क्या गर्भ में पलने वाला बच्चा अभिमन्यु की तरह संस्कार सीख सकता है?

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आगरा । आगरा शहर इन दिनों एक अनोखा उदाहरण पेश कर रहा है, जहां गर्भ संस्कार को जीवंत रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है। क्या मां के गर्भ को संस्कारित करने का मतलब सिर्फ आस्था है, या विज्ञान भी इसे समर्थन देता है? हाल में आयोजित कार्यक्रमों में क्लेम किया गया है कि गर्भ में ही बच्चे को अच्छे संस्कार दिए जा सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे महाभारत में अभिमन्यु ने अपनी मां सुभद्रा के गर्भ में चक्रव्यूह भेदने की विद्या सीखी थी। समाजसेवी अशोक गोयल की पहल पर चल रहे ये प्रयास लोगों में जागरूकता फैला रहे हैं।

मातृत्व ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है। यह न सिर्फ एक महिला को मां बनाता है, बल्कि आने वाली पीढ़ी को संस्कारी और स्वस्थ बनाने का अवसर भी देता है। गर्भ संस्कार प्राचीन भारतीय परंपरा है, जिसमें गर्भस्थ शिशु को ही सकारात्मक प्रभाव दिए जाते हैं। प्रसिद्ध पेंटर, आर्टिस्ट, शिक्षाविद डॉ. चित्रलेखा सिंह कहती हैं, “मां का गर्भ बच्चे की पहली पाठशाला है।” विज्ञान भी इसकी पुष्टि करता है। शोध बताते हैं कि गर्भावस्था के दौरान शिशु का मस्तिष्क तेजी से विकसित होता है। गर्भधारण के 3-4 हफ्तों में न्यूरल ट्यूब बनती है, जो मस्तिष्क का आधार होती है। जन्म के समय शिशु के मस्तिष्क में लगभग 100 अरब न्यूरॉन्स होते हैं, और गर्भ में ही ये 2.5 लाख प्रति मिनट की दर से बढ़ते हैं। जन्म के समय मस्तिष्क वयस्क आकार का 25 प्रतिशत होता है, जो पहले साल में दोगुना हो जाता है। गर्भ में ही 18-20 हफ्तों से शिशु सुन सकता है, और मां की आवाज या संगीत पर प्रतिक्रिया देता है।

हाल ही में प्रताप नगर के गर्भाधान संस्कार एवं मेटरनिटी होम में एक अनोखा कार्यक्रम हुआ। चित्रलेखा द विलेज ऑफ आर्ट सोसाइटी और श्री चंद्रभान साबुन वाले सेवा ट्रस्ट के सहयोग से गर्भ संस्कार पर संभवत: दुनिया की पहली लाइव पेंटिंग वर्कशॉप और चित्र प्रदर्शनी आयोजित की गई, जिसमें 11 चित्रकारों ने भाग लिया। इनमें डॉ. त्रिलोक शर्मा, डॉ. मंजू बघेल, डॉ. मधु गौतम, डॉ. त्रिगुणातीत जैमिनी, कमलेश्वर शर्मा, नरेश कुमार, सौम्य देव मंडल, राहुल, विपिन उपाध्याय और सुदेश शामिल थे। उन्होंने लाइव पेंटिंग्स बनाकर गर्भ संस्कार और मातृत्व की चेतना का सुंदर संदेश दिया। विभिन्न संस्थानों से आए 100 से ज्यादा चित्रों में गर्भ संस्कार की महत्वपूर्णता को रेखांकित किया गया था।

गर्भ संस्कार का उद्देश्य बच्चे को शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाना है। जब मां सकारात्मक सोच रखती है, शांत रहती है, पौष्टिक भोजन करती है, मंत्र जपती है, भक्ति गीत सुनती है या अच्छी कहानियां सुनाती है, तो शिशु इनका प्रभाव ग्रहण करता है। अभिमन्यु की कथा इसका प्रतीक है। आधुनिक विज्ञान कहता है कि मां के भाव और वातावरण से शिशु का मस्तिष्क प्रभावित होता है। अध्ययनों से पता चलता है कि गर्भावस्था में मां का तनाव (जैसे चिंता या अवसाद) शिशु में कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ाता है, जो समय से पहले जन्म या कम वजन (5 पौंड से कम) का कारण बन सकता है। ऐसे बच्चे बाद में ADHD, व्यवहार संबंधी समस्याओं या मानसिक स्वास्थ्य विकारों का शिकार हो सकते हैं। वहीं, सकारात्मक उत्तेजना से शिशु का मस्तिष्क बेहतर विकसित होता है, जैसे बाएं हिप्पोकैंपस की मात्रा बढ़ती है, जो स्मृति से जुड़ी है।

