छात्राओं ने अकीला रेस्ट्रॉन्ट में साड़ी पहनकर किया प्रवेश

साड़ी पहने महिला के अपमान के विरुद्ध अभाविप की छात्रा कार्यकर्ताओं ने भारतीय परिधान में किया प्रदर्शन

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने भारी संख्या में छात्रा कार्यकर्ताओं के साथ दिल्ली के अक्विला रेस्ट्रॉन्ट में साड़ी पहनकर गई महिला को अंदर जाने से रोकने के विरोध में रेस्ट्रॉन्ट के सामने प्रदर्शन किया।

ज्ञात हो कि 19 सितंबर, 2021 को दिल्ली के खेल गाँव स्थित अकीला रेस्टोरेंट ने एक महिला को साड़ी पहनकर आने के कारण अपने परिसर के भीतर आने की अनुमति नहीं दी गयी थी। उसको रेस्टोरेंट में उपस्थित एक कर्मचारी ने प्रवेश से मना करते हुए कहा की केवल ‘ स्मार्ट कैज़ूअल’ कपड़े पहने हुए ही प्रवेश मिलेगा और साड़ी उसमें नहीं आती है। यह भारतीय परिधान को विदेशी पोशाकों के सामने कम आँकने के साथ-साथ भारतीय परंपरा का भी सीधा अपमान है जिसके विरोध में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की छात्रा कार्यकर्ताओं ने आज भारतीय परिधान साड़ी पहनकर रेस्ट्रॉन्ट में जा कर प्रदर्शन किया। 

छात्रा कार्यकर्ताओं का भारतीय परिधान में प्रदर्शन

अभाविप की प्रांत छात्रा प्रमुख वैलेंटीना भ्रम्मा ने कहा “बीते दिनों भारत की राजधानी दिल्ली के अकीला रेस्ट्रॉन्ट में एक महिला को अंदर जाने पे सिर्फ इसीलिये रोका गया कि उसने साड़ी पहन रखी थी ये बहुत ही निंदनीय है तथा अभाविप इस घटना का पुरजोर विरोध करती है एवं साथ ही साथ सरकार से ऐसे रेस्त्रोंतों के खिलाफ कड़ी करवाई करने की मांग करती है जो किसी भी प्रकार से भारतीय संस्कृति, भारतीय परिधान का अपमान करती हो। हमने आज भारतीय परिधान में होटेल में प्रवेश किया और उनकी सोच को तोड़ने का काम किया।”

प्रदर्शन के दौरान उपस्थित अभाविप दिल्ली के प्रांत मंत्री एवं राष्ट्रीय मीडिया संयोजक सिद्धार्थ यादव ने कहा की, “भारत स्वाधीनता के 75वे वर्ष में है परंतु आज भी कुछ लोगों की सोच ग़ुलाम है। हमारी लड़ाई इस ग़ुलाम ‘कलोनीयल मानसिकता’ को हराने की है। साड़ी एक महिला की शान है और देश की राजधानी में ऐसी घटना बहुत निंदनीय है। हम देश के सभी प्रगतिशील विचार के लोगों की आवाज़ बनकर ऐसी संकुचित मानसिकता के लोगों को संदेश देने में सफल हुए हैं।”

प्रदर्शन के बाद रेस्ट्रॉन्ट के मैनेजर द्वारा माफी मांगी गई तथा आगे ऐसी कोई भी घटना जो भारतीय संस्कृति का अपमान करती हो, को ना करने का आश्वासन भी दिया।

ABVP’s student activists protest in Indian attire against the humiliation of saree clad woman

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Female student activists entered Aquila restaurant wearing sarees in protest

Annapurna Chowdhary

Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad along with a large number of student activists demonstrated protest in front of Delhi’s Aquila restaurant against the entry of a woman wearing a saree.

It is to be known that on September 19, 2021, Aquila restaurant in Khel Village, Delhi did not allow a woman inside its premises as she was wearing a saree. She was denied entry by an employee present in the restaurant saying that she will be allowed entry only wearing ‘smart casual’ clothes and saree is not a part of it. This is a direct insult to the Indian tradition as well as undermining the Indian attire in front of the western clothes, in protest against which the student activists of Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad today demonstrated in the restaurant wearing Indian sarees.

