25 अगस्त 2003 : 54 नागरिकों की मौत : 244 लोग घायल

2003_bomb_blast_1-sixteen_nine.jpg

–रमेश शर्मा

मुंबई: अगस्त माह में भारत स्वतंत्र हुआ था । इस माह में पूरे भारतवासी स्वतंत्रता का उत्सव मनाते हैं।इतिहास के पन्नों में यह अगस्त माह देश के बड़े दर्द समेटे हैं । विभाजन की त्रासदी और मुस्लिम लीग के डायरेक्टर एक्शन का नर संहार, अगस्त क्रान्ति पर अंग्रेजों के गोली चालन । लेकिन यह सब स्वतंत्रता के पूर्व की स्मृतियाँ हैं । स्वतंत्रता के बाद से लगातार भारत की खुशियों को छीनने का षड्यंत्र होते रहे हैं। ऐसा ही एक कुचक्र 25 अगस्त 2003 को रचा गया जब मुंबई के दो स्थानों पर कार बम विस्फोट हुये जिसमें 54 निर्दोष लोगों के प्राण गये और 244 लोग घायल हुये । घायलों में कुछ और लोगों ने बाद में प्राण त्यागे । 25 अगस्त को एक धमाका गेटवे ऑफ इंडिया पर हुआ और दूसरा जावेरी बाजार में । ये दोनों धमाके ऐसे थे जिसमें न केवल मुम्बई अपितु पूरे देश में सनसनी फैल गई थी ।

जावेरी बाजार के धमाके में 29 लोगों की मौत हुई । यह धमाका इतना जबरदस्त था कि 200 मीटर दूर तक जमीन हिल गई और अनेक मकानों में तो दरार आ गई । एक ज्वैलरी स्टोर सहित कुछ दुकानों के शीशे टूट गए थे ।

पहला धमाका जावेरी बाजार में हुआ । पुलिस और प्रशासन बचाव के लिये वहाँ पहुँचा। अभी प्रशासन ठीक से बचाव कार्य शुरु भी नहीं कर पाया था कि गेटवे ऑफ इंडिया में दूसरा बम धमाका होने की खबर आ गयी । ये धमाका भी कार बम बिस्फोट था । गेटवे आफ इंडिया के धमाके में 25 लोगों की मौत हुई और 200 से ज्यादा लोग घायल हुए ।

दोनों बम विस्फोट टैक्सियों में किये थे । आतंकवादी दोनों टैक्सियों में टाइमर लगाकर बम छोड़ गये थे । निर्धारित समय पर विस्फोट हुये । दोनों घटनाओं में आरोपियों ने पहले टैक्सी किराये पर ली और दोनों स्थानों पर टैक्सी से उतरे और ड्राइवर को जल्दी लौटने का कह कर चल दिये थे । जावेरी बाजार में टैक्सी ड्राइवर गाड़ी में बैठकर ही अपनी सवारी के वापस लौटने का इंतजार कर रहा था । विस्फोट में उसकी भी मौत हो गई । लेकिन गेटवे ऑफ इंडिया पर टैक्‍सी ड्राइवर की जान बच गई थी । सवारियाँ उतर कर जल्दी लौटने का कहकर चल दीं थीं। लेकिन यहाँ टैक्‍सी ड्राइवर गाड़ी से बाहर निकलकर टहलने लगा था । जिससे बच गया था । इस ड्राइवर के ब्यान हुये आरोपियों का सुराग लगा और आरोपियों की पहचान हो गई । इसमें हनीफ, फहमीदा और अशरफ तीन लोग पकड़े गये । उन्होंने स्वीकार किया था कि वे पहले जावेरी बाजार में भी वे ही टैक्सी में बम से भरा बैग छोड़कर आगे बढ़े थे । और दूसरी टैक्सी लेकर गेटवे ऑफ इंडिया आये थे । यहाँ भी बम से भरा दूसरा झौला छोड़कर आगे बढ़े थे । ये तीनों पाकिस्तान से संबंधित आतंकवादी संगठन लश्कर से जुड़े थे ।

टैक्सी ड्राइवर की पहचान पर तीनों बंदी बनाये गये और अदालत में पेश किया । 6 साल बाद अगस्त 2009 को अदालत से इन्हें फाँसी की सजा सुनाई गई । लेकिन उन्होने हाईकोर्ट में अपील कर दी थी । मामला सोलह वर्षों तक अदालतों में घूमता रहा ।

राहुल गांधी के ‘पिंजरे’ में भारतीय परिवार, लेकिन इटली का आईना कहाँ है?

6787a619c881f-rahul-gandhi-151200229-16x9.jpg.avif

दीपक कुमार द्विवेदी

मुंबई। जब भी समाज में वैचारिक बहसों के नाम पर किसी एक पक्ष को कटघरे में खड़ा किया जाता है, तब निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता सबसे पहले दम तोड़ती है। 22 अगस्त 2026 को पुणे के एआईएसएसएमएस (AISSMS) ग्राउंड में आयोजित ‘छात्रों की गूँज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी ने भारतीय परिवार व्यवस्था और महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर जो तीखे प्रहार किए, उन्होंने इसी चयनात्मक और एकतरफा विमर्श को फिर से हवा दी है। उन्होंने भारतीय परिवार को एक निश्चित चौखटे में कैद और पितृसत्तात्मक बताते हुए महिलाओं को किसी भी पुरुष के नियंत्रण से मुक्त होने का आह्वान किया। यह सोचना भ्रामक है कि स्त्री के अधिकारों और सुरक्षा पर चर्चा गलत है; लोकतंत्र में यह आवश्यक है। लेकिन गंभीर प्रश्न यह है कि जिस कसौटी से भारत और उसके प्राचीन संस्कारों को मापा जा रहा है, क्या वही कठोर पैमाने राहुल गांधी के अपने राजनीतिक विमर्श, वैचारिक स्रोतों और उनके ननिहाल पर भी लागू होते हैं?

