श्रीकृष्ण जेन-जी के सच्चे मार्गदर्शक

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विजय मनोहर तिवारी

भोपाल। गीता कोई धार्मिक ग्रंथ है ही नहीं। वह मनोविज्ञान की संसार की सबसे पुरानी किताब है। जैसे अशोका सही नहीं है, अशोक ही सही है। उसी तरह गीता भी गीता नहीं एक गीत है, एक कविता है। आज के जेन-जी के अगर कोई ईश्वर हो सकते हैं तो वो केवल श्रीकृष्ण हैं। गीता जेन-जी के लिए ही है। क्योंकि आज के युवा को तर्क चाहिए। यथार्थ में वह जीता है। गीता उसके लिए सच्चा मार्गदर्शन करती है।

डॉ. विजय अग्रवाल का यह परिचय सब जानते हैं कि वे भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति रहे डॉ. शंकरदयाल शर्मा के साथ दस साल ओएसडी के रूप में रहे हैं। वे प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो के अधिकारी थे मगर उसके पहले पाँच साल एक कॉलेज में पढ़ाया भी। उनकी लिखी किताबों की सूची लंबी है, जिसमें श्रीराम, हनुमान और गीता से लेकर समय प्रबंधन जैसे विषय शामिल हैं। गुरुजनों के लिए गीता विषय पर उन्हें सुनना अपनी ही विरासत से अपना जोड़ और मजबूत करने का अनुभव रहा।

वे कहते हैं कि गीता मनुष्य के पहचान के संकट की समस्या को संबोधित करती है। यही महाभारत की समस्या है। कुरुक्षेत्र में अर्जुन की पहचान एक योद्धा की है। वह सशस्त्र होकर आया है युद्ध के लिए। मगर आते ही विरक्त हो रहा है। अपनी पहचान से दूर हो रहा है। अपनी पहचान भूल रहा है। अब उसे सारे कौरव अपने संबंधी दिखाई पड़ रहे हैं और युद्ध की व्यर्थता पर विचार कर रहा है। अर्जुन के सारे तर्क थोथे हैं। हास्यास्पद हैं। एक प्रकार से विदुर को छोड़कर महाभारत के सारे पात्र इसी समस्या में पड़े हैं।

यह आज के युग में हम सबकी समस्या है। अर्जुन, कर्ण, भीष्म सहित सभी पात्र जीवन में हम सबके भीतर इसी संकट में डाले हुए रखते हैं। हम अपने मूल स्वभाव में नहीं होते। गीता यहीं हमें थामती आई है। वह कहती है कि अपने कर्म को ठीक से करें। वही आपका धर्म है। और अपने धर्म में मृत्यु परधर्म से श्रेष्ठ है।
गुरुजनों के लिए डॉ. अग्रवाल कहते हैं कि वह केवल एक विषय ही नहीं पढ़ाता। वह विषय के बहाने बहुत कुछ पढ़ाता है। जीवन का सार पढ़ाता है। तत्वज्ञानी का मतलब है ज्ञानवान होना और तत्वदर्शी का अर्थ है व्यावहारिक ज्ञान से अनुभव संपन्न होना।

उज्जैन में कृष्ण केवल 64 दिन रहे और 64 कलाओं में निष्णात होकर निकले। वह व्यावहारिक ज्ञान में पारंगत यहाँ हुए और उसके बाद वाराणसी जाकर घोर अंगीरस नाम के ऋषि से सांख्य दर्शन सीखा। व्यावहारिक ज्ञान और दार्शनिक ज्ञान के बाद ही गीता कही उन्होंने। एक गहराई उसमें है, जिसके कारण व्याख्या की जरूरत पड़ती है। हर श्लोक में कृष्ण का अनुभव झलकता है। गीता के 700 श्लोकों में से 574 श्लोक कृष्ण के हैं। 84 अर्जुन के।
अंत में वे अर्जुन से पूछते हैं-“तुमने मेरी बातों को ध्यान से सुना?’ अर्जुन कहता है-“अमृत की बूंदों की तरह ग्रहण किया है।’ तब कृष्ण उत्तर देते हैं-“अब जो इच्छा हो वह करो। अब निर्णय तुम लो।’

