तिलपत में औरंगजेब द्वारा सामूहिक नरसंहार

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दिल्ली । स्वाधीनता और स्वाभिमान के संघर्ष में असंख्य बलिदान हुये हैं। इतिहास की पुस्तकों में उनका विवरण नगण्य मिलता है। ऐसा ही बलिदान तिलपत में वीर गोकुल सिंह जाट का हुआ। यह बलिदान साधारण नहीं था। बंदी बनाकर ऐसी क्रूरतम मौत दी गई कि उसे पढ़कर आज भी रोंगटे खड़े होते हैं। बादशाह औरंगजेब की सेना ने गांव के गाँव उजाड़े, सामूहिक नरसंहार किया। उन्हीं को जीवित छोड़ा गया जिन्होंने मतान्तरण स्वीकार कर लिया था।

वर्तमान में तिलपत हरियाणा प्राँत में फरीदाबाद जिले के अंतर्गत आता है। मुगल काल में यह क्षेत्र मथुरा के किलेदार के नियंत्रण में था। गोकुल सिंह के पूर्वज कभी इस क्षेत्र के शासक हुआ करते थे। पर समय बदला रियासत समाप्त हो गई और मुगलों के अंतर्गत जागीरदार हो गये। यह समझौता परिस्थियों का था। पर मन का समर्पण नहीं था। समय पर कर चुकाकर और भेंट भेजकर किलेदार अपनी प्रजा को संरक्षण देते रहे लेकिन औरंगजेब के काल में यह संतुलन बिगड़ गया। औरंगजेब ने सभी मंदिरों और मूर्तियों को ध्वस्त करने का आदेश निकाला और मतान्तरण का अभियान चलाया। इसके लिये जजिया कर भी बढ़ा दिया गया। बसूली के नाम पर मुगल सेना का आतंक बढ़ा। यह जजिया टैक्स केवल हिन्दुओं पर लगता था। टैक्स और बसूली की सख्ती से बचने केलिये लोग मतान्तरण करने लगे। जो मतान्तरण कर लेते थे उन्हें छूट मिल जाती थी। वर्ष 1669 में फसल खराब हुई। जमीदारों ने रियायत माँगी। जो नहीं मिली । तब वीर गोकुलसिंह ने सेना एकत्र की और जजिया देने से इंकार कर दिया। गोकुल सिंह ने बादशाह को स्पष्ट संदेश भेजा कि जजिया कम किया जाय और फसल अच्छी आने तक बसूली रोकी जाय। लेकिन बात नहीं बनी। उल्टे इसे विद्रोह माना गया और औरंगजेब ने सैन्य कार्रवाई का आदेश दिया। फौजदार हसन अली के नेतृत्व में मुगल फौज मथुरा पहुँची। वीर गोकुल सिंह जाट ने सामना किया। यह युद्ध 10 मई 1669 को मथुरा से छह मील दूर हुआ। यह युद्ध वर्तमान में राया विकास खंड के अंतर्गत सिहोरा नाम से जाना जाता है । गोकुलसिंह और उनके सैनिक भारी पड़े। मुगल सेना को पीछे हटना पड़ा। इससे उत्साहित होकर वीर गोकुल सिंह ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया । और तिलपत पर अपना ध्वज फहरा दिया। इस बीच मुगल दरबार से समर्पण के प्रस्ताव भेजे गये। मुगलों की ओर से समझौते का अंतिम संदेश लेकर फौजदार शफ शिकन खाँ गये और गोकुलसिंह से पूर्ण समर्पण करके माफी मांगने को कहा। लेकिन बात नहीं बनी। अंत में 28 नवम्बर 1669 औरंगजेब स्वयं एक बड़ी सेना और तोपखाने के साथ तिलपत रवाना हुआ।

