हिन्दुओं को बाँटने के कुचक्र के बीच हिन्दुओं को जाग्रत और संगठित करने का अभियान

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–रमेश शर्मा

भोपाल । भारत राष्ट्र के रूपान्तरण केलिये चल रहे षड्यंत्र से सनातन समाज को जागरुक करने के अपने संकल्प के अंतर्गत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से देशभर सकल हिन्दू सम्मेलन का अभियान आरंभ हुआ जो जनवरी माह के अंत तक चलेगा। इन सम्मेलनों के बाद समाज में संगठनात्मक समरसता और दायित्व वोध की झलक भी देखने को मिलने लगी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी साँस्कृतिक और सामाजिक यात्रा के सौ वर्ष पूरे कर लिये हैं। संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। वह 27 सितंबर विजयदशमीं का दिन था। संघ की पहली शाखा में केवल छै स्वयंसेवक थे। अब यह विश्व का सबसे विशाल सामाजिक संगठन है। जिसकी केवल भारत में ही 83129 दैनिक शाखाएँ संचालित हो रहीं हैं। तकनीकि रूप से भले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सःगठन कहा जाय लेकिन यह करोड़ों कार्यकर्ताओं का मानों एक परिवार है। संघ की स्थापना से लेकर आजतक इस शताब्दी यात्रा में सतत हमले हुये। सरकारों ने प्रतिबंध लगाये, संघ कार्यकर्ताओं और प्रचारकों पर हमले हुये, हत्याएँ हुई। शाब्दिक हमले तो कभी बंद ही नहीं हुये। यदि अंग्रेजीकाल की बात छोड़ दी जाय तो स्वतंत्रता के बाद भी तीन बार प्रतिबंध लगे। गाँधी जी हत्या में झूठा फँसाया गया। लेकिन संघ की ध्येयनिष्ट यात्रा में कोई अंतर नहीं आया। वह हर संकट के बाद मानों और संकल्पनिष्ट होकर सामने आया। इतने हमलों के बाद भी संघ ने कभी किसी की आलोचना नहीं की, किसी को बुरा नहीं कहा। भारत राष्ट्र के परम वैभव के प्रति संघ की ध्येयनिष्टा अखंड रही। राष्ट्र, समाज और संस्कृति के प्रति यही संकल्पशीलता संघ के शताब्दी वर्ष आयोजन में दिखी। संघ ने अपने शताब्दी समागम को किसी उत्सव के रूप में मनाया अपितु अपनी ध्येय को गति देने का निमित्त बनाया। शताब्दी यात्रा पूर्ण करने के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने तीन अभियान चलाये। पहला गणवेश धारी स्वयंसेवकों का पथ संचलन दूसरा हर घर संपर्क अभियान और तीसरा “जात पात की करो विदाई, हम सब हिन्दु भाई भाई” उद्घोष के साथ सकल हिन्दु सम्मेलनों का आयोजन। स्वयसेवकों द्वारा गणवेश में बस्ती स्तर पर 2 अक्टोबर से 12 अक्टोबर 2025 की बीच, विशाल पथ संचलनों का आयोजन किया गया था। देशभर की प्रत्येक बस्ती में आयोजित ऐसे पथ संचलन में सरसंघचालक से लेकर संघ का प्रत्येक सामान्य कार्यकर्ता भी गणवेश में सम्मिलित हुआ। दूसरे कार्यक्रम के रूप में संघ के स्वयसेवकों ने अपनी बस्ती एवं मोहल्लों में 15 नवम्बर से 30 नवम्बर 2025 की बीच प्रत्येक घर पर दस्तक दी। इस गृह सम्पर्क अभियान में “संगठित हिन्दु समर्थ भारत” का संदेश दिया गया। इसी श्रृंखला की तीसरी कड़ी में पूरे देश में हिन्दू सम्मेलन के आयोजन आरंभ हुआ। भारत के एक छोटे ग्राम से लेकर महानगरों तक की प्रत्येक बस्ती में ऐसे एक लाख से अधिक हिंदू सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनी। इनकी शुरुआत 20 दिसम्बर 2025 से हुई थी और इन्हें 20 जनवरी 2026 तक पूरा किया जाना है।

