हिन्दी पट्टी का भेड़िया-धसान

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पटना। सबसे पहले तो शायद “भेड़िया-धसान” शब्द ही बताना होगा। क्या होता है कि एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर जाते भेड़िये हमेशा एक ही कतार में चलते हैं। कतार कायम रहेगी, झुण्ड का सबसे आगे चल रहा भेड़िया जिधर से गया है, उससे कोई जरा भी दाएँ-बाएँ नहीं खिसकेगा। आगे वाले ने जरा भी गलत मार्ग चुन लिया, किसी गड्ढे-टीले से गुजरा, कहीं छलाँग लगानी पड़ी तो पीछे वाले बिलकुल भी बुद्धि नहीं लगायेंगे। अवरोध के किनारे से कतरा कर नहीं निकलेंगे, वही मुश्किल रास्ता अपनाएंगे। मोटे, सपाट शब्दों में कहें तो किसी ने कह दिया कि कौवा कान लेकर उड़ गया तो पहले अपना कान टटोलने के बदले, सभी को कौवे के पीछे दौड़ पड़ना है। हाल में ऐसा होते देखना है तो भोपाल के एक तथाकथित साहित्योत्सव में किसी सत्र के नाम पर उठे बवाल में देख लीजिये।

बात एक लेख से शुरू हुई थी जिसमें असल में प्रश्न बाबर को महिमामंडित किये जाने पर कम था और सत्रों के नाम में जबरन उर्दू-फारसी शब्द क्यों घुसाए जा रहे हैं, इसपर था। पता नहीं कैसे उससे बाबर को महिमामंडित किये जाने की बात उठी। चलिए उठ भी गयी थी तो कोई बात नहीं, एक बार जिस लेखक का सत्र था, उसकी पुस्तक देख लेते। इसका उचित तरीका ये होता है कि किसी अकादमिक व्यक्ति को वह पुस्तक पढ़ा दी जाए और उससे पूछ लें कि समझा दो इसमें लिखा क्या है? अब इसपर कुछ लोग कहेंगे कि हमें क्या शब्दों के अर्थ समझ नहीं आते? तो भाई ऐसा है कि अकादमिक जगत में “आलोचना” का अर्थ कुछ और होता है, आम बोलचाल की भाषा जैसा “निन्दात्मक” अर्थ नही होता। पुस्तकों की आलोचना होती है, उसमें सिर्फ किताब की खराबी बताते हैं क्या? अदालती-अकादमिक भाषा समझ नहीं आती इसलिए वकील रखते हैं।

जो सत्र का नाम था, उसमें “क्वेस्ट” लिखा देखकर हिन्दी बोलने-पढ़ने वाला कोई आम आदमी उसका अर्थ “क्वेश्चन” जैसा लगाने लगे, केवल खोज या अन्वेषण समझ बैठे ऐसा हो सकता है। अकादमिक जगत वाला तुरंत बता देगा ये लैटिन से पुराने फ्रेंच में आया शब्द है। ये तो जरूर है कि “क्वेश्चन” उसी मूल से बनता है जिससे “क्वेस्ट” बना है लेकिन “क्वेस्ट” कोई “भारत एक खोज” जैसा “खोज” बिलकुल नहीं होता। ये शुरू में तो न्यायिक जाँच जैसे अर्थ में प्रयुक्त होता था लेकिन अंग्रेजी में आते-आते इस शब्द का अर्थ किसी कीमती वस्तु की ऐसी जोखिम भरी तलाश हो गया था जिसके लिए योद्धा (नाईट) निकलते थे। रास्ते में आने वाली विघ्न-बाधाओं को मिटाते हुए कीमती चीज (जैसे होली ग्रेल) लेकर लौटने की मंशा स्पष्ट होती है “क्वेस्ट” में।

