विचित्र कानूनो पर राष्ट्रीय विमर्श की आवश्यकता

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रामेश्वर मिश्र पंकज

दिल्ली । कहा जा रहा है कि शिवसेना की एक माननीय सांसद ने संसद में शासक पक्ष को यह सूचना दे दी कि संसद में माननीय स्त्री सांसद गण में से कुछ अचानक कुछ झूठे नाटक करने वाली है कपड़े फाड़ने आदि का और झूठे आरोप लगाने वाली है ।
इससे डर कर माननीय लोकसभा अध्यक्ष ने माननीय प्रधानमंत्री को सुझाव दिया कि इस समय संसद में ना आए।।

इतनी महत्वपूर्ण घटना पर राष्ट्रीय विमर्श होना चाहिए परंतु नहीं हो रहा है।

इस घटना का जो सबसे पहला निष्कर्ष है, वह यह है कि प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष और संपूर्ण शासक दल जानता है कि स्त्रियों से संबंधित जो एक्ट है वह झूठ अन्याय और अनीति को बढ़ावा देने वाला है। स्त्रियों के द्वारा झूठे आरोप भी लगते ही रहते हैं और ऐसी भी स्त्रियां होती हैं जो प्रतिशोध या द्वेष या विरोध भाव वश झूठे आरोप इस प्रकार के लगाने लगी हैं।
यद्यपि भारत में परंपरागत रूप में ऐसी किसी भी स्त्री की कल्पना हिंदू समाज में कभी नहीं की गई कि वह अपनी ही अस्मिता को इतना लांछित करें ।
परंतु अब यह दिन भी आ गए।।

लेकिन मुख्य बात जिस पर विमर्श होना चाहिए कि अगर स्वयं प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष और शासक दल एक ऐसे एक्ट की संभावना मान रहा है जो सरासर अनीति असत्य और अन्याय का आधार बनाया जा सकता है और स्त्री की सुरक्षा के नाम पर इस प्रकार का एक्ट बना दिया गया है तो प्रारंभिक जांच उस एक्ट में भी अनिवार्य की जाए ।
जब पता चल जाए कि निश्चित कोई घटना हुई है तभी अपराध दर्ज किया जाए ।
यह नहीं कि स्त्री ने आरोप लगाया और बस,जिस पर आरोप लगाया गया है वह जेल जाए ।।

यही क्यों,
अन्य कानूनों में भी यही होता है:- अनुसूचित जाति जनजाति की सुरक्षा के नाम पर जो एक्ट बना है उसका भी भीषण दुरुपयोग हो रहा है। आरंभिक जांच का निर्देश माननीय सुप्रीम कोर्ट ने दिया था लेकिन हमारे कुंवारे प्रधानमंत्री जी ने उसे बदल दिया।।
कुंवारे लोगों को स्त्रियों के प्रति जो आदर होता है वह सब प्रकार से सम्मान योग्य है परंतु वह भावुकता की अति तक जाने पर देश के संदर्भ में अगर आप समर्थ हैं तो देश की हानि कर देते हैं।क्योंकि आप अपने निजी विचार को सारे देश पर लागू कर देते हैं।
एक ऐसे समय में जब स्त्री हो या पुरुष सब लोग कानून के दुरुपयोग पर आमादा बना दिए गए हैं ऐसा राष्ट्रीय परिवेश बना दिया गया है,, तब प्रत्येक कानून का सदुपयोग हो और दुरुपयोग ना हो, यह सुनिश्चित करना शासन का दायित्व है और यह सुनिश्चित होगा कानून की संरचना में।
नेताओं के भाषण से कुछ सुनिश्चित नहीं होता ।

अभी विश्वविद्यालयों के विषय में जो घिनौने और भीषण विनियम यूजीसी ने जारी किया है उसके लिए भी यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि प्रारंभिक जाँच के बिना कुछ नहीं होगा, कोई एक केस दर्ज नहीं किया जाएगा ।