लेकिन कहीं कहीं यह तिथि आगे भी बढ़ाई गई है और संभावना है कि 25 जनवरी तक लक्ष्य पूरा हो जायेगा। हिंदू सम्मेलन आयोजित करने की भावना तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की है, पर इनका आयोजक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं नहीं है। इनका आयोजन स्थानीय स्तर पर सकल हिंदू समाज द्वारा किया जा रहा है। अब तक जैसे समाचार पूरे देश से आ रहे हैं उनके अनुसार प्रत्येक आयोजन में हिंदू समाज की उत्साह पूर्वक सहभागिता देखने को मिली। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों और सेवा बस्तियों में अपेक्षाकृत अधिक उत्साह देखा गया। जितना उत्साह सम्मेलन में सम्मिलित होने का था। उससे अधिक उत्साह सम्मेलन के बाद सामाजिक समरसता के वातावरण में देखा गया। सम्मेलन में आये वक्ताओं का संदेश बहुत स्पष्ट और सामयिक था। प्रत्येक हिन्दु सम्मेलन में स्थानीय वक्ताओं के अतिरिक्त तीन प्रकार के मुख्य वक्ता रहे। इनमें एक संत समाज से, दूसरे सामाजिक एवं साँस्कृतिक संगठनों से संबंधित मातृशक्ति और तीसरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित वक्ता। संतों की ओर से शास्त्रों और पुराणकथाओं के आधार पर संपूर्ण समाज को अपनी परंपराओं से जुड़ने और एक जुट रहने का आव्हान किया गया। यह स्पष्ट किया गया कि सभी सनातनी ऋषियों की संतान हैं, जाति भेद सल्तनतकाल और अंग्रेजीकाल में फैलाये गये। अब हमें उस कुचक्र से सावधान रहना है। संतों ने यह आव्हान भी किया कि सप्ताह कम से कम एक दिन परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठें, घर का बना भोजन साथ खाएं और अपने ईष्ट की पूजा प्रार्थना करें, इससे न केवल पारिवारिक और सामाजिक रिश्ते मजबूत होंगे अपितु यह परिवार की प्रगति और अपनी परंपराओं को समझने का आधार बनेगा । जबकि सामाजिक अथवा साँस्कृतिक संगठनों से संबंधित मातृ शक्ति के वक्ता ने कुटुम्ब समन्वय, स्वत्व वोध और स्वदेशी का महत्व, जीवन केलिये पर्यावरण की महत्ता, नागरिक कर्तव्यों का पालन एवं संगठित सामाज की महत्ता समझाई। स्वाभाविक है कि समाज में अधिकार के साथ कर्त्तव्य पालन का भाव आया, पर्यावरण के प्रति जागरुकता बढ़ी, स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग और स्वसंस्कृति के अनुरुप जीवन शैली बढ़ी तो समाज और राष्ट्र की अनेक समस्याओं का समाधान स्वमेव हो जायेगा। वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित वक्ता ने संघ की ध्येयनिष्ट शताब्दी यात्रा की जानकारी दी और देश एवं समाज के सामने बढ़ती चुनौतियों की ओर समाज का ध्यान आकर्षित किया। इन वक्ताओं ने इतिहास और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घटने वाली घटनाओं का उदाहरण देकर समझाया कि वही समाज इतिहास में अमिट रहता है जो सजग और संगठित रहता है। लगभग सभी वक्ताओं ने समस्त हिंदू समाज में आपसी समझ बढ़ाने, एक दूसरे का सहयोगी बनकर देश का इतिहास एवं पूर्वजों की परंपरा को जानने पर जोर दिया गया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहल पर ये हिन्दु सम्मेलन ऐसे समय आयोजित किये जा रहे हैं जब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ शक्तियाँ सनातन हिन्दू समाज को विभाजित करने का कुचक्र कर रहीं हैं। ये शक्तियाँ भारत राष्ट्र के साँस्कृतिक स्वरूप का रूपान्तरण करने के कुचक्र मे एकजुट होकर कार्य कर रहीं हैं। उनका प्रयास सनातन हिन्दु समाज को भ्रमित करना, उसे अपनी जड़ों से काटना और जातीय विभेद पैदा करना है ताकि भारत राष्ट्र की प्रगति को अवरुद्ध किया जा सके और सनातन हिन्दु समाज का धार्मिक और सांस्कृतिक रूपान्तरण कराया जा सके। इसके लिये प्रतिदिन नये नये षड्यंत्र किये जा रहे हैं। जन्म और जाति आधारित विभेद उत्पन्न करके आंतरिक अशान्ति पैदा करने का कुचक्र किया जा रहा है। जबकि वास्तविकता यह है कि भारत में सामाजिक व्यवस्था जन्म अथवा जाति आधारित नहीं थी। भारत की सामाजिक व्यवस्था गुण और कर्म आधारित “वर्ण व्यवस्था” रही है। इसे समझने केलिये हर कालखंड में पर्याप्त उदाहरण हैं। यदि पुराण काल में देखे तो कुबेर और रावण एक ही पिता की संतान हैं। लेकिन समाज में दोनों का स्थान अलग अलग है। कुबेर की गणना देवताओं में होती है, दीपावली पर पूजन किया जाता है जबकि रावण की गणना राक्षसों में होती है, दशहरे के दिन पुतला जलाया जाता है। वहीं मातंग ऋषि ने अपने आश्रम की उत्तराधिकारी माता शबरी को बनाया था। माता शबरी का संबंध शबर वनवासी समाज से है। महर्षि व्यास की माता मछली पालक समाज से थीं और महर्षि बाल्मीकि का जन्म व्याध समाज में हुआ था। पुराण काल से परे बाद के इतिहास को देखे तो मगध के दोनों नंदवंश और मौर्य वंश सेवा वर्ग से संबंधित थे। जिन्हें आज की शब्दावली में अनुसूचित जाति कहते हैं। यदि भारत में जन्म या जाति आधारित समाज व्यवस्था होती तो ये दोनों शासक कैसे बनते। मध्यकाल में देखे तो रानी दुर्गावती कालिंजर के चंदेल राजपूत राजा की पुत्री थीं। उनका विवाह गौंडवांना में हुआ था। संत रविदास जी का जन्म चर्म शिल्पकार समाज में हुआ था। वे रामानंदाचार्य के शिष्य थे और मीराबाई एवं झाला रानी ने संत रविदासजी को अपना गुरु बनाया था। यदि भारतीय समाज जीवन में जाति का निर्धारण जन्म आधारित होता तो न मीरा बाई संत रविदासजी को अपना गुरु नहीं बनातीं और न रानी दुर्गावती का विवाह भी गौंडवांना में होता। भारतीय इतिहास में केवल यही उदाहरण नहीं हैं। ऐसे असंख्य विवरण हैं।

