स्क्रिप्टेड जोक्स और विवाद बनाम सिनेमाई आत्मा – IFFD 2026 ने क्यों मात दी Chetak Awards को

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दिल्ली में International Film Festival Delhi (IFFD) 2026 ने Chetak Screen Awards 2026 की तुलना में सिनेमाई उत्सव की सच्ची भावना, सांस्कृतिक गहराई और दर्शक-केंद्रित अनुभव प्रदान किया। यह तुलना केवल सतही चमक या स्टार पावर पर नहीं, बल्कि आयोजन के उद्देश्य, निष्पादन, प्रभाव और सिनेमाई मूल्यों पर आधारित है। Chetak Screen Awards मुख्य रूप से एक ग्लैमरस अवार्ड शो था, जो मुंबई में 5 अप्रैल 2026 को आयोजित हुआ, जबकि IFFD 25 से 31 मार्च 2026 तक दिल्ली के भारत मंडपम में चला। दोनों ही घटनाओं में सितारे मौजूद थे, लेकिन IFFD ने फिल्म महोत्सव की गरिमा बनाए रखी, जबकि Chetak Screen Awards स्क्रिप्टेड कॉमेडी, विवाद और सतही तमाशे में उलझ गया।

सबसे पहले, उद्देश्य और फोकस में स्पष्ट अंतर है। IFFD एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव था, जिसका मुख्य लक्ष्य विश्व सिनेमा को दिल्ली की जनता तक पहुंचाना, सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना और दिल्ली को ग्लोबल सिनेमा हब बनाना था। इसमें 125 से अधिक फिल्में 47 देशों से दिखाई गईं, जिनमें ओस्कर-नॉमिनेटेड ‘सिरात’ (Sirât) उद्घाटन फिल्म के रूप में शामिल थी। महोत्सव में पॉलिसी डायलॉग, इंडस्ट्री इवेंट्स और पब्लिक स्क्रीनिंग्स शामिल थीं, जो सिनेमाई चर्चा और नई पीढ़ी के फिल्मकारों को प्रोत्साहित करती थीं। लगभग 30,000 से अधिक रजिस्ट्रेशन्स और 2,187 एंट्रीज (100+ देशों से) ने इसकी वैश्विक अपील साबित की।

दूसरी ओर, Chetak Screen Awards (The Indian Express ग्रुप द्वारा) मुख्य रूप से भारतीय सिनेमा के ‘बेस्ट’ को सम्मानित करने वाला अवार्ड शो था। इसमें ‘Homebound’ को बेस्ट फिल्म, ‘Dhurandhar’ को 14 अवार्ड्स (Aditya Dhar बेस्ट डायरेक्टर) जैसे परिणाम आए, लेकिन यह शो ग्लैमर, रेड कार्पेट और होस्ट्स (Alia Bhatt, Sunil Grover, Zakir Khan, Saurabh Dwivedi) पर केंद्रित रहा। अवार्ड शो अक्सर इंडस्ट्री की सेलिब्रेशन होते हैं, लेकिन इस बार यह स्क्रिप्टेड जोक्स और सस्ते चुटकुलों तक सीमित हो गया। बड़े कलाकारों की मौजूदगी (जैसे Vicky Kaushal, Bhumi Pednekar आदि) ने चमक जरूर दी, लेकिन सिनेमाई गहराई की कमी महसूस हुई।

दूसरा प्रमुख अंतर निष्पादन और प्रोडक्शन क्वालिटी में है। IFFD के उद्घाटन समारोह में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने उद्घाटन किया, हेमामालिनी, शर्मिला टैगोर, कंगना रानौत, अर्जुन कपूर, Nimrat Kaur, Vicky Kaushal, Bhumi Pednekar जैसी हस्तियां मौजूद रहीं। मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रम और ऑडियो-विजुअल प्रस्तुति ने भारतीय सिनेमा की यात्रा दिखाई। कुल मिलाकर यह फिल्म-केंद्रित रहा। दर्शक फिल्में देखने आए थे, न कि सिर्फ तमाशा देखने। महोत्सव पूरे सप्ताह चला, जिसमें मल्टीपल स्क्रीनिंग्स, चर्चाएं और सिनेमाई अनुभव थे।

