संघ की दृष्टि में ऐसे हैं महात्मा गांधी

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डॉ. मनमोहन वैद्य

संघ में भी गांधी जी की चर्चा तो अनेक बार होती देखी है पर गोडसे के नाम की चर्चा मैंने कभी नहीं सुनी। परंतु अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए गांधी जी के नाम को भुनाने के लिए, ऐसे-ऐसे लोग गोडसे का नाम बार-बार लेते हैं जिनका आचरण और जिनकी नीतियों का गांधी जी के विचारों से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं दिखताएक बात मैंने देखी है। जो गांधी जी के असली अनुयायी हैं। वे अपने आचरण पर अधिक ध्यान देते हैं, वे कभी गोडसे का नाम तक नहीं लेते।

संघ में भी गांधी जी की चर्चा तो अनेक बार होती देखी है पर गोडसे के नाम की चर्चा मैंने कभी नहीं सुनी। परंतु अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए गांधी जी के नाम को भुनाने के लिए, ऐसे-ऐसे लोग गोडसे का नाम बार-बार लेते हैं जिनका आचरण और जिनकी नीतियों का गांधी जी के विचारों से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं दिखता। वे तो सरासर असत्य और हिंसा का आश्रय लेने वाले और अपने स्वार्थ के लिए गांधी जी का उपयोग करने वाले ही होते हैं।
एक दैनिक के सम्पादक ने, जो संघ के स्वयंसेवक भी हैं, कहा कि एक गांधीवादी विचारक के लेख हमारे दैनिक में प्रकाशित हो रहे हैं। उस सम्पादक ने यह भी कहा कि उन गांधीवादी विचारक ने लेख लिखने की बात करते समय यह कहा था कि – संघ के और गांधीजी के संबंध कैसे थे, यह मैं जानता हूं, फिर भी मैं उन कुछ पहलुओं के बारे में लिखूंगा जिनके बारे में आप अनजान हैं। यह सुन कर मैंने प्रश्न किया कि संघ और गांधीजी के संबंध कैसे थे, यह वे विचारक सही में जानते हैं? लोग बिना जाने, बिना अध्ययन किए अपनी धारणाएं बना लेते हैं। संघ के बारे में तो अनेक विद्वान, स्कॉलर कहलाने वाले लोग भी पूरा अध्ययन करने का कष्ट किए बिना या, सिलेक्टिव अध्ययन के आधार पर या एक विशिष्ट दृष्टिकोण से लिखे साहित्य के आधार पर ही अपने ‘विद्वतापूर्ण’ विचार व्यक्त करते हैं। किन्तु वास्तविकता यह है कि इन विचारों का ‘सत्य’ से कोई लेना-देना नहीं होता है।
महात्मा गांधी के कुछ मतों से घोर असहमति होते हुए भी, उनके संघ से संबंध कैसे थे, इस पर उपलब्ध जानकारी पर नजर डालनी चाहिए। भारत की आजादी के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष में जनाधार को व्यापक बनाने के शुद्ध उद्देश्य से मुसलमानों के कट्टर और जिहादी मानसिकता वाले हिस्से के सामने उनकी शरणागति से सहमत न होते हुए भी, आजादी के आंदोलन में सर्वसामान्य लोगों को सहभागी होने के लिए उन्होंने चरखे जैसा सहज उपलब्ध अमोघ साधन और सत्याग्रह जैसा सहज स्वीकार्य तरीका दिया, वह उनकी महानता है।

ग्राम स्वराज्य, स्वदेशी, गोरक्षा, अस्पृश्यता निर्मूलन आदि उनके आग्रह के विषयों से भारत के मूलभूत हिंदू चिंतन से उनके लगाव और आग्रह के महत्व को कोई नकार नहीं सकता। उनका स्वयं का मूल्याधारित जीवन अनेक युवक-युवतियों को आजीवन व्रतधारी बनकर समाज की सेवा में लगने की प्रेरणा देने वाला था।

