दिल्ली में सांस लेना हुआ दुभर

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आपको जान कर हैरानी होगी कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली मीडिया संस्थानों में पर्यावरण को लेकर कोई डेस्क नहीं है, जहां पर्यावरण जैसे गंभीर मसले पर रिपोर्टिंग करने वाले विषय की समझ रखने वाले पत्रकारों की तैनाती हो

एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल तकरीबन 12 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण के कारण होती है। जिसकी वजह से देश की जीडीपी में 03 फीसदी का नुकसान होता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इसके पीछे खेतों की पराली, गाड़ी से निकलने वाले धुआं, फॉसिल फ्यूल और इंडस्ट्री से निकलने वाले धुएं को बढ़ते प्रदूषण का जिम्मेदार माना है। यही कारण है कि प्रदूषण ना सिर्फ दिल्ली के लिए बल्कि समूचे विश्व के लिए एक चिंता का विषय बना हुआ है।

उज्ज्वल मिश्रा अर्नव

प्रदूषण दिल्ली, पंजाब, हरियाणा के साथ-साथ पूरे उत्तर भारत के लिए भी मुसीबत बन चुका है। यह दिल्ली के आलावा उत्तर प्रदेश , बिहार , झारखंड और पश्चिम बंगाल को भी सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। केंद्रीय प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2019 में वाराणसी को देश के सबसे प्रदूषित शहरों की श्रेणी में रखा गया था। हालांकि दिल्ली अक्सर केंद्र में होती है। कारण है दिल्ली में मीडिया का केंद्र होना जिसके वजह से प्रदूषण का स्तर बढ़ते ही दिल्ली को ही ज्यादातर केंद्रित किया जाता है। परन्तु एक सच्चाई यह भी है कि जब प्रदुषण का स्तर बेहद ही खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है तब सरकार को या फिर मीडिया को इस विषय को उठाने का मौका मिलता है उससे पहले ना ही मीडिया पर्यावरण को लेकर कभी सजग रही है ना ही सरकारें।

आंकड़े – आपको बता दें कि “IQAir” की 2020 “वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट” में 106 देशों के प्रदूषण स्तर की जांच की गई जिसमें दुनिया के 50 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में से 35 भारत में पाए गए। जिसमें दिल्ली को 10 वें सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर और दुनिया की सबसे ज्यादा प्रदूषित राजधानी बताया गया है। लिहाजा यह एक बेहद ही चिंताजनक स्थिति है। कुछ रिपोर्ट्स तो यह कहती हैं कि दिल्ली में रहने वाले लोगों की आयु वहां की प्रदूषित हवा के कारण 10 वर्ष कम हो रही है। लोगों के फेफड़े वक्त से पहले खराब होने लगते हैं वहीं उन्हें आगे चलकर अस्थमा जैसी समस्याओं से भी जूझना पड़ता है। हालाँकि, दिल्ली की वायु गुणवत्ता में वर्ष 2019 से वर्ष 2020 के बीच लगभग 15% का सुधार दर्ज किया गया है।

राजधानी दिल्ली में जब कभी प्रदूषण का स्तर अधिक हो जाता है तो यहां सरकार द्वारा एक (GRADED RESPONSE ACTION PLAN) को लागू कर दिया जाता है। जिसके अंर्तगत प्रदूषण के बढ़ते स्तर को देखते हुए दिल्ली में फैक्ट्रियां , कंस्ट्रक्शन वर्क के साथ साथ स्कूलों को बंद कर दिया जाता है , साथ ही ऑड-इवेन जैसे फार्मूले लागू कर दिए जाते हैं। जिससे प्रदूषण को कम करने में बहुत कम ही सही पर मदद
मिलती है।

