मैं सभी पत्रकारों, वरिष्ठ संपादकों के सम्मुख इसे सार्वजनिक कर रहा हूं। क्योंकि यह सार्वजनिक चर्चा का विषय है, देश के कम्युनिस्ट इको सिस्टम के बड़े समाचार पत्र में यह प्रकाशित है, समाचार पत्र का नाम फिर से बताता हूं- द हिंदू । 22 अगस्त 2026 को द हिंदू के दिल्ली संस्करण के पृष्ठ क्रमांक 4 पर यह प्रकाशित है। डिजिटल पर भी मौजूद है।
मेरे विद्यार्थियों ने मुझसे पूछा है कि एक ओर तो हिंदू समाचार पत्र का संपादकीय विभाग स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या को जस्टिफाइड करने जैसे एक कथित मिथ्या आरोप को मोटे अक्षरों में लिख रहा है कि उनके ऊपर नफरत फैलाने का आरोप था, इसलिए प्रतिबंधित वामपंथी रिबेल्स ने उनकी हत्या कर दी।…
और उसी समाचार के ठीक बगल में, दूसरी ओर, कम्युनिस्ट विचार संचालित न्यूज पेपर द हिंदू समाचार पत्र ने एक अन्य समाचार प्रकाशित किया है कि मुस्लिम मौलाना को साथियों सहित, जिसे एनआईए कोर्ट ने उम्रकैद की सजा दी है, दोषी माना है, उस मौलाना कलीम सिद्दीकी को revered muslim preacher अर्थात् श्रद्धेय मुस्लिम उपदेशक लिखा है। लेकिन अदालत ने जिन धाराओं में सजा सुनाई है, उसके अंतर्गत परिभाषित नफरती, आतंकी, देशद्रोही आदि दोषसिद्ध संज्ञा लिखने से भी द हिंदू की पूरी एडिटोरियल टीम ने परहेज किया है।

आखिर ऐसा किस पत्रकारीय संपादन आचार के कारण किया गया है? यह प्रश्न उपस्थित किया गया है।
मेरे उस विद्यार्थी ने अपने एक दूसरे साथी के साथ उस पर कुछ गहन शोध भी किया। उसने एनआईए कोर्ट के आदेश की कॉपी मुझे भेजी जिसमें उन आरोपों का जिक्र है जिसे लेकर आतंकवादी, अवैध मतांतरण में लिप्त कलीम सिद्दीकी को सजा सुनाई गई है। मैंने क्रॉस चेक किया है तो गंभीर आरोपों में दी गई सजा को सही पाया है। हालांकि ऊपरी अदालत में इसे चुनौती भी दी गई है। लेकिन तब तक तो सजा सजा ही है। दोषसिद्ध है। सजा पर कोई स्टे तो नहीं है अभी तक। खैर,
सत्य और संपूर्ण तथ्य के अनुसार, अदालत ने मौलाना कलीम सिद्दीकी और उमर सहित अन्य को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120-B (आपराधिक साजिश), 121-A (देश के खिलाफ युद्ध की साजिश), 153-A & 153-B (सौहार्द बिगाड़ना, घृणा फैलाना), 295-A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना) और उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धाराओं के तहत साल 2024 सितंबर माह में दोषी करार दिया है।
लेकिन हिंदू समाचार पत्र के संपादकीय विभाग ने उसे अपनी ओर से श्रद्धेय लिख दिया है। किसी का स्टेटमेंट होता, कोट-अनकोट होता तो भी एक बार स्वीकार हो जाता? किंतु यह तो स्टोरी के रिपोर्टर और पृष्ठ से जुड़े संपादकों ने रिपोर्ट में ही श्रद्धेय घोषित कर दिया है। क्या ऐसा किया जाना उचित है? क्या केवल यह साधारण भूल या चूक है, अथवा जानबूझकर किया पत्रकारीय संपादन है? प्रश्न है।
यहां जो प्रस्तुति हुई है, उसमें दो शब्द बहुत महत्व के हैं। एक है ‘हेट्रेड’ और दूसरा ‘रेवर्ड’। लक्ष्मणानंद हिंदू संन्यासी हैं और उनकी नृशंस हत्या के पीछे नफरती उपदेश को हिंदू अखबार ने कारण बताकर इंट्रो में ही लिख दिया है।
