सबरीमाला : घंटियों की गूँज से संविधान तक, आओ करें हिंदू जीवन का विराट संवाद

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– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । सुबह का वह क्षण याद कीजिए, जब किसी मंदिर की घंटी की ध्वनि वातावरण को चीरते हुए सीधे हृदय तक पहुँचती है। उस ध्वनि में पीढ़ियों की आस्था, श्रद्धा और भक्ति का संचित स्पंदन होता है। एक हिंदू जीवन की शुरुआत प्राय: मंदिर से होती है, जन्‍म लेने के पूर्व गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन यानी इस संपूर्ण तीन भाग के ‘गर्भ संस्कार’ के दौरान गर्भ में पल रहे शिशु के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के साथ-साथ माता की प्रसन्नता के लिए देवताओं से प्रार्थना की जाती है और तभी एक जन्‍म लेनेवाले जीवात्‍मा के जीवन में उसके अस्‍तित्‍व के साथ ही मंदिर प्रवेश कर जाता है।

उसके बाद मंदिर की यात्रा जैसे घर के छोटे से पूजा-स्थल से लेकर विशाल तीर्थों तक संपूर्ण जीवन भर हमें जुड़ी हुई दिखाई देती है, इतना ही नहीं देह छोड़ देने के बाद भी मंदिर का अस्‍तित्‍व रहता है, स्‍मृतियों में पुरखों के रूप में, पितर बनकर जीवात्‍मा अपने अस्‍तित्‍व को सदियों तक बनाए रखती है।

जीवन में यही मंदिर जीवन के संघर्षों में सहारा बनते हैं, तो उत्सवों में उल्लास का केंद्र भी। ऐसे ही आध्यात्मिक अनुभवों का चरम रूप है केरल के घने वनों में स्थित सबरीमाला मंदिर, जोकि आज श्रद्धा केंद्र होने के साथ ही इन दिनों देश के बौद्धिक और संवैधानिक विमर्श का भी केंद्र बना हुआ है। उच्‍चतम न्‍यायालय में चल रही बहस ने इसे आस्था और अधिकार के संगम पर खड़ा कर दिया है।

प्रश्‍न बार-बार सहज रूप से उमड़ रहा है, आखिर हिंदू जीवन में मंदिर क्‍या सिर्फ पूजा का स्थान है? हर बार एक ही उत्‍तर सामने आ रहा है, इससे भी कहीं अधिक गहरा है ये मंदिर! जीवन का आधार है। यह वह स्थान है जहाँ व्यक्ति अपने भीतर के शोर को शांत कर, चेतना के स्‍तर पर आत्मा की आवाज सुनता है, इसीलिए ही सनातन परंपरा में जन्म से लेकर मृत्यु तक हर संस्कार मंदिर से जुड़ा है।

मंदिर मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन का माध्यम है। इसमें वैज्ञानिकता भी है, आध्‍यात्‍म भी, धर्म भी है और विचार भी, श्रद्धा भी है तो भक्‍ति भी। वस्‍तुत: वैज्ञानिक दृष्टि कहती है कि मंदिरों की संरचना इस प्रकार की जाती है कि वहाँ ऊर्जा सकारात्मक रहे। घंटियों की ध्वनि, मंत्रोच्चार और धूप-दीप का वातावरण मस्तिष्क को शांति प्रदान करता है। यही कारण है कि मंदिर से लौटते समय व्यक्ति स्वयं को हल्का और संतुलित महसूस करता है।

जिसमें कि मंदिर के साथ जुड़ी श्रद्धा वह अदृश्य शक्ति है जोकि मनुष्य को असंभव को संभव करने की प्रेरणा देती है। भक्ति उस श्रद्धा का सजीव रूप है, जोकि कर्म और भावना में प्रकट होती है। जब एक भक्त मंदिर में माथा टेकता है, तब वह अपने अहंकार को त्यागकर एक उच्चतर शक्ति को स्वीकार कर रहा होता है। यह प्रक्रिया व्यक्ति के भीतर विनम्रता और संतुलन पैदा करती है। यही कारण है कि कठिन परिस्थितियों में भी श्रद्धालु व्यक्ति टूटता नहीं है, वह और अधिक मजबूत होकर उभरता है।

