विश्व फोटोग्राफी डे:  ताज कैमरे की आंख में कैद होती एक अनंत कहानी

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मुंबई : एक क्लिक होता है और सदियों पुरानी इमारत अचानक जिंदा हो उठती है। संगमरमर पर ठहरी रोशनी बदलती है, यमुना की लहरें करवट लेती हैं और ताजमहल एक नए चेहरे के साथ कैमरे में उतर जाता है।
सवाल यह है कि आखिर इस इमारत में ऐसा क्या है, जो लाखों तस्वीरों के बाद भी कैमरे को फिर से क्लिक करने के लिए मजबूर करता है?
यही ताज का जादू है। सदियां गुजर गईं, कैमरे बदल गए, तकनीक आसमान छू गई, लेकिन ताज की तस्वीर का आकर्षण कम नहीं हुआ।
विश्व फोटोग्राफी दिवस, 19 अगस्त, पर ताजमहल एक बार फिर कैमरे की दुनिया के केंद्र में है। 17वीं सदी का यह मकबरा फोटोग्राफी की कई पीढ़ियों का गवाह रहा है। भारी लकड़ी के कैमरों और कांच की प्लेटों से शुरू हुई कहानी आज स्मार्टफोन, ड्रोन और हाई-रिजॉल्यूशन कैमरों तक पहुंच चुकी है।
आगरा में फोटोग्राफी की यह दास्तान भी कम दिलचस्प नहीं है। एमजी रोड का प्रिया लाल एंड सन्स फोटो स्टूडियो इसका जिंदा सबूत है। वर्ष 1878 में शुरू हुआ यह स्टूडियो आज भी मौजूद है और परिवार की छठी पीढ़ी इस विरासत को आगे बढ़ा रही है।
उस दौर में तस्वीर खींचना चुटकी का खेल नहीं था। बिजली आम नहीं थी। कैमरे भारी थे और तस्वीर तैयार करने के लिए अंधेरे कमरे में घंटों मेहनत करनी पड़ती थी। प्रिया लाल के डार्करूम में प्राकृतिक रोशनी को पर्दों और शीशों की मदद से नियंत्रित किया जाता था। फोटोग्राफी तब तकनीक से ज्यादा सब्र, हुनर और बारीक नजर का इम्तिहान थी।
प्रिया लाल खंडेलवाल ने ताजमहल और आगरा के दूसरे ऐतिहासिक स्मारकों की अनेक तस्वीरें तैयार कीं। उनकी तस्वीरें इंग्लैंड की महारानी तक पहुंचीं और उन्हें स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। उनकी पुस्तक ‘Pictorial Agra’ में आगरा के स्मारकों की 25 हाफ-टोन तस्वीरें और उनका संक्षिप्त इतिहास दर्ज है। यह सिर्फ तस्वीरों की किताब नहीं, बल्कि उस दौर के आगरा की एक दृश्य स्मृति है।
लेकिन आगरा और ताज की फोटोग्राफी की कहानी राजा दीन दयाल के बिना अधूरी है। 1844 में जन्मे दीन दयाल ने 19वीं सदी के भारत को कैमरे की नजर से दुनिया के सामने रखा। वे हैदराबाद के निजाम के दरबारी फोटोग्राफर बने और उन्हें ‘राजा मुसव्विर जंग’ की उपाधि मिली।
उनका कैमरा आज के मोबाइल फोन की तरह जेब में नहीं समाता था। विशाल लकड़ी के कैमरे, कांच की प्लेटें और भारी ट्राइपॉड लेकर वे बैलगाड़ियों और सहायकों के साथ लंबी यात्राएं करते थे। महल, किले, मंदिर, मस्जिदें, स्मारक, राजसी जुलूस, हाथी और शिकार; उन्होंने भारत की पूरी शानो-शौकत को अपने लेंस में समेटने की कोशिश की।
