उद्योग नीति आदि के माध्यम से भारत का निर्माण करने वाले नेहरू थे या डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी? 

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पंकज कुमार झा

रायपुर : पिछले पोस्ट में अपन ने पूछा था कि स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग मंत्री कौन थे? अनेक मित्रों ने सही ही जवाब दिया है कि डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे।

स्वतंत्रता उपरांत नेहरू कैबिनेट में ऐसे दो मंत्री बने, जो कांग्रेस से नहीं थे। जिन्हें गांधीजी के दबाव के कारण बिल्कुल अनिच्छा से नेहरू ने अपनी टीम में शामिल किया था। दोनों को अंततः निकल भी जाना पड़ा नेहरू सरकार से। किंतु दोनों ने जाते-जाते भी अपना काम कर दिया था।

जहां अंबेडकर जी के पास विधि-विधायी काम आया। संविधान निर्माण का काम आया, वहीं डॉक्टर मुखर्जी के पास भारत की उद्योग नीति आदि बनाने का। नए भारत का औद्योगिक पथ कैसा हो, इसे तय करने का।

डॉक्टर अंबेडकर ने अपना काम इस बेहतरीन ढंग से किया कि उन्हें हम सभी संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं, भले संविधान सभा के अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद रहे हों। है न?

किंतु डॉक्टर मुखर्जी उद्योग-व्यापार आदि की दृष्टि से भारत निर्माता कहे जाने योग्य हैं जिनका श्रेय पंडित नेहरू ने हड़प लिया। गलत तो नहीं है एम यह तथ्य?

स्वतंत्रता में तुरंत बाद भारत की दशा और दोष तय होनी थी। पहले प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू के पास हजार कार्य और लाख व्यस्तता थी। भारत विभाजन, शरणार्थी संकट, साम्प्रदायिक विषय, नए शासन की नीति, शिक्षा नीति, भाषा, कृषि, रोजी-रोजगार समेत हजार तरह के विषय थे जिसे उन्हें देखना था। ऐसे में ….

ऐसे में क्या उनके पास इतना समय रहा होगा कि वे उद्योग नीति के बारे में पूर्णकालिक ढंग से सोच-विचार कर सकें? और ऐसा वे करते भी क्यों भला? उनकी टीम में इस कार्य के लिए ऐसे विद्वान डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे, जिनकी विद्वता नेहरू से तो अधिक ही थी। है न?

जो सबसे कम उम्र के तब के सबसे प्रतिष्ठित कोलकाता विश्वविद्यालय के वीसी रह चुके थे। जो हमेशा भारतीय संस्कृति, जीवन पद्धति और महान सनातन दर्शन के आधार पर भारत को आगे ले जाना चाहते थे। जिनके पिता आशुतोष मुखर्जी भी वीसी और बहुत बड़े कानूनविद थे। तो पारिवारिक रूप से भी वही चिंतन उन्हें विरासत में मिली थी। ऐसे में ..

ऐसे में गांधी की पसंद और उनके दर्शन के आधार पर भारत की अर्थ-उद्योग नीति को आकार देने में डॉक्टर मुखर्जी अधिक सक्षम हो सकते थे, थे भी।

इधर व्यस्तता और अपेक्षाकृत कम समझ के कारण निश्चित ही इस मामले में पंडित नेहरू, डॉक्टर मुखर्जी पर निर्भर होते। थे भी।

अतः यह तार्किक और प्रामाणिक रूप से उचित होगा कि जिस तरह संविधान निर्माता भारत रत्न अम्बेडकर को कहा जाता है, उसी तरह उद्योग आदि की दृष्टि से भारत निर्माता डॉक्टर मुखर्जी को कहा जाना चाहिए। नेता में रूप में भले सामने नेहरू हों लेकिन भिलाई संयंत्र समेत तमाम औद्योगिक इकाइयों समेत तमाम सार्वजनिक क्षेत्र के औद्योगिक संस्थानों के सृजन और औद्योगिक नीति आदि के निर्माण का श्रेय डॉक्टर मुखर्जी को जाना चाहिए।

