पाटलिपुत्र इंटरसिटी ट्रेन के परिचालन के लिए चंपारण के गौरव मिश्र ने रेल मंत्री से किया आग्रह

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अब, जबकि कोविड के बाद की स्थिति में आवश्यक ट्रेनों का परिचालन पूरे देश में आरम्भ होने लगा है, ऐसे में उक्त ट्रेन के परिचालन की आवश्यकता अहम है।

गीतांजलि शर्मा

देश में प्रतिष्ठित लोक नीति विश्लेषक और स्थानीय रामगढवा मौजे ग्राम निवासी गौरव कुमार मिश्र ने केंद्रीय रेल मंत्री को पत्र लिख कर रक्सौल पाटलिपुत्र इंटरसिटी एक्सप्रेस के परिचालन को आरंभ करने की मांग की है।

पत्र में उन्होंने लिखा है कि चंपारण अपनी ऐतिहासिक विरासत के साथ न केवल भारत के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि वैश्विक स्तर पर इसकी अमिट छाप है। ऐसे में चंपारण के विकास की बात राष्ट्रीय मुद्दा है। साथ ही चंपारण वासी होने के कारण उनके लिए यह व्यक्तिगत महत्व भी रखता है।

उन्होंने राज्य की राजधानी को चंपारण से जोड़ने वाली इंटरसिटी ट्रेन के परिचालन के मुद्दे को गंभीर समस्या बताते हुए इसे तत्काल शुरू करने की मांग की है। पत्र में उन्होंने लिखा है कि माननीय प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में भारत का प्रत्येक क्षेत्र विकास के नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है.। देश का प्रत्येक भाग विकास की मुख्यधारा में शामिल हो रहा है। किन्तु विडंबना है या अधिकारियों की उदासीनता कि बिहार के उत्तर में अवस्थित पूर्वी और पश्चिमी चंपारण के लोग आज अपने प्रदेश के मुख्यालय तक पहुँचने के लिए एक अदद सार्वजनिक परिवहन के अभाव से जूझ रहे है।

इस पर गहरा दुख जताते हुए उन्होंने कहा है कि यह अत्यंत दुखद स्थिति है कि चंपारण वासी अपने अंतर्राष्ट्रीय महत्व को याद कर गौरवान्वित तो होते हैं, किन्तु इस प्रकार की मूलभूत सुविधा से वंचित हैं।

उन्होंने कहा है कि विगत कई वर्षों से रक्सौल- सुगौली- पाटलिपुत्र इंटरसिटी एक्सप्रेस ट्रेन (05201 और 05202 ) का परिचालन हो रहा था, जिससे दोनों चंपारण के लोग और नेपाल सीमा से लगे होने के कारण नेपाल के नागरिक भी इसका लाभ ले रहे थे। किन्तु करीब 2 वर्ष पूर्व कोविड के कारण इसका परिचालन बंद कर दिया गया। इससे परिवहन की असुविधा से लोगों को अपार कष्ट हो रहा है और इसके साथ राजस्व की हानि भी हो रही है।

अब, जबकि कोविड के बाद की स्थिति में आवश्यक ट्रेनों का परिचालन पूरे देश में आरम्भ होने लगा है, ऐसे में उक्त ट्रेन के परिचालन की आवश्यकता अहम है।

पत्र में उन्होंने सभी चंपारण वासियों की तरफ से उक्त ट्रेन के परिचालन को पूर्व स्थिति की भाँति आरम्भ कराने हेतु निवेदन किया है। जिससे न केवल प्रतिदिन सैकड़ो यात्रियों को लाभ होगा बल्कि इससे रेल राजस्व की वृद्धि भी होगी। इसके साथ ही राज्य की राजधानी से अंतर्राष्ट्रीय सीमा क्षेत्र का संपर्क भी स्थापित हो सकेगा।

पूर्व वीसी प्रो जुयाल बने बीटीएसएस के पहले राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष

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-प्रो. जुयाल बोले, तिब्बत मुक्ति-यज्ञ को परिणाम तक पहुंचाने की है यह जिम्मेदारी

हिमाचल प्रदेश के कार्यकर्ताओं में अपार हर्ष

भारत-तिब्बत समन्वय संघ की कोर कमेटी की बैठक में प्रथम राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिनाम वैज्ञानिक प्रो प्रयाग दत्त जुयाल को सर्वसम्मति से चुना गया। प्रो जुयाल प्रसिद्ध पशु विज्ञानी हैं और गत वर्ष जबलपुर (मध्य प्रदेश) के नानाजी देशमुख वेटरनरी साइंस यूनिवर्सिटी के कुलपति के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं।