अगर अंग्रेजी में अकादमिक स्तर पर लिखी गयी कोई पुस्तक होगी और उसमें बाबर को लुटेरे की तरह, सोने की चिड़िया (यानि भारत) की रक्षा करने वालों को निपटाकर सोने की चिड़िया लूटने आया बताने की मंशा होगी तो बाबर के भारत आने को सभ्य अकादमिक भाषा में “क्वेस्ट” ही लिखेंगे। शब्दों के उल्टे या बिलकुल असंगत अर्थ कर डालना कोई नयी बात भी नहीं है। समय-समय पर आत्मा को “सोल”, धर्म को “रिलिजन”, या ईमानदारी-शहीद जैसे शब्दों के प्रचलित अर्थ तक पर बहसें होती रही हैं। जिस लेख के आधार पर बहसें शुरू हुई उसमें भी आदिशंकराचार्य पर कहीं आयोजित किसी सत्र का नाम “दास्तान” रखने पर बात होती दिखेगी। बात सही भी है, आदिशंकराचार्य की कथा होगी, दास्तान क्यों होगी? पति के साथ पत्नी होती है, बेगम नहीं होती।

ये सीधी सी बात है कि कंप्यूटर इंजिनियर से किसान के हल के सात पुर्जों के नाम पूछ लिए जाएँ तो उसे नहीं पता होगा, ऐसे ही किसान को कंप्यूटर के कल-पुर्जों से कोई लेना-देना नहीं, तो वो उनके काम या नाम नहीं जानेगा। हर व्यक्ति हर विषय का विशेषज्ञ नहीं होता। आभास मलदहियार की पुस्तक का प्रयोग अकादमिक जगत में बाबर के महिमामंडन की धज्जियाँ उड़ा देने के लिए हो सकता है। एक आयातित विचारधारा के गढ़े कथानक में बाबर को महान धर्मनिरपेक्ष घोषित करने के लिए तथाकथित बुद्धिजीवी “भोपाल वसीयतनामा” का नाम उछालते हुए कभी भी दिख जायेंगे। ये “भोपाल वसीयतनामा” फर्जी है, इसे सिद्ध करने में किसी भी अकादमिक या सार्वजनिक मंच पर आभास की पुस्तक या उसके भाषण का प्रयोग हो सकता है।

ये कोई भी लिखने-पढ़ने में रूचि रखने वाला बता सकता है कि सन्दर्भ (पुस्तकों के अंत में पाया जाने वाला रिफरेन्स) कैसी पुस्तकों का दिया जाता है। बाबर के हमले के कारण चंदेरी की स्त्रियों को जौहर करना पड़ा था। इसका सन्दर्भ किस पुस्तक से देंगे? आयातित विचारधारा वाले तो जौहर-साका की बात करने से रहे! चंदेरी के जौहर पर आभास की पुस्तक तो है, दूसरी राष्ट्रवादी पुस्तकें ढूंढना लगभग असंभव है। ध्यान दीजिये शब्दों पर तो दिख जायेगा, पुस्तकें लिखा, उपन्यास नही लिखा है। आश्चर्यजनक है कि मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी भी लेखक या सत्र के बारे में चुप रही। क्या उनके पास चार ऐसे लोग भी नही जो उन्हें पुस्तक पढ़कर बता देते कि इसमें क्या लिखा है, या विवाद उठा है तो इसके बारे में क्या बताना है? ऐसे लोगों को साहित्य अकादमी के पद-प्रतिष्ठा की मलाई की कटोरी वापस रख देनी चाहिए।

हिन्दी पट्टी के “गैरों पे करम, अपनों पे सितम…” की परिपाटी कोई नयी भी नहीं है। हाल में दूसरे पक्ष के एक लेखक के पक्ष में हुआ-हुआ करते लोग दिखे थे। काफी पहले एक लेखक-पत्रकार महोदय की अयोध्या (राम जन्मभूमि आन्दोलन) पर लिखी पुस्तक का विमोचन तो संघ प्रमुख और अमित शाह से करवा दिया था। पिछले उत्तर प्रदेश चुनावों के बाद तथाकथित लेखक-पत्रकार का क्या हुआ ये बताने की आवश्यकता नहीं। स्वबोध और शत्रुबोध दोनों से हीन लोग समाज को जैसी दिशा देंगे, उसके बारे में तो सोचने से ही डर लगता है। हिन्दी में कथेतर साहित्य की कमी, शोध करके लिखने वालों का न होना, काफी हद तक शोधपरक लेखकों को खदेड़े जाने के कारण है। हमारे पास जब पाठकों के “ये पुस्तक हिन्दी में आती है क्या?” वाले प्रश्न का उत्तर नहीं होता, तो उसके पीछे बड़ा कारण “अपनों पे सितम…” ही है!