हैदराबाद में उनके कैमरे ने केवल इमारतों की खूबसूरती नहीं दिखाई। उसने रियासती जिंदगी, पहनावे, रस्मों, दरबारों और शाही ठाठ को भी हमेशा के लिए दर्ज कर दिया। आज उनके भारी कैमरे और कांच की नेगेटिव प्लेटें किसी संग्रहालय की वस्तु लग सकती हैं, लेकिन उन तस्वीरों में उन्नीसवीं सदी का भारत आज भी सांस लेता दिखाई देता है।
दीन दयाल की तस्वीरें एक अहम बात सिखाती हैं; बेहतरीन तस्वीर कैमरा नहीं, नजर बनाती है।
ताजमहल इस कहावत को हर रोज सही साबित करता है। फोटोग्राफर के सामने यहां केवल एक इमारत नहीं होती। रोशनी, पानी, आसमान, बादल, पेड़ और छाया मिलकर हर पल नया फ्रेम बनाते हैं।
सुबह की नरम धूप संगमरमर को गुलाबी और सुनहरा कर देती है। दोपहर में उसकी सफेदी तेज चमकती है। शाम ढलते ही ताज किसी पुराने ख्वाब की तरह नजर आता है। पूर्णिमा की रात वही इमारत चांदनी में तैरती हुई लगती है।
यमुना इस दृश्य की खामोश साझेदार है। पानी में ताज का प्रतिबिंब तस्वीर को एक अलग गहराई देता है। धुंध आए तो रहस्य बढ़ जाता है। बादल घिरें तो दृश्य में नाटकीयता उतर आती है। मेहताब बाग से नदी पार का दृश्य हो या मुख्य द्वार से लिया गया क्लासिक फ्रेम, हर कोण अपनी अलग कहानी कहता है।
ताज की तस्वीरों की लोकप्रियता को डायना बेंच ने भी नया आयाम दिया। 1992 में राजकुमारी डायना की यहां खींची गई तस्वीर ने इस जगह को दुनिया के सबसे चर्चित फोटो स्पॉट्स में शामिल कर दिया।
ताजमहल 1983 से यूनेस्को विश्व धरोहर है और 2007 में न्यू सेवन वंडर्स ऑफ द वर्ल्ड में शामिल हुआ। हर साल लाखों पर्यटक आगरा आते हैं। आज लगभग हर हाथ में स्मार्टफोन है। लिहाजा ताज की तस्वीरें अब सिर्फ पेशेवर कैमरों से नहीं, मोबाइल स्क्रीन से भी पैदा होती हैं।
सेल्फी, रील और सोशल मीडिया ने ताज को एक नया डिजिटल जीवन दिया है। कभी फोटोग्राफर घंटों एक सही फ्रेम का इंतजार करता था। आज पर्यटक कुछ सेकंड में दर्जनों तस्वीरें खींच लेते हैं।
फिर भी सवाल अपनी जगह कायम है: लाखों तस्वीरों के बाद भी ताज पुराना क्यों नहीं पड़ता?
शायद इसलिए कि ताज सिर्फ पत्थर का स्मारक नहीं, एहसास का स्मारक है। हर आंख उसे अलग ढंग से देखती है और हर फोटोग्राफर उसमें कोई नया कोण खोज लेता है।
राजा दीन दयाल के भारी कैमरे से लेकर आज के स्मार्टफोन तक तकनीक ने लंबा सफर तय किया है। कैमरा छोटा होता गया, तस्वीर ज्यादा साफ होती गई, शूटिंग आसान होती गई। मगर ताज के सामने खड़ी हैरत आज भी वैसी ही है।
विश्व फोटोग्राफी दिवस पर ताज का पैगाम साफ है; कैमरा छोटा हो सकता है, मगर नजर बड़ी होनी चाहिए।