सही तो यह है कि विश्वविद्यालय का कानून आपको बनाना ही है, अपने नौनिहालों पर, किशोरों पर युवाओं पर आपको बिल्कुल भरोसा नहीं है ,आप उन सबको दुष्ट स्वभाव का , चरित्र हीन और भेदभाव करने वाला ही मानते हैं तो कम से कम ऐसा नियम बनाया जाय कि किसी भी छात्र छात्रा के साथ यदि भेदभाव मूलक कोई व्यवहार होता है तो उस पर विश्वविद्यालय प्रशासन कार्रवाई करेगा। वैसे तो यह प्रावधान है ही।

विद्यार्थियों को बांटने वाली बुद्धि को धिक्कार है। धिक्कार है।
वैसे 80 वर्षों तक सरकारी नियंत्रण में शिक्षा विभाग चलने के बाद यदि शासको और विपक्षियों दोनों को लग रहा है कि विश्वविद्यालय में ऐसा भीषण और अनुचित परिवेश है कि शासन को या विश्वविद्यालय को कानून बनाना पड़ रहा है और एक्शन लेना पड़ रहा है तो उचित तो यह है कि शिक्षा विभाग को भारत सरकार और सभी राज्य सरकार अपने नियंत्रण से हटा दें।

केवल शिक्षा के मानक स्वरूप पर नजर रख सकती हैं वह भी बहुत लचीलेपन के साथ नियम बनाए जाएं कि शिक्षा क्या होगी, अलग-अलग शिक्षण संस्थान स्वयं तय करें ,अपनी परीक्षाएं भी वे लें । संबंधित क्षेत्र में सेवा के लिए हर क्षेत्र के लिए अपनी एक विभागीय परीक्षा अनिवार्य हो और अपने प्रतिष्ठा के बल पर स्वयं ही संस्थाओं की कीर्ति बढ़ेगी।

सरकार ने शिक्षा के नाम पर अगर देश में भेदभाव करने वाले विद्यार्थी होंगे ऐसा परिवेश बना दिया है तो उसका अर्थ है कि शिक्षा राजनीति और शासन के नियंत्रण से बाहर होना चाहिए। केवल एक सुपरविजन का काम शासकीय अधिकारी करें। एक छोटी टीम के साथ। बस।
बाद में उसकी भी आवश्यकता ना रहे क्योंकि अगर समाज भ्रष्ट नहीं है तो इसकी आवश्यकता नहीं है और अगर समाज भृष्ट है तो अधिकारी भी अवश्य भृष्ट होंगे इसलिए इसकी आवश्यकता नहीं है।

कवि प्रदीप: शब्दशक्ति से राष्ट्रभक्ति और स्वाभिमान जागरण की यात्रा

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भोपाल : भारतीय स्वाधीनता संग्राम में करोड़ो प्राणों के बलिदान हुये। इन बलिदानों केलिये आव्हान करने वाले शब्द साधकों की धारा भी अनवरत रही। हर कालखंड में शब्द साधकों अपनी साहित्य रचना और गीतों के माध्यम से राष्ट्र को जाग्रत किया। ऐसे ही शब्द साधक और कालजयी रचनाकार हैं कवि प्रदीप। उनके गीत संपूर्ण राष्ट्र में गूँजे।