प्रमुख कारण – दिल्ली में वायु प्रदूषण का एक प्रमुख कारण शहर की लैंडलॉक भौगोलिक स्थिति के साथ साथ पड़ोसी राज्यों (पंजाब, हरियाणा और राजस्थान) में पराली जलाने की घटनाएँ , वाहन उत्सर्जन , औद्योगिक प्रदूषण , बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियाँ मुख्य रूप से शामिल हैं। मिनिस्ट्री ऑफ अर्थ साइंसेज के अंर्तगत आने वाली एक एजेंसी “SAFAR” अर्थात (सिस्टम ऑफ एयर क्वॉलिटी & वेदर फॉरकेस्टिंग) ने दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के पीछे 46 % ज़िम्मेदार “पराली” को माना है। आपको बता दें कि यह एजेंसी वायु गुणवक्ता की जांच कर उस पर रिसर्च करती है , और प्रदूषण के पीछे की मुख्य वजह का पता लगा कर अपना रिपोर्ट्स तैयार करती है। पड़ोसी राज्य जैसे पंजाब और हरियाणा में अक्सर किसान अपने समय और पैसे बचाने के लिए खेतों की पराली जला देते हैं। जिससे की पराली का धुंआ सीधे दिल्ली की तरफ आने लगता है और उसके कारण दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। पिछले साल नवंबर में जब पराली (Stubble) जलाए गए उस पूरे समय में दिल्ली में PM 2.5 का औसत स्तर 144 माइक्रोग्राम्स प्रति क्यूबिक मीटर दर्ज किया गया था। जबकि, दिसंबर में यह 157 माइक्रोग्राम्स प्रति क्यूबिक मीटर दर्ज किया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा शहर के 15 स्थानों पर “एम्बिएंट एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशन” का निर्माण किया गया है। यह तकनीक शहर के प्रदूषित वातावरण में धूल के कणों का पता लगाती है। साथ ही इसकी मदद से पर्यावरण को प्रदूषित करने वाली जहरीली गैसों का भी पता लगाया जा सकता है। कुछ रिपोर्ट्स की मुताबिक ये उपकरण पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले छह हानिकारक कारकों को भांप कर समय से पर्यावरण प्रदूषण पर लगाम लगाने में कारगर साबित हो रहे हैं।

फिलहाल वाराणसी के पंद्रह जगहों पर एम्बिएंट एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशन बनाए गए हैं जिसमें “तरना, पंचक्रोशी मार्ग, पड़ाव, कैंट स्टेशन, अर्दली बाजार, बौलिया, कंदवा, BHU, आदमपुर, भेलूपुर, मलदहिया, चितरंजन पार्क, मंडुवाडीह, शास्त्री चौक और सारनाथ ” शामिल है। यहां की हवा को साफ बनाए रखने के लिए इसकी निगरानी “रियल टाइम एम्बिएंट एयर क्वालिटी मानिटरिंग स्टेशन” से की जाती है और एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) की सूचना हर दस मिनट पर कंट्रोल रूम में भेजी जाती है। इस तकनीक में छह तरह के अत्याधुनिक सेंसर लगे हुए हैं जो कि शहर की वायु में प्रदूषणों के मानकों की रियल टाइम सूचना कंट्रोल रूम को देते हैं। लिहाजा मुझे लगता है कि इस तरह के उपाय अन्य राज्य सरकारों को भी करना चाहिए जिससे कि बढ़ते प्रदूषण पर रोक लगाया जा सके।

