विहिप ने हिन्दू युवतियों और महिलाओं से भी जिहादियों के खिलाफ विशेष सतर्कता बरतने की अपील की

unnamed-9.jpg
संजीव कुमार
दिल्ली । हिन्दू युवती मुस्कान की नृशंस हत्या पर विहिप का तीव्र आक्रोश; आरोपी जिहादी इमरान के विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई की मांग, हिन्दू युवतियों के लिए जिहादी ट्रेनर रखने पर कार्रवाई करेगा बजरंगदल

नई दिल्ली: जनकपुरी–तिलक नगर क्षेत्र में कल देर शाम 20 वर्षीय हिन्दू युवती मुस्कान की उसके घर में घुसकर जिहादी जिम ट्रेनर इमरान (25 वर्ष) द्वारा चाकुओं से गोदकर की गई बर्बर हत्या की घटना ने राजधानी को स्तब्ध कर दिया है। विश्व हिन्दू परिषद् इस जघन्य हत्याकांड पर गहरा आक्रोश व्यक्त करती है तथा प्रशासन से आरोपी जिहादी के विरुद्ध त्वरित और कठोरतम कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग करती है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, हिन्दू युवती मुस्कान और जिहादी इमरान के बीच पिछले कुछ महीनों से जान-पहचान थी। कल देर शाम किसी बात को लेकर हुए विवाद के बाद आरोपी जिहादी ने मुस्कान के घर में घुसकर इस खौफनाक वारदात को अंजाम दिया। विहिप मांग करती है कि पुलिस इस मामले में सभी उपलब्ध डिजिटल साक्ष्य, सीसीटीवी फुटेज और बयानों की निष्पक्ष जांच करे ताकि किसी भी तथ्य को दबाया न जा सके।

विहिप इन्द्रप्रस्थ प्रान्त के मन्त्री श्री सुनील सूरी ने कहा कि राजधानी में युवतियों और महिलाओं की सुरक्षा सर्वोपरि है। विहिप ने हिन्दू युवतियों और महिलाओं से भी जिहादियों के खिलाफ विशेष सतर्कता बरतने की अपील की है। उन्होंने कहा कि लव जिहाद, छलपूर्वक धर्मांतरण और सुनियोजित हिंसा जैसी जिहादी घटनाओं के प्रति समाज को निरंतर सजग रहने की आवश्यकता है।

विहिप ने दिल्ली के सभी जिम संचालकों एवं फिटनेस प्रतिष्ठानों को कड़े शब्दों में आगाह किया है कि वे अपने यहां कार्यरत सभी ट्रेनर्स और कर्मचारियों का अनिवार्य पुलिस सत्यापन (Police Verification) सुनिश्चित करें तथा हिन्दू महिलाओं के प्रशिक्षण में सुरक्षा मानकों और जवाबदेही से कोई समझौता न करें। प्रान्त मंत्री श्री सूरी ने कहा है कि हिन्दू महिलाओं के लिए किसी भी सूरत में जिहादी ट्रेनर नहीं रखे जाएं! बजरंग दल ऐसी व्यवस्थाओं पर कड़ी निगरानी रखेगा और अनदेखी पर संस्थागत जवाबदेही तय करेगा!

विश्व हिन्दू परिषद् दिल्ली पुलिस और न्यायिक प्रशासन से मांग करती है कि इस प्रकरण की सुनवाई फास्ट-ट्रैक कोर्ट में की जाए, ताकि पीड़ित परिवार को शीघ्र न्याय मिले और दोषी को कड़ी से कड़ी सजा हो।