1921 के असहयोग आंदोलन और 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन, इन दोनों सत्याग्रहों में डॉक्टर हेडगेवार सहभागी हुए थे। इस कारण डॉ. हेडगेवार जी को 19 अगस्त 1921 से 12 जुलाई 1922 तक और 21 जुलाई,1930 से 14 फरवरी, 1931 तक, दो बार सश्रम कारावास की सजा भी हुई।
महात्मा गांधी को 18 मार्च, 1922 को छह वर्ष की सजा हुई। तब से उनकी मुक्ति तक प्रत्येक महीने की 18 तारीख ‘गांधी दिन’ के रूप में मनाई जाती थी। 1922 के अक्तूबर मास में ‘गांधी दिन’ के अवसर पर दिए गए भाषण में डॉक्टर हेडगेवार ने कहा कि – आज का दिन अत्यंत पवित्र है। महात्मा जी जैसे पुण्यश्लोक पुरुष के जीवन में व्याप्त सद्गुणों के श्रवण एवं चिंतन का यह दिन है। उनके अनुयायी कहलाने में गौरव अनुभव करने वालों के सिर पर तो उनके इन गुणों का अनुकरण करने की जिम्मेदारी विशेषकर है।

1934 में वर्धा में श्री जमनालाल बजाज के यहां जब गांधी जी का निवास था तब पास ही संघ का शीत शिविर चल रहा था। उत्सुकतावश गांधी जी वहां गए, संघ अधिकारियों ने उनका स्वागत किया और स्वयंसेवकों के साथ उनका वार्तालाप भी हुआ। वार्तालाप के दौरान जब उन्हें पता चला कि शिविर में अनुसूचित जाति से भी स्वयंसेवक हैं, और उनसे किसी भी प्रकार का भेदभाव किए बिना सब भाईचारे के साथ स्नेहपूर्वक साथ रहते हैं, सारे कार्यक्रम साथ करते हैं, तब उन्होंने बहुत प्रसन्नता व्यक्त की।

स्वतंत्रता के पश्चात जब गांधी जी का निवास दिल्ली में मैला ढोने वाले समाज की कॉलोनी में था, तब सामने मैदान में संघ की प्रभात शाखा चलती थी। सितम्बर में गांधी जी ने प्रमुख स्वयंसेवकों से बात करने की इच्छा व्यक्त की और सम्बोधित किया-‘बरसों पहले मैं वर्धा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक शिविर में गया था। उस समय इसके संस्थापक श्री हेडगेवार जीवित थे। स्व. जमनालाल बजाज मुझे शिविर में ले गए थे। मैं उन लोगों का कड़ा अनुशासन, सादगी और छुआछूत की पूर्ण समाप्ति देखकर अत्यंत प्रभावित हुआ था। तब से संघ काफी बढ़ गया है। मैं तो हमेशा से यह मानता हूं कि जो भी संस्था सेवा और आत्म-त्याग के आदर्श से प्रेरित है, उसकी ताकत बढ़ती ही है। लेकिन सच्चे रूप में उपयोगी होने के लिए त्याग भाव के साथ ध्येय की पवित्रता और सच्चे ज्ञान का संयोजन आवश्यक है। ऐसा त्याग, जिसमें इन दो चीजों का अभाव हो, समाज के लिए अनर्थकारी सिद्ध हुआ है।’
(यह सम्बोधन ‘गांधी समग्र वाङ्गमय’ के खंड 89 में 215-217 पृष्ठ पर प्रकाशित है।)