आपको जान कर हैरानी होगी कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली मीडिया संस्थानों में पर्यावरण को लेकर कोई डेस्क नहीं है, जहां पर्यावरण जैसे गंभीर मसले पर रिपोर्टिंग करने वाले विषय की समझ रखने वाले पत्रकारों की तैनाती हो। यहां तक की सरकारों की भी नींद तभी खुलती है जब स्थिति भयावह हो जाती है। कारण हमारा चुनाव करना भी है। जब तक आप और हम जैसे लोग पर्यावरण जैसे विषय की गंभीरत को नहीं समझेंगे और निरर्थक मुद्दों पर सरकार चुनते रहेंगे, तब तक ऐसा ही होता रहेगा। हमें कहीं न कहीं गंभीर और महत्वपूर्ण विषयों पर सरकार का चुनाव करना होगा जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य , रोजगार, गरीबी और पर्यावरण शामिल हों। साथ ही पर्यावरण के प्रति हमें भी सजग होना होगा। जितना हो सकें यातायात के साधनों का प्रयोग करें , बदलते वक्त के साथ साथ पेट्रोल डीजल वाहनों की जगह इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रयोग करें अपने आस पास ज्यादा से ज्यादा पेड़ पौधे लगाएं ताकि हम अपने आने वाले भविष्य को एक बेहतर पर्यावरण दे सकें।

mishraarnav89@gmail.com

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विश्व शांति व बंधुत्व के लिए हिंदुत्व का मार्ग ही श्रेष्ठ – आलोक कुमार

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  • विश्व बंधुत्व दिवस पर एनडीटीएफ डीयू ने आयोजित किया विशेष कार्यक्रम
  • आलोक कुमार, प्रो. केजी सुरेश व अनंत विजय ने रखे अपने विचार

बिजेंद्र कुमार

विश्व शांति व बंधुत्व के लिए हिंदुत्व का मार्ग ही श्रेष्ठ है। हजारों सालों से हिंदुत्व की विचारधारा ने साबित किया है कि विश्व को जोड़ने और आपसी प्रेम के साथ सभी के विचारों, धार्मिक आस्थाओं व आचार व्यवहार को स्वीकार कर आगे बढ़ने का अवसर हिन्दुत्व प्रदान करता है। विश्व में जहां इस्लाम और अन्य धर्म के प्रचारकों व शासकों ने धर्म परिवर्तन का मार्ग अपनाया वहीं हिंदुत्व ने सभी को उसी रूप में उन मान्यताओं के साथ अपनाया जो कि अनुयायी को स्वीकार है। हिंदुत्व वह भाव है जो सभी को उनके वास्तविक स्वरूप के साथ स्वीकार करता है वो चाहे किसी भी विचार और मान्यता के पक्षधर क्यों न हो। आयुर्वेद व प्रणायाम आदि पर किसी धर्म विशेष का एकाधिकार व पेटेंट नहीं है। यही हिंदुत्व का भाव है जो हजारों सालों से विश्व शांति और बंधुत्व के भाव को लेकर निरंतर आगे बढ़ रहा है। स्वामी विवेकानंद ने हिंदुत्व के इसी स्वरूप को शिकागो में व्यक्त कर समूचे विश्व को हिंदुत्व से अवगत कराया था। ये विचार विश्व हिंदू परिषद् के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने नेशनल डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट (एनडीटीएफ) की ओर से ‘हिंदुत्व: विश्व शांति का सशक्त मार्ग’ विषय पर आयोजित ऑनलाइन वेबिनार में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए व्यक्त किए। इस आयोजन में अतिथि वक्ता के रूप में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के जी सुरेश व वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय ने भी संबोधित किया।