Chetak Screen Awards में स्क्रिप्ट और प्रस्तुति औसत से नीचे रही। होस्ट्स ने सस्ते चुटकुलों पर भरोसा किया, जिसका चरम Saurabh Dwivedi द्वारा Rajpal Yadav पर की गई टिप्पणी थी। Rajpal के हालिया चेक बाउंस केस का जिक्र करते हुए Saurabh ने कहा, “Rajpal bhai, dollar kitna bhi upar-neeche ho jaye, aapko utne hi paise lautane padenge…” यह जोक विवादास्पद बना, सोशल मीडिया पर आलोचना हुई, Salman Khan ने Rajpal का समर्थन किया, और बाद में Rajpal ने खुद होस्ट्स को ‘भाई’ कहकर विवाद शांत किया। इसे स्क्रिप्ट का हिस्सा बताया गया, लेकिन इससे साबित हुआ कि अवार्ड शो में भी ‘एक्टिंग’ चल रही है-फिल्मों में जो एक्टिंग चलती है, वही यहां कॉमेडी के नाम पर। दर्शक अब ऐसे शोज में थोड़ा ‘तमाशा एलिमेंट’ की उम्मीद करने लगे हैं, क्योंकि सोशल मीडिया पर स्टैंडअप कॉमेडी पहले से भरपूर है।

तीसरा, दर्शक प्रभाव और स्मरणीयता। IFFD ने दिल्ली को सिनेमाई उत्सव में बदल दिया। यह शहर-व्यापी अनुभव था, जो जनता को विश्व सिनेमा से जोड़ता था। लोग फिल्में देख रहे थे, फिल्मकारों से मिल रहे थे, और सिनेमाई संस्कृति का हिस्सा बन रहे थे। उद्घाटन में लाल कालीन बिछाई गई, लेकिन फोकस फिल्म पर था—’सिरात’ जैसी अंतरराष्ट्रीय फिल्म से शुरूआत ने स्तर ऊंचा रखा। महोत्सव ने दिल्ली की सिनेमाई विरासत को फिर से जीवंत किया, जो 70-80 के दशक में विश्व सिनेमा का केंद्र था।

Chetak Screen Awards के विपरीत, अब इन अवार्ड्स से आम लोगों को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। आस-पास सर्वे करें तो ज्यादातर लोग नहीं जानते कि इस बार किस फिल्म या कलाकार को क्या मिला। ‘Homebound’ बेस्ट फिल्म बनी, Dhurandhar ने सबसे ज्यादा अवार्ड्स झटके, लेकिन यह खबर रेड कार्पेट ग्लैम और विवाद तक सीमित रही। पुराने जमाने की तरह बिनाका गीतमाला के टॉप-3 गाने याद रखने वाली पब्लिक अब अवार्ड विनर्स याद नहीं रखती। क्योंकि ये शोज अब इंडस्ट्री की सेल्फ-कॉन्ग्रेचुलेशन बन गए हैं, न कि पब्लिक सेलिब्रेशन।

चौथा, सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्य। IFFD ने सिनेमा को कला के रूप में मनाया-विविधता, कहानियां, और वैश्विक संवाद पर जोर दिया। यह सरकारी समर्थन (DTTDC और दिल्ली सरकार) से हुआ, जो दिल्ली को सांस्कृतिक हब बनाने की दिशा में कदम था। तकनीकी खामियों के बावजूद, इसका उद्देश्य शुद्ध था: फिल्म प्रेमियों को जोड़ना।

Chetak Screen Awards ने बड़े कलाकारों को जुटाकर और कॉमेडी जोड़कर हिट बनाने की कोशिश की, लेकिन यह सतही लगा। Rajpal Yadav वाला विवाद आयोजकों की तरफ से ही स्क्रिप्टेड था, जो जल्दी हवा निकल गया। अवार्ड शोज अब अक्सर ‘पंचिंग डाउन’ या व्यक्तिगत जोक्स पर निर्भर होते हैं, जो एम्पैथी की कमी दिखाते हैं। जबकि IFFD ने सिनेमाई यात्रा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से भावनात्मक जुड़ाव पैदा किया।