30 जनवरी, 1948 को तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी मद्रास में एक कार्यक्रम में थे, जब उन्हें गांधी जी की मृत्यु का समाचार मिला। उन्होंने तुरंत ही प्रधानमंत्री पंडित नेहरू, गृह मंत्री सरदार पटेल और गांधी जी के सुपुत्र देवदास गांधी को टेलीग्राम द्वारा अपनी शोक संवेदना भेजी। उसमें श्री गुरुजी ने लिखा, ‘प्राणघातक क्रूर हमले के फलस्वरूप एक महान विभूति की दु:खद हत्या का समाचार सुनकर मुझे बड़ा आघात लगा। वर्तमान कठिन परिस्थिति में इससे देश की अपरिमित हानि हुई है। अतुलनीय संगठक के तिरोधान से जो रिक्तता पैदा हुई है, उसे पूर्ण करने और जो गुरुतर भार कंधों पर आ पड़ा है, उसे पूर्ण करने का सामर्थ्य भगवान हमें प्रदान करें।’

गांधी जी के प्रति सम्मान रूप शोक व्यक्त करने के लिए 13 दिन तक संघ का दैनिक कार्य स्थगित करने की सूचना उन्होंने देशभर के स्वयंसेवकों को दी। दूसरे ही दिन 31 जनवरी, 1948 को श्री गुरुजी ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को एक विस्तृत पत्र लिखा। उसमें वे लिखते हैं- ‘कल मद्रास में वह भयंकर वार्ता सुनी कि किसी अविचारी भ्रष्ट-हृदय व्यक्ति ने पूज्य महात्मा जी पर गोली चलकर उस महापुरुष के आकस्मिक-असामयिक निधन का नीरघृण कृत्य किया। यह निंदा कृत्य संसार के सम्मुख अपने समाज पर कलंक लगाने वाला हुआ है।’

ये सारी जानकारी ‘Justice on Trial’ नामक पुस्तक में और श्री गुरुजी समग्र में उपलब्ध है। 6 अक्तूबर, 1969 में महात्मा गांधी जी की जन्मशताब्दी के समय महाराष्ट्र के सांगली में गांधी जी की प्रतिमा का श्री गुरुजी के द्वारा अनावरण किया गया। उस समय श्री गुरुजी ने कहा-‘आज एक महत्वपूर्ण व पवित्र अवसर पर हम एकत्र हुए हैं। सौ वर्ष पूर्व इसी दिन सौराष्ट्र में एक बालक का जन्म हुआ था। उस दिन अनेक बालकों का जन्म हुआ होगा, पर हम उनकी जन्म-शताब्दी नहीं मनाते। महात्मा गांधी जी का जन्म सामान्य व्यक्ति के समान हुआ, पर वे अपने कर्तव्य और अंत:करण के प्रेम से परमश्रेष्ठ पुरुष की कोटि तक पहुंचे। उनका जीवन अपने सम्मुख रखकर, अपने जीवन को हम उसी प्रकार ढालें। उनके जीवन का जितना अधिकाधिक अनुकरण हम कर सकते हैं, उतना करें’।

‘लोकमान्य तिलक के पश्चात महात्मा गांधी ने अपने हाथों में स्वतंत्रता आंदोलन के सूत्र संभाले और इस दिशा में बहुत प्रयास किए। शिक्षित-अशिक्षित स्त्री-पुरुषों में यह प्रेरणा जगाई कि अंग्रेजों का राज्य हटाना चाहिए, देश को स्वतंत्र करना चाहिए और स्व के तंत्र से चलने के लिए जो कुछ मूल्य देना होगा, वह हम देंगे। महात्मा गांधी ने मिट्टी से सोना बनाया। साधारण लोगों में असाधारणत्व निर्माण किया। इस सारे वातावरण से ही अंग्रेजों को हटना पड़ा’।

