एक युवा कवि की कविता पर एजेडाबाजी 

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रवि शंकर

दिल्ली। एक युवा कवि की कविता पर होने वाले विवाद पर जो तर्क-वितर्क चल रहे हैं, दुर्भाग्यवश वह विवाद कुछ हद तक एजेडाबाजी विवाद है।

पहली बात समझने की है कि श्रृंगार रस में जब भी कुछ लिखा जाएगा तो उसमें स्त्रियों के यौनांगों का उल्लेख आएगा ही। वह बहुतों को अश्लील ही प्रतीत होगा। भक्ति में भी जब श्रृंगार रस का वर्णन आया तो वह अश्लील ही बन गया। जिन्हें यह समझना हो, वे मध्यकालीन कवि जयदेव का गीत गोविंद पढ़ लें। यहाँ तक कि  ब्रह्मवैवर्त पुराण में श्रीकृष्ण की रासलीला का वर्णन ऐसा अश्लील है कि आचार्य श्रीराम शर्मा ने अपने भाष्य में उन अंशों को शामिल ही नहीं किया। यह उन्होंने उसकी भूमिका में भी लिखा है। हम यह भी पढ़ते हैं कि कविवर कालीदास को ऐसे ही अश्लील पद्य की रचना करने के कारण कोढ़ हो गया था। वे भी श्रृंगार और अश्लीलता को भेज बीच में भूल गए थे।

वस्तुतः श्रृंगार रस और अश्लीलता में बहुत ही सूक्ष्म रेखा है। इस सूक्ष्म रेखा को जानने वाला ही वास्तविक कवि हो सकता है, अन्यथा वह मानसिक रूप से कुष्ठग्रस्त ही माना जाएगा। इसे और भी अच्छे से समझना हो तो पाश्चात्य साहित्य में इरोटिका और पोर्न के विवाद को पढ़ लें। वहाँ इरोटिका लिखने वाले स्वयं को पोर्न की श्रेणी से बाहर रखते हैं और वे यह मानते हैं कि उनका लेखन कलात्मक है, पोर्न नहीं। यानी पोर्न से उन्हें भी परहेज है। यही कारण है कि वहाँ भी एरोटिक और स्लैंग लैंग्वेज में भेद किया जाता है।

तो इरोटिका कब पोर्न बन जाती है या फिर भारतीय शब्दावली में कहें तो श्रृंगार कब अश्लील हो जाता है? इस प्रश्न का उत्तर भाषा में छिपा है। पीन पयोधर कहेंगे तो वह श्रृंगार हो जाएगा, उन्नत स्तन कहेंगे तो अश्लील हो जाएगा। बात दोनों में ही समान ही कही गई है। अंतर केवल शब्दों और भावों का है। पहले में शब्द आलंकारिक हैं, बात लक्षणा में कही गई है और इस कारण भाव श्रृंगारिक होते हुए भी कलात्मक हैं। दूसरे में बात अभिधा में है, सीधे-सीधे यौनांगों का उल्लेख उसका स्पष्ट चित्रण करता है और वह अश्लीलता में आ जाता है।

उस युवा कवि की समस्या यही है कि उसके शिक्षकों ने उसे यह अंतर करना नहीं सिखाया। वैसे भी आज के विश्वविद्यालयों में शिक्षा दी भी नहीं जाती। वहाँ एक पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है, जिसका उसके चरित्रनिर्माण से कोई लेना-देना नहीं होता। उस कवि की कोई गलती नहीं है, गलती विश्वविद्यालयों के शिक्षकों की है, उन्हें संभवतः स्वयं भी इस सूक्ष्मता की समझ नहीं है। इस युवा कवि की कविता में निहित खुरदरे भावों को सही ठहराने वालों की भी यही दशा है।

अरुण प्रकाश की टिप्पणी : शिकायत इतनी है कि वह अद्वैत होकर भी दो की बात करता है। उसे स्तनाद्वैत प्रतिपादित करना था।