उनका संपूर्ण जीवन मानों ओजस्वी गीतों केलिये समर्पित था। स्वतन्त्रता के पूर्व उनके गीतों में संघर्ष केलिये आव्हान था तो स्वाधीनता के बाद राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा। स्वतंत्रता से पहले- “दूर हटो ये दुनियाँ वालो ये हिन्दुस्तान हमारा है ।” तो स्वतंत्रता के बाद- “ऐ मेरे वतन के लोगो जरा आँख में भर लो पानी” जैसे अमर गीत के रचयिता कवि प्रदीप ही हैं वे दुनियाँ के उन विरले गीतकारों में से हैं जिनका हर गीत लोकप्रिय हुआ। उन्होंने दो हजार से अधिक गीत लिखे इसमें लगभग 1700 गीत फिल्मों में आये। उनके द्वारा लिखे गये सौ से अधिक राष्ट्र भक्ति के गीत तो अपने समय हर देशवासी की जुबान पर रहे। ऐसे अमर गीतों के गीतकार कवि प्रदीप का जन्म 6 फरवरी 1915 को मध्यप्रदेश में उज्जैन जिले के अंतर्गत बड़नगर में हुआ। उनके पिता रामचंद्र द्विवेदी आर्य समाज से जुड़े थे। घर में राष्ट्रसेवा सांस्कृतिक गरिमा का वातावरण था। इसका प्रभाव प्रदीपजी मन और विचार पर पड़ा। वे बचपन से राष्ट्र और सांस्कृतिक चेतना से आह्लादित रहते थे। उनकी प्रारंम्भिक शिक्षा बड़नगर में और उच्चशिक्षा लखनऊ में हुई।

कविताएं लिखने का शौक उन्हे बचपन से था। वे एक दृश्य देखकर अथवा कोई प्रसंग सुनकर बहुत प्रभावी गीत या कविता रच देते थे। उनकी इसी विधा ने पढ़ाई के दौरान लखनऊ विश्वविद्यालय में लोकप्रिय हो गये। पढ़ाई के दौरान ही उनकी भेंट उस समय के एक प्रखर और प्रभाव शाली कवि गिरिजा शंकर दीक्षित से हुई। दीक्षितजी अपने समय में कवि सम्मेलनों के लोकप्रिय कवि और उनके शिक्षक भी थे। उनके मार्गदर्शन गीत जीवन की यात्रा आरंभ हुई ।
प्रदीपजी ने 1939 में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। आजीविका केलिये शिक्षक बनने की तैयारी भी करने लगे। इसके साथ गीत रचना भी निरन्तर रही।

प्रदीपजी के गीतों से उनके शिक्षक दीक्षित जी बहुत प्रभावित थे। उन्ही दिनों प्रदीपजी ने “चल चल रे नौजवान” एक गीत लिखा था। दीक्षितजी ने यह गीत मुम्बई भेज दिया। यह गीत एक फिल्म “नौजवान” में आ गया। फिल्म लोकप्रिय हुई और गीत भी। यह फिल्म 1940 में रिलीज हुई थी । इस गीत के साथ प्रदीप जी रातोंरात पूरे देश में लोकप्रिय हो गये। 1942 में उनका दूसरा गीत मानों “भारत छोड़ो आंदोलन” का एक मंत्र बन गया । यह गीत था “आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है “। यह गीत समाज को आव्हान करने वाला था आँदोलन के दौरान उस समय हर गली चौराहे पर गाया गया। 1944 में उनके एक और गीत “दूर हटो ऐ दुनिया वालो, यह हिन्दुस्तान हमारा है” ने फिर पूरे देश में तहलका मचा दिया। अंग्रेजी सरकार ने उनके गीतों को भड़काने वाला माना और गिरफ्तारी वारंट जारी हो गया। कवि प्रदीप गिरफ्तारी से बचने के लिए भूमिगत हो गये। बाद में फिल्म निर्माताओं ने मध्यस्थता की और प्रशासन को फिल्म स्क्रिप्ट केलिये इन गीतों की आवश्यकता बताई तब जाकर वारंट निरस्त हुआ ।

प्रदीप जी ने स्वतंत्रता के बाद जागृति जैसी फिल्मों के लिये नये अंदाज से गीत लिखे। “हम लाए हैं तूफान से किश्त निकल के” आज भी लोकप्रिय है। उन्होंने 1954 में बच्चों को समझाया कि “आओ बच्चों तुम्हें दिखाये झाँकी हिन्दुस्तान की”। इस गीत में भारत के गौरवमयी अतीत की मानों एक झाँकी थी। स्वतंत्रता की इस यात्रा के बीच ही 1962 में भारत चीन युद्ध आ गया । उस युद्ध में भारतीय सैनिकों ने कितनी विषम परिस्थिति में भारत राष्ट्र की रक्षा की। वे कहानियाँ दिल को दहलाने वाली है । सैनिकों के बलिदान पर उनका गीत ” ऐ मेरे वतन के लोगो, जरा आँख में भर लो पानी” की रचना की । जिस भाव से प्रदीप ने इस गीत की रचना की उसी भावना से लता जी ने गाया। इस गीत के बोल आज भी हृदय को छू जाते हैं। यह गीत देश भक्ति के गीतों में अग्रणी माना गया। भारत सरकार ने उन्हे “राष्ट्र कवि” के सम्मान से सम्मानित किया ।