गीता हमारे जीवन का मैनुअल है। गीता कहती है कि ज्ञान से पवित्र इस धरती पर कुछ नहीं है। गीता में कृष्ण का कथन है-“ज्ञान के माध्यम से जो मेरी पूजा करता है, वही मेरी सच्ची पूजा है।’

कृष्ण अपने विराट रूप दर्शन में संसार की प्रत्येक रचना में स्वयं को श्रेष्ठतम रूप में परिभाषित करते हैं। हाथियों में एरावत, पर्वतों में हिमालय। मगर पांडवों में स्वयं को युधिष्ठिर नहीं बताते। कहते हैं पांडवों में मैं अर्जुन हूं। यह एक व्यावहारिक संकेत है कि यदि काम अभी अर्जुन से लेना है तो अर्जुन को ही संबोधित होना है। अर्जुन को उनके हर संबोधन- पार्थ या कौंतेय के अपने अर्थ हैं। हर संबोधन अर्जुन को किसी स्मृति से जोड़ रहा है ताकि वह अपने स्वभाविक धर्म को पहचाने और सारी दुविधा से बाहर आकर अपने कर्म में लग जाए।

श्रीकृष्ण द्वारिका जाने के पहले हस्तिनापुर में अर्जुन ने पूछा-“आप द्वारिका जा रहे हैं। कुरुक्षेत्र का ज्ञान स्मृतियों में धुंधला गया है। कृपया वही ज्ञान एक बार फिर से दें।’ कृष्ण कहते हैं- “कुरुक्षेत्र के कृष्ण को हस्तिनापुर के महलों में ढूँढ रहे हो।’ इसका अर्थ है कि कृष्ण संकेत कर रहे हैं कि कोई भी दार्शनिक विचार परिस्थितिजन्य होता है। ऐसा नहीं कि कभी भी कहीं भी कुछ भी बोल दिया।

“कृष्ण नाम के बादल में जो कुछ भी था वह कुरुक्षेत्र के मैदान में गीता के रूप में बरस गया।’

(डॉ. विजय अग्रवाल भोपाल में रहते हैं। सिविल सेवाओं की तैयारी करने वालों के लिए यूट्यूब पर उनके वीडियो उपलब्ध हैं। उनकी किताबें ऑनलाइन उपलब्ध हैं।)

कालिदास की रचनाओं में स्त्री केवल सौंदर्य का विषय नहीं है – गजेंद्र सिंह शेखावत

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अनुराग पुनेठा

नई दिल्ली : इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के कलानिधि प्रभाग द्वारा लेखक युगल जोशी की पुस्तक ‘कहो कालिदास!’ का लोकार्पण एवं पुस्तक परिचर्चा कार्यक्रम मंगलवार को नई दिल्ली स्थित आईजीएनसीए के समवेत सभागार में आयोजित किया गया। पुस्तक का प्रकाशन मंजुल प्रकाशन द्वारा किया गया है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत थे। अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय ने की। नीति आयोग की सदस्य डॉ. जोराम आनिया विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। कलानिधि प्रभाग के अध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार ने स्वागत एवं परिचय भाषण दिया। पुस्तक के लेखक श्री युगल जोशी ने पुस्तक की रचना-प्रक्रिया और विषय-वस्तु पर अपने विचार साझा किए।

इस अवसर पर वक्ताओं ने कालिदास के साहित्य, उनके रचनात्मक व्यक्तित्व और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में उनके महत्त्व पर विचार व्यक्त किए। श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि मनुष्य के जीवन के साथ जो बात शाश्वत रूप से जुड़ी है, जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है, वह है कल्पना। उन्होंने कहा, यह केवल पुस्तक के विमोचन का अवसर नहीं है, बल्कि हम सब का यहां एकत्र होना कालिदास के उस ऐतिहासिक मौन को स्वर देना है, जो सदियों से उनके व्यक्तित्व और जीवन के अनजाने पक्षों के इर्द-गिर्द पसरा हुआ है। कालिदास के जीवन के प्रामाणिक विवरण सीमित हैं, इसलिए लेखक ने उनकी रचनाओं के भीतर निहित भाव, संकेतों के माध्यम से उनके संभावित जीवन और संवेदनाओं को समझने का प्रयास किया है।

