मस्क के स्टारलिंक पर भारत की हिचकिचाहट

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बेंगलूरु: यूक्रेन ने साबित कर दिया है कि एक विदेशी निजी कंपनी के सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है। युद्ध के बीच स्टारलिंक की सेवा पर अचानक पाबंदी से यूक्रेन के सैन्य संचार और ड्रोन अभियान बाधित हुए। भारत का संयम दुश्मनी नहीं, बल्कि संप्रभुता, आत्मनिर्भरता और सीमांत सुरक्षा की अनिवार्य शर्त है।
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क्या भारत को एलन मस्क के लिए अपने दरवाजे बिना सोचे-समझे खोल देने चाहिए? क्या तेज इंटरनेट की चमक-दमक में हम अपनी हिफाजत, सरहदों की सुरक्षा और मुल्क की खुदमुख्तारी को दांव पर लगा सकते हैं? और अगर कल किसी जंग के दौरान कोई विदेशी कंपनी हमारी संचार व्यवस्था पर पाबंदी लगा दे, तो हम क्या करेंगे?
ये सवाल आज इसलिए अहम हो गए हैं, क्योंकि यूक्रेन में हाल की घटनाओं ने दुनिया को एक कड़ा सबक दिया है। भारत में स्टारलिंक को मंजूरी देने में सरकार की देरी और एहतियात पर सवाल उठाने वालों को अब समझना चाहिए कि हर देरी नाकामी नहीं होती। कभी-कभी जल्दबाजी से बचना ही सबसे बड़ी समझदारी होती है।

एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स का स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट आज की दुनिया की एक बड़ी तकनीकी कामयाबी है। आसमान में धरती के करीब चक्कर लगाने वाले हजारों छोटे उपग्रहों की मदद से दूर-दराज के इलाकों में भी इंटरनेट पहुंचाया जा सकता है। जहां मोबाइल नेटवर्क नहीं पहुंचता, वहां भी इसकी मदद से संपर्क कायम रखा जा सकता है।

यूरोपीय मामलों के जानकार प्रोफेसर पी एन चौधरी के मुताबिक, “यूक्रेन की जंग में स्टारलिंक ने बड़ी भूमिका निभाई है। रूसी हमलों के बीच यूक्रेनी सेना ने इसका इस्तेमाल सैनिकों के बीच संपर्क, रसद और ड्रोन चलाने के लिए किया। लेकिन अब इसी निर्भरता ने एक नई चिंता पैदा कर दी है।

अक्टूबर 2026 के मध्य में आई खबरों के मुताबिक, यूक्रेन के सैन्य संचार तंत्र से जुड़े स्टारशील्ड नेटवर्क पर गति संबंधी पाबंदियों के कारण कुछ तेज रफ्तार ड्रोनों के संचालन में मुश्किलें आईं। इससे रूसी ड्रोन और दूसरे हवाई खतरों को रोकने वाले कुछ अभियानों पर भी असर पड़ने की खबरें सामने आईं। बाद में संपर्क व्यवस्था बहाल होने की खबर आई।”

इन पाबंदियों के पीछे किसका फैसला था और पूरा मामला क्या था, इस पर अलग-अलग दावे हैं। एलन मस्क का कहना है कि सैन्य इस्तेमाल वाला स्टारशील्ड अमेरिकी सरकार के नियंत्रण में है और उसके संचालन से जुड़े फैसले अमेरिकी अधिकारी लेते हैं।

लेकिन यहां असली सवाल मस्क या वाशिंगटन के बीच जिम्मेदारी तय करने का नहीं है। सवाल यह है कि जब किसी मुल्क की सेना की ताकत एक विदेशी संचार व्यवस्था पर निर्भर हो जाए, तो उस मुल्क की अपनी आजादी कितनी महफूज रह जाती है?

जंग में कुछ मिनटों का संपर्क टूटना भी भारी पड़ सकता है। ड्रोन रास्ता भटक सकता है, हमला नाकाम हो सकता है और दुश्मन को बढ़त मिल सकती है। यानी जो तकनीक कल तक मददगार थी, वही संकट के समय कमजोरी बन सकती है।

स्टारलिंक जैसी सेवाएं निजी कंपनियां चलाती हैं, लेकिन उनका रिश्ता संबंधित देशों की सरकारों, कानूनों और सुरक्षा नीतियों से भी होता है। जरूरत पड़ने पर सेवाओं पर पाबंदी लग सकती है, कुछ इलाकों में कवरेज रोकी जा सकती है या इस्तेमाल की शर्तें बदली जा सकती हैं।

आज अमेरिका और यूक्रेन के हित एक दिशा में हों, यह जरूरी नहीं कि हर हाल में ऐसा ही रहे। यही बात भारत पर भी लागू होती है।
मान लीजिए, कल चीन या पाकिस्तान के साथ भारत का गंभीर सैन्य टकराव हो जाए। अगर उस समय किसी विदेशी कंपनी ने अपनी सेवा सीमित कर दी, तो क्या होगा? अगर किसी अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विवाद के कारण भारत को जरूरी संचार सुविधा मिलने में रुकावट आ जाए, तो हमारी सेना क्या करेगी?
क्या हम किसी दूसरे देश की सरकार या किसी कारोबारी की मर्जी पर अपनी सुरक्षा छोड़ सकते हैं?

यह किसी के खिलाफ दुश्मनी नहीं, बल्कि हकीकत को समझने की बात है। अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में दोस्ती अहम है, मगर राष्ट्रीय हित सबसे ऊपर होते हैं।
एक रिटायर्ड सैन्य अधिकारी बताते हैं कि भारत ने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान विदेशी उपग्रह तस्वीरों और संबंधित क्षमताओं तक पहुंच की सीमाओं का अनुभव किया था। ऐसे अनुभवों ने यह समझ मजबूत की कि जरूरी तकनीक के लिए हमेशा दूसरे देशों पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है।

इसी सोच के तहत भारत ने अपनी उपग्रह और नेविगेशन क्षमताओं को बढ़ाया। स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली नाविक इसी दिशा में एक अहम कदम है।
स्टारलिंक के मामले में भी यही सोच अपनाने की जरूरत है।

भारत में इंटरनेट की सुविधा बढ़नी चाहिए। पहाड़ों, द्वीपों, गांवों और सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों को बेहतर संपर्क मिलना चाहिए। आपदा के समय सैटेलाइट इंटरनेट बहुत काम आ सकता है। कारोबार और शिक्षा के लिए भी इसके बड़े फायदे हैं।

लेकिन फायदे गिनाते समय खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भारत में गेटवे स्थापित करना, आंकड़ों की सुरक्षा के नियम बनाना और सरकारी निगरानी की व्यवस्था करना जरूरी है। लेकिन सिर्फ भारत की जमीन पर स्टेशन बना देने से अंतरिक्ष में घूम रहे उपग्रहों पर भारत का नियंत्रण नहीं हो जाता।

इंटरनेट का कनेक्शन हमारे यहां हो सकता है, मगर उसे चालू या बंद करने का अधिकार किसी और के पास हो, तो यह अधूरी आत्मनिर्भरता है।
विशेषज्ञ टीपी श्रीवास्तव कहते हैं, “भारत को स्टारलिंक का दरवाजा पूरी तरह बंद करने की जरूरत नहीं है। जरूरत है सोच-समझकर आगे बढ़ने की। विदेशी कंपनियों को नियमों के तहत काम करने का मौका मिले। लोगों को बेहतर इंटरनेट मिले और बाजार में मुकाबला बढ़े। मगर साथ ही भारत को अपने उपग्रह, सुरक्षित सैन्य संचार और ड्रोन नियंत्रण प्रणालियां भी मजबूत करनी होंगी।”

सरकार को एक ही कंपनी पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता से बचना चाहिए। फाइबर नेटवर्क, मोबाइल इंटरनेट और स्वदेशी उपग्रह सेवाओं का विस्तार जारी रहना चाहिए। संकट के समय हमारे पास ऐसे विकल्प होने चाहिए जो किसी विदेशी कंपनी के फैसले से ठप न पड़ें।

यूक्रेन का तजुर्बा हमें यही समझाता है कि तकनीक जितनी ताकत देती है, उस पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता उतनी ही बड़ी कमजोरी भी पैदा कर सकती है।
स्टारलिंक आए, कारोबार करे और भारतीयों को बेहतर इंटरनेट दे। लेकिन भारत की सुरक्षा, सरहदों की हिफाजत और फैसले लेने की आजादी की चाबी भारत के ही हाथों में रहनी चाहिए।

क्योंकि इंटरनेट की रफ्तार कुछ देर कम हो जाए, तो गुजारा हो सकता है। लेकिन अगर मुल्क की खुदमुख्तारी ही कमजोर पड़ जाए, तो उसकी कीमत बहुत भारी हो सकती है।

महिला पत्रकार ऋचा पराशर की शिकायत और प्रेस संस्थाओं की चुप्पी

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दिल्ली। 12 अक्टूबर 2026 की शाम करीब 6:30 बजे सुप्रीम कोर्ट परिसर में एक घटना हुई, जिसे वनइंडिया की एसोसिएट प्रोड्यूसर ऋचा पराशर ने अपनी आपराधिक शिकायत में विस्तार से दर्ज कराया है। वे लगभग ग्यारह सप्ताह तीन दिन की गर्भवती थीं (एलएमपी 24 जुलाई 2026)। वे पेशेवर ड्यूटी पर रजिस्ट्री काउंटर के पास थीं, जब विपक्षी नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का जुलूस नारेबाजी करते हुए परिसर में प्रवेश कर रहा था।

पराशर की शिकायत के अनुसार, उन्होंने गांधी से सुप्रीम कोर्ट परिसर में सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मौजूदगी पर सवाल पूछा। इसके बाद गांधी ने उन्हें गेट की ओर धक्का दिया। उन्होंने बार-बार कहा, “सर, धक्का मत दीजिए, हम जा रहे हैं,” लेकिन धक्का इतना जोरदार था कि वे संतुलन खोकर गिर पड़ीं और हाथों से गिरने को रोकने की कोशिश की। शिकायत में कहा गया है कि यह भीड़ की सामान्य धक्का-मुक्की नहीं, बल्कि जानबूझकर लगाया गया धक्का था। वे चिल्लाईं, लेकिन गांधी आगे बढ़ गए और कार्यकर्ता नारे लगाते रहे। हाथों से खून निकल रहा था। करीब 40 मिनट तक वे फुटपाथ पर बैठी मदद मांगती रहीं।

उसी रात करीब 9 बजे उन्हें सर गंगा राम अस्पताल ले जाया गया। अगले दिन भर्ती हुईं। डिस्चार्ज समरी में ‘प्राइमिग्राविडा एट 11 वीक्स 3 डेज पीओजी विद हाइपोथायरायडिज्म विद हिस्ट्री ऑफ फॉल’ दर्ज है। पेट के निचले हिस्से में दर्द, अल्ट्रासाउंड से फीटल कार्डियक एक्टिविटी चेक, और सुरक्षित निगरानी के लिए भर्ती का जिक्र है। वे 13 अक्टूबर को दवाइयों के साथ डिस्चार्ज हुईं, आगे की स्कैनिंग और दर्द/ब्लीडिंग पर तुरंत रिपोर्ट करने के निर्देश के साथ।

शिकायत में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 74 (महिला की शील भंग करने के इरादे से आपराधिक बल), 115(2) (स्वेच्छा से चोट), 131 (गंभीर उकसावे के बिना आपराधिक बल), 125 (लापरवाही से जीवन/सुरक्षा खतरे में डालना) और 3(5) (साझा इरादे) के तहत राहुल गांधी और अन्य के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई है। शिकायत में मेडिकल रिकॉर्ड, आधार और प्रेस आईडी (आईएन1706) संलग्न हैं। सुप्रीम कोर्ट ने घटना पर संज्ञान लिया है और 12 अक्टूबर के मूल वीडियो संरक्षित करने के आदेश दिए हैं।

यह मामला केवल एक व्यक्तिगत शिकायत नहीं है। एक गर्भवती महिला पत्रकार सुप्रीम कोर्ट परिसर में ड्यूटी के दौरान गिरती है, अस्पताल जाती है, और मेडिकल रिकॉर्ड में ‘हिस्ट्री ऑफ फॉल’ दर्ज होता है। कोई भी राजनीतिक पद कानून से ऊपर नहीं है। पत्रकार का काम सवाल पूछना और कवरेज करना है। अगर किसी नेता की मौजूदगी में ही ऐसा बल प्रयोग होता है और आवाज नारेबाजी से दबा दी जाती है, तो यह रिपोर्टिंग के अधिकार पर हमला है।

यहीं प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, वूमेन्स प्रेस क्लब और एडिटर्स गिल्ड से सीधा सवाल बनता है। इन संस्थाओं ने कई मौकों पर पत्रकारों की सुरक्षा, प्रेस की स्वतंत्रता और महिला पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार पर बयान जारी किए हैं। क्या इस शिकायत को पढ़ने के बाद वे चुप रहेंगे? क्या गर्भावस्था की स्थिति, मेडिकल रिकॉर्ड और सुप्रीम कोर्ट परिसर में हुई घटना पर्याप्त नहीं है कि वे एक पत्रकार के पक्ष में खड़े हों और निष्पक्ष जांच की मांग करें? क्या वे केवल चुनिंदा मामलों में आवाज उठाते हैं?