ABVP’s State Girls Cordinator, Valentina Brahma said, “In the past, a woman was stopped from entering Aquila Restaurant in Delhi’s capital, just because she was wearing a saree, it is very condemnable and ABVP strongly opposes this incident. And at the same time demands the government to take strict action against such restaurants which in any way insult Indian culture and Indian attire. We entered the hotel today in Indian attire with the intention to bring out the hotel management out of their colonial hangover”

ABVP Delhi’s State Secretary and National Media Convener Sidharth Yadav, who was present during the protest, said, “India is in the 75th year of independence, but even today the thinking of some people is narrow minded. Our fight is to defeat this narrow minded ‘colonial mindset’. Saree is the pride of a woman and such incident in the capital of the country is highly condemnable. We have been successful in giving a message to the people of such narrow mindedness by becoming the voice of all progressive minded people of the country.”

After the demonstration, the manager of the restaurant apologized and further assured not to do any such incident which insults Indian outfits and Indian culture.

बालश्रम खत्म करने के लिए वैश्विक सामाजिक सुरक्षा कोष की हुई मांग

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नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित श्री कैलाश सत्यार्थी द्वारा संस्थापित संगठन ‘लॉरियेट्स एंड लीडर्स फॉर चिल्‍ड्रेन’ द्वारा आयोजित अंतरराष्‍ट्रीय परिसंवाद “फेयर शेयर टू इंड चाइल्ड लेबर- सरवाइवर्स एंड लीडर्स ऑन सोशल प्रोटेक्शन” में वैश्विक नेताओं ने कोविड-19 महामारी के दौरान पूरी दुनिया में बाल मजदूरी और बच्चों के शोषण बढ़ने पर गंभीर चिंता जाहिर की। इस अतंरराष्ट्रीय परिसंवाद में गरीब देशों के वंचित और हाशिए के बच्चों को संसाधनों का उचित हिस्सा (फेयर शेयर) देने और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए एक ‘वैश्विक सामाजिक सुरक्षा कोष’ स्थापित करने की भी मांग की गई

अमरनाथ कुमार

नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित श्री कैलाश सत्यार्थी द्वारा संस्थापित संगठन ‘लॉरियेट्स एंड लीडर्स फॉर चिल्‍ड्रेन’ द्वारा आयोजित अंतरराष्‍ट्रीय परिसंवाद “फेयर शेयर टू इंड चाइल्ड लेबर-

सरवाइवर्स एंड लीडर्स ऑन सोशल प्रोटेक्शन” में वैश्विक नेताओं ने कोविड-19 महामारी के दौरान पूरी दुनिया में बाल मजदूरी और बच्चों के शोषण बढ़ने पर गंभीर चिंता जाहिर की। वैश्विक नेताओं ने एक सुर में कहा कि हमें दुनियाभर के वंचित और हाशिए के बच्चों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी और विश्व समुदाय को गरीबी दूर करने के लिए तत्काल कारगर कदम उठाने होंगे। इस अतंरराष्ट्रीय परिसंवाद में गरीब देशों के वंचित और हाशिए के बच्चों को संसाधनों का उचित हिस्सा (फेयर शेयर) देने और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए एक ‘वैश्विक सामाजिक सुरक्षा कोष’ स्थापित करने की भी मांग की गई।

परिसंवाद में आए महत्‍वपूर्ण सुझावों को कैलाश सत्यार्थी 28 सितम्‍बर 2021 को गरीबी उन्मूलन के लिए नौकरियों और सामाजिक सुरक्षा पर दुनिया के राष्ट्राध्यक्षों और सरकार के प्रमुखों की जो बैठक होने जा रही है, उसमें रखेंगे। यह बैठक संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस द्वारा अंतरराष्‍ट्रीय श्रम संगठन के साथ मिलकर आयोजित की जा रही है। जिसमें कोविड-19 के दौरान और उसके बाद दुनिया के विकास के लिए दी जाने वाली आर्थिक सहायता के लिए की जाने वाली पहल पर बातचीत होगी।