कुछ ही दिन पहले इस नृशंस हत्याकांड के मुख्य आरोपी माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नेता आजाद उर्फ डी. केशव राव को अदालत ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। उस समय भी जो रिपोर्ट द हिंदू अखबार ने प्रकाशित की थी, उसमें भी स्वामी लक्ष्मणानंद को नफरत फैलाने का आरोपी लिखा गया।
उल्लेखनीय है कि 23 अगस्त 2008 को कंधमाल जिले के जलेस्पेटा आश्रम में जनजातियों के मसीहा कहे जाने वाले स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार सहयोगियों की गंड़ासे, कुल्हाड़ी से काटकर नृशंस तरीके से हत्या की गई थी। उन्हें गोली भी मारी गई। जिस दिन हत्या हुई उस दिन जन्माष्टमी थी, स्वामी भगवान कृष्ण की उपासना में थे, उपवास पर थे।
इस आतंकी घटना के बाद पूरा कंधमाल सुलग उठा था। उनकी अंतिम यात्रा में लाखों लोग शामिल हुए थे। हत्या की तीखी प्रतिक्रिया हुई थी जिसमें चर्च और उसके इको सिस्टम का भारी नुकसान हुआ। बहुत से निर्दोष लोग मारे गए।
अन्य समाचार स्रोतों के अनुसार स्वामी लक्ष्मणानंद ने लाखों की तादाद में प्रेम से जनजातियों और अनुसूचित समाज के लोगों की ईसाई मत से घरवापसी कराई थी, और उनका संकल्प था कि जनजातीय इलाके से अवैध मतांतरण को प्रेम और श्रद्धा के बल पर समाप्त कर देंगे। इस कारण वह चर्च के षड्यंत्र के निशाने पर थे। समाचार स्रोतों के अनुसार, हत्या के लिए वामपंथी नेटवर्क का इस्तेमाल हुआ। किसी उग्रपंथी वामनेता से या किसी साधारण व्यक्ति से भी स्वामीजी की कोई शत्रुता कभी नहीं रही।
उल्लेखनीय है कि स्वामी लक्ष्मणानंद जनजातियों और दलित समुदाय के उत्थान के लिए समर्पित थे। उन्हें डॉ. अंबेडकर दलित मित्र सम्मान से ओडिशा में नवाजा गया था। हत्या के पहले कभी उनके खिलाफ कोई एफआइआर नहीं है, किसी भी किसी भी अदालत में उनके खिलाफ कोई शिकायत ही नहीं रही।
उनकी लोकप्रियता का अंदाजा लगा सकते हैं कि उनकी अंतिम यात्रा में 150-200 किलोमीटर की दूरी तक सड़कों पर लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा। इतनी लंबी श्रद्धांजलि यात्रा किसी संत की निकली हो, इतिहास में उल्लेख नहीं।
फिर भी द हिंदू अखबार के संपादकीय विभाग ने उन्हें नफरत फैलाने का आरोपी बार-बार लिखा है तो द हिंदू अखबार के संपादक और रिपोर्टर को बताना ही चाहिए कि इस आरोप का आधार क्या है? किस कोर्ट ने उन्हें नफरती और घृणा फैलाने का आरोपी सिद्ध किया है? मेरे विद्यार्थियों ने पूछा है।
दूसरी ओर जिसे भारत की एनआईए कोर्ट ने आतंक फैलाने, नफरत फैलाने, अवैध मजहबी जिहाद कर मतांतरण करने, देशद्रोह करने के आरोप में दोषसिद्ध करार दिया है, उसे श्रद्धेय मुस्लिम प्रचारक लिखकर सम्मानित कर रहे हैं तो बताना ही होगा कि आपके लेखन का आधार क्या है? जेनज़ी के मेरे विद्यार्थी पूछ रहे हैं।
क्या कम्यूनिस्ट कार्डहोल्डर होना, पोलित ब्यूरो की मेंबरशिप या उनका आशीर्वाद पाने के लिए इस प्रकार का झूठ बोलना ही एकमात्र योग्यता है? बोलिए झूठ लेकिन आप इसके लिए पत्रकारीय कर्म को हथियार क्यों बना रहे हैं। मेरे विद्यार्थी मुझसे पूछ रहे हैं।
हत्या, हिंसा को जायज ठहराना उनके विचार में सही है!