उन्होंने कहा, साहित्य, कला और संस्कृति के सृजनकर्ता अपनी रचनात्मकता के माध्यम से समाज को प्रेरित करते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर का निर्माण करते हैं। ‘कहो कालिदास!’ शीर्षक अपने आप में एक आत्मीय पुकार है, जो वर्तमान समय से कालिदास के साथ संवाद स्थापित करती है। पुस्तक में कालिदास के जीवन, उनकी रचनाओं, प्रेम, विरह, उत्तरदायित्व, प्रकृति और विशेष रूप से उनके स्त्री पात्रों के विविध आयामों को नए दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया गया है। उन्होंने कहा कि इतिहास यह पूछता है कि क्या हुआ, कब और कहां हुआ, जबकि साहित्य यह जानने का प्रयास करता है कि मनुष्य के मन में क्या घटित हुआ। इसी अर्थ में साहित्य संवेदना, कल्पना और कथा के माध्यम से इतिहास के अनछुए पक्षों को समझने का अवसर देता है।

केन्द्रीय संस्कृति मंत्री ने आगे कहा, कालिदास की रचनाओं में स्त्री केवल सौंदर्य का विषय नहीं है। महाकवि ने अपनी विभिन्न रचनाओं में स्त्री पात्रों के माध्यम से नारी को चेतना, गरिमा, प्रेम आदि के प्रतीक के रूम में स्थापित किया है। उन्होंने कहा, ‘कहो कालिदास!’ के लेखक युगल जोशी को इस रचनात्मक प्रयास के लिए बधाई देते हुए उम्मीद जताई कि पुस्तक का व्यापक रूप से पाठ हो और उस पर संवाद हो, ताकि पाठकों को कालिदास को नए दृष्टिकोण से समझने का अवसर मिले।

श्री रामबहादुर राय ने कहा, ‘कहो कालिदास!’ महाकवि कालिदास के जीवन की औपन्यासिक प्रस्तुति है। उन्होंने कहा, कालिदास देश-काल की सीमाओं से परे हैं। वह केवल भारत के कवि नहीं, बल्कि वैश्विक कवि हैं। कालिदास ने जो साहित्य रचा, वह हर देश, हर काल, हर व्यक्ति और हर समाज के लिए है। उनका साहित्य युवा मन की आशा, उमंग, वेदना और विरह की कलात्मक अभिव्यक्ति है। यह पुस्तक बहुत सामयिक है और अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।

डॉ. जोराम आनिया ने पुस्तक की विस्तृत समीक्षा करते हुए कहा, पुस्तक का शीर्षक ‘कहो कालिदास!’ संबोधन नहीं है, बल्कि कालिदास से संवाद करता है। कालिदास के बारे में इतिहास मौन है, लेकिन उनकी रचनाएं उनके बारे में बोलती हैं। ‘कहो कालिदास!’ एक ऐसी कृति है, जो कालिदास के जीवन के अज्ञात अंधकार पर लेखक की कल्पना से रोशनी डालने का प्रयास करती है। आज के समय यह उपन्यास कालिदास का पुनर्पाठ है। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद कालिदास के साहित्य को पढ़े बिना नहीं रहा जा सकता।

लेखक युगल जोशी ने पुस्तक की अंतर्वस्तु के बारे में बात करते हुए कहा, प्रसिद्ध लेखक गेटे ने कालिदास के बारे में कहा था – यदि स्वर्गलोक को और मानव लोक को देखा जा सकता है, तो वह कालिदास के ‘शाकुंतलम्’ में ही संभव है। उन्होंने आगे कहा, मिथिला वाले कालिदास को अपने यहां का मानते हैं। उज्जैन वाले उन्हें अपना कहते हैं। उत्तराखंड के लोग भी ऐसा ही समझते हैं। देश के हर जगह के लोग उन्हें अपने यहां का कहते हैं, लेकिन कालिदास पूरे देश के हैं। ‘कहो कालिदास!’ महाकवि कालिदास पर आधारित उपन्यास है।