औरंगजेब ने मथुरा पहुँचकर अपना कैंप किया। और तिलपत को घेरने के लिये सेना भेजी । युद्ध आरंभ हुआ। यह दूसरा युद्ध 4 दिसम्बर 1669 को तिलपत से 20 मील पर आरंभ हुआ। यह युद्ध केवल तीन दिन चल पाया ।मुगलों के पास सेना अधिक थी दूसरा उनके पास तोपखाना था । मुगलों के तोपखाने ने सब तहस नहस कर दिया था। वीर गोकुलसिंह के नेतृत्व में युद्ध कर रहे सैनिकों की संख्या केवल सात हजार थी इसमें कोई तीन हजार सैनिक किले में तैनात थे और अन्य मैदान में युद्ध के लिये आये थे। जिनकी की संख्या चार हजार के आसपास थी फिर भी इस सेना ने वीरता से सामना किया। लेकिन यह वीरता तोपखाने के सामने बेबस हो गई। सेना का भारी विनाश हुआ । तब गोकुलसिंह सिंह की सेना पीछे हटी और तिलपत गढ़ी की सुरक्षा में लग गई। लेकिन यहां भी तोपों सब कुछ नष्ट कर दिया। गढ़ी की दीवारें ध्वस्त हो गई। गोकुल सिंह और उनके चाचा उदय सिंह सहित वहाँ जितने लोग थे सभी बंदी बना लिये गये। सभी बंदियों को मथुरा लाया गया और औरंगजेब के सामने पेश किया गया। औरंगजेब ने सबको मतान्तरण कराने का आदेश दिया। लेकिन गोकुलसिंह और उनके चाचा किसी भी प्रकार तैयार नहीं हुये तब उन्हें जंजीरों में बाँधकर बाहर चबूतरे पर लाया गया, भारी यातनाएँ दीगई। वह एक जनवरी 1670 का दिन था। इनके सामने वे सभी लोग जमा किये गये जो तिलपत के युद्ध में बंदी बनाए गए थे । इसमें सैनिकों के साथ स्त्री पुरुष और बच्चे भी थे । सबके सामने गोकुलसिंह और उनके चाचा उदय सिंह के शरीर में तलवारें चुभोई गईं। एक एक अंग काटा गया। यह क्रूर कृत्य इसलिये किया गया ताकि लोग डर कर मतान्तरण कर लें। गोकुलसिंह को क्रूरतम मौत देकर सैनिकों ने जीवित उदय सिंह की खाल खींची । इसके बाद अन्य बंदियों का भी इसी प्रकार अन्य सैनिकों का भी नरसंहार हुआ । केवल उन्हीं को जीवित छोड़ा गया जिन्होंने मतान्तरण स्वीकार कर लिया था ।
मुगल काल के इतिहास के विवरण में इस घटना को विद्रोह लिखा है। लेकिन राजस्थान के सम्मानित एवं पुरस्कृत कविवर श्री बलवीर सिंह ‘करुण’ ने इस विषय पर “समरवीर गोकुला” नाम से एक प्रबंध काव्य की रचना की है। इस ओजस्वी रचना ने गोकुलसिंह सिंह के उपेक्षित बलिदान को जीवंत कर दिया । यह काव्य लोक जीवन में बहुत ऊर्जा और आदर से गाया और सुना जाता है ।

बाद के दिनों में तिलहत युद्ध पर शोध भी हुये। इतिहास के शोध और प्रबंध काव्य दोनों में युद्ध, प्रताड़ना और बलिदान का वर्णन तो समान है लेकिन युद्ध में सैनिकों की संख्या और बलिदान के स्थान का अंतर है । इतिहासकार सर जदुनाथ और उपेन्द्रनाथ शर्मा का मानना है कि निर्णायक युद्ध 4 दिसम्बर 1669 से आरंभ हुआ और “गोकुला और उदयसिंह सहित सभी बंदियों को मथुरा से आगरा लाया गया था। उनका बलिदान आगरा कोतवाली के चबूतरे पर हुआ। इतिहासकारों के अनुसार जिन लोगों को मतान्तरण के बाद जीवित छोड़ा गया उनमें गोकुलसिंह परिवार के स्त्री बच्चे भी थे एक अन्य इतिहासकार कानूनगो का विचार है कि “किसानों ने पहले लम्बे समय तक तक धीरतापूर्वक अपनी बात बादशाह तक पहुँचाई थी । कर माफी की शर्त मतान्तरण थी। जो किसानों को स्वीकार्य नहीं थी। गोकुलसिंह के नेतृत्व यह संघर्ष सैनिकों के साथ किसानों का भी था। यह भी माना जाता है कि युद्ध से पहले अनेक सैनिक अपने परिवार की महिलाओं को मार कर युद्ध में पहुँचे थे। तिलहत एक छोटी सी जागीर थी, सैनिकों की संख्या भी कम थी पर यह युद्ध भीषण था । इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि औरंगजेब को स्वयं तोपखाना लेकर आना पड़ा और तोपखाने के साथ युद्ध तीन दिन चला। तिथि और दिनांक में हो सकता है कुछ अंतर हो लेकिन औरंगजेब की क्रूरता और गोकुल सिंह के बलिदान का वर्णन समान है।