बार-बार अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के बाद भी हिन्दी पट्टी अकादमिक लेखन और आम जनता के लिए लेखन में अंतर समझे, शोध को आम जन की भाषा में उनतक पहुँचाने जैसे प्रयास करेगी, इसकी उम्मीद हमें तो नगण्य लगती है। हाँ, शायद नए लोगों के हिंदी लेखन में आने के बाद एक-आध दशक में स्थितियाँ बदलें, तबतक तो प्रतीक्षा ही करनी होगी।

खेतों में मौन होता श्रम: झाबुआ की ‘अड़जी-पड़जी’ परंपरा से सुलझती कृषि की गुत्थी

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निलेश देसाई

भोपाल : विरोधाभासों के बीच फंसी खेती भारतीय कृषि आज एक अजीबोगरीब चौराहे पर खड़ी है। अर्थशास्त्री इसे ‘अधिशेष श्रम’ (Surplus Labour) का क्षेत्र कहते हैं, जहाँ आवश्यकता से अधिक लोग नियोजित हैं। लेकिन धरातल की सच्चाई इसके ठीक उलट है। आज गाँव का किसान बुवाई और कटाई के महत्वपूर्ण समय में ‘हाथ’ तलाश रहा है, जबकि खेत में पसीना बहाने वाला मजदूर सम्मानजनक पारिश्रमिक और सुरक्षा के अभाव में शहरों की ओर पलायन कर रहा है। यह केवल एक आर्थिक संकट नहीं है, बल्कि उस सामाजिक ढांचे का ढहना है जिसने सदियों तक भारतीय गाँवों को आत्मनिर्भर बनाए रखा था। इस गहराते संकट के बीच, मध्य प्रदेश के झाबुआ की आदिवासी परंपरा ‘अड़जी-पड़जी’ एक ऐसी मशाल बनकर उभरती है, जो न केवल श्रम की समस्या का समाधान देती है, बल्कि आधुनिक खेती के लिए एक नया ‘इकोनॉमिक मॉडल’ भी प्रस्तुत करती है।

कृषि श्रम का गहराता संकट: एक कड़वी सच्चाई

आज का भारतीय किसान दोहरी मार झेल रहा है। एक तरफ खेती में ‘प्रच्छन्न बेरोजगारी’ का शोर है, तो दूसरी तरफ हकीकत यह है कि बुवाई और कटाई के पीक सीजन में किसान को एक मजदूर तक नसीब नहीं होता। जो मजदूर उपलब्ध हैं, उनकी नकद मजदूरी की मांग और किसान की भुगतान करने की घटती क्षमता के बीच एक गहरी खाई पैदा हो गई है।

इस संकट को हल करने के लिए हमने मशीनीकरण और खरपतवारनाशक रसायनों का सहारा लिया। लेकिन इस समाधान ने नई समस्याएं पैदा कर दीं। भारी मशीनों ने मिट्टी के स्वास्थ्य को बिगाड़ा और रसायनों ने जैव-विविधता को नष्ट किया। सबसे बड़ी मार महिलाओं पर पड़ी, जिनके हाथ से निराई-गुड़ाई जैसे पारंपरिक काम छिन गए। मशीनीकरण ने श्रम की समस्या को हल करने के बजाय उसे ‘विस्थापित’ कर दिया और किसान को कर्ज के नए जाल में धकेल दिया।

अड़जी-पड़जी: सामूहिक श्रम की गौरवशाली परंपरा

जहाँ आधुनिक नीतियां विफल होती हैं, वहां आदिवासी समाज का ‘स्थानीय ज्ञान’ मार्ग दिखाता है। झाबुआ और अलीराजपुर के आदिवासी अंचलों में प्रचलित ‘अड़जी-पड़जी’ (Adji-Padji) कोई साधारण प्रथा नहीं, बल्कि श्रम के लोकतंत्रीकरण का उत्कृष्ट उदाहरण है।