सबरीमाला, तपस्या, अनुशासन और आस्था का संगम है

सबरीमाला मंदिर की परंपरा अन्य मंदिरों से भिन्न है। यहाँ भगवान अय्यप्पा को एक तपस्वी ब्रह्मचारी के रूप में पूजा जाता है, इसीलिए यहाँ आने वाले भक्तों के लिए 41 दिनों का कठोर व्रत, संयम और ब्रह्मचर्य अनिवार्य माना गया है। यह यात्रा संपूर्ण हिन्‍दू भक्‍ति परंपरा में धार्मिक अनुष्ठान होने के साथ ही सबसे अधिक जरूरी आत्मानुशासन की परीक्षा है। जंगलों से होकर कठिन मार्ग तय करना, सादा जीवन जीना और सामूहिक भक्ति में शामिल होना, वस्‍तुत: यह सभी तत्व मिलकर एक ऐसा अनुभव रचते हैं, जिसमें व्यक्ति को संपूर्णता के साथ भीतर से बदल देने का सामर्थ्‍य होता है।

न्यायालय की बहस: आस्था बनाम समानता

ऐसे में जब उच्‍चतम न्‍यायालय ने 2018 में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमाला में प्रवेश की अनुमति दी, तब यह निर्णय लगा कि एक तरफा हो गया है, समानता के सिद्धांत पर इसे आरूढ़ तो किया गया, किंतु इसके मर्म को शायद गहराई से नहीं समझा गया! परंतु इसके बाद यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि क्या हर धार्मिक परंपरा को एक ही संवैधानिक मानक से परखा जा सकता है?

अब एक बार फिर इस मंदिर की परंपरा को लेकर न्‍यायालय में बहस चल रही है, केंद्र सरकार की ओर से तुषार मेहता लगातार अपने तर्क रख रहे हैं, वे बता रहे हैं कि भारत में कई मंदिरों में विशिष्ट परंपराएँ हैं, जो उनकी आस्था का अभिन्न हिस्सा हैं। इस संदर्भ में ब्रह्मा मंदिर पुष्कर, कामाख्या देवी मंदिर और कोट्टनकुलंगारा देवी मंदिर जैसे उदाहरण दिए गए, जहाँ अलग-अलग नियम प्रचलित हैं।

विविधता ही है हिंदू धर्म की सबसे बड़ी शक्ति

हिंदू धर्म किसी एकरूपता का आग्रह नहीं करता। यहाँ हर मंदिर, हर परंपरा और हर पूजा पद्धति का अपना विशिष्ट महत्व (वैशिष्‍ट्य) है। यही कारण है कि कहीं केवल महिलाएँ पूजा करती हैं, तो कहीं पुरुषों को विशेष वेशभूषा धारण करनी होती है। वस्‍तुत: यह विविधता यह दर्शाती है कि हिंदू धर्म एक जीवंत परंपरा है, जोकि समय और परिस्थितियों के साथ विकसित होती रही है। यह किसी एक नियम में बंधा हुआ धर्म नहीं, य‍ह तो अनुभव और आस्था का विस्तृत महासागर है।

काश; इस बात को और मंदिर की गहराई एवं उसके संदेश को न्‍यायालय और उसके बाहर सभी समझें! “सबरीमाला मंदिर” पर विवाद व्‍यर्थ है, क्‍योंकि हिंदू धर्म की महानता ही इसी में है कि यह विविधता को स्वीकार करता है, संवाद को महत्व देता है और हर व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुसार जीने की स्वतंत्रता देता है। मंदिर से जुड़ी श्रद्धा और भक्ति जीवन को दिशा देने वाले तत्व हैं।

एक भक्त के लिए मंदिर एक अनुभव है। जब वह कठिन यात्रा करके सबरीमाला पहुँचता है, तब उसकी आँखों में सिर्फ अपने आराध्‍य के दर्शन की इच्छा होने के साथ ही गहरा संतुष्टि का भाव भी होता है। निश्‍चित ही यह अनुभव शब्दों से परे है; यह वह क्षण है जब मनुष्य स्वयं को ईश्वर के निकट महसूस करता है, उसकी चेतना बोल उठती है, प्रज्ञानं ब्रह्म- “चेतना ही ब्रह्म है।” अहं ब्रह्मास्मि- “मैं ब्रह्म हूँ।” तत्‍वमसि- “तुम वही हो” (वह तुम हो) और अयमात्मा ब्रह्म- “यह आत्मा ही ब्रह्म है।” ‘शिवोहम शिवोहम’- “मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।” वस्‍तुत: यही आस्था की वास्तविक शक्ति है…जो भारत में है, जो भारत से सर्वत्र व्‍याप्‍त है…