भारत में 273 वर्ष पहले लागू हुआ था

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दिल्ली । एक जनवरी से नया साल आरंभ हो रहा है। पूरी दुनियाँ वर्ष 2026 में प्रवेश करेगी। यह अंग्रेजी कैलेण्डर 2025 वर्ष पुराना नहीं है। केवल 444 वर्ष पुराना है और भारत में 273 वर्ष पहले लागू हुआ था।
दुनियाँ में काल गणना का इतिहास बहुत उतार-चढ़ाव से भरा है। विभिन्न देशों में अपने अपने पुराने कैलेण्डर हैं। बीस से अधिक कैलेण्डरों का इतिहास उपलब्ध है। जिस अंग्रेजी कैलेंडर को आज की दुनियाँ में सबसे अधिक मान्यता है उसे “ग्रेगेरियन कैलेण्डर” कहा जाता है। इस कैलेण्डर के अनुसार संसार वर्ष 2026 में प्रवेश करने जा रहा है। लेकिन यह कैलेण्डर इतना पुराना नहीं है। इसे आरंभ करने वाले पोप ग्रैगरी अष्टम थे।उनके नाम पर ही इस कैलेण्डर का नाम “ग्रेगोरियन कैलेण्डर” कहलाता है। यह कैलेण्डर 1582 ईस्वी में लागू हुआ था। अंग्रेजों ने भारत में इस कैलेण्डर को 1753 में लागू किया था। अंग्रेजों ने आरंभ में इस कैलेण्डर को शासन व्यवस्था में लागू किया था और धीरे धीरे समाज में घोला। अब पूरे भारत की जीवनचर्या इसी कैलेण्डर से संचालित होती है।

कैलेण्डर का इतिहास

आज भारत की आधुनिक पीढ़ी भले अपना अतीत भूल गयी हो पर यह गर्व की बात है कि यूरोप को काल गणना से परिचित कराने वाले भारतीय शोध कर्ता ही रहे हैं। यूरोप के प्राचीन इतिहास में वर्णन मिलता है कि दो सौ नावों से आर्यों का एक दल यूरोप गया था जिसने रोम की स्थापना की थी वे अपने साथ समय की गणना पद्धति लेकर गये थे। दूसरा विवरण सुप्रसिद्ध यूनानी सम्राट सिकन्दर के समय का है। सिकन्दर आक्रमणकारी के रूप में भारत आया था। और भारत से लौटते समय विभिन्न विषय के विद्वानों का दल अपने साथ ले गया था। उनमें पंचांग पद्धति विशेषज्ञ भी थे। इन विशेषज्ञों ने यूरोप जाकर यूरोपीय काल गणना पद्धति में संशोधन किये और जूलियन कैलेण्डर आरंभ किया। फिर पोप ग्रेगरी अष्टम ने 1582 में कुछ संशोधन किये और वर्तमान कैलेण्डर का यह स्वरूप सामने आया। पोप ग्रेगरी अष्टम ने ईसा मसीह की अनुमानित जन्मतिथि की गणना करके 1582 वर्ष पूर्व की तिथि 1 जनवरी निर्धारित की और इसी तिथि से कैलेण्डर आरंभ किया। ईसा मसीह की अनुमानित जन्मतिथि से लागू करने के कारण इसे “ईस्वी सन्” कहा गया और इस कैलेण्डर को पोप ग्रेगरी के नाम पर “गेग्रेरियन कैलेण्डर” नाम दिया। अंग्रेज जिस देश में व्यापार करने गये, शासक बने, उन्होने अपनी परंपराएँ लागू कीं और यह ग्रेगेरियन ईस्वी सन् कैलेण्डर पद्धति भी। अंग्रेज अपनी जड़ों और परंपराओं से इतने गहरे जुड़े रहे कि उन्होंने पूरी दुनियाँ को अपने ही परिवेश में ढाला। पता नहीं अंग्रेजों के पास क्या जादू था कि दुनिया से उनके शासन का अंत भले हो गया हो पर उनके द्वारा शासित रहे अधिकांश देश आज भी अंग्रेजी परंपराएँ और उनके इस ग्रेगोरियन कैलेंडर से ही अपनी सरकार और समाज चलाते हैं । कुछ देशों में भीतर अपनी निजी काल गणना पद्धति प्रचलित तो है, पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी दुनियाँ अंग्रेजी महीनों और तिथियों के अनुसार ही संचालित होती है ।