जम्मू कश्मीर के संवैधानिक एकीकरण के लिए डॉक्टर मुखर्जी ने जीवन बलिदान दिया जिन्हें सच्ची श्रद्धांजलि Narendra Modi जी ने अनुच्छेद 370 और 35 अ जैसे सफेद कानूनों को घिस कर दिया। इसी तरह डॉक्टर मुखर्जी की औद्योगिक नीति को भी अधिक बेहतर तरीके से लागू कर भी मोदीजी ने डॉक्टर मुखर्जी के कृतित्व को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि दी है।

संविधान निर्माता अम्बेडकर और भारत के अर्थतंत्र के निर्माता डॉक्टर मुखर्जी, दोनों की स्मृति को सादर नमन। इन दोनों को कृतित्व को कभी उचित ढंग से नेहरू और उनके खानदान द्वारा समर्पित नहीं किया गया। मोदीजी में इन दोनों के महान कार्यों को जनमानस तक पहुंचा कर श्रेष्ठ कार्य किया है।

इतिहास में अब इन दोनों का स्थान किसी भी वंशवादी सत्ता से अधिक बेहतर ढंग से प्रतिष्ठापित किया गया है। भारत का उद्योग जगत अब एक प्रणेता में बतौर डॉक्टर मुखर्जी को सदा वंदन करेगा। ऐसा ही करना भी चाहिए। हमें अपने पुरखों के यश पर फैलाए गए धुंध को साफ करते रहने का कार्य करते रहना होगा।

Yoga Not A Philosophy Or Religion, Yoga Is Science For Inner Well-Being: Sadhguru On IDY 2026

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  • On International Day of Yoga 2026, Isha Foundation conducted yoga sessions for Central Reserve Police Force (CRPF) at Adiyogi in Coimbatore and for NCC cadets, Border Security Force (BSF) at Sadhguru Sannidhi Bengaluru.
  • Nearly 1000 free yoga and meditation sessions were also organized across India, reaching an estimated 50,000 participants from corporates, educational institutions, medical establishments, government bodies, defense organizations and community spaces.

Bengaluru : On 12th International Day of Yoga, Sadhguru, Founder – Isha Foundation, said, “Twelve years as you know is an approximate solar cycle. So we completed one cycle of this International Yoga Day. It’s time to pitch it up so that nobody in this world goes without knowing that there are ways to fix themselves.”

Emphasizing the true purpose of yoga, Sadhguru said, “What we call as yoga is not a philosophy, is not an ideology, not a belief system, not a religion, nor definitely it is not about twisting and turning your body as a lot of people seem to understand.” He described yoga as a reminder that “as there is a science and technology for external well-being, there is a whole science and technology for inner well-being.”

He stressed that many of the challenges faced by humanity stem from a lack of understanding of the fundamental basis of human experience. “Human experience happens from within us. If we want to bring human experience to its full potential, ‘IN’ is the only way out. This needs to happen. This is the fundamental goal of yoga.”

Marking the occasion, Isha Foundation conducted nearly 1,000 free yoga and meditation sessions across India, reaching an estimated 50,000 participants from corporates, educational institutions, medical establishments, government bodies, defense organizations and community spaces. Participants were introduced to simple yogic practices and meditation tools designed to support physical health, mental wellbeing and overall quality of life.

At the Isha Yoga Center Coimbatore, more than 700 people participated in the International Day of Yoga celebrations, including 500 students from the Young Indians Coimbatore Chapter and 200 personnel from the Central Reserve Police Force (CRPF). At Sadhguru Sannidhi Bengaluru, more than 2,500 participants, including NCC cadets, Border Security Force personnel, students, villagers, volunteers and members of the public, came together for yoga and meditation sessions in the presence of Adiyogi.