लेकिन योजना पूर्वक सनातन हिन्दु समाज को बाँटने का प्रयास हो रहा है। विभाजन की यह लकीर गहरी करने के रोज नये बहाने ढूँढे जा रहे हैं। कभी जन गणना के नाम पर तो कभी किसी के बहाने। और तो और व्यक्तिगत अपराध की घटनाओं में पीड़ित और आरोपी दोनों को जाति से जोड़कर प्रचारित किया जाता है। जबकि किसी अन्य समाज या वर्ग में जाति आधारित विभाजन की बात कतई नहीं होती। केवल हिन्दू समाज में जातीय विभाजन की चर्चा जोर शोर से की जाती है। सनातन हिन्दू समाज को जागरुक होकर इस षड्यंत्र को समझना होगा। सकल हिन्दू समाज द्वारा आयोजित इन सम्मेलनों में जागरुकता का यही संदेश दिया गया। यह बात बहुत स्पष्ट रूप से समझाई गई कि समाज और देश दोनों की प्रगति केलिये सबको एकजुट होना आवश्यक है।
समाज को एकजुटता के इस संदेश के साथ इन सम्मेलनों से भारतीय समाज जीवन में यह संदेश बहुत स्पष्ट रूप से गया कि किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके जन्म, जाति, भाषा, स्थान, संपत्ति या सामाजिक स्थिति के आधार पर नहीं होता। उसका महत्व उसकी कर्मशीलता पर निर्भर करता है। पूरा राष्ट्र उत्थान के लिये सामाजिक समरसता की भावना ही सबसे बड़ी शक्ति है। सम्मेलनों के बाद विभिन्न बस्तियों में स्थानीर स्तर आपसी विवाद को परस्पर बाथचीत से विराम देने के समाचार भी आने लगे। जिससे भारत के भविष्य निर्माण के लिये एक अच्छा वातावरण बनता दिखाई दे रहा है।