पत्रकारिता का मूल सिद्धांत है कि सत्ता के सामने सवाल पूछने वाले को धक्का न मिले। अगर प्रेस संस्थाएं इस शिकायत को ‘राजनीतिक’ कहकर नजरअंदाज करती हैं, तो वे अपने ही सदस्यों के अधिकारों की रक्षा में विफल साबित होंगी। ऋचा पराशर ने शिकायत में साफ कहा है कि वे केवल अपना काम कर रही थीं। अब सवाल यह है कि प्रेस क्लब, वूमेन्स प्रेस क्लब और एडिटर्स गिल्ड इस लड़ाई में एक पत्रकार का साथ देंगे या नहीं। उनकी चुप्पी भी एक जवाब है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : शताब्दी यात्रा : 02  

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की यात्रा के संदर्भ में इस इन्फो पैक में चार प्रमुख विषयों को शामिल किया गया है। इनमें संघ का कार्य, विस्तार एवं उद्देश्य, संघ–यात्रा के महत्त्वपूर्ण पड़ाव; तथा पंच परिवर्तन जैसे पहलू प्रमुख हैं। इन विषयों के माध्यम से संघ की स्थापना से लेकर उसके विकास, परंपराओं और राष्ट्रजीवन में उसके योगदान तक की एक समग्र जानकारी प्रस्तुत की जा सकती है।

मातृशक्ति और श्रीगुरु जी

  • अपने इस देश में संकट काल में स्त्री राखी भेज कर दूसरों को भाई बनाती थी। जिसे रक्षा भेजी जाती वह भाई हो जाता और एक बार जो भाई बना, वह अपने प्राण देकर भी अपनी बहन की रक्षा करता था। यह परिपाटी पुरानी चली आ रही है। भैया-दूज के समय हर एक मनुष्य बहन से टीका लगवाता है। बहन न हो तो पड़ोसी के घर टीका लगवाने जाता है और बहन बनाता है। एक बार टीका लगा कि जन्म-भर के लिए बहन के भाव आ जाते हैं। ( श्रीगुरूजी समग्र, खंड 2, पृष्ठ 66)
  • माता केवल एक महिला ही नहीं वरन्‌ इससे बहुत श्रेष्ठ धरातल पर एक विशाल व्यक्तित्व होती है। वह हमारे लिए शक्ति का मूल स्रोत है। (श्रीगुरूजी समग्र, खंड 3, पृष्ठ 273)
  • अपने राष्ट्र की जीवनधारा अक्षुण्ण रखने का उत्तरदायित्व महिलाओं ने ही संभाला है, आगे भी उन्हे निभाना है। आज सर्वत्र सद्भावना व शुद्धता का अभाव व स्वार्थ दिखाई देता है। इस वातावरण को अपनी अतीव पवित्रता से  प्रभावित करने का सामर्थ्य स्त्रियों में ही है – ऐसा मेरा विचार है। (श्रीगुरूजी समग्र, खंड 5, भारतीय नारी का दायित्व, पृष्ठ 6)

जहाँ पर माता का अपमान होता है, वहाँ भगवान भी क्षुब्ध हो जाते हैं और उन्हें अवतार-कार्य की प्रेरणा मिलती है। यह भूमि हमारी शाश्वत माता है। माता और मातृभूमि के अपमान का बोध होने पर कार्य के लिए चालना मिलती है। (श्रीगुरूजी समग्र, खंड 5, भारतीय नारी का दायित्व, पृष्ठ 7)


नारी
–गरिमा को बनाए रखने की आवश्यकता

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा इस तथ्य को रेखांकित करना चाहती है कि भारतीय जीवनमूल्यों एवं भारतीय परम्परा के अनुसार नारी और पुरुष को परस्पर पूरकता एवं सामंजस्य के संबंधों के आधार पर परिवार का सुसंचालन करते हुए राष्ट्रजीवन के विविध क्षेत्रों में अपनी-अपनी भूमिका का निर्वहन करना चाहिए। भारत का इतिहास व वाङ्मय नारी की महत्ता व गुणगान से भरा पड़ा है। विश्व के प्राचीनतमग्रन्थ ऋग्वेद में 30 से अधिक महिला मंत्र-दृष्टाओं का उल्लेख है तथा जीवन के सभी क्षेत्रों में उनकी सम्मानजनक सहभागिता के प्रचुर उल्लेख विद्यमान हैं। आगे भी यह धारा प्रवाहमान होती रही है। यह तो सच है कि महिला एवं पुरुष के बीच कुछ निसर्गप्रदत्त अंतर होता है। किंतु भारत की परम्परा ने महिला के प्रति किसी भी प्रकार के भेदभाव को मान्यता नहीं दी है, अपितु उसे सदैव एवं सर्वत्र अत्यन्त श्रद्धा व सम्मान का स्थान दिया है। अत: यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि महिलाओं के प्रति किसी भी प्रकार का भेदभावपूर्ण व्यवहार न हो तथा निर्णयप्रक्रिया में सदैव उनकी भागीदारी बनी रहे।

आगे चलकर विलासितापूर्ण जीवनशैली में से उत्पन्न वातावरण से जीवन में धीरे-धीरे स्खलन प्रारम्भ हुआ। विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा हमारी आस्थाओं-श्रद्धाओं पर चुन-चुन कर प्रहार प्रारम्भ हुए और हमारे विश्व-वंदित जीवनमूल्य तहस-नहस होने लगे। भौतिकता की चकाचौंध में हम पश्चिम के अन्धानुकरण-पथ परचल पड़े, जहाँ नारी स्वातंत्र्य के नाम पर उच्छृंखलता ही मिली। वैश्वीकरण और उदारीकरण की आँधी में महिलाओं को सम्मान का पात्र नहीं, बल्कि भोग-वस्तु बनाने की होड़ मच गई। प्रतिनिधि सभा इस बात पर चिन्ता व्यक्त करती है कि विज्ञापनों, पत्र-पत्रिकाओं, टी.वी. समाचारों, टी.वी. धारावाहिकों एवं चलचित्रों में महिलाओं के भोंडे तथा अश्लीलतापूर्ण चित्रों एवं दृश्यों को प्रचारित-प्रसारित कर भारतीय समाज में नारी की गरिमा व सम्मान को शर्मनाक ढंग से ध्वस्त करने एवं इनके परिणामस्वरूप परिवार को तोड़ने के कुत्सित प्रयास चल रहे हैं।

अ.भा.प्र.सभा महिलाओं के प्रति बढ़ती जा रही अभद्रता और छेड़छाड़ से लेकर उनके यौन शोषण, उत्पीड़न तथा अन्य संगीन अपराधों को खेदजनक मानती है। यह त्रासदी ही है कि उन्हें स्त्री-भ्रूणहत्या और दहेज-हिंसा ही नहीं, अपितु यौन शोषण की यंत्रणा भी कार्यस्थान और सार्वजनिक स्थानों से लेकर अपने घरों के दायरों तक में झेलनी पड़ती है। प्रतिनिधि सभा माँग करती है कि सरकार महिलाओं की सुरक्षा, संरक्षण तथा सशक्तीकरण के साथ घरेलू हिंसा और सार्वजनिक व कार्यस्थलों पर होने वाले दुर्व्यवहार शोषण के खिलाफ बने कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करे और विज्ञापनों, समाचार-पत्रों एवं इलैक्ट्रोनिक मीडियाके कार्यक्रमों में नारी की गरिमा बनाए रखने की दृष्टि से उपयुक्त आचार संहिता एवं कड़े कानून बनाए।

प्रतिनिधि सभा यह भी गहराई से अनुभव करती है कि इस संस्कृति-विध्वंसक परिस्थिति में सार्थक परिवर्तन लाने हेतु समाज की मानसिकता को भी आमूलाग्र बदलना होगा। केवल सरकारी कानूनों के भरोसे बैठे रहना आत्मवंचना होगी। समाजको यह प्रामाणिकता से अनुभव करना होगा कि उसका निर्माण परिवार संस्था से होता है और परिवार की धुरी स्त्री होती है; अत: स्त्री को सुविज्ञ, सजग और सशक्त किए बिनाविकसित समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। साथ ही महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहारकी दृष्टि से परिवार, शिक्षा, मीडिया एवं समाज की मनोभूमिका में परिवर्तन नितान्त आवश्यक है। अ.भा.प्र.सभा साधु-सन्तों और सामाजिक नेताओं से भी इस सन्दर्भ में अग्रणी भूमिका निभाने हेतु आवाहन करती है।

संघ और सामाजिक समरसता

डॉ. मोहन भागवत जी सामाजिक समरसता पर बल देते हुए कहते हैं कि “जिस क्षेत्र में हम रहते हैं, हमारा संचार है, जाना-आना है, उठना-बैठना है, कार्यालय है, अपनी बस्ती है, वहाँ जितने प्रकार के लोग रहते हैं, वे सब हमारे अपने हैं। हम तो पूरे समाज को एक ही मानते हैं, लेकिन समाज में लोग प्रकार मानते हैं, जात-पात मानते हैं। जातिगत विषमता की समस्या है। सब प्रकार के लोगों में अपने व्यक्तिगत मित्र होने चाहिए। उनके कुटुंब में अपने कुटुंब की मित्रता होनी चाहिए। उनका घर में आना-जाना, उठना-बैठना, पर्व-त्योहारों पर सुख-दुख में सहभागी होना, यह सब होते रहना चाहिए। जैसे मित्रों का चलता है, वैसे ही हमारा और हमारे परिवार का, सब प्रकार के परिवारों में, सब प्रकार के लोगों में होना चाहिए। आज शुरू करें, तो तीन-चार वर्ष में पूरा वातावरण बन जाएगा। लेकिन प्रारंभ तो करना पड़ेगा, सबको करना पड़ेगा। जहाँ अपना एक ऐसा समूह बन जाता है, उसकी साख बनती है, वह कहेगा तो बातें होती हैं। वहाँ पर मंदिर, पानी, श्मशान में कोई भेद नहीं होना चाहिए। वह सबके लिए है। मंदिर भक्तों के लिए है। भक्त किस जाति का है, यह नहीं पूछा जाता। पानी सब मनुष्यों के लिए है, उसमें भेद नहीं होता। मरने के बाद भी श्मशान में भेद क्यों होना चाहिए? अपने गाँव में, अपनी बस्ती में ये सब करना चाहिए। (डॉ. मोहन भागवत साक्षात्कार : 100 वर्ष की संघ यात्रा – नए क्षितिज, सुरुचि प्रकाशन, पृष्ठ 48)

संघ शाखा के माध्यम से अस्पृश्यता का उपचार : अस्पृश्यता को परिभाषित करते समय श्री गुरुजी का कथन है, “दूसरे शब्दों में अस्पृश्यता एक मानसिक विकृति है। मानसिक सुधार संस्कारों द्वारा ही संभव है। संस्कार एकात्मता का, एकरसता का, भ्रातृभाव का, सेवाभाव का निरंतर करना चाहिए। संघ शाखा की कार्यपद्धति इस में अद्वितीय यश प्राप्त कर चुकी है। वर्षा शिविर में महात्मा गांधी ने अनुभव किया कि सभी शिविरार्थी एक समान धरातल पर है। अस्पृश्य-स्पृश्य ऐसा कोई भेदभाव उनमें नहीं है। पुणे के संघ शिक्षा वर्ग में डॉ. बाबासाहब अंबेडकरजी को भी इसी सत्य का अनुभव आया। संघ शाखा से संस्कारित हिंदू केवल हिंदूभाव जानता है, उसे अपने जन्मजाति विस्मरण हो जाता है। संघ में न आनेवाले, संघ के बाहर जो विशाल हिंदू समाज है उसके मन को कैसे साफ किया जाय यह समस्या है।

समाज में एकता को लेकर श्रीगुरुजी के विचार

एकता के प्रभावी उपाय : श्री गुरूजी एकता पर बल देने और भेदों की अनदेखी करने की बात करते हैं। वे कहते हैं कि इसके लिए भजन-कीर्तन अथवा रामायण व महाभारत की कथाओं को सुनाने आदि का कार्यक्रम किया जा सकता हे, जहाँ सभी हिंदू विशुद्ध धर्म-प्रेम की पवित्र धारा में समान भ्रातृ-भावना से अनुप्राणित होकर अस्पृश्य-स्पृश्य आदि का भेद भूलकर एकत्र हों। साक्षरता, स्वास्थ्य, खेल इत्यादि के प्रोत्साहन हेतु सेवा प्रकल्प प्रारंभ किए जा सकते हैं। इस हेतु आधुनिक दृश्य-श्रव्य उपकरणों की भी उपयोगी ढंग से अपनाया जा सकता है। परंतु इन सभी गतिविधियाँ का केंद्र-बिंदु हृदय को प्रभावित करना, एकताकारी सत्प्रवृत्तियों पर बल देना तथा मतभेदों की उपेक्षा करना होना चाहिए।