शब्द “कैलेण्डर” की यात्रा

ग्रेगोरियन कैलेण्डर उपयोग किये गये महीनों और दिनों के नाम भी अंग्रेजों के अपने नहीं हैं । वे दुनियाँ की विभिन्न भाषाओं से लेकर रूपान्तरित किये गये है । सबसे पहले इसका नाम “कैलेण्डर” ही देखें। कैलेण्डर शब्द अंग्रेजी भाषा का नहीं है । लैटिन भाषा का है। लैटिन भाषा में “कैलेण्ड” शब्द का अर्थ हिसाब किताब होता है। उधर चीन में “केलैण्ड” का अर्थ चिल्लाना होता है। वहाँ ढोल बजाकर तिथि दिन और समय की सूचना दी जाती थी। इस तरह कैलेण्ड शब्द से इस पद्धति का नाम कैलेण्डर पड़ा । इसे संसार में अलग-अलग देशों में अलग अलग तिथियों में लागू किया गया । यह ग्रेगोरियन कैलेंडर इटली, फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल ने सन् 1582 ईस्वी में, परशिया, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, हॉलैंड और फ़्लैंडर्स ने 1583 ईस्वी में, पोलैंड ने 1586 ईस्वी में, हंगरी ने 1587 ईस्वी में, जर्मनी, नीदरलैंड, डेनमार्क ने 1700 ईस्वी में, ब्रिटेन और उनके द्वारा शासित लगभग सभी देशों में 1752 ईस्वी, जापान ने 1972 ईस्वी, चीन ने 1912 ईस्वी, बुल्गारिया ने 1915 ईस्वी, तुर्की और सोवियत रूस ने 1917 ईस्वी, युगोस्लाविया और रोमानिया ने 1919 ईस्वी में लागू हुआ ।

यूरोप में कैलेण्डर की शुरुआत

यूरोपियन कैलेण्डर का आरंभ रोम से हुआ था। इसे आरंभ करने वाले रोमन सम्राट जूलियन सीजर थे। इसलिये उसका पुराना जूलियन कैलेण्डर था। उन्होने पूर्व से प्रचलित कैलेण्डर में कुछ परिवर्तन किये थे जो उनसे पूर्व राजा न्यूमा पोपेलियस ने आरंभ किया था। तब इसमें केवल दस माह और 354 दिन ही हुआ करते थे। कहते हैं शोध कर्ता तो बारह मास का ही कैलेण्डर तैयार करना चाहते थे पर राजा बारह माह का कैलेण्डर बनाने तैयार न हुआ था। राजा की जिद के चलते बारह के बजाय दस माह का कैलेण्डर तैयार हुआ था । बादमें जूलियट सीजर ने उस कैलेण्डर में परिवर्तन करने के आदेश दिये और तब यह कैलेण्डर बारह महीने का तैयार हुआ। अब कुछ विद्वानों का मत है कि इसमें ईसा मसीह की जन्मतिथि में चार वर्ष का अंतर आ गया है। इसमें समय के साथ अनेक परिवर्तन हुये। जब यह कैलेण्डर आरंभ हुआ था तब इसमें लीप एयर या हर चौथे साल फरवरी 29 दिन का प्रावधान नहीं था। यह प्रावधान खगोल अनुसंधान के बाद अमेरिकी वैज्ञानिकों ने सूर्य और पृथ्वी परिक्रमा की गणना करके जोड़ा । जबकि भारत में पाँच हजार वर्ष पुरानी गणना भी बारह माह की थी। जो ऋतु परिवर्तन का अध्ययन करके निर्धारित किया गया था। भारत में इसे कैलेण्डर नहीं “पंचांग” कहा जाता है । शब्द “पंचांग” भी गहन अर्थ लिए हुए है । पंचांग अर्थात पाँच अंग । भारतीय पंचांग में कुल पाँच आधार होते हैं। ये तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण हैं। इन पाँच अंगों से ही भारतीय पंचांग में तिथि दिन की गणना होती है जबकि वर्ष और माह की जानकारी इन पाँच अंगों से अलग होती है। जबकि ग्रेगोरियन कैलेण्डर में केवल दो जानकारी होती है। तारीख और दिन की । माह और वर्ष भी। इस प्रकार पाँच हजार वर्ष पुरानी भारतीय कालगणना पद्धति “पंचांग” पश्चिम की आधुनिक कैलेण्डर पद्धति से अपेक्षाकृत अधिक उन्नत रही है ।

सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार की परिकल्पना इन्हीं की थी