इतिहास और तथ्यों के आईने में जब हम इस वैचारिक पाखंड की थाह लेते हैं, तो कई अनुत्तरित प्रश्न सामने आते हैं। राहुल गांधी की मातृभूमि भारत है, किंतु उनका ननिहाल इटली से जुड़ा है; सोनिया गांधी का जन्म 9 दिसंबर 1946 को इटली के लुसियाना, विसेंज़ा में हुआ था, जो कि लोकसभा के आधिकारिक जीवनी अभिलेखों में भी दर्ज है। जिस यूरोपीय समाज को आधुनिक लोकतंत्र और महिला अधिकारों का आदर्श मानकर प्रस्तुत किया जाता है, वहाँ भी महिलाओं को राष्ट्रीय स्तर पर मताधिकार पाने के लिए 1945 तक लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ी थी और 2 जून 1946 को उन्होंने पहली बार राष्ट्रीय चुनाव तथा राजतंत्र-गणराज्य जनमत-संग्रह में मतदान किया था। इसके विपरीत, स्वतंत्र भारत के संविधान ने प्रारंभ से ही स्त्री और पुरुष को समान राजनीतिक नागरिकता और सार्वभौमिक मताधिकार प्रदान किया, जिसके लिए भारत को इटली की तरह दशकों इंतजार नहीं करना पड़ा। आज भारत की संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी को ऐतिहासिक रूप से मजबूत करने के लिए 106वें संविधान संशोधन के माध्यम से एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान लागू किया जा चुका है।

इसके बावजूद, यदि पश्चिमी आँकड़ों और रिपोर्टों को देखें, तो तस्वीर काफी भिन्न दिखाई देती है। ‘ओईसीड’ (OECD) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, इटली में पुरुषों और महिलाओं की श्रम-बल भागीदारी के बीच लगभग 18 प्रतिशत अंक का बड़ा अंतर आज भी दर्ज है। वहाँ महिला प्रबंधकीय भागीदारी लगभग 29 प्रतिशत है और बड़ी संख्या में नियोजित महिलाएँ अंशकालिक काम करने को विवश हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि बच्चों के जन्म के बाद देखभाल का पूरा उत्तरदायित्व आज भी मुख्य रूप से महिलाओं पर ही है। इसके अलावा, मार्च 2026 में प्रकाशित आँकड़ों के अनुसार इटली की महिला रोजगार दर केवल 53.2 प्रतिशत थी, जिसमें पुरुषों की तुलना में 17.8 प्रतिशत अंकों का स्पष्ट अंतर बना हुआ है। ऐसे में, यह एक स्वाभाविक प्रश्न है कि राहुल गांधी अपनी ही ननिहाल की धरती इटली या यूरोपीय समाज की इन पितृसत्तात्मक संरचनाओं और श्रम-बाजार की असमानताओं के खिलाफ आवाज उठाने कब जाएंगे? क्या वे वहाँ जाकर ‘पिंजरा तोड़ो’ या स्वतंत्रता के ऐसे ही किसी अभियान का नेतृत्व करने का साहस कभी दिखाएंगे?

यदि बात इटली और यूरोपीय समाज की हो, तो वहाँ की ऐतिहासिक और सामाजिक संरचना लंबे समय से गहरी पितृसत्तात्मक मान्यताओं और चर्च के काले अध्यायों में जकड़ी रही है। मध्यकालीन रोमन कैथोलिक चर्च और कैनन लॉ (कैनन कानून) के साये में महिलाओं को सदियों तक दोयम दर्जे का नागरिक माना गया, उनकी आत्मा और शरीर पर कड़े पहरे बिठाए गए। यूरोपीय इतिहास में लगभग 1400 से 1775 के बीच ‘Witchcraft’ (जादूटोना) के झूठे और मनगढ़ंत आरोपों के नाम पर लगभग एक लाख लोगों पर मुकदमे चलाए गए और 40,000 से 60,000 के बीच मासूमों को—जिनमें अधिकांश अभागिन महिलाएँ थीं अमानवीय यातनाएँ देकर जिंदा जला दिया गया या मृत्युदंड के घाट उतार दिया गया। सोचिए, उन महिलाओं की चीखों, उनकी लाचारी और उनकी टूटी हुई आत्माओं का दर्द क्या कभी किसी सामाजिक न्याय के स्वयंभू योद्धा के दिल को नहीं झकझोरता? चर्च के तहखानों में, मठों के एकांत में और पितृसत्तात्मक धार्मिक विधानों के नाम पर सदियों तक जो अमानवीयता स्त्रियों के साथ हुई, उस दर्दनाक इतिहास पर पर्दा डालकर केवल भारतीय परिवार को निशाना बनाना क्या बौद्धिक बेईमानी नहीं है? आज भी इटली के सामाजिक ताने-बाने में गहरी पितृसत्तात्मक मानसिकता और पारिवारिक दबाव काम करते हैं, जिसके कारण दक्षिणी इटली के कई क्षेत्रों में महिलाएँ आर्थिक रूप से पूरी तरह निष्क्रिय हैं। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि जो लोग भारत के हर परिवार को ‘पिंजरा’ घोषित करने में जरा भी संकोच नहीं करते, वे इटली के इस पितृसत्तात्मक और चर्च-प्रेरित इतिहास पर हमेशा रहस्यमय चुप्पी साध लेते हैं।