छुआछूत और जातियां : श्री गुरूजी का मत है कि समाज में छुआछूत की प्रक्रिया हमें रोकनी है। इस बात को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं कि पहले अपने देश में कुल 18 जातियाँ थी। संभवतः अब 18 हजार हो गई हैं। कहा जाता है कि उनका आपस में कोई संबंध नहीं। मुझे बडा आश्चर्य होता है जब कुछ लोग कहते हैं कि कुछ जातियॉं तो स्पर्श करने योग्य नहीं है। ऐसे लोग यह भी कहते हैं, चूँकि उन्होंने घोर कृत्य किए थे, इसलिए उन्हें समाज के बाहर करने का दंड दिया गया था। यदि यह बात मान भी ली जाए तो भी यह कई शताब्दियों पहले की बात है। उसके लिए आज उनके वंशजों को दंडित करते रहने का कोई कारण दिखाई नहीं देता। वंशपरंपरा से समाजबाह्यता की बात मुझे बिलकुल नहीं जॅचती। किसी व्यक्ति ने समाज-विरोधी कोई कार्य किया हो तो उसे दंडित किया जा सकता है। परंतु उसके वंशजों को क्‍यों कर प्रताडित किया जाए? किसी समूह को समाजबाह्य करने में बहुत बडा खतरा रहता है। अपने समाज के अंग को इस प्रकार पृथक कर देते हैं, तव टूटकर अलग होनेवाला हिस्सा अपने अस्तित्व के लिए सहज ही एक अलग गुट बनाकर काम करता है। यह गुट अपने विचित्र व्यवहार द्वारा कालांतर में संपूर्ण समाज को खोखला बना डालता है। इस तरह से खोला बना समाज संसार में टिक नहीं सकता। समाज को खोखला करनेवाली इस छुआछूत की प्रक्रिया को हमें रोकना ही चाहिए।

हरिजन बांधवों के साथ सद्भाव : श्री गुरूजी का मानना है कि हरिजन बांधवों को अगर आज की परिस्थिति से क्षोभ है, तो इसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता है। उनके मन की कटुता दूर हो और वे अपने को समाज का गौरवपूर्ण अंग समझें, इस पद्धति से उनके साथ बर्ताव करना चाहिए। इसी क्रम में श्री गुरूजी कहते हैं कि युगानुसार समाज के व्यवहार में परिवर्तन होता रहता है। कानून को परिस्थिति के अनुसार बदलना पड़ता है और निरुपयोगी सिद्ध हुआ तो रद्द करना पड़ता है, यह सदैव का अनुभव है।

मानवीय संवेदना की आवश्यकता : श्री गुरूजी मानवीय संवेदना की आवश्यकता पर बल देते हुए कहते हैं कि निराशा को छोडकर सच्ची आत्मीयता से अपने समाज बधुओं के कष्ट दूर करने के लिए सन्नद्ध होना चाहिए। सोचना चाहिए कि विदेशों से आनेवाले पर्यटकों के समक्ष हाथ पसारकर भीख माँगता हुआ अपना समाजबंधु दिखाई देता है, क्या यह हमारे लिए अपमानास्पद बात नहीं है? ऐसी स्थिति निर्माण करनी चाहिए कि विदेशी ही क्यों, किसी के भी समक्ष कोई हाथ पसारता हुआ दिखाई न दे। हमें अपने मन में यही विचार दृढ करना चाहिए कि अपने समाज के प्रत्येक बंधु को हम स्वावलंबी बनाकर खड़ा करेंगे।

हमारा सच्चा राष्ट्रीय जीवन सर्वसमावेशी : श्री गुरूजी भारतीय समाज में समरसता का उद्घोष करते हुए कहते हैं कि हमारा सच्चा राष्ट्रीय जीवन सर्वसमावेशी है। भारतीय प्राचीन परंपरा की एकात्मकता और समरसता को बताते हुए श्रीगुरूजी कहते हैं कि भारत का राष्ट्रीय जीवन अति पुरातन है। यहाँ के समाज-जीवन का ताना-बाना सर्वसमावेशी, विशाल जीवन-दर्शन से उद्भूत और समान जीवन-आदर्शों से परिपूरित सांस्कृतिक परंपराओं के इर्द-गिर्द बुना हुआ है। यह जीवंत परंपरा इस भूमि पर इस्लामी एव ईसावादी आकांताओं के पदार्पण से बहुत पहले सदियों से विद्यमान है। जातियों, वर्गों, सम्प्रदायों यहाँ तक कि राजनैतिक साम्राज्यों में मत-भिन्रता एवं ऊपरी विविधताओं के होते हुए भी उनमें अंतर्निहित एकता-सूत्र कभी विच्छिन्न नहीं हुआ। इस एकात्म प्रवाह से परिपूर्ण जीवन की अभिव्यक्ति करनेवाला मानव-समूह ही हिंदू के रूप में विख्यात हुआ। इसलिए भारत में राष्ट्रीय जीवन वास्तव में हिंदू राष्ट्रीय जीवन ही है।

समाज में समरसता को बढ़ावा देने की दिशा में श्री गुरूजी कहते हैं कि जाति और विश्वास से परे प्रत्येक व्यक्ति को यह शिक्षा देनी होगी कि प्रत्येक भारतवासी का यह परम कर्त्तव्य है कि वह भारत के हिन्दू राष्ट्रवाद के सत्य का बेझिझक उद्घोष करे। इस राष्ट्र के प्रति उत्कट समर्पण का भाव सभी के मन में उद्दीप्त करना होगा।

श्री गुरूजी का मानना है कि मतपंथों की सुरक्षा व सम्मान करते हुए उन्हें इस राष्ट्र के मूल्यों, आदशों, जीवन-दृष्टि, इतिहास व परंपराओं के प्रति स्नेह व आदर प्रकट करने तथा अपनी आकांक्षाओं को राष्ट्र के साथ एकाकार करने का संस्कार देने की व्यवस्था करनी होगी।

20 जुलाई 1959 को श्री गुरूजी ने शृंगेरी मठ के श्रीमद् शंकराचार्य स्वामीजी को पत्र लिखा। स्वामीजी उस समय तमिलनाडु में तिरुचिरप्पल्लि जिले में, मुसिरि तहसील में अयलूर गांव में थे। गुरुजी का वह पत्र एक नम्र निवेदन था, एक प्रार्थना थी, सर्वसामान्य सात्विक आस्तिक हिन्दुहृदय की तड़पन थी। पत्र इस प्रकार है : “कालटी में श्रीशंकर कॉलेज है, उस संबन्ध में वहाँ के श्रीरामकृष्णाश्रम के स्वामी आगमानन्दजी ने श्रीचरणों में वस्तुस्थिति का वर्णन किया ही होगा। आगमानन्द स्वामी आर्थिक संकटों के कारण तथा इन सब कार्यकलापों के फलस्वरूप कुछ अप्रिय होने के कारण कॉलेज का भार वहन कर सकेंगे, ऐसा दिखता नहीं। श्री रामकृष्ण मिशन का केन्द्रस्थान बेलूर मठ के प्रमुख भी अर्थाभाव के कारण कॉलेज का भार नहीं ले रहे हैं। अभी जो ऋण है उससे मुक्त होने पर आगे का भार वे ले सकेंगे, ऐसा समाचार मिला है। किन्तु यदि श्री शृंगेरी मठ उस कॉलेज में उचित परिवर्तन संवर्धन कर संस्कृत, वेद, वेदांग, दर्शन, शास्त्रादि की शिक्षा का स्थान वहाँ बनावें और उस की ऐहिक शिक्षा की शाखा के रूप में विद्यमान कॉलेज का कार्य चलाने दें तो श्री शृंगेरी मठ की परंपरा के प्रतिकूल न होकर आज का कॉलेज भी चल सकेगा एवं श्रीमदाचार्य के आविर्भावस्थान पर श्रीमदाचार्य के नाम पर खुला हुआ यह विद्यालय बंद होने की आपत्ति टल सकेगी। अनेक जानकारों का यह मत है जो में नम्रतापूर्वक श्रीचरणों में निवेदन कर रहा हूँ।”

योग्य विचार विमर्श के उपरान्त उचित आदेश प्रदान कर कॉलेज का रक्षण करें। कॉलेज से संबन्धित सद्यः कालीन कार्यकर्ताओं को वह आदेश शिरोधार्य होगा, श्रेष्ठ आशीष के रूप में वे उसे ग्रहण करेंगे, ऐसा मैं समझता हूँ। श्रीमत् आचार्यचरणों से वे परिचित भी है।”

जब गुरुजी यह पत्र शृंगेरी आचार्य को लिख रहे थे वे भली भांति जानते थे कि मठ की असमर्थता क्या हो सकती है। शृंगेरी मठ धर्म-दर्शन संबन्धित विद्यापीठों के अतिरिक्त भौतिकी विद्या संस्थायें नहीं चलाता है। वह मठ की परंपरा है। अतः एव गुरुजी ने लिखा ‘मठ की परंपरा के प्रतिकूल न होकर’ और पत्र में उस के लिए उपाय भी सुझाया। अंत में गुरुजी की इच्छा पूरी हो गयी। श्रीमत् शंकराचार्य ने समस्या से संबन्धित व्यक्तियों को बुलाकर उन से विचार विमर्श कर गुरुजी द्वारा सूचित आपत्ति से महाविद्यालय को बचाया। फल स्वरूप हिन्दूसमाज का स्वाभिमान भी बच गया।

उपेक्षित बंधुओं की सेवा : श्रीगुरूजी अपने जीवनकाल में उपेक्षित बन्धुओं की सेवा। नागपुर के अंध विद्यालय के एक संस्थापक श्रीवामनराव वाडेगाँवकर उनके घनिष्ट मित्र थे। श्रीवाडेगाँवकर अपनी आयु के दसवें वर्ष से ही अंधे हो गये थे। फलस्वरूप गुरुजी के हृदय में उनके लिए सहज अनुकम्पा थी। वे प्रायः उनसे मिलने जाते तथा उनके अंध विद्यालय के लिए निधि एकत्र करने के निमित्त उनका हाथ अपने हाथ में पकडकर या उन्हें साइकिल पर आगे बिठाकर शहर भर में घुमा लाते थे। सच्ची सेवा एक ऐसी पवित्र और स्वयंस्फूर्त भावना है, जिसके सम्मुख निंदा-स्तुति की चेतना नष्ट हो जाती है। इसी सेवाभाव की प्रेरणा से पंद्रह अध्यायों का वेदांतविषयक “पंचदशी” नामक ग्रंथ उन्होंने श्रीवाडेगाँवकर को टीका के साथ पढकर सुनाया था। श्रीगुरूजी में यह समरसता अत्यंत उत्कट रूप में पाई जाती है।

श्री गुरूजी सामाजिक समरसता का विचार करते समय वनवासी बांधवों का भी विचार करते है। आदिवासी शब्दप्रयोग और उसके कारण निर्माण किए गए अनेक भ्रमों के खतरे श्री गुरुजी जानते थे। गिरि-कंदरों में निवास करनेवाले अपने बंधु को वे पराया नहीं मानते थे।

श्री गुरूजी कहते हैं कि वन्य प्रातं में निवास करनेवाले इन बंधुओं से मिलने पर अनुभव होता है कि ये लोग अनेक गुणों से परिपूर्ण होते हैं, यथा- साहस, बुद्धिमत्ता, परिश्रमशीलता, सत्य-निष्ठा, निश्छल आत्मीयता तथा सांस्कृतिक एव आध्यात्मिक। हमें कुछ श्रेष्ठतम सैनिक इसी समाज ने दिए हैं। संभवत केवल महाराणा प्रताप ही ऐसे व्यक्ति थे, जो इनसे घनिष्ठ संबंध स्थापित कर इन्हें शेष समाज की बराबरी पर ले आए थे। उन अंचलों के वनवासी भील राजपूर्तों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर स्वदेश व स्वधर्म की रक्षा शौर्यपूर्वक पीढी-दर-पीढी करते रहे।

श्रीगुरुजी का विचार हैं कि वनों में रहनेवाले अपने बंधुजनों के साथ हमको समरस होना चाहिए। सामाजिक समरसता की दिशा में वे आगे कहते हैं कि  “अब यह हमारा परम कर्तव्य है कि हम इन उपेक्षित बंधुओं के बीच जाएँ और उनके जीवनस्तर में सुधार लाने हेतु पूरी शक्ति से जुट जाएँ। हमें ऐसी योजनाएँ बनानी होगी जिनसे उनकी मूलभूत भौतिक आवश्यकताओं एवं सुख-साधनों की पूर्ति हो सके। उन्हें इन योजनाओं से लाभान्वित कराने हेतु हमें विद्यालय, छात्रावास व प्रशिक्षण केंद्र खोलने होंगे।” शेष हिंदू समाज के साथ उनको समरस करने हेतु ‘हमें ऊँच-नीच की मिथ्या धारणाओं का परित्याग कर समता की भावना के साथ उनमें घुलना-मिलना चाहिए।”