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भोपाल । भारतीय स्वाधीनता संग्राम में कुछ ऐसी दूरदर्शी विभूतियाँ रहीं हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता के लिये सार्वजनिक संघर्ष किया, अनेक बार जेल गये और इसके साथ ही सांस्कृतिक मूल्यों की पुर्नप्रतिष्ठा का अभियान भी चलाया । ऐसे ही महान स्वाधीनता सेनानी थे श्री के एम मुंशी ।
उनका पूरा नाम कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी था । वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, राजनेता, गुजराती एवं हिन्दी के ख्यातनाम साहित्यकार और शिक्षाविद थे। उन्होने भारतीय विद्या भवन की स्थापना की। सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार की कल्पना सबसे पहले इन्हीं ने की थी । सरदार वल्लभभाई पटेल ने इन्ही को आगे करके हैदराबाद रियासत को भारतीय गणतंत्र में विलय करने की रणनीति का क्रियान्वयन किया था ।
इनका जन्म 30 दिसंबर 1887 को गुजरात के भड़ौच क्षेत्र में हुआ था । ये बचपन में बहुत आकर्षक और चंचल थे । इसलिये इनका नाम घनश्याम रखा । लेकिन माँ प्यार से इन्हें कन्हैया पुकारती थीं इनके पिता माणिकलाल व्यास अपने क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे । यद्यपि परिवार भार्गव ब्राह्मण था। लेकिन उच्च शिक्षित पिता कुछ समय कोर्ट में मुंशी रहे और यही उनकी पहचान बनी । वे “व्यास” के स्थान पर मुंशी कहलाए और यही उनका उपनाम हो गया । और जब घनश्याम बड़े हुये तो उन्होंने माँ के द्वारा दिया गया कन्हैयालाल के साथ पिता का नाम जोड़कर कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी स्वीकार किया और यही उनकी पहचान बनी । माता बहुत आध्यात्मिक और धार्मिक विचारों की थीं। प्रतिदिन धार्मिक गीत गाया करतीं थीं। आसपास कहीं भी धार्मिक आयोजन होते तो वे अपने साथ इनको लेकर जातीं थीं। शिशुवय से मिली यही धार्मिक और आध्यात्मिक शिक्षा के एम मुंशी जी के जीवन की चेतना बनी । 1900 में उनका विवाह अतिलक्ष्मी पाठक से हुआ । विवाह के बाद आधुनिक शिक्षा बड़ौदा भेजे गये।1907 में अंग्रेजी विषय में प्रथम श्रेणी में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की । महाविद्यालयीन शिक्षा में उन्हें अध्यापक के रूप में अरविंद घोष मिले । अरविन्द घोष क्राँतिकारी थे । वे शिक्षा के साथ युवाओं में राष्ट्र चेतना जगाने के अभियान में जुटे थे । अरविन्द घोष अलीपुर बम काण्ड में जेल गये थे बाद में सन्यास लेकर आध्यात्मिक और राष्ट्र साधना में लीन हो गये और महर्षि अरविन्द के नाम से प्रसिद्ध हुये । इन्हीं के सान्निध्य युवा कन्हैयालाल मुंशी के मन में स्वत्व एवं स्वाभिमान का भाव प्रबल हुआ और अंग्रेजी शासन से मुक्ति के संघर्ष से जुड़ गये । अरविन्द जी के सानिध्य वे बम बनाना भी सीख गये थे । स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण कर वकालत पढ़ने मुम्बई पहुँचे। 1910 में वकालत पास की और बम्बई उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे । उन्होंने हर परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी । यह उनकी कुशाग्रता थी कि कम समय में ही उनकी गणना मुम्बई उच्च न्यायालय के प्रतिष्ठित वकीलों में होने लगी थी । समय के साथ वे ऐनी बेसेन्ट के संपर्क में आये और उनकी संस्था होमरूल से जुड़ गये ।
आरंभिक कुछ वर्ष उनका भड़ौच और बड़ौदा आना जाना रहा । फिर 1914 में मुम्बई को उन्होंने अपना स्थाई निवास बना लिया । 1915 में होमरूल आँदोलन के सचिव बने। 1917 में बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन के भी सचिव बने। 1920 में अहमदाबाद में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया और कांग्रेस से जुड़ गए। काँग्रेस में उनकी गाँधीजी, सरदार वल्लभभाई पटेल, भूलाभाई देसाई आदि विभिन्न नेताओं से निकटता भी बढ़ी। 1921 के असहयोग आँदोलन में हिस्सा लिया और गिरफ्तार हुये । 1924 में पत्नि का निधन हो गया और 1926 में उन्होंने दूसरा विवाह किया ।
1927 में बॉम्बे विधान सभा के लिए चुने गए लेकिन त्यागपत्र देकर बारडोली सत्याग्रह में शामिल हुये, जेल गये। 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया गिरफ्तार हुये और छह माह की सजा हुई । 1932 के सत्याग्रह के दौरान फिर गिरफ्तार हुये और दो साल की सजा हुई । उनका जेल जीवन लिखने और पढ़ने में ही बीतता । लगातार आँदोलनों और प्रभावशाली बौद्धिक क्षमता के चलते कांग्रेस में उनका विशिष्ट स्थान बना और 1934 में कांग्रेस संसदीय बोर्ड के सचिव बने। 1937 के बॉम्बे प्रेसीडेंसी चुनाव में पुनः निर्वाचित हुये और बॉम्बे प्रेसीडेंसी के गृह मंत्री बने । उन्होंने 1938 में एक शैक्षिक ट्रस्ट, भारतीय विद्या भवन की स्थापना की । जिसमें साहित्य और सांस्कृतिक शोध प्रमुख कार्य थे ।