अंत में, समग्र प्रभाव। IFFD ने दिल्ली में सिनेमा का जादू बिखेरा, भले ही उद्घाटन पूरी तरह परफेक्ट न रहा हो। यह महोत्सव था, जो सप्ताह भर चला और हजारों लोगों को प्रभावित किया। Chetak Screen Awards एक शाम का इवेंट था, जो ग्लैमर और विवाद में खो गया। अवार्ड शोज उपयोगी हैं, लेकिन जब वे स्क्रिप्टेड तमाशे बन जाते हैं, तो उनकी विश्वसनीयता कम हो जाती है। IFFD ने साबित किया कि सच्चा फिल्म उत्सव स्टार पावर से नहीं, बल्कि फिल्मों, चर्चाओं और जनता से बनता है।

इस तुलना से स्पष्ट है कि IFFD 2026 ने Chetak Screen Awards को तार्किक रूप से पीछे छोड़ दिया—क्योंकि यह सिनेमा की आत्मा को छूता था, न कि सिर्फ सतह को चमकाता था। दिल्ली के लिए यह एक नई शुरुआत थी, जबकि अवार्ड शो पुरानी फॉर्मूला पर अटका रहा। सिनेमाई प्रेमी अब ऐसे आयोजनों की उम्मीद करते हैं जो मनोरंजन के साथ-साथ प्रेरणा भी दें। IFFD ने वह दिया, Chetak Screen Awards नहीं।

सबरीमाला : घंटियों की गूँज से संविधान तक, आओ करें हिंदू जीवन का विराट संवाद

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– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । सुबह का वह क्षण याद कीजिए, जब किसी मंदिर की घंटी की ध्वनि वातावरण को चीरते हुए सीधे हृदय तक पहुँचती है। उस ध्वनि में पीढ़ियों की आस्था, श्रद्धा और भक्ति का संचित स्पंदन होता है। एक हिंदू जीवन की शुरुआत प्राय: मंदिर से होती है, जन्‍म लेने के पूर्व गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन यानी इस संपूर्ण तीन भाग के ‘गर्भ संस्कार’ के दौरान गर्भ में पल रहे शिशु के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के साथ-साथ माता की प्रसन्नता के लिए देवताओं से प्रार्थना की जाती है और तभी एक जन्‍म लेनेवाले जीवात्‍मा के जीवन में उसके अस्‍तित्‍व के साथ ही मंदिर प्रवेश कर जाता है।

उसके बाद मंदिर की यात्रा जैसे घर के छोटे से पूजा-स्थल से लेकर विशाल तीर्थों तक संपूर्ण जीवन भर हमें जुड़ी हुई दिखाई देती है, इतना ही नहीं देह छोड़ देने के बाद भी मंदिर का अस्‍तित्‍व रहता है, स्‍मृतियों में पुरखों के रूप में, पितर बनकर जीवात्‍मा अपने अस्‍तित्‍व को सदियों तक बनाए रखती है।

जीवन में यही मंदिर जीवन के संघर्षों में सहारा बनते हैं, तो उत्सवों में उल्लास का केंद्र भी। ऐसे ही आध्यात्मिक अनुभवों का चरम रूप है केरल के घने वनों में स्थित सबरीमाला मंदिर, जोकि आज श्रद्धा केंद्र होने के साथ ही इन दिनों देश के बौद्धिक और संवैधानिक विमर्श का भी केंद्र बना हुआ है। उच्‍चतम न्‍यायालय में चल रही बहस ने इसे आस्था और अधिकार के संगम पर खड़ा कर दिया है।