 प्रो जुयाल के नाम का प्रस्ताव केंद्रीय संयोजक श्री हेमेन्द्र तोमर ने रखा, जिसे सभी सदस्यों ने पूर्ण सहमति से पारित कर दिया। उत्तराखंड के मूल निवासी प्रो जुयाल वर्तमान में देहरादून में निवास कर रहे हैं और अब तक बीटीएसएस की केंद्रीय परामर्शदात्री समिति (सीएसी) के माननीय सदस्य के रूप में नियुक्त थे। इनके बारे में केंद्रीय संयोजक श्री तोमर ने बताया कि प्रो जुयाल की तिब्बती मामलों में सक्रियता और सूझ बूझ के साथ काम करने की उनकी आक्रामक कार्यशैली के कारण संघ के कार्यकर्ताओं में बहुत उत्साह दिखने लगा था। इस नाते उनके इस ऊर्जा से संघ को एक अच्छे, कुशल और परिणाममूलक नेतृत्व मिलने के विश्वास पर उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष दायित्व पर चुना गया। श्री तोमर ने कहा कि इसी वर्ष मकर संक्रांति के दिन संघ की स्थापना और मार्च में सरकारी स्तर पर पंजीकरण के बाद यह नियुक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उधर, इसके बाद संघ के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो जुयाल ने अपने अधिकारिक बयान में कहा कि इस निर्णय को शिरोधार्य करते हुए अब तिब्बत-स्वातंत्र्य और कैलाश मुक्ति साधना में इस प्रकार लगना है कि विश्व समुदाय को इन उद्देश्यों में प्रभावी रुप से बीटीएसएस का ही कार्य दिखेगा। उन्होंने कहा कि तिब्बत की आज़ादी अब हम भारत वासियों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। चीन को अब समझना होगा कि हम आध्यात्मिक  शक्ति के केंद्र भारत में जिस दिन पूर्ण जन जागरण हो जाएगा, उस दिन चीन न केवल तिब्बत छोड़ भाग खड़ा होगा बल्कि खुद भी कई भागों में विखंडित हो जाएगा। उन्होंने कहा कि तिब्बती समाज को शत्रु-संघर्ष में अपना मुखर  योगदान देने की आवश्यकता है क्योंकि  चीन पूरी तरह से कपटी और धूर्त देश है। कार्यकारी अध्यक्ष ने कहा कि यज्ञ तो अब शुरू हुआ है तो पूर्णाहुति दे कर हम ही अब क्रांति की निर्णायक स्थिति तय करेंगे। बाबा भोलेनाथ  और भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को आत्मसात कर शत्रु शमन कर विश्वशांति स्थापित करने का संकल्प संघ का है और इसमें हम सफल होंगे।

प्रो प्रयाग दत्त जुयाल

इस अवसर पर, बीटीएसएस और प्रो जुयाल को मिल रही लगातार बधाइयों के बीच राष्ट्रीय महामंत्री द्वय विजय मान व अरविंद केशरी ने कहा कि प्रो जुयाल जिस प्रकार तिब्बती समुदाय के लिए हितचिंतक के रूप में निरन्तर कार्य कर रहे थे, वह वास्तव में अनुकरणीय है। उनकी काम करने की सहयोगात्मक शैली ने ही सब को अभिभूत कर दिया था। देश-विदेश से और साधु-संतों से मिल रही बधाई के बीच हिमाचल प्रदेश के प्रांत अध्यक्ष बी आर कौंडल (हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक सेवा (सेवानिवृत), अध्यक्ष-हि.प्र. भूमि अधिग्रहण मंच) तथा प्रान्त उपाध्यक्ष प्रोफेसर मनोज सक्सेना (शिक्षा शास्त्र के आचार्य, हिमाचल केंद्रीय विवि, धर्मशाला) ने कहा कि यह संघ के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है तथा प्रोफेसर जुयाल जी कि दूरगामी सोच एवं मार्गदर्शन से संघ को बल मिलेगा। राष्ट्रीय नेतृत्व में प्रत्यक्ष बागडोर प्रो जुयाल को देने से बहुत अच्छा परिणाम मिलेगा। यह विश्वास है कि संघ की गति जो पहले से ही द्रुत थी, अब महाद्रुत हो जाएगी। हिमाचल प्रदेश के प्रान्त संयोजक (शोध व विकास प्रभाग) डॉ सचिन श्रीवास्तव (गणित विभाग के सहायक आचार्य, हिमाचल केंद्रीय विवि, धर्मशाला), राष्ट्रीय अध्यक्ष (महिला विभाग) श्रीमती नामग्याल सेकी (प्रखर विधि-विशेषज्ञ, पूर्व तिब्बतियन सुप्रीम जस्टिस कमीशन सलाहकार व अधिवक्ता), राष्ट्रीय संयोजक (अन्तराष्ट्रीय सम्बन्ध प्रभाग) डॉ अमरीक सिंह ठाकुर, प्रान्त उपाध्यक्ष श्री तेनजिन सुन्ग्रोप तथा राष्ट्रीय सह-संयोजक (प्रचार व आई टी प्रभाग) श्री अखिलेश पाठक इत्यादि संघ के सक्रिय कार्यकर्ताओं ने कहा कि प्रो जुयाल के पाण्डित्य से संघ बहुत आगे बढ़ेगा और विश्व स्तर पर तिब्बत मुक्ति की पहचान बनेगा।