नई पीढ़ी को भा रही है धर्म की राह: पहले बुढ़ापे में होती थी तीर्थ यात्रा 

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मथुरा (उप्र) : सुबह की ठंडी हवा में घंटियों की आवाज गूंजती है। दूर तक युवाओं के जत्थे दिखाई देते हैं। किसी के कंधे पर कांवर है, कोई नंगे पांव परिक्रमा कर रहा है, तो कोई दोस्तों के साथ भजन गाते हुए पहाड़ चढ़ रहा है। मोबाइल जेब में है, सेल्फी भी चल रही है और भगवान का नाम भी।
यही भारत की नई तीर्थयात्रा है।
धर्म अब केवल बुजुर्गों की चिंता नहीं रहा। आज का युवा मंदिर जा रहा है, परिक्रमा कर रहा है, कांवर उठा रहा है और कठिन यात्राओं में शामिल हो रहा है। मगर उसकी यात्रा का मकसद केवल पूजा नहीं है। इसमें आध्यात्मिक सुकून, सांस्कृतिक पहचान, दोस्ती, रोमांच और घूमने-फिरने का आनंद भी शामिल है।
यानी आस्था और पर्यटन का नया मेल सामने आ रहा है। बीयर के साथ भांग भी!
चारधाम, अमरनाथ, वैष्णो देवी, करौली माता यात्रा, श्री बांके बिहारी, नाथद्वारा दर्शन, सबरीमाला, वृंदावन और गोवर्धन की परिक्रमा में युवाओं की मौजूदगी अब आम बात है। सावन में गंगा जल लेकर शिव मंदिरों की ओर बढ़ते कांवरियों के जत्थों में बड़ी संख्या युवा चेहरों की होती है। लड़कियां भी शामिल हो रहीं हैं। मैसूर, ऋषिकेश के योग केंद्रों में गोरे विदेशियों के साथ भारतीय युवजन भी आस्था और नव_पुरातन संस्कृति में डुबकी लगा रहे हैं!
इसे केवल धार्मिक उत्साह कहकर नजरअंदाज करना आसान होगा। मगर तस्वीर इससे कहीं बड़ी है।
धर्म की ओर क्यों लौट रहा है युवा?
आधुनिक जीवन ने सुविधाएं तो खूब दी हैं, लेकिन सुकून कम कर दिया है। नौकरी का दबाव, प्रतियोगिता, सोशल मीडिया की लगातार हलचल, रिश्तों में दूरी और अकेलापन युवा मन को थका रहे हैं।
ऐसे में मंदिर, आश्रम और तीर्थस्थल एक अलग दुनिया देते हैं। कुछ दिन मोबाइल और दफ्तर से दूरी, सुबह जल्दी उठना, पैदल चलना, भजन सुनना और हजारों लोगों के साथ समय बिताना मन को राहत देता है।
धर्म का यह नया आकर्षण युवाओं की पहचान से भी जुड़ रहा है। अपनी जड़ों, परंपराओं और संस्कृति को करीब से देखने की इच्छा बढ़ी है। सोशल मीडिया ने भी इसे हवा दी है। यात्रा की तस्वीरें, रील और वीडियो दूसरे युवाओं को भी इन रास्तों पर खींच रहे हैं।
एक तरह से धार्मिक यात्रा अब आस्था के साथ अनुभव की यात्रा बन रही है।
तीर्थ या थेरेपी?
लंबी पैदल यात्रा शरीर को सक्रिय रखती है। नियमित दिनचर्या मन को कुछ अनुशासन देती है। सामूहिक भजन और प्रार्थना अकेलेपन को कम कर सकते हैं।
गोवर्धन की 21 किलोमीटर परिक्रमा हो या सबरीमाला की कठिन चढ़ाई, शरीर पसीना बहाता है और मन एक लक्ष्य पर टिकता है। यात्रा पूरी होने के बाद मिलने वाला संतोष कई यात्रियों के लिए खास अनुभव बन जाता है।
कुंभ, माघ मेला और बड़े धार्मिक आयोजनों में भी सामूहिक स्नान, ध्यान, हवन, उपवास और भजन जैसी गतिविधियां लोगों को एक साझा माहौल देती हैं। कई लोगों को ऐसी यात्राओं के बाद मन हल्का और अधिक शांत महसूस होता है।
इसीलिए ‘पिलग्रिमेज थेरेपी’ की बात होने लगी है। हालांकि इसे किसी बीमारी का इलाज मानना सही नहीं होगा। मानसिक बीमारी होने पर डॉक्टर की सलाह और उपचार जरूरी है। लेकिन तनाव और रोजमर्रा की मानसिक थकान से राहत के लिए आध्यात्मिक वातावरण मददगार हो सकता है।