अनेकता में एकता : श्री गुरूजी अनेकता में एकता को बताते हुए विचार करते हैं कि अपने देश में भी तो पूजा के अनेक रूप अनेक प्रकार और अनेक प्रकार के देवता विद्यमान हैं, यही नहीं, अनेक प्रकार के पुराण और अनेक प्रकार के पंथ इत्यादि भी हैं और इन सबसे अपने को पृथक मानने वाले भी हैं। दक्षिण में तो शैव और वैष्णव का झगडा भी हो गया था। तुलसीदास जी जैसे विद्वान लोगों ने अपने ग्रंथों के प्रचार द्वारा यह झगडा दूर करने के लिए ‘मानस’में यहाँ तक लिखा कि जो शिव की मानता है और विष्णु को नहीं मानता है वह अधोगति को जाएगा और जो विष्णु को मानता है तथा शिव की अवहेलना करता है, वह शैव नरक में गिरेगा। ऐसा कहकर, दोनों का समान रूप से एक ही ईश्वर के नाते अंतः करण से आदर करने को प्रेरित किया।

इसी क्रम में श्री गुरूजी कहते हैं कि अपने समाज की रचना के लिए लगनेवाले जो संस्कार हैं, उनमें थोडा-बहुत भिन्नत्व देखने के लिए मिलता है। परिणामस्वरूप अपना यह समाज इस छोटी सी भिन्नता को लेकर ही पृथक-पृथक अंशो में बँट गया है।

श्री गुरूजी का मानना है कि अपने यहाँ चातुर्वर्ण्य है। चातुर्वर्ण्य, याने एक शरीर के अवयव के रूप में संपूर्ण समाज है, एक ही उसकी शक्ति है, एक ही उसका चैतन्य है और एक ही उसका जीवनरस है। इस प्रकार की धारणा को अपने अंदर स्थापित करें।

वस्तुतः श्री गुरूजी आत्मीयता को सामाजिक समरसता की दिशा में सर्वोत्तम समाधान के रूप में देखते हैं।

संघ और स्वदेशी

स्वाधीन भारत में स्वभाषा, स्वभूषा और स्वबोध का विचार : सरसंघचालकमोहनभागवत

स्वाधीन भारत में वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी स्वभाषा और स्वभूषा के साथ-साथ स्वबोध के विचार को रखते हैं। उनका मानना है कि अपने घर की चौखट के अंदर अपनी भाषा चाहिए, अपनी वेशभूषा चाहिए। भाषा, भूषा, भजन, भोजन अपने घर के अंदर अपना चाहिए। अपनी परंपरा का चाहिए। भ्रमण और भवन भी अपना ही चाहिए। अपना भवन अपनी परंपरा से होना चाहिए। बहुत अच्छा घर बनाया और पूजा घर नहीं बनाया, तो वह हिन्दू परंपरा का घर नहीं होगा। पूजा घर रहता है, अच्छे स्थान पर रहता है। पूजा घर बनाने को कहा तो सीढ़ी के नीचे जो त्रिकोण होता है उसमें बना दिया, ऐसा नहीं करना। ठीक से भाषा, भूषा, भजन, भवन, भ्रमण, भोजन होना चाहिए। भ्रमण, यानि वही जो पहले कहा, कि कुंभलगढ़ लेकर जाओ बच्चों को। पेरिस, सिंगापुर भी देखिए। दुनिया देखनी चाहिए, लेकिन कुंभलगढ़ भी देखिए और झुग्गी-झोपड़ी भी देखिए। वहाँ रहने वाले अपने लोग हैं, अपने बंधु हैं। कल हो सकता है कि उनमें से एकाध अरबपति बने और अपने सामने बड़ी बिल्डिंग बनाए। इस अपनत्व के साथ अपने घर की चौखट के अंदर अपना व्यवहार करना चाहिए।

ठीक है, फुल पैंट में रहना पड़ता है, पाश्चात्य वेश में रहना पड़ता है, कोई विरोध नहीं। वैसे देखा जाए तो अपना वेश या पराया वेश नहीं होता। जो विधिवत यानी कन्वीनिएंट है, वह पहनना। परंतु हमको धोती पहनना आता ही नहीं, ऐसा नहीं होना चाहिए। हमारे देश की आबो-हवा के अनुसार ये हमारी परंपरा में बने हैं। कम से कम पर्व-त्योहारों पर पहनना चाहिए। यह स्वबोध है। अपना हस्ताक्षर हम अपनी भाषा में कर नहीं सकते..! छोटी बात है। बदल दीजिए अगर अंग्रेजी में करते हैं तो। अपनी भाषा में कीजिए। जहाँ आवश्यक है, वहाँ अपनी भाषा के शब्द प्रयोग करें। यह वृत्ति है। ‘स्व’ का बोध होने से आदमी बनता है। स्व के आधार पर ही प्रगति होती है।

 स्वदेशी

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का स्वदेश प्रेम बहुत गहरा था। उनका मानना था कि स्वदेशी नीति एवं दृष्टिकोण के अभाव में स्वराज्य बिल्कुल अधूरा ही है। स्वदेशी नीति के द्वारा ही राष्ट्रीय निधि को मजबूत बनाया जा सकता है। सरकार को इसलिए त्वरित कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

स्वदेशी वस्तुओं की कमी पर चिंता प्रकट करते हुए और स्वदेशी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने के लिए वह कहते हैं कि हमें उद्योगों का विकेंद्रीकरण करना होगा। छोटे-छोटे कुटीर उद्योगों को लेकर चलना होगा। बड़े दुःख की बात है कि पंचवर्षीय योजना में बड़े-बड़े उद्योगों के लिए 1500 करोड़ रुपए रखे गए हैं, जबकि छोटे-छोटे उद्योगों के लिए केवल 300 करोड़। यही कारण है कि छोटे-छोटे उद्योग बिगड़ते जा रहे हैं व स्वदेशी वस्तुओं का ह्रास होता जा रहा है।

दीनदयाल जी कहते हैं कि

  • विदेशी माल पर नियंत्रण कर स्वदेशी को प्रोत्साहन दिया जाए।
  • दूतावासों में केवल स्वदेशी, विशेषत: कुटीर उद्योग निर्मित वस्तुओं का ही उपयोग हो।

उद्योग नीति में ऐसे उद्योगों को कोई स्थान नहीं, जिन्हें थोड़ी पूँजी से तथा थोड़े ज्ञान से चलाया जा सकता है। जो कुछ छोटे-छोटे उद्योग लड़ाई के काल में पनपे थे, वे नष्ट हो रहे हैं। आयात-निर्यात की नीति इन स्वदेशी उद्योगों के लिए हानिकर रही है। विदेशी पूँजीपति भ्रष्ट नौकरशाही को सहज ही अपने अनुकूल कर लेते हैं, जिससे भारत के उद्योगों के हित के प्रतिकूल आयात किया जाता है। निर्यात पर लगाए गए टैक्सों ने हमारे छोटे–छोटे ही नहीं, बड़े उद्योगों को भी आघात पहुँचाया है।

‘स्वदेशी’ की प्रासंगिकता और विदेशी वस्तुओं के लगातार प्रयोग के दूरगामी प्रभावों को बताते हुए दीनदयाल जी कहते हैं कि विदेशों की हर वस्तु हम बडे चाव से ले रहे हैं। विचार, व्यवस्था, पद्धति, पूँजी, उत्पादन-प्रणाली, प्रौद्योगिकी तथा उपभोग के मानदंड सभी क्षेत्रों में हम विदेशों पर निर्भर हैं। यह प्रगति का रास्ता नहीं। इससे विकास नहीं होगा। हम अपने ‘स्व’ को विस्मृत कर परतंत्र हो जाएँगे। ‘स्वदेशी’ के भावात्मक रूप को समझकर हमें उसे सृजन का आधार एवं अवलंब बनाना चाहिए।

स्वदेशी की भावना का पुनः जागरण और आत्मनिर्भरता

दीनदयाल जी का मानना है कि विदेशी मुद्रा विनिमय में युक्तिकरण के साथ-साथ ही हमारे जीवन के प्रति नजरिए और हमारी नीतियों में भी बदलाव आना चाहिए। हमें स्वदेशी की भावना को फिर से जगाना होगा। उन ग़लत ख़यालों को, जो कि हमारे मन में घर कर गए. हैं, उन्हें हटाना होगा। प्रगति सिर्फ़ किन्ही विदेशी वस्तुओं, पश्चिमी देशों से आई चीज़ों के भरोसे नहीं होती। आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का भाव जैसे ही जागेगा, वैसे ही डॉलर की जरूरत कम पड़ने लगेगी। सफ़र तभी कीजिए जब वह ज़रूरी हो’, यह युद्ध के दौरान का रेलवे का वह नारा था, जो उसने भीड़ कम करने के लिए चलाया था। “ विदेशी मुद्रा तभी लें जब बहुत आवश्यक हो’ और “विदेश यात्रा तभी, जब बहुत आवश्यक हो’ के नारे अब हमारी जरूरत हैं। हमारी योजनाएँ अब उपलब्ध विदेशी मदद पर नहीं, हमारी आवश्यकताओं पर आधारित होनी चाहिए। जब हम खुद के स्रोत न जुटा पाएँ, केवल तभी किसी भी विदेशी मदद पर निर्भर हों। आख़िर क्यों हम डॉलर का इस्तेमाल करें, जब हम रुपए से काम कर सकते हैं!

वस्तुतः पंडित दीनदयाल जी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत को बलवान बनाने के लिए अर्थव्यवस्था के स्वदेशीकरण को विशेष महत्त्व देते हैं।

तृतीय पड़ाव

  • संघ कार्य की विकास यात्रा का तीसरा पड़ाव डॉ. हेडगेवार जन्मशती (1989) से प्रारम्भ हुआ। समाज के वंचित, दुर्बल और पिछड़े वर्गों तक पहुँचने का संकल्प लिया गया। आत्मीयता से उनकी सहायता और सेवा को अपना दायित्व मानते हुए समग्र विकास के उद्देश्य से 1990 मेंसेवा विभागकी स्थापना हुई।
  • सम्पूर्ण समाज को प्रेम और आत्मीयता के आधार पर संगठित करने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम था। शाखाओं और संघ शिविरों में स्वयंसेवक सेवा-भाव और अपनी कुशलता का अभ्यास करते हैं। वर्तमान में स्वयंसेवकों द्वारा विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से लगभग 1,29,000 सेवा कार्य और गतिविधियाँसंचालित हैं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक कार्य और स्वावलंबन प्रमुख हैं।
  • “राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति” में समाज के अनेक सज्जन स्वयं योगदान देना चाहते हैं। ऐसे प्रभावी व्यक्तियों की विशेषता, सक्रियता, उपलब्धियाँ और समाज-सेवा की जानकारी प्राप्त कर, साथ ही संघ का विचार और कार्य उनसे साझा करने के उद्देश्य सेसम्पर्क विभागका कार्य 1994 में प्रारम्भ हुआ।
  • धर्मजागरण: हिन्दू समाज के लोगों को मतांतरण (conversion) से बचाने और जो लौटना चाहें उनके लिएघर वापसीका मार्ग सरल बनाने का कार्य आरम्भ हुआ।
  • सामाजिक समरसता: अछूत प्रथा और जातीय अन्याय को दूर कर, सबको समान अवसर व सम्मान मिले—इसके लिए प्रयास शुरू हुए।
  • सामाजिक सद्भाव: जातीय विद्वेष मिटाने और साझा समस्याओं पर विचार हेतुसामाजिक सद्भाव बैठकोंकी श्रृंखला चली।
  • ग्राम विकास: सरकारी योजनाओं का उपयोग करते हुए ग्रामवासी मिलकर अपने गांव का सर्वांगीण विकास करेंगे—इस संकल्प से कार्य प्रारम्भ हुआ।
  • गौसेवा व संवर्धन: भारतीय नस्ल की गायों के संरक्षण, औषधीय महत्व, नस्ल सुधार और गोबर-आधारित जैविक खेती को बढ़ावा देने हेतु व्यापक कार्यक्रम चल रहे हैं। देशभर में हज़ारों गौशालाएँ स्थापित हुई हैं।

 

 

चतुर्थ पड़ाव

  • संघ कार्य काचौथा पड़ावचल रहा है, जिसमें प्रत्येक स्वयंसेवक अपनी रुचि व क्षमता के अनुसार किसी क्षेत्र को चुनकर समाज परिवर्तन में सक्रिय होता है। डॉ. हेडगेवार ने कहा था—“संघ कार्य केवल शाखा तक सीमित नहीं, सम्पूर्ण हिन्दू समाज ही कार्यक्षेत्र है।”
  • शाखाओं में पुरुषों के लिए व्यक्ति-निर्माण का कार्य होता है, तो महिलाओं के लिए यही कार्यराष्ट्र सेविका समितिकरती है। सेवा, संपर्क और प्रचार विभागों सहित धर्मजागरण, ग्राम विकास, कुटुंब प्रबोधन, समरसता, गौ-संवर्धन और पर्यावरण जैसे 32+ क्षेत्रों में स्वयंसेवक, मातृशक्ति और सज्जन शक्ति मिलकर सक्रिय हैं।

पंच परिवर्तन

संघ का अनुभव है कि समाज-परिवर्तन का महान कार्य केवल कुछ लोगों से नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज की शक्ति से ही संभव है। इसलिए आगामी वर्षों के लिए संघ ने समाज-परिवर्तन कोपंच–परिवर्तनके रूप में समग्रतापूर्वक देखा है। इसका आशय है कि समाज जीवन में समयानुकूल परिवर्तन लाकर हम राष्ट्रहित में अपने जीवन को ढालें।

