भनक तक नहीं लग सकी।

ज्यादातर बाल यौन शोषण के मामले की फाइल थाने में ही बंद हो जाती है – कैलाश सत्या्र्थी चिल्ड्रेन्स फाउंडेशन

114.1.png

कैलाश सत्‍यार्थी चिल्‍ड्रेन्‍स फाउंडेशन (केएससीएफ) ने अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। फाउंडेशन द्वारा जारी एक अध्ययन रिपोर्ट बताती हैं कि हर साल बच्चों के यौन शोषण के तकरीबन तीन हजार मामले निष्पक्ष सुनवाई के लिए अदालत तक पहुंच ही नहीं पाते। हर दिन यौन शोषण के शिकार चार बच्‍चों को न्याय से इसलिए वंचित कर दिया जाता है कि क्योंकि पुलिस पर्याप्‍त सबूत और सुराग नहीं मिलने के कारण इन मामलों की जांच को अदालत में आरोपपत्र दायर करने से पहले ही बंद कर देती है। बच्चों के यौन शोषण के खिलाफ प्रिवेन्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेन्सेस एक्ट (पॉक्सो) के तहत मामला दर्ज किया जाता है। भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन कार्यरत नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की साल 2019 की रिपोर्ट बताती है कि बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में उनके यौन शोषण के खिलाफ मामलों की हिस्सेदारी 32 फीसदी है। इसमें भी 99 फीसदी मामले लड़कियों के यौन शोषण के मामले होते हैं।   

अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर कैलाश सत्‍यार्थी चिल्‍ड्रेन्‍स फाउंडेशन ने “पुलिस केस डिस्‍पोजल पैटर्न: एन इन्‍क्‍वायरी इनटू द केसेस फाइल्‍ड अंडर पॉक्‍सो एक्‍ट 2012’’ और “स्टेट्स ऑफ पॉक्सों केस इन इंडिया” नामक दो अध्ययन रिपोर्ट तैयार किया है। यह अध्‍ययन रिपोर्ट साल 2017-2019 के बीच पॉक्‍सो मामलों के पुलिस निपटान के पैटर्न का विश्लेषण है। यह तथ्‍य नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर आधारित है जो हर साल क्राइम ऑफ इंडिया रिपोर्ट नाम से जारी जाती है। रिपोर्ट में पिछले कुछ सालों के तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि आरोपपत्र दाखिल किए बिना जांच के बाद पुलिस द्वारा बंद किए गए मामलों की संख्या में वृद्धि हुई है। पॉक्सो कानून के मुताबिक बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामले की जांच से लेकर अदालती प्रकिया एक साल में खत्म हो जानी चाहिए। यानी एक साल के भीतर ही पीड़ित को न्याय मिल जाना चाहिए। जबकि रिपोर्ट बताती है कि सजा की यह दर केवल 34 फीसदी है। इसकी वजह से अदालतों पर पॉक्सों के मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।

बच्‍चों का यौन शोषण सबसे जघन्य अपराधों में से एक है। यह अपराध समाज के लिए एक धब्बा है, क्योंकि यह मासूमों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने में विफल रहा है। आंकड़ों से पता चलता है कि देश में पिछले कुछ वर्षों में यौन अपराधों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। जबकि सरकार ने एक विशेष कानून की जरूरत को महसूस करते हुए ही पॉक्‍सो कानून बनाया था। लेकिन जमीन पर इसका प्रभाव और परिणाम अत्‍यंत निराशाजनक रहा है। सरकार ने बच्चों के यौन शोषण के मामले में अतिशीघ्र सुनवाई कर त्वरित गति से न्याय दिलाने के लिए 2018 में फास्टट्रैक कोर्ट बनाने की घोषणा की थी। लेकिन अभी तक इसे अमलीजामा नहीं पहनाया गया। आकड़े बताते हैं कि साल 2017 में पॉक्‍सो के तहत 32,608 मामले दर्ज किए गए जो 2018 में बढ़कर 39,827 हो गए। यह वृद्धि करीब 22 फीसदी थी। जबकि 2019 में यह संख्या बढ़कर 47,335 हो गई। साल 2018 के मुकाबले इसकी तुलना की जाए तो साल 2019 में पिछले के मुकाबले बच्चों के यौन शोषण के मामलों में 19 फीसदी की बढोत्तरी देखने को मिली।