यह दोहरा चरित्र केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं है, बल्कि कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की कार्यप्रणाली में भी स्पष्ट झलकता है। राहुल गांधी में नजर आने वाली पितृसत्तात्मक समाज की यह सोच कहीं न कहीं सोनिया गांधी के संस्कारों और उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि से जुड़ी है, और सोनिया गांधी की यह मानसिकता स्वयं इटली के समाज में महिलाओं को मिलने वाले दोयम दर्जे के इतिहास से उपजी है। इन सबकी मूल जड़ें कैथोलिक चर्च के साम्राज्यवादी और पदानुक्रमित ढाँचे में विकसित हुई हैं, जहाँ सत्ता और अधिकार का केंद्र हमेशा पुरुष-प्रधान और अनुशासित नियंत्रण रहा है।
जिस कांग्रेस पार्टी में दशकों से एक ही परिवार का सर्वोच्च वर्चस्व रहा है, वहाँ भी नेतृत्व और अवसरों की समानता का पैमाना नदारद है। बेटा होने के नाते राहुल गांधी बहुत कम उम्र में पार्टी के शीर्ष पदों पर काबिज हो गए, जबकि बेटी होने के नाते प्रियंका गांधी को राजनीतिक मंच पर अपनी जगह बनाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। यदि राहुल गांधी वास्तव में परिवार के भीतर और समाज में पितृसत्ता को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, तो क्या वे अपनी माँ सोनिया गांधी के समक्ष यह प्रस्ताव रखने का नैतिक साहस दिखाएंगे कि अब कांग्रेस पार्टी की पूरी कमान और प्रधानमंत्री पद की दावेदारी उनकी बहन प्रियंका गांधी को सौंपी जाए? जब वे अपने ही राजनीतिक दल और परिवार के भीतर इस वंशवादी और पितृसत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती नहीं दे सकते, तो उन्हें भारतीय समाज को उपदेश देने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

भारतीय परिवार व्यवस्था पर प्रहार करने से पहले हमें अपनी दार्शनिक और सांस्कृतिक जड़ों को समझना होगा। भारतीय परंपरा में स्त्री और पुरुष को कभी भी एक-दूसरे का विरोधी या प्रतिद्वंद्वी नहीं माना गया। हमारे यहाँ प्रकृति और पुरुष के सहयोग के बिना सृष्टि के निर्माण की कल्पना ही नहीं की जा सकती—यही कारण है कि वेद-पुराणों से लेकर अर्धनारीश्वर की दार्शनिक अवधारणा तक, स्त्री और पुरुष को एक-दूसरे का पूरक और पूर्णता प्रदान करने वाली शक्तियों के रूप में देखा गया है। इसके विपरीत, यदि विश्व की अन्य धार्मिक और वैचारिक परंपराओं का ऐतिहासिक अवलोकन किया जाए, तो बाइबल की कथाओं में भी जहाँ स्त्री की उत्पत्ति आदम की पसली से बताई गई है, वहीं इस्लाम और शरिया के वैधानिक प्रावधानों में भी महिलाओं के अधिकार और स्वतंत्रता को लेकर कई ऐसी सीमाएँ हैं जिनपर दुनिया भर के मानवाधिकारवादी और सुधारक लंबे समय से सवाल उठाते रहे हैं।

किंतु विडंबना यह है कि राहुल गांधी या उनके वामपंथी-कम्युनिस्ट सलाहकारों के मुँह से बाइबल की रचना, चर्च के अत्याचारों, या इस्लाम की रूढ़ियों और लैंगिक असमानताओं पर कभी एक भी तीखा शब्द नहीं निकलता। वे बाइबल या कुरान की उन व्यवस्थाओं पर प्रश्न उठाने से हमेशा बचते हैं जहाँ महिलाओं की स्वतंत्र नागरिकता या सामाजिक स्थिति सीमित होती है। इसके विपरीत, वे केवल हिंदू समाज, उसकी सहिष्णुता और उसकी परिवार-व्यवस्था को हीन दिखाने का प्रयास करते हैं। पुणे के उस कार्यक्रम में भी जब यह विमर्श गढ़ा गया, तो वहाँ मौजूद उन बेटियों ने इसका सबसे सटीक उत्तर दिया जो अपने परिवारों के समर्थन, पिता की गाढ़ी कमाई और त्याग के बल पर दूर-दूर से आकर अपनी उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। जो पिता अपना पेट काटकर बेटी को पढ़ाता है, उसके स्नेह और संरक्षण को ‘नियंत्रण’ या ‘पिंजरा’ बता देना भारतीय परिवार के यथार्थ के साथ सबसे बड़ा छल है।

भारत में कमियाँ अवश्य रही हैं, और हर जीवंत समाज की तरह हमने अपनी ऐतिहासिक कुप्रथाओं का सामना करते हुए निरंतर सुधार भी किया है। हमारे यहाँ समय-समय पर संत, सुधारक और मनीषी पैदा हुए जिन्होंने समाज को भीतर से परिष्कृत किया। हमारे पूर्वजों ने स्त्री की गरिमा और मर्यादा की रक्षा के लिए महायुद्ध लड़े चाहे वह त्रेतायुग में माता सीता की रक्षा के लिए रावण के विरुद्ध राम का संघर्ष हो, या महाभारत का कालजयी प्रसंग, जो स्त्री के अपमान के विरुद्ध लड़ा गया था। हमने अपनी गलतियों को स्वीकारा है और लगातार सुधरते हुए आज दुनिया के सबसे आधुनिक, सहिष्णु और जीवंत समाजों में अपनी जगह बनाई है।