On the occasion of International Day of Yoga, six new languages – Gujarati, Kannada, Malayalam, Bangla, Italian and Nepali were added to Sadhguru’s free guided meditation app, Miracle of Mind, expanding access to the seven-minute meditation practice for people across diverse linguistic communities worldwide.

21 जून योग दिवस : तन मन और जीवन को स्वस्थ्य रखने के संकल्प का दिन

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दिल्ली । भारत की पहल पर पूरे संसार में आयोजित अंतराष्ट्रीय योग दिवस का इस वर्ष बारहवाँ आयाम है। इसका आयोजन भारतीय ज्ञान परंपरा की वैश्विक मान्यता का दिवस है। यह शरीर और मन मष्तिष्क के साथ संपूर्ण यूनिवर्स से तादात्म्य स्थापित कर जीवन को समृद्ध बनाने का संकल्प दिवस है।
21 जून अंतराष्ट्रीय योग दिवस है। आरोग्य रहकर सृष्टि के विविध रहस्यों से एकाकार होने का माध्यम है योग। भारत के प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी ने विश्व नेतृत्व को इस अद्भुत विधा से अवगत कराया था। प्रारंभिक चर्चा और बैठकों के बाद संयुक्त राष्ट्रसंघ ने विशेषज्ञों से भी परामर्श किया। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासचिव की सहमति से मोदीजी ने 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में योग की अंतर्राष्ट्रीय मान्यता और वर्ष में एक दिन योग दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव पारित हुआ और 21 जून 2015 को पहला अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस आयोजित हुआ। पूरे संसार में इस वर्ष बारहवाँ योग दिवस आयोजित हो रहा है। गतवर्ष दुनियाँ के 180 से अधिक देशों ने 21जून को योग दिवस आयोजन किया था। कुछ देशों ने तो नियमित अभ्यास और शिक्षण की व्यवस्था भी आरंभ की है। योग दिवस केलिये 21 जून को निर्धारण सामान्य अथवा किसी व्यक्ति विशेष के स्मरण का दिन नहीं है। इस तिथि का निर्धारण वैज्ञानिक अनुसंधान के आधार पर सुनिश्चित हुआ है। 21 जून को उत्तरी गोलार्ध में वर्ष का सबसे लंबा दिन होता है। इसका सीधा प्रभाव सूर्य से धरती पर आने वाले प्रकाश और तापमान के संतुलन से पड़ता है। सूर्य की विभिन्न स्थितियों में उत्सर्जित प्रकाश और ऊर्जा में अंतर आता है। इसे हम प्रतिक्षण बदलते तापमान से समझ सकते हैं। यह धरती के जीवन पर प्रभाव डालती है। योगाभ्यास व्यक्ति के अवचेतन की चेतना को सूर्य की केन्द्रीभूत चेतना से एकाकार करने का प्रयास करता है जो धरती पर जीवन को पल्लवित करती है। सूर्य से ऊर्जा, ऊष्मा और प्रकाश के सहारे ही व्यक्ति अपनी प्रतिभा एवं क्षमता का विकास करता है। जिस प्रकार सूर्य में अनंत ऊर्जा होती है। उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति में भी असीम प्रतिभा होती है। लेकिन इसके माध्यम से वह नई ऊचाइयाँ तभी प्राप्त कर सकता है जब स्वस्थ हो, मनोबल संपन्न हो अपनी प्रतिभा की मौलिकता के अनुरूप जीवन यात्रा का मार्ग निर्धारित करता है। योगाभ्यास उसकी इस मौलिक प्रतिभा और दक्षता को भी उन्नत नहीं करता उसके स्वभाव में संतुलन एवं आत्मविश्वास की वृद्धि भी करता है। जिससे व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का समन्वित विकास कर सके। योगाभ्यास केवल आरोग्य ही नहीं देता वह व्यक्ति की समस्त शारीरिक क्षमताओं का विकास भी करता है। जिससे वह जीवन में आगे बढ़ सके। आज इस तथ्य को पूरे संसार ने स्वीकार किया और योग को अंतराष्ट्रीय मान्यता मिली।