मीडिया अध्ययन : बिहार में जलवायु संकट से बढ़े हीट वेव और वज्रपात का आकलन और उसे रोकने के प्रयास का आकलन

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”बिहार में जलवायु संकट से बढ़े हीट वेव और वज्रपात का आकलन और उसे रोकने के प्रयास के आकलन’ पर ‘मीडिया कलेक्टिव फॉर क्लाइमेट इन बिहार’ ने गैर सरकारी संस्था ‘असर’ के सहयोग से मीडिया रिपोर्ट जारी किया है। इस अध्ययन टीम में सीटू तिवारी, सत्यम कुमार झा, मनीष शांडिल्य, पुष्यमित्र शामिल थे। रिपोर्ट तैयार करने में इनका सहयोग- सौरभ मोहन ठाकुर, संजीत भारती, बासुमित्र ने किया। 67 पन्ने की रिपोर्ट के मुख्य अंश को हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं। जिसे पढ़ने के बाद आप जमीनी स्थिति से परिचित हो सकेंगे। अध्ययन करने वाली टीम ने जहां एक तरफ यह बताया है कि इस अध्ययन की आवश्कता क्यों है, दूसरी तरफ उन्होंने जमीनी चुनौतियों को भी कलमबद्ध किया और हालात कैसे सुधरे, इस पर भी उन्होंने अपनी रिपोर्ट में सुझावों से भरा एक लंबा नोट लिखा है। आइए इस रिपोर्ट के माध्यम से समझते हैं जलवायु संकट और इससे जुड़ी चुनौतियों को।

अरविन्द अभय

यह अध्ययन क्यों?

भारत के पूर्वी हिस्से में बसा राज्य बिहार पिछले कई दशकों से मानव विकास से जुड़ी कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। इन चुनौतियों में सबसे प्रमुख यहां हर वर्ष आने वाली विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं को माना जाता है, जिनमें बाढ़ सबसे बड़ी आपदा है। इसके अलावा सूखा, वज्रपात, अग्निकांड, शीतलहर और लू (गर्म हवाएं) भी ऐसी आपदाएं हैं, जो अमूमन हर साल राज्य की बड़ी आबादी को प्रभावित करती है और विकास की तमाम योजनाओं और कोशिशों के बावजूद यह राज्य हमेशा पिछड़ जाता है। हाल के वर्षों में बढ़े जलवायु संकट ने इस समस्या को और अधिक बढ़ा दिया है। 

यह अध्ययन हमने बिहार राज्य में हीट वेव और वज्रपात के असर को समझने, उसको लेकर किये जाने वाले सरकारी हस्तक्षेपों और उसकी जमीनी पड़ताल का आकलन करने और उसका बेहतर समाधान तलाशने के लिए किया था। इस अध्ययन के दौरान अध्येताओं के तौर पर भी हमने समझा कि हीट वेव और वज्रपात बिहार जैसे गरीब राज्य के लिए कितनी बड़ी समस्या है। साथ ही यह भी समझा कि ये दोनों आपदा भी जलवायु संकट की उस विराट आपदा के हिस्से हैं, जिससे आज पूरी दुनिया जूझ रही है।

हमने क्या पाया?