भारत की स्त्री को शिक्षा, सुरक्षा, संपत्ति और निर्णय लेने की पूर्ण स्वतंत्रता चाहिए, और आज देश की बेटियाँ हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। लेकिन उन्हें अपनी ही संस्कृति, अपने माता-पिता और अपने परिवार के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाली वह पश्चिम-प्रेरित विचारधारा नहीं चाहिए जो हर भारतीय रिश्ते को शोषण का साधन मानती है। सुधार और आत्मद्वेष में बहुत बड़ा अंतर होता है। इतिहास और न्याय की ईमानदार माँग यही है कि यदि कसौटी तय होगी, तो वह सार्वभौमिक होगी वह भारत से लेकर इटली, यूरोप, चर्च के इतिहास, क्रिश्चियनिटी और इस्लाम तक, हर उस चौखटे पर समान रूप से लागू होगी जहाँ नारी की स्वतंत्रता, गरिमा और उसके आंसुओं पर पहरे बिठाए जाते हैं।

पुणे विमर्श, राहुल भारत को भी इटली बना देना चाहते हैं!

art_298_pg1_1787637344.jpg

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

पुणे। अभी इसी माह 22 अगस्त को पुणे, महाराष्ट्र में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी द्वारा जनरेशन-जेड की छात्राओं और युवतियों के बीच जिस आक्रामक शैली में “पितृसत्ता को ध्वस्त करने” और महिलाओं को “किसी की संपत्ति न होने” का आह्वान किया, वह पहली नजर में महिलाओं के अधिकारों के प्रति एक प्रगतिशील झुकाव लगता है, परंतु, यदि इस भाषण की वैचारिक परतों, प्रयुक्त शब्दावलियों और इसके पीछे छिपे आर्थिक-सांस्कृतिक दर्शन का गहनता से अध्‍ययन किया जाए, तो इसमें एक गहरा अंतर्विरोध और खतरनाक प्रतिमान स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जिसका उद्देश्‍य भारत की समाज व्‍यवस्‍था को तोड़ना है।

इसे लेकर आप यह भी कह सकते हैं कि राहुल गांधी का यह भाषण वास्तव में भारत की गौरवशाली और सुरक्षात्मक परिवार व्यवस्था पर पाश्चात्य ‘हाइपर-इंडिविजुअलिज्म’ (अति-व्यक्तिवाद) और ‘बाजारवादी नारीवाद’ को थोपने का एक सुनियोजित प्रयास है। यह विचारधारा स्त्री को उसकी सांस्कृतिक जड़ों, पारिवारिक बंधनों और सामूहिक मर्यादाओं से पूरी तरह काटकर उसे बाजार के लिए एक स्वतंत्र, अकेली और असुरक्षित आर्थिक इकाई में तब्दील करना चाहती है। इसलिए वे भारतीय परिवारों के परस्पर पूरकता के सिद्धांत को ‘शोषक व्यवस्था’ बता रहे हैं।

पुणे में राहुल गांधी ने छात्राओं से कहा कि वे समाज द्वारा तय किए गए बंधनों के खिलाफ “मुखर और निडर” बनें। इस बयान की अंतर्निहित भावना सीधे तौर पर पश्चिमी ‘कल्चरल मार्क्सवाद’ से प्रेरित है। पारंपरिक मार्क्सवादी दर्शन जहाँ समाज को अमीर और गरीब के आर्थिक संघर्ष में बांटता था, वहीं ‘कल्चरल मार्क्सवाद’ इसी वर्ग-संघर्ष को परिवार के भीतर पति-पत्नी, पिता-पुत्री और भाई-बहन के पवित्र संबंधों पर लागू कर देता है।

राहुल गांधी ने अपने भाषण में इसी सिद्धांत को हवा दी है, जहाँ उन्होंने परिवार के पुरुष सदस्यों द्वारा दिए जाने वाले पारंपरिक स्नेह और ‘संरक्षण’ को एक ‘दमनकारी सत्ता’ या ‘अधीनता’ के रूप में चित्रित किया। जबकि भारतीय दर्शन के अनुसार, परिवार एक ऐसी जैविक इकाई है जहाँ पुरुष और महिला एक-दूसरे के ‘पूरक’ हैं। पुणे का भाषण इस पूरकता के सिद्धांत पर आघात करता है और युवतियों के मन में यह धारणा पैदा करने की कोशिश करता है कि उनके अपने माता-पिता या परिवार द्वारा लगाई गई नैतिक मर्यादाएं उनके विकास में बाधा हैं। यह सोच अंततः परिवार के भीतर अविश्वास और विखंडन का बीज बोती है।

वस्‍तुत: जब पाश्चात्य ‘कल्चरल मार्क्सवाद’ के चश्मे से परिवार के स्नेहपूर्ण संरक्षण और नैतिक सीमाओं को ‘बंधक’ या ‘शोषण’ मान लिया जाता है, तो परिवार के भीतर अविश्वास जन्म लेता है। स्वतंत्रता की इस अति-आक्रामक परिभाषा से प्रेरित होकर युवतियां अनजाने में अपने ही माता-पिता, पति या पारिवारिक मूल्यों से विच्छेद (अलग) होने लगती है। इसका तात्कालिक परिणाम यह होता है कि महिलाओं को समाज में सुरक्षा देने वाला सदियों पुराना पारिवारिक ढांचा कमजोर हो जाता है।