‘अड़जी-पड़जी’ का दर्शन सरल और प्रभावी है: इसमें गाँव के किसान एक-दूसरे के खेतों में सामूहिक रूप से काम करते हैं। यदि आज एक किसान के खेत में बीज रोपना है, तो पूरा गाँव या टोला वहां मौजूद होगा। कल वही समूह दूसरे के खेत में जाएगा। यहाँ श्रम का मूल्य ‘नोटों’ में नहीं, बल्कि ‘सहयोग’ में मापा जाता है। इसमें न कोई मालिक है, न कोई नौकर; हर कोई एक-दूसरे का सहयोगी है।

समाधान के रूप में स्थानीय ज्ञान के लाभ

अड़जी-पड़जी जैसी परंपराएं आधुनिक कृषि की तीन बड़ी चुनौतियों का समाधान करती हैं:

1. आर्थिक स्वावलंबन: छोटे और सीमांत किसानों के पास नकद राशि का अभाव होता है। अड़जी-पड़जी नकद मजदूरी की आवश्यकता को समाप्त कर देती है, जिससे किसान को साहूकारों या बैंकों से कर्ज नहीं लेना पड़ता।
2. समयबद्धता और लचीलापन: कृषि में समय का बहुत महत्व है। बारिश होने के साथ ही बुवाई शुरू करनी होती है। अड़जी-पड़जी के माध्यम से जो काम एक परिवार दस दिन में करता, वह सामूहिक श्रम से एक ही दिन में संपन्न हो जाता है।
3. श्रम की गरिमा और सुरक्षा: जब किसान एक-दूसरे के खेतों में काम करते हैं, तो काम में ‘सम्मान’ जुड़ जाता है। यह उन मजदूरों के लिए भी एक सुरक्षित विकल्प है जो शहरों की असुरक्षित गलियों में धक्के खाने के बजाय अपने समुदाय के बीच रहकर गरिमापूर्ण जीवन जीना चाहते हैं।

कृषि श्रम कोष: परंपरा को नीति का समर्थन

झाबुआ के इस अनुभव को राष्ट्रव्यापी बनाने के लिए केवल सराहना काफी नहीं है, इसे नीतिगत समर्थन की आवश्यकता है। एक ‘कृषि श्रम कोष’ (Agriculture Labour Fund) की स्थापना समय की मांग है।

इस कोष का उद्देश्य उन समुदायों और समूहों को वित्तीय प्रोत्साहन देना होना चाहिए जो मशीनीकरण के बजाय पारंपरिक श्रम-साझा प्रणालियों को चुनते हैं। यह कोष छोटे और मध्यम किसानों को संगठित होने, ‘टूल बैंक’ (साझा कृषि उपकरण) बनाने और पीक सीजन के दौरान होने वाले जोखिमों को कवर करने में मदद कर सकता है। यदि सरकार मनरेगा (MGNREGS) जैसी योजनाओं को इन स्थानीय श्रम-साझा मॉडलों के साथ जोड़ दे, तो ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और उत्पादकता दोनों में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है।

पारिस्थितिकी और सामाजिक न्याय का संगम

अड़जी-पड़जी केवल श्रम बचाने का तरीका नहीं है, यह ‘प्राकृतिक खेती’ का आधार भी है। जब श्रम सामूहिक होता है, तो रसायनों की जगह हाथों से निराई-गुड़ाई संभव होती है। इससे मिट्टी की उर्वरता बचती है और पर्यावरण की रक्षा होती है। यह मॉडल सामाजिक न्याय की भी बात करता है, क्योंकि यह महिलाओं के श्रम को अदृश्य होने से बचाता है और उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करता है।

निष्कर्ष: जड़ों की ओर वापसी

भारतीय कृषि आज जिस चौराहे पर खड़ी है, वहां रास्ता केवल ‘स्मार्ट सिटी’ या ‘बड़ी मशीनों’ से होकर नहीं जाता। रास्ता उन ‘साझा हाथों’ से होकर जाता है जो झाबुआ के खेतों में एक-दूसरे को थामे हुए हैं। ‘अड़जी-पड़जी’ हमें याद दिलाती है कि खेती केवल एक व्यापार नहीं है, बल्कि एक सामुदायिक उत्सव और जीवन पद्धति है।