काँग्रेस से मतभेद

श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी के कांग्रेस में मतभेद 1934 से आरंभ हुये । वे समान नागरिक अधिकारके पक्षधरथे लेकिन काँग्रेस लोकल असेंबलियों के चुनाव में मुस्लिम लीग को विशिष्ट सुविधा देने पर सहमत हो गई थी। मुंशीजी ने इसका विरोध किया था पर उनकी बात नहीं मानी गई। इन्हीं दिनों पाकिस्तान की मांग के समर्थन में मुस्लिम लीग ने सशस्त्र गार्ड तैयार करके हिंसक गतिविधियाँ आरंभ कीं । जिन असेंबलियों मुस्लिम लीग प्रभावी थी वहाँ ये हिंसक गतिविधि बहुत बढ़ी। तब मुंशी जी इन हिंसक तत्वों से उनकी शैली में ही उत्तर देकर राष्ट्र और समाज रक्षा के पक्ष में थे। उनकी सोच साम्प्रदायिक नहीं थी वे मानते ​​थे कि हिंदुओं और मुसलमानों का भविष्य शाँति और “अखंड भारत” में ही निहित है । लेकिन मुस्लिम लीग पूरे देश को वैमनस्य और हिंसा में धकेल रही है । जिससे हिन्दु और मुसलमान दोनों को शक्ति से इन तत्वों से निबटना चाहिए। पर काँग्रेस में उनके मत को समर्थन न मिला उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी । लेकिन गाँधीजी और सरदार वल्लभभाई पटेल से उनका व्यक्तिगत संपर्क बना रहा । अंततः गांधी जी के आग्रह पर 1946 में कांग्रेस से पुनः जुड़ गये और संविधान सभा के सदस्य बने । श्री के एम मुंशी उस ध्वज समिति में भी रहे जिसमें भारत के ध्वज का चयन किया था । वे श्री भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता वाली उस समिति के भी सदस्य थे जिसमें संविधान का मसौदा तैयार किया गया था।

हैदराबाद विलय और सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में भूमिका

भारत की स्वतंत्रता के बाद श्री के एम मुंशी की महत्वपूर्ण भूमिका हैदराबाद रियासत के भारत विलय और सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में रही । वे सरदार वल्लभभाई पटेल के अति निकट और विश्वसनीय थे । रियासतों के भारत में विलीनीकरण के लिये सरदार पटेल की हैदराबाद और जूनागढ़ यात्रा में एनवी गाडगिल और के एम मुंशी साथ थे । सरदार पटेल ने श्रीमुंशी को हैदराबाद रियासत के लिए राजनयिक दूत और व्यापार एजेंट नियुक्त किया गया था । इस रूप में रहकर ही श्री मुंशी ने वहाँ सैन्य कार्रवाई का वातावरण बनाया । सरदार पटेल के जूनागढ़ में भी श्री मुंशी साथ रहे । सरदार पटेल ने जूनागढ़ में ही सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की घोषणा की थी । इसका पूरा मसौदा श्री के एम मुंशी ने ही तैयार किया था । पुनर्निर्माण पूरा होने से पहले ही सरदार पटेल का निधन हो गया था । लेकिन मुंशीजी ने सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य जारी रखा ।
1950 में वे केंद्रीय खाद्य और कृषि मंत्री थे । पर्यावरण समृद्धि की दृष्टि से वन क्षेत्र बढ़ाने की दृष्टि से उन्होंने ही वन महोत्सव की शुरुआत की थी। तब से जुलाई माह में हर वर्ष वृक्षारोपण उत्सव और वन महोत्सव मनाया जाता है ।
वे 1952 से 1957 तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे । उन्होंने चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के साथ स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की । वे समान नागरिक संहिता और अखंड भारत के समर्थक थे ।
अगस्त 1964 में विश्व हिंदू परिषद की स्थापना के लिए आयोजित बैठक की अध्यक्षता श्री के एम मुंशी ने ही की थी । इसी वर्ष उन्होंने राजनीति से सन्यास ले लिया और अपना शेष जीवन अध्ययन और लेखन में ही व्यतीत किया । और 8 फरवरी 1971 को उन्होंने संसार से विदा ले ली ।