17 जनवरी 1601 : बादशाह अकबर का असीरगढ़ पर धोखे से कब्जा

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भोपाल । बचपन की पाठ्यपुस्तकों में मुगल बादशाह अकबर को महान पढ़ा था । उन पुस्तकों में कुछ उदाहरण भी थे । इस कारण अकबर को और समझने की जिज्ञासा सदैव बनी रही । आगे चलकर उनकी महानता की अनेक कहानियाँ भी पढ़ी । हो सकता है वे सारी घटनाएं सही हों । पर अकबर के अधिकाँश सैन्य अभियान धोखे और चालाकियों से भरे हैं । भारत में अकबर के जितने सैन्य विजय हुईं । वे अकबर के शौर्य और सैन्य बल से कम अपितु कूटनीति, फूट डालकर, परिवार जनों को तोड़कर या किसी भेदिये को किले में भेजकर दरबाजा खुलवाने की युक्ति से भरीं हैं । उनमें एक है मध्यप्रदेश में सतपुड़ा के शिखर पर बने असीरगढ के किले पर अकबर महान के कब्जे का विवरण, जो उन्होंने धोखे से किया था । कब्जे के बाद किले में लूट और हत्याकांड का सिलसिला एक सप्ताह तक चला ।

अकबर महान ने यह धोखा असीरगढ के सूबेदार बहादुर शाह फारुकी के साथ किया था । हालांकि फारूकी खानदान ने भी इस किले पर धोखा देकर ही कब्जा किया था । वही धोखा उनके सामने आया ।

असीरगढ का यह किला बुरहानपुर जिले में है । जिला मुख्यालय से बीस किलोमीटर की दूरी पर । जो संसार के प्राचीनतम पर्वतों में से एक सतपुड़ा के शिखर पर बना है । सतपुड़ा हिमालय से भी प्रचीन पर्वत है । उसी के शिखर पर यह यह किला बना है जिसकी गिनती दुनियाँ के अजेय किलों में की जाती है । यह किला कब बना किसने बनाया इसका निश्चित विवरण कहीं नहीं मिलता । हमलावरों ने इसके सभी साक्ष्य नष्ट कर दिये । फिर भी इसकी बनावट में मौर्यकाल की झलक भी है और गुप्तकाल की भी । लेकिन अधिकांश निर्माण कला की शैली बारहवीं शताब्दी की है । हालाँकि किले की नींव और कुछ निर्माण ईसा पूर्व के भी लगते हैं । पुरातत्व विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्माण अति प्राचीन है । और समय के साथ इसके पुनर्निर्माण होते रहे हैं । इसीलिये इसके अस्तित्व में विविधता है । हर युग की शिल्प कला झलकती है । स्थानीय नागरिकों में यह धारणा प्रबल है कि यह स्थान रामायण काल में भी समृद्ध था और पांडव काल में भी । किले में भगवान् गुप्तेश्वर मंदिर है । इस मंदिर के बारे में यह धारणा भी है कि यहां प्रतिदिन अश्वत्थामा पूजन के लिये आते हैं । यह प्रसंग इस स्थान को महाभारत काल से जोड़ता है । इस मंदिर में कुछ आश्चर्य तो हैं जो लोग लोगों की जिज्ञासा का कारण हैं । और उन्ही से अश्वत्थामा की किंवदंती को बल मिलता है ।