एपिजेनेटिक्स के शोध बताते हैं कि मां का तनाव शिशु के जीनों को बदल सकता है, जो दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के अध्ययन में पाया गया कि गर्भावस्था में तनाव शिशु के तंत्रिका तंत्र और संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित करता है। संगीत या मां की आवाज से शिशु 34 हफ्तों में लय सीखता है और जन्म के बाद याद रखता है। इससे संज्ञानात्मक और भावनात्मक विकास बेहतर होता है। मां का तनाव कम होता है, बच्चे से जुड़ाव बढ़ता है और संतान श्रेष्ठ बनती है। यह परंपरा सिर्फ हिंदू धर्म की नहीं, बल्कि आज के तनावपूर्ण जीवन में सभी के लिए जरूरी है।
लेकिन सवाल है , क्या गर्भ संस्कार ज्ञान की खोज है या सिर्फ आस्था? मध्य प्रदेश सरकार के अस्पतालों में गर्भ संस्कार कक्ष बन रहे हैं, जहां भ्रूण को ‘मन शिक्षित’ करने की कोशिश की जा रही है। आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा का मिश्रण अच्छा है : पोषण, मानसिक स्वास्थ्य, सकारात्मक सोच। मां का तनाव और आहार शिशु पर असर डालता है, यह सिद्ध है। अध्ययनों से पता चलता है कि गर्भ संस्कार जैसी प्रथाएं गर्भपात की जटिलताएं कम करती हैं और जन्म परिणाम सुधारती हैं।
फिर भी, “भ्रूण के मन को पढ़ाना”, इस पर पर वैज्ञानिक प्रमाण जुटाने होंगे। अगर यह मां को बेहतर देखभाल मिले, तो बेहतर परिणाम आएंगे। अभिमन्यु की कहानी भी बताती है कि आधा ज्ञान घातक हो सकता है।
मध्य प्रदेश सरकार की प्राथमिकताएं सोचने लायक हैं। मातृ मृत्यु दर (भारत में 113 प्रति लाख जन्म), कुपोषण (35% बच्चे कम वजन के) और डॉक्टरों की कमी जैसी चुनौतियां हैं, तब ऐसे कक्षों पर फोकस सही है, या कुछ और? आयुर्वेद और एलोपैथी साथ चलें, लेकिन प्रमाणों पर आधारित। गर्भ संस्कार को आस्था का आदेश न बनाएं, ज्ञान की राह बनाएं। मां को सशक्त करें, निर्देशित न करें। वैज्ञानिक जांच, स्वैच्छिक भागीदारी और सरल भाषा से ही यह सफल होगा। जैसा बीज, वैसा वृक्ष , गर्भ से ही अच्छे संस्कार डालें, ताकि पीढ़ियां स्वस्थ, बुद्धिमान और तेजस्वी बनें।

मालिनी अवस्थी ठहरी मालिनी अवस्थी

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दिल्ली। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में आयोजित भारतीय रंग महोत्सव (भारत रंग महोत्सव) के दौरान एक अविस्मरणीय घटना घटी, जिसने लोक संगीत और रंगमंच की सच्ची शक्ति को उजागर कर दिया। पद्मश्री सम्मानित लोक गायिका मालिनी अवस्थी की प्रस्तुति निर्धारित थी, लेकिन तकनीकी खराबी के कारण मंच पर न लाइटें जलीं और न ही माइक्रोफोन काम कर रहे थे। अधिकारियों ने सुझाव दिया कि कार्यक्रम किसी अन्य दिन स्थगित कर दिया जाए, लेकिन मालिनी अवस्थी ने इसे अस्वीकार कर दिया। उन्होंने मंच की ऊंचाई को ठुकराकर श्रोताओं के बीच उतरना चुना और एक ऐसी प्रस्तुति दी जो तकनीक से परे, दिल से दिल तक पहुंच गई।

घटना की शुरुआत में पूरा सभागार अंधेरे में डूबा हुआ था। माइक खामोश थे, स्पॉटलाइट्स थम चुके थे। ऐसा लग रहा था जैसे रंगमंच की सांस रुक गई हो। लेकिन ठीक उसी पल लोक की आत्मा जाग उठी। मालिनी अवस्थी मंच पर नहीं चढ़ीं, बल्कि सीढ़ियों पर बैठ गईं—ठीक वैसे जैसे कोई गाँव की चौपाल में अपनी कथा सुना रही हो। उनके पास न कोई वाद्य यंत्र का सहारा था, न प्रकाश का, बस उनका कंठ था, मन था और मिट्टी से उपजा स्वर। श्रोता भी अपनी कुर्सियां छोड़कर आसपास जमीन पर बैठ गए, जैसे कोई अनौपचारिक लोक-संगोष्ठी चल रही हो।