साहित्य रचना

वे स्वतंत्रता के बाद भारत के उसी साँस्कृतिक स्वरूप की कल्पना करते थे जो अतीत में रहा है । इसीलिए स्वतंत्रता आँदोलन के साथ वे भाषा, साहित्य और साँस्कृतिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहे । इसी दिशा में उनका लेखन रहा । उन्होंने हिन्दी, अंग्रेजी और गुजराती तीन भाषाओं में अपने साहित्य की रचना की । वे राष्ट्र और समाज की उन्नति के लिये शक्ति और शास्त्र दोनों के समर्थक थे । इसीलिए उन्होंने भगवान परशुराम जी पर एक उपन्यास लिखा और अन्य साहित्य की रचना भी की । उनके रचना संसार में गुजरातनो नाथ, पाटणनी प्रभुता, पृथिवीवल्लभ, कृष्णावतार (सात खंडों में), राजाधिराज,जय सोमनाथ, भगवान कौटिल्य, भग्न पादुका, लोपामुद्रा, लोमहर्षिणी, भगवान परशुराम, वेरनी वसुलात, कोनो वांक, स्वप्नद्रष्टा, तपस्विनी, अडधे रस्ते, सीधां चढाण, स्वप्नसिद्धिनी शोधमां, पुरन्दर पराजय, अविभक्त आत्मा तर्पण, पुत्र समोवडी, वावा शेठनुं स्वातंत्र्य, बे खराब जण, आज्ञांकित, ध्रुवसंवामिनीदेवी, स्नेहसंभ्रम, डॉ॰ मधुरिका, काकानी शशी, छीए ते ज ठीक,ब्रह्मचर्याश्रम, मारी बिनजवाबदार कहाणी और गुजरातनी कीर्ति गाथा प्रमुख हैं।

चिनाब पर भारत का निर्णायक कदम, पाकिस्तान में मचा राजनीतिक भूचाल

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । दक्षिण एशिया की राजनीति में जल आज प्राकृतिक संसाधन से अधिक रणनीति, संप्रभुता और सुरक्षा का अहम हथियार बन चुका है। चिनाब नदी पर भारत द्वारा उठाया गया ताजा कदम इसी बदले हुए भू-राजनीतिक यथार्थ का सशक्त उदाहरण है। दुलहस्ती हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के दूसरे चरण को जैसे ही भारत सरकार की पर्यावरणीय समिति से मंजूरी मिली, इस फैसले की गूंज सरहद पार पाकिस्तान तक सुनाई देने लगी। वहां की राजनीति में खलबली मच गई, आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए और एक बार फिर सिंधु जल समझौता चर्चा के केंद्र में आ गया है। भारत के लिए यह ऊर्जा आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय हित का सवाल है, जबकि पाकिस्तान इसे अपने अस्तित्व और जल अधिकारों से जोड़कर देख रहा है।

भारत सरकार की पर्यावरण विभाग की विशेषज्ञ समिति ने 27 दिसम्‍बर को जम्मू-कश्मीर स्थित दुलहस्ती हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के स्टेज-2 को औपचारिक स्वीकृति प्रदान की है। वस्‍तुत: यह मंजूरी मिलते ही पाकिस्तान की सियासत में बेचैनी साफ दिखाई देने लगी। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की वरिष्ठ सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री शेरी रहमान ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भारत पर “पानी को हथियार बनाने” का संगीन आरोप लगाया। उनके अनुसार, यह कदम क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा है और अंतरराष्ट्रीय समझौतों की भावना के विरुद्ध है।