युवाओं की बढ़ती धार्मिक भागीदारी भारतीय समाज में एक बड़े बदलाव का संकेत भी है। धर्म अब निजी पूजा तक सीमित नहीं है। वह पहचान, सामाजिक जुड़ाव और सामूहिक उत्सव का हिस्सा बन रहा है।

कांवर यात्रा इसका बड़ा उदाहरण है। हजारों युवा एक साथ चलते हैं। रास्ते में संगीत है, नारे हैं, भोजन और सेवा शिविर हैं। दोस्ती है और सामूहिक जोश भी है।
इसी तरह वृंदावन और गोवर्धन में युवा भक्ति के साथ यात्रा का आनंद लेते हैं। मंदिर दर्शन के बाद बाजार, स्थानीय भोजन, संगीत और सांस्कृतिक स्थलों का अनुभव भी यात्रा का हिस्सा बन जाता है।
इंस्टा रील बनाने की धुन ने भी इस ट्रेंड को लोकप्रिय बनाया है। सोशल मीडिया पर धर्म, आस्था से जुड़े विडियोज की बाढ़ आ गई है। हर त्यौहार एक महा सेलिब्रेशन, अक्रॉस इंडिया बन चुका है।

तीर्थयात्रा अब बड़ा कारोबार भी है। होटल, धर्मशालाएं, टैक्सी, बसें, फूल, प्रसाद, पूजा सामग्री, स्थानीय भोजन और हस्तशिल्प से हजारों लोगों की रोजी जुड़ी है।
तिरुमला तिरुपति, वैष्णो देवी, शिरडी, काशी, वृंदावन और अयोध्या जैसे केंद्रों ने आसपास की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार दी है। बड़े धार्मिक आयोजनों में रेलवे, परिवहन, होटल और छोटे दुकानदारों को भी फायदा मिलता है।

डिजिटल दुनिया ने इसे और आसान बना दिया है। ऑनलाइन दर्शन, डिजिटल दान, पूजा बुकिंग और धार्मिक ऐप युवाओं को सुविधा दे रहे हैं।
सरकार भी धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रही है। PRASAD जैसी योजनाओं का उद्देश्य तीर्थस्थलों की सुविधाएं और बुनियादी ढांचा बेहतर करना है।
लेकिन विकास का मतलब केवल चमकदार गलियां और बड़े कॉरिडोर नहीं होना चाहिए। साफ पानी, स्वच्छ शौचालय, सस्ता ठहराव, सुरक्षित रास्ते और कचरा प्रबंधन भी उतने ही जरूरी हैं।

बढ़ती धर्मयात्राओं का एक दूसरा पहलू भी है। जब आस्था पर्यटन और बाजार से जुड़ती है, तो खतरा रहता है कि श्रद्धा कहीं केवल कारोबार न बन जाए।
युवाओं को धार्मिक यात्रा में जगह मिलना अच्छी बात है। लेकिन धर्म के नाम पर नफरत, दिखावा और अंधविश्वास बढ़ना चिंता की बात होगी।
तीर्थ का मतलब केवल भीड़ बढ़ाना नहीं है। इसका मतलब मनुष्य को भीतर से बेहतर बनाना भी है।