‘वे कहा करते थे-मैं कट्टर हिन्दू हूं, इसलिए केवल मानवों से ही नहीं, सम्पूर्ण जीवमात्र से प्रेम करता हूं।’ उनके जीवन व राजनीति में सत्य व अहिंसा को जो प्रधानता मिली, वह कट्टर हिंदुत्व के कारण ही मिली।’जिस हिंदू-धर्म के बारे में हम इतना बोलते हैं, उस धर्म के भवितव्य पर उन्होंने ‘फ्यूचर ऑफ हिंदुइज्म’ शीर्षक से अपने विचार व्यक्त किए हैं। उन्होंने लिखा है-‘ हिंदू धर्म यानी न रुकने वाला, आग्रह के साथ बढ़ने वाला, सत्य की खोज का मार्ग है। आज यह धर्म थका हुआ-सा, आगे जाने की प्रेरणा देने में सहायक प्रतीत होता अनुभव में नहीं आता। इसका कारण है कि हम थक गए है, पर धर्म नहीं थका। जिस क्षण हमारी यह थकावट दूर होगी, उस क्षण हिंदू धर्म का भारी विस्फोट होगा जो भूतकाल में कभी नहीं हुआ, इतने बड़े परिमाण में हिंदू धर्म अपने प्रभाव और प्रकाश से दुनिया में चमक उठेगा’। महात्मा जी की यह भविष्यवाणी पूरी करने की जिम्मेदारी हमारी है।

‘ देश को राजकीय स्वतंत्रता चाहिए, आर्थिक स्वतंत्रता चाहिए। उसी भांति इस तरह की धार्मिक स्वतंत्रता चाहिए कि कोई किसी का अपमान न कर सके, भिन्न-भिन्न पंथ के, मत के लोग साथ-साथ रह सकें। विदेशी विचारों की दासता से अपनी मुक्ति होनी चाहिए। गांधी जी की यही सीख थी। मैं गांधी जी से अनेक बार मिला हूं। उनसे बहुत चर्चा भी की है। उन्होंने जो विचार व्यक्त किए, उन्हीं के अध्ययन से मैं यह कह रहा हूं। इसीलिए अंत:करण की अनुभूति से मुझे महात्मा जी के प्रति नितांत आदर है।

गुरुजी कहते हैं – ‘महात्मा जी से मेरी अंतिम भेंट सन् 1947 में हुई थी। उस समय देश को स्वाधीनता मिलने से शासन-सूत्र संभालने के कारण नेतागण खुशी में थे। उसी समय दिल्ली में दंगा हो गया। मैं उस समय शांति प्रस्थापना करने का काम कर रहा था। गृह मंत्री सरदार पटेल भी प्रयत्न कर रहे थे और उस कार्य में उन्हें सफलता भी मिली। ऐसे वातावरण में मेरी महात्मा गांधी से भेंट हुई थी। महात्मा जी ने मुझसे कहा-देखो यह क्या हो रहा है? मैंने कहा-यह अपना दुर्भाग्य है। अंग्रेज कहा करते थे कि हमारे जाने पर तुम लोग एक-दूसरे का गला काटोगे। आज प्रत्यक्ष में वही हो रहा है। दुनिया में हमारी अप्रतिष्ठा हो रही है। इसे रोकना चाहिए। गांधीजी ने उस दिन अपनी प्रार्थना सभा में मेरे नाम का उल्लेख गौरवपूर्ण शब्दों में कर, मेरे विचार लोगों को बताए और देश की हो रही अप्रतिष्ठा रोकने की प्रार्थना की। उस महात्मा के मुख से मेरा गौरवपूर्ण उल्लेख हुआ, यह मेरा सौभाग्य था। इन सारे सम्बन्धों से ही मैं कहता हूं कि हमें उनका अनुकरण करना चाहिए।’