फिर जो गान बहा, वह महज संगीत नहीं था—वह संस्कार था, स्मृति थी, जीवन की धड़कन थी। हर तान में खेतों की हवा महसूस हुई, हर बोल में लोक की पुरानी यादें जीवंत हो उठीं। अवधी, भोजपुरी और बुंदेली बोलियों में गाए गए उनके गीत-कजरी, सोहर, झूला या ठुमरी—सीधे हृदय में उतरते चले गए। बिना किसी शोर-शराबे, बिना दिखावे के, उनकी आवाज ने पूरे सभागार को एक सूत्र में बांध दिया। अंधेरे में भी चेहरों पर मुस्कान फैल गई, आंखें नम हो गईं। वह पल साबित कर गया कि सच्चा कलाकार मंच पर निर्भर नहीं होता, वह जन-जन से जुड़ता है।

इस घटना ने एक गहरा संदेश दिया-लोक कलाकार मंच से नहीं, जन से बड़ा होता है। सुविधाएं छिन जाएं तो भी जिसका सुर न डगमगाए, जिसकी साधना न रुके, वही महान होता है। मालिनी अवस्थी ने यह जता दिया कि लोक की शक्ति रोशनी और ध्वनि में नहीं, बल्कि संवेदना, सादगी और सच्चे सरोकार में बसती है। यह प्रस्तुति तकनीकी असफलता नहीं, बल्कि रंगमंच की जीत थी-जहां कला ने तकनीक को मात दे दी। एनएसडी के इस महोत्सव में यह क्षण अमर हो गया, जो याद दिलाता है कि असली प्रदर्शन दिल की गहराइयों से निकलता है, न कि उपकरणों से। मालिनी अवस्थी की यह सादगी भरी प्रस्तुति भारतीय लोक संगीत और रंगमंच की आत्मा को नई ऊर्जा प्रदान करती है।

मुंबई में 07, 08 फरवरी को शताब्दी वर्ष के निमित्त व्याख्यानमाला – ‘संघ यात्रा के १०० वर्ष – नए क्षितिज’

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मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी ने संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त होने वाली “संघ यात्रा के १०० वर्ष : नए क्षितिज” व्याख्यानमाला (मुंबई) की विस्तृत जानकारी दी। आज प्रेस क्लब में आयोजित पत्रकार वार्ता में सुनील जी के साथ कोकण प्रांत संघचालक अर्जुन चांदेकर जी भी उपस्थित थे।

शताब्दी वर्ष के निमित्त अखिल भारतीय योजना के अंतर्गत दिल्ली, बेंगलुरु और कोलकाता में इसी प्रकार की व्याख्यानमालाएं आयोजित हुई हैं, मुंबई व्याख्यानमाला इस श्रृंखला की अंतिम व्याख्यानमाला होगी। पिछली सभी व्याख्यानमालाओं को उत्साहवर्धक प्रतिसाद मिला है।
उन्होंने बताया कि वर्ळी स्थित नेहरू सेंटर सभागार में ७ और ८ फरवरी को व्याख्यानमाला का आयोजन होगा, जिसमें ४ सत्र रहेंगे। पहले दिन दोपहर ३:३० से शाम ७:३० बजे तक २ सत्र होंगे, जिसमें सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का उद्बोधन होगा।

कांग्रेस का एपस्टीन फाइल हमला: खुद के लिए खोदा गड्ढा

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कांग्रेस की घटिया राजनीति का नया अध्याय

दिल्ली। हाल ही में जेफरी एपस्टीन से जुड़े कुछ दस्तावेजों की रिलीज के बाद कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आधारहीन आरोप लगाने की कोशिश की है। पार्टी के प्रवक्ताओं ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि एपस्टीन के ईमेल में मोदी जी का जिक्र है, जिसमें 2017 के इजराइल दौरे को ‘नृत्य और गायन’ से जोड़ा गया और इसे अमेरिकी राष्ट्रपति के फायदे के लिए बताया गया। कांग्रेस ने इसे ‘राष्ट्रीय शर्म’ करार देते हुए स्पष्टीकरण मांगा। लेकिन सरकार की ओर से स्पष्ट जवाब आ चुका है—यह आरोप पूरी तरह झूठा और निराधार है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने इसे ‘एक दोषी अपराधी की घटिया कल्पनाएं’ (trashy ruminations by a convicted criminal) बताया और कहा कि इसे पूर्ण तिरस्कार के साथ खारिज किया जाना चाहिए।