पीडि़तों के न्‍याय को सुनिश्चित करने में आरोपपत्र दाखिल करना एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि यह निष्पक्ष सुनवाई और न्याय का मार्ग प्रशस्त करता है। नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यरो के आंकड़ों में यह देखा गया है कि पॉक्‍सो के तहत दर्ज कुल मामलों में से 6 फीसदी मामले सबूत का अभाव बताकर थाने की फाइलों में ही बंद कर दिए जाते हैं। जो मामले बिना आरोपपत्र दाखिल किए ही पुलिस द्वारा बंद किए गए थे, उनमें 40 फीसदी मामले सही थे। लेकिन, जांच में उसके पक्ष में पर्याप्‍त साक्ष्‍य या सुराग नहीं मिल पाए थे। चूंकि मामलों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, जिन्हें चार्जशीट दाखिल किए बिना बंद कर दिया गया। इसलिए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जांच ठीक से नहीं की गई थी। यह एक ऐसा संवेदनशील मसला है, जिसे पीड़ितों को न्याय दिलाने और बच्चों के प्रति यौन अपराधों की संख्या पर रोक लगाने के लिए तुरंत कार्रवाई करने की जरूरत है।

इसके अलावा केएससीएफ ने (2017 से 2019) पॉक्‍सो मामले में एक अन्य विश्लेषण का भी खुलासा किया है। जिसमें कहा गया है कि बाल यौन दुर्व्‍यवहार के पीड़ितों के न्‍याय को सुनिश्चित करने के लिए अदालतों को अपने न्याय वितरण तंत्र को तत्‍काल तेज करने की आवश्यकता है। पिछले मामले (बैकलॉग) भी अगले वर्ष में जांच के लिए मामलों की संख्या में वृद्धि कर रहे हैं। यह ऐसे गंभीर मामलों से निपटने के लिए पुलिस की प्रभावी भूमिका पर भी सवाल उठता है। इस प्रकार 2017 के बाद से जांच के लंबित मामलों में 2019 तक 44 फीसदी की वृद्धि हुई है। यह सालाना औसतन 15 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि के साथ यह जारी है। यदि लंबित मामलों में यह वृद्धि जारी रहती है तो लंबित मामलों की संख्या सात वर्षों में दोगुनी हो जाएगी।

स्टेट्स ऑफ पॉकसों केस इन इंडिया रिपोर्ट बताती है कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्‍तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली ऐसे राज्‍य हैं, जहां बच्चों के यौन शोषण यानी पॉक्सो के कुल मामलों में भागीदारी 51 फीसदी है। जबकि इन राज्यों में पॉक्सो मामले में सजा की दर 30 फीसदी से 64 फीसदी के बीच है, जो काफी कम है। एक हकीकत यह भी है कि जिन मामलों में पीड़ित वंचित और हाशिए के समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, उन मामलों में पीड़ित एफआईआर में वर्णित तथ्यों से किसी प्रभाव में आकर या किसी मजबूरी में समय आने पर अपने बयान को बदल देते हैं या सच से खुद मुकर जाते हैं।   

रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कैलाश सत्‍यार्थी चिल्‍ड्रेन्‍स फाउंडेशन की निदेशक ज्योति माथुर ने कहा, “पीडि़तों के न्‍याय को सुनिश्चित करने और प्रभावी ढंग से चुनौतियों का समाधान करने के लिए पॉक्‍सो के तहत पंजीकृत सभी मामलों को अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक या पुलिस उपायुक्त स्तर के वरिष्ठ अधिकारी द्वारा बारीकी से देखा जाना चाहिए। दूसरी ओर बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से संबंधित मामलों के बढ़ते हुए खतरों को देखते हुए इसकी जांच के लिए जिला स्तर पर एक समर्पित यूनिट की की भी आवश्यकता है। साथ ही पीड़ितों को शीघ्र न्याय दिलाने के लिए फास्टट्रैक और स्पेशल कोर्ट की जरूरत है। इसके अलावा यौन अपराध के शिकार बच्‍चों और महिलाओं को ऐसे प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों को भी मुहैया कराने की आवश्‍यकता है, जो उन्‍हें ऐसे आघातों से पार पाने में सहायता कर सकें। फाउंडेशन देश से बाल यौन शोषण के किसी भी खतरे को दूर करने के लिए सभी संबंधित हितधारकों को अपना पूर्ण समर्थन और सहयोग देगा।’’

चरैवेति चरैवेति…

113-6.jpg

साथी अजीत भारती के विदाई पर कुछ इस तरह याद किया अजीत झा ने

2021 की इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को एक पुरुष साथी अलग सफर पर निकला पड़ा तो मुझे सहसा ऐतरेय ब्राह्मण की याद आई। इसमें कहा गया है;

चरन् वै मधु विंदति चरन् स्वादुमुदंबरम

सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तंद्रयते चरंश्चरैवेति

यानी, चलते हुए मधु प्राप्त होता है। चलते हुए फल का स्वाद मिलता है। सूर्य की श्रेष्ठता देखो, चलते हुए उसे तंद्रा नहीं आती। चलते रहो।