भारतीय संस्कृति का विकृतिकरण और बाजार का एजेंडा

राहुल गांधी ने पुणे में जोर देकर कहा, “आप अपने अलावा किसी और की नहीं हैं। आप किसी की संपत्ति नहीं हैं।” यह वाक्य सुनने में आकर्षक लगता है, परंतु यह भारतीय सामाजिक परंपराओं का एक घोर विकृतिकरण है। क्‍योंकि पारंपरिक बंधन में स्त्री को परिवार की धुरी माना गया है। लेकिन जब कोई स्‍त्री परिवार के संबंधों को बंधन मान कर तोड़ देती है ओर अपने परिवार से विच्‍छेद करती है तब वह फिर बाजार के हाथों में खेलने लगती है।

बाजार चाहता है कि स्त्री परिवार की धुरी न रहे, वह बच्चों की परवरिश और घर के बुजुर्गों की देखभाल जैसी “बिना भुगतान वाली” भूमिकाओं को छोड़कर 12 घंटे कॉर्पोरेट दफ्तरों में श्रम करे। इस प्रकार, परिवार से कटी हुई महिला बाजार के लिए एक ‘सस्ती श्रमिक’ और कॉस्मेटिक्स, फैशन व उपभोक्ता वस्तुओं की एक ‘बड़ी खरीदार’ बन जाती है। यह स्त्री की मुक्ति कैसे हो सकती है, यह तो उसका बाजारवादी कहीं दोहन तो कहीं शोषण है!

दूसरी ओर भारतीय संस्कृति है, जिसमें कभी भी स्त्री को ‘पुरुष की कानूनी संपत्ति’ नहीं माना गया। सनातन परंपरा में स्त्री को ‘गृहलक्ष्मी’, ‘अर्धांगिनी’ और ‘शक्ति’ का सर्वोच्च स्थान दिया गया है। जब राहुल गांधी इस व्यवस्था को ‘संपत्ति की मानसिकता’ कहते हैं, तो वे वास्तव में पाश्चात्य और मध्यकालीन यूरोपीय इतिहास की बुराइयों को भारतीय समाज पर थोप रहे होते हैं, क्योंकि यूरोप के रोमन कानून में महिलाओं को सचमुच पुरुष की कानूनी संपत्ति माना जाता था और बहुत हद तक आज भी माना जाता है, (कैथोलिक इटली, जहां से इनकी मां हैं आज भी आसानी से देखा जा सकता है)

सोनिया गांधी की इतालवी विरासत: ‘माचिस्मो’ का अहंकार और दोहरा मापदंड

यह अत्यंत विचारणीय तथ्य है कि राहुल गांधी भारत की जिस पितृसत्ता को ध्वस्त करने की बात पुणे के मंच से कर रहे थे, उसका वास्तविक और कठोर रूप उनकी अपनी माता सोनिया गांधी के मूल देश इटली में आज भी सांख्यिकीय रूप से मौजूद है। परंतु, राहुल गांधी ने कभी भी इतालवी समाज या कैथोलिक ईसाई पंथ के भीतर मौजूद महिला दमन पर कोई टिप्पणी नहीं की, जो उनके पुरुष अहंकार और राजनीतिक चयनात्मकता को उजागर करता है।

इतालवी सांख्यिकी संस्थान (आईएसटीएटी) और यूरोपीय संघ के वर्ष 2025-2026 के आंकड़ों के अनुसार, इटली में आज भी 43 फीसद महिलाएँ कार्यबल से पूरी तरह बाहर हैं, इटली में जेंडर पे गैप 17.4 प्रतिशत तक है, जहाँ एक ही पद पर काम करने के बावजूद महिलाओं को पुरुषों से कम वेतन मिलता है। इटली में तलाक की दर लगभग 48.3 फीसद है, जो यह दर्शाती है कि जिस पाश्चात्य ‘बाजारवादी मुक्ति’ और अति-व्यक्तिवाद का मॉडल राहुल गांधी भारत में लाना चाहते हैं, उसने इटली के पारिवारिक ताने-बाने को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। क्या राहुल गांधी पुणे की युवतियों को ऐसा समाज देना चाहते हैं जहाँ हर दूसरा परिवार टूटा हुआ हो और महिलाएँ अकेलेपन व मानसिक तनाव से जूझ रही हों?

भारत बनाम इटली में महिला सुरक्षा का यथार्थ

पुणे के भाषण में राहुल गांधी ने भारत की सामाजिक व्यवस्था को महिलाओं के लिए एक दमनकारी संरचना के रूप में पेश किया। परंतु, यदि हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जनसंख्या के अनुपात (प्रति लाख आबादी पर दर) के आधार पर भारत और इटली की तुलना करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि पश्चिमी देशों का सामाजिक ढांचा महिलाओं के लिए कहीं अधिक असुरक्षित और हिंसक है।