कृति सेनन अंतर्वस्त्र विवाद

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अनुपम के सिंह
दिल्ली । कृति सेनन अंतर्वस्त्र पहनकर राखी बाँध रही हैं। वीडियो आभूषण ब्रांड GIVA का है। विरोध के जवाब में कहा जाएगा कि कपड़े छोटे नहीं हैं, आलोचना करने वालों की सोच छोटी है।

तो ऐसा है, अगर कोई पुरुष नग्न होकर राखी बँधवाता तो इसका भी विरोध ही होता। ठीक है, कुत्ते को भी राखी बाँध दिया। बहुत बड़े सुधारवादी बन गए। सनातन में सभी जीव-जंतुओं के साथ सहज सह-अस्तित्व को बढ़ावा दिया गया है। लेकिन, ये इस सुधारवाद का दायरा थोड़ा और बढ़ाओ। ज़रा पता करो कि किसी कुत्ते को लेकर मक्का-मदीना ले जा सकते हो या नहीं।

जब भी कोई अपराध होता है तो पुलिस जाँच में सबसे अधिक माथापच्ची उसके प्रयोजन को खोजने में लगाया जाता है। Motive, मतलब इरादा क्या था अपराधी का। इस विज्ञापन के इरादे नेक नहीं लगते, ऐसा प्रतीत होता है जैसे सनातन धर्म की रीतियों को अपमानित करने के लिए ही इसे बनाया गया है। ठीक वैसे ही, जैसे ‘मान्यवर’ के आलिया भट्ट वाले विज्ञापन में कन्यादान का मजाक बनाया गया था।

मुझे कुत्ते से कोई समस्या नहीं है। चलो ये भी मान लिया कि एक कुत्ते को स्वर्ग ले जाने के लिए युधिष्ठिर अड़ गए थे। लेकिन, रक्षाबंधन स्पेन का टोमैटो फेस्टिवल नहीं है। ये एक धार्मिक त्योहार है। राखी बाँधना या बँधवाना अनुष्ठान का हिस्सा है। अनुष्ठान के कुछ नियम-क़ानून होते हैं। उसमें नग्नता अथवा अश्लीलता घुसाना सुधार नहीं कहलाएगा। तुम पूजा की थाली हटा दोगे, हिन्दू त्योहार को सेक्युलर बनाने के लिए। कुत्ता घुसा दोगे। महिलाओं के कपड़े उतरवा दोगे। फिर ज्ञान दोगे। आरती की थाली का कहीं कोई अता-पता नहीं है। तिलक का कहीं कोई अता-पता नहीं है। सेक्युलरिज़्म ऐसा नहीं चलता है।

कल को ये दारू पीते लोगों को रक्षाबंधन मनाते हुए दिखाएँगे। फिर कहेंगे कि हमने चीजों को आज के हिसाब से ढाला है। अभी कुत्ते पर प्रेम उमड़ रहा है, बकरीद आते ही पशुप्रेम के सारे दिखावे हवा हो जाएँगे। क्रिसमस पर दुनियाभर में 10 करोड़ टर्की पक्षी मारे जाते हैं, तब भी ये प्रेम गायब रहता है।

राहुल गांधी इस्लाम पर हकलाता है, मनु स्मृति को गरियाता है 

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अनुपम कुमार सिंह
नोएडा। मनुस्मृति। जब मुद्दाविहीन हो जाओ तो मनुस्मृति को गाली दे दो। जब स्वयं को आधुनिक व बुद्धिजीवी दिखाना हो तो मनुस्मृति को गाली दे दो। जब वोक दिखना हो तो मनुस्मृति को गाली दे दो।

मनुस्मृति कहती है कि कन्या का अविवाहित रह जाना बेहतर है, लेकिन उसका विवाह किसी गुणहीन पुरुष से नहीं किया जाना चाहिए। नारी-सशक्तिकरण के लिए इससे बेहतर समझ रखते हैं आप? मनुस्मृति कहती है कि शारीरिक परिपक्वता के बाद निर्धारित अवधि तक प्रतीक्षा करने के बाद ही लड़की का विवाह हो, उस समय के हिसाब से 17 वर्ष तक। बाल-विवाह के विरुद्ध इससे बेहतर कोई प्रमाण है आपके पास?