“योग” शब्द का महत्व

भारतीय ज्ञान परंपरा में यौगिक विधा कितनी प्राचीन है, यह कहा नहीं जा सकता। इतिहास में पीछे जहाँ तक दृष्टि जाती है, योग का विवरण मिलता है। गीता महाभारत, उपनिषद या अरण्यक ग्रंथ ही नहीं चारों वेदों में भी योग का उल्लेख है। योग शब्द के दो अर्थ हैं एक सामान्य और दूसरा संस्कृत के भाषा विज्ञान की व्याख्या। शब्द “योग” का सामान्य अर्थ जोड़ना होता है। सूर्य के प्रकाश और ऊर्जा के माध्यम से प्रकृति से जुड़ने की विधा का नाम योग है। यह शब्द संस्कृत की “युज” धातु से बनता है। युज धातु में “यु” पहले आता है। “युग” और “युगान्तरकारी” जैसे शब्द इसी से बनते हैं। फिर प्रत्यय के रूप में “ज” जुड़ता है। “ज” से जन्म और जीवन बनता है। जन्म के बाद जीवन को युगान्तकारी बनाने का संदेश इस युज धातु में है। इसी “युज” धातु से यजुर्वेद शब्द बना है। जो विद्यार्थी किसी सद्गुरू के माध्यम से वैदिक अध्ययन आरंभ करते हैं उन्हें सबसे पहले यजुर्वेद के ज्ञान से ही विद्या आरंभ की जाती है। साधना से आत्मकोष की जाग्रति और सृष्टि की अनंत ऊर्जा से एकात्म होने के सूत्र यजुर्वेद में है। और आत्म जाग्रति की यात्रा आरंभ करने की पहली सीढ़ी योग ही है। इसके लिये मन बुद्धि विचारों के समन्वय और संतुलन के साथ आरोग्य होना आवश्यक है। यदि हम साधना से दूर होकर केवल संसार की यात्रा करें तो भी मन बुद्धि विचारों के संतुलन के साथ आरोग्य होना आवश्यक है। इसलिए भारतीय मनीषियों ने योगाभ्यास के लिये प्रत्येक नागरिक को प्रेरित किया। इसका संबंध किसी धर्म विशेष से अथवा पंथ विशेष से नहीं अपितु मानव मात्र के आरोग्य केलिये है। सूर्य की ऊर्जा और ऊष्मा से पूरे संसार का जीवन चलता है। उस ऊर्जा और ऊष्मा का अपनी क्षमता के अनुरूप अधिकतम आधार प्राप्त करने का माध्यम ही योग है। योग दिवस पर प्रतिवर्ष की थीम अलग होती है। इस वर्ष की थीम “स्वस्थ्य जीवन के लिये योग” है। स्वास्थ्य का संबंध केवल शरीर से ही नहीं होता। यह पूरे जीवन से जुड़ा होता है। आरोग्य और स्वस्थ्य शरीर से संपन्न व्यक्ति ही अपने जीवन को स्वस्थ्य बना सकता है। पूरी दुनियां के वैज्ञानिक और सरकारें इस बात से चिंतित है कि बीमारियाँ शरीर को क्षति पहुंचायी ही हैं। इसके वे मन को भी प्रभावित करती हैं जिससे पूरा जीवन और व्यक्ति की कार्यशैली प्रभावित होती है। केवल शरीर ही नहीं मन बुद्धि और विचार को भी योग द्वारा उन्नत बनाया जा सकता है। ये कुल आठ क्रियाएँ होती हैं। इन यौगिक क्रियाओं को कुल आठ भागों में विभाजित किया गया है। इन्हें “अष्टांग योग” कहा गया है। इनमें यम, नियम, संयम आहार, आसन, ध्यान, धारणा और समाधि है। योगाभ्यास के लिये आवश्यक है कि व्यक्ति के मन और चित्त में एकाग्रता हो किसी भी प्रकार का भटकाव न हो, उसका आहार अर्थात भोजन भी शरीर की आवश्यकता के अनुरूप हो। हम जो भी आहार लेते हैं वह केवल शरीर की आवश्यकता की पूर्ति ही नहीं करता हमारी चित्त वृत्ति को भी प्रभावित करता है इसलिये हमारा आहार भी उचित होना चाहिए। आसन में योगाभ्यास होता है । इसके लिये सूर्योदय और सूर्यास्त का संध्याकाल उचित माना गया है। ध्यानस्थ होने के लिये चित्त और शरीर के विभिन्न चक्र में एकाग्रता आवश्यक है। धारणा उस प्रतीक को कहा गया है जिसके माध्यम से शरीर, मन, बुद्धि और चित्त वृत्ति सब एकाग्र होते हैं और अंत में समाधि की आवश्यकता। यह स्थितप्रज्ञ स्थिति है। इसमें अवचेतन की ऊर्जा जाग्रत होकर चमत्कारिक शक्ति प्रदान करती है।