विश्‍व सांख्यिकी (जैसे संयुक्त राष्ट्र यूएनओडीसी, यूरोपीय संघ की एफआरए 2026 रिपोर्ट और भारत की एनसीआरबी 2024–2026 रिपोर्ट) के अनुसार भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध की राष्ट्रीय दर 64.6 मामले प्रति एक लाख महिला जनसंख्‍या पर हैं। दूसरी ओर यूरोपीय संघ (ईयू) के देशों में जनसंख्या के अनुपात में वार्षिक दर्ज अपराधों की औसत दर लगभग 125 मामले प्रति एक लाख महिला जनसंख्‍या है। यह दर भारत से कहीं अधिक है। यानी यौन हिंसा, अन्‍य जितने भी महिला उत्‍पीड़न एवं हिंसा के प्रकार हो सकते हैं, युरोप उन सभी अपराध मामलों में भारत से कई गुना आगे है। पाश्चात्य समाज में महिलाओं के खिलाफ घरेलू और यौन हिंसा का प्रतिशत अधिक है। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत की पारंपरिक परिवार व्यवस्था, जिसे राहुल गांधी पुणे में कोस रहे थे, वास्तव में महिलाओं को एक अत्यंत मजबूत सुरक्षात्मक कवच प्रदान करती है।

राहुल गांधी का वैचारिक खोखलापन

पुणे के भाषण में राहुल गांधी ने एक बार फिर पारंपरिक हिंदू व्यवस्था और प्राचीन ग्रंथों को निशाने पर लिया, परन्‍तु वे भारत और दुनिया भर में इस्लाम और ईसाइयत के भीतर मौजूद संस्थागत महिला दमन पर पूरी तरह मौन रहे। यह चुप्पी सिद्ध करती है कि उनका यह विमर्श सिर्फ राजनैतिक ध्रुवीकरण के लिए था।

यदि राहुल गांधी महिलाओं की पूर्ण स्वतंत्रता के इतने ही बड़े पक्षधर हैं, तो वे मुस्लिम महिलाओं को शरिया कानून के तहत पैतृक संपत्ति में मिलने वाले असमान अधिकारों और बहुविवाह जैसी कुप्रथाओं पर पुणे में क्यों नहीं बोले? जब भारत की संसद ने मुस्लिम महिलाओं को नारकीय जीवन से मुक्ति दिलाने के लिए ‘तीन तलाक’ के खिलाफ कानून बनाया, तो राहुल गांधी और उनकी पार्टी ने उसके खिलाफ मतदान क्‍यों किया । अरे, इतिहास में जाएं तो उनके पिता राजीव गांधी ने भी शाहबानों प्रकरण में यही किया था!

इसी तरह, वेटिकन और कैथोलिक चर्च के वे नियम जो महिलाओं को आज भी पादरी बनने के अधिकार से वंचित करते हैं और गर्भपात जैसी आपातकालीन चिकित्सा स्थितियों पर पूर्ण रिलीजियस प्रतिबंध लगाते हैं, सच कहें तो उन पर राहुल गांधी की चुप्पी उनके वैचारिक दोहरे मापदंड को उजागर करती है। यह चयनात्मकता दर्शाती है कि वे सिर्फ और सिर्फ हिंदू महिलाओं को उनकी सामाजिक परंपराओं से अलग करना चाहते हैं।

ऐसे में कहना यही होगा कि पुणे में राहुल गांधी द्वारा दिया गया भाषण भारतीय सामाजिक मूल्यों को नष्ट करके एक विघटनकारी पाश्चात्य बाजारवादी मॉडल को स्थापित करने का प्रयास है। स्त्री को उसके परिवार से पूरी तरह मुक्त कर देने का नारा सुनने में तो आकर्षक हो सकता है, पर इसका अंतिम परिणाम समाज का विखंडन, अकेलेपन का संकट और महिलाओं की सुरक्षात्मक प्रणाली का ध्वस्त होना है, जैसा कि इटली और अन्य यूरोपीय देशों के आंकड़े साबित करते हैं। लगता भी यही है कि राहुल गांधी भारत को भी अपनी मां के देश इटली जैसा बना देना चाहते हैं, जिसमें स्‍त्री हिंसा और दमन अपने चरम पर है।

ओणम: अन्न से प्राण और प्राण से परमात्मा तक की आध्यात्मिक यात्रा

unnamed-7.jpg
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

कोच्चि। ओणम को सामान्यतः केरलम् के प्रमुख फसल पर्व और राजा महाबली की स्मृति से जुड़ा उत्सव माना जाता है। घरों में पुक्कलम सजते हैं, ओणसद्या बनती है, नौका प्रतियोगिताएं होती हैं और लोकजीवन उल्लास से भर उठता है। केरलम् पर्यटन भी ओणम को फसल उत्सव तथा महाबली और वामन की परंपरा से संबंधित पर्व के रूप में वर्णित करता है, किंतु भारतीय दर्शन की दृष्टि से ओणम को समझने पर इसके भीतर प्रकृति, अन्न, प्राण, चेतना, समर्पण और परम सत्ता के बीच संबंध का अत्यंत गहरा सूत्र दिखाई देता है।

यह सूत्र तैत्तिरीय उपनिषद के पंचकोश चिंतन से लेकर ऋग्वेद में वर्णित विष्णु के त्रिविक्रम स्वरूप और श्रीमद्भागवत में राजा बलि के आत्मसमर्पण तक जाता है। इस दृष्टि से ओणम अन्न की समृद्धि का उत्सव होने के साथ जीवनदायिनी प्राणशक्ति के प्रति कृतज्ञता और उस विराट सत्ता के प्रति समर्पण का पर्व भी बन जाता है, जो समस्त सृष्टि में व्याप्त है।