मनुस्मृति कहती है – विन्देत सदृशं पतिम्। कन्या अपने योग्य पति का स्वयं वरण करे। यदि अभिभावक विवाह नहीं कराते और कन्या स्वयं पति चुन ले, तो न कन्या किसी पाप या अपराध की भागी होती है, और न वह पुरुष जिसे वह चुनती है। स्वेच्छा और कंसेंट को इससे बेहतर परिभाषित कर सकते हैं आप?

पुत्रेण दुहिता समा। पुत्री पुत्र के समान है। स्त्री-पुरुष समानता के लिए मनुस्मृति से बेहतर कुछ ला सकते हैं आप? क़ुरान या बाइबिल लेकर आइए, देख लीजिए। स्वयं डॉ आंबेडकर ने बुढ़ापे में मनुस्मृति का लोहा माना है, उत्तराधिकार वाले विषय को लेकर। मनुस्मृति माता की निजी संपत्ति को अलग से मान्यता देती है और उसे अविवाहित पुत्री का भाग बताती है। परिवार में महिलाओं को सशक्त रखने के लिए इससे बेहतर कोई व्यवस्था अबतक लेकर आए आप?

बल, दबाव या जबरन नियंत्रण से स्त्रियों को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। विश्वसनीय पुरुष भी उन्हें क़ैद नहीं रख सकते। आत्मानमात्मना यास्तु रक्षेयुस्ताः सुरक्षिताः। मतलब, जो स्त्री अपने विवेक से अपनी रक्षा करती हैं, वही सुरक्षित है। बाहरी निगरानी से ऊपर विवेक को रखा गया है। स्त्रियों को विवेकी माना गया है। इससे अधिक सम्मान देते हैं आप? आपने तो अपनी बहन तक को चुनावी राजनीति में खुद के 2 दशक बाद उतारा।

धन के देखभाल एवं प्रबंधन के लिए मनुस्मृति ने स्त्रियों पर विश्वास जताया है। राजा को मनुस्मृति आदेश देती है कि ऐसी स्त्रियों की रक्षा करे जिनके पति बाहर हैं, जिनका परिवार प्रभावशाली नहीं है, जो बीमार हैं या जिनके पति या पुत्र नहीं हैं। अगर कोई संबंधी भी किसी स्त्री की संपत्ति हड़पता है तो उसे चोर मानकर दंड देने को कहा है। इससे अधिक परवाह है आपको स्त्रियों की?

पति को आदेश है कि बाहर जाने से पहले पत्नी की आजीविका की व्यवस्था करके जाए। अब ये मत कहिएगा कि पत्नी ख़ुद नहीं कर सकती क्या। जीवेच्छिल्पैरगर्हितैः। आगे ये भी लिखा है कि पति न करे तो स्त्री ख़ुद सम्मानजनक कार्यों के जरिए कमाए। आत्मनिर्भरता के लिए इससे बेहतर नियम बना लेंगे आप?

तस्मात्साधारणो धर्मः श्रुतौ पत्न्या सहोदितः। धार्मिक कार्य पति-पत्नी साथ मिलकर करें। पत्नी के बिना कोई अनुष्ठान पूरा नहीं होता है। हमारे यहाँ पत्नी को बेगम नहीं, अर्धांगिनी कहा गया है। यहीं से निकला है ‘आधी आबादी’। पूरे पचास प्रतिशत – उतना ही, जितना पुरुष का हिस्सा। पचास-पचास। इससे अधिक सटीक तरीके से बराबरी का सन्देश दे सकते हैं आप? अन्योन्यस्य। एक-दूसरे के प्रति। वैवाहिक जीवन में भी दोनों की ज़िम्मेदारियाँ हैं। मनुस्मृति कहती है कि न स्त्री और न ही पुरुष वैवाहिक मर्यादा का उल्लंघन करे। इसमें क्या जोड़ देंगे आप क्रांतिकारी कहलाने के लिए? कुछ बाक़ी है क्या? मनुस्मृति कहती है कि नियम दोनों पर हैं।