मैं जब वडोदरा में प्रचारक था तब (1987-90) सहसरकार्यवह श्री यादवराव जोशी का वडोदरा में प्रकट व्याख्यान था। उसमें श्री यादवराव जी ने महात्मा गांधी जी का बहुत सम्मान के साथ उल्लेख किया। व्याख्यान के पश्चात कार्यालय में एक कार्यकर्ता ने उनसे पूछा कि आज आपने महात्मा गांधी जी का सम्मानपूर्वक जो उल्लेख किया, वह क्या मन से किया था? इस पर यादवराव जी ने कहा कि मन में ना होते हुए भी, मैं केवल बोलने वाला कोई राजकीय नेता नहीं हूं। जो कहता हूं, मन से ही कहता हूं। फिर उन्होंने समझाया कि जब किसी व्यक्ति का हम आदर-सम्मान करते हैं, इसका मतलब यह नहीं कि उनके सभी विचारों से हम सहमत होते हैं। एक विशिष्ट प्रभावी गुण के लिए हम उन्हें याद करते हैं, आदर्श मानते हैं। जैसे पितामह भीष्म को हम उनकी प्रतिज्ञा की दृढ़ता के लिए अवश्य स्मरण करते हैं, परंतु राज सभा में द्रौपदी के वस्त्रहरण के समय वे सारा अन्याय मौन बैठे देखते रहे, इसका समर्थन हम नहीं कर सकते हैं। इसी तरह कट्टर और जिहादी मुस्लिम नेतृत्व के संबंध में गांधी जी के व्यवहार के बारे में घोर असहमति होने के बावजूद, स्वतंत्रता आंदोलन में जनसामान्य को सहभागी होने के लिए उनके द्वारा दिया गया अवसर, स्वतंत्रता के लिए सामान्य लोगों में उनके द्वारा प्रज्ज्वलित की गई ज्वाला, भारतीय चिंतन पर आधारित उनके अनेक आग्रह के विषय, सत्याग्रह के माध्यम से व्यक्त किया जन आक्रोश-ये उनका योगदान निश्चित ही सराहनीय और प्रेरणादायी है।

इन सारे तथ्यों को ध्यान में लिए बिना संघ और गांधी जी के संबंध पर टिप्पणी करना असत्य और अनुचित ही कहा जा सकता है। ग्राम विकास, सेंद्रिय कृषि, गोसंवर्धन, सामाजिक समरसता, मातृभाषा में शिक्षा और स्वदेशी अर्थ व्यवस्था एवं जीवनशैली-ऐसे महात्मा गांधी जी के प्रिय एवं आग्रह के क्षेत्रों में संघ स्वयंसेवक पूर्ण मनोयोग से सक्रिय हैं। उनकी पावन स्मृति को विनम्र आदरांजलि।
( पाञ्चजन्य आर्काइव )

JU Agree Science और Bibharte NGO ने बच्चों की सुरक्षा व स्वास्थ्य पर आयोजित किया जागरूकता कार्यक्रम

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राम अजोर

नई दिल्ली/पटना: JU Agree Science Private Limited ने Bibharte NGO के सहयोग से बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा देने वाला एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया। इस आयोजन में POCSO एक्ट, Good Touch–Bad Touch की जागरूकता, मेडिकल कैंप और बच्चों के सांस्कृतिक प्रदर्शन शामिल थे, जो बच्चों को उनके अधिकारों और सुरक्षा के प्रति सजग बनाने पर केंद्रित था।

कार्यक्रम की मुख्य वक्ता हाई कोर्ट की अधिवक्ता सैफ्फैली पाट्याल ने बच्चों को POCSO एक्ट के प्रावधानों और Good Touch–Bad Touch के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बच्चों को सशक्त बनाते हुए कहा कि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए हमेशा सतर्क रहना चाहिए और किसी भी अनुचित व्यवहार की रिपोर्ट करने से न डरें। वहीं, यशोदा मेडिसिटी हॉस्पिटल की टीम ने मेडिकल कैंप का संचालन किया, जिसमें बच्चों की स्वास्थ्य जांच की गई और आवश्यक चिकित्सीय परामर्श प्रदान किया गया।