युवा अगर मंदिर जा रहा है, तो उसे करुणा, सहिष्णुता और सेवा भी सीखनी चाहिए। अगर वह परिक्रमा कर रहा है, तो रास्ते में पड़े कूड़े को देखकर आंखें नहीं मूंदनी चाहिए। अगर वह नदी में स्नान कर रहा है, तो उसी नदी को गंदा करने से भी बचना चाहिए।
यही असली धार्मिकता होगी।
मंदिर तक जाने वाला रास्ता भीतर भी जाता है
भारत में तीर्थयात्रा का पुराना रास्ता फिर जवान हो रहा है। कांवर उठाते कंधे, पहाड़ चढ़ते कदम और परिक्रमा करते युवा इसके गवाह हैं।
आज का युवा शायद मोक्ष की तलाश में नहीं निकला है। वह सुकून खोज रहा है। वह अपनी जड़ों को समझना चाहता है। दोस्तों के साथ यात्रा करना चाहता है। कुछ दिन जिंदगी की भागदौड़ से दूर रहना चाहता है।
और हां, वह घूमना भी चाहता है।
इसलिए नई तीर्थयात्रा में धर्म भी है, पर्यटन भी; आस्था भी है और आनंद भी; शरीर की मेहनत भी है और मन की तलाश भी।
सवाल यह नहीं कि युवा धर्म की ओर क्यों लौट रहा है। बड़ा सवाल यह है कि धर्म उसे किस दिशा में ले जा रहा है।
अगर यह यात्रा उसे अधिक संवेदनशील, स्वस्थ, अनुशासित और सहिष्णु बनाती है, तो शायद तीर्थ सचमुच एक तरह की देसी थेरेपी बन सकता है।
पुरानी कहावत है: चलते रहो, रास्ता खुद रास्ता दिखाएगा।
शायद भारत के ये प्राचीन तीर्थमार्ग आज के युवा को यही रास्ता दिखा रहे हैं; भगवान तक पहुंचने का ही नहीं, बल्कि खुद तक लौटने का भी।

