Glimpses from the opening day of the National School of Drama’s Three-Year Diploma Students’ Foreign Input Programme

1-6-3.jpeg

Delhi : Presented in collaboration with GITIS International, Russian Theatre Institute, the inaugural performances featured *The Courtyard as a Vanishing Species* written by Elena Isaeva, directed by Natalya Shurganova, and *Storm* written by Alexander Ostrovsky, directed by Alexander Khukhlin.


The opening performances were graced by Madame Diana Alipova, spouse of the Russian Ambassador to India, and Ms. Yulia Aryaeva, Counselor (Culture), Embassy of the Russian Federation in India. The programme was inaugurated by Shri Chittaranjan Tripathy, Director, National School of Drama.

The Foreign Input Programme offers NSD’s final-year students an opportunity to work with international theatre practitioners and engage with diverse theatrical traditions and creative approaches. The collaboration with GITIS International further strengthens avenues for artistic exchange and learning between India and Russia.

Brings to the stage 8 children’s theatre productions featuring nearly 300 young participants from across India

7aa47166-2cd9-11e8-a965-f54d0b6b9edf.jpg
New Delhi : The National School of Drama (NSD), in collaboration with Indian Oil Corporation Limited (IOCL), inaugurated Rang Pallav 3.0, the third edition of the National Children’s Theatre Festival, on 21 June 2026 at the Abhimanch Auditorium, NSD, New Delhi. The festival marks the culmination of a month-long national theatre initiative supported by IndianOil, aimed at fostering creativity, confidence and self-expression among nearly 300 children from marginalised, rural and tribal communities across the country.
The inaugural ceremony was graced by Shri Bibhuti Ranjan Pradhan, Executive Director (Coordination & CSR), IOCL, as the Chief Guest, while noted casting director Shri Mukesh Chhabra attended as the Guest of Honour.
Shri Chittaranjan Tripathy, Director, National School of Drama, delivered the welcome address and Shri Pradeep Kumar Mohanty, Registrar, NSD, proposed the vote of thanks.

The festival showcases eight children’s theatre productions from seven states, highlighting the transformative role of theatre in nurturing imagination, communication skills and personal growth.

The performances scheduled for 21 June include Shanti Ki Pukar from Rajghat, Delhi (workshop directed by Nisha Trivedi), The Missile Man from Thanjavur, Tamil Nadu, Hatao Aaba-Aaba from Gadchiroli, Maharashtra (workshop directed by Akhilesh Khanna), and Shabari Ke Ram from Chitrakoot, Madhya Pradesh (workshop directed by Muskan Goswami).

The second day of the festival, on 22 June, will feature Bhootnagari from Najafgarh, Delhi (workshop directed by Priya Bandhu), Mo Saanga from Keonjhar, Odisha (workshop directed by Avinash Deshpande), Deep Daan from Jaisalmer, Rajasthan (workshop directed by Naresh Pal Singh Chauhan), and Pyar Satkar from Ferozpur, Punjab (workshop directed by Preetpal Rupana).
Speaking on the occasion, Shri Chittaranjan Tripathy said, “This initiative offers a powerful opportunity for children from marginalised, rural and tribal communities. For them, this platform is not just a performance space but a new beginning to build an identity, develop self-confidence and express their emotions. Its expansion across seven states demonstrates how meaningful cultural interventions can create a lasting social impact. Theatre instils essential values such as teamwork, communication and discipline, helping shape responsible and aware citizens.”

Shri Bibhuti Ranjan Pradhan, Executive Director (Coordination & CSR), Indian Oil Corporation Limited, said, “This initiative is not merely a cultural programme but a platform that nurtures imagination and self-expression among children. What began in Delhi has now expanded across seven states, touching the lives of children from diverse backgrounds. IndianOil is proud to be associated with this journey through its CSR initiatives and believes that such efforts lay the foundation for an inclusive, creative and sensitive society.”

Addressing the audience, Mr. Mukesh Chhabra, who was earlier part of NSD Theatre in Education wing during his earlier theatre career shared how only 8 Summer Theatre Workshops were being organised during his time and appreciated the fact that NSD could conduct the Summer Theatre Workshop for more than 100 different children groups across the country.

He also added that for any future casting projects related to children, he would come to NSD to tap into the plethora of talented children here, instead of depending on different places for talent searches.