खैर, आजाद उर्फ डी.केशव राव स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या करके सबूतों के अभाव में रिहा हो चुका है। 2008 में उसे गिरफ्तार किया गया था। उसकी गतिविधियों और बयानों को अनेक वामविचारक सदा ही सही ठहराते रहे हैं। thehindu.com/news/national/…
अब देखना होगा कि ग्राहम स्टेंस के हत्यारे की रिहाई पर समाचार पत्र और उनके संपादक क्या रूख दिखाएंगे? साल 2000 से दारा सिंह उर्फ रवींद्र पाल सिंह जेल में बंद है। 26 साल से वह कैद में है। उम्र कैद की अवधि बीत चुकी है। अब सुप्रीम कोर्ट ने 2 सितंबर 2026 तक अंतिम तारीख तय की है कि ओडिशा सरकार रिहाई पर फैसला ले ले, अन्यथा अदालत फैसला लेगी।
उल्लेखनीय है कि दारा सिंह को ओड़िशा हाईकोर्ट ने और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा देने से इस आधार पर इन्कार किया कि जिस गाड़ी में ग्राहम स्टेंस और उनके दो मासूम बच्चे सोए हुए थे, उसमें आग जनजातियों की जिस भीड़ ने लगाई, उसमें दारा सिंह थे, इसे प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं।
दारा सिंह ने पूरे मामले में स्वीकार किया है कि जनजातियों की भीड़ की अगुवाई की थी क्योंकि अवैध मतांतरण को लेकर भोले-भाले आदिवासी ईसाई मिशनरियों से नाराज थे। लेकिन आग उसने नहीं लगाई।
”हत्या माफ और भेड़िया ‘आजाद’ ”
स्वामी लक्ष्मणानंद और उनके साथ मारे गए 4 कम उम्र जनजातीय भक्तों की हत्या के गुनाहगार आजाद यानी माओवादी डीके राव की रिहाई पर तो यह शीर्षक नहीं छप सका, दारा सिंह की रिहाई की प्रतीक्षा करिए, और तैयार रहिए नए वाम स्लोगनियरिंग के वायरल स्वरूपों के अध्ययन के लिए।
उल्लेखनीय है कि स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या उस कन्या विद्यालय में की गई जिसमें वह अनाथ बच्चियों, जनजातीय बेटियों की निःशुल्क आवासीय पढ़ाई का प्रबंध करते थे। उनके साथ चार अन्य सहयोगियों की हत्या की गई। उसमें एक 10 साल की अध्ययनरत बेटी के पिता पुरंजन गांथी भी थे, एक जनजातीय शिष्या मां भक्तिमयी थीं, एक साधू अमृतानंद थे, जो उन्हें बचाने आए थे, एक किशोर बाबा थे। कन्या छात्रावास में रह रहीं बहुत सी बच्चियों पर भी भाड़े के माओवादी हमलावरों ने अटैक किया था जिन्होंने #स्वामीलक्ष्मणानंद को बचाने की कोशिश की।
द हिंदू अखबार के संपाकीय विभाग और पत्रकारों को इस केस से जुड़े अन्य तथ्यों को जानने की कोई फुरसत क्यों नहीं मिली, आखिर क्यों उन्होंने एक सजायाफ्ता आतंकी को श्रद्धेय और एक हिंदू संन्यासी को बिना किसी दोषसिद्धि या एफआईआर के नफरत फैलाने का आरोपी लिख दिया है? यही प्रश्न पूछा है मेरे विद्यार्थियों ने।
अब इस पर शोध आधारित तथ्यात्मक अध्ययन क्या आवश्यक नहीं है? क्या इस मुद्दे को पत्रकारिता-आचार से जुड़े नियामकों को स्वतः संज्ञान नहीं लेना चाहिए?



The national conference brought together policymakers, scientists, water experts, industry leaders, grassroots practitioners and young innovators to deliberate on India’s water challenges and build greater awareness around conservation, responsible consumption and sustainable water management.