इस अवसर पर Bibharte NGO के प्रेसिडेंट मोहन सिंह और उनकी पूरी टीम के साथ JU Agree Science की ओर से सरद कुमार सिंह एवं उनकी टीम उपस्थित रही। आयोजन में बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया, जिसने कार्यक्रम को और अधिक जीवंत बना दिया।

कार्यक्रम के दौरान यह भी घोषणा की गई कि Bibharte NGO, JU Agree Science के सहयोग से आने वाले समय में बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में लगभग 50 स्कूलों में इसी प्रकार के जागरूकता अभियान चलाएगी। इसका उद्देश्य अधिक से अधिक बच्चों तक सुरक्षा, स्वास्थ्य और उनके अधिकारों की जानकारी पहुंचाना है। आयोजकों का मानना है कि ऐसे कार्यक्रम समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

बेतिया के बड़ा रमना के अस्तित्व को संकट, विकास के नाम पर विपत्ति को आमंत्रण

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डॉ. दिवाकर राय

बेतिया: यह छायाचित्र उस ऐतिहासिक बड़ा रमना के पूर्वी -उत्तरी हिस्से का है, जो कल तक हरा-भरा था। यहां सायंकाल पंछियों की चहचहाहट से वातावरण गुंजायमान रहता था। बसंत का मौसम हो या शीत का, सालों भर हरे रहने वाले वृक्ष पर्यावरण तो शुद्ध करते ही थे, खेलने वाले बच्चों तथा टहलने वाले आम लोगों के मन को भी शांति प्रदान करते थे। स्टेडियम के विस्तार की योजना बनी और बड़े-बड़े सैकड़ों पेड़ काट दिए गए। अब यह उजड़ा चमन जैसा दिखाई दे रहा है। हजारी में बिहार सरकार की हजारों एकड़ खाली जमीन पड़ी है। नये स्टेडियम का निर्माण वहाँ भी हो सकता था।

कभी बेतिया राज का ऐतिहासिक रमना मैदान बेतिया राज के घोड़ों को प्रशिक्षित करने के काम आता था। बाद में अँगरेज यहाँ पोलो खेलने लगे। दशहरा मेला में यह बड़ा रमना सर्कस से गुलजार रहता था। बड़े-बड़े राजनेताओं की सभायें यहीं होती थीं। धीरे-धीरे यह अतिक्रमण का शिकार होता गया। निजी लोगों ने भी अतिक्रमण किया, सरकार द्वारा भी अतिक्रमण किया गया। तत्कालीन जिलाधिकारी जी.कृष्णैया ने इसकी चहारदीवारी करायी। तबतक यहां केवल एक स्टेडियम बना था। फिर उत्तर-पश्चिम के दूसरे हिस्से पर ऑडिटोरियम बन गया। दक्षिणी हिस्से में पता नहीं कौन सा प्रोजेक्ट शुरू हुआ, जो जगह तो घेर लिया; पर वह पूरा ही नहीं हो सका। पश्चिमी हिस्सा सड़क चौड़ीकरण की भेंट चढ़ गया। अब तो बच्चों के झुंडों को खेलने के लिए भी पर्याप्त जगह नहीं है। बेतिया शहर में अब बड़े आयोजनों के लिए कोई जगह ही नहीं बची है। यह विकास हो रहा है या कुछ और, पता नहीं?

इसका एक और पक्ष है। हमलोगों के सामने ही इसमें पौधरोपण किया गया। एक बार नहीं, कई-कई बार। हर बार लाखों खर्च कर फोटो खिंचवाए गये। अधिकांश तो खैर सूख गये, मवेशियों द्वारा चर लिए गए; पर फिर भी वन विभाग के प्रयास से सैकड़ों पेड़ लगे भी। ये पेड़ जब फूल देने लगे, छाया देने लगे तो इन्हें काटने का फरमान आ गया। अब एक हिस्सा बिल्कुल विरान हो गया है। खैर, मैं भी क्या कर सकता हूं? सरकारी फरमान है, सरकारी पैसा है, जैसा सरकार उचित समझे!