विश्व हिंदू परिषद् के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार


एनडीटीएफ के बौद्धिक प्रकोष्ठ की ओर से स्वामी विवेकानंद के शिकागों में दिए गए ऐतिहासिक भाषण के 128 वर्ष होने के उपलक्ष में इस वेबिनार का आयोजन किया गया। इसमें मुख्य वक्ता आलोक कुमार ने अमेरिका में हिंदुत्व के विरुद्ध होने सम्मेलन का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें एक खास उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए हिंदुत्व के खिलाफ दुष्प्रचार करने का प्रयास किया जा रहा है जोकि प्रामाणिकता से एकदम परे है। उन्होंने कहा कि हिन्दुत्व के विचार में सभी की स्वीकार्यता है। हिन्दुत्व विश्व समाज को जोड़ता है जबकि अन्य धर्मों में अलगाव का भाव सर्वविदित है। इतिहास गवाह है कि हिन्दुत्व ने हर किसी को उसके मौलिक रूप और विचार के साथ ही स्वीकार किया है, फिर वो चाहे यहूदी हो, पारसी हो या फिर बौध धर्म को मानने वाले हो। उन्होंने कहा कि विश्व ने हिन्दुत्व का विचार देखा, समझा और अपनाया है और विश्वशांति व बंधुत्व के भाव का प्रचार किया हैं। हिन्दुत्व ने सदैव से जगतगुरू का दायित्व निभाया है और आगे भी निभाता रहेगा।
आयोजन में शामिल अतिथि वक्ता प्रो. के जी सुरेश ने कहा कि आज समय आ गया है कि विमर्श का जवाब विमर्श के साथ दिया जाए। अगर हिंदुत्व के खिलाफ कोई नरैटिव स्थापित करने की दिशा में प्रयास करता है तो हमें भी उसके जवाब में नरैटिव प्रस्तुत करना होगा। प्रो के जी सुरेश ने अमेरिका में हिंदुत्व के खिलाफ जारी एक सम्मेलन विशेष का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके पीछे जो ताकतें सक्रिय हैं वह चाहती हैं कि विश्व में स्थापित इस्लामिक आंतकवाद के समानंतर हिन्दुत्व को स्थापित किया जाए। ये ताकतें नहीं चाहती हैं कि अफगानिस्तान के माध्यम से समूचे विश्व के समक्ष आ रहा इस्लाम के महिला विरोधी, विकास विरोधी व बंधुत्व विरोधी रूप स्थापित हो सके और इसके लिए हिंदुत्व पर प्रहार किया जा रहा है और उसके खिलाफ विश्व में प्रचार प्रसार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अब समय है कि हम नारे से आगे बढ़कर विरोधियों को उनकी ही भाषा में जवाब दें। इसमें किताब का जवाब किताब से, शोध का जवाब शोध से, विमर्श का जवाब विमर्श से देना होगा। अवश्य ही एनडीटीएफ का यह प्रयास ऐसी हिंदुत्व विरोधी कोशिशों को नाकाम करने में मददगार होगा।

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के जी सुरेश

वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय ने महात्मा गांधी का उल्लेख करते हुए कहा कि यशोपनिषद का उपदेश हिंदु धर्म को ना मानने वालों की शंकाओं का भी निदान करने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि जिस तरह के प्रयास हिंदुत्व के विरूद्ध में जारी है उनमें वस्तुनिष्ठता का अभाव है। यह हिन्दु धर्म ही है जो कि भगवान से भी प्रश्नों का सामना करने का अवसर प्रदान करता है। यही वो धर्म है जो संवाद का अवसर प्रदान करता है, इसमें सकारात्मकता है। हिन्दुत्व सिखाता है कि समाज विज्ञान ही धर्म विज्ञान है। हम सुकरात का उल्लेख करते हैं, प्लूटो की बात करते हैं तो यहां स्पष्ट कर दिया जाए कि वो भी हिंदू धर्म की तरह धर्म को ज्ञान का अभिन्न अंग मानते थे।

वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय

कार्यक्रम में एनडीटीएफ के अध्यक्ष डॉ. ए के भागी ने कहा कि हम किसी के झूठे प्रयास का जवाब देने के लिए सामने नहीं आए है बल्कि हम तो हिन्दू धर्म के आधार संवाद को सामने लेकर आए हैं। यकीनन हमारा यह प्रयास हिन्दुत्व की विचारधारा को नुकसान पहुंचाने वालों के विरूद्ध विचार प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि अवश्य ही हमारे कार्यक्रम के सहभागी इस विचार को हजारों, लाखों लोगों के बीच लेकर जायेंगें। डॉ. भागी ने कहा कि कोई भी ऐसी कोशिश जो हिन्दुत्व के विचार को नुकसान पहुंचाना चाहती है वो कभी सफल नहीं हो पाएगी। कार्यक्रम के अंत में डॉ. सलोनी गुप्ता ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। आयोजन में पूर्व अध्यक्ष व मार्गदर्शक एन के कक्कड़, इंद्र मोहन कपाही, महासचिव डॉ. वीएस नेगी, डॉ. सलोनी गुप्ता, डॉ. मनोज कैन सहित भारी संख्या में शिक्षक शामिल हुए।