ज्ञान, शोध और ‘सिमिलैरिटी’ का युग: एक बौद्धिक विडंबना

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डॉ. अमलेश पांडेय

दिल्ली। ज्ञान का यह नया युग सचमुच विचित्र है—इतना विचित्र कि यहाँ विचार की मौलिकता से अधिक मूल्य “सिमिलैरिटी इंडेक्स” का हो गया है। एक समय था जब शोध का अर्थ था—अज्ञात को जानने की जिज्ञासा, सत्य की खोज, और ज्ञान के विस्तार का संकल्प। पर आज अनेक स्थानों पर यह प्रक्रिया एक तकनीकी औपचारिकता में बदलती दिखाई देती है, जहाँ सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं रह गई कि आपने क्या नया सोचा, बल्कि यह हो गई है कि आपकी थीसिस में “plagiarism report” 10% से नीचे कैसे लाई जाए।
शोध की आत्मा बनाम तकनीकी औपचारिकता

शोध की मूल आत्मा जिज्ञासा है। यह वह आंतरिक बेचैनी है जो किसी व्यक्ति को प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करती है—“क्यों?”, “कैसे?”, “क्या यह और बेहतर हो सकता है?”। किंतु वर्तमान समय में यह जिज्ञासा कई बार “paraphrasing tools” और “AI rewriters” के शोर में दब जाती है। शोधार्थी अब विचारों के स्रोत नहीं खोजता, बल्कि ऐसे साधनों की तलाश करता है जो पहले से उपलब्ध सामग्री को इस प्रकार बदल दें कि वह मौलिक प्रतीत हो।

यहाँ सबसे चिंताजनक बात केवल शोधार्थियों का व्यवहार नहीं है, बल्कि वह मौन स्वीकृति भी है जो कभी-कभी मार्गदर्शकों और संस्थानों की ओर से मिलती है। जब यह कहा जाता है कि “बस similarity कम कर दो, ज्ञान बाद में देख लेंगे”, तब यह केवल एक सलाह नहीं, बल्कि एक पूरी बौद्धिक संस्कृति के पतन का संकेत बन जाता है।

‘डिग्री प्रबंधन’ की उभरती संस्कृति

धीरे-धीरे विश्वविद्यालयों में एक नई संस्कृति आकार ले रही है—जहाँ शोध कम और “डिग्री प्रबंधन” अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें उद्देश्य ज्ञान का सृजन नहीं, बल्कि औपचारिकताओं को पूरा कर एक प्रमाणपत्र प्राप्त करना होता है।

जब किसी विश्वविद्यालय में बड़ी संख्या में थीसिस में समानता पाई जाती है, तो यह केवल एक सांख्यिकीय समस्या नहीं है। यह उस गहरे संकट का लक्षण है जिसमें शोध की प्रक्रिया अपनी आत्मा खो चुकी है। असली प्रश्न यह नहीं है कि similarity 20% है या 40%—असल प्रश्न यह है कि क्या शोध अब भी जिज्ञासा से उत्पन्न होता है, या केवल डिग्री की आवश्यकता से?

परंपरा से विचलन: तप से तकनीक तक

भारतीय ज्ञान परंपरा में शोध को तपस्या के समान माना गया है। यह एक लंबी, धैर्यपूर्ण और ईमानदार प्रक्रिया थी जिसमें शोधार्थी अपने विषय के साथ जीता था, उसे अनुभव करता था और अंततः उसमें कुछ नया जोड़ता था।

आज, कई मामलों में यह तपस्या “डाटा संकलन + paraphrasing + formatting” के एक यांत्रिक क्रम में बदलती जा रही है। ज्ञान की जगह “PDF” तैयार हो रही हैं—ऐसी PDF जो देखने में शोध लगती हैं, पर जिनमें विचारों की गहराई का अभाव होता है।

मशीन और मनुष्य: एक उलटती हुई भूमिका

सबसे गहरी विडंबना यह है कि जिस समय मशीनें मानव-सदृश लेखन सीख रही हैं, उसी समय मनुष्य मशीनों की तरह कॉपी-पेस्ट करने में अधिक दक्ष होता जा रहा है। यह एक विचित्र उलटाव है—

पहले मनुष्य सोचता था, मशीन गणना करती थी

अब मशीन लिखने लगी है, और मनुष्य “संपादन” करने लगा है

यह स्थिति केवल तकनीकी परिवर्तन का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उस बौद्धिक आलस्य का भी द्योतक है जो धीरे-धीरे हमारी शैक्षणिक संस्कृति में प्रवेश कर रहा है।
ज्ञान का भविष्य: संग्रह या सृजन?

यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो भविष्य में विश्वविद्यालयों की लाइब्रेरियाँ हजारों थीसिस से भर जाएँगी—पर वे थीसिस ज्ञान का भंडार नहीं होंगी, बल्कि एल्गोरिद्म की गूँज मात्र बनकर रह जाएँगी। वे पढ़ी नहीं जाएँगी, केवल संग्रहित रहेंगी।

इतिहास शायद यह दर्ज करेगा कि एक समय ऐसा भी आया जब मनुष्य के पास सूचना की कोई कमी नहीं थी, परंतु मौलिक विचारों का अभाव हो गया था। ज्ञान का उत्पादन तो हुआ, पर ज्ञान का सृजन नहीं।

समाधान की दिशा: पुनः जिज्ञासा की ओर

इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए केवल तकनीकी नियमों को सख्त करना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यकता है—

शोध के उद्देश्य को पुनः परिभाषित करने की

मार्गदर्शकों की भूमिका को अधिक उत्तरदायी बनाने की

शोधार्थियों में जिज्ञासा और आलोचनात्मक सोच को प्रोत्साहित करने की

मूल्यांकन प्रणाली को केवल “similarity index” से आगे ले जाने की

जब तक हम शोध को केवल एक औपचारिक प्रक्रिया मानते रहेंगे, तब तक यह संकट बना रहेगा। पर यदि हम इसे फिर से एक बौद्धिक यात्रा के रूप में देखना शुरू करें—जहाँ प्रश्न पूछना, संदेह करना और नया सोचना सबसे बड़ा मूल्य हो—तभी वास्तविक परिवर्तन संभव है।

अंततः, प्रश्न यह नहीं है कि तकनीक हमारे शोध को कैसे प्रभावित कर रही है; प्रश्न यह है कि हम तकनीक का उपयोग किस उद्देश्य से कर रहे हैं। यदि उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना है, तो शोध एक औपचारिकता बन जाएगा। पर यदि उद्देश्य ज्ञान की खोज है, तो वही तकनीक एक शक्तिशाली साधन बन सकती है।

शायद अभी भी समय है यह तय करने का कि हम “थीसिस” बनाना चाहते हैं या “ज्ञान”।

आइए, हम मिलकर भारत की नारी शक्ति को सशक्त करें।

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नरेन्द्र मोदी

दिल्ली । यह क्षण इसलिए भी विशेष है, क्योंकि यह ऐसे समय में आ रहा है जब देश का वातावरण उत्सव, नवीनता और सकारात्मकता से भरा हुआ है। आने वाले दिनों में भारत के अलग अलग हिस्सों में अनेक पर्व मनाए जाएंगे। असम के लोग रोंगाली बिहू मनाने वाले हैं, और ओडिशा में महा बिशुबा पणा संक्रांति का उत्सव मनाया जाएगा। पश्चिम बंगाल में पोइला बैशाख के साथ बंगाली नववर्ष की शुरुआत होगी। केरलम में विषु पूरे उत्साह के साथ मनाया जाएगा। तमिलनाडु के लोग उत्सुकता से पुथांडु की प्रतीक्षा कर रहे हैं, तो पंजाब और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में लोगों को बैसाखी के पर्व का इंतजार है।

हमारे ये पावन पर्व हर किसी में एक नई आशा का संचार करने वाले हैं। भारत के साथ-साथ दुनियाभर में इन त्योहारों को मनाने वाले सभी लोगों को मैं हृदय से शुभकामनाएं देता हूं। मैं ये कामना करता हूं कि ये दिव्य और पावन अवसर हम सभी के जीवन में सुख-समृद्धि लेकर आएं।इसी दौरान 11 अप्रैल से महात्मा फुले की 200वीं जयंती के समारोह भी शुरू होंगे। 14 अप्रैल को हम भारतवासी डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की जयंती मनाएंगे। ये दोनों तिथियां हमें सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा के उन मूल्यों की भी याद दिलाती हैं, जिन्होंने आधुनिक होते भारत की दिशा तय की हैं।