सामाजिक समरसता

हिन्दू समाज की स्वाभाविक विशेषता समरसता रही है। किंतु समय के साथ जाति-भेद, ऊँच-नीच और अस्पृश्यता जैसी विकृतियाँ उत्पन्न हुईं, जिससे समाज के कुछ वर्गों को अन्याय और अपमान सहना पड़ा। आज यह बुराई त्याज्य है और इसका समाप्त होना अत्यंत आवश्यक है। संतों, गुरुओं और समाजसुधारकों ने इसे पाप और अमानवीय परंपरा बताया। संघ का आग्रह है कि समाज में सब समान हैं—इस भावना से सभी को जोड़कर एकत्व की स्थापना की जाए।

पर्यावरण संरक्षण

मानव जीवन पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश) पर आधारित है। इनका संतुलन बिगड़ने से ही आज की पर्यावरणीय चुनौतियाँ खड़ी हुई हैं। भारतीय परंपरा में पेड़-पौधों और प्रकृति की पूजा का जो भाव है, वही सच्चे अर्थों में पर्यावरण संरक्षण का आधार है। जल-बचत, वृक्षारोपण, स्वच्छता और ऊर्जा-संरक्षण प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। यही भाव नव राष्ट्र-निर्माण की आवश्यकता है।

कुटुंब–प्रबोधन

कुटुंब समाज की सबसे छोटी लेकिन सबसे प्रभावी इकाई है। ऋग्वेद और अथर्ववेद में परिवार को आनंद और समृद्धि का केंद्र बताया गया है। परिवार में हिन्दू जीवन-शैली, संस्कार और कर्तव्यों का पोषण कर हमवसुधैव कुटुम्बकम्की भावना को जीवित रखते हैं। संघ का मानना है कि स्वस्थ परिवार से ही स्वस्थ समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है।

स्व–आधारित जीवन

विदेशी दासता से मुक्त होकर स्वभाषा, स्वभूषा, स्वसंस्कृति और स्वदेशी उद्योगों पर बल देना आवश्यक है। आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से अलग होना नहीं, बल्कि स्वाभिमान के साथ व्यापार और उत्पादन करना है। रक्षा, विज्ञान और तकनीक में आत्मनिर्भर भारत—जैसे डीआरडीओ, इसरो, परम सुपरकंप्यूटर और कोविड वैक्सीन के उदाहरण—स्व-आधारित जीवन की दिशा में प्रेरणास्रोत हैं। स्थानीय व कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देकर हमें रोजगार और आत्मनिर्भरता दोनों को बढ़ाना है।

नागरिक कर्तव्यबोध और शिष्टाचार

संविधान ने हमें अधिकार दिए हैं, लेकिन साथ ही मौलिक कर्तव्यों का भी आग्रह किया है। राष्ट्रभक्ति केवल बड़े अवसरों पर नहीं, बल्कि दैनिक आचरण में झलकनी चाहिए—पानी-बिजली की बचत, ईंधन का संयमित उपयोग, अनुशासन, ईमानदारी और शिष्टाचार भी राष्ट्रसेवा हैं। अच्छे और जिम्मेदार नागरिक ही किसी भी देश की आंतरिक शक्ति और स्थायी विकास का आधार होते हैं।

 

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : शताब्दी यात्रा : 01

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की यात्रा के संदर्भ में इस इन्फो पैक में चार प्रमुख विषयों को शामिल किया गया है। इनमें संघ का कार्य, विस्तार एवं उद्देश्य, संघ–यात्रा के महत्त्वपूर्ण पड़ाव; तथा पंच परिवर्तन जैसे पहलू प्रमुख हैं। इन विषयों के माध्यम से संघ की स्थापना से लेकर उसके विकास, परंपराओं और राष्ट्रजीवन में उसके योगदान तक की एक समग्र जानकारी प्रस्तुत की जा सकती है।

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संघ : कार्य, विस्तार एवं उद्देश्य

 

संघ की स्थापना

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 27 सितम्बर 1925 (विजयादशमी, विक्रम संवत् 1982) को हुई। इसका उद्देश्य सम्पूर्ण हिन्दू समाज का संगठन था। तब से सहयोग और सहभागिता के बल पर संघ का कार्य निरंतर बढ़ता गया है। प्रतिदिन चलने वाली शाखाओं के माध्यम से बालक, युवा और प्रौढ़ अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन अनुभव करते हैं, जिससे समाज में संघ की शक्ति और स्वीकृति सतत बढ़ रही है।आज 100 वर्ष की इस यात्रा ने समाज में उत्सुकता जगाई है कि लोग संघ कार्य को जानें और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उससे जुड़ें।

डॉ. हेडगेवार जन्मजात देशभक्त थे। अंग्रेजों की गुलामी उन्हें गहरी चुभती थी, पर वह मानते थे कि केवल स्वतंत्रता प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने सोचा कि भारत गुलाम क्यों बना, इसका मूल कारण खोजकर उसका समाधान करना होगा। आत्मजागृति, स्वाभिमान, एकता, अनुशासन और राष्ट्रीय चरित्र निर्माण को उन्होंने आवश्यक माना। इसी उद्देश्य से स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहते हुए भी उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की।

श्री गुरूजी के अनुसार,“विजयादशमी के शुभ प्रसंग पर स्वर्गीय डॉक्टर हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कर विसृंखलित हिंदू समाज को संगठित करने का कार्य प्रारंभ किया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भगवा ध्वज के नीचे संपूर्ण हिंदू समाज को संगठित करने का निरंतर कार्य कर रहा है। आज चारों ओर भीषण परिस्थिति उपस्थित है। ऐसी अवस्था में संगठन के बिना बचना संभव नहीं है। हजारों वर्ष की अवनति चुटकी बजाते दूर नहीं हो सकती, यह संघ जानता है। पर इससे हम निराश नहीं हैं। हमारा पूर्ण विश्वास है कि हिंदू समाज संगठित होकर अपने पूर्व गौरव को अवश्य प्राप्त करेगा।“

संघ के प्रारंभिक 15 साल

डॉ. हेडगेवार के निधन के तेरहवें दिन, यानि 3 जुलाई 1940 को नागपुर में डॉ. साहब की श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। सरसंघचालक के नाते श्री गुरूजी ने डॉ. हेडगेवार जी को याद करते हुए बताया कि डॉ. साहब के कार्य की परिणति पंद्रह वर्षों में एक लाख स्वयंसेवकों के संगठित होने में हुई।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संदर्भ में दत्तोपंत ठेंगड़ी कहते हैं, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का निर्माण किसी भावना या उत्तेजना में आकर नहीं हुआ है। श्रेष्ठ पुरुष, जन्मजात देशभक्त डॉक्टर जी, जिन्होंने बचपन से ही देशभक्ति का परिचय दिया, सब प्रकार का अध्ययन किया और अपने समय में चलने वाले सभी आंदोलनों और कार्यों में हिस्सा लिया, कांग्रेस और हिंदू सभा के आंदोलनों में भाग लिया, क्रांतिकार्य का अनुभव लेने के लिए बंगाल में भी रहे, उन्होंने गहन चिंतन के पश्चात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की योजना बनाई।”

नागपुर के बाद 1929 में वर्धा और फिर 1932 में पुणे में संघकार्य की शुरुआत हुई।  जल्दी ही महाराष्ट्र के अन्य शहरों में भी विस्तार होने लगा। जहाँ 1929 में शाखाओं की संख्या 37 थी, वह 1933 तक 125 हो गई। डॉ. हेडगेवार एक पत्र के माध्यम से लिखते हैं, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य हमने किसी एक नगर या प्रांत के लिए आरंभ नहीं किया है। अपने अखिल हिंदुस्थान देश को यथाशीघ्र सुसंगठित करके हिंदू समाज को स्वसंरक्षण एवं बलसंपन्न बनाने के उद्देश्य से इसे प्रारंभ किया गया है।“

संघ का यह विचार और विस्तार दोनों ब्रिटिश सरकार के लिए अनुकूल नहीं थे। दिल्ली में ब्रिटिश अधिकारी एम. जी. हालौट द्वारा मध्य प्रांत सरकार पर दबाव बनाया गया कि वह संघ को रोकने का प्रयास करे। आखिरकार दिसंबर 1933 में मध्य भारत के शिक्षकों और निकायों के कर्मचारियों को संघ के कार्यक्रमों में हिस्सा लेने से रोक लगा दी गई। मार्च 1934 में प्रतिबंध के विरोध में एक कटौती प्रस्ताव विधानसभा के समक्ष रखा गया। इसके पक्ष में टी.एच. केदार, आर.डब्ल्यू. फुले, रमाबाई तांबे, बी.जी. खापर्डे, आर.ए. कानिटकर, सी.बी. पारेख, यू.एन. ठाकुर, मनमोहन सिंह, एम.डी. मंगलमूर्ति, एस.जी. सपकल और डब्लू.वाई. देशमुख सहित अन्य सदस्यों ने अपनी बात रखी। संघ की अवधारणा का इस प्रकार समर्थन अभूतपूर्व था। बहस के अंत में ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाया गया प्रतिबंध वापस ले लिया गया।

डॉ हेडगेवार के निर्देशन में देशभर में प्रवास होने लगे। भाऊराव देवरस (लखनऊ), राजाभाऊ पातुरकर (लाहौर), वसंतराव ओक (दिल्ली), एकनाथ रानाडे (महाकौशल), माधवराव मूळे (कोंकण), जनार्दन चिंचालकर एवं दादाराव परमार्थ (दक्षिण भारत), नरहरि पारिख एवं बापूराव दिवाकर (बिहार) और बालासाहब देवरस (कोलकाता) ने संघ कार्य का विस्तार करना शुरू किया।

परिणामस्वरूप, लगभग एक दशक बाद देशभर में 600 से अधिक शाखाएँ और लगभग 70,000 स्वयंसेवक नियमित अभ्यास करने लगे।1939 तक दिल्ली, पंजाब, बंगाल, बिहार, कर्नाटक, मध्य प्रांत, बंबई (वर्तमान महाराष्ट्र और गुजरात) में संघ शाखाएँ लगनी शुरू हो गईं।

डॉ. साहब 15 वर्षों तक संघ के पहले सरसंघचालक रहे। इस दौरान संघ शाखाओं के द्वारा संगठन खड़ा करने की प्रणाली डॉ. साहब ने विचारपूर्वक विकसित कर ली थी। संगठन के इस तंत्र के साथ राष्ट्रीयता का महामंत्र भी बराबर रहता था। वे दावे के साथ आश्वासन देते थे कि अच्छी संघ शाखाओं का निर्माण कीजिए, उस जाल को अधिकतम घना बुनते जाइए, समूचे समाज को संघ शाखाओं के प्रभाव में लाइए, तब राष्ट्रीय आज़ादी से लेकर हमारी सर्वांगीण उन्नति करने की सभी समस्याएँ निश्चित रूप से हल हो जाएँगी। इन वर्षों में जिनसे भी उनका संपर्क हुआ, उन्होंने उनकी और उनके कार्यों की हमेशा सराहना की। जिनमें महर्षि अरविंद, लोकमान्य तिलक, मदनमोहन मालवीय, विनायक दामोदर सावरकर, बी. एस. मुंजे, विट्ठलभाई पटेल, महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और के. एम. मुंशी जैसे नाम प्रमुख थे।

संघ का कार्य : व्यक्ति निर्माण

1935 में एक भाषण के दौरान डॉ. हेडगेवार कहते हैं, “कोई स्वयंसेवक आज अच्छी तरह से काम कर रहा है और कल वह अपने घर बैठ जाए। यदि किसी दिन कोई स्वयंसेवक शाखा में उपस्थित न रहे, तो तुरंत उसके घर पहुँचकर यह जानकारी लेनी चाहिए कि क्यों नहीं आया।”

राष्ट्रीय चारित्र्य निर्माण और सामूहिक गुणों की उपासना (साधना), उन राष्ट्रीय गुणों का सामूहिक अभ्यास करने तथा अपने ध्येय का नित्य स्मरण करने के लिए संघ में शाखा नामक कार्यपद्धति विकसित हुई। प्रतिदिन एक घंटा चलने वाली शाखा में यह भाव जगाया जाता है कि भारत का सम्पूर्ण समाज एक है, समान है और सभी अपने हैं। साथ ही, उद्यम, साहस, धैर्य, शक्ति, बुद्धि और पराक्रम जैसे गुण विकसित करने हेतु खेल आदि विविध कार्यक्रम शाखा पर होते हैं। अनुशासन, एकता, वीरत्व और सामूहिकता का भाव निर्माण करने के लिए समता-अभ्यास (परेड), बैंड के ताल पर पथ संचलन (Route March) और योग-व्यायाम (पीटी) जैसे कार्यक्रम शाखा में प्रारम्भ हुए और आज भी हो रहे हैं।