प्रशांत उमराव समेत जारी हुई लखनऊ से एक दर्जन मीडिया पैनलिस्टों की सूची, त्यागी बने प्रवक्ता

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ढाई दर्जन सोशल मीडिया इन्फ्लुएंर्स से मिले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। श्री योगी का वक्तव्य सुनने के बाद यह स्पष्ट था कि प्रदेश भाजपा अब 2022 के चुनाव के मैदान में उतर गई है

आशीष कुमार

”भारतीय जनता पार्टी उत्तरप्रदेश के मीडिया पैनलिस्ट बनने पर आदरणीय श्री प्रशांत उमराव भैया जी को हार्दिक शुभकामनाएं व बधाई। काशी विश्वनाथ आपको ऊर्जावान रखे ताकि हम सब मिलकर विरोधियों की बखिया उधेड़ दें।”

आरती मिश्रा नाम के सोशल मीडिया यूजर ने पेशे से अधिवक्ता और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर प्रशांत उमराव को टैग करके अपनी शुभकामना प्रेषित ​की।

प्रशांत समेत बारह लोगों को मीडिया पैनलिस्ट बनाया गया है, गुरुवार को भाजपा के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह के हस्ताक्षर से यह जानकारी सार्वजनिक की गई।

गुरुवार को ही मेरठ के अवनीश ​त्यागी पार्टी के प्रवक्ता नियुक्त किए गए। उनके साथ एक दर्जन मीडिया पैनलिस्टों की सूचि जारी की गई। जारी सूचि के अनुसार — ओमप्रकाश सिंह, संजीव मिश्रा, राजेश चौधरी, राघवेन्द्र सिंह, डॉ. कौशल मिश्रा, अमृता, प्रशांत कुमार उमराव, शरतेन्दु त्रिवेदी शरद, दीपक बघेल, दीपक सोनकर, कृष्ण मोहन पांडेय और एसएन सिंह को मीडिया पैनलिस्ट घोषित किया गया है।

सोशल मीडिया संवाद 2021

यह फैसला अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर अहम हो सकता है। ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश अब पूरी तरह चुनावी रंग में रंग चुका है और सरकार सोशल मीडिया के महत्व को समझ रही है। गुरुवार को भाजपा रुझान वाले सोशल मीडिया इन्फ्लुएंर्स से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जूम पर सोशल मीडिया संवाद किया। संवाद में कपिल मिश्रा, तेजिन्दर पाल सिंह बग्गा, प्रशांत उमराव, प्रीति गांधी, शेफाली वैद्य, प्रदीप भंडारी के साथ लगभग 30 सोशल मीडिया इन्फ्लुएंर्स शामिल हुए।

अपने वक्तव्य में श्री योगी ने इस बात का उल्लेख भी किया कि सोशल मीडिया पर हमारी बात को प्रमुखता से रखने वाली जो टीम है, उसमें लगभग ढाई दर्जन प्रमुख नाम संवाद में शामिल हुए। आज श्री योगी का वक्तव्य सुनने के बाद यह स्पष्ट था कि प्रदेश भाजपा 2022 के चुनाव की तैयारी में जुट गई है।

नेपथ्य के नायकों का प्रतिनिधि दस्तावेज है ‘कोरोनानामा’