Stopping Corruption: Circle Officers (CO) Fear Strict Action by Vijay Kumar Sinha, Strike Ends on First Day

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Patna : In public grievance hearings, immediate suspensions, “no work, no pay” rule, and threats of investigations scared COs so much that they returned to work. This is a direct attack on the root cause of land disputes in Bihar.

A new beginning has started in Bihar’s Revenue and Land Reforms Department under the leadership of Minister Vijay Kumar Sinha. For a long time, people in Bihar suffered from corruption, delays, and bribes in land-related matters. More than 90% of corruption happened at the Circle Officer (CO) level, where basic tasks like mutation (name transfer in land records), name corrections, and entry/exit in records did not happen without bribes. A full network of middlemen (brokers) had formed, working with COs and police stations to cheat people of their land. This led to more fights, murders, and crimes over land disputes in Bihar.

But Minister Sinha’s strict attitude and honest resolve have created fear among these corrupt people.Minister Sinha has adopted a zero-tolerance policy against corruption in the department. He has clearly said that the revenue department is for serving people, not troubling them. In public hearings (Janata Darbar) and land reform public welfare meetings, he personally listens to complaints and takes immediate action against guilty officers.

In one such program in Bodh Gaya (Gaya district), people accused the CO of Amas circle, Arshad Madni, of taking bribes. One applicant said the CO took ₹25,000 bribe through a government bodyguard. From the stage itself, Minister Sinha ordered the CO’s removal, an investigation, and suspension plus FIR if found guilty. For other complaints, he warned officers that delaying files or harassing people will not be tolerated anymore. In a sarcastic comment, he said: “I know exactly which gods are worshipped in circles to get name corrections done” — this was a direct hit at corruption and middlemen.

This fear is clearly visible among officers. When the government started tightening control on corruption, COs threatened a strike (mass leave) and went on an indefinite strike from February 2, 2026. Their main issue was fear over new posts like Sub-Divisional Revenue Officer affecting their promotions or cadre balance.

But circle offices could not stay closed for public interest, especially during the budget session. Minister Sinha showed strictness — he applied “no work, no pay,” ordered return of government vehicles and office keys, and gave options to hand over charge to senior staff, BDOs, DCLRs, etc. Principal Secretary CK Anil warned in front of the minister that if the strike is not withdrawn, they will be dismissed.

As a result, the strike broke on the very first day. In the evening, after meeting Minister Sinha, the Bihar Revenue Service Association withdrew the strike. A three-member committee was formed, with Principal Secretary CK Anil as chairman. The committee will look into their demands, promotions, court orders, and cadre balance. Minister Sinha assured that fair demands will be met, service rules will be respected, and no injustice will happen. His statement — “Okay, the medicine is being given, the effect is showing, don’t worry, everything will be solved” — compares the reform process to effective medicine.

This is the first time the government has controlled corrupt COs so strictly. Earlier, bribes came through middlemen and did not go directly to CO accounts. Many officers spent far more than their salary — children’s fees alone equaled their pay. But now, they fear investigations.

Since Sinha came, honest work is encouraged. People are happy. They say COs can no longer keep brokers to collect money, and work will happen without bribes.

Minister Sinha’s effort is historic. He is challenging land mafias “with a shroud tied on the head” (meaning ready to risk everything) and working to make the department transparent and people-focused. Steps like opening Common Service Centres (CSCs) in every circle, grievance redressal on Saturdays, and strengthening online services will help common people. Honest officers will now get respect, while corrupt ones will face action.

Time will tell if land disputes reduce in Bihar and the roots of crime dry up. People are with Sinha. We pray to God to give him long life, good health, and strong willpower so he continues serving people with this resolve. Bihar’s people are now seeing a ray of hope – a corruption-free revenue system. This struggle by Vijay Kumar Sinha will become a golden chapter in Bihar’s history.

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