26 जनवरी 1963 को आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह में लताजी ने प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में यह गीत गाया। नई दिल्ली में आयोजित इस राष्ट्रीय गणतंत्र समारोह में ऐसा कोई नहीं था जिसकी आँख में आँसू न आये हों। प्रदीपजी ने इस गीत की रॉयल्टी सैनिकों की विधवाओं केलिये बनाये गये सहायता कोष अर्थात ‘वॉर विडो फंड’ में जमा करने की घोषणा की। पर गीत के अधिकार रखने वाली कंपनी “एच एम वी” ने समय पर पैसा जमा नहीं किया। और मामला कोर्ट में गया। एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने एचएमवी कंपनी को रॉयल्टी के बकाया के रूप में 1 मिलियन रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया।

देश भक्ति मानों प्रदीप जी के रक्त में थी । 1987 में प्रदीप जी ने कहा था- “कोई भी आपको देशभक्त नहीं बना सकता। यह आपके खून में होती है। आप इसे देश की सेवा के लिए कैसे लाते हैं जो आपको अलग बनाता है।” सतत शब्द साधना और अपने गीतों से राष्ट्र साधना में रत प्रदीप जी ने अंततः 11 दिसम्बर 1998 को 83 वर्ष की आयु में इस संसार से विदा ली ।
शत शत नमन ।

पैसा और त्याग कभी बराबरी से नहीं तौले जा सकते

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

रायपुर: कई साल पहले मैंने अपने माता-पिता का फ्लैट अपनी बहन को देने का फैसला किया था। जब इस पर सवाल उठे, तो मैंने कहा यह इस बात की ईमानदार स्वीकृति थी कि पिता के गंभीर बीमार होने पर बहन ने ही उनकी देखभाल की थी।

अधिकांश परिवारों की तरह हमारे परिवार में भी दो तरह के सिबलिंग्स थे- एक ‘सैटेलाइट चाइल्ड’ यानी मैं- सफल, दूर रहने वाला, पैसे भेजने वाला। और दूसरी ‘केन चाइल्ड’ यानी मेरी बहन- जो पिता को कई बार अस्पताल ले गईं और अंत तक उनकी देखभाल करती रहीं। उसी दौरान उसकी सेहत भी बिगड़ी, जिसकी परेशानियां आज तक बनी हुई हैं।

इस हफ्ते की शुरुआत में मुझे अपने जीवन का यह छोटा-सा हिस्सा फिर याद आ गया, जब मुझे मुंबई के एक ऐसे अस्पताल जाना पड़ा, जहां मेरे परिवार के एक सदस्य भर्ती थे। पास के कमरे में एक अन्य महिला भर्ती थीं और उनका बेटा उनकी देखभाल कर रहा था। बगल के कमरे में बैठे-बैठे मैं उस बेटे और विदेश में रहने वाले उसके बड़े भाई की बातचीत सुन सकता था।

छोटे बेटे और मां की बातचीत से मुझे समझ आ रहा था कि पैसे बड़ा भाई भेज रहा था और मां की रोजमर्रा की जरूरतों की जिम्मेदारी छोटा भाई निभा रहा था। एक बार छोटे भाई ने गुस्से में फोन पर कहा कि हर बात पर यह मत जताया करो कि तुमने इसके लिए पैसे भेजे, उसके लिए पैसे भेजे। जैसे ही उसकी नजर मुझ पर पड़ी, वह फोन लेकर बाहर चला गया।