कार्यक्रम में साहित्य, कला, संस्कृति और अकादमिक जगत से जुड़े अनेक लोग उपस्थित रहे। मंच संचालन श्री मंजीत ठाकुर ने किया और मंजुल प्रकाशन के श्री सुशांत झा ने कार्यक्रम के अंत में अतिथियों और उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त किया।

 

मनोज बाजपेयी का ने ऐसा जवाब दिया कि वीडियो रोककर बार बार सुना

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आस्था नंद पाठक

लखनऊ। मनोज बाजपेयी का, समधीश के साथ एक इंटरव्यू देख रहा था। समधीश ने उनसे एक बहुत सामान्य सा प्रश्न पूछा कि आज जब आप जिंदगी में एक मुकाम पर आ चुके हैं, इतना कुछ हासिल कर चुके हैं तो अब आपको क्या चीज ‘ड्राइव’ करती है?

मनोज बाजपेयी ने इसका जो उत्तर दिया, वह इतना सहज, इतना गहरा और इतना मार्मिक लगा कि वीडियो रोककर बार बार सुनना पड़ा…
उन्होंने कहा कि किसी मुकाम तक आने के लिए मैं थोड़ी एक्टिंग कर रहा था…एक्टिंग तो इसलिए कर रहा था कि जिंदगी में कुछ ऐसा होना चाहिए कि लगे कि अगर ये नहीं किया तो मर जाएंगे…और इसीलिए मैं एक्टिंग कर रहा हूँ!

कितनी सीधी सरल बात है…लेकिन मुझे लगा जैसे एक अभिनेता ने एक दो वाक्य में गीता का मर्म समझा दिया हो।
मनोज बाजपेयी मुझे हमेशा से बहुत पसंद रहे हैं। उनकी सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि से निकलकर इस मुकाम तक पहुँचने की संघर्षपूर्ण यात्रा तो प्रभावित करती ही है लेकिन उससे कहीं ज्यादा उनका इंटेलेक्ट, उनकी संवेदनशीलता और जीवन को देखने का उनका दार्शनिक नजरिया मुझे प्रभावित करता रहा है।

मैंने जीवन में पैशन (Passion) और अपने ‘स्व’ (Self) को पहचानने को लेकर पहले भी कई बार लिखा है। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि ईश्वर ने हर व्यक्ति को इस संसार में किसी न किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए भेजा है। हर व्यक्ति के अंदर कुछ न कुछ ऐसा जरूर है जो उसका अपना है, जो दूसरे से अलग है और जिसे शायद वह दुनिया के किसी दूसरे काम से बेहतर कर सकता है। मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी चुनौती पैसा, पद या प्रसिद्धि हासिल करना नहीं बल्कि अपने अंदर छिपे उसी व्यक्ति को खोज लेना है।

मनोज बाजपेयी की इस एक बात ने उसी विचार को कितनी खूबसूरती से कह दिया कि जिंदगी में कुछ ऐसा होना चाहिए कि अगर ये नहीं किया तो मर जाएंगे…
जरा सोचिए कि जीवन में वह कौन सा काम है जिसके लिए आपके अंदर ऐसी बेचैनी है? कौन सा काम है जिसे करते हुए आपको समय का पता नहीं चलता? कौन सा काम है जिसे करने के बाद शरीर भले थक जाए लेकिन मन प्रसन्न हो जाता है? और वह कौन सा काम है जिसे न कर पाने की कल्पना मात्र से आपको लगता है कि जीवन में कुछ बहुत जरूरी छूट रहा है?