योग के विविध आयाम

मुख्यतः योग के कुल पांच आयाम होते हैं। इनमें चार केलिये प्रयास किया जाता है लेकिन पाँचवा आयाम परिस्थितिजन्य होता है। इन्हें हम कर्म योग, भक्तियोग, ज्ञान योग, राज योग और भाव योग के नाम से जानते हैं। हमारे कर्म अथवा कार्य या अभ्यास से जो क्रिया होती है, उसे कर्मयोग कहा जाता है। इसमें करणीय कार्य के प्रति पूरी निष्ठा और समर्पण होता है। दूसरा भक्तियोग है। यह सात्विक प्रेम और समर्पण पर केंद्रित होता है। यह ईश्वर के प्रति, गुरु के प्रति, माता पिता अथवा किसी भी आदर्श पात्र के प्रति हो सकती है। तीसरा ज्ञान योग है यह शरीर, इन्द्रियों और मन से बुद्धि के विकास पर केंद्रित होता इसमें व्यक्ति अपनी ज्ञान वृद्धि केलिये अध्ययन, अभ्यास शिक्षण, प्रशिक्षण और सत्संग करता है। चौथा राज योग है। यह कठोर साधना का आयाम है। आत्म विकास के लिये व्रत, उपवास, योगासन, ध्यान प्रणायाम से लेकर समाधि तक की साधना इसी योग के अंतर्गत मानी जाती है। पाँचवा भाव योग है। यह परिस्थिति जन्य होता है। मनुष्य की पाँचों ज्ञानेन्दियाँ सदैव सक्रिय रहती हैं। देखकर, सुनकर, छूकर अथवा स्वाद के बाद व्यक्ति जिन भावों से जुड़ता है वह भाव योग है। इसमें हर्ष भी हो सकता है और विषाद भी। जैसे महाभारत युद्ध केलिये एकत्र हुये अपने परिजनों को देखकर अर्जुन के मन में जो भाव उत्पन्न हुये उसे विषाद योग कहा गया।