इन्हीं प्रेरणादायी अवसरों के बीच, 16 अप्रैल को संसद की ऐतिहासिक बैठक होगी। महिला आरक्षण को लागू करने से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयक पर चर्चा के बाद उसे पारित कराने के लिए विशेष सत्र बुलाया गया है। इसे सिर्फ एक विधायी प्रक्रिया कहना इसके महत्व को कम करके आंकना होगा। यह भारतवर्ष की करोड़ों महिलाओं की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है।हमारी नारीशक्ति देश की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने राष्ट्र निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया है। आज देश के हर सेक्टर में नारीशक्ति मिसाल बन रही है। साइंस एंड टेक्नोलॉजी से लेकर एंटरप्रेन्योरशिप तक, खेल के मैदान से लेकर सशस्त्र बलों तक और संगीत से लेकर कला के क्षेत्र में महिलाएं अपनी सशक्त पहचान बना रही हैं। हमारी माताएं-बहनें और बेटियां देश की प्रगति में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं।

4 से 8 मई को नई दिल्ली में आयोजन | अडूर गोपाल कृष्णन करेंगे उद्धाघाटन | दिल्ली का पहला और अकेला अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह है डिफ

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नई दिल्ली : संस्कृति मंत्रालय के अधीन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) और द सोशल सर्किल द्वारा आयोजित होने वाले 15वां दिल्ली अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह 2026 की औपचारिकरूप से घोषणा हो गयी . राजधानी दिल्ली में आयोजित होने वाला यह प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह 4 मई से 8 मई 2026 तक इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र और डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर (DAIC) जनपथ दिल्ली में भव्य रूप से आयोजित किया जाएगा. डिफ के नाम से दुनिया भर में जाना जाने वाला दिल्ली अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह इस वर्ष और अधिक व्यापक और वैश्विक स्वरूप में सामने आ रहा है, जिसमें 60 से अधिक देशों की 175 फिल्मों का प्रदर्शन किया जाएगा, साथ ही 100 से अधिक कलाकृतियों की प्रदर्शनी भी दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र होगी.

समारोह का उद्घाटन दादा साहब फाल्के पुरस्कार विजेता विख्यात मलयालम फिल्मकार अडूर गोपालकृष्णन द्वारा किया जाएगा. इस अवसर पर बंगाली सिनेमा के महान अभिनेता उत्तम कुमार की जन्मशती पर विशेष श्रद्धांजलि दी जाएगी. वहीं मोरक्को के प्रसिद्ध फिल्मकार मोहम्मद आहेद बेन्सौदा को सम्मानित करते हुए उनकी चर्चित फिल्म ‘द डिवोर्सिज ऑफ कासाब्लांका’ प्रदर्शित की जाएगी. बांग्लादेश की ख्यातिप्राप्त गायिका रूना लैला को मीनार-ए-दिल्ली अवार्ड से सम्मानित किया जाएगा जबकि वरिष्ठ भारतीय गायिका उषा उथुप को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रदान किया जाएगा. वरिष्ठ अभिनेत्री शर्मिला टैगोर की बंगाली सिनेमा में वापसी को उनकी फिल्म ‘पुरातन: द एनिशेंट’ के माध्यम से विशेष रूप से रेखांकित किया जाएगा. रितुपेर्नो सेनगुप्ता द्वारा अभिनीत और निर्मित इस फिल्म को दुनिया भर में सराहा जा रहा है . समारोह में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री सुश्री अन्नपूर्णा देवी मुख्य अथिति के तौर पर शामिल होंगी.

इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय सिनेमा की प्रमुख हस्तियों की भी प्रभावशाली उपस्थिति रहेगी, जिनमें केतन मेहता, दक्षिण भारतीय निर्देशक और अभिनेत्री रेवती, रितुपर्णो सेनगुप्ता, श्वेता मेनन, हिमानी शिवपुरी, राजपाल यादव, रघुवीर यादव, पियूष मिश्रा, यशपाल शर्मा और मुकेश तिवारी जैसे नाम शामिल हैं. इसके साथ ही लेबनान की सुपरस्टार मारवा करौनी, अफगानिस्तान की अभिनेत्री मलालाई ज़िक्रिया, ओमान की मारवत यूसुफ अल-बलुशी, मिस्र की नानेस अयमान, मोरक्को की मालक दहमूनी और बांग्लादेश के अशरफ शिशिर सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय कलाकार और फिल्मकार इस आयोजन में भाग लेंगे, जिससे यह समारोह एक वैश्विक सांस्कृतिक संगम का रूप लेगा.