शाखा व्यक्ति-निर्माण की सतत साधना है। समाज को अपना मानकर उसके लिए कुछ न कुछ और कभी-कभी सब कुछ अर्पित करने का संस्कार यहीं से मिलता है। इस विचार को व्रत के रूप में स्वीकार कर जीवन भर उसका पालन करने का संकल्प लेकर जीने वाले हजारों स्वयंसेवक सक्रिय हैं। ऐसे सहयोगी कार्यकर्ताओं को देखकर प्रेरित हुए हजारों-लाखों स्वयंसेवकों के द्वारा आनंदपूर्वक यह समर्पण-यज्ञ अविरल चल रहा है।

श्री गुरुजी का मानना है कि संघ केवल संगठन का काम करने वाला है। उसे न तो नाममात्र के अनुयायियों की फौज खड़ी करनी है और न ही किसी प्रकार की राजनीति करनी है। संघ तो सामाजिक जीवनयुक्त उत्कृष्ट नागरिक तैयार करना चाहता है और इसके लिए वह आवश्यक अनुशासन उन्हें सिखाता है। यह सीधा-साधा काम हैं।

श्री गुरूजी के अनुसार संघ की आवश्यकता

संघ के 20 वर्ष पूरे होने पर श्री गुरुजी ने कहा था,“20 वर्ष पूर्व जब संघ का जन्म हुआ, तब यह बात तो नहीं थी कि भारतवर्ष में कोई दूसरी संस्था ही नहीं थी। देश में कितनी संस्थाएँ थीं, जो अपने-अपने पथ पर चलकर, अपने-अपने तरीके से काम कर रही थीं, परंतु ‘हिंदुस्थान हिंदुओं की स्वाभाविक जन्मभूमि, कर्मभूमि और पुण्यभूमि है’, इसका ध्यान किसी को भी नहीं था। इस बात का विस्मरण ही हो गया था। अपनी प्राचीन संस्कृति, सभ्यता, इतिहास आदि को भुलाकर लोग नए सिरे से काम करने निकले, मानो यहाँ पहले कभी कुछ था ही नहीं। विद्वान लोग कहते थे – हमारा राष्ट्र अभी बनने जा रहा है। प्राचीनकाल से भारतवर्ष में एक सभ्य समाज है और यह स्वयं एक महान राष्ट्र है, इसका ज्ञान लुप्त-सा हो गया था। अपने अतीत को हम भूल गए थे, उससे हमें घृणा होने लगी थी। हमें ‘हिंदू’ नाम से भी घृणा हो गई थी। परंतु जो मनुष्य अपने अतीत से घृणा करता है, वह भविष्य कदापि नहीं बना सकता।”

श्रीगुरुजी का मानना है कि हिंदुओं की यह प्रवृत्ति एक अतीव भव्य संस्कृति का विनाश करने की प्रवृत्ति है। हमारी संस्कृति विशाल है, जो केवल मनुष्य को ही नहीं, अपितु अखिल चराचर सृष्टि को आत्मवत् मानती है। हमारी संस्कृति के स्थापक ऋषि-मुनियों ने दूसरों को अवश्य अपनाया है, पर अपने आत्मीयजनों को ठुकराकर नहीं। ‘स्वयं जीवित रहो और दूसरों को भी रहने दो’ की नीति पर भारतीय चलते हैं। हम समझने लगे हैं कि केवल गत सौ वर्षों से ही हमें नया ज्ञान होने लगा है, उसके पहले देश में अंधकार था।

श्रीगुरुजी कहते हैं निःस्वार्थ भाव से देशकार्य के लिए अपना जीवन लगा देने का निश्चय कितने अंतःकरणों में है? वह आगे कहते है, कि ‘मेरा समाज मेरा देव है, मेरा ध्येय है’ — यह भाव दिखाई नहीं देता।

श्रीगुरुजी के अनुसार संघ इसलिए पैदा हुआ कि हर एक हिंदू हिंदूपन, अपने हिंदू गौरव, हिंदू जीवन, हिंदू परंपरा, हिंदू इतिहास का अभिमान करे, अपने को हिंदू समझे।”

गुरुजी कहते हैं कि हिंदू समाज के संगठन के लिए व्यक्ति को समष्टि जीवन जीने का अभ्यास होने की आवश्यकता है, यही बताने के लिए संघ का जन्म हुआ है। हमें हिंदू समाज को इतना सामर्थ्यशाली बनाना है कि कोई उसकी ओर गलत दृष्टि से देखने की हिम्मत न कर सके।

वर्तमान में संगठन का विस्तार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वार्षिक रिपोर्ट में प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष देशभर में 51,740 स्थानों (स्थान) पर 83,129 शाखाएँ संचालित हो रही थीं। अब यह संख्या बढ़कर 55,683 स्थानों पर 88,949 शाखाओं तक पहुँच गई है। इस प्रकार, एक वर्ष में 3,943 नए स्थान जुड़े हैं और शाखाओं की कुल संख्या में 5,820 की वृद्धि हुई है। यह संगठन की गतिविधियों के निरंतर और व्यापक विस्तार को दर्शाता है।

                                       संघ और युवा

राष्ट्र–निर्माण के लिए युवकों को आह्वान : सामान्यतः अपने भाषणों में श्री गुरुजी युवकों का उत्साह बढ़ाते हुए उनका आह्वान कर कहा करते थे कि “हम अपनी सम्पूर्ण शक्ति से देशभक्ति की यह ज्योति जगाएँ। उसे देशव्यापी व प्रखर बनायें। उस प्रकाश में सम्पूर्ण अज्ञानान्धकार लुप्त हो जाएगा। वह प्रकाश दुनिया की समस्त आसुरी शक्तियों को चुनौती देगा, दृढ़ नींव पर अजेय खड़ा रहेगा और सम्पूर्ण दुनिया को सिद्ध कर देगा कि हम इस श्रेष्ठ राष्ट्र के सुपुत्र हैं। केवल इसी मार्ग से हम सफल हो सकते हैं।”

श्री गुरूजी का मानना है कि “कार्य को करने का निश्चय करो, लोगों के पास जाओ, उनसे सम्पर्क स्थापित करो और ऐसा दृढ़ संगठन बनाओ, जो किसी भी परिस्थिति में भी अडिग रहे। कंधे से कंधा लगाकर काम करो। आगे बढ़ो, बढ़ते ही रहो। समय व्यर्थ नष्ट मत करो। व्यक्ति-व्यक्ति को सुसंगठित करो और संगठन से राष्ट्र निर्माण करो। आपमें युवकोचित उत्साह, साहसवृत्ति, संकटों से लड़ने और सफलता प्राप्त करने की शक्ति है। बढ़ते जाओ, भविष्य उज्ज्वल है।”

5 जुलाई 1955 को रविशंकर शुक्ल की 79 वीं वर्षगाँठ पर अभिनन्दन करते हुए देश की युवा पीढ़ी को संबोधित करते हुए श्री गुरूजी कहते हैं कि उनका यह परिश्रम से भरा हुआ जीवन, देश के हित सर्व प्रकार के कार्यों में अविरत रूप से व्यस्त जीवन आज की तरुण पीढी में अध्यवसायी वृत्ति, श्रम करने का उत्साह, कर्तव्य-पथ पर अडिग रहने का धैर्य प्रदान करने में समर्थ है। मैं आशा करता हूँ कि इन गुणों का तथा धर्मप्रेम एवं आचरण का यह आदर्श अपनाकर देश का युवक वर्ग अपने-आपको योग्य राष्ट्रसेवक के रूप में उपस्थित करने में यत्नशील होगा।

श्रीगुरूजी का मानना है कि राष्ट्रोत्थान साहसी युवक ही कर सकते हैं। वे कहते हैं किजीवन में भोगप्रवणता को त्याग केवल राष्ट्रहितसाधक, स्वार्थशून्य भाव भरकर यह राष्ट्रोत्थान कार्य सफल करने का साहस आज का युवक वर्ग ही कर सकता है। आप तथा अन्य छात्रबंधु अपनी इस श्रेष्ठता को पहचानते ही हैं! अत सद्य स्थिति में जो अनेकविध समस्याएँ राष्ट्र के सम्मुख खडी हैं, उन्हें नष्ट करने के दायित्व को निभाने के लिए योग्यतम बनने का उद्योग आप सब मिलकर करें।

5 जुलाई 1955 को श्री नाना ढोबले को लिखे पत्र में श्रीगुरूजी कहते हैं कि हमें राष्ट्रनिर्माण में अभी कितने ही उत्साही युवकों की आवश्यकता है। वर्ष दो-वर्ष घर की चिंता छोड़कर कार्य करनेवाले तथा परिस्थिति के अनुसार घर जाकर उसके बाद व्यक्तिगत उद्योग करने को विवश होने पर, काम-धंधा शुरू कर पहले जैसे उत्साह और शक्ति से खून-पसीना एक कर कार्यरत होनेवाले अनेक युवक सामने आएँ, यह कार्य की आवश्यकता है। परंतु यह एकदम कैसे संभव है? जिस प्रकार एक-एक मणि जोड़कर माला गूँथी जाती है, इस प्रकार धीमे-धीमे कार्य करना होगा। आपके (नासिक) विभाग में शांति से प्रयत्न करने पर कुछ मात्रा में सफलता मिलेगी ही।

4 सितंबर 1959, डॉ. सबा जोशी को लिखे एक पत्र में गुरूजी कहते हैं कि धीरे-धीरे प्रयत्न किया तो अच्छे एवं जीवन में ध्येय की खोज करनेवाले बुद्धिमान शीलवान युवक खोजे जा सकते हैं।

श्री गुरूजी 14 जुलाई 1969 में लिखे एक पत्र में कहते हैं कि बालकों-युवकों को अपने धर्म की महत्ता समझाएँ। अपने बालकों-युवकों को संक्षेप में, सरल भाषा में, अपने धर्म की तर्कसंगत महत्ता समझा कर, उसके योग्य श्रेष्ठ पवित्र जीवन जीने की तथा उस जीवन की निस्वार्थ कर्तव्यनिष्ठा में से स्वसमाज, स्वराष्ट्र को पवित्र गुणसपन्न, समृद्धिसंपन्न ऐश्वर्ययुक्त बनाने की शुद्ध आकांक्षा जागृत करनेवाली विचारप्रवर्तक पुस्तकें तथा अन्य प्रकार का प्रचार अत्यंत आवश्यक है। यह आवश्यकता पूर्ण करने का प्रयास प्रत्येक को करना चाहिए। इस दिशा में यह अल्प-सा, परंतु बहुगुणी प्रयत्न अत्यंत उपयोगी और अभिनंदनीय है।(मूल मराठी)

साहित्य के माध्यम से युवकों का संस्कार : श्रीगुरूजी साहित्य के माध्यम से युवकों का संस्कारदेने की बात करते हैं। वे कहते हैं कि अपनी संस्कृति की आस्था के अभाव में कितने ही अच्छे युवक राष्ट्रविरोधी शक्तियों के समर्थक बने हैं, बनते जा रहे हैं। बडे-बडे जननेता भी अपनी सांस्कृतिक परंपरा के प्रतिकूल मानव का वास्तविक कल्याण सिद्ध करने में अक्षम विचारधाराओं का प्रचार कर अपने ही देशबांधवों को स्वदेश-विरोधी बनाने में प्रत्यक्ष या परोक्ष सहायता दे रहे हैं। इस वायुमंडल को विषमुक्त कर उसे शुद्ध, पवित्र भारतीयत्व से भरने का कार्य साहित्यकार उत्तम रीति से कर सकते हैं।

देश के तरुणों के प्रति चिंता : श्री गुरूजी देश के तरुणों के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि राष्ट्रीयता को सांप्रदायिक और संकुचित कहकर उसकी भीषण अवहेलना हुई है। इससे राष्ट्र के सच्चे स्वरूप का विस्मरण हो चुका है। इन कारणों से समाज की तरुण पीढी वैचारिक क्षेत्र में आधारहीन हो गई है। तरुणों की बुद्धि के लिए कोई आधार ही शेष नहीं बचा। देश, धर्म, राष्ट्र किसी भी प्रकार की शुद्ध भावना उन्हें नहीं मिलती। परिणाम यह है कि उन्हें चारों ओर अराष्ट्रीय विचारों के जो बवंडर दिखाई पडते हैं, उनकी और वे खींचे जाते हैं। इन बवंडर का विस्तार होता रहता है। इन कारणों से हमारे राष्ट्रीय जीवन पर जो आघात होते हैं, उनका लाभ अहिंदू लोगों को ही होता है। इससे उनके स्वार्थ सिद्ध होते हैं। विभिन्‍न दल और जातियों के बीच आपसी संघर्ष की जो दुर्भाग्यपूर्ण क्रिया चल पडी है, वह हमारे मार्ग में बडा रोडा बनी है। साथ ही कुछ लोग सत्ता पर अपना कब्जा बनाए रखने के लिए उन सभी लोगों को, जो राष्ट्रविरोधी, धर्मविरोधी, हिंदू-समाज विरोधी हैं, एकत्र करने का प्रयत्न कर रहे हैं। समाजविरोधियों को आत्मीय मानना और अपनों को तिरस्कृत करने की यह प्रवृत्ति हिंदू समाज पर बहुत बडा आघात करनेवाली है।

