Atul Gangwar: The Storyteller Behind National Award-Winning Main Nida

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Delhi: Atul Gangwar’s journey through Indian media has always been marked by quiet persistence and a deep love for storytelling rooted in language and culture. That journey reached a significant milestone when his documentary Main Nida was awarded Best Art and Culture Documentary at the 72nd National Film Awards. The film, a biographical portrait of the celebrated Urdu poet Padma Shri Nida Fazli, captures the essence of a literary voice that bridged worlds with simplicity and profundity. Its recognition at the national level is both a personal triumph and a validation of Gangwar’s long commitment to documenting India’s cultural heritage.

 

A Career Forged in Television and Literature

Gangwar entered the television industry more than two decades ago. His professional path began at B.A.G. Films under the guidance of Anuradha Prasad. There he directed several series, including Lens Eye, Hit Thi Hit Hai, and Birla Yamaha Hi-5. These early experiences taught him the craft of visual storytelling and the discipline of working within the fast-moving world of broadcast media.

For eleven years he served as a program producer at Sahara Samay Channel. During this period he handled a wide range of content, from film-based entertainment to news and current affairs. He produced and edited documentaries on varied subjects and created infotainment programs such as Adabi Cocktail and Urdu Bazar, both of which reflected his affinity for literature and language. On screen he became a familiar face as an anchor and presenter of election-based satirical shows. Programs like Tau ki Khari Khari, Shabda Baan, and Chunavi Chai Ki Chuski—the last co-hosted with the late Padma Shri Tom Alter—showcased his ability to blend sharp observation with warmth and humour.

Documentaries, Cinema, and a Lasting Cultural Legacy

Gangwar’s interest in cinema developed naturally from his television work. His story was adapted for the film Muawaza (Paisa Zameen Ka), starring Anupam Kher. He has written the story for Jalebi Culture, produced by Atul Pandey, and is developing the screenplay of Who Killed Deendayal Upadhyay for National Award-winning director Ujjwal Chatterjee. Parallel to these narrative projects, he has continued to produce documentaries. Main Nida was selected for the official section of the International Film Festival of India in Goa in 2024, won best documentary awards at the Rajasthan International Film Festival and the Jagran Film Festival, and earned official selection at the Mumbai International Film Festival 2026. Another of his works, Shat Shat Atal, a biographical documentary on former Prime Minister Atal Bihari Vajpayee, is available on the WAVES OTT platform. He is also co-producer of the feature film Dulhaniya Le Aayegi, scheduled for release in 2026.

Beyond production, Gangwar remains actively involved in the larger film community. He has served as a jury member for the non-feature film category at the 51st International Film Festival of India and the 66th National Film Awards. He is a member of the selection committee of the Mumbai International Film Festival and served on the jury of the 2nd Chitra Bharati Film Festival in 2018. Currently he is Festival Director of the Vardaan International Film Festival 2026 and holds the position of National Secretary of Bharatiya Chitra Sadhna. He also works as managing editor of the news portals Bol Bindaass and Bihar Update.com.

Through more than twenty years in the industry, Atul Gangwar has witnessed the transformation of Indian media while remaining anchored in literature, culture, and thoughtful storytelling. The National Award for Main Nida is a fitting recognition of a career dedicated to preserving and presenting the voices that shape the nation’s artistic and intellectual life.

अतुल गंगवार: ‘मैं निदा’ से राष्ट्रीय पहचान तक का सफर

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दिल्ली। अतुल गंगवार का भारतीय मीडिया में सफर हमेशा शांत दृढ़ता और भाषा व संस्कृति में गहरे जुड़ाव वाली कहानी कहने की ललक से भरा रहा है। यह सफर तब एक महत्वपूर्ण मुकाम पर पहुँचा जब उनके वृत्तचित्र मैं निदा को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ कला और संस्कृति वृत्तचित्र का सम्मान मिला। यह फिल्म पद्मश्री उर्दू कवि निदा फाजली का जीवनीपरक चित्रण है, जो सादगी और गहराई के साथ दुनियाओं को जोड़ने वाली साहित्यिक आवाज़ को जीवंत करती है। राष्ट्रीय स्तर पर यह सम्मान न केवल उनका व्यक्तिगत उत्कर्ष है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के प्रति उनकी लंबी प्रतिबद्धता की पुष्टि भी है।