वर्तमान परिस्थिति में योग दिवस का महत्व

अंतराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन एक ओर भारतीय ज्ञान की समृद्धि की ओर पूरे संसार का ध्यान आकर्षित करता ही है। वहीं प्रगति केलिये वर्तमान वैश्विक स्पर्धा में भी इसका महत्व और बढ़ गया है। योगाभ्यास व्यक्ति को सामाज, राष्ट्र, पूरे वैश्व ही नहीं संपूर्ण सृष्टि को एक सूत्र में पिरोता है। योगाभ्यास से शरीर को स्वस्थ रहता है और मन शांत रहता है। इसके साथ शरीर और मन के बीच समन्वय भी रहता है। शरीर और मन के समन्वय से बुद्धि प्रखर होती है। निरन्तर योगाभ्यास करने वाले तनाव, अवसाद जैसे मनोरोगों से दूर रहते हैं वहीं उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा जैसे शारीरिक रोगों से भी मुक्त रहते हैं। आज जीवन शैली केवल प्रकृति को ही प्रदूषित नहीं कर रही अपितु मनुष्य को अनेक शारीरिक और मानसिक रोगों से जकड़ रही है। रोज किसी नये रोग के फैलने का समाचार आता है। जब तक रोग के उपचार खोजे जाते हैं तब तक अनेक प्राणी अपने प्राण गंवा चुके होते हैं। इसके अतिरिक्त आधुनिक युग की उपचार प्रणाली भी बहुत मंहगी हो गई है। कुछ बीमारियाँ तो ऐसी हैं जिनमें जीवन भर की कमाई चली जाती है। मनुष्य के शरीर में किसी भी रोग से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता होती है। यदि व्यक्ति जागरूक है, उसकी प्रतिरोधक क्षमता सक्षम है तो किसी रोग का मुकाबला सरलता से किया जा सकता है। अग्रिम सावधानी आवश्यक है। इसलिए आज के संदर्भ में योग अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इसलिए पूरी दुनियाँ ने इसे माना और 21 जून को अंतराष्ट्रीय योग दिवस के माध्यम से जाग्रति अभियान आरंभ किया है।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस : 12 वर्षों की कुछ ऐसी रही भारत में योग यात्रा

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल । आज यानी 21 जून को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस अब वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य, संतुलन और सकारात्मक जीवनशैली का जन-आंदोलन बन चुका है। वर्ष 2015 में इसकी शुरुआत हुई थी और अब 12 वर्षों की यात्रा तय करते हुए यह दुनिया के सबसे बड़े सहभागी आरोग्य अभियानों में शुमार हो चुका है। वर्ष 2026 की थीम ‘स्वस्थ आयु के लिए योग’ इस बात का संकेत है कि अब योग को व्यायाम मानने से अधिक जीवन भर स्वस्थ और सक्रिय बने रहने के माध्यम के रूप में देखा जा रहा है।

भारत की धरोहर से विश्व का आरोग्य मंत्र

योग भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत है। इसकी जड़ें सिंधु-सरस्वती सभ्यता तक पहुंचती हैं। संस्कृत के ‘युज’ धातु से बने योग शब्द का अर्थ है, जोड़ना या एकत्व स्थापित करना। यही कारण है कि योग शरीर, मन और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करने का माध्यम माना जाता है।

 

योग का उल्लेख वेदों, उपनिषदों, महाभारत, रामायण तथा बौद्ध और जैन परंपराओं में मिलता है। महर्षि पतंजलि ने योग सूत्रों के माध्यम से इसकी व्यवस्थित व्याख्या की और इसे एक वैज्ञानिक एवं दार्शनिक स्वरूप प्रदान किया। सदियों तक ऋषि-मुनियों और योगाचार्यों ने इस ज्ञान परंपरा को सुरक्षित रखा और दुनिया तक पहुंचाया।

संयुक्त राष्ट्र की मान्यता और ऐतिहासिक शुरुआत

योग के वैश्विक महत्व को स्वीकार करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 11 दिसंबर 2014 को 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र के 69वें अधिवेशन में इसका प्रस्ताव रखा था, जिसे 175 देशों का अभूतपूर्व समर्थन मिला। यह संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में सबसे अधिक समर्थन प्राप्त प्रस्तावों में से एक था।

21 जून 2015 को पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया। नई दिल्ली के राजपथ पर आयोजित मुख्य कार्यक्रम में 35,985 लोगों ने एक साथ योगाभ्यास कर दो गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाए। इसके बाद योग ने विश्व मंच पर नई पहचान हासिल की। वर्ष 2016 में यूनेस्को ने योग को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल कर इसकी वैश्विक प्रतिष्ठा को और मजबूत किया।