संगठित युवा–शक्ति : श्रीगुरूजी युवा शक्ति को स्वस्थ कार्यों में लगाने पर विशेष बल देते हैं। उनका विचार है कि विद्यार्थी-संगठनों का अन्य राजनैतिक या आंदोलनकारी पक्षों से पूर्ण विच्छेद कर देना चाहिए और उनकी शक्तियों को ज्ञान-संवर्धक, सेवाभावी, श्रम-प्रतिष्ठा बढानेवाले, बंधुभाव एवं सामूहिक जीवन निर्माण करनेवाले स्वस्थ कार्यों में लगाना चाहिए। विद्यार्थी संगठन बंद कर देना- यह समस्या का कोई उपाय नहीं है। विद्यार्थी-संगठनों को बढावा देना, विशेषत महाविद्यालय के स्तर पर अत्यावश्यक है। शालेय अवस्था में विद्यार्थी बहुत अपरिपक्व रहते हैं। न वे विद्यार्थी-संगठन का अर्थ समझ सकते हैं और न वे उनको चला ही सकते हैं। महाविद्यालय में संगठनों का कार्य एक और बात के लिए भी आवश्यक है। इन संगठनों के कार्य द्वारा तरुणों में विद्यमान अतिरिक्त शक्ति को समुचित दिशा प्राप्त होती है।

युवकों की निराशा के कारणों पर विचार : श्री गुरूजी युवकों की अनुशासनहीनता के पीछे छिपे कारणों पर बात करते हुए कहते हैं कि आज के युवकों पर सद्‌वर्तन के कोई भी संस्कार नहीं किए जाते। उन्हें जीवन में एक प्रकार की अस्थिरता एव असुरक्षितता दिखाई देती है। परिणाम यह हुआ है कि वे हताश हो गए हैं। जिसके लिए वे अपनी शक्तियाँ लगाएँ और यत्न करें, ऐसा न तो कोई ध्येय उनके सामने है और न जनता में तथाकथित नेताओं अथवा मार्गदर्शकों का कोई प्रेरणादायक आदर्श ही है। ‘गृह’ नाम की संस्था आज पूरी तरह ढह गई है। ये कुछ कारण हैं, जिनके फलस्वरूप क्षोभ, अशांति, आदि बातें उत्पन्न होती हैं। इन्हीं को हम युवकों, अर्थात्‌ विद्यार्थियों की अनुशासनहीनता कहते हैं।श्री गुरूजी का विचार है कि विद्यार्थी अवस्था में सादगी व संयम-नियमपूर्वक रहने, मन को व्यसनों और दुर्गुणों की ओर जाने का अवसर न देने आदि की सतर्कता यदि हम रखते हैं, तो युवक अवांछनीय कार्यो एव अवांछनीय व्यवहार से दूर रह सकते हैं।

विद्यार्थियों और युवकों के लिए ध्येयोन्मुख शिक्षा–प्रणाली जरूरी : श्री गुरूजी चिंतन करते हैं कि अपने इस विशाल युवक समुदाय को महान समाज-रचना में योग्य एव गुणवान नागरिक किस प्रकार बनाया जाए, यही आज की वास्तविक समस्या है। इस समस्या का हल केवल सतही विचार करने से अथवा ऊपर-ऊपर मरहम-पट्टी करने से नहीं निकलेगा।  इसके लिए श्रीगुरूजी ध्येयोन्मुख शिक्षा-प्रणाली को उपाय के रूप में देखते हैं। उनका विचार है कि विद्यार्थियों की ग्रहणशील आयु में, उनके मन पर सतत संस्कारों से यह सत्य अंकित कर देना चाहिए कि कर्त्तव्य सर्वोपरि है और सब अधिकार, चाहे व्यक्ति के हों, चाहे समूह के, कर्त्तव्य-सापेक्ष हैं और कर्त्तव्य की तुलना में गौण हैं। विद्यार्थियों में समुचित कर्त्तव्य-भावना जागृत करने के लिए हमारी शिक्षा-प्रणाली ध्येयोन्मुख होनी चाहिए।

संघ और महिलाएँ

 

हमारी परिवार व्यवस्था की धुरी माँ होती है। मातृशक्ति का सम्मान करने का स्वभाव परिवार के प्रत्येक सदस्य में आना चाहिए। सामूहिक निर्णय हमारे परिवार की परंपरा बननी चाहिए। परिवार के सदस्यों में अधिकारों की जगह कर्तव्यों पर चर्चा होनी चाहिए। प्रत्येक के कर्तव्य-पालन में ही दूसरे के अधिकार निहित हैं। (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा, ग्वालियर, 10 मार्च 2019, प्रस्ताव-1)

मातृशक्ति पर सरसंघचालक जी के विचार :

  • संघ में महिलाओं की स्थिति : डॉ. हेडगेवार से एक महिला ने 1931 में पूछा कि आप बात कर रहे हो हिन्दू समाज के संगठन की, लेकिन 50 प्रतिशत महिलाओं को तो वैसे ही छोड़ दिया आपने। तब डॉ. हेडगेवार ने उनको कहा कि आपकी बात बिल्कुल ठीक है, परंतु आज वातावरण ऐसा नहीं है कि पुरुष जाकर महिलाओं में काम करे। इससे कई प्रकार की गलतफहमियों को मौका मिलता है। कोई महिला अगर काम करने को जाती है तो हम उसकी पूरी मदद करेंगे। तब उस महिला ने इसी प्रकार चलने वाला एक ‘राष्ट्र सेविका समिति’ नाम का संगठन चलाया। आज वह भी भारतव्यापी संगठन बन गया है। संघ के संस्कारों की कार्यपद्धति पुरुषों के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में, महिलाओं के लिए राष्ट्र सेविका समिति में, ये दोनों समानांतर चलेंगे। एक-दूसरे के कार्यक्षेत्र में काम नहीं करेंगे, एक-दूसरे की हमेशा मदद करके चलेंगे। ये उस समय तय हुआ। अगर इसको बदलना है तो दोनों तरफ लगना चाहिए कि इसको बदलना है तब वह होगा, नहीं तो नहीं होगा, ऐसे ही चलेगा। परंतु संघ के स्वयंसेवक जो अन्य काम करते हैं, सेवा कार्य करते हैं, 1 लाख 70 हजार से ऊपर छोटे-बड़े सेवा प्रकल्प चलते हैं। यह 5 साल के पहले का आँकड़ा है, 5 साल के बाद की गिनती अभी हो रही है। इस साल वह आँकड़ा आ जाएगा। उसमें तो महिला, पुरुष सभी काम करते हैं। संघ कोई संन्यासियों का संगठन नहीं है। अधिकांश स्वयंसेवक गृहस्थ कार्यकर्ता हैं। घरों में आना-जाना रहता है। हमारी माताएँ, बहनें अपनी-अपनी जगह से भी बहुत मदद सीधे संघ के कार्य को करती हैं। इतने सारे विविध कार्य चलते हैं, उसमें महिलाएँ आई हैं और आगे भी आएंगी। (भविष्य का भारत, पृष्ठ 37)

 

  • संघ में महिलाओं की भागीदारी : संघ के प्रारम्भिक दिनों में, 1933 के आस पास, यह व्यवस्था बनी कि महिलाओं में व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन का काम राष्ट्र सेविका समिति के द्वारा ही होगा। वह व्यवस्था चल रही है। जब राष्ट्र सेविका समिति कहेगी कि संघ भी महिलाओं में यह काम करे, तभी हम उसमें जाएंगे। दूसरी बात ये है कि संघ की शाखा का कार्यक्रम पुरुषों के लिए है। उन कार्यक्रमों को देखने के लिए महिलाएं आ सकती हैं और आती भी हैं। परन्तु संघ का कार्य केवल कार्यकर्ताओं के भरोसे नहीं चलता। हमारी माता-बहनों का हाथ लगता है, तभी संघ चलता है। संघ के स्वयंसेवक के घर में जितनी भी महिलाएं हैं, उतनी महिलाएं संघ में हैं। विभिन्न संगठनों में भी महिलाएं संघ के स्वयंसेवकों के साथ मिलकर काम करती हैं। संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में भी उनका प्रतिनिधित्व और सक्रिय सहभागिता है। इन महिलाओं ने पहली बार भारत के महिला जगत का व्यापक सर्वेक्षण किया, जिसको शासन ने भी स्वीकारा है। उन्हीं के द्वारा पिछले वर्ष सारे देश में बहुत बड़े महिला सम्मेलन हुए, जिनमें लाखों महिलाओं ने भाग लिया। इन सब कार्यों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन व सहयोग रहा। हम यह मानते हैं कि महिलाओं का उद्धार पुरुष नहीं कर सकते। महिलाएं स्वयं अपना उद्धार करेंगी, उसमें सबका उद्धार हो जाएगा। इसलिए हम उन्हीं को प्रमुखता देते हैं और जो वे करना चाहती हैं, उसके लिए उनको सशक्त बनाते हैं। (डॉ. मोहन भागवत, साक्षात्कार@संघ शताब्दी, 10 अप्रैल 2025, विमर्श प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 26)

 

  • महिलाओं का विचार करते समय भी हमारा विचार यही है। हमारे देश में प्राचीन समय से ही महिलाओं को अत्यंत बड़ा स्थान दिया है। वैचारिक रूप से उन्हें हम शक्तिस्वरूपा, जगदंबा का रूप मानते हैं, लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं होता है। अब ये तो ठीक है कि उनको भगवान बनाकर मंदिर में स्थापित करके पूजने की भी आवश्यकता नहीं और ना ही उनको दासता की कड़ी में ढकेलने की जरूरत है। महिला समाज का एक हिस्सा होने के नाते समाज जीवन के सब प्रयासों में बराबरी की हिस्सेदार है, बराबरी की जिम्मेदार है और उसी तरह उनके साथ व्यवहार होना चाहिए। लेकिन यह इस ढंग से नहीं होना चाहिए कि बेचारी महिला का ‘हम उद्धार करेंगे’। हमारा और आपका भी यह अनुभव होगा कि कई मामलों में महिलाएँ पुरुषों से ज्यादा समर्थ हैं, पुरुषों की तुलना में वे उसी काम को अधिक कुशलता और निपुणता से कर लेती हैं। उनको और सशक्त करने की जरूरत है, स्वतंत्रता देने की जरूरत है और ऐसे काम करने के लिए उनको प्रबुद्ध बनाने की जरूरत है। (डॉ. मोहनराव भागवत, भविष्य का भारत, विमर्श प्रकाशन, नई दिल्ली,पृष्ठ 44)
  • संघ की इच्छा है कि अपने घर से लेकर समाज के प्रत्येक क्षेत्र में सर्वत्र मातृशक्ति जागरण का काम होना चाहिए। संघ के स्वयंसेवक और संघ के साथ जुड़े हुए परिवारों की महिलाएँ, स्वयंसेवकों द्वारा चलाए जा रहे अनेक संगठनों में सहभागी महिलाएँ मिलकर ये काम करती हैं। महिला और पुरुष एक–दूसरे के पूरक हैं, सार्थक जीवन के लिए दोनों को बराबरी से काम करना होगा। निर्णयों से लेकर दायित्वों तक में उनकी बराबरी से सहभागिता होनी चाहिए, राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका भी होनी चाहिए। महिलाओं के बारे में संघ का यह सुविचारित मत है। (डॉ. मोहनराव भागवत, भविष्य का भारत, विमर्श प्रकाशन, नई दिल्ली,पृष्ठ 44)

 