हमारी समझ बनी कि भले बिहार राज्य दुनिया को जलवायु संकट के खतरे में झोंकने की दिशा में बड़ी भूमिका नहीं निभा रहा, मगर एक गरीब, संसाधन विहीन और बेहतर प्रशासनिक क्षमता से वंचित राज्य होने की वजह से बिहार के सामने जलवायु संकट एक बड़ी आपदा की तरह सामने आया है। हर साल आने वाली बाढ़ के बाद हीट वेव और वज्रपात ही ऐसी आपदा हैं, जिससे बिहार सर्वाधिक प्रभावित हो रहा है।

हमने पाया कि राज्य में 2015-2019 के बीच हीट वेव की वजह से 534 लोगों की जान गयी। यानी औसतन हर साल 106.8 लोगों की मौत हुई। राज्य के 38 में से 33 जिले में हीट वेव की स्थिति सामान्य से अधिक ऊंची है। इनमें चार जिले खगड़िया, जमुई, पूर्णिया और बांका में हीट वेव का संकट बड़ा है। ये टाइप टू वाली श्रेणी में आते हैं। राहत की बात यह जरूर है कि राज्य में कोई जिला अभी अति उच्च ताप भेद्यता वाली टाइप वन में नहीं आता। मगर यह तथ्य आंखें खोलने वाला है कि खगड़िया और पूर्णिया जैसे उत्तर बिहार के जिलों में हीट वेव का संकट अधिक है, जबकि वहां के लोग और वहां का प्रशासन भी अमूमन इस खतरे से अनभिज्ञ नजर आते हैं। यह तथ्य हमें राज्य के हीट एक्शन प्लान में मिला है, मगर हम सब जानते हैं कि इस खतरे को लेकर हमारी जानकारी कितनी कम है।

वज्रपात के मामले में भी स्थिति ऐसी ही है। देश में मध्य प्रदेश और बिहार दो ऐसे राज्य माने जाते हैं, जहां वज्रपात से सबसे अधिक मौतें होती हैं। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में 2015 से 2019 के बीच वज्रपात से कुल 1280 लोगों की मौत हुई यानी हर साल अमूमन 256 लोगों की। इस दौरान देश में कुल 14074 लोगों की मौत हुई यानी हर साल 2814.8 लोगों की। इस लिहाज से वज्रपात से मरने वाले देश के हर सौ लोगों में नौ बिहार के थे। जबकि वज्रपात की कुल घटनाओं की बात करें तो बिहार का देश में दसवां स्थान है। ओड़िशा और बंगाल में वज्रपात की घटनाएं सर्वाधिक होती हैं, मगर वहां की सरकार ने अपने तरीके से इस संकट पर काबू पाया है और अपने राज्य के लोगों को मरने से बचाया है।

हमने यह भी जाना कि बिहार सरकार ने 2019 में हीट वेव एक्शन प्लान तैयार किया है। इसके अलावा 2015 से हर साल राज्य का आपदा प्रबंधन विभाग मार्च महीने में सभी जिलों को हीट वेव से बचाव के निर्देश जारी करता है। इस योजना में राज्य के 18 विभागों को शामिल किया गया है और उन्हें अलग-अलग जिम्मेदारी दी गयी है। मगर जमीनी पड़ताल बताते हैं कि इनमें से ज्यादातर निर्देशों को लागू नहीं किया जाता।

जमीनी हकीकत

  • ग्रामीण अस्पतालों में नहीं के बराबर आइसोलेशन बेड बनते हैं।
  • प्रचार प्रसार का काम औपचारिकता निभाने जैसा होता है।
  • स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों में बचाव के उपाय के तौर पर दवाएं और संसाधन नहीं के बराबर हैं।
  • मनरेगा और श्रम संसाधन विभाग व्यावहारिक रूप से कहीं मजदूरों के लिए कार्यस्थल पर पीने का पानी और ओआरएस, आइसपैक वगैरह नहीं रखवाता। उनके काम के वक्त में बदलाव नहीं किया जाता।
  • नगर निकायों को शहर में जगह-जगह पर प्याऊ की व्यवस्था करनी है। मगर यह काम भी खानापूर्ति की तरह होता है। कहीं धूप से बचाव के लिए शेड का इंतजाम नहीं होता।
  • तापमान 40 डिग्री से अधिक होने पर कई तरह के उपायों को करना है, मगर वह किया नहीं जाता।
  • किसी बस में पीने के पानी और ओआरएस की व्यवस्था नहीं होती।