असीरगढ़ के इतिहास के बारे में अभी जो विवरण मिलता हैं वह इतिहासकार मोहम्मद कासिम द्वारा लिखित है । उनके अनुसार यह निर्माण बारहवीं से चौदहवीं शताब्दी के बीच हुआ । किले को आशा अहीर ने बनवाया था और उन्ही के नाम पर किले का नाम असीरगढ़ पढ़ा । पर आशा अहीर का भी अधिक विवरण नहीं मिलता । बहादुरशाह फारूकी के परिवार ने इन्हीं आशा अहीर से यह किला धोखा देकर पाया था । इतिहासकार मोहम्मद कासिम के विवरण के अनुसार दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक का एक सरदार था मलिक फारूकी । दिल्ली के सत्ता संघर्ष में मलिक फारूकी अपने साथी सिपाहियों के साथ दिल्ली से दक्षिण की ओर चल दिया । उन दिनों बुरहानपुर और असीरगढ़ को दक्षिण का द्वार माना जाता था । दिल्ली के हर शासक ने असीरगढ़ पर हमला किया महीनों घेरा रहा, तोपें चलीं, पर कोई सफलता नहीं मिली । अधिकांश हमले बेकार हुये । इसका कारण किले की ऊँचाई है । उस युग में असीरगढ़ एक समृद्ध नगर हुआ करता था जो बार बार के हमलों में पूरी तरह उजड़ गया और अब एक छोटा सा गाँव रह गया ।
असफल होकर मलिक लौट गया । जाते समय आशा अहीर को भेंट दे गया और हमले के लिये माफी भी मांग गया । लेकिन वह एक माह बाद अपने दल के साथ पुनः असीरगढ़ आया । अपना कैंप नगर के बाहर लगाया । वह अपने साथ कुछ भेंट लाया था । उसने किलेदार आशा अहीर को खबर भेजी कि उसके परिवार और परिवार की महिलाओं की जान खतरे में है । शरण चाहिए । उदार आशा अहीर ने परिवार की सुरक्षा का आश्वासन दिया और किले के दरवाजे खोल दिये । मलिक फारूकी ने कुछ डोले भेजे और कहा कि इनमें बहन बेटियाँ हैं । आशा अहीर ने अपने पुत्रों को उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी । जैसे ही डोले किले के भीतर पहुँचे उन डोलों में से सैनिक निकल पड़े । उन्होंने सबसे पहले आशा अहीर के पुत्रों को मार डाला और मलिक फारूकी ने आशा अहीर को । इस तरह मलिक फारूकी ने किले पर कब्जा कर लिया । लूट हत्या बलात्कार का सिलसिला चला । किले के भीतर वही जीवित बचा जिसने इस्लाम कबूला बाकी सब मार डाले गये । मंदिर तोड़ दिये गये । उन्हे रूपान्तरण करके मस्जिदों में बदल दिया गया । आज भी वहां मस्जिदों में मंदिरों की नक्काशी के पत्थर देखे जा सकते हैं । जिस सूबेदार बहादुर शाह फारूकी से बादशाह अकबर ने किला छीना वह इस मलिक फारूकी का वंशज था ।