शायद उसी सवाल के उत्तर के आसपास आपके जीवन का उद्देश्य छिपा हुआ है…
दुर्भाग्य यह है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था, परिवार और समाज हमें बचपन से यह जानने का अवसर ही बहुत कम देते हैं कि हम वास्तव में हैं कौन और करना क्या चाहते हैं। इसके बजाय बहुत जल्दी यह तय कर दिया जाता है कि हमें क्या बनना चाहिए। कोई डॉक्टर बनेगा, कोई इंजीनियर, कोई IAS…और इस पूरी प्रक्रिया में कई बार डॉक्टर बनाने के चक्कर में एक बेहतरीन संगीतकार मर जाता है, IAS बनाने के चक्कर में एक शानदार लेखक या अभिनेता और इंजीनियर बनाने के चक्कर में कोई असाधारण खिलाड़ी…

और जब तक हमें अपने अंदर के उस व्यक्ति का पता चलता है तब तक हम सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों के इतने मजबूत साँचे में ढल चुके होते हैं कि उससे बाहर निकलना बहुत कठिन हो जाता है। फिर हमारे पास अच्छी नौकरी होती है, अच्छा पद होता है, घर गाड़ी और सामाजिक प्रतिष्ठा सब कुछ होता है, लेकिन कई बार अंदर से लगातार एक आवाज आती रहती है कि

“मैं शायद इसके लिए बना ही नहीं था…”
मैं अपने पिछले लेख में मजाक में लिख चुका हूँ कि कल्पना कीजिए मनोज बाजपेयी अपने अंदर के अभिनेता को मारकर किसी प्रतियोगी परीक्षा में सफल होकर भभुआ के कलेक्टर हो गए होते…सचिन तेंदुलकर मेडिकल की पढ़ाई करके बांद्रा के प्रसिद्ध हड्डी रोग विशेषज्ञ होते…महेंद्र सिंह धोनी रेलवे में TTE से विभागीय पदोन्नति पाते हुए आज किसी मंडल के DRM होते और बिस्मिल्लाह खान शहनाई छोड़कर वाराणसी के सबसे बड़े ‘खान ज्वेलर्स’ के मालिक होते…
ये सारे लोग तब भी हमारे सामाजिक पैमानों पर सफल ही कहलाते…अच्छा पैसा कमाते, प्रतिष्ठित जीवन जीते और शायद उनके परिवार वाले भी बहुत खुश होते…
लेकिन फिर ये दुनिया कितनी बदरंग होती…कितनी बेनूर होती..

और ये लोग स्वयं भी अपने भीतर कहीं उतने ही अधूरे होते।
इसीलिए भारतीय दर्शन में ‘स्व’ की पहचान पर इतना जोर दिया गया है। गीता का स्वधर्म हो, उपनिषदों का ‘स्वयं को जानने’ का आग्रह हो या पाश्चात्य दर्शन का ‘Know Thyself’…अंततः बात एक ही है कि सबसे पहले यह पता लगाइये कि आप वास्तव में हैं कौन और ईश्वर ने आपके हिस्से कौन सा काम सोच रखा है!
इसका अर्थ कतई यह नहीं है कि हर व्यक्ति कल सुबह अपनी नौकरी छोड़कर अपने passion के पीछे भागने लगे। जीवन की अपनी व्यावहारिकताएँ हैं, जिम्मेदारियाँ हैं और पेट पालने की आवश्यकता भी है। लेकिन इन व्यावहारिकताओं के नाम पर अपने अंदर की उस आवाज को हमेशा के लिए मार देना भी तो जीवन नहीं हो सकता। नौकरी करते हुए भी उसे खोजा जा सकता है, समय निकालकर उस दिशा में काम किया जा सकता है और धीरे धीरे अपने जीवन को उस तरफ मोड़ा जा सकता है जहाँ काम केवल जीविका कमाने का साधन न रहकर ‘आनंद का स्रोत’ भी बन जाए।

स्टीव जॉब्स ने Stanford के अपने प्रसिद्ध भाषण में कहा था- “Stay Hungry, Stay Foolish” और इसी भाषण में उन्होंने यह भी कहा था कि अगर अभी तक वह नहीं मिला है जिसे आप सचमुच प्रेम करते हैं तो तलाशते रहिए, settle मत होइए…

शायद मनोज बाजपेयी भी बिल्कुल वही बात अपने तरीके से कह रहे हैं।
ढूंढते रहिए उस काम को जिसे करने के लिए आपको किसी motivation की जरूरत न पड़े…जिसे करने के लिए सोमवार की सुबह बोझ न लगे…जिसमें असफल होने के बाद भी अगली सुबह फिर वही करने का मन करे…और जिसके बारे में एक दिन आप पूरे विश्वास से कह सकें कि अगर जिंदगी में ये नहीं किया तो फिर जिंदगी जी ही किसलिए…