जो मुझे समझ आया, वो यह था कि बड़ा बेटा विदेश में था और शायद सोच रहा था कि मेरी वजह से बिल चुकाए जा रहे हैं; मेरी वजह से मां ठीक से खा रही हैं और उनकी देखभाल हो रही है; मेरी वजह से चीजें ‘हैंडल’ की जा रही हैं।

वहीं छोटा बेटा अलग-अलग बातचीत में यह बताते हुए सुना गया कि उसकी मां भूल जाती हैं कि अस्पतालों में कई बार उनके भर्ती रहने के दौरान वही हर समय मौजूद रहा था, लेकिन उन्हें हमेशा याद रहता है कि बड़ा बेटा उनकी देखभाल के लिए पैसे भेजता है। एक बार उन्होंने उसे काट भी लिया था, लेकिन वह उन्हें छोड़ नहीं सकता ​​​था, क्योंकि उनकी देखभाल करने वाला कोई और नहीं था।

इस हफ्ते जब मैं एक रात वहां गया तो मैंने सुना कि छोटा भाई फूट पड़ा और ऊंची आवाज में बोला- भाई, मैं तुम्हारा शुक्रगुजार हूं, क्योंकि तुम्हारे पैसों की वजह से मैं मां को सबसे अच्छा इलाज दिला पा रहा हूं। लेकिन तुम पैसा भेजकर चैन की नींद सो जाते हो, जबकि मैं बीते चार सालों में एक भी रात ठीक से नहीं सो पाया हूं।

तुम्हारे पैसे सुबह तीन बजे उनकी चादरें साफ नहीं कर पाते, मैं करता हूं। जैसे ही उसने मुझे बाहर आते देखा, वह अचानक रुक गया। मैं उसे खुलकर बोलने देने के लिए वापस अंदर चला गया। उसने बोलना जारी रखा- भाई, शायद तुम्हें पता भी नहीं कि उन्हें नहलाते समय उठाते हुए मेरी कमर में चोट लग गई थी।

डॉक्टर ने बताया कि मुझे हर्नियेटेड डिस्क हो गई है। लेकिन मैं अपने लिए समय ही नहीं निकाल सकता, क्योंकि वे अस्पताल में हैं। तुम्हें अंदाजा नहीं है, भाई। तुम्हारे पैसे उन्हें तब थाम नहीं पाते हैं, जब वे गिर रही होती हैं- यह याद रखना। इतना कहकर उसने फोन काट दिया।

वह कितनी सच्ची बात कह रहा था! आज तक किसी ने नहीं सुना कि पैसा डायपर बदल सकता है या अकेलेपन में सहारा दे सकता है। शायद इसी वजह से मुझे अपनी बहन की​ याद आई। जब मैं पिता की दवाइयों के पैसे देता था, तो वही उन्हें दवा खिलाती थी। हो सकता है अंतिम संस्कार का खर्च मैंने उठाया हो, लेकिन आखिरी पल में पिता का हाथ उसने ही थामा था।

तब उसने मुझे फोन करके कहा ​था- भाई, मैंने उन्हें जाते हुए देखा। उस दिन मैंने खुद को कोसा। अस्पताल से डिस्चार्ज कराने से ठीक दो घंटे पहले मैं उनके साथ था, लेकिन उनके अं​​तिम क्षण में यह सैटेलाइट सक्सेसफुल चाइल्ड- यानी मैं- वहां मौजूद नहीं था।

फंडा यह है कि विरासत का मतलब सम्पत्ति को बराबर-बराबर बांटना नहीं होता। इसका मतलब यह पहचानना भी होता है कि किसने अपने जीवन में ज्यादा त्याग किए, ताकि कोई और अपना जीवन संवार सके। पैसा और त्याग कभी बराबरी से नहीं तौले जा सकते।
(प्रस्तुति : कल्पेश पटेल)

कीटनाशक प्रबंधन विधेयक 2025: आधुनिक कृषि की चुनौतियां, किसान हित और जीएम बीजों का भविष्य