अकबर ने 1600 में दक्षिण का रुख किया । उसकी फौज कहर बरपाती हुई असीरगढ़ पहुँची । किले पर कोई छै माह तक घेरा पड़ा रहा लेकिन सफलता नहीं मिली और न बहादुरशाह विचलित हुआ । इसका कारण यह था कि किले के भीतर राशन पानी का पर्याप्त प्रबंध था । फारुखी भीतर सुरक्षित रहा । जब तोप के गोले भी बेअसर हुये तब अकबर ने चाल चली । ठीक उसी प्रकार जैसी मलिक फारुकी ने चली थी । अकबर ने कीमती भेंट भेजकर दोस्ती का संदेश दिया और कहा कि वे लौट रहे हैं जाते जाते दोस्ती का हाथ मिलाना चाहते हैं । साथ दावत करना चाहते हैं । फारुखी को यकीन हो इसके लिये अकबर ने तोपखाना रवाना कर दिया था । इस संदेश पर फारुकी ने कोई एक सप्ताह विचार किया । और पता लगाया । उसे सूचना मिली कि न केवल तोपखाना बल्कि आधी फौज भी वापस हो चुकी है । उसने दोस्ती का पैगाम कबूल कर लिया और अपने परिवार सहित दावत करने अकबर के कैंप में आ गया । वह 17 जनवरी 1601 की तिथि थी । वह दोपहर में आया । अकबर ने स्वागत किया । साथ भोजन की दावत हुई और बातचीत के लिये दूसरे पांडाल में गये । वहां पहले से यह प्रबंध था कि कौन कहाँ बैठेंगे । सब लोग निर्धारित आसन पर बैठकर बातें करने लगे । तभी अचानक फारुकी और उसके बेटों पर पीछे से हमले हुये और पकड़ लिये गये । इसके साथ ही मुगल घुड़सवार किले में दाखिल हुये । बंदी के रूप में फारूकी के दो बेटों को साथ ले जाया गया । एक बेटा और फारुकी को नीचे ही बंदी रखा गया । वहां घोषणा हुई कि यदि किसी ने विरोध किया तो फारुकी और उसके पूरे खानदान को कत्ल कर दिया जायेगा । यह सुनकर सब लोग सिर झुका कर खड़े हो गये । सैनिकों ने सबसे पहले शस्त्रागार पर कब्जा किया फिर जनानखाने को अपने कब्जे में लिया । फिर धन पूछा गया । जनानखाने और वफादारों को अकबर के सामने प्रस्तुत किया गया । पुरूषों को कत्ल करने का हुक्म हुआ और महिलाएं सैनिकों को भेंट कर दी गयी ।

असीरगढ़ के इस किले पर 17 जनवरी 1601 से 1760 तक मुगलों का कब्जा रहा । 1760 में मराठों ने इस किले पर अपना आधिपत्य किया । जो मंदिर असीरगढ़ में आज दीख रहे हैं उनका जीर्णोद्धार मराठा काल में ही हुआ । किले पर मराठों का आधिपत्य 1760 से 1819 तक रहा । इसके बाद यह किला कुछ वर्षों तक वीरान यहाँ फिर 1904 में किले पर अंग्रेजों का आधिपत्य हो गया ।
किले में अनेक शिलालेख हैं जो अधिकांश मुगल काल के हैं ।

गौमाता पर आधारित फिल्म ‘गोदान’ का पोस्टर हुआ विमोचन, 6 फरवरी को होगी रिलीज

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नौएडा : सेक्टर 12 स्थित भाउराव देवरस सरस्वती विद्या मंदिर में गौमाता पर आधारित फिल्म ‘गोदान’ का पोस्टर, टीज़र और गीतों का विमोचन किया गया। इस विशेष अवसर पर सनातन संस्कृति के प्रतिनिधियों के रूप में देश की जानी-मानी आध्यात्मिक एवं सामाजिक विभूतियों ने गौमाता पर अपने विचार प्रगट किये।

इस विशेष कार्यक्रम में सद्गुरु ऋतेश्वर जी महाराज, आचार्य बाल कृष्ण जी, स्वामी दीपांकर जी, महामंडलेश्वर भैयादास जी, आचार्य प्रतिष्ठा जी, बाबा सत्य नारायण मौर्य जी, सुरेश चव्हाणके जी, कवि डॉ. हरिओम पंवार जी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गौ सेवा गतिविधि के अखिल भारतीय सह संयोजक नवल किशोर जी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र प्रचारक महेंद्र जी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह सेवा प्रमुख सेंथिल कुमार जी, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड के प्रचार प्रमुख कृपा शंकर जी, पश्चिम क्षेत्र के प्रचार प्रमुख पदम जी एवं संघ के अनेक अधिकारी, नोएडा के सांसद डॉ. महेश शर्मा एवं नगर के गणमान्य व्यक्तियों समेत अनेक परिवारों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम में सोशल मीडिया से जुड़े 50 से अधिक एनफ़्लुएन्सर्स ने भी सहभागिता की।