‘लॉरियेट्स एंड लीडर्स फॉर चिल्‍ड्रेन’ द्वारा “फेयर शेयर टू इंड चाइल्ड लेबर- सरवाइवर्स एंड लीडर्स ऑन सोशल प्रोटेक्शन” नामक इस ऑनलाइन अंतरराष्‍ट्रीय परिसंवाद का आयोजन अंतरराष्‍ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) एवं स्‍वीडन सरकार और नार्वे के विदेश मंत्रालय ने संयुक्‍त रूप से किया। इस परिसंवाद में आईएलओ के महानिदेशक गाई राइडर, स्वीडन के प्रधानमंत्री स्टीफन लोफवेन, नार्वे के अंतरराष्ट्रीय विकास मंत्री डाग इंगे उलस्टीन, नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्मानित बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्‍यार्थी, तिमोर लेस्ते के पूर्व राष्ट्रपति और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता जोस रामोस होर्ता, जर्मनी के फेडरल मिनिस्ट्री ऑफ लेबर एंड सोशल अफेयर के परमानेंट स्टेट सेकेट्री बीजॉन बोहनिंग, प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और संयुक्त राष्ट्र संघ के सस्टेनेबल डेवलपमेंट सल्युसन्स नेटवर्क के अध्यक्ष जैफरी सैक्स, यूनेस्को की असिस्टेंट डायरेक्टर जनरल (शिक्षा) स्टेफेनिया जियाननी, प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता और राबर्ट एफ कैनेडी ह्यूमन राइट्स की अध्यक्ष कैरी कैनेडी, वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन की डिप्टी डायरेक्टर जनरल डॉ सुसाना जकब और इंटर पार्लियामेंटरी यूनियन के महासचिव मार्टिन चुंगोंग सहित दुनिया के करीब दो दर्जन वैश्विक नेताओं ने हिस्सा लिया। परिसंवाद को तमाम देशों के युवा और छात्र नेताओं सहित पूर्व बाल मजदूरों ने भी संबोधित किया। यह अतंरराष्ट्रीय परिसंवाद ऐसे समय पर आयोजित किया गया, जब न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र संघ की जनरल असेंबली चल रही है। इस मौके पर इस अंतरराष्ट्रीय मंच से संयुक्त राष्ट्र संघ के जनरल असेंबली में शामिल होने वाले तमाम देशों के नेताओं से अपील की गई की वे बच्चों की सामाजिक सुरक्षा के लिए फौरन नीतियां और कार्यक्रम बनाएं।

इस अवसर पर दो दशकों में पहली बार बाल श्रमिकों की संख्‍या में अभूतपूर्व वृद्धि पर विचार किया गया। मौजूदा हालात और प्रगति को देखते हुए सन 2025 तक बाल श्रम के सभी रूपों को खत्‍म करने की विश्व समुदाय की प्रतिबद्धता पर जो एक बड़ा़ सवाल खड़ा हुआ है, उस पर भी गंभीर चिंता व्‍यक्‍त की गई। उल्‍लेखनीय है कि इन संकटों ने संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्‍यों (एसडीजी) को 2030 तक प्राप्‍त करने में भी एक चुनौती पैदा कर दी है। इन संकटों से निपटने के लिए लॉरियेट्स एंड लीडर्स फॉर चिल्‍ड्रेन की ओर से अंतरराष्‍ट्रीय नेताओं और मुक्‍त बाल श्रमिकों द्वारा बच्चों की सामाजिक सुरक्षा की तत्काल आवश्यकता को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर पुरजोर दबाव डाला गया। इस अवसर पर वैश्विक वक्‍ताओं ने एक ओर जहां समाज के सबसे हाशिए पर रहने वाले बच्‍चों के लिए सामाजिक सुरक्षा निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि की मांग की, वहीं दूसरी ओर उन्‍होंने कम आय वाले देशों के लिए एक वैश्विक सामाजिक सुरक्षा कोष की स्थापना पर भी बल दिया।

स्‍वीडन के प्रधानमंत्री स्‍टीफन लोफवेन

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए स्‍वीडन के प्रधानमंत्री स्‍टीफन लोफवेन ने शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा पर जोर दिया। स्‍टीफन लोफवेन ने कहा, ‘‘स्‍कूल के खाली डेस्‍क का मतलब है कि बच्‍चे बाल मजदूरी कर रहे होंगे। बाल श्रम को समाप्‍त करने के लिए जरूरी है कि बच्‍चे स्‍कूल में हों और वयस्‍कों को हम ऐसी सामाजिक सुरक्षा प्रदान करें जो उन्‍हें अच्‍छे वातावरण में काम करने के लिए प्रेरित करें। हमें गरीबों को फोकस करना चाहिए। स्‍वीडन अंतरराष्‍ट्रीय सहायता के लिए आगे भी महत्‍वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता रहेगा। हमें सप्‍लाई चेन से बाल श्रम को समाप्‍त करने के लिए काम करना होगा।’’ वहीं अंतरराष्‍ट्रीय श्रम संगठन के महानिदेशक गाई राइडर ने भी सामाजिक सुरक्षा पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “हम बच्चों और उनके परिवारों के लिए पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान करके ही आगे बढ़ सकते हैं। जिसका हम अतीत में प्रावधान करने में अक्षम रहे।’’