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पुस्तक के अध्ययन के पश्चात् यह साफ होता है कि कोरोना संकट के कोपाकुल-काल के दौर में हमारे समाज के वरिष्ठ नागरिकों की भूमिका और उसके विभिन्न पहलुओं पर केन्द्रित बेहद गंभीर चिंतन हुआ है। इसके लिए संपादक के मार्गदर्शन और कौशल के साथ-साथ इस संग्रह में शामिल आठों रिपोर्टरों क्रमश: अमृता मौर्य, डॉ. उपेन्द्र पाण्डेय, दीक्षा मिश्रा, डॉ. अरुण प्रकाश, अर्चना अरोड़ा, अमन तिवारी, अल्पना बिमल और विनय कुमार की गंभीरता, चुनौतियों और संवेदनशीलता को स्पष्ट महसूस किया जा सकता है

डॉ. पवन विजय

पुस्तक ‘कोरोनानामा: बुजुर्गों की अनकही दास्तान’ अपनी शैली की दृष्टि में रिपोर्ताज है। इसमें वैश्विक महामारी कोविड-19 के दौरान हुए देशव्यापी लाॅकडाउन के कारण उपजी विसंगतियों की आठ विशिष्ट रिपोर्ट्स शामिल हैं, जोकि देश के अलग-अलग हिस्सों से संकलित की गयी हैं।कोरोनानामा कई मायनों में विशेष पुस्तक कही जा सकती है, जिसका हिन्दी साहित्य की यात्रा में भी विशेष अवदान माना जाना चाहिए। इस क्रम में इससे संबंधित सबसे पहली बात तो यह है कि कोरोनानामा जैसा कि अपने शीर्षक से ही स्पष्ट है कि यह कोरोनाकाल का एक सशक्त दस्तावेज सिद्ध है। यह बहुत अच्छा प्रयास माना जाता है कि आप वैश्विक महामारी का सजीव दस्तावेज अपने पास रखें। भारत और खासकर हिन्दी भाषियों के लिए यह एक अच्छी बात है कि उनके पास कोरोनानामा जैसा ग्रंथ उपलब्ध हो गया है, जो हमारी आने वाली पीढ़ियों को इस वैश्विक महामारी का जीवंत सनद प्रस्तुत करेगा। यूँ तो प्राय: वैश्विक महामारी के करुण दस्तावेज संकलित करने की संभावना अधिक होनी चाहिए या रहती है, लेकिन कोरोनानामा के संकलनकर्ता अमित राजपूत की इस दृष्टि की जमकर प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने वैश्विक महामारी के सकारात्मक दस्तावेज हमारे सामने लाकर प्रस्तुत कर दिये।पुस्तक की दूसरी विशेषता यह है कि इस आठ रिपोर्ट्स के संकलन से गठित रिपोर्ताज-संग्रह कोरोनानामा में सभी बुजुर्गों की कहानियाँ हैं। आज के दौर में बुजुर्गों पर केन्द्रित कोई काम कम ही दिखता है और पुस्तक लेखन में खासकर हिन्दी में और भी कम। इसलिए हिन्दी भाषा में बुजुर्गों पर केन्द्रित पुस्तक तैयार करने के लिए भी इसके संपादक अमित राजपूत न केवल प्रशंसा के पात्र हैं, बल्कि उन्हें इसके लिए बधाई भी दी जानी चाहिए।