In her message, Ms. Rashmi Govil, Director (Human Resources), IOCL, stated, “This platform provides underprivileged youth with a valuable opportunity for self-discovery and holistic development. Theatre nurtures vital life skills such as teamwork, empathy and communication, enabling children to grow into sensitive and responsible citizens. Indian Oil is proud to partner with NSD in promoting social inclusion through cultural education.”

The initiative is part of the social commitment of NSD and IOCL to make theatre accessible to all and use theatre as a tool for holistic development of children.
Since the launch of the Rang Pallav initiative, more than 1,000 schoolchildren across the country have benefited from the programme under NSD’s Project Monitoring Unit.

बिहार की मौन भू-अभिलेख क्रांति

1-4-6.jpeg

विवेक सिंह

भारत में भूमि प्रशासन का भविष्य हमेशा अदालतों से नहीं, बल्कि पारदर्शी, सतत अद्यतन और डिजिटल रूप से सुरक्षित राजस्व अभिलेखों से भी निकल सकता है

पटना। भारत की अर्थव्यवस्था भूमि अभिलेखों पर आधारित है, लेकिन हमारी कानूनी सोच ने कभी उन्हें वह महत्व नहीं दिया जिसकी वे हकदार थे। प्रशासनिक व्यवस्था में बहुत कम ऐसे साधन हैं जिन्हें नियमित रूप से खारिज किया गया हो, जैसा कि नामांतरण (म्यूटेशन) प्रविष्टियों के साथ हुआ। लंबे समय तक इन्हें केवल कमजोर राजस्व दस्तावेज माना गया, जिनका स्वामित्व मूल्य सीमित है। अदालतों ने बार-बार कहा कि नामांतरण न तो स्वामित्व पैदा करता है और न ही समाप्त करता है। वकीलों ने इसे मात्र एक अनुमानात्मक दस्तावेज माना। आम नागरिकों ने राजस्व अभिलेखों को हेरफेर, गायब रजिस्टरों, अपारदर्शी प्रक्रियाओं और मनमाने सुधारों से जोड़कर देखा।

इस संशय का एक बड़ा हिस्सा उचित भी था, क्योंकि वह व्यवस्था वास्तव में एक पुराने दौर की उपज थी। लेकिन आज समस्या यह है कि नामांतरण को लेकर भारत की कानूनी बहस अभी भी अतीत में अटकी हुई है, जबकि कई राज्यों में भूमि प्रशासन की संरचना पूरी तरह बदल चुकी है। इस परिवर्तन का सबसे उल्लेखनीय उदाहरण बिहार है, जहां पिछले एक दशक में भूमि अभिलेखों के क्षेत्र में एक शांत लेकिन दूरगामी क्रांति घटित हुई है।

बिहार डिजिटलीकरण की दौड़ में शुरुआती राज्यों में नहीं था। 2017-18 के आसपास इस प्रक्रिया को अपनाने के बाद उसने बहुत कम समय में देश के सबसे महत्वाकांक्षी सुधारकों में स्थान बना लिया। 2021 में राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक अनुसंधान परिषद (NCAER) के भूमि अभिलेख एवं सेवाएं सूचकांक में बिहार को सबसे प्रगतिशील राज्य के रूप में मान्यता मिली। बिहार के अनुभव की विशेषता यह है कि यह सुधार केवल तकनीकी नहीं था, बल्कि एक साथ कानूनी, प्रक्रियागत और संस्थागत भी था।

राज्य ने जिस मॉडल को अपनाया, उसे “3-डी रणनीति” कहा जा सकता है—डिजिटाइज, डिस्टिल, डिलीवर (Digitise, Distil, Deliver)। चुनौती अत्यंत जटिल थी। जमींदारी उन्मूलन के बाद भूमि अभिलेखों में भारी असंगतियां, गुम कड़ियां, परस्पर विरोधी दावे और पीढ़ियों से जमा बिखरे दस्तावेज मौजूद थे। केवल पुराने रिकॉर्डों को स्कैन कर देना समाधान नहीं था। आंकड़ों को साफ करना, मिलान करना, मानकीकृत करना और लगातार अद्यतन रखना आवश्यक था।

इसलिए डिजिटलीकरण के साथ-साथ अभिलेखों का सत्यापन, सुधार, एकीकरण और पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से उनका निरंतर अद्यतन भी किया गया। इसे “परिमार्जन” के रूपांतरणकारी कार्यक्रम के जरिए अंजाम दिया गया। यदि यह प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती, तो डिजिटलीकरण केवल ऐतिहासिक त्रुटियों को इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में स्थायी बना देता।