प्रश्‍न बार-बार सहज रूप से उमड़ रहा है, आखिर हिंदू जीवन में मंदिर क्‍या सिर्फ पूजा का स्थान है? हर बार एक ही उत्‍तर सामने आ रहा है, इससे भी कहीं अधिक गहरा है ये मंदिर! जीवन का आधार है। यह वह स्थान है जहाँ व्यक्ति अपने भीतर के शोर को शांत कर, चेतना के स्‍तर पर आत्मा की आवाज सुनता है, इसीलिए ही सनातन परंपरा में जन्म से लेकर मृत्यु तक हर संस्कार मंदिर से जुड़ा है।

मंदिर मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन का माध्यम है। इसमें वैज्ञानिकता भी है, आध्‍यात्‍म भी, धर्म भी है और विचार भी, श्रद्धा भी है तो भक्‍ति भी। वस्‍तुत: वैज्ञानिक दृष्टि कहती है कि मंदिरों की संरचना इस प्रकार की जाती है कि वहाँ ऊर्जा सकारात्मक रहे। घंटियों की ध्वनि, मंत्रोच्चार और धूप-दीप का वातावरण मस्तिष्क को शांति प्रदान करता है। यही कारण है कि मंदिर से लौटते समय व्यक्ति स्वयं को हल्का और संतुलित महसूस करता है।

जिसमें कि मंदिर के साथ जुड़ी श्रद्धा वह अदृश्य शक्ति है जोकि मनुष्य को असंभव को संभव करने की प्रेरणा देती है। भक्ति उस श्रद्धा का सजीव रूप है, जोकि कर्म और भावना में प्रकट होती है। जब एक भक्त मंदिर में माथा टेकता है, तब वह अपने अहंकार को त्यागकर एक उच्चतर शक्ति को स्वीकार कर रहा होता है। यह प्रक्रिया व्यक्ति के भीतर विनम्रता और संतुलन पैदा करती है। यही कारण है कि कठिन परिस्थितियों में भी श्रद्धालु व्यक्ति टूटता नहीं है, वह और अधिक मजबूत होकर उभरता है।

सबरीमाला, तपस्या, अनुशासन और आस्था का संगम है

सबरीमाला मंदिर की परंपरा अन्य मंदिरों से भिन्न है। यहाँ भगवान अय्यप्पा को एक तपस्वी ब्रह्मचारी के रूप में पूजा जाता है, इसीलिए यहाँ आने वाले भक्तों के लिए 41 दिनों का कठोर व्रत, संयम और ब्रह्मचर्य अनिवार्य माना गया है। यह यात्रा संपूर्ण हिन्‍दू भक्‍ति परंपरा में धार्मिक अनुष्ठान होने के साथ ही सबसे अधिक जरूरी आत्मानुशासन की परीक्षा है। जंगलों से होकर कठिन मार्ग तय करना, सादा जीवन जीना और सामूहिक भक्ति में शामिल होना, वस्‍तुत: यह सभी तत्व मिलकर एक ऐसा अनुभव रचते हैं, जिसमें व्यक्ति को संपूर्णता के साथ भीतर से बदल देने का सामर्थ्‍य होता है।

न्यायालय की बहस: आस्था बनाम समानता

ऐसे में जब उच्‍चतम न्‍यायालय ने 2018 में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमाला में प्रवेश की अनुमति दी, तब यह निर्णय लगा कि एक तरफा हो गया है, समानता के सिद्धांत पर इसे आरूढ़ तो किया गया, किंतु इसके मर्म को शायद गहराई से नहीं समझा गया! परंतु इसके बाद यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि क्या हर धार्मिक परंपरा को एक ही संवैधानिक मानक से परखा जा सकता है?

अब एक बार फिर इस मंदिर की परंपरा को लेकर न्‍यायालय में बहस चल रही है, केंद्र सरकार की ओर से तुषार मेहता लगातार अपने तर्क रख रहे हैं, वे बता रहे हैं कि भारत में कई मंदिरों में विशिष्ट परंपराएँ हैं, जो उनकी आस्था का अभिन्न हिस्सा हैं। इस संदर्भ में ब्रह्मा मंदिर पुष्कर, कामाख्या देवी मंदिर और कोट्टनकुलंगारा देवी मंदिर जैसे उदाहरण दिए गए, जहाँ अलग-अलग नियम प्रचलित हैं।