समारोह में विश्व स्तर पर ख्यात रूस की प्रमुख फिल्म संस्था रोस्किनो और मोजाम्बिक का राष्ट्रीय फिल्म संस्थान सहयोगी भागीदार के रूप में जुड़ रहे हैं. इस फिल्म समारोह में रूस और चीन की फिल्मों को विशेष रूप से प्रदर्शित किया जायेगा जबकि अफ़्रीकी सिनेमा को फोकस किया जा रहा है . पांच दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में न केवल फिल्मों का प्रदर्शन होगा, बल्कि यह सिनेमा के माध्यम से सांस्कृतिक संवाद और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी नई दिशा देगा. उल्लेखनीय है कि इस मंच पर प्रदर्शित भारतीय खंड की कई फिल्मों को राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं, जबकि कुछ अंतरराष्ट्रीय फिल्मों को ऑस्कर तक भेजा गया है. इसके अलावा यह समारोह भारत और विश्व के बीच फिल्मी आदान-प्रदान को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है, जिसके तहत विभिन्न देशों के फिल्म समारोहों में भारतीय फिल्म कार्यक्रम भेजे जाते रहे हैं.

समारोह में प्रवेश पूरी तरह निःशुल्क रहेगा. फिल्मों का चयन प्रसिद्ध फिल्म पत्रकार अनुराग पुनेठा, कवि और समीक्षक प्रमोद कौंसवाल और टीवी दुनिया का जानामाना नाम रीमा दिनेश कपूर द्वारा किया गया है. जबकि ज्यूरी की अध्यक्षता रमन चावला करेंगे.

समारोह को लेकर आम लोगों लेकर फिल्म समीक्षकों में खासी दिलचस्पी बनी हुई है. प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक प्रवीण भटनागर ने कहा है कि हाल के समय में दिल्ली में अन्य फिल्म समारोह हुआ जिससे गफलत पैदा हुई. इसलिए वर्गों में यह चर्चा रही है कि वह आयोजन इस अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के पूर्व संस्करणों की संरचना और अवधारणा से प्रभावित या प्रेरित प्रतीत हुआ. दिल्ली अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह को मिलते जुलते नाम से किया गया लेकिन इसकी भी राजधानी में धूम रही. जबकि दिल्ली अंतरराष्ट्रीय फिल्म (डिफ) मौलिक, स्वतंत्र और अपने मूल स्वरूप को निरंतर बनाए रखने वाले मंच के रूप में देखा जाता है, जिसने वर्षों में अपनी अलग पहचान और विश्वसनीयता स्थापित की है.

दिल्ली इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के संस्थापक और प्रेसिडेंट रामकिशोर पारचा का कहना है कि हमने विश्व सिनेमा के लिए इस बार जो भी श्रेणियां बनाई है हम उसे विश्वसनीय तरीके से पेश करेंगे जिसमें फिल्मों की वैश्विक परिस्थितियां तो इंगित होंगी ही फिल्म और समाज के आपसी ताने-बाने को लेकर विशेषज्ञों के साथ चर्चाएँ भी आयो भी आयोजित की जाएँगी. हम सिनेमा के इतिहास में जाएंगे और समाज की सच्चाई से सिनेमा को परखेंगे. हर वर्ष की तरह हमारी कोशिश होगी कि फिल्म समारोह का संदेश देश और दुनिया में मनुष्य और उसके संघर्षों के साथ उसकी जिजीविषा का खास आईना बन सके.