तवायफ़ों के घर पैदा हुए लौंडे 

images-8.jpeg
सर्वेश
गोपालगंज (बिहार): आज के समय में यदि गांव देहात में किसी पशुपालक की गाय या भैंस बछड़ा/पाड़ा को जन्म दे, तो वह दुखी हो जाता है। कोई पड़ोसी पूछे तो उदास भाव से सर झुका कर धीरे से कहते हैं, बछड़ा हुआ है… जबतक दूध निकालने के लिए उनकी जरूरत होती है, तबतक उन्हें चारा पानी दे कर रखते हैं, दूध छूटते ही अधिकांश लोग बेच देते हैं। उसके बाद? मान लीजिए कि अधिकांश बछड़े कसाईखानों तक पहुंच जाते हैं। शहरों के बड़े पशु कृषक तो बछड़ों को जन्म के समय ही मारने लगे हैं क्योंकि उन्हें दूध निकालने के लिए बछड़ों की जरूरत ही नहीं होती…
मात्र दो तीन दशक पहले तक ऐसा नहीं था। जबतक किसान खेतों में बिछड़े से हल चलवाता था, उनसे बैलगाड़ी खिंचवाता था, तबतक बछड़ों की पूछ थी। उन्हें ऊंचे दामों पर खरीदा बेचा जाता था। उनके चारा, दाना आदि की विशेष व्यवस्था होती, उन्हें सजा धजा कर रखा जाता, वे दरवाजे की प्रतिष्ठा कहे जाते थे।
हमारी ओर एक परंपरा है कि परिवार के मालिक की सप्ताह के जिस दिन मृत्यु होती है, वह दिन उसके बच्चों के लिए “मान” हो जाता है। उस दिन परिवार में कोई शुभ कार्य, कोई शुभ यात्रा नहीं होती। हां भविष्य में उसी दिन घर में बालक का जन्म हो जाय, या गाय बछड़े को जन्म दे दे तो मान का भेद समाप्त हो जाता है। अर्थात बछड़े का जन्म उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता रहा है, जितना एक बालक का।
तो अब बछड़ों के तिरस्कार का कारण क्या है? कारण है उनकी उपयोगिता का खत्म हो जाना। अब किसान किस लिए उन्हें रखे, उनकी सेवा करे? सेवाभाव वाला युग रहा नहीं, और देने को वे सिवाय गोबर के और कुछ नहीं दे सकते… इसलिए धर्मभीरू लोग यूं ही हांक देते हैं, और कुछ लोग सीधे कसाई के हाथों बेंच देते हैं।
लगभग ऐसी ही स्थिति होती थी तवायफों के यहां जन्म लेने वालों बालकों की। वे जन्म से ही तिरस्कार पाते थे। कुछ बेंच दिए जाते, कुछ भगा दिए जाते, कुछ थोड़े बड़े होते ही तिरस्कार के कारण स्वयं भाग जाते, और कुछ तो मार दिए जाते थे। तवायफों की स्थिति भी वही थी, कोठों पर लड़कों की उपयोगिता ही नहीं थी।
वहां लड़कियां जन्म लेतीं तो खुशियां मनाई जाती थीं। मिठाई बंटती, हफ्तों जश्न होता, धूम रहती… वह लड़की बाद में मां की उत्तराधिकारी होती, उसी के सहारे मां का बुढ़ापा भी शान से कटता… तो लड़कियों का सत्कार और लड़कों का तिरस्कार स्वाभाविक ही था।
तवायफ लड़कियों के लिए भाई एक अनावश्यक वस्तु होता था। उनके जीवन में उसकी क्या ही जरूरत होनी थी? उनके लिए भाई से अधिक पाले गए कुत्ते महत्वपूर्ण होते थे। उनके जीवन में कुत्ते की जरूरत थी, भाई की जरूरत नहीं थी। इसमें उनका दोष नहीं था, उनका जीवन ही ऐसा था कि उसमें भाई के लिए कोई जगह नहीं थी।
कुल मिला कर बात यह कि जब जहां जिस वस्तु की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, वहां उस वस्तु की प्रतिष्ठा भी खत्म हो जाती है। फिर क्या भाई और क्या कुत्ता…
उस राखी वाले विज्ञापन में कीर्ति सेनन द्वारा कुत्ते को राखी बांधते देख कर याद आया… वहां भी कुत्ता अधिक महत्वपूर्ण है, भाई कम…