विविधता ही है हिंदू धर्म की सबसे बड़ी शक्ति

हिंदू धर्म किसी एकरूपता का आग्रह नहीं करता। यहाँ हर मंदिर, हर परंपरा और हर पूजा पद्धति का अपना विशिष्ट महत्व (वैशिष्‍ट्य) है। यही कारण है कि कहीं केवल महिलाएँ पूजा करती हैं, तो कहीं पुरुषों को विशेष वेशभूषा धारण करनी होती है। वस्‍तुत: यह विविधता यह दर्शाती है कि हिंदू धर्म एक जीवंत परंपरा है, जोकि समय और परिस्थितियों के साथ विकसित होती रही है। यह किसी एक नियम में बंधा हुआ धर्म नहीं, य‍ह तो अनुभव और आस्था का विस्तृत महासागर है।

काश; इस बात को और मंदिर की गहराई एवं उसके संदेश को न्‍यायालय और उसके बाहर सभी समझें! “सबरीमाला मंदिर” पर विवाद व्‍यर्थ है, क्‍योंकि हिंदू धर्म की महानता ही इसी में है कि यह विविधता को स्वीकार करता है, संवाद को महत्व देता है और हर व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुसार जीने की स्वतंत्रता देता है। मंदिर से जुड़ी श्रद्धा और भक्ति जीवन को दिशा देने वाले तत्व हैं।

एक भक्त के लिए मंदिर एक अनुभव है। जब वह कठिन यात्रा करके सबरीमाला पहुँचता है, तब उसकी आँखों में सिर्फ अपने आराध्‍य के दर्शन की इच्छा होने के साथ ही गहरा संतुष्टि का भाव भी होता है। निश्‍चित ही यह अनुभव शब्दों से परे है; यह वह क्षण है जब मनुष्य स्वयं को ईश्वर के निकट महसूस करता है, उसकी चेतना बोल उठती है, प्रज्ञानं ब्रह्म- “चेतना ही ब्रह्म है।” अहं ब्रह्मास्मि- “मैं ब्रह्म हूँ।” तत्‍वमसि- “तुम वही हो” (वह तुम हो) और अयमात्मा ब्रह्म- “यह आत्मा ही ब्रह्म है।” ‘शिवोहम शिवोहम’- “मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।” वस्‍तुत: यही आस्था की वास्तविक शक्ति है…जो भारत में है, जो भारत से सर्वत्र व्‍याप्‍त है…

ज्ञान, शोध और ‘सिमिलैरिटी’ का युग: एक बौद्धिक विडंबना

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डॉ. अमलेश पांडेय

दिल्ली। ज्ञान का यह नया युग सचमुच विचित्र है—इतना विचित्र कि यहाँ विचार की मौलिकता से अधिक मूल्य “सिमिलैरिटी इंडेक्स” का हो गया है। एक समय था जब शोध का अर्थ था—अज्ञात को जानने की जिज्ञासा, सत्य की खोज, और ज्ञान के विस्तार का संकल्प। पर आज अनेक स्थानों पर यह प्रक्रिया एक तकनीकी औपचारिकता में बदलती दिखाई देती है, जहाँ सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं रह गई कि आपने क्या नया सोचा, बल्कि यह हो गई है कि आपकी थीसिस में “plagiarism report” 10% से नीचे कैसे लाई जाए।
शोध की आत्मा बनाम तकनीकी औपचारिकता

शोध की मूल आत्मा जिज्ञासा है। यह वह आंतरिक बेचैनी है जो किसी व्यक्ति को प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करती है—“क्यों?”, “कैसे?”, “क्या यह और बेहतर हो सकता है?”। किंतु वर्तमान समय में यह जिज्ञासा कई बार “paraphrasing tools” और “AI rewriters” के शोर में दब जाती है। शोधार्थी अब विचारों के स्रोत नहीं खोजता, बल्कि ऐसे साधनों की तलाश करता है जो पहले से उपलब्ध सामग्री को इस प्रकार बदल दें कि वह मौलिक प्रतीत हो।