यदि हम वास्तव में किसान और मजदूर दोनों को बचाना चाहते हैं, तो हमें अपनी आधुनिक नीतियों में झाबुआ के इस ‘अड़जी-पड़जी’ मॉडल को जगह देनी होगी। स्थानीय ज्ञान और परंपराओं का सम्मान ही वह एकमात्र पुल है, जो वर्तमान के संकट और भविष्य की खुशहाली को जोड़ सकता है। यह समय मशीनों के शोर को कम करने और सहयोग की उन दबी हुई आवाजों को सुनने का है, जो हमारे गाँवों की मिट्टी में आज भी गूँज रही हैं।इति

 

इस्लामिक साम्राज्यवाद के विरुद्ध सभ्यता की बगावत

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✍️ प्रणय विक्रम सिंह

दिल्ली । ईरान में आज जो घट रहा है, वह किसी एक मुल्क की सियासी हलचल नहीं, यह इतिहास की छाती पर उठती हुई एक सभ्यतागत बगावत है।

यह उस पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है, जिसे यह समझा दिया गया था कि मजहबी सत्ता ढांचे हमेशा के लिए समाजों की आत्मा पर कब्जा कर सकते हैं। नहीं, जब किसी कौम की तारीख, तहजीब और इंसानी आजादी को कुचला जाता है, तो इन्कलाब लाजिमी हो जाता है।

ईरान आज इस इन्कलाब की अग्रिम चौकी है। दशकों तक जिस इस्लामवादी सत्ता-व्यवस्था ने शरीयत, डर और वैचारिक निगरानी से जिंदगियों को जकड़े रखा, वही आज अपने ही अवाम की जागी हुई चेतना से घिर चुकी है।

यह बगावत हमें यह याद दिलाती है कि किसी भी क़ौम का डीएनए मिटाया नहीं जा सकता। ईरान का डीएनए पर्शिया है। साइरस की सहिष्णुता, जरतुस्त्र की नैतिक ज्वाला और अवेस्ता की रूह हर कोने में समाई है। अरब से आई इस्लामवादी सत्ता-रचना ने इस पहचान पर परदे डाले, प्रतीकों को बदला, स्मृतियों को हाशिए पर धकेला मगर उसे बुझा नहीं सकी। आज वही भूली-बिसरी स्मृति फिर दहक रही है। अफगानिस्तान से लेकर मिस्र और यूरोप तक सवाल गूंज रहा है कि क्या मजहबी पहचान सभ्यतागत पहचान से बड़ी हो सकती है?

इस्लामवादी साम्राज्यवाद ने पर्शिया को ईरान बनाया और इस बदलाव में केवल नाम नहीं बदला, एक सभ्यता को परदे के पीछे धकेल दिया गया। पर्शिया वह धरती थी जहां नैतिकता, सहिष्णुता और मानवीय गरिमा राज्य-दृष्टि का आधार थीं। सत्ता-रूप में उभरी मजहबी विचारधारा ने इस प्राचीन पहचान को पूर्व-इस्लामी कहकर संदिग्ध बनाया। भाषा बदली, प्रतीक बदले, इतिहास की किताबों से स्मृति छीनी गई। आज ईरान की सड़कों पर उठती आग उसी दबाई गई पर्शियन आत्मा की पुकार है कि हम वही हैं जो थे। हमारी रूह को नाम बदलकर मिटाया नहीं जा सकता।

दरअसल, इस्लामी साम्राज्यवाद की बर्बरता उसकी आस्था, उसके सत्ता-रूप में दिखाई देती है। इतिहास गवाह है कि जब ‘मजहब’ तलवार बनकर सभ्यताओं पर टूटा, तब नगर उजड़े, पुस्तकालय जले, मंदिर-प्रतिमाएं तोड़ी गईं, भाषाएं हाशिये पर डाली गईं और स्त्रियों की देह को नियंत्रण का मैदान बनाया गया।

इनके द्वारा विविधता को ‘कुफ्र’, स्मृति को ‘जाहिलियत’ और असहमति को ‘बगावत’ कहकर कुचला गया। इस साम्राज्यवादी विस्तार ने संवाद नहीं, दहशत रची, आस्था नहीं, आज्ञाकारिता मांगी और न्याय नहीं, अधीनता थोपी।