सफलता मिले या न मिले, प्रसिद्धि मिले या न मिले, यह बहुत बाद की बात है। लेकिन अगर जीवन के किसी मोड़ पर आपने अपने हिस्से का वह काम खोज लिया जिसके लिए आपका मन कहे कि “हाँ, यही है जिसके लिए मैं बना हूँ”, तो मेरे विचार से आप दुनिया के सबसे भाग्यशाली लोगों में शामिल हो जाएंगे.
नीचे मनोज बाजपेयी के साक्षात्कार का वह अंश है…….उसे बार बार जरूर सुनिएगा।
वीडियो बहुत छोटा है, बात साधारण सी है, लेकिन सवाल बहुत बड़ा छोड़ जाती है-
“क्या मैं जिंदगी में वही कर रहा हूँ, जिसके लिए मैं बनाया गया हूँ?”

— सोशल मीडिया से साभार

मोदी के मैजिक मंत्र : विचारों को राष्ट्रीय मिशन में बदलने की संचार कला

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(A Mass Communication Study)
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दिल्ली : देश अपने घरों में बंद था। सड़कें सुनसान थीं, बाजार खामोश थे और कोरोना का डर हर दिमाग में पहुंच चुका था। इसी माहौल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टेलीविजन पर देश को संबोधित किया।
शाम पांच बजे ताली, घंटी या थाली बजाने की अपील हुई। कुछ दिन बाद रात नौ बजे नौ मिनट तक दीया, मोमबत्ती या मोबाइल की रोशनी जलाने का संदेश आया।
इन अपीलों पर बहस हुई। उनके प्रभाव को लेकर अलग-अलग राय भी सामने आई। लेकिन संचार के स्तर पर संदेश स्पष्ट था: समय तय था, निर्देश सरल थे और नागरिक की भूमिका साफ थी।
यहीं से नरेंद्र मोदी की राजनीतिक संचार शैली को समझने का एक रास्ता मिलता है। पिछले एक दशक से अधिक समय में उन्होंने नीतियों, योजनाओं और राष्ट्रीय लक्ष्यों को छोटे सूत्रों, नारों और याद रहने वाले वाक्यों में प्रस्तुत किया है।
3S, 5T, 5F, पंच प्रण और सप्तधारा इसके उदाहरण हैं।
ग्रामीण विकास, कौशल, तकनीक, आत्मनिर्भरता या विकसित भारत; इन विषयों को अक्सर कुछ शब्दों में समेटा जाता है। लक्ष्य, दिशा और नागरिक की भूमिका एक साथ रखी जाती है।
यही मास कम्युनिकेशन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है: जटिल विचार को सरल संदेश में बदलना।
तीन, पांच और सात का सूत्र
5T—Talent, Tradition, Tourism, Trade और Technology में विकास के पांच क्षेत्रों को एक साथ रखा गया।
Talent और Technology भविष्य की ओर संकेत करते हैं। Tradition और Tourism सांस्कृतिक विरासत को आर्थिक गतिविधि से जोड़ते हैं। Trade बाजार और व्यापार का पक्ष सामने लाता है।
इसी तरह 3S: Speed, Skill और Scale विकास के तीन पहलुओं को संक्षेप में रखता है।
गति चाहिए। कौशल चाहिए। और काम बड़े पैमाने पर होना चाहिए।
5F: Farm, Fibre, Fabric, Fashion और Foreign कृषि से निर्यात तक की वैल्यू चेन को पांच शब्दों में पेश करता है।
एक और यादगार सूत्र है:
IT + IT = IT
Indian Talent + Information Technology = India Tomorrow.
ऐसे सूत्रों की ताकत उनकी संक्षिप्तता में है। वे किसी लंबे भाषण का विकल्प नहीं हैं, लेकिन पूरे विचार को याद रखने का माध्यम बन सकते हैं।
नारे और स्मृति
Reform, Perform, Transform सुधार, प्रदर्शन और बदलाव को एक क्रम में रखता है।
Per Drop More Crop जल और कृषि के संबंध को चार शब्दों में व्यक्त करता है।