मनुस्मृति ने स्त्री को महाभागाः (सौभाग्यशालिनी और सौभाग्य लाने वाली) कहा। मनुस्मृति ने स्त्री को पूजार्हाः (सम्मान की अधिकारी) कहा। मनुस्मृति ने स्त्री को गृहदीप्तयः (घर को प्रकाशित और प्रसन्न रखने वाली) कहा। परिवार के सुख का आधार कहा। गृहस्थ-जीवन का प्रत्यक्ष आधार कहा।

अब जिसने परिवार नामक संस्था को ख़त्म करने का लक्ष्य ले रखा हो, उसे ये सब बुरा लगेगा ही। वो पूछेगा कि स्त्री परिवार के सुख के लिए तिनका भी क्यों हिलाए। वो ये नहीं पूछेगा कि मनुस्मृति ने पुरुष को भी स्त्री के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी उठाने को क्यों कहा है।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते… रटा-रटाया है, इसीलिए इसे नहीं गिनाया। सबको पता है। इसी प्रसङ्ग में ये भी लिखा है कि जिस घर में स्त्री दुःखी रहती है वह परिवार शीघ्र नष्ट होता है। यानी, परिवार की स्थिति का पैमाना यह तय कर दिया गया है कि उसमें महिलाओं को प्रसन्न रखा जा रहा है या नहीं।

लेकिन नहीं, गाली तो केवल मनुस्मृति को ही पड़ेगी। क़ुरान और बाइबिल का नाम नहीं लिया जाएगा। राहुल गाँधी आज ‘स्त्रीवादी’ बने हैं, काश मनुस्मृति पढ़ लिया होता कम से कम। पढ़ा तो हमने भी नहीं है, इसीलिए जो कहा जाता है मान लेते हैं। सफाई देने लगते हैं कि ये उस समय की व्यवस्था थी।

मनुस्मृति से अधिक फेमिनिज्म और कहीं नहीं है। फ़िलहाल इस इकोसिस्टम के लिए तो फेमिनिज्म सिर्फ़ अश्लीलता और अंग-प्रदर्शन ही है।

(सोशल मीडिया से)

मेरी पुस्तक अमृत कुंभ में एक चैप्टर है :- “विवाह सूक्त”

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अभिजीत सिंह

दिल्ली । पुस्तक का कथानक यूं है कि निवेदिता नाम की एक महिला “स्वामी विवेकानंद एकेडमी” नाम से एक स्कूल शुरू करती है। उद्देश्य था – बच्चों को उनके धर्म और संस्कृति से परिचित कराना पर कई कारणों से वो उसमें सफल नहीं होतीं। अनेक कारणों में एक कारण बच्चों का इन विषयों में रुचि न लेना भी था।

एक दिन एक कैफे में निवेदिता आनंद को एक लड़का मिलता है – समीर राघवन जो पिता का इलाज कराने कुछ दिनों के लिए दिल्ली आया हुआ है। समीर की जब निवेदिता से बात होती है तो समीर कहता है कि मैं कुछ दिन बच्चों को बतौर गेस्ट टीचर पढ़ा सकता हूं, जिसमें मैं कोशिश करूंगा कि उन्हें उनके धर्म, संस्कृति और राष्ट्र के विषयों में रुचि हो जाए।


कुछ दिनों के क्लास के बाद ही स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन का अवसर आता है और क्लास की बच्चियां एक छोटे से नाटक का थीम चुनना तय करती है। इसमें उसकी मदद करते हैं उसके गेस्ट टीचर – समीर राघवन।

इस चर्चा में समीर से बच्चियां वही पूछती हैं, जो वाम खेमा हमेशा से उन्हें सिखाता आया है कि हिन्दू धर्म ने स्त्रियों को क्या दिया है?