इतिहास गवाह है कि ‘मजहबी’ अंधड़ ने इंसान से उसकी जड़ें, उसकी भाषा, उसकी कला और उसकी गरिमा छीनने की कोशिश की और वहीं से प्रतिरोध की नैतिक जरूरत जन्मी।

यहां यह समझना जरूरी है कि इस्लामवाद यानी मजहब का सत्ता-रूप अक्सर सभ्यता से टकराता है। उसकी भाषा द्वैत रचती है ‘काफ़िर’ और ‘मोमिन’, ‘दारुल-इस्लाम’ और ‘दारुल-हरब’। इस दृष्टि में स्थानीय परंपराएं, स्त्री की स्वतंत्रता, कला, स्मृति और विविधता संदेह के घेरे में आ जाती हैं। जहां यह वैचारिक कठोरता सत्ता बनती है, वहां इंसान अपनी जड़ों से काटा जाता है। यह धर्म नहीं विचारधारा का कब्जा है।

इसीलिए जब ईरान की बेटियां सरे-आम बुर्क़ा जलाती हैं, तो वे कपड़ा नहीं डर और नियंत्रण को आग लगाती हैं। यह केवल स्त्री-अधिकार का एलान नहीं, यह उस देह पर थोपे गए मजहबी पहरे के खिलाफ खुली बगावत है। तेहरान की यह लपटें काबुल, कराची और गाजा तक जमीरों को झकझोर रही हैं। और जब शेर और अग्नि वाला पुराना फारसी झंडा फिर से उठता है, तो वह अरब-केंद्रित इस्लामवादी पहचान के विरुद्ध सभ्यता की चुनौती बन जाता है। वह तुर्की, मध्य एशिया और उत्तर अफ्रीका तक फैले समाजों को उनकी-उनकी भूली हुई सभ्यताओं की याद दिला रहा है।

यह जंग किसी आस्था से नहीं इस्लामवादी अधिनायकवाद से है। यह ऐलान है कि मजहब निजी है, मगर सभ्यता जनता की। और जब कोई मजहबी सत्ता सभ्यता को निगलने बढ़े, तो रहम नहीं बगावत उसका जवाब होती है।

आज ईरान केवल एक देश नहीं, एक दर्पण बन चुका है और दुनिया उसके सामने खड़ी दर्शक। इस दर्पण में हर समाज अपनी शक्ल देख सकता है, कहीं दबाई गई स्मृतियां, कहीं कुचली गई अस्मिताएं, कहीं थोपे गए मजहबी पहरे। सवाल यह नहीं कि ईरान में क्या हो रहा है! सवाल यह है कि दुनिया उस प्रतिबिंब को देखकर क्या करेगी? नजर चुराएगी या सच स्वीकार करेगी। क्योंकि जब कोई सभ्यता अपने भीतर झांक लेती है, तब इतिहास दर्शक नहीं रहता, भागीदार बन जाता है। ईरान की यह आग इसलिए महज तेहरान की नहीं यह वैश्विक जमीर की दहकती मशाल है।

जितनी डुबकी, उतना लाई ग्राम्य भारत की जीवित मकर संक्रांति

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अखिलेश चौधरी

दिल्ली । मकर संक्रांति आज के शहरी जीवन में केवल पतंगबाजी, सोशल मीडिया पोस्ट और बाज़ार की गूँज तक सिमट गई है। लेकिन ग्रामीण भारत की स्मृतियों में झाँकें, तो यह पर्व समाज-निर्माण का एक वार्षिक महायज्ञ हुआ करता था। संक्रांति केवल एक दिन का त्यौहार नहीं, बल्कि पूरे गाँव की सामूहिक चेतना का उत्सवकाल थी। यह वह समय था जब व्यक्ति, समाज, प्रकृति और राष्ट्र—चारों को एक ही संस्कार-सूत्र में बाँधा जाता था।

🌑 *मकर संक्रांति: क्या, कब और क्यों?* (खगोलीय एवं आध्यात्मिक आधार)