राजपथ से देश के कोने-कोने तक

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का मुख्य आयोजन हर वर्ष देश के अलग-अलग शहरों में आयोजित किया जाता रहा है। नई दिल्ली के बाद चंडीगढ़, लखनऊ, देहरादून, रांची, मैसूरु, जबलपुर, श्रीनगर और विशाखापत्‍तनम जैसे शहर इस आयोजन के साक्षी बने। वर्ष 2026 में कोलकाता मुख्य राष्ट्रीय कार्यक्रम की मेजबानी कर रहा है।

इन आयोजनों ने योग को महानगरों से निकालकर गांवों, कस्बों और दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंचाया। स्कूलों, विश्वविद्यालयों, सशस्त्र बलों, स्वास्थ्य संस्थानों, कॉर्पोरेट कार्यालयों और सामाजिक संगठनों की बढ़ती भागीदारी ने इसे एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का स्वरूप दे दिया।

कॉमन योग प्रोटोकॉल : वैश्विक एकता का सूत्र

योग दिवस की सबसे बड़ी विशेषता ‘कॉमन योग प्रोटोकॉल’ (सीवाईपी) है। वर्ष 2015 में आयुष मंत्रालय ने प्रमुख योग संस्थानों और विशेषज्ञों के सहयोग से 45 मिनट का यह मानकीकृत योग क्रम तैयार किया। इसमें शिथिलीकरण अभ्यास, विभिन्न योगासन, कपालभाति, प्राणायाम, ध्यान और विश्राम तकनीकों को शामिल किया गया है।

दरअसल, यह ऐसा प्रारूप है जिसे किसी भी आयु वर्ग का व्यक्ति आसानी से कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र की छह आधिकारिक भाषाओं में उपलब्ध यह प्रोटोकॉल दुनिया भर के लोगों को एक समान योग अनुभव प्रदान करता है। यही कारण है कि न्यूयॉर्क से लेकर टोक्यो और रियाद से लेकर जोहान्सबर्ग तक लाखों लोग एक ही समय पर एक समान योगाभ्यास कर पाते हैं।

महामारी में भी नहीं टूटा योग का सिलसिला

कोविड-19 महामारी के दौरान जब दुनिया सामाजिक दूरी और लॉकडाउन की चुनौती से जूझ रही थी, तब योग ने लोगों को मानसिक और शारीरिक मजबूती प्रदान की। सार्वजनिक कार्यक्रमों पर प्रतिबंध के बावजूद अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन डिजिटल माध्यमों से जारी रहा।

“घर पर योग, परिवार के साथ योग” और “आरोग्य के लिए योग” जैसी थीमों ने यह संदेश दिया कि कठिन परिस्थितियों में भी योग व्यक्ति को तनाव, चिंता और अकेलेपन से उबरने में मदद कर सकता है। इस दौर ने योग की प्रासंगिकता को पहले से कहीं अधिक बढ़ा दिया।

एक दशक में जन-आंदोलन का रूप

पिछले 12 वर्षों में योग दिवस का स्वरूप लगातार व्यापक हुआ है। वर्ष 2025 इसका एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, जब अंतरराष्ट्रीय योग दिवस ने अपनी दस वर्ष की यात्रा पूरी की। “एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य के लिए योग” थीम के साथ आयोजित इस संस्करण में देशभर में 13 लाख से अधिक कार्यक्रम हुए और 26 करोड़ से अधिक लोगों ने भागीदारी की।

विशाखापत्‍तनम में आयोजित मुख्य कार्यक्रम में तीन लाख से अधिक लोगों की उपस्थिति ने यह साबित कर दिया कि योग अब एक स्वास्थ्य गतिविधि तक सीमित नहीं रह गया है, यह भारत समेत संपूर्ण विश्‍व के लिए उसकी सामाजिक चेतना का हिस्सा बन चुका है। इस दौरान सबसे बड़ी योग कक्षा और सबसे बड़े सामूहिक सूर्य नमस्कार प्रदर्शन के नए रिकॉर्ड भी बने।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 : स्वस्थ आयु के लिए योग