तो हमारे एक साथी ने एक और नए सफर पर चलते रहना का आज आधिकारिक तौर पर फैसला कर लिया। वह फैसला जिसके बारे में मैं काफी समय से जानता था। जिसको लेकर आपमें से कई ने फोन कर, कुछ ने संदेश भेज मुझसे पूछा था। और मैं हमेशा कहता कि मुझे जानकारी नहीं। वे आज भी मेरे संपादक हैं और मुझे निर्देश दे रहे हैं।

तो अब आधिकारिक खबर यह है कि अजीत भारती मेरे संपादक से पूर्व संपादक हो गए हैं। मुझे सहसा जून 2019 का महीना याद आ गया। मैं करीब एक महीने बाद दिल्ली लौटा था और एक दिन शाम के वक्त एक नंबर पर कॉल मिलाया। नंबर के उस पार अजीत भारती थे। मैंने कहा कि फलाने आदमी से आपका नंबर मिला। उन्होंने कहा- अरे महराज मार्च में मेरी उनसे बात हुई थी, आपको अब याद आई है। आप कल आकर मिलिए। उन्होंने पता बताया और समय। अगले दिन मैं नियत जगह पर पहुंचा। वे एक केबिन में ले गए। सोफे पर बिठाया और खुद से मेज पर रखा कॉफी का मग और अन्य कूड़ा साफ करने लगे। फिर इधर-उधर की कई बातें हुई। मैंने पूछा कि काम के सिलसिले में कुछ पूछना हो। वे बोले- आप इतने अनुभवी हैं। क्या पूछना। आप बताइए कब से शुरू करेंगे? इसके बाद 7 मार्च 2021 तक यह सफर साथ-साथ चलता रहा। 

यह बेहतरीन सफर रहा! ऐसा सफर जिसे आप पूरी जिंदगी याद रखना चाहेंगे!

अजीत जी की चर्चाओं के साथ कुछ सवाल भी हैं। व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि राष्ट्रवादी पत्रकारिता को मजबूत करने की दिशा में अभी इतना काम करने की जरूरत है कि ढेर सारे वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध संस्थान खड़ा करना जरूरी है। इसलिए, अजीत जी के नए वेंचर से इस तरह की पत्रकारिता को कोई नुकसान नहीं होगा। यह और समृद्ध होगा। इससे ऑप इंडिया के विचारों को भी और विस्तार मिलेगा।

इसलिए, यह वक्त किंतु-परंतु का नहीं। दुख या अवसाद का नहीं। उल्लास का है! DO Politics को भी वैसा ही दुलार और सहयोग दें, जैसा आप ऑप इंडिया को देते रहे हैं। हां, रोजमर्रा की जीवन में डोंट डू पॉलिटिक्स!

चलते-चलते बाबा नागार्जुन याद आ रहे हैं। उन्होंने कहा था, 

पुरजन, परिजन के छोड़ि छाड़ि

पातिल पुरहर के फोड़ि फाड़ि

हम जा रहल छी आन ठाम

आन ठाम, यानी दूसरी जगह। लेकिन इससे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि हम उस परंपरा के लोग हैं जो दूसरी जगह जाते वक्त भी पातिल पुरहर (पत्राच्छादित कलश) को नहीं फोड़ते।  

नई सफर की हृदय से शुभकामनाएं। मां उच्चैठ भगवती आपको और प्रखरता दें।

पहली बार हुई इस देश में ट्रांसजेंडर न्यूज एंकर की नियुक्ति

113-5.jpg

पहली बार बांग्लादेश में एक ट्रांसजेंडर को न्यूज एंकर के पद पर नियुक्त किया गया है। बांग्लादेश की आजादी के 50 साल पूरे होने पर ‘बोइशाखी टीवी’ चैनल ने ट्रांसजेंडर तश्नुवा आनन शिशिर को न्यूज एंकर के तौर पर नियुक्ति दी है।

मीडिया खबर के अनुसार, तश्नुवा एक मॉडल और एक्टर भी हैं और वह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस यानी आठ मार्च से न्यूज एंकर के रूप में अपनी पारी की शुरुआत करेंगी। तश्नुवा ने 2007 में थिएटर मंडली नटुआ के साथ अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी। वह दो साल से अधिक समय तक थिएटर मंडली बोटटोला का हिस्सा रही हैं और कई प्रस्तुतियों में अहम भूमिका निभाई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार ‘बोइशाखी टीवी’ चैनल के जनसंपर्क अधिकारी दुलाल खान का कहना है, ‘ हमने स्वतंत्रता स्वर्ण जयंती की पूर्व संध्या और महिला दिवस पर दो ट्रांसजेंडर महिलाओं को अपने चैनल की न्यूज और नाटक टीम में नियुक्त किया है। यह पहली बार है जब देश के लोग एक ट्रांसजेंडर को न्यूज एंकरिंग करते हुए देखेंगे। ऐसा स्वतंत्रता के 50 वर्षों में पहले कभी नहीं हुआ है।’

scroll to top