कार्यक्रम का शुभारम्भ गौपूजन के साथ हुआ। सभी अतिथियों ने गौमाता का पूजन कर गौ पालन और गौ संरक्षण का सन्देश दिया।
इस अवसर पर आचार्य बाल कृष्ण जी ने भारत की संस्कृति में गौमाता के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कृषि प्रधान भारत में गौमाता की उपादेयता को हमारे पूर्वजों ने समझ लिया था। उन्होंने कहा गौमाता का संरक्षण हमारे अस्तित्व को बचाने का प्रयास है। उन्होंने कहा गाय हमसे लेती नहीं है बल्कि देती है।

सदगुरु ऋतेश्वर जी महाराज ने कहा कि यह फिल्म गौ माता के महत्त्व को देश और दुनिया के सामने उजागर करेगी। 1857 में गौमाता की चर्बी ने इस देश में क्रान्ति ला दी थी। गौशाला और वृद्धाश्रम भारत की परम्परा नहीं। जब तक घर-घर में गौ नहीं होगी तब तक गौ का संरक्षण नहीं होगा। उन्होंने कहा जब तक गौमाता को कृषि के साथ प्रत्यक्ष रूप से नहीं जोड़ा जाएगा तब तक गौमाता की रक्षा नहीं होगी।

स्वामी दीपांकर जी ने कहा कि गौमाता हिन्दू संस्कृति का प्राण है। उसमें सभी देवी देवताओं का वास है। गौसेवा से ही राष्ट्र क्रान्ति होगी। महामंडलेश्वर भैयादास जी ने कहा कि जब से उन्होंने गौसेवा प्रारम्भ की गौमाता की कृपा से उन्हें प्रतिदिन एक लाख व्यक्तियों को भोजन कराने की सामर्थ्य मिली। उन्होंने कहा एक बार गौसेवा करके देखो, किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रह जायेगी।

आचार्य प्रतिष्ठा जी ने कहा कि देश गौ, गंगा, गायत्री, यज्ञ, योग और आयुर्वेद के माध्यम से ही पूरे विश्व में कीर्तिवान बनेगा।

बाबा सत्य नारायण मौर्य जी ने अपनी कविता और गीत के माध्यम से उपस्थित जनसमुदाय को गौमाता के संरक्षण की प्रेरणा दी। इस अवसर पर प्रसिद्ध कवि हरिओम पंवार जी ने अपनी कविताओं से राष्ट्रबोध का दर्शन कराया और भारत की वर्तमान सशक्त होती छवि, शक्ति सम्पन्न भारत के प्रादुर्भाव को अभिव्यक्त किया।

फिल्म के निर्माता हैं- विनोद कुमार चौधरी एवं डॉ. पारुल चौधरी (दीनदयाल कामधेनु गौशाला समिति), सह-निर्माता चेतन गोस्वामी। निर्देशन अमित प्रजापति ने किया है। फिल्म की कहानी को एक बछिया और उसके नायक पर केंद्रित करते हुए बनाया गया है, जो हिंदू धर्म में गाय को विशेष तौर से रेखांकित करती है। फिल्म 6 फरवरी को देश भर में रिलीज होगी।

फिल्म के निर्माता विनोद चौधरी का कहना है कि गोदान फिल्म गाय के धार्मिक, वैज्ञानिक और सामाजिक पहलुओं पर प्रकाश डालती है। निर्माता का कहना है कि यह फिल्म संस्कृति और मानवता के बंधन को भी दर्शाती है।