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निलेश देसाई

भोपाल । भारतीय कृषि आज एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ उत्पादकता बढ़ाने के दबाव और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना अनिवार्य हो गया है। 1968 के पुराने ‘कीटनाशक अधिनियम’ को प्रतिस्थापित करने के लिए प्रस्तावित ‘कीटनाशक प्रबंधन विधेयक 2025’ (PMB 2025) इसी दिशा में एक बड़ा कदम है। हालांकि, यह विधेयक केवल रसायनों के नियंत्रण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे भविष्य की खेती, बीजों की तकनीक और किसानों की आर्थिक सुरक्षा को भी गहरे स्तर पर प्रभावित करने वाला है। विशेष रूप से जीएम (GM) बीजों का कीटनाशक के रूप में वर्गीकरण और कॉर्पोरेट जवाबदेही जैसे मुद्दे इस बहस के केंद्र में हैं।

जीएम (GM) बीजों पर प्रभाव: एक नई कानूनी परिभाषा

विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण और चर्चा वाली बात इसकी व्यापक परिभाषा है। दस्तावेज़ों के अनुसार, “टॉक्सिन-संबंधित जीन संशोधन” (Toxin-related gene modification) को भी इसके दायरे में लाने का प्रस्ताव है। इसका सीधा असर बीटी (Bt) कपास या बीटी बैंगन जैसी फसलों पर पड़ेगा।

1. कीटनाशक के रूप में वर्गीकरण: वर्तमान में, जीएम बीजों को मुख्य रूप से ‘पर्यावरण संरक्षण अधिनियम’ और बीज नियमों के तहत विनियमित किया जाता है। लेकिन PMB 2025 के तहत, यदि कोई बीज स्वयं कीटों से लड़ने वाला ‘जहर’ (Toxin) पैदा करता है, तो उसे एक ‘कीटनाशक उपकरण’ या स्वयं कीटनाशक के रूप में माना जा सकता है। इसका मतलब यह है कि बीज कंपनियों को अब न केवल बीज मानकों का पालन करना होगा, बल्कि कीटनाशक पंजीकरण समिति (Registration Committee) से भी कड़े सुरक्षा प्रमाणपत्र लेने होंगे।

2. जवाबदेही और नियामक जांच: यदि किसी जीएम फसल के कीटनाशकीय गुणों के कारण मिट्टी के मित्र कीटों (जैसे केंचुए या मधुमक्खियां) को नुकसान पहुँचता है या मनुष्यों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो कंपनी को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा। यह ‘कॉर्पोरेट लायबिलिटी’ (Corporate Liability) के सिद्धांत को मजबूत करता है, जहाँ अब कंपनियां केवल यह कहकर नहीं बच सकतीं कि उन्होंने केवल बीज बेचा है।

किसान हित: मूल्य नियंत्रण और आर्थिक सुरक्षा

भारत में छोटे और सीमांत किसानों के लिए खेती की लागत का एक बड़ा हिस्सा कीटनाशकों और उर्वरकों पर खर्च होता है। विधेयक में ‘मूल्य नियंत्रण’ (Price Regulation) को शामिल करने की मांग किसानों के अस्तित्व से जुड़ी है।

• मूल्य निर्धारण की आवश्यकता: अक्सर देखा गया है कि कीटों के प्रकोप के समय बाजार में कीटनाशकों की कृत्रिम कमी पैदा कर दी जाती है और उन्हें मनमाने दामों पर बेचा जाता है। विधेयक में संशोधन का प्रस्ताव है कि सरकार को आवश्यक वस्तुओं की तरह कीटनाशकों की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) निर्धारित करने का अधिकार होना चाहिए। इससे किसानों को कर्ज के जाल से बचाने में मदद मिलेगी।
• गुणवत्ता का आश्वासन: मूल्य नियंत्रण के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि कम कीमत के नाम पर किसानों को नकली या मिलावटी कीटनाशक न दिए जाएं। इसके लिए ‘ट्रैसेबिलिटी’ (Traceability) यानी कारखाने से खेत तक की निगरानी अनिवार्य की जानी चाहिए।