शेरी रहमान का दावा है कि 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुए इस समझौते के तहत पाकिस्तान को चिनाब, झेलम और सिंधु नदियों के जल पर अधिकार प्राप्त हैं, जबकि भारत को रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का उपयोग करने की अनुमति दी गई थी। रहमान का आरोप है कि भारत ने एकतरफा तरीके से सिंधु जल समझौते को स्थगित कर दिया है, जो न तो कानूनी है और न ही नैतिक रूप से स्वीकार्य। पाकिस्तान की आपत्ति केवल दुलहस्ती परियोजना तक सीमित नहीं है। शेरी रहमान ने भारत द्वारा चिनाब घाटी में संचालित या प्रस्तावित कई अन्य परियोजनाओं को भी विवादास्पद करार दिया। उन्होंने सावलकोट, रेटल, बड़सर, पाकल डुल, क्वार, कीरू और किरथाई जैसी परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि भारत सुनियोजित ढंग से इन सभी पर काम तेज कर रहा है। पाकिस्तान का तर्क है कि इन परियोजनाओं के कारण भविष्य में उसके हिस्से के पानी में कटौती हो सकती है, जिससे उसकी कृषि, खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।

दूसरी ओर भारत का दृष्टिकोण इससे एकदम अलग और स्पष्ट है। भारत बार-बार यह दोहराता रहा है कि सिंधु जल समझौते में उसे पश्चिमी नदियों पर वैध अधिकार प्राप्‍त हैं। भारत इन नदियों पर रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाएं स्थापित कर सकता है। दुलहस्ती परियोजना इसी श्रेणी में आती है, जिसका उद्देश्य जल संरक्षण से अधिक स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन है। वहीं इस पूरे घटनाक्रम को हालिया सुरक्षा परिदृश्य से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

इसी वर्ष 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले ने भारत-पाक संबंधों में पहले से मौजूद तनाव को और गहरा कर दिया। इस हमले में 22 निर्दोष पर्यटकों की धर्म पूछकर हत्या कर दी गई थी। जांच एजेंसियों की रिपोर्ट में पाकिस्तानी आतंकवादियों की संलिप्तता सामने आने के बाद भारत सरकार ने बेहद सख्त रुख अपनाया। इसके बाद भारत ने सिंधु जल समझौते को स्थगित करने का फैसला लिया और पाकिस्तान के साथ जल प्रवाह से जुड़ी तकनीकी जानकारियां साझा करना बंद कर दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस संदर्भ में कई बार दो टूक शब्दों में कह चुके हैं कि “पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते।” यह कथन अब केवल राजनीतिक बयान नहीं माना जाना चाहिए, यह तो भारत की नई रणनीतिक सोच का प्रतीक बन चुका है। भारत का मानना है कि जब तक पाकिस्तान अपनी धरती से संचालित आतंकवाद पर ठोस और निर्णायक कार्रवाई नहीं करता, तब तक किसी भी प्रकार के सहयोग या संवाद का आधार नहीं बन सकता।

इसके साथ एक तथ्‍य यह भी है कि दुलहस्ती हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के दूसरे चरण के तहत लगभग 260 मेगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन की योजना है। इससे जम्मू-कश्मीर में ऊर्जा उपलब्धता को मजबूती मिलेगी और देश की बढ़ती बिजली जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी। यह परियोजना पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ ही स्थानीय विकास, रोजगार सृजन और बुनियादी ढांचे को भी गति देने वाली है।

इसके साथ ही भारत सरकार चिनाब नदी पर प्रस्तावित सावलकोट हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को लेकर भी गंभीर तैयारी कर रही है। करीब 1856 मेगावाट क्षमता वाली यह परियोजना पूरी होने पर उत्तरी भारत की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में शुमार होगी। भारत का स्पष्ट दृष्टिकोण है कि जम्मू-कश्मीर जैसे पर्वतीय क्षेत्र जलविद्युत की अपार संभावनाओं से भरे हुए हैं और इनका उपयोग राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के लिए किया जाना चाहिए।

अंततः चिनाब नदी पर भारत का यह कदम कहना होगा कि तकनीकी या ऊर्जा परियोजना भर नहीं है, यह तो बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों का संकेतक है। पाकिस्तान की बौखलाहट और आरोपों के बावजूद भारत यह संदेश देने में सफल रहा है कि अब राष्ट्रीय सुरक्षा, विकास और संप्रभु अधिकारों पर कोई समझौता नहीं होगा। फिलहाल मोदी सरकार अपने कहे पर अडिगता से खड़ी हुई नजर आ रही है। निश्‍चत ही इस निर्णय से प्रत्‍येक भारतवासी अपनी सरकार पर गौरव महसूस कर सकता है।

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