वर्ष 2026 का विषय ‘स्वस्थ आयु के लिए योग’ है। आज दुनिया की बड़ी आबादी उम्रदराज हो रही है और जीवनशैली संबंधी रोग तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में केवल जीवन की अवधि बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्वस्थ और सक्रिय जीवन जीना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

योग इस लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रभावी माध्यम माना जा रहा है। ताड़ासन, त्रिकोणासन और भुजंगासन जैसे आसन शरीर की लचक, संतुलन और रीढ़ की मजबूती बढ़ाते हैं। वहीं अनुलोम-विलोम, भ्रामरी और ध्यान जैसी प्रक्रियाएं मानसिक शांति, एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन को मजबूत करती हैं। यही कारण है कि योग को स्वस्थ आयु की आधारशिला माना जा रहा है।

योग 365 : एक दिन नहीं, पूरे वर्ष का संकल्प

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 की सबसे महत्वपूर्ण पहल ‘योग 365’ है। इसका उद्देश्य योग को वर्ष के 365 दिनों का अभ्यास बनाना है। सरकार और विभिन्न संस्थाएं लोगों को घर, विद्यालय, कार्यस्थल और समुदाय स्तर पर नियमित योग अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। ‘वाई-ब्रेक’ जैसे छोटे कार्यस्थलीय योग मॉड्यूल कर्मचारियों को तनावमुक्त बनाने में मदद कर रहे हैं। वहीं ‘योग फॉर एयर ट्रैवल’ जैसी नई पहलें आधुनिक जीवनशैली की आवश्यकताओं के अनुरूप योग को ढालने का प्रयास हैं।

स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान में योग

वर्ष 2026 में गैर-संचारी रोगों के लिए विशेष योग प्रोटोकॉल भी विकसित किए गए हैं। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, अस्थमा और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के लिए तैयार ये मॉड्यूल योग को निवारक स्वास्थ्य सेवा के रूप में स्थापित कर रहे हैं। इसके अलावा बच्चों, किशोरों, महिलाओं, गर्भवती महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों और नशा मुक्ति की प्रक्रिया से गुजर रहे लोगों के लिए भी अलग-अलग योग कार्यक्रम तैयार किए गए हैं। इससे योग की उपयोगिता और समावेशिता दोनों बढ़ी हैं।

दुनिया को जोड़ता योग

आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 190 से अधिक देशों में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय, ऐतिहासिक स्मारकों, विश्वविद्यालय परिसरों, खेल मैदानों और सार्वजनिक स्थलों पर योग कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। भारतीय दूतावास और सांस्कृतिक केंद्र दुनिया भर में हजारों कार्यक्रमों का समन्वय करते हैं। योग की यही वैश्विक स्वीकार्यता भारत की सांस्कृतिक शक्ति का प्रमाण है। यह एक ऐसा माध्यम बन चुका है जो भाषा, संस्कृति, धर्म और सीमाओं से ऊपर उठकर मानवता को स्वास्थ्य और शांति के सूत्र में बांधता है।

योग की असली विरासत

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की 12 वर्षों की यात्रा इस बात की साक्षी है कि एक प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा आधुनिक विश्व की आवश्यकताओं का समाधान बन सकती है। राजपथ से शुरू हुआ यह अभियान आज करोड़ों लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। अत: इस वर्ष का संदेश स्पष्ट है- यह योग किसी विशेष दिन का आयोजन नहीं है, यह तो जीवन जीने की कला है। इसकी वास्तविक सफलता इस बात में निहित है कि कितने लोग इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाते हैं, इसलिए आज कहना यही है कि जब योग 365 दिनों तक जीवन में उतरेगा, तभी स्वस्थ, संतुलित और सुखी समाज का सपना साकार होगा।

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