अंतिम चरण था सेवा-प्रदाय। तकनीक के माध्यम से राजस्व सेवाओं को नागरिकों के लिए अधिक सुलभ, पारदर्शी और ट्रैक करने योग्य बनाया गया।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सुधार केवल तकनीक के भरोसे नहीं किए गए। इनके पीछे कानूनी पुनर्संरचना भी थी। पिछले दशक तक देश के अधिकांश हिस्सों में भूमि राजस्व प्रशासन अस्पष्ट परंपराओं, विभागीय परिपत्रों और व्यवहारगत प्रक्रियाओं के आधार पर चलता था। बिहार ने इस अनिश्चित ढांचे से बाहर निकलकर 2011 के बाद नामांतरण से संबंधित स्पष्ट वैधानिक प्रावधान लागू किए।

इससे नामांतरण केवल एक अनौपचारिक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रहा, बल्कि कानूनी रूप से विनियमित अर्द्ध-न्यायिक प्रक्रिया का स्वरूप ग्रहण करने लगा, जिसमें नोटिस, सुनवाई, आपत्ति, अपील और पुनरीक्षण जैसी सुरक्षा व्यवस्थाएं शामिल हैं। 2017 के बाद किए गए संशोधनों ने डिजिटलीकृत प्रशासन को वैधानिक प्रक्रियाओं के साथ जोड़ा। यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। उद्देश्य केवल कागजी रजिस्टरों को इलेक्ट्रॉनिक चित्रों में बदलना नहीं था, बल्कि ऐसे अभिलेख तैयार करना था जो निरंतर अद्यतन, कानूनी रूप से संचालित और प्रक्रियागत रूप से सत्यापन योग्य हों।
इसके बाद राजस्व न्यायालय प्रबंधन प्रणाली (RCMS) को जोड़ा गया, जिसने कार्यवाहियों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार कर पारदर्शिता की एक अतिरिक्त परत जोड़ी। आदेश सार्वजनिक रूप से उपलब्ध और संस्थागत रूप से ट्रैक करने योग्य बने।

इसके परिणाम उल्लेखनीय रहे हैं। डिजिटलीकरण के एक वर्ष के भीतर ही बिहार में नामांतरण आवेदनों की संख्या 13.41 लाख से बढ़कर 20.90 लाख हो गई। सामान्यतः नागरिक अव्यवस्थित व्यवस्थाओं से दूरी बनाते हैं; इसलिए आवेदनों में यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि लोगों का भरोसा बढ़ा और उन्होंने संपत्ति हस्तांतरण, उत्तराधिकार तथा उत्तराधिकार प्रमाणन जैसी प्रक्रियाओं को औपचारिक माध्यम से दर्ज कराना शुरू किया।

आज बिहार में 100 प्रतिशत प्रावधिक सर्वे मानचित्र डिजिटाइज और जियो-रेफरेंस किए जा चुके हैं, जिससे भू-अभिलेखों की सटीकता और जीआईएस आधारित प्रशासन को बड़ी मजबूती मिली है।

एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि लंबित मामलों में कमी है। पिछले वर्ष तक लंबित नामांतरण मामलों की संख्या 8.42 लाख से घटकर 1.32 लाख रह गई।

राज्य में डिजिटाइज किए गए 4.54 करोड़ जमाबंदियों का विश्लेषण और भी दिलचस्प तस्वीर प्रस्तुत करता है। इनमें लगभग 93.5 लाख अभिलेखों में विधिवत अर्द्ध-न्यायिक प्रक्रियाओं के माध्यम से परिवर्तन दर्ज किए गए। इससे लगभग 21 प्रतिशत अद्यतन जमाबंदी अनुपात सामने आता है, जो इस बात का प्रमाण है कि भूमि अभिलेख अब केवल संग्रहित दस्तावेज नहीं रह गए हैं, बल्कि जमीन पर बदलती वास्तविकताओं के अनुरूप जीवंत प्रशासनिक साधन बन चुके हैं।

राजस्व न्यायनिर्णयन में पारदर्शिता भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। उप समाहर्ता भूमि सुधार (DCLR) के समक्ष दायर 4.19 लाख ऑनलाइन मामलों में से लगभग 2.57 लाख मामलों का निपटारा किया जा चुका है, जो लगभग 61 प्रतिशत निस्तारण दर को दर्शाता है।