फिल्म के प्रमोशन के लिए देश के सभी राज्यों के विभिन्न नगरों में कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। इस अवसर पर दीनदयाल कामधेनु गौशाला समिति, दीनदयाल धाम मथुरा के अध्यक्ष महेश गुप्ता जी एवं मंत्री हरिशंकर जी भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में 1500 लोगों ने सहभागिता कर गौमाता के संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाई। मंच का संचालन युवा कवि अमित शर्मा ने किया।

Swachh Bharat to Circular Bharat: TERI SAS, IRIS Summit foster sustainable practices

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New Delhi: The IPCA Centre for Waste Management and Research (ICWMR) at TERI SAS kicked off the International Recycling Incubation Summit (IRIS) 2026 at the India Habitat Centre today. The two-day event is focused on ‘Integrating sustainable waste supply chain logistics and low-carbon pathways for a circular economy’. It brings together over 300 participants from various sectors, including government, business, academia, media, and community groups, to accelerate India’s shift towards more efficient resource use.

During the opening ceremony, the mood was optimistic and action-oriented. Presiding as Chief Guest, Shri Tokhan Sahu, Minister of State, Ministry of Housing and Urban Affairs, emphasised the government’s determination to incorporate sustainability into urban planning. “Our journey from a Clean India to a Circular India is essential,” he said, emphasising that cities should not just be places where things are consumed but also areas where resources are reused and regenerated. He said that Swachh Bharat Mission started by our Hon’ble PM in the year 2014 is not just a mission but a revolution towards making Clean India. He mentioned that Circular Economy is the way to achieve the vision of “Viksit Bharat”. He also mentioned that the event like IRIS 2026 is the right platform to bring together the Govt. Academia, Research Institutes and NGO’s to deliberate ways to achieve Sustainable Development and making Viksit Bharat. . In his welcome address, Prof. Arun Kansal, Director, ICWMR, TERI SAS, framed the summit as a critical platform for convergence. “IRIS 2026 is designed to connect the dots between technology, policy, and community action to unlock its value. We are here to move from incubation to acceleration,” he remarked. Dr Vibha Dhawan, Chancellor, TERI SAS, highlighted that educational institutions need to play an active role in this circular transition. She noted that universities should collaborate with industry and communities to develop real solutions rather than focusing solely on theoretical knowledge. She also highlighted the importance of effective waste logistics to achieve greater resource recovery and reduce carbon footprints.

Providing a global policy perspective, Mr C.R. Mohanty from the UNCRD connected India’s efforts to the broader Sustainable Development Goals. India’s scale and innovation in circular economy models offer transformative lessons for the Global South. “Integrating low-carbon pathways into waste management is a powerful strategy for climate mitigation and building resilient economies,” he observed. He also spoke about the importance of working towards achieving SDG’s with more rigour to counter various environmental challenges.

While setting the theme address, Mr Ashish Jain, Founder Director, IPCA, highlighted “The future belongs to businesses that see waste as a strategic resource. In the circular economy, sustainability is not a cost—it is our greatest competitive advantage and our responsibility to the planet.” He mentioned that now we should responsibly and collectively work to achieve “Waste to Wealth & Health”. Prof. Suman Dhar, VC, TERI SAS, informed, “Our students are not just studying sustainability—they are designing it. The circular transition will be led by those who can blend technical skill with systemic vision, and TERI SAS is committed to empowering these changemakers.

The summit’s agenda is packed with various discussions, including:
• Industry Leaders Meet: Examining stewardship beyond compliance.
• The Circular Confluence: A high-level panel on aligning policy, practice, and innovation.
• Parallel Technical Tracks: On Advanced Recycling Technologies, Waste Logistics Optimization, Circular Supply Chain Design, and Policy Frameworks.
• Media Panel & Grassroots Impact Stories: Highlighting the role of narrative and community action.
• Collective Wisdom Panel & Valedictory: Synthesising outcomes and felicitating research excellence.
IRIS 2026 aims to finish with a clear plan for partnerships, policy suggestions, and innovative ideas that strengthen the movement from waste to valuable resources, supporting India’s goal of achieving net-zero emissions.

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