दक्षिण में आज़ादी का जश्न: विजय के संदेश से बदली तमिलनाडु की तस्वीर

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चेन्नई : भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर दक्षिण भारत देशभक्ति के रंग में रंगा नजर आया। तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में तिरंगा फहराया गया, सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए और स्वतंत्रता सेनानियों को याद किया गया।
लेकिन इस बार तमिलनाडु का समारोह खास रहा। वजह थी मुख्यमंत्री और अभिनेता से नेता बने विजय का पहला स्वतंत्रता दिवस संबोधन।
चेन्नई के ऐतिहासिक फोर्ट सेंट जॉर्ज में विजय ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया और परेड की सलामी ली। खुली गाड़ी में परेड का निरीक्षण करते हुए उनका अंदाज किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं लगा। लेकिन असली ध्यान उनके भाषण पर रहा।
विजय ने कहा कि आज की असली आज़ादी केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। भ्रष्टाचार से मुक्ति भी उतनी ही जरूरी है। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी सरकार के ‘मिशन मोड’ में काम करने की बात कही और साफ संदेश दिया कि सुशासन से कोई समझौता नहीं होगा।
उनका संदेश युवाओं पर भी केंद्रित था। विजय ने तमिलनाडु के युवाओं और दुनिया भर में बसे तमिल लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि राज्य के हितों की रक्षा उनकी प्राथमिकता है। जाति और धर्म की दीवारों से ऊपर उठकर समानता और सामाजिक न्याय को असली आज़ादी बताया।
समारोह में अभिनेत्री त्रिशा कृष्णन की मौजूदगी ने भी खूब सुर्खियां बटोरीं। वह विजय के माता-पिता के साथ अग्रिम पंक्ति में बैठी दिखाई दीं। विजय ने उन्हें और अपने माता-पिता को सलाम किया। यह भावुक दृश्य सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ।
तमिलनाडु से बाहर भी स्वतंत्रता दिवस पूरे उत्साह से मनाया गया। केरल में स्कूलों, सरकारी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में ध्वजारोहण तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। राज्य के स्कूलों के लिए जारी निर्देशों में विद्यार्थियों और कर्मचारियों की अधिकतम भागीदारी पर जोर दिया गया।
कर्नाटक में बेंगलुरु सहित विभिन्न शहरों में तिरंगा फहराया गया। विधानसभा और सरकारी इमारतों पर रोशनी की गई तथा देशभक्ति से जुड़े सांस्कृतिक आयोजन हुए। बेंगलुरु का प्रसिद्ध फ्रीडम जैम भी स्वतंत्रता दिवस की संगीत परंपरा का हिस्सा रहा है।
फिर भी दक्षिण के इस पूरे जश्न में तमिलनाडु और विजय सबसे ज्यादा चर्चा में रहे। अभिनेता से मुख्यमंत्री बने विजय के लिए यह केवल रस्मी परेड और भाषण नहीं था। यह उनके राजनीतिक सफर की नई पारी का सार्वजनिक ऐलान भी था।
उनकी भाषा में तमिल अस्मिता, युवा उम्मीद और भ्रष्टाचार के खिलाफ तेवर साफ दिखाई दिए। सवाल अब यही है कि मंच पर दिया गया यह जोशीला पैगाम ज़मीन पर कितनी तेजी से अमल में आता है।
केरल और कर्नाटक में भी 80वें स्वतंत्रता दिवस को देशभक्ति के जोश के साथ मनाया गया। कर्नाटक में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने पहली बार मुख्यमंत्री के रूप में तिरंगा फहराया, बेंगलुरु में विधान सौध के सामने भव्य ‘फ्रीडम हब्बा’ का आयोजन हुआ जिसमें विविध सांस्कृतिक परंपराओं (यक्षगान, गरबा, ढोल-ताशा आदि) की परेड और कार्यक्रम शामिल थे, जबकि उत्तर कर्नाटक समेत विभिन्न जिलों में परेड, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ और उपलब्धि हासिल करने वालों का सम्मान किया गया। केरल में मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने तिरुवनंतपुरम के सेंट्रल स्टेडियम में राष्ट्रीय ध्वज फहराया, जिला स्तर पर परेड और सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए, कोझिकोड में 10,000 आवाजों वाला गायन कार्यक्रम तथा महिलाओं की सुरक्षा को लेकर ‘रिसर्ज’ जैसी पहलें भी हुईं, हालांकि रिपोर्ट्स के मुताबिक, राज्य-स्तरीय समारोह में वंदे मातरम् नहीं गाया गया जिससे राजनीतिक चर्चा भी हुई।

बेरोजगारों की कतार: इनकी फिक्र किसे है?

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दिल्ली । पचास साल पहले बेरोजगार लोग एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज के बाहर खड़े होते थे। आज वे कोचिंग सेंटरों, भर्ती वेबसाइटों और परीक्षा पोर्टलों के सामने खड़े हैं। जगह बदल गई है। इंतजार वही है। जॉब नहीं मिले, एम्प्लॉयमेंट news मिला।

तब कुछ क्लर्कों की नौकरियों के लिए हजारों आवेदन आते थे। आज भी हजारों, अक्सर लाखों, उम्मीदवार कुछ सौ सरकारी पदों के लिए भिड़ते हैं। ग्रेजुएट चपरासी की नौकरी के लिए आवेदन करता है। पोस्ट ग्रेजुएट क्लर्क बनने की दौड़ में शामिल होता है। इंजीनियर ऐसी परीक्षा की तैयारी करता है जिसका उसके ज्ञान से कोई लेना-देना नहीं।

शिक्षा बढ़ी है। रोजगार उतनी तेजी से नहीं बढ़ा। और इन दोनों के बीच भारतीय युवा खड़ा है; एक हाथ में डिग्री और दूसरे में आवेदन-पत्र लेकर।

पुराना रोजगार कार्यालय अब इतिहास बन चुका है। उसकी जगह स्मार्टफोन ने ले ली है। युवा नौकरी पोर्टल पर रजिस्टर करता है, भर्ती ऐप डाउनलोड करता है, रिज्यूमे अपलोड करता है। रिजेक्शन भी अब डिजिटल हो गया है। इसे भी प्रगति ही कहिए।