यहाँ सबसे चिंताजनक बात केवल शोधार्थियों का व्यवहार नहीं है, बल्कि वह मौन स्वीकृति भी है जो कभी-कभी मार्गदर्शकों और संस्थानों की ओर से मिलती है। जब यह कहा जाता है कि “बस similarity कम कर दो, ज्ञान बाद में देख लेंगे”, तब यह केवल एक सलाह नहीं, बल्कि एक पूरी बौद्धिक संस्कृति के पतन का संकेत बन जाता है।

‘डिग्री प्रबंधन’ की उभरती संस्कृति

धीरे-धीरे विश्वविद्यालयों में एक नई संस्कृति आकार ले रही है—जहाँ शोध कम और “डिग्री प्रबंधन” अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें उद्देश्य ज्ञान का सृजन नहीं, बल्कि औपचारिकताओं को पूरा कर एक प्रमाणपत्र प्राप्त करना होता है।

जब किसी विश्वविद्यालय में बड़ी संख्या में थीसिस में समानता पाई जाती है, तो यह केवल एक सांख्यिकीय समस्या नहीं है। यह उस गहरे संकट का लक्षण है जिसमें शोध की प्रक्रिया अपनी आत्मा खो चुकी है। असली प्रश्न यह नहीं है कि similarity 20% है या 40%—असल प्रश्न यह है कि क्या शोध अब भी जिज्ञासा से उत्पन्न होता है, या केवल डिग्री की आवश्यकता से?

परंपरा से विचलन: तप से तकनीक तक

भारतीय ज्ञान परंपरा में शोध को तपस्या के समान माना गया है। यह एक लंबी, धैर्यपूर्ण और ईमानदार प्रक्रिया थी जिसमें शोधार्थी अपने विषय के साथ जीता था, उसे अनुभव करता था और अंततः उसमें कुछ नया जोड़ता था।

आज, कई मामलों में यह तपस्या “डाटा संकलन + paraphrasing + formatting” के एक यांत्रिक क्रम में बदलती जा रही है। ज्ञान की जगह “PDF” तैयार हो रही हैं—ऐसी PDF जो देखने में शोध लगती हैं, पर जिनमें विचारों की गहराई का अभाव होता है।

मशीन और मनुष्य: एक उलटती हुई भूमिका

सबसे गहरी विडंबना यह है कि जिस समय मशीनें मानव-सदृश लेखन सीख रही हैं, उसी समय मनुष्य मशीनों की तरह कॉपी-पेस्ट करने में अधिक दक्ष होता जा रहा है। यह एक विचित्र उलटाव है—

पहले मनुष्य सोचता था, मशीन गणना करती थी

अब मशीन लिखने लगी है, और मनुष्य “संपादन” करने लगा है

यह स्थिति केवल तकनीकी परिवर्तन का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उस बौद्धिक आलस्य का भी द्योतक है जो धीरे-धीरे हमारी शैक्षणिक संस्कृति में प्रवेश कर रहा है।
ज्ञान का भविष्य: संग्रह या सृजन?

यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो भविष्य में विश्वविद्यालयों की लाइब्रेरियाँ हजारों थीसिस से भर जाएँगी—पर वे थीसिस ज्ञान का भंडार नहीं होंगी, बल्कि एल्गोरिद्म की गूँज मात्र बनकर रह जाएँगी। वे पढ़ी नहीं जाएँगी, केवल संग्रहित रहेंगी।

इतिहास शायद यह दर्ज करेगा कि एक समय ऐसा भी आया जब मनुष्य के पास सूचना की कोई कमी नहीं थी, परंतु मौलिक विचारों का अभाव हो गया था। ज्ञान का उत्पादन तो हुआ, पर ज्ञान का सृजन नहीं।

समाधान की दिशा: पुनः जिज्ञासा की ओर

इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए केवल तकनीकी नियमों को सख्त करना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यकता है—