जबाब में समीर कहते हैं – इसे ऐसे न पूछकर ऐसे पूछो कि “स्त्रियों ने हिन्दू धर्म को क्या दिया है” तो मैं इसका जो उत्तर दूंगा वो मेरी और सम्पूर्ण हिन्दू समाज की ओर से स्त्रियों के लिए कृतज्ञता ज्ञापन जैसा होगा।

और इसके बाद समीर उसकी बात सुनकर हतप्रभ उन बच्चियों को “विवाह सूक्त” के बारे में बताता है।

समीर उनसे जो कहता है, वो तो मेरी पुस्तक में बहुत विस्तार से है पर उसका सार – संक्षेपण यूं है –

नारी सम्मानित रहे, सुरक्षित रहे और समाज के घटिया लोग उसे अपनी कुदृष्टि का शिकार न बनाए साथ ही समाज सभ्य प्रजनन की रीति से आगे बढ़े इस हेतु एक सुदृढ़ “नियमावली” की आवश्यकता थी।

पर ये बनाये कौन?

ये प्रश्न जब हमारे ऋषियों के समक्ष आया तो उन्होंने बहुत विचार के बाद कहा –

देखो ! ये प्रश्न नारी और फिर सबसे बढ़कर समाज की सुदृढ़ संरचना का है तो इसके लिए नियमावली भी “नारी” ही बनाये और फिर उनके इस आह्वान पर आगे आईं एक देवी जिनका नाम था – “सूर्या सावित्री”

इस नारी के समक्ष सारी मानवजाति को नतमस्तक होना चाहिए; क्योंकि इस नारी ने दुनिया को “विवाह” नाम की संस्था से परिचित कराया। इस तेजस्वी एवं विदुषी महिला ने वेद के सूक्त ही रच दिए जिसे कहा गया- “विवाह-सूक्त”

है न रोचक कि मानव जीवन के सबसे बड़े स्तंभों में एक ‘विवाह’ संस्था की नियमावालियां किसी पुरुष ने नहीं बल्कि एक स्त्री ने बनाई है

और उसमें उसने पुरुषों को अधिकारपूर्वक नैतिक होने की शपथ दिलाई है ताकि समाज मर्यादित रहे और उसने अपने “सूक्त” में ‘नारी’ को हर तरह से सुरक्षित और सम्मानित करने की भी व्यवस्था दी।

“सूर्या सावित्री” ने 47 मंत्रों के “विवाह सूक्त” को लिखा जिसके आधार पर आगे “हिन्दू विवाह पद्धति” जिसका अनुपालन हम सब कर रहे हैं और जिसके “एकपत्नीव्रत” के आदेश का अनुपालन करने के कारण “प्रभु श्रीराम” के नाम के आगे “मर्यादा पुरुषोत्तम” जुड़ा।

आपको पता है “देवी सूर्या” ने नारी को कैसे-कैसे अधिकार दिए? उन्होंने कहा :-

स्त्री को विधवा विवाह की अनुमति है।

पुरुष के बहुविवाह का निषेध किया और उसकी निंदा करते हुए कहा-“जिस प्रकार रथ का घोड़ा दोनों धुराओं के मध्य में दबा हुआ चलता हैं वैसे ही एक समय में दो स्त्रियाँ करनेवाला पति दबा हुआ होता हैं अर्थात परतंत्र हो जाता हैं ,इसलिए एक समय दो व अधिक पत्नियाँ करना उचित नहीं हैं।”

स्त्री हेतु किसी तलाक जैसी कोई अवधारणा नहीं रखी बल्कि ये कहा- “तुम दोनों इस संसार व गृहस्थ आश्रम में सुख पूर्वक निवास करो, तुम्हारा कभी परस्पर वियोग न हो, सदा प्रसन्नतापूर्वक अपने घर में रहो।”

स्त्री को गृहस्वामिनी, गृहपत्नी और ‘साम्राज्ञी’ कहा गया।

ये कहा गया कि अगर कोई पिता दहेज़ देने में सक्षम नहीं है तो उस कन्या के गुण को ही उसका लाया दहेज़ माना जाएगा।