175 फिल्में, 60+देशों की भागीदारी

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र और डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर (DAIC) में आयोजित होने वाले इस समारोह में फिल्मों को विभिन्न श्रेणियों में प्रस्तुत किया जाएगा, जिससे दर्शकों और फिल्म समीक्षकों को सिनेमा के विविध आयामों को समझने का अवसर मिलेगा. समारोह में विश्व सिनेमा, भारतीय सिनेमा, एनआरआई सिनेमा, शॉर्ट फिल्म्स, डॉक्यूमेंट्री और विशेष रेट्रोस्पेक्टिव सेक्शन जैसी अलग-अलग श्रेणियां बनाई गई हैं. विश्व सिनेमा खंड में विभिन्न देशों की समकालीन और क्लासिक फिल्मों का चयन किया गया है, जो सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय मुद्दों को वैश्विक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती हैं. भारतीय सिनेमा खंड में क्षेत्रीय और मुख्यधारा दोनों प्रकार की फिल्मों को शामिल किया गया है, जिनमें नई कहानियों और प्रयोगधर्मी सिनेमा की झलक देखने को मिलेगी. एनआरआई सिनेमा श्रेणी विशेष रूप से प्रवासी भारतीय फिल्मकारों की रचनात्मकता को सामने लाने का मंच बनेगी, जहां पहचान, संस्कृति और वैश्विक अनुभवों की कहानियां प्रमुखता से उभरेंगी.

समारोह में प्रदर्शित की जाने वाली फिल्मों में कुछ विशेष प्रस्तुतियां पहले ही चर्चा का विषय बन चुकी हैं. मोरक्को के चर्चित फिल्मकार मोहम्मद अहद बेन्सौदा की फिल्म दि डिवोर्सिज ऑफ कासाब्लांका (The Divorcees of Casablanca) को खास तौर पर सराहा गया है, जो आधुनिक समाज में रिश्तों की जटिलताओं को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती है. इसी तरह भारतीय खंड में चयनित कई फिल्में समकालीन सामाजिक बदलाव, पारिवारिक संरचना और व्यक्तिगत संघर्षों को बेहद प्रभावशाली ढंग से सामने लाने के लिए जानी जा रही हैं. शॉर्ट फिल्म और डॉक्यूमेंट्री श्रेणियों में भी कई ऐसी प्रविष्टियां शामिल हैं, जो अपने विषय, प्रस्तुति और तकनीकी उत्कृष्टता के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता रखती हैं.

वर्ल्ड सिनेमा:
– फीचर फिल्म: 21
– शॉर्ट फिल्म: 25
– डॉक्यूमेंट्री: 12
– एनीमेशन (फीचर+शॉर्ट): 10
-म्यूजिक वीडियो: 1

एनआरआई फिल्म सेक्शन:
– फीचर फिल्म: 3
– शॉर्ट फिल्म: 9

– इंडियन शोकेस
– फीचर फिल्म: 11
– शॉर्ट फिल्म: 41
– डॉक्यूमेंट्री: 7
– एनीमेशन: 8
– म्यूजिक वीडियो: 7

इंडियन शोकेस (सेंसर सार्टिफिकेट के साथ के साथ):
-फीचर फिल्म: 16
-शॉर्ट फिल्म: 2
– डॉक्यूमेंट्री: 2
– कुल फिल्में: 175
– भागीदारी: 60 से अधिक देश

हस्तियों का लगेगा मेला

भारतीय फिल्म जगत से अडूर गोपालकृष्णन, केतन मेहता, शर्मिला टैगोर, रेवती, उषा उथुप, रितुपर्णो सेनगुप्ता, श्वेता मेनन, मेघना मलिक, हिमानी शिवपुरी, मुकेश तिवारी, राजपाल यादव, रघुवीर यादव, यशपाल शर्मा, पियूष मिश्रा, चित्तरंजन त्रिपाठी, राजेन्द्र गुप्ता.

अंतरराष्ट्रीय मेहमान: रूना लैला (बांग्लादेश), मारवा करौनी (लेबनान), मलालाई ज़िक्रिया (अफगानिस्तान), मारवत यूसुफ अल-बलुशी (ओमान), नानेस अयमान (मिस्र), मालक दहमूनी (मोरक्को), अशरफ शिशिर (बांग्लादेश), गीतांजलि बौंगली (मॉरिशस), देविंदा कोंगाहेगे (श्रीलंका), जग परमार (कनाडा), आमेर सलमीन (यूएई), मारियाना कंडूमा (मोजाम्बिक), सैंड्रा ई कवार (जॉर्डन), मुजतबा सब्बार (अफगानिस्तान)

विशेष आकर्षण: अडूर गोपालकृष्णन करेंगे उद्घाटन
रूना लैला को ‘मीनार-ए-दिल्ली अवार्ड’. उषा उथुप को लाइफटाइम अचीवमेंट. उत्तम कुमार जन्मशती पर श्रद्धांजलि. मोरक्को के फिल्मकार मोहम्मद आहेद बेन्सौदा को सम्मान.

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