  • महिलाएँ और संघ का दृष्टिकोण : लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा- यह सुनिश्चित करने के लिए दो-तीन बातें करनी पड़ेंगी। पुराने जमाने में महिलाओं का जब घर के अंदर बंद होना निश्चित रहता था तब उसकी जिम्मेवारी परिवार पर रहती थी। लेकिन अब महिलाएँ भी पुरुषों की बराबरी से बाहर आकर कर्तृत्व दिखा रही हैं और उन्होंने दिखाना चाहिए। तो उनको अपनी सुरक्षा के लिए भी सजग और सक्षम बनाना पड़ेगा। इसलिए किशोर आयु के लड़के और लड़की दोनों का प्रशिक्षण करना पड़ेगा- किशोरी विकास, किशोर विकास। ये काम संघ के स्वयंसेवक कर रहे हैं, क्योंकि महिला असुरक्षित कब हो जाती है, जब पुरुष उसकी ओर देखने की अपनी दृष्टि को बदलता है। (भविष्य का भारत, पृष्ठ 77)
  • जब सुप्रीम कोर्ट से बलात्कारियों को कड़ी सजा हो गई थी, उसकी चर्चा टी.वी. पर चल रही थी। मैं बैठा सुन रहा था तो एक महिला पत्रकार कह रही थी कि केवल अपराधियों को सजा होने से काम नहीं चलता। मूल समस्या यह है कि महिलाओं को देखने की पुरुष की दृष्टि बदलनी पड़ेगी। यह दृष्टि हमारी परम्परा में है ‘मातृवत् परदारेषु‘। अपनी ब्याहता पत्नी छोड़कर बाकी सबको माता के रूप में देखना। यह अपना आदर्श है। उन संस्कारों को पुरुषों में भी जगाना पड़ेगा। इसलिए किशोर और किशोरी विकास के उपक्रम चलें और महिलाओं को आत्मसंरक्षण की कला सिखाने वाले उपक्रम भी बढ़ें। इसमें भी स्वयंसेवकों ने काम प्रारंभ किया है। बड़ी मात्रा में स्कूल, कॉलेज की छात्राओं को इसका प्रशिक्षण देना और फिर प्रशिक्षण की स्पर्धाएँ भी आयोजित करना, पिछले वर्ष से ये उपक्रम शुरु हुआ है। आगे चलकर देश के सब राज्यों में ये शुरु होगा। संघ के स्वयंसेवक इसको करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल शाखा चलाता है, और कुछ नहीं करता। लेकिन संघ के स्वयंसेवक ये करते हैं तो विद्यार्थी परिषद् के द्वारा यह उपक्रम शुरु किया गया है और उसके बड़े-बड़े कार्यक्रम हो रहे हैं और यह प्रशिक्षण दिया जा रहा है। वे देशव्यापी कार्यक्रम चलाएंगे। (भविष्य का भारत, पृष्ठ 77)
  • मातृशक्ति के सशक्तिकरण की बात आज हम करते हैं, लेकिन मातृशक्ति कितनी सशक्त है और क्या- क्या कर सकती है, कैसे कर सकती है? इसका अनुकरण करने लायक आदर्श देवी अहिल्याबाई ने अपने जीवन से हम सब लोगों के सामने रखा है। उन्होंने जो काम किया वो अनेक प्रकार से विशेष है। राज्य को उन्होंने कुशलतापूर्वक चलाया। उस समय सभी राज्यकर्ताओं से उनके संबंध मित्रता के थे, इतना ही नहीं तो आसपास के सभी राज्यकर्ता भी उनको देवी स्वरूपा मानते थे। इतनी श्रद्धा और आदर उनके बारे में समकालीन राज्यकर्ताओं में था। राज्य पर कोई आक्रमण न हो, इसलिए समरनीति की जानकार के रूप में भी उनको जाना जाता है। बड़ी सेना लेकर राघोबा दादा आए थे, लेकिन उन्होंने अपनी नीति से और बिना संघर्ष के उस आपत्ति का निवारण कर दिया। ऐसी कुशल प्रशासक, उत्तम राज्यकर्ता, सामरिक और राजनयिक कर्तव्यों में माहिर राज्यकर्ता थीं, और केवल अपने राज्य की उन्होंने चिंता नहीं की पूरे देश की चिंता की।
  • अपने देश की संस्कृति का जो आधार है, उसको पुष्ट करने के लिए देश में अनेक स्थानों पर उन्होंने मंदिर बनवाए। स्वयं राज्य करती थीं, तो भी अपने को राजा नहीं मानती थीं। “श्री शंकर कृपे करूण” ऐसा लिखती थीं। श्री शंकर आज्ञेकरूण – शिव भगवान की आज्ञा से राज्य चला रहीं हैं, ऐसा उनका भाव था। उन्होंने कई जगह मंदिर बनवाए, नदियों पर घाट बनवाए, धर्मशालाएं बनवाई। उन्होंने सारे भारत में यह कार्य किया। जो धर्मयात्राओं के मार्ग थे और व्यापारिक आने जाने के मार्ग थे, उन पर यह सारे काम किए ताकि पूर्ववत भारत की सारी जनता का आना जाना अपने सांस्कृतिक स्थलों में और अपनी आजीविका के लिए सर्वत्र चलता रहे। एकात्मता बनती रहे, बढ़ती रहे। इतना दूर का विचार करके उन्होंने यह काम किया और विशेष है कि अपनी धर्म श्रद्धा के कारण किया। इसलिए उन्होंने यह सारा काम अपनी निजी संपत्ति में से किया।
  • स्वयं रानी होकर बहुत सादगी से रहती थीं। इस प्रकार प्रजा का पालन, राज्य का संचालन, राज्य की सुरक्षा, देश की एकात्मता-अखंडता, सामाजिक समरसता, सुशीलता और सादगी, इनका आदर्श रखने वाली एक महिला राज्यकर्ता, आदर्श महिला इस प्रकार पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई का चित्र हमारे सामने है। (पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर महिलाओं के कर्तृत्व की क्षमता की प्रतीक हैं – पूजनीय सरसंघचालक जी)

मातृशक्ति संगम : जयपुर में सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी का व्याख्यान 29 सितम्बर, 2018

  • राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने कहा कि भारतीय विचार परम्परा में पुरुष और महिला को एक–दूसरे का पूरक माना गया है। महिला और पुरुष दोनों के अपनी–अपनी प्राकृतिक गुण संपदा के आधार पर साथ चलने से ही सृष्टि चलती है। उन्होंने कहा कि महिलाओं में कई भिन्न–भिन्न कार्यों को साथ–साथ कर पाने की नैसर्गिक क्षमता होती है। पुरुष अपनी आजीविका के माध्यम से परिवार को चलाने और उसे सुरक्षा प्रदान करने का काम करते हैं, तो महिलाएं इन कार्यों के साथ–साथ संतान को अपने वात्सल्य भाव से योग्य बनाने और परिवार को एक बनाए रखने की जिम्मेदारी भी कुशलता से निर्वहन करती हैं। महिलाएं पुरूषों से किसी भी तरह कमतर नहीं हैं, अपितु जो कार्य पुरुषों के लिए सम्भव नहीं, वह कार्य भी महिला करने में समर्थ है। देश का 50% हिस्सा महिलाओं का है,उनके सहयोग के बिना देश की उन्नति संभव नहीं। सरसंघचालक जी शनिवार 29 सितंबर को जयपुर के इंदिरा गांधी पंचायती राज संस्थान में आयोजित मातृशक्ति संगम को सम्बोधित कर रहे थे।
  • उन्होंने कहा कि संघ में व्यक्ति नहीं परिवार जुड़ता है। महिलाओं के सहयोग के बिना पुरूषों के लिए संघ कार्य को पर्याप्त समय देना सम्भव नहीं।संघ के व्यापक तौर में सीधे रूप से सेवा, संपर्क, प्रचार, कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता आदि में भी मातृशक्ति सहयोग कर रही है। जिस प्रकार महिलाएं परिवार का कुशल नेतृत्व करती आई हैं, उसी प्रकार आज के समय में समाज के भी प्रमुख कार्यों में नेतृत्व दे रही हैं, यह हमारे लिए अच्छे संकेत हैं।
  • महिला सुरक्षा के लिए कठोर कानून क़ी आवश्यकता है, परंतु कानून की अपनी सीमाएं है। सिर्फ कठोर कानून बनाने से नहीं समाज जागरण से ही पूर्ण समाधान संभव है। विवेक विकसित करने और संस्कारों के संपादन से ही यह हमको करना होगा। उन्होंने कहा कि इसी कारण भारतीय संस्कृति में वह नारी शक्ति के बजाय मातृशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित है, जबकि पश्चिम में महिला को मात्र स्त्री और पत्नी के रूप में देखा गया।
  • डॉ मोहन जी ने कहा कि आधुनिक परिप्रेक्ष्य में नारी सशक्तिकरण आंदोलन पश्चिम की देन माना जाता है, लेकिन वहां पुरुष को अधिकार-सक्षम और महिला को गुलाम मान कर नारी मुक्ति पर बल दिया गया। इसका परिणाम वहां परिवार और विवाह संस्था पर खतरे के रूप में सामने आया। उन्होंने कहा कि भारत में परिवार संस्था कई विषम परिस्थितियों को झेलने के बाद भी सुदृढ़ बनी हुई है, जिससे सीख लेते हुए आज पश्चिम में भी परिवार संस्था को पुनः मजबूत करने के प्रयास होने लगे हैं।
  • पुरुषों को महिलाओं को देवी अथवा दासी मानने के स्थान पर वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप उनके प्रति अपनी सोच बदलनी होगी। पौराणिक कथाओं में ऐसे कई उल्लेख मिलते हैं कि जब देवता भी किसी कार्य को पूर्ण नहीं कर सके तो वे उसके लिए जगतजननी की शरण में गए। इसलिए महिलाओं का अपने कल्याण के लिए पुरुषों की ओर देखने के बजाय स्वयं ही जाग्रत होना होगा।
  • सरसंघचालक जी ने कहा कि मातृशक्ति का उत्थान इस राष्ट्र की उन्नति के लिए अनिवार्य शर्त है, जबकि रीति-रिवाज, परिवेश और परिस्थिति के अनुसार भारत में अलग-अलग स्थानों पर महिलाओं की स्थिति में बहुत बड़ा अंतर है। उन्होंने आह्वान किया कि समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रमुख भूमिका निभा रही महिलाएं मातृशक्ति के उत्थान के लिए आगे आएं।
  • उन्होंने कुटुम्ब में संस्कारों का स्तर गिरने और इंटरनेट सहित बाहरी प्रभावों के कारण बाल मनोवृत्ति पर हो रहे दुष्प्रभाव के बारे में चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि दबे पांव, चोरी छिपे आ रहे सांस्कृतिक संकट से अपने परिवार और समाज को बचाने के लिए महिलाओं को आगे आना होगा।वर्तमान समय में हमें अपने अंदर नीतिकारक और अनीतिकारक में भेद करने की दृष्टि विकसित करनी होगी, इसके लिए हमें Legality (विधि संगत) के साथ Morality (नैतिकता) और Naturality (प्रकृति सम्मत) का भी विचार करना होगा।
  • मातृशक्ति संगम में राजस्थान के सभी जिलों के विभिन्न स्थानों पर समाज जीवन में अग्रणी भूमिका निभा रही 284 महिलाएं उपस्थित रहीं।

प्रश्न : संघ में महिलाओं की भागीदारी को लेकर क्यों प्रश्न खड़े होते हैं ?

जवाब : संघ की मुख्य संगठनात्मक संरचना का प्रारूप शुरुआत से ही ऐसा है, जिसमें पुरुषों को शामिल किया जाता है। किन्तु इसका आशय यह नहीं है कि यह महिला विरोधी है अथवा महिलाओं को लेकर समाज से कोई भिन्न राय रखता है। सरसंघचालक डॉ. भागवत के अनुसार “संघ महिलाओं को हाशिये पर नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र-निर्माण की केंद्रीय शक्ति के रूप में देखता है। संगठनात्मक संरचना भले भिन्न हो, पर वैचारिक स्तर पर पुरुष और महिला – दोनों की भूमिका समान रूप से अनिवार्य मानी जाती है।“

सितंबर 2025 में एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान सरसंघचालक डॉ. भागवत ने कहा था, “मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि संघ में कितनी महिलाएँ हैं। मेरा उत्तर है, संघ में जितने पुरुष हैं, उतनी ही महिलाएँ भी हैं।” उन्होंने आगे कहा कि संघ का कार्य महिलाओं के बिना संभव ही नहीं है। कोई भी स्वयंसेवक अपनी माँ, पत्नी या बहन के सहयोग और सहमति के बिना संघ कार्य नहीं कर सकता। समाज के लिए स्वयंसेवक जो दायित्व निभाते हैं, उसके पीछे परिवार की महिलाओं की मौन लेकिन निर्णायक भूमिका होती है।“

संघ का मानना है कि समाज में वास्तविक परिवर्तन लाना है, तो आधी आबादी को अलग रखकर ऐसा संभव नहीं है। इसी सोच के अनुरूप महिलाओं के लिए संघ की विचारधारा से प्रेरित राष्ट्रीय सेविका समिति कार्यरत है, जो महिलाओं के चरित्र-निर्माण, नेतृत्व विकास, सामाजिक सेवा और राष्ट्रबोध के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाती है।

यह सर्वविदित है संघ की स्थापना के एक दशक के बाद, 1936 में ‘राष्ट्र सेविका समिति’ का गठन हुआ था। यह कार्य डॉ. हेडगेवार के समय ही हुआ था। इसकी संस्थापक वन्दनीय लक्ष्मीबाई केलकर ‘मौसी जी’थी और वह श्रीगुरूजी के समकालीन थी। उनके बाद, सेविका समिति का कार्य सरस्वती बाई आपटे जी, उषा ताई चाटी जी, प्रमिलाताई मेढे जी ने आगे बढ़ाया और वर्तमान में शान्ताक्का जी इसे संभाल रही है।

सेविका समिति की लगभग 4900 दैनिक शाखाएं लगती है। साथ ही, इसके वार्षिक प्रशिक्षण वर्गों में 10,000 महिलायें हिस्सा लेती हैं। इसके साथ-साथ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् में 1948 से ही छात्राएं शामिल होती रही है।

यही नहीं, संघ से जुड़े कई अनुषांगिक संगठनों – अधिवक्ता परिषद, इतिहास संकलन समिति, भारतीय मजदूर संघ, विज्ञान भारती, विद्या भारती, भारतीय जनता पार्टी, अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम,संस्कार भारती, और प्रज्ञा प्रवाह में न सिर्फ महिलाओं की प्रत्यक्ष भागीदारी देखी जा सकती है बल्कि महिला-विमर्श से जुड़ें प्रत्येक पहलू पर भी ये सभी संगठन विचार-विमर्श करते रहते हैं।

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