नागरिक पहुंच भी लगातार विस्तृत हुई है। आज बिहार भूमि पोर्टल के माध्यम से 22 ऑनलाइन सेवाएं उपलब्ध हैं, जो भूमि प्रशासन को धीरे-धीरे एक सुलभ ई-गवर्नेंस व्यवस्था में बदल रही हैं।

भूमि राजस्व कार्यवाहियों की आलोचना करने वालों का एक सामान्य तर्क यह रहा है कि राजस्व अधिकारियों में न्यायिक अधिकारियों जैसी कानूनी क्षमता नहीं होती। लेकिन यह आलोचना अक्सर भूमि प्रशासन की विशिष्ट प्रकृति को नजरअंदाज कर देती है। पारंपरिक एलएलबी पाठ्यक्रमों में राज्य-विशिष्ट भूमि राजस्व कानूनों, जमाबंदी प्रणालियों, काश्तकारी ढांचे, सर्वे प्रशासन और नामांतरण प्रक्रियाओं पर सीमित ध्यान दिया जाता है। इसके विपरीत राजस्व अधिकारी इन्हीं विषयों में प्रशिक्षित होते हैं और उत्तराधिकार विवादों, बंटवारे के दावों, संपत्ति हस्तांतरण, कब्जे के पैटर्न और भू-अभिलेखीय वास्तविकताओं वाले पारिस्थितिकी तंत्र में लगातार काम करते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि राजस्व न्यायालयों को दीवानी अदालतों का स्थान ले लेना चाहिए या वर्तमान राजस्व अभिलेखों को अचूक स्वामित्व घोषणा मान लिया जाना चाहिए। फर्जी दस्तावेज, दबाव में किए गए हस्तांतरण और जटिल स्वामित्व विवादों का समाधान आगे भी न्यायिक निर्णय से ही होगा।

लेकिन नामांतरण अभिलेखों को सहज रूप से खारिज करने की परंपरागत प्रवृत्ति अब समकालीन प्रशासनिक वास्तविकताओं को नहीं दर्शाती। आधुनिक नामांतरण अभिलेखों को राज्य मशीनरी वर्तमान भूमि स्वामित्व की वास्तविक अभिव्यक्ति के रूप में अधिकाधिक स्वीकार कर रही है। बैंक ऋण स्वीकृत करने से पहले इन्हीं पर भरोसा करते हैं। सरकारी एजेंसियां मुआवजा निर्धारण में इनका उपयोग करती हैं। खरीदार संपत्ति लेनदेन के दौरान इनकी जांच करते हैं। उपयोगिता सेवाएं और कल्याणकारी योजनाएं भी बढ़ते हुए इन्हीं पर निर्भर होती जा रही हैं।

कानून भले ही अभी नामांतरण प्रविष्टियों को अंतिम स्वामित्व प्रमाण का दर्जा न देता हो, लेकिन शासन व्यवस्था तेजी से इस धारणा पर काम कर रही है कि नामांतरण आधारित अभिलेख वर्तमान स्वामित्व का सबसे विश्वसनीय प्रशासनिक आधार हैं।

निस्संदेह बिहार की चुनौतियां अभी भी बहुत बड़ी हैं। भूमि संबंधी ऐतिहासिक विसंगतियां, परस्पर विरोधी दावे, काश्तकारी संबंधी जटिलताएं, सर्वेक्षण की असंगतियां, पारिवारिक बंटवारे और प्रक्रियागत विलंब-ये सभी विवादों और शिकायतों को जन्म देते रहेंगे।

फिर भी, भूमि प्रशासन की भारतीय व्यवस्था की सीमाओं के भीतर रहते हुए बिहार जैसे राज्यों के निरंतर अद्यतन और डिजिटल रूप से सुरक्षित नामांतरण तंत्र उस अव्यवस्थित व्यवस्था को क्रमशः व्यवस्थित बना रहे हैं, जो कभी लगभग अराजक स्वरूप धारण कर चुकी थी।

बिहार का अनुभव यह दर्शाता है कि भूमि राजस्व प्रशासन को अतीत की छाया में कैद रहने की आवश्यकता नहीं है। वैधानिक सुरक्षा उपायों, डिजिटाइज्ड अभिलेखों, जियो-रेफरेंस्ड मानचित्रण, पारदर्शी राजस्व न्यायनिर्णयन और सतत रिकॉर्ड अद्यतन का संगम भूमि प्रशासन की विश्वसनीयता को मूल रूप से बदल सकता है।