अन्न: जीवन का पहला आधार

तैत्तिरीय उपनिषद मानव अस्तित्व को पांच स्तरों में समझाता है। ये हैं अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोष। यह चिंतन मनुष्य को उसके स्थूल शरीर से लेकर चेतना के सूक्ष्मतम स्तर तक ले जाता है। तैत्तिरीय उपनिषद की ब्रह्मानंदवल्ली में कहा गया है- “अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते। अथो अन्नेनैव जीवन्ति। अथैनदपि यन्त्यन्ततः।” (तैत्तिरीय उपनिषद, ब्रह्मानंदवल्ली, 2.1.1)

अर्थ स्पष्ट है कि प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न से जीवन धारण करते हैं और अंततः उसी प्रकृति में लौट जाते हैं। तैत्तिरीय उपनिषद की भृगुवल्ली में इसी चिंतन को और आगे ले जाकर कहा गया है- “अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्।” (तैत्तिरीय उपनिषद, भृगुवल्ली, 3.2.1)

यहां अन्न को ब्रह्म के चिंतन का विषय बनाया गया है। साधक की ब्रह्मज्ञान की यात्रा में अन्न एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। शरीर अन्न से बना है, शरीर के माध्यम से जीवन का अनुभव होता है और इसी जीवन से चेतना की उच्चतर खोज प्रारंभ होती है। वस्‍तुत: यहीं ओणम का पहला आध्यात्मिक अर्थ सामने आता है। खेत की फसल पृथ्वी, जल, सूर्य, ऋतु, बीज और मानव श्रम की संयुक्त परिणति है, इसलिए नई फसल का स्वागत प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संस्कार है।

अन्न से प्राण की ओर

तैत्तिरीय उपनिषद की भृगुवल्ली अन्न के बाद प्राण को ब्रह्म की खोज में अगला सोपान बनाती है। वहां कहा गया है, “प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्। प्राणाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। प्राणेन जातानि जीवन्ति।” (तैत्तिरीय उपनिषद, भृगुवल्ली, 3.3.1)। यहां दर्शन एक महत्वपूर्ण दिशा ग्रहण करता है। अन्न शरीर का आधार है, प्राण उस शरीर को जीवन देता है। अन्नमय कोष के भीतर प्राणमय कोष की अनुभूति होती है, इसीलिए अन्न और प्राण को अलग-अलग खानों में बांटकर देखने के बजाय भारतीय चिंतन उन्हें जीवन की निरंतर प्रक्रिया के दो जुड़े हुए स्तरों के रूप में देखता है।

अब इसे ओणम पर्व के साथ जोड़कर देखें, तब ध्‍यान में आता है कि खेत में पैदा हुआ अन्न प्रकृति की संचित ऊर्जा है। मनुष्य जब उसे ग्रहण करता है, तो वही ऊर्जा शरीर और प्राण की गतिविधियों को संचालित करती है। इस अर्थ में फसल का उत्सव जीवन के उत्सव में बदल जाता है।

विष्णु: विराट व्याप्ति का वैदिक प्रतीक

ओणम के दूसरे महत्वपूर्ण पक्ष को समझने के लिए विष्णु के वैदिक स्वरूप पर ध्यान देना आवश्यक है। ऋग्वेद के विष्णु सूक्त में उनके त्रिविक्रम रूप का उल्लेख मिलता है- “इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम्।” (ऋग्वेद, मंडल 1, सूक्त 22, मंत्र 17)। अगले मंत्र में विष्णु के तीन पगों का उल्लेख है- “त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः।” (ऋग्वेद, 1.22.18)। वस्‍तुत: ऋग्वैदिक विष्णु के ये तीन पग आगे चलकर वामन और त्रिविक्रम की पुराण परंपरा में अत्यंत प्रभावशाली प्रतीक बनते हैं। सायण भाष्य में विष्णु के तीन पगों को पृथ्वी, अंतरिक्ष और द्युलोक से संबंधित व्याख्या भी प्राप्त होती है।
अत: वामन कथा को सिर्फ राजा और एक ब्राह्मण बालक के बीच भूमि के दान की कथा मान लेना भारी भूल होगी, क्‍योंकि इस वक्‍त जिस तरह का नैरेटिव चलाने का प्रयास हो रहा है, उसमें यह भी एक चिंता का विषय है! वस्‍तुत: यह दृष्टिकोण उसके वैदिक संदर्भ को सीमित कर देता है, जबकि इसके भीतर विराट सत्ता की सर्वव्यापकता का भाव जुड़ा है।

महाबली और तीन पग का रहस्य

श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध में वामन भगवान और राजा बलि का प्रसंग विस्तार से आता है। बलि अत्यंत शक्तिशाली और दानी राजा थे। वामन ने उनसे तीन पग भूमि मांगी। बलि ने वचन दे दिया। वामन ने विराट रूप धारण किया और दो पगों में समस्त उपलब्ध क्षेत्र को नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए स्थान शेष नहीं था। यही कथा का मोक्ष क्षण है, जिसमें देह की मुक्‍ति है, भीतर का मोह ब्रह्म से समा जाता है। एकल सत्‍ता, परासत्‍ता में विलुप्‍त हो जाती है, क्षण, विलुप्‍त हो चुका हुआ है, व्‍यक्‍ति, विराट में समा जाता है, वह उसी का स्‍वरूप बन जाता है।

वस्‍तुत: इस कथा में बलि ने अपना सिर प्रस्तुत करते हुए कहा- “पदं तृतीयं कुरु शीर्ष्णि मे निजम्।” (श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कंध 8, अध्याय 22, श्लोक 2) यह वाक्य भारतीय आध्यात्मिक चिंतन में आत्मसमर्पण का अत्यंत प्रभावशाली प्रतीक बन गया। बलि के पास धन था, भूमि थी, सत्ता थी, प्रतिष्ठा थी। दो पगों में सब चला गया। तीसरे पग के लिए उन्होंने अपना सिर दे दिया। अर्थात् बाहरी संपत्ति के बाद स्वयं का अहंकार भी समर्पित कर दिया।