कीटनाशक जहर राहत कोष: मानवीय संवेदना और न्याय

खेती के दौरान कीटनाशकों के संपर्क में आने से हर साल हजारों किसान और मजदूर बीमार होते हैं या अपनी जान गंवा देते हैं। प्रस्तावित धारा 44A के तहत एक ‘कीटनाशक जहर राहत कोष’ (Pesticide Poisoning Relief Fund) बनाने का सुझाव दिया गया है।

• अनिवार्य मुआवजा: इस कोष का निर्माण कीटनाशक कंपनियों के योगदान से किया जाना चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में कीटनाशक के कारण सामूहिक बीमारी या आकस्मिक मृत्यु होती है, तो इस कोष से पीड़ितों को तत्काल राहत मिलनी चाहिए।
• बिना दोष के उत्तरदायित्व (Strict Liability): राहत पाने के लिए किसान को यह साबित करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि कंपनी ने जानबूझकर गलती की है। यदि उत्पाद के उपयोग से नुकसान हुआ है, तो कंपनी को मुआवजा देना ही होगा।

पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श

विधेयक में सबसे बड़ी कमी पारदर्शिता की मानी गई है। वर्तमान में, कीटनाशकों के पंजीकरण की प्रक्रिया बंद कमरों में होती है, जहाँ केवल सरकारी अधिकारी और कंपनी के प्रतिनिधि होते हैं।

• सार्वजनिक परामर्श (Public Consultation): प्रस्तावित सुधारों में यह मांग की गई है कि किसी भी नए कीटनाशक को मंजूरी देने से पहले उसके विष विज्ञान (Toxicology) डेटा को सार्वजनिक किया जाए और किसानों, वैज्ञानिकों व नागरिक समाज से आपत्तियां मांगी जाएं।
• सूचना का अधिकार: किसान को यह जानने का पूरा हक है कि वह जो रसायन अपने खेत में डाल रहा है, उसका मिट्टी और आने वाली पीढ़ियों पर क्या असर होगा। पंजीकरण समिति को अपने हर निर्णय का लिखित कारण और वैज्ञानिक आधार सार्वजनिक पोर्टल पर साझा करना चाहिए।

पर्यावरण-मित्र खेती की ओर कदम

विधेयक का एक मुख्य उद्देश्य “पर्यावरण-मित्र” (Paryamitra) कृषि को बढ़ावा देना होना चाहिए। इसके लिए सुझाव दिया गया है कि:

1. जैव-कीटनाशकों को प्रोत्साहन: नीम, गौमूत्र और अन्य जैविक अर्क पर आधारित कीटनाशकों को पंजीकरण में छूट और सब्सिडी मिलनी चाहिए।
2. राज्यों को अधिकार: चूंकि कृषि राज्य का विषय है, इसलिए राज्य सरकारों को यह अधिकार होना चाहिए कि वे अपने पारिस्थितिकी तंत्र के आधार पर किसी विशेष खतरनाक कीटनाशक को प्रतिबंधित कर सकें।

अंततःकीटनाशक प्रबंधन विधेयक 2025 भारत की खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा के बीच एक सेतु बन सकता है। जीएम बीजों की सख्त निगरानी, कीटनाशकों के मूल्यों पर लगाम, और पीड़ितों के लिए तत्काल राहत कोष जैसे प्रावधान इस कानून को वास्तव में ‘किसान-हितैषी’ बनाएंगे। संसद को चाहिए कि वह प्रस्तावित 54 संशोधनों पर गंभीरता से विचार करे ताकि यह विधेयक केवल कागजों पर न रहे, बल्कि खेतों में हरियाली और किसान के जीवन में खुशहाली सुनिश्चित करे। यदि हम आज एक पारदर्शी और जवाबदेह ढांचा तैयार नहीं करते, तो भविष्य की पीढ़ियों को जहरीली मिट्टी और असुरक्षित भोजन विरासत में मिलेगा।

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