(लेखक विवेक सिंह, क्रॉसवर्ड को दुनिया के कोने कोने तक पहुंचाने वाले, बिहार के विकास आयुक्त रहे हैं। उनका यह आलेख The Pioneer अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित हुआ है। फिलहाल वे Rera Bihar के अध्यक्ष हैं। लेख इसलिए भी अहम है क्योंकि वे बिहार सरकार के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग में प्रधान सचिव के रूप में कार्य कर चुके हैं। उन्हें सरकारी और जमीनी दोनों अनुभव हैं)

नगरासू निहंग घटना: जिलाधिकारी विशाल मिश्रा ने किया अनाउसमेंट, नहीं माने निहंग सिख!! अपनी जिद्द पर अड़े!!

Screenshot-2026-06-22-at-3.35.43-PM.png

नगरासू गुरुद्वारे में 22 घंटे से गतिरोध, हाईवे किनारे बढ़ी हलचल!!

डीएम-एसपी मौके पर, फिर भी नहीं निकला समाधान, नगरासू बना प्रदेशभर में चर्चा का केंद्र!!

चमोली (उत्तराखंड): बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित नगरासू रविवार को पूरे प्रदेश की नजरों का केंद्र बना रहा। यहां स्थित गुरुद्वारे में शनिवार दोपहर शुरू हुआ विवाद रविवार तक भी जारी रहा, जिससे प्रशासनिक अमले में लगातार हलचल बनी हुई है। जिले के शीर्ष अधिकारी मौके पर डटे हैं, लेकिन घंटों की मशक्कत के बाद भी स्थिति सामान्य नहीं हो सकी है।

जानकारी के अनुसार शनिवार दोपहर करीब तीन बजे कुछ निहंग सिख गुरुद्वारे में पहुंचे और इसके बाद विवाद ने तेजी से तूल पकड़ लिया। देखते ही देखते मामला इतना संवेदनशील हो गया कि जिलाधिकारी विशाल मिश्रा और पुलिस अधीक्षक नीहारिका तोमर को स्वयं मौके पर पहुंचकर मोर्चा संभालना पड़ा।

बताया जा रहा है कि निहंग सिख गुरुद्वारा प्रबंधन के रवैये से नाराज बताए जा रहे हैं। इसी नाराजगी के चलते वे गुरुद्वारे के भीतर डटे हुए हैं और अपनी मांगों को लेकर अड़े हैं। प्रशासन लगातार वार्ता के माध्यम से समाधान निकालने का प्रयास कर रहा है, लेकिन अब तक कोई निर्णायक नतीजा सामने नहीं आ पाया है।

घटना के बाद नगरासू क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की लगातार आवाजाही बनी हुई है, जबकि आसपास के क्षेत्रों में भी सतर्कता बढ़ा दी गई है। स्थानीय लोगों में भी पूरे घटनाक्रम को लेकर चर्चा और उत्सुकता बनी हुई है।
गौरतलब है कि 16 जून को कर्णप्रयाग में निहंग सिखों और स्थानीय लोगों के बीच हुए विवाद के बाद यह दूसरा बड़ा घटनाक्रम है, जिसने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। इसी कारण नगरासू की स्थिति को बेहद संवेदनशील मानते हुए हर गतिविधि पर पैनी नजर रखी जा रही है।

बताया जा रहा है कि जिलाधिकारी ने मौके पर सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली के माध्यम से कई बार अपील की और शांतिपूर्ण समाधान का आग्रह किया, लेकिन गतिरोध लगातार बना रहा। वार्ता के कई दौर होने के बावजूद अभी तक कोई अंतिम सहमति नहीं बन सकी थी।

चारधाम यात्रा के व्यस्ततम मार्गों में से एक पर उत्पन्न इस स्थिति ने प्रशासन के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आखिर यह गतिरोध कब समाप्त होगा और प्रशासन किस तरह सभी पक्षों को साथ लेकर समाधान तक पहुंचेगा।
फिलहाल नगरासू में हालात नियंत्रण में बताए जा रहे हैं, लेकिन 22 घंटे से अधिक समय से जारी यह विवाद पूरे क्षेत्र में चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है।

scroll to top