जानते हैं इन सूक्तों के आधार पर “पाणिग्रहण” के समय जब पिता कन्या का हाथ, वर के हाथ में देता है तो उस समय पति कन्या का वरण करते हुए उसे क्या वचन देता है? वो उससे कहता है:- तेरे सौभाग्य के लिए तेरा यह हाथ मैं अपने हाथ में लेता हूं। मैं तेरा पति हूं, मेरे साथ ही तू वृद्ध हो। भाग्यपति अर्यमा, सविता, पुरंधि आदि समस्त दिव्य विभूतियों ने तुझे मेरे हाथों में सौंपा है कि मैं गृहस्थ धर्म का पालन कर सकूं।”

इस देवी और विदुषी महिला ने इस सूक्त के आधार पर स्त्री-पुरुष के “दाम्पत्य जीवन” को नई परिभाषा दी। “विवाह-सूक्त” लिखकर उस देवी ने सम्पूर्ण हिंदू समाज को एक ऐसा उपहार दिया है, जिसके लिए हिंदू समाज उस “महीयसी” के प्रति सदैव ऋणी रहेगा।

मैं कई हिंदूवादी लड़कियों को देखता हूँ जो हिंदुत्व-निष्ठ होते हुए भी कहीं न कहीं हिन्दू धर्म के नारी वाले पक्ष शंकित रहतीं हैं तो उनको मैं पूरे गर्व से बताना चाहता हूँ कि दुनिया में आपका “हिन्दू धर्म” अकेला ऐसा है जिसने विवाह संस्था की तमाम-नियमावली आपसे लिखवाई है और जिसके कारण अनीति के अस्ताचल काल में भी हिन्दू समाज स्त्री के प्रति कभी अनुदार नहीं हुआ। “देवी सूर्या” प्रणीत पति-पत्नी के इसी आर्ष संबंधों की पवित्रता के रक्षण के लिए रावण का वध हुआ था और इसी के लिए दुर्योधन की जंघाएँ तोड़ी गई थी।

आप गर्व करो कि “हिन्दू धर्म” की “स्टेक होल्डर” आप हो इसलिए जब कोई जाकिर नाईक राजा दशरथ का उदाहरण देते हुए बेशर्मी से आपसे कहता है न कि हिन्दू धर्म में भी तो बहुविवाह होते थे तो उसकी आँखों में आँखें डालकर उससे कहो- किये होंगे राजा दशरथ ने बहुविवाह पर मेरी पूर्वज, मेरी माँ देवी सूर्या ने ऐसी व्यवस्था दी है कि मेरा हिन्दू समाज अपना “आदर्श” एक विवाह की मर्यादा रखने वाले श्रीराम जी को मानता है दशरथ को नहीं।

“हिन्दू धर्म में नारी” विषय पर आपको लांछित करने वाले हरेक से कहो कि देवी “सूर्या” ने जो विवाह व्यवस्था दी थी उसे बाद में “सुवर्चला” नामक विदुषी ने और पुष्ट किया और विवाह संस्कार को पुष्टता देने वाली ये दोनों महिलाएं ही थीं क्या तुम्हारे यहाँ कोई है ऐसी नारी जिसने “विवाह-संहिता” को छूने का भी साहस किया हो?

हिन्दू धर्म में एक नहीं वरन ऐसी अनेकों व्यवस्थाएं हैं जिसे हिन्दू देवियों ने रचा और परिवर्धित किया है, अपने इस गौरव का घोष कीजिये और आगे आकर हमारा प्रबोधन कीजिये क्योंकि हम भी उन्हीं ऋषियों की संततियां हैं जो विवाह जैसे महत्वपूर्ण विषय पर प्रबोधन के लिए आपके समक्ष नत थे।

मनु ने अपनी स्मृति में स्त्रियों को पूजने का निर्देश इसी कारण दिया था।

पुस्तक पढ़ेंगे तो उन प्रश्नों के उत्तर भी मिलेंगे, जिसको लेकर कोई भी कुछ भी बकवास कर जाता है।

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