पुस्तक लोकार्पण

पुस्तक के अध्ययन के पश्चात् यह साफ होता है कि कोरोना संकट के कोपाकुल-काल के दौर में हमारे समाज के वरिष्ठ नागरिकों की भूमिका और उसके विभिन्न पहलुओं पर केन्द्रित बेहद गंभीर चिंतन हुआ है। इसके लिए संपादक के मार्गदर्शन और कौशल के साथ-साथ इस संग्रह में शामिल आठों रिपोर्टरों क्रमश: अमृता मौर्य, डॉ. उपेन्द्र पाण्डेय, दीक्षा मिश्रा, डॉ. अरुण प्रकाश, अर्चना अरोड़ा, अमन तिवारी, अल्पना बिमल और विनय कुमार की गंभीरता, चुनौतियों और संवेदनशीलता को स्पष्ट महसूस किया जा सकता है। पुस्तक की एकलयता परस्पर सभी रिपोर्टरों और संपादक के आपकी समन्वय की ओर भी ध्यान इंगित कराता है। इस किताब की लयबद्धता और प्रवास इस बात का समर्थन भी करती हैं।संपादक की एक और दृष्टि की ओर मैं आपकी दृष्टि ले चलने का प्रयास करूँगा; और वो है, इन रिपोर्ट्स के पात्रों की खोज और उन्हें संकलन में शामिल किये जाने के निश्चय की निडरता। जी हाँ, किसी भी समाज के किसी भी दौर में नेपथ्य के नायकों का रेखांकन उजले ढंग से कभी नहीं किया गया। किन्तु कोरोनानामा तो नेपथ्य के नायकों का ही मजबूत दस्तावेज है। ऐसे में, इस पुस्तक के उद्देश्य को हम सर्व समाज एवं वर्ग के लिए उपयोगी, अंतिम जन के लिए भी रुचिकर और लोक-कल्याकारी पुस्तक कह हैं। और सरल तरीके से इसे हम यह भी कह सकते हैं कि पुस्तक कोरोनानामा हमारे बुजुर्गों के प्रति हमारी दृष्टि को बदलने वाली और उनके प्रति चिन्तन को हमें प्रेरित करने वाली पुस्तक है। हालाँकि यह इतना आसान भी नहीं है। इसका हल पुस्तक में ही पृष्ठ- 27 में उल्लिखित है कि “परिवार, समाज और सरकार तीनों की जिम्मेदारी बनती है कि वह वरिष्ठ-जनों की सुविधाओं का ख्याल रखें।”बहरहाल, कोरोना के लाॅकडाउन में पुस्तक के संकलनकर्ता और संपादक के प्रयास से समाज के विभिन्न क्षेत्रों और सुदूर गाँवों की रिपोर्टों से पाठकों को रूबरू कराना और वैश्विक बहस में वरिष्ठ-जनों की भूमिका को प्रमुखता से रेखांकित करना बहुत ही महती और बहादुरी का काम किया गया है।एक दिलचस्प बात यह भी है इस पुस्तक की कि हिन्दी साहित्य के आधुनिक इतिहास में मुख्यधारा में दशकों से रिपोर्ताज नहीं लिखे गये हैं। अमित राजपूत की पुस्तक कोरोनानामा ने इस सूखे को भी समाप्त कर दिया है और हिन्दी साहित्य के विकास में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ दी है। इसी के साथ यह पुस्तक समयानुकूल है और वरिष्ठ-जनों के जीवन पर उपलब्ध हिन्दी-साहित्य में भी अपना एक प्रमुख योगदान देती है। इसकी भाषा ललित और परिमार्जित है। जमीनी स्तर की रिपोर्ट की वैशिष्ट्यता और उसका बोध भी कोरोनानामा को ऊँचा मकाम देता है। एक ओर इसमें शामिल आठ रिपोर्ट हमें सिंगल सिटिंग में बैठकर पढ़ लेने का रोमांच देते हैं, तो इसमें शामिल रिपोर्टों की बेहद सीमित संख्या हमें और जानने व पढ़ने की जिज्ञासा के वास्ते हमें निराश भी कर देती है। बावजूद इसके कोरोनानामा को एक जरूरी पुस्तक के तौर पर रेखांकित किया जाता है।


पुस्तक का नाम: कोरोनानामा: बुजुर्गों की अनकही दास्तान
संपादक: अमित राजपूत
प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली।
मूल्य: 175 रुपये मात्र/-

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