सरकार का स्पष्ट खंडन: कोई संबंध नहीं, सिर्फ झूठ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम इन फाइलों में सिर्फ 2017 के आधिकारिक इजराइल दौरे के संदर्भ में आया है, जो भारत-इजराइल संबंधों की 25वीं वर्षगांठ पर हुआ था। एपस्टीन के ईमेल में कोई सबूत नहीं है कि मोदी जी ने कभी उससे सलाह ली, मुलाकात की या कोई संपर्क था। MEA के प्रवक्ता रंधीर जयसवाल ने कहा, “प्रधानमंत्री के इजराइल दौरे के अलावा बाकी सब कुछ एक दोषी अपराधी की घटिया कल्पनाएं हैं, जिन्हें पूर्ण तिरस्कार के साथ खारिज किया जाना चाहिए।” यह स्पष्ट है कि एपस्टीन जैसे व्यक्ति अपनी साख बढ़ाने के लिए बड़े नामों का इस्तेमाल करते थे, लेकिन इसमें कोई सच्चाई नहीं। कांग्रेस ने ईमेल को तोड़-मरोड़ कर पेश किया, जैसे ‘सलाह’ और ‘यह काम कर गया’ जैसे शब्द जोड़े, जो मूल दस्तावेजों में नहीं हैं। BJP ने इसे फर्जीवाड़ा करार दिया।

मोदी जी का जीवन: तप और सादगी का प्रतीक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जीवन सादगी, अनुशासन और तपस्या का उदाहरण है। वे साल में दो बार नवरात्रि का कठोर व्रत रखते हैं—चौबीसों घंटे उपवास, ध्यान और राष्ट्रसेवा। उनके चेहरे पर वह तेज दिखता है जो कठिन तप से आता है। ऐसे व्यक्ति पर “अय्याशी” का आरोप लगाना न सिर्फ हास्यास्पद है, बल्कि कांग्रेस की नैतिक दिवालियापन को उजागर करता है। क्या एक व्यक्ति एक साथ इतना कठोर तप और विलासिता कर सकता है? नहीं। यह आरोप मोदी जी की छवि पर कीचड़ उछालने की नाकाम कोशिश है।

कांग्रेस का दोहरा चरित्र: हाकिंग से लेकर संजय गांधी तक

कांग्रेस का तर्क अगर सही होता तो स्टीफन हॉकिंग भी “महा अय्याश” होते, क्योंकि उनके एपस्टीन के साथ फोटो हैं। लेकिन हॉकिंग एक महान वैज्ञानिक थे, और फोटो से कोई गलत संबंध साबित नहीं होता। इसी तरह मोदी जी का नाम का जिक्र कोई आरोप नहीं है। उल्टे कांग्रेस को अपने इतिहास पर नजर डालनी चाहिए। नेहरू-एडविना माउंटबेटन के संबंधों पर सवाल उठते रहे हैं—क्या बदले में देश का बंटवारा हुआ? संजय गांधी की अय्याशियां और गुंडागर्दी कांग्रेस के लिए कलंक हैं। एक मशहूर अभिनेता की पत्नी को दिनदहाड़े उठाकर ले जाने की घटना, गुप्ता गेस्ट हाउस में रखना—ये सब ज्ञात हैं। उस अभिनेता ने बेबसी में BJP जॉइन की, और उनकी पत्नी आज भी BJP से सांसद हैं। जामा मस्जिद के बुखारी को कांग्रेस हाईकमान क्यों संरक्षण देता था? मेनका गांधी को पार्टी से निकालने में भी ऐसे कलंक थे।

कांग्रेस खुद गड्ढे में गिर रही है

कांग्रेस जितना गड्ढा खोदेगी, उतनी मिट्टी निकलेगी। यह घटिया राजनीति है, जिसमें झूठे आरोप लगाकर ध्यान भटकाने की कोशिश है। मोदी जी पर लगे आरोप झूठे साबित हो चुके हैं। सरकार ने साफ कहा—कोई संबंध नहीं। कांग्रेस को अपने नेहरू-गांधी परिवार की अय्याशियों और घोटालों पर जवाब देना चाहिए। जनता जानती है कि कौन सच्चाई का साथ देता है और कौन झूठ की राजनीति करता है। यह हमला कांग्रेस के लिए राजनीतिक सुसाइड साबित होगा।

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