इस संकट को समझने के लिए हमने राज्य की स्वास्थ्य सुविधाओं का अलग से आकलन किया। मगर हमने पाया कि वे भी अपर्याप्त हैं। खास तौर पर अस्पतालों में मैनपावर का संकट बड़ा है। यह भी इस संकट को बढ़ा देता है, क्योंकि हीट वेव से पीड़ित लोगों को समय से उपचार नहीं मिल पाता।

वज्रपात के संकट का सामना करने के लिये राज्य सरकार के पास आज की तारीख तक कोई सुव्यवस्थित योजना नहीं है। एक्शन प्लान भी नहीं बना है। हालांकि आपदा प्रबंधन विभाग का कहना है कि वे इसे बहुत जल्द तैयार करके लागू करने वाले हैं। चेतावनी का तंत्र भी व्यवस्थित नहीं है। इंद्रवज्र नामक एक एप बना है, जो बहुत कारगर नहीं है। एसएमएस के जरिये एक बहुत सामान्य किस्म की चेतावनी जारी की जाती है, मगर वह बहुत प्रभावी नहीं है। फिलहाल सरकार सिर्फ अखबारों में विज्ञापन जारी कर लोगों को जागरूक करने का प्रयास करती है।

अगर संक्षेप में कहें तो हीट वेव और वज्रपात के जिस स्तर के खतरे का बिहार सामना कर रहा है, उसे लेकर न लोगों में गंभीरता है और न सरकारी हस्तक्षेप किये जा रहे हैं। लिहाजा यह खतरा लगातार बढ़ रहा है। जो योजनाएं बनी भी हैं, वे धरातल पर न के बराबर लागू होती हैं और इसकी निगरानी भी नहीं होती।

हमारे सुझाव

  • हीट वेव और वज्रपात का संकट बड़ा है, मगर इस खतरे को लेकर अभी बिहार के लोग तो दूर प्रशासन के बीच भी अच्छी समझ नहीं बन पायी है। पूर्णिया जैसा जिला जो हीट वेव के खतरे की उच्च श्रेणी में है, वहां का प्रशासन मानता है कि जिले का मौसम वैसा नहीं है कि यहां हीट वेव का खतरा हो। इसलिए सबसे अधिक जरूरी इस खतरे के बारे में प्रशासन को प्रशिक्षित और संवेदित करने की है। उन्हें बताना होगा कि राज्य किस स्तर के खतरे का सामना कर रहा है। इसके लिए नियमित सेमीनार और कार्यशालाओं का आयोजन होना चाहिए।
  • जागरूकता का काम आम लोगों के बीच भी होना चाहिए। अगर वे इस खतरे के वास्तविक स्वरूप को समझ लेंगे तो संकट से बचाव करने में वे खुद धीरे-धीरे सश्रम हो जायेंगे। इसके लिए प्रचार प्रसार का काम गंभीरता से करना होगा और ऑनलाइन माध्यमों से कहीं अधिक होर्डिंग, माइकिंग और नुक्कड़ नाटकों जैसे पारंपरिक माध्यमों को अपनाना होगा, जो बिहार जैसे राज्य के लिए अधिक मुफीद हैं, जहां अभी भी बहुत कम लोगों के पास स्मार्टफोन है।
  • हीट वेव एक्शन प्लान की तरह वज्रपात का एक्शन प्लान भी जल्द से जल्द बने और लागू हो। देश के कई राज्यों में जिलावार एक्शन प्लान बने हैं। बिहार में भी खतरे को देखते हुए कुछ सर्वाधिक प्रभावित जिलों का अलग से एक्शन प्लान बने, वहां की परिस्थितियों के अनुकूल।
  • एक्शन प्लान और नीतियों को तैयार करने में बाहरी विशेषज्ञों के बदले ऐसे स्थानीय विशेषज्ञों को प्राथमिकता दी जाये जो स्थानीय भूगोल और पर्यावरण को समझते हों।
  • यह ध्यान रखा जाये कि एक्शन प्लान और दिशानिर्देशों का जमीनी स्तर पर ठीक से प्लानिंग हो रहा है या नहीं। इसकी सख्त निगरानी हो और सुनिश्चित किया जाये कि दिशा निर्देशों का कम से कम 60 फीसदी पालन तो जरूर हो।
  • इस संकट का सामना करने में सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की बड़ी भूमिका होती है। इसलिए खास तौर पर ग्रामीण और दूरदराज के अस्पतालों को सुविधा, दवा और मैनपावर से युक्त बनाया जाये और उसकी व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाये। अगर हो सके तो ऊर्जा के साधनों के रूप में सोलर को अपनाया जाये। जो आपदा की स्थिति में भी अस्पताल को क्रियाशील रखने में मददगार हो।
  • फिलहाल हमारा पूरा फोकस इस संकट से लोगों को राहत दिलाने में है, मगर साथ-साथ हमें यह प्रयास भी करना होगा कि कैसे हम जलवायु संकट को कम करने में मददगार हो सकते हैं। शहरों के कंकरीट एरिया को कम करें, पेड़ों को कटने से रोकें और पर्यावरण को बेहतर बनायें।