Make in India, Atmanirbhar Bharat और Vocal for Local उत्पादन, आत्मनिर्भरता और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़े विचारों को अलग-अलग अभियानों के रूप में सामने लाते हैं।
इसी तरह सबका साथ, सबका विकास बाद में सबका विश्वास और सबका प्रयास से विस्तृत हुआ।
चार शब्द: साथ, विकास, विश्वास और प्रयास, एक राजनीतिक संदेश को याद रखने योग्य रूप देते हैं।
भाजपा संगठन के संदर्भ में बताए गए सात शब्द: सेवाभाव, संतुलन, संयम, समन्वय, सकारात्मकता, संवेदना और संवाद, भी इसी भाषायी तकनीक का उदाहरण हैं। विपक्ष इस कला को जुमलेबाजी कहता है।
समान ध्वनि और क्रमबद्धता स्मृति को आसान बनाते हैं। यहां भाषा सिर्फ सूचना नहीं देती। वह सूचना को याद रखने योग्य बनाती है।
कोविड और सहभागी संचार
कोविड महामारी के दौरान संचार शासन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। देश में भय था, आर्थिक गतिविधियां बंद थीं और स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव था।
जनता कर्फ्यू की अपील के बाद कोरोना योद्धाओं के सम्मान में ताली, घंटी और थाली बजाने का संदेश आया। फिर 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा हुई।
लॉकडाउन समझाने के लिए लक्ष्मण रेखा का रूपक इस्तेमाल किया गया।
घर आपकी सीमा है। बाहर न निकलें। संक्रमण की कड़ी तोड़ें।
इसके बाद नौ बजे नौ मिनट की अपील आई। बत्तियां बुझाने और रोशनी जलाने का साझा प्रतीक बनाया गया।
सात बिंदुओं वाली अपील में बुजुर्गों की सुरक्षा, सामाजिक दूरी, गरीबों की मदद, कर्मचारियों की चिंता और कोरोना योद्धाओं के सम्मान जैसे विषय शामिल थे।
इन संदेशों में एक महत्वपूर्ण संचार तत्व था: नागरिक को दर्शक नहीं, सहभागी बनाना।
सरकार क्या कर रही है, यह बताने के साथ नागरिक से यह भी कहा गया कि वह क्या कर सकता है।
मास कम्युनिकेशन में इसे सहभागी संचार की दृष्टि से देखा जा सकता है।
संकट से विकसित भारत तक
मोदी की संचार शैली केवल तत्काल संकटों तक सीमित नहीं रही। बाद में यही तकनीक दीर्घकालीन लक्ष्यों के लिए इस्तेमाल हुई।
पंच प्रण में 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य, औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति, विरासत पर गर्व, एकता और नागरिक कर्तव्य जैसे विषय शामिल किए गए।
2047 एक लंबी समय-सीमा है। पंच प्रण उसे पांच बिंदुओं में व्यवस्थित करता है।
इसी तरह Demography, Democracy और Diversity को भारत की तीन प्रमुख शक्तियों के रूप में प्रस्तुत किया गया।
दूसरी ओर भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टीकरण जैसे राजनीतिक मुद्दों को भी तीन के ढांचे में रखा गया।
फिर आया सप्तधारा का विचार। इसमें मैन्युफैक्चरिंग, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण, तकनीक और नवाचार, कनेक्टिविटी, रक्षा, ग्रीन और ब्लू इकोनॉमी तथा भारत की सॉफ्ट पावर को विकास की अलग-अलग धाराओं के रूप में रखा गया।
यहां एक और संचार तकनीक दिखाई देती है; परंपरागत प्रतीकों को आधुनिक नीतिगत भाषा से जोड़ना।
सप्त सिंधु जैसी सांस्कृतिक स्मृति के साथ आधुनिक विकास की सात धाराओं को जोड़ा जाता है।