दुनिया में बढ़ती समानता और बाल श्रम की समस्या पर ध्यान आकर्षित करते हुए नोबेल शांति पुरस्कार से सम्‍मानित जाने-माने बाल अधिकार कार्यकर्ता श्री कैलाश सत्‍यार्थी ने कहा, “वैश्विक नेताओं में यह कहने का नैतिक साहस होना चाहिए कि हां, हम अपने बच्‍चों के लिए कुछ भी करने में असमर्थ रहे हैं और हम उसके लिए जिम्‍मेदार हैं। कोई तो इसकी जिममेदारी ले कि एक ओर जहां दुनिया की संपत्ति में 10 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का इजाफा हो गया हो, वहीं दूसरी ओर 10 हजार बच्‍चे प्रति दिन बाल मजदूरी और गुलामी के दलदल में धकेले जा रहे हैं। हम मुक्‍त बाल मजदूर, छात्र, नोबेल पुरस्‍कार विजेता, ट्रेड यूनियन बच्‍चों के लिए दरवाजे खटखटाते रहेंगे। यह हमारे बच्चों के लिए ‘सामाजिक सुरक्षा का वैश्‍वीकरण’ करने का समय है।”

वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन की डिप्टी डायरेक्टर जनरल डॉ सुसाना जकब

गौरतलब है कि दुनियाभर में लगभग तीन चौथाई बच्चे और कम आय वाले देशों में नब्बे प्रतिशत बच्चे बगैर किसी सामाजिक सुरक्षा के जीने को अभिशप्‍त हैं। अंतरराष्ट्रीय सहायता में सामाजिक सुरक्षा के लिए दी जाने वाली राशि में अत्यधिक कमी है। परिसंवाद में इस ओर ध्यान आकर्षित करते हुए संयुक्त राष्ट्र सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क के अध्यक्ष और प्रसिद्ध अर्थशात्री जेफरी सैक्‍स ने कहा, “बच्चों की वर्तमान स्थिति दिल दहला देने वाली और घृणित है। बच्चों की शिक्षा के लिए हमें अब वित्तीय संसाधन जुटाने होंगे। अगर वे स्कूल में होंगे, तो बाल श्रम नहीं कर रहे होंगे।’’

परिसंवाद में यह बात जोर-शोर से उठी कि बाल श्रम खत्म करने में भी सामाजिक सुरक्षा एक कारगर हथियार है। लेकिन इस पर बहुत कम पैसा खर्च किया जा रहा है। सामाजिक सुरक्षा के लिए विदेशी विकास सहायता के मद में साल 2017 में अमीर देशों की सकल राष्ट्रीय आय का महज 0.0047 प्रतिशत ही दिया गया। जो मामूली है। नार्वे के अंतर्राष्ट्रीय विकास मंत्री डाग-इंगे उलस्टीन ने कहा, ‘‘हमें 2025 तक बाल श्रम को समाप्‍त कर देना है। लेकिन प्रत्‍येक दिन 10 हजार बच्‍चे बाल श्रम करने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं और उन्‍हें इससे मुक्‍त करने की कोशिश भी नहीं हो रही है। यह समय है उन्‍हें ‘फेयर शेयर’ उपलब्‍ध कराने के लिए कदम उठाने का। इसमें सामाजिक सुरक्षा महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।’’

आईएलओ के महानिदेशक गाई राइडर

इस अवसर पर कम आय वाले देशों में सामाजिक सुरक्षा के कार्यों और कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में तेजी लाने के लिए वैश्विक सामाजिक सुरक्षा कोष बनाने की मांग की गई। बचपन बचाओं आंदोलन द्वारा मुक्‍त बाल श्रमिक मनन अंसारी कभी झारखंड के अभ्रक खदानों में काम करता था। फिलहाल वह माइक्रो बाइलोजी में एमएससी कर रहा है। परिसंवाद में शामिल वैश्विक नेताओं को संबोधित करते हुए मनन ने भावुक होकर कहा, ‘‘मैं जीवन की आखिरी सांस तक संघर्ष करता रहूंगा कि किसी भी बच्‍चे का बचपन किसी भी हाल में खदानों में दम न तोड़ दे। हम सभी को मिलकर बाल दासता को खत्‍म करने के लिए ‘फेयर शेयर फॉर चिल्ड्रेन’ की मांग करनी चाहिए। हर बच्चे के लिए सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।’’ वहीं झारखंड बाल पंचायत की राज्‍य सचिव और बाल नेता खुशबू शर्मा ने अमीर देशों से अपील की कि उनके पास पर्याप्त धन और संसाधन हैं और वे बच्‍चों के सपनों को पूरा करने में मदद कर सकते हैं।