भारतीय संस्कृति में किसी भी पर्व का आधार केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि गहरा विज्ञान होता है। मकर संक्रांति वह खगोलीय क्षण है जब सूर्य धनु राशि से निकलकर *मकर राशि* में प्रवेश करता है। इसी के साथ सूर्य की यात्रा ‘दक्षिणायन’ (अंधकार की ओर) समाप्त होकर *’उत्तरायण’* (प्रकाश की ओर) शुरू होती है।

भारत के विभिन्न कोनों में इसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है, जो इसकी व्यापकता को दर्शाता है। *बिहार के मिथिलांचल में इसे ‘तिला-संक्रांति’* कहा जाता है, तो *बिहार और उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) के अन्य हिस्सों में इसे लोकभाषा में ‘खिचड़ी’* ही कह दिया जाता है। *पंजाब में इसे ‘लोहड़ी’* के रूप में अग्नि को समर्पित किया जाता है, तो *महाराष्ट्र में ‘तिल-गुल’* कहकर मिठास बाँटी जाती है। दक्षिण में इसे *’पोंगल’* तो असम में *’बिहू’* के नाम से नई फसल का स्वागत माना जाता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से उत्तरायण को ‘देवताओं का दिन’ कहा जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने स्वेच्छा से अपना शरीर त्यागने के लिए इसी पुण्य काल की प्रतीक्षा की थी, क्योंकि यह समय मोक्ष और चेतना के ऊर्ध्वगमन का प्रतीक है।

❄️ *कड़कड़ाती ठंड और सामूहिक उत्साह की ऊष्मा*

पौष मास की वह ठिठुरन, जहाँ हाथ-पाँव सुन्न हो जाते थे, वहाँ भी गाँव का उत्साह कभी ठंडा नहीं पड़ा। संक्रांति की तैयारियाँ हफ़्तों पहले शुरू हो जाती थीं। घर-घर में मिट्टी के बड़े बर्तनों में दही जमाया जाता था। माँ, दादी, चाची और बुआ मिलकर चूड़ा, मुरही (परमल) और तिल को साफ करतीं और गुड़ की चाशनी की खुशबू पूरे घर में महकने लगती।

इस उत्सव का एक अनिवार्य हिस्सा था *“बाँझ डाल” की खोज*। गाँव के युवा आम के बगीचों में घूमकर ऐसी टहनियों को चिह्नित करते थे जिनमें फल नहीं आते थे। धूनी जलाने के लिए केवल वही डाल काटी जाती थी जो अनुपयोगी हो। फलदार शाखा को छूना भी वर्जित था, क्योंकि वह केवल लकड़ी नहीं, बल्कि धरती की उर्वर कोख थी। यहाँ पर्यावरण संरक्षण कोई लिखित कानून नहीं, बल्कि संस्कार के रूप में रचा-बसा धर्म था।

🌞 *“जितनी डुबकी, उतना लाई” : आत्मशुद्धि का जीवन दर्शन*

संक्रांति की भोर में जब गाँव की पवित्र नदियों, तालाबों या कुएँ पर भीड़ उमड़ती थी, तो बुजुर्ग बच्चों को एक ही मंत्र देते थे: *“जितनी डुबकी, उतना लाई मिलेगा।”* यह वाक्य केवल बच्चों का मन बहलाने के लिए नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक गहरा जीवन-दर्शन था। ‘डुबकी’ का अर्थ था – आलस्य, प्रमाद और अहंकार को धोना। पुराने वर्ष के दोषों को विसर्जित कर नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ना। ‘लाई’ उस साधना के फल का प्रतीक थी। यह संदेश दिया जाता था कि जो व्यक्ति स्वयं को जितना तपाएगा (डुबकी लगाएगा), वह समाज की मिठास (लाई) का उतना ही बड़ा अधिकारी होगा।

🔥 *धूनी : सामाजिक चेतना की अखंड अग्नि*

स्नान के बाद गाँव के सामूहिक चौक पर जलाई गई ‘धूनी’ केवल शरीर तपाने का साधन नहीं थी, बल्कि वह समाज की आत्मा की अग्नि थी। धूनी के चारों ओर पूरा गाँव इकट्ठा होता था – जहाँ पीढ़ियों का अनूठा संगम होता। बच्चे वहाँ बड़ों से संस्कार और मर्यादा सीखते, बुजुर्ग अनुभवों की पोटली खोलते और युवा अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों को समझते। यह धूनी ‘अखंड भारत’ के एक लघु प्रतिरूप जैसी थी, जहाँ जाति और वर्ग के भेद आग में जलकर भस्म हो जाते थे।