सरकारी आंकड़ों में बेरोजगारी बेहतर दिखती है। लेकिन औसत आंकड़े बहुत कुछ छिपा लेते हैं। युवाओं में बेरोजगारी कहीं ज्यादा है। पढ़े-लिखे युवाओं के सामने समस्या और भी पेचीदा है।

मामला अब सिर्फ बेरोजगारी का नहीं। कम रोजगार, अधूरा रोजगार और अपनी योग्यता से नीचे का रोजगार भी बड़ा सवाल है। कोई काम कर रहा है, लेकिन कमाई इतनी नहीं कि अपने पैरों पर खड़ा हो सके। कोई नौकरी में है, लेकिन कल की गारंटी नहीं। कोई सालों से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है और परीक्षा बार-बार टल जाती है। भारतीय युवा ने इंतजार करने में शायद पीएचडी कर ली है।

भारत में सरकारी नौकरी का आकर्षण किसी धार्मिक आस्था से कम नहीं। नौकरी पक्की। इज्जत पक्की। छुट्टियां पक्की। भविष्य की चिंता कुछ कम। इसलिए 500 पदों पर लाखों आवेदन आ जाते हैं।

क्योंकि निजी नौकरी सिर्फ रोजगार देती है। सरकारी नौकरी रोजगार के साथ प्रतिष्ठा भी देती है। माता-पिता आज भी कहते हैं: “पहले सरकारी नौकरी की कोशिश करो।” मानो नियुक्ति-पत्र खानदानी विरासत हो।

युवा मामूली निजी नौकरी छोड़कर सरकारी परीक्षा की तैयारी में कई साल लगा देता है। उम्र बढ़ती है। प्रयास खत्म होते जाते हैं। एक दिन नौकरी की तैयारी ही उसका सबसे स्थायी रोजगार बन जाती है।

भारत ने करोड़ों पढ़े-लिखे युवाओं की फौज तैयार की है। डिग्रियां बढ़ीं। कॉलेज बढ़े। कोचिंग सेंटर और तेजी से बढ़े। हर कोई यूपीएससी, एसएससी, बैंकिंग, रेलवे, पुलिस या शिक्षक भर्ती की तैयारी कर रहा है।कई उम्मीदवार वर्षों लगा देते हैं ऐसी परीक्षाओं में, जहां पद ऊंट के मुंह में जीरा हैं।
कोचिंग उद्योग ने शानदार मॉडल खोज लिया है: उम्मीद मत छोड़िए। फेल हुए? “अगली बार कोशिश कीजिए।” फिर फेल? “रणनीति बदलिए।” फिर भी फेल? “सफलता बस आने वाली है।” सफलता जरूर आती है; अक्सर कोचिंग बेचने वाले की।
डिग्री नौकरी नहीं है। शिक्षा व्यवस्था की बड़ी विडंबना यह है कि उसने युवाओं को परीक्षा पास करना सिखाया है, समस्या हल करना नहीं। बच्चा परिभाषाएं याद करता है, उत्तर रटता है, प्रमाणपत्र जमा करता है। फिर कंपनी पूछती है: “आप बात कर सकते हैं? टीम के साथ काम कर सकते हैं? व्यावहारिक समस्या हल कर सकते हैं?”
सन्नाटा।

फिर गिग इकोनॉमी आई। कहा गया,मोबाइल उठाइए और डिलीवरी कीजिए, गाड़ी चलाइए, फ्रीलांस कीजिए। खूबी है लचीलापन। दिक्कत यह है कि लचीली आमदनी इतनी लचीली होती है कि अगले महीने का भरोसा नहीं रहता।

तकनीक ने नए अवसर पैदा किए हैं। उसने असुरक्षित रोजगार के लिए नई शब्दावली भी दी है। पहले अस्थायी या दिहाड़ी कहते थे। अब “गिग वर्क” कहते हैं। नाम आधुनिक हो गया। अनिश्चितता उतनी नहीं।