बलि का समर्पण और विष्णु की स्वीकृति

यहां ‘बलि’ और उसके भाव को व्‍यापक अर्थों में समझने की आवश्‍यकता है। सिर्फ दान के अर्थ में जो इस घटनाक्रम को देखेंगे वह शायद इस कथा से बहुत कुछ प्राप्‍त न कर पाएं। कथा का आध्यात्मिक पक्ष यह है कि मनुष्य जब अपनी संपत्ति को अपना अंतिम सत्य मानता है, तब वामन उसे विराट सत्ता का बोध कराते हैं। पृथ्वी, आकाश और समस्त लोक जिस सत्ता के भीतर हैं, उनके सामने व्यक्तिगत स्वामित्व का अहंकार सीमित हो जाता है।

बलि का मस्तक आगे बढ़ाना इसी बोध का प्रतीक है। यह पराजय से अधिक आत्मस्वीकृति है। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके पास ऐसा कुछ नहीं है जो उस विराट सत्ता से बाहर हो। इसी कारण वामन द्वारा तीसरा चरण बलि के सिर पर रखना केवल दंड की घटना नहीं है। भागवत परंपरा में इसके बाद बलि को सुतल लोक का अधिपति बनाए जाने और भगवान द्वारा उनके द्वारपाल बनने की कथा आती है। समर्पण यहां अनुग्रह का द्वार बनता है।

ओणम में अन्न, प्राण और विष्णु का मिलन

अब ओणम के मूल स्वरूप को समझना आसान हो जाता है। फसल अन्न का प्रतीक है। अन्न शरीर का आधार है। शरीर में प्राण जीवन की गति पैदा करता है। प्राण और प्रकृति के पीछे जो विराट व्यवस्था है, भारतीय चिंतन उसे परम सत्ता से जोड़कर देखता है, इसलिए ओणसद्या इस अन्न संस्कृति की सामूहिक अभिव्यक्ति है। पुक्कलम प्रकृति के सौंदर्य का उत्सव है। वल्लमकली सामूहिक ऊर्जा और जीवन के उल्लास को अभिव्यक्त करती है।

इस प्रकार ओणम में खेत से घर तक और शरीर से चेतना तक एक निरंतर संबंध दिखाई देता है। अन्न जीवन देता है, प्राण उसे गति देता है और आध्यात्मिक चिंतन मनुष्य को उस व्यापक सत्ता की ओर ले जाता है जिसके सामने बलि अपना मस्तक अर्पित करते हैं।

पंचकोश से आनंदमय कोष तक

तैत्तिरीय उपनिषद की यात्रा अन्नमय से प्राणमय, प्राणमय से मनोमय, मनोमय से विज्ञानमय और अंततः आनंदमय कोष तक पहुंचती है। इस क्रम को ओणम के प्रतीकात्मक अर्थ से जोड़कर देखें तो पर्व की बाहरी समृद्धि धीरे धीरे आंतरिक आनंद की ओर संकेत करती है। अन्न हमें जीवन का आधार देता है। प्राण जीवन को गति देता है। मन अनुभव करता है। विज्ञान विवेक प्रदान करता है और आनंद उस गहरे संतोष की अनुभूति है जिसमें व्यक्ति अपने अस्तित्व को व्यापक सत्य से जोड़ता है। वहीं, अन्नमय कोष मनुष्य को उसकी प्रकृति से जोड़ता है, प्राणमय कोष जीवन की अनुभूति कराता है और आत्मसमर्पण उसे उस विराट चेतना की ओर ले जाता है, जिसे वैदिक परंपरा विष्णु की व्यापकता और त्रिविक्रम सत्ता के रूप में स्मरण करती है।

इस दृष्टि से महाबली की कथा ओणम के भीतर एक महत्वपूर्ण आत्मिक संदेश रखती है। बाहरी वैभव मनुष्य को महान नहीं बनाता। महानता तब प्रकट होती है जब मनुष्य अपने अहंकार से ऊपर उठकर विराट सत्ता के प्रति समर्पण का भाव स्वीकार करता है। ओणम का सबसे गहरा संदेश शायद यही है कि अन्न का सम्मान जीवन का सम्मान है, प्राण का सम्मान चेतना का सम्मान है और अहंकार का समर्पण परम सत्ता की ओर मनुष्य की यात्रा है।

यहां महाबली की कथा मनुष्य को बता रही है कि सत्ता और संपत्ति सीमित हैं। वामन का त्रिविक्रम रूप का संदेश ही यही है कि विराट सत्ता के सामने संसार की सीमाएं छोटी हैं। यही ओणम का वह आध्यात्मिक आयाम है, जो फसल की सुनहरी बालियों, ओणसद्या की थाली, फूलों के पुक्कलम और महाबली के झुके हुए मस्तक को एक ही दार्शनिक सूत्र में पिरो देता है। यहां उत्सव बाहर भी है और भीतर भी। खेत में अन्न की समृद्धि है और अंतर्मन में समर्पण का भाव। यही समृद्धि और समर्पण मिलकर ओणम को भारत के हिन्‍दू जीवनदर्शन के एक विशिष्ट पर्व के रूप में स्थापित करते हैं।

scroll to top