🍘 *संगठन का शास्त्र और “खिचड़ी के चार यार”*

लाई (चूड़ा-गुड़, तिल-गुड़) और खिचड़ी केवल भोजन नहीं, सामाजिक संगठन के अद्भुत शास्त्र हैं। तिल अकेला हो तो बिखरा हुआ होता है, लेकिन जब वह गुड़ की आत्मीयता के साथ जुड़ता है, तो एक शक्तिशाली लड्डू बन जाता है। यही राष्ट्र निर्माण का सूत्र है।

खिचड़ी के संदर्भ में ग्रामीण इलाकों में एक प्रसिद्ध कहावत है—

*“खिचड़ी के चार यार : दही, पापड़, घी और अचार।”* यह कहावत केवल स्वाद के लिए नहीं है, बल्कि यह जीवन में *’सहयोग’* और *’पूरकता’* का दर्शन है। खिचड़ी सिखाती है कि अलग-अलग अस्तित्व (चावल, दाल, मसाले) होने के बावजूद जब सब एक साथ मिलते हैं, तो एक ‘पूर्ण आहार’ बनते हैं। जैसे खिचड़ी इन चार सहयोगियों (दही, पापड़, घी, अचार) के बिना अधूरी है, वैसे ही एक सशक्त समाज भी हर वर्ग के सहयोग के बिना अधूरा है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी, यह संतुलित आहार शीत ऋतु में शरीर को आवश्यक ऊर्जा और संतुलन प्रदान करता है।

🏡 *“तिलकूट भरोगे न?” आत्मीयता की दीक्षा*

संक्रांति का सबसे भावुक क्षण वह होता था जब घर की ज्येष्ठ महिलाएँ तिल-गुड़ लेकर बच्चों के पास आतीं और तीन बार पूछतीं -“तिलकूट भरोगे न?” यह एक प्रकार की सांस्कृतिक दीक्षा थी। जैसे ही बच्चा विनम्रतापूर्वक “हाँ” कहता, उसकी हथेली मिठास से भर दी जाती। यह सिखाता था कि जीवन में प्रेम और सम्मान अधिकार से नहीं, बल्कि ‘विनम्र स्वीकृति’ और ‘आत्मीयता’ से प्राप्त होता है।

🌾 *पशु-धन, दान और पितृ-तर्पण*

ग्राम्य भारत में यह पर्व *’कृतज्ञता’* का महापर्व था। खेती की रीढ़ कहे जाने वाले गायों और बैलों को तिलक लगाकर उन्हें विशेष खिचड़ी खिलाई जाती थी। घर की देहरी पर आए हर जरूरतमंद को ‘सिद्धा’ (कच्चा अन्न) दान करना यह सुनिश्चित करता था कि उत्तरायण के प्रकाश में समाज का कोई भी कोना भूखा न रहे। इस दिन पूर्वजों को याद करना और उनके नाम पर तर्पण करना हमें हमारी जड़ों से जोड़ता था।

🌳 *जड़ों की ओर वापसी का संकल्प*

आज जब समाज व्यक्तिवाद के अंधेरे में खो रहा है, हमें फिर से उसी धूनी, उसी डुबकी और उसी ‘तिला-संक्रांति’ के मर्म को समझने की जरूरत है। मकर संक्रांति हमें सिखाती है कि:

• *सूर्य* की तरह परोपकारी बनें।
• *गुड़* की तरह अपनी वाणी में मधुरता लाएं।
• *तिल* की तरह संगठित होकर राष्ट्र की शक्ति बनें।
• खिचड़ी की तरह समरस होकर समाज को एक करें।

जो समाज को जोड़ना जानता है, वही वास्तव में राष्ट्र बनाना जानता है। आइए, इस मकर संक्रांति पर हम अपनी जड़ों की ओर लौटने का संकल्प लें और भारत को पुनः सांस्कृतिक वैभव के शिखर पर प्रतिष्ठित करें।

लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु।

भारत माता की जय।
शुभ मकर संक्रांति।

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