रसुवा बाढ़ का खतरा: बिहार में गंडक किनारे के ये जिले खतरे में

2-2-6.jpeg

बेतिया। नेपाल के रसुवा जिले में हाल ही में आई भीषण बाढ़ ने पूरे क्षेत्र को हिला दिया है। तिब्बत की ओर से अचानक आई जलराशि ने भोटेकोशी नदी को उफान पर ला दिया। बाजार बह गए, पुल टूट गए, इमारतें और वाहन पानी में समा गए तथा कई जलविद्युत परियोजनाएं क्षतिग्रस्त हो गईं। सैकड़ों पर्यटक लापता बताए जा रहे हैं। यह तबाही केवल नेपाल तक सीमित नहीं है। भोटेकोशी आगे त्रिशूली से मिलती है, जो नारायणी बनकर भारत में गंडक नदी के रूप में प्रवेश करती है। इसलिए बिहार के लिए यह गंभीर चेतावनी है।

गंडक नदी बिहार में पश्चिमी चंपारण जिले के वाल्मीकिनगर के पास प्रवेश करती है। यहां गंडक बैराज स्थित है जो पानी के प्रवाह को नियंत्रित करता है। नेपाल से आने वाले अतिरिक्त पानी के कारण बैराज पर दबाव बढ़ सकता है। जल संसाधन विभाग के अनुसार दो से ढाई लाख क्यूसेक पानी अचानक पहुंचने की आशंका जताई गई है। तीन मीटर ऊंची फ्लैश फ्लड लहर भी आ सकती है।

सबसे अधिक खतरा पश्चिमी चंपारण के बागहा और आसपास के इलाकों को है। इसके बाद पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सीवान और सारण जिले प्रभावित हो सकते हैं। गंडक इन जिलों से गुजरती हुई सोनपुर (सारण) के पास गंगा में मिलती है। मुजफ्फरपुर और वैशाली के निचले इलाके भी बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं। सीतामढ़ी और शिवहर जैसे संवेदनशील जिलों में भी सतर्कता बढ़ाई गई है।

इन क्षेत्रों में खेती, आबादी और बुनियादी ढांचा नदी के किनारे बसा है। अचानक जलस्तर बढ़ने से फसलें डूब सकती हैं, सड़कें और पुल प्रभावित हो सकते हैं तथा गांवों में पानी घुस सकता है। पहले भी नेपाल की नदियों से आने वाले पानी ने बिहार में बाढ़ लाई है। गंडक की प्रकृति ही ऐसी है कि ऊपरी इलाकों में कोई बड़ी घटना नीचे तुरंत असर डालती है।


बिहार सरकार ने पहले ही अलर्ट जारी कर दिया है। मुख्य सचिव की बैठक के बाद पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर और वैशाली में विशेष निगरानी के निर्देश दिए गए हैं। एनडीआरएफ और एसडीआरएफ टीमें तैनात की गई हैं। वाल्मीकिनगर बैराज पर सुरक्षा बढ़ाई गई है। स्थानीय प्रशासन लोगों को नदी किनारे न जाने और सुरक्षित स्थानों की ओर बढ़ने की सलाह दे रहा है।

यह घटना जलवायु परिवर्तन और हिमालयी क्षेत्रों की नाजुकता की याद दिलाती है। ग्लेशियल झील फटने या अचानक भारी जलप्रवाह जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। भारत और नेपाल के बीच जल प्रबंधन और पूर्व चेतावनी प्रणाली को और मजबूत करने की जरूरत है। बिहार जैसे मैदानी राज्य के लिए ऊपरी इलाकों की हर हलचल मायने रखती है।

रसुवा की तबाही हमें याद दिलाती है कि प्रकृति की कोई सीमा नहीं होती। समय रहते सतर्कता और तैयारी ही जान-माल की रक्षा कर सकती है। गंडक किनारे के जिलों के निवासियों को प्रशासन की सलाह मानकर सावधानी बरतनी चाहिए ताकि संभावित नुकसान कम से कम हो।

राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित सर्वश्रेष्ठ गढ़वाली फिल्म ‘ढोली’

2-2-5.jpeg

अनिल गोयल

दिल्ली। भारत के गाँवों में सुरक्षित हमारी संस्कृति को हमारा सिनेमा प्रायः ही दिखाता रहा है।  गढ़वाली फिल्म ‘ढोली’ में भी निर्देशक दिनेश भोसले ने उत्तराखण्ड की ढोली परम्परा पर दृष्टि डाली है।  बहुत ही सामान्य बजट पर बनी फिल्म ‘ढोली’ को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में फीचर फिल्म श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ गढ़वाली फिल्म के लिये रजत कमल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

दिल्ली में आयोजित एक प्रैस कॉन्फ्रैंस में दिनेश भोसले ने बताया कि डेढ़ घंटे से कुछ अधिक लम्बाई की इस फिल्म की शूटिंग उत्तरकाशी जिले की असीगंगा घाटी के नाल्ड गाँव तथा आसपास के क्षेत्रों में की गई थी।  फिल्म की प्रामाणिकता इस बात से सिद्ध होती है कि इस फिल्म में संगीत उत्तराखण्ड के सुप्रसिद्ध संगीतकार नरेन्द्र सिंह नेगी ने तैयार किया है, जिन्होंने अपने गीतों से उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति, रीति-रिवाज और पहाड़ के जनजीवन की झलक पूरे देश में पहुँचाई है।  इस फिल्म का एक गाना भी यहाँ रिलीज किया गया।  प्रैस कॉन्फ्रैंस के बाद दिनेश भोसले तथा निर्माता सुनील नायक ने दिल्ली में रह रहे गढ़वाली समाज के अनेक गण्यमान्य तथा प्रबुद्ध वर्ग के व्यक्तियों के साथ भेंट करके उन्हें फिल्म के बारे में विस्तृत जानकारी दी, तथा उनके प्रश्नों के उत्तर देकर उनकी जिज्ञासा को शान्त किया।

फिल्म के पटकथा लेखक व निर्देशक दिनेश भोसले हैं, तथा निर्माता सुनील नायक (एस.सी.पी.पी.एल.) हैं।  कथा विस्तार, हिन्दी संवाद और कार्यकारी निर्माता का काम जाने-माने फिल्म इतिहासकार शिशिर कृष्ण शर्मा ने किया।  फिल्म की मूलकथा के लेखक तथा संवादों के हिन्दी से गढ़वाली में अनुवादक डा. नन्दकिशोर हटवाल हैं, तथा सिनेमैटोग्राफर अभिनव गन्धर्व हैं।  फिल्म के अगले दो महीने के अंदर रिलीज होने की सम्भावना है।

फिल्म के प्रमुख कलाकारों में उत्तरकाशी के अन्य कलाकारों के साथ-साथ मोहित धिल्डियाल तथा दीपा देउबा हैं।  फिल्म के लेखक व निर्देशक दिनेश भोसले ने मशहूर फिल्म एडिटर वामन भोंसले के साथ काम किया हुआ है।

उन्हें उनकी फिल्मों ‘एनिमी?’ के लिये 2015 में और ‘अमोरी’ के लिये 2018 में कोंकणी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है।  मिलान (इटली) और मेलबर्न (ऑस्ट्रेलिया) के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फैस्टिवल्स में अवॉर्ड जीतने के साथ ही उन्होंने जी गौरव अवॉर्ड्स में 2013 में “मर्मबंध” के लिये बैस्ट एक्टर व सपोर्टिंग एक्ट्रेस के लिए दो अवॉर्ड, तथा गोवा राज्य के अनेक पुरस्कार जीते हैं।  वर्तमान में वे गोआ के स्वतन्त्रता आन्दोलन से सम्बन्धित विषय पर काम कर रहे हैं।

scroll to top