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वायु गुणवत्ता के नए मानक खतरे की तरफ कर रहे इशारा

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अगर पूरी दुनिया पीएम 2.5 के नए मानकों को लागू करती है तो इसके द्वारा पीएम 2.5 के कारण होने वाले मृत्यु की संख्या में 80% तक की कमी की जा सकती है

धीप्रज्ञ द्विवेदी

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2005 के बाद पहली बार अपने वायु गुणवत्ता मानकों में बदलाव किया है। इसका प्रमुख कारण है वायु प्रदूषण से हो रही मृत्यु की संख्या में बढ़ोतरी। पिछले कुछ वर्षों में वायु प्रदूषण के कारण पूरे विश्व में मृत्यु की संख्या अभूतपूर्व रूप से बढ़ी है। प्रतिवर्ष लगभग 7000000 (70 लाख) लोगों की मृत्यु वायु प्रदूषण के कारण होती है। अगर हम इस संख्या को मृत्यु के अन्य कारणों से तुलना करें तो पाते हैं कि यह संख्या तंबाकू के कारण होने वाली या पर्याप्त पोषण ना मिलने के कारण होने वाले मृत्यु के संख्या के लगभग बराबर है। यहां तक की वर्ष 2019 के अंत से कोरोनावायरस महामारी के आने के बाद भी 2020-21 में वायु प्रदूषण के कारण होने वाले मृत्यु की संख्या में बहुत कमी नहीं देखी गई। वायु प्रदूषण के कारण होने वाले स्वास्थ्य समस्याओं को कम करने के लिए तथा इसके कारण से होने वाले मृत्यु की संख्या को नियंत्रित करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी नई वायु गुणवत्ता मानकों को जारी किया है। यह मानक विश्व स्वास्थ संगठन के 191 सदस्य देशों के लिए हैं। इन मानकों को ध्यान से देखें तो हम पाते हैं कि इसमें सभी 6 महत्वपूर्ण क्लासिकल प्रदूषकों को शामिल किया गया है। यह प्रदूषक हैं, पीएम 2.5, पीएम 10, ओजोन, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड एवं कार्बन मोनोऑक्साइड।

पिछली बार लगभग 16 वर्ष पहले वर्ष 2005 में विश्व स्वास्थ संगठन ने वायु गुणवत्ता मानकों को जारी किया था तब से लेकर अब तक वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य पर प्रभाव को लेकर बहुत अध्ययन किए गए हैं पिछले 16 वर्षों में 500 से अधिक शोध पत्र इन विषयों पर प्रकाशित हुए हैं जिसके द्वारा इन प्रदूषकों के मानव शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को और अच्छे तरीके से समझा जा सका है। इसके साथ ही विकासशील एवं अविकसित देशों में वायु प्रदूषण के कारण हो रही स्वास्थ्य समस्याओं तथा मृत्यु में भी लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। इन सभी कारणों को ध्यान में रखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने नए मानकों को जारी किया इन मांगों को जारी करते हुए संगठन ने कहा है कि यह गुणवत्ता मानक वायु के उस गुणवत्ता को बताते हैं जो हमारे स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए न्यूनतम स्तर है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अगर पूरी दुनिया पीएम 2.5 के नए मानकों को लागू करती है तो इसके द्वारा पीएम 2.5 के कारण होने वाले मृत्यु की संख्या में 80% तक की कमी की जा सकती है। वर्तमान में पीएम 2.5 एक बहुत महत्वपूर्ण वायु प्रदूषण है क्योंकि यह अपने बहुत छोटे आकार के कारण आसानी से ना केवल हमारे से हो तक पहुंच जाता है और हमारे स्वसन तंत्र को प्रभावित करता है बल्कि वहां से आगे बढ़ते हुए या हमारे रक्त संचालन तंत्र के द्वारा शरीर के अन्य अंगों तक पहुंच कर उन्हें भी प्रभावित करता है। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड हमारे स्वसन तंत्र को प्रभावित करता है और इसका ज्यादा कंसंट्रेशन मनुष्य में अस्थमा का कारण बन सकता है साथ ही साथ यह सतही ओजोन का निर्माण भी करता है जो स्वास्थ समस्याओं के साथ-साथ अन्य पर्यावरण समस्याओं के लिए भी जिम्मेदार है। सल्फर डाइऑक्साइड हमारे श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है और साथ ही एंफिसेमा का कारक बनता है एवं हमारे फेफड़ों की क्षमता को प्रभावित करता है। कार्बन मोनोऑक्साइड की अधिक मात्रा हमारे लिए जहर की तरह होती है जिसे कारण हमारी मृत्यु भी हो सकती है क्योंकि कार्बन मोनोऑक्साइड की एफिनिटी हीमोग्लोबिन के साथ ऑक्सीजन की तुलना में कहीं ज्यादा है अतः जब या हमारे शरीर तक पहुंचता है तो धीरे-धीरे पूरे शरीर में ऑक्सीजन की सप्लाई को प्रभावित करता है जिसके कारण मृत्यु तक हो सकती है। ऐसी स्थिति में इन सभी प्रदूषकों के वातावरण में कंसंट्रेशन को कम करना ही अच्छे स्वास्थ्य को पाने का पहला कदम है।