शोध के उद्देश्य को पुनः परिभाषित करने की

मार्गदर्शकों की भूमिका को अधिक उत्तरदायी बनाने की

शोधार्थियों में जिज्ञासा और आलोचनात्मक सोच को प्रोत्साहित करने की

मूल्यांकन प्रणाली को केवल “similarity index” से आगे ले जाने की

जब तक हम शोध को केवल एक औपचारिक प्रक्रिया मानते रहेंगे, तब तक यह संकट बना रहेगा। पर यदि हम इसे फिर से एक बौद्धिक यात्रा के रूप में देखना शुरू करें—जहाँ प्रश्न पूछना, संदेह करना और नया सोचना सबसे बड़ा मूल्य हो—तभी वास्तविक परिवर्तन संभव है।

अंततः, प्रश्न यह नहीं है कि तकनीक हमारे शोध को कैसे प्रभावित कर रही है; प्रश्न यह है कि हम तकनीक का उपयोग किस उद्देश्य से कर रहे हैं। यदि उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना है, तो शोध एक औपचारिकता बन जाएगा। पर यदि उद्देश्य ज्ञान की खोज है, तो वही तकनीक एक शक्तिशाली साधन बन सकती है।

शायद अभी भी समय है यह तय करने का कि हम “थीसिस” बनाना चाहते हैं या “ज्ञान”।

आइए, हम मिलकर भारत की नारी शक्ति को सशक्त करें।

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नरेन्द्र मोदी

दिल्ली । यह क्षण इसलिए भी विशेष है, क्योंकि यह ऐसे समय में आ रहा है जब देश का वातावरण उत्सव, नवीनता और सकारात्मकता से भरा हुआ है। आने वाले दिनों में भारत के अलग अलग हिस्सों में अनेक पर्व मनाए जाएंगे। असम के लोग रोंगाली बिहू मनाने वाले हैं, और ओडिशा में महा बिशुबा पणा संक्रांति का उत्सव मनाया जाएगा। पश्चिम बंगाल में पोइला बैशाख के साथ बंगाली नववर्ष की शुरुआत होगी। केरलम में विषु पूरे उत्साह के साथ मनाया जाएगा। तमिलनाडु के लोग उत्सुकता से पुथांडु की प्रतीक्षा कर रहे हैं, तो पंजाब और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में लोगों को बैसाखी के पर्व का इंतजार है।

हमारे ये पावन पर्व हर किसी में एक नई आशा का संचार करने वाले हैं। भारत के साथ-साथ दुनियाभर में इन त्योहारों को मनाने वाले सभी लोगों को मैं हृदय से शुभकामनाएं देता हूं। मैं ये कामना करता हूं कि ये दिव्य और पावन अवसर हम सभी के जीवन में सुख-समृद्धि लेकर आएं।इसी दौरान 11 अप्रैल से महात्मा फुले की 200वीं जयंती के समारोह भी शुरू होंगे। 14 अप्रैल को हम भारतवासी डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की जयंती मनाएंगे। ये दोनों तिथियां हमें सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा के उन मूल्यों की भी याद दिलाती हैं, जिन्होंने आधुनिक होते भारत की दिशा तय की हैं।

इन्हीं प्रेरणादायी अवसरों के बीच, 16 अप्रैल को संसद की ऐतिहासिक बैठक होगी। महिला आरक्षण को लागू करने से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयक पर चर्चा के बाद उसे पारित कराने के लिए विशेष सत्र बुलाया गया है। इसे सिर्फ एक विधायी प्रक्रिया कहना इसके महत्व को कम करके आंकना होगा। यह भारतवर्ष की करोड़ों महिलाओं की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है।हमारी नारीशक्ति देश की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने राष्ट्र निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया है। आज देश के हर सेक्टर में नारीशक्ति मिसाल बन रही है। साइंस एंड टेक्नोलॉजी से लेकर एंटरप्रेन्योरशिप तक, खेल के मैदान से लेकर सशस्त्र बलों तक और संगीत से लेकर कला के क्षेत्र में महिलाएं अपनी सशक्त पहचान बना रही हैं। हमारी माताएं-बहनें और बेटियां देश की प्रगति में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं।

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