पाकिस्तानी मॉडल ऑफ जर्नलिज्म, तमंचे पर पत्रकारिता

तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान को आतंकी कहा तो पत्रकार को मिलेगी सजा ए मौत

तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान

पाकिस्तानी आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने तमाम मीडिया समूहों के नाम एक खुला पत्र लिखा है। पत्र में धमकाया गया है कि आगे से कोई भी मीडिया हाउस उसे आतंकी संगठन ना लिखे और ना इलेक्ट्रानिक मीडिया के एंकर ऐसा कहने की कहने जुर्रत करें। आपत्र में साफ—साफ कहा गया है कि अगर उन्हें आतंकी कहा जाता है तो ऐसे मीडिया समूहों से वही बर्ताव किया जाएगा जो दुश्मनों के साथ किया जाता है। यह पत्र सोशल मीडिया पर छह सितम्बर को जारी किया गया।

आतंकी सिखा रहे पत्रकारिता

संगठन के प्रवक्ता मोहम्मद खुरासानी ने जारी किए एक वीडियो में पाकिस्तानी पत्रकारों पर तालिबान पाकिस्तान के लिए इस्तेमाल किए जा रहे नामों पर सख्त नाराजगी जाहिर की। बात नाराजगी तक की नहीं थी, उन्होंने पत्रकारों को पत्रकारिता भी सिखाई। आतंकियों के प्रवक्ता के अनुसार— उनके आतंकी संगठन के लिए आतंकी और कट्टरपंथी जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है। ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करना पत्रकारिता नहीं है। अपने बयान में फिर प्रवक्ता खुरासानी ने यह भी कह दिया कि इस तरह की गलत पत्रकारिता को वे बर्दाश्त नहीं कर सकते। अब ऐसी पत्रकारिता करने वालों के साथ उनका आतंकी संगठन उसी तरह की व्यवहार करेगा, जैसा वे अपने दुश्मनों के साथ करते हैं। एक आतंकी संगठन जिस तरह स्थानीय पत्रकारों को तमंचे के जोर पर पत्रकारिता सिखा रहा है, यह भविष्य में पाकिस्तान मॉडल ऑफ जर्नलिज्म ना बन जाए।

खुरासानी के अनुसार— पाकिस्तान की मीडिया इमरान सरकार के इशारे पर काम कर रहा है, यह सरकार इलेक्टेड नहीं बल्कि सिलेक्टेड है। यह बात पाकिस्तान के आम जनों के बीच भी मानी जा रही है इमरान वहां फौज के आशीर्वाद से ही सरकार चला पा रहे हैं।

पाकिस्तान फेडरेशन यूनियन आफ जर्नलिस्ट (PFUJ) ने पाकिस्तानी तालिबान की तरफ से पत्रकारों के लिए आई धमकी पर अपनी चिन्ता जाहिर की। उन्होंने पत्रकारिता संस्थानों और पाकिस्तान की सरकार से इस धमकी को गंभीरता से लेने की बात कही है। इस धमकी के बाद पाकिस्तान में पत्रकारों की सुरक्षा का प्रश्न फिर एक बार अहम हो गया है।

पाकिस्तानी तालिबान

तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान 2007 में बना। यह अफगानिस्तान में सरकार चला रही तालिबान का ही एक हिस्सा है। यह आतंकी संगठन पाकिस्तान में शरिया कानून लागू करवाना चाह रहा है। पाकिस्तान में ये 2008 से ही प्रतिबंधित है। इसके पहले प्रमुख बैतुल्लाह महसूद को अमेरिका ने संगठन बनने के दो साल बाद ही ड्रोन हमले में में मार गिराया था।

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