जब युवा नौकरियों के लिए संघर्ष सीख ही रहा था, एआई मैदान में उतर आया। नई नौकरियां पैदा करेगा, उत्पादकता बढ़ाएगा। लेकिन कई दोहराव वाले काम भी निगल सकता है।युवा अक्सर पहली सीढ़ी से शुरुआत करता है। वहीं अनुभव मिलता है। अगर एआई ने पहली सीढ़ी हटा दी तो ऊपर कौन पहुंचेगा?
कल के युवा को डिग्री, कौशल और एआई को सही आदेश देने की कला; तीनों चाहिए।

रोजगार की कहानी महिलाओं के बिना अधूरी है। शिक्षा और भागीदारी बढ़ी है, फिर भी बड़ा अंतर बना हुआ है। बाधाएं पुरानी हैं, बिना वेतन वाला घर का काम, सुरक्षा, बच्चों की देखभाल, सामाजिक दबाव।
विडंबना देखिए। हम कहते हैं: लड़कियों को पढ़ाओ। फिर पूछते हैं; नौकरी क्यों करनी है? हम कहते हैं; आत्मनिर्भर बनाओ। फिर पूछते हैं; घर कौन संभालेगा।

रोजगार योजनाओं की कमी नहीं: कौशल विकास, स्वरोजगार, उद्यमिता, अप्रेंटिसशिप, ग्रामीण रोजगार, ऋण, प्रशिक्षण, पोर्टल। कभी-कभी लगता है हर चीज के लिए योजना है, बस उसे सफल बनाने की योजना नहीं।
असली सवाल सीधा होना चाहिए: कितने लोगों को अच्छी नौकरी मिली? प्रशिक्षण और प्रमाणपत्र नहीं। स्थायी और सम्मानजनक रोजगार गिनिए। वहीं असली हिसाब होगा।

ग्रामीण बेरोजगारी ने रूप बदल लिया है। खेती सबको रोजगार नहीं दे सकती। युवा गांव छोड़कर शहर जा रहे हैं। सपने लेकर आते हैं। शहर किराया और ट्रैफिक का बिल थमा देता है।

प्रवास बुरा नहीं। मजबूरी में किया गया पलायन अलग बात है। युवा शहर इसलिए जाए कि वहां अवसर हैं; इसलिए नहीं कि गांव में कुछ बचा ही नहीं है। अगर गांव युवाओं को खो दें और शहर सम्मानजनक काम न दे पाएं, तो दोनों जगह हार होगी।

सरकारें योजनाएं घोषित करती हैं। विश्वविद्यालय डिग्रियां बांटते हैं। कंपनियां कौशल मांगती हैं। कोचिंग सेंटर उम्मीद बेचते हैं। माता-पिता फीस भरते हैं। युवा आवेदन करता रहता है।

भारत को एक और नारा नहीं, ईमानदार रोजगार नीति चाहिए। श्रम-प्रधान उद्योग बढ़ाने होंगे। अप्रेंटिसशिप मजबूत करनी होगी। व्यावसायिक शिक्षा बेहतर बनानी होगी। छोटे कारोबार को बढ़ने देना होगा। महिलाओं के लिए सुरक्षित रोजगार बढ़ाने होंगे।

सबसे जरूरी, प्रशिक्षण की संख्या नहीं, नौकरी की संख्या गिननी होगी। प्रमाणपत्र से किराया नहीं भरता। पोर्टल से घर नहीं चलता।

नौकरी मांगने वाला युवा बहुत बड़ी मांग नहीं कर रहा। वह चाहता है: एक काम, उचित वेतन और थोड़ी इज्जत।

कतार अब डिजिटल हो गई है। आवेदन एक क्लिक में चला जाता है। रिज्यूमे एआई बना देता है। लेकिन सवाल आज भी इंसानी है; जब एक पढ़ा-लिखा भारतीय युवा नौकरी मांगते हुए दरवाजे पर दस्तक देता है, तो दरवाजा खोलने की जिम्मेदारी किसकी है? और अगर कोई दरवाजा नहीं खोलता, तो वह दस्तक कब तक देता रहेगा?

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