इस तरह कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम टेक्नोलॉजी और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे विषयों के साथ योग, आयुर्वेद, संस्कृति और पर्यटन भी राष्ट्रीय विकास की भाषा में शामिल होते हैं।
मोदी से
आगे की संचार शैली
सूत्रों और संक्षिप्त अवधारणाओं का इस्तेमाल केवल प्रधानमंत्री तक सीमित नहीं है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बदलती वैश्विक व्यवस्था को 3Cs: Competition, Conflict और Choke Points जैसे ढांचों में समझाया है।
इसी संदर्भ में Derisking और Diversification जैसे शब्द वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति को समझाने के उपकरण बने हैं।
Just in Time से Just in Case की ओर बदलाव भी इसी तरह एक जटिल आर्थिक विचार को एक छोटे वाक्य में ढालता है।
यह दिखाता है कि संक्षिप्त सूत्र अब भारतीय सार्वजनिक नीति की भाषा का हिस्सा बन रहे हैं।
मगर नारा शासन नहीं होता है; यहीं इस संचार शैली की सीमा पर भी ध्यान देना जरूरी है।
नारा नीति का विकल्प नहीं है। संदेश कारखाना नहीं बनाता। मंत्र रोजगार पैदा नहीं करता। कोई आकर्षक वाक्य नदी को साफ नहीं कर सकता।
अंततः किसी भी नीति का मूल्यांकन उसके परिणामों से ही होगा ।
सरकारी दावों की जांच जरूरी है। आर्थिक आंकड़ों की समीक्षा जरूरी है। पत्रकारों, विशेषज्ञों, नागरिकों और विपक्ष को सवाल पूछने का अधिकार है। संचार लोगों को किसी नीति या अभियान से जोड़ सकता है। लेकिन उसकी सफलता का अंतिम पैमाना उसका वास्तविक प्रभाव है।
इसलिए प्रभावी राजनीतिक संचार और प्रभावी शासन को एक ही चीज नहीं माना जा सकता।
संक्षिप्तता का विज्ञान
भारत जैसे विशाल और विविध देश में सार्वजनिक संचार की सबसे बड़ी चुनौती है; एक ही संदेश को करोड़ों लोगों तक पहुंचाना।
इसके लिए भाषा सरल होनी चाहिए। संदेश दोहराया जा सके। नागरिक को अपनी भूमिका समझ में आए। और विचार इतना छोटा हो कि वह भाषण से निकलकर रोजमर्रा की बातचीत में पहुंच सके।
भारत में छोटे राजनीतिक नारों की परंपरा पुरानी है। गांधी के दौर में भारत छोड़ो और करो या मरो जैसे वाक्यों ने बड़े आंदोलनों को भाषा दी।
आज माध्यम बदल गए हैं। टेलीविजन, मोबाइल, यूट्यूब और सोशल मीडिया ने संचार की गति कई गुना बढ़ा दी है।
लेकिन मूल सिद्धांत वही है:
एक विचार। एक उद्देश्य। एक स्पष्ट भूमिका।
मोदी के 3S, 5T, 5F, पंच प्रण, सप्तधारा और Per Drop More Crop जैसे सूत्र इसी दृष्टि से मास कम्युनिकेशन के अध्ययन के उपयोगी उदाहरण हैं।
इनका महत्व केवल इस बात में नहीं है कि वे आकर्षक हैं। उनका महत्व इस बात में है कि वे जटिल विचारों को संक्षिप्त, दोहराने योग्य और याद रखने योग्य बनाते हैं।
एक संदेश अखबार की हेडलाइन बनता है। फिर टीवी की पट्टी। फिर सोशल मीडिया पोस्ट। फिर व्हाट्सऐप संदेश। अंततः वह आम बातचीत का हिस्सा बन सकता है।
यही किसी राजनीतिक संदेश की संचार-यात्रा है।
एक अच्छा वक्ता लोगों को सोचने के लिए विचार देता है।
एक प्रभावी संचारक उस विचार को याद रखने योग्य बनाता है।
और सफल सार्वजनिक संचार तब होता है, जब याद किया गया विचार कार्रवाई से जुड़ जाए।
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