दिल्ली की हवा खराब

इन्हीं सब कारणों को ध्यान में रखते हुए संगठन ने नए वायु गुणवत्ता मानकों का निर्धारण किया है। इन मानकों के आधार पर अगर हम वर्तमान में वायु प्रदूषण की स्थिति की तुलना करें तो हम समझ पाएंगे के प्रदूषण की स्थिति कितनी भयावह है। यह स्थिति विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य समस्याओं के जन्मदाता है भारत जैसे देशों के लिए और बड़ी समस्या है क्योंकि एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग 3% लोग स्वास्थ्य समस्याओं के कारण गरीबी रेखा से ऊपर नहीं उठ पाते। ऐसी स्थिति में बढ़ता वायु प्रदूषण भारत की जनता के लिए स्वास्थ्य समस्याओं के साथ आर्थिक विषमता एवं समस्याओं को भी बढ़ाता है।

अगर हम वर्तमान भारतीय वायु गुणवत्ता मानकों की तुलना डब्लू एच ओ के नए मानकों से करें तो हम पाते हैं कि हमारे मानक कहीं से भी स्वास्थ्य के लिए बहुत उपयोगी नहीं है। उदाहरण स्वरूप पीएम 2.5 का नया वार्षिक मानक औसत 5 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब है जबकि भारत में 40 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब है। ऐसे ही पीएम 10 के लिए डब्लू एच ओ का नया मानक औसत 15 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब वार्षिक है जबकि भारतीय मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब है। इसी प्रकार नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का नया वार्षिक औसत मानक 10 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब है जबकि वर्तमान भारतीय मानक 40 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब है, (वास्तव में यहां नाइट्रोजन डाइऑक्साइड भारतीय मानक विश्व स्वास्थ संगठन के 2005 के मानक के अनुरूप है) इसी प्रकार यदि हम सल्फर डाइऑक्साइड के नए और भारतीय मानकों की तुलना करें तो हम पाते हैं कि नए मानक एक बिल्कुल ही नए स्तर को निरूपित करते हैं अर्थात विश्व स्वास्थ संगठन के नए मानकों की तुलना में भारतीय मानक कहीं नहीं ठहरते।
इन मानकों के आधार पर भारत के भी वायु गुणवत्ता मानकों में परिवर्तन करने की आवश्यकता है अन्यथा हम अपने देश में वायु प्रदूषण कारण हो रही स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने में समय के अनुसार सक्षम नहीं हो पाएंगे।
डब्ल्यूएचओ के नए मानक हमें यह बताते हैं के अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए हमें अपने वायु की गुणवत्ता को और बेहतर बनाना होगा और इसके लिए अगर समय रहते उचित कदम नहीं उठाएगा तो हमारा भविष्य अंधकार में हो सकता है।

( लेखक पर्यावरण विषय में स्नातकोत्तर एवं यूजीसी नेट क्वालिफाइड हैं, पर्यावरण विषय पर लगातार विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं, प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए पर्यावरण विज्ञान पढ़ाते हैं। साथही स्वास्थ्य विषय पर काम करने वाली संस्था स्वस्थ भारत न्यास के संस्थापक न्यासी हैं एवं सभ्यता अध्ययन केंद्र से एक अध्ययन के रूप में जुड़े हुए हैं)

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