टेलीविजन और साहित्य से जुड़ा करियर

दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल करने वाले गंगवार दो दशक से अधिक समय से टेलीविजन उद्योग से जुड़े हैं। उनका पेशेवर सफर बी.ए.जी. फिल्म्स में अनुराधा प्रसाद के मार्गदर्शन में शुरू हुआ। वहाँ उन्होंने लेंस आई, हिट थी हिट है और बिरला यामाहा हाई-5 जैसी कई श्रृंखलाओं का निर्देशन किया। इन शुरुआती अनुभवों ने उन्हें दृश्य कहानी कहने की कला और प्रसारण मीडिया की तेज रफ्तार वाली दुनिया में काम करने का अनुशासन सिखाया।

ग्यारह वर्षों तक उन्होंने सहारा समय चैनल में प्रोग्राम प्रोड्यूसर के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने फिल्म-आधारित मनोरंजन से लेकर समाचार और समसामयिक मामलों तक विविध सामग्री संभाली। उन्होंने विभिन्न विषयों पर वृत्तचित्र तैयार और संपादित किए तथा अदबी कॉकटेल और उर्दू बाजार जैसे इन्फोटेनमेंट कार्यक्रम बनाए, जो साहित्य और भाषा के प्रति उनके लगाव को दर्शाते हैं। स्क्रीन पर वे चुनाव आधारित व्यंग्यात्मक कार्यक्रमों के एंकर और प्रस्तुतकर्ता के रूप में परिचित चेहरा बने। ताऊ की खरी-खरी, शब्द बाण और चुनावी चाय की चुस्की—जिसमें उन्होंने स्वर्गीय पद्मश्री टॉम ऑल्टर के साथ सह-मेजबानी की-जैसे कार्यक्रमों में उनकी तीक्ष्ण दृष्टि, गर्मजोशी और हास्य का अनूठा मिश्रण दिखता है।

वृत्तचित्र, सिनेमा और सांस्कृतिक विरासत

टेलीविजन के अनुभव से स्वाभाविक रूप से सिनेमा में उनकी रुचि विकसित हुई। उनकी कहानी को मुआवजा (पैसा जमीन का) फिल्म के लिए अपनाया गया, जिसमें अनुपम खेर ने अभिनय किया। उन्होंने अतुल पांडे द्वारा निर्मित जलेबी कल्चर की कहानी लिखी है और राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक उज्ज्वल चटर्जी के लिए हू किल्ड दीनदयाल उपाध्याय की पटकथा पर काम कर रहे हैं। इन कथात्मक परियोजनाओं के साथ-साथ वे वृत्तचित्र बनाने का काम जारी रखे हुए हैं। मैं निदा को 2024 में गोवा में अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में चुना गया, राजस्थान अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव और जागरण फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र का पुरस्कार मिला तथा मुंबई अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव 2026 में आधिकारिक चयन हासिल किया। उनकी एक अन्य कृति शत शत अटल, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर आधारित जीवनीपरक वृत्तचित्र, वेव्स ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है। वे 2026 में रिलीज होने वाली फीचर फिल्म दुल्हनिया ले आएगी के सह-निर्माता भी हैं।

निर्माण के अलावा गंगवार फिल्म समुदाय में सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। उन्होंने 51वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव भारत और 66वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में गैर-फीचर फिल्म श्रेणी के ज्यूरी सदस्य के रूप में सेवा दी है। वे मुंबई अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव की चयन समिति के सदस्य हैं और 2018 में द्वितीय चित्र भारती फिल्म महोत्सव के ज्यूरी में शामिल रहे। वर्तमान में वे वरदान अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव 2026 के महोत्सव निदेशक हैं तथा भारतीय चित्र साधना के राष्ट्रीय सचिव का पद भी संभाल रहे हैं। वे बोल बिंदास और बिहार अपडेट.कॉम नामक समाचार पोर्टलों के प्रबंध संपादक के रूप में भी काम कर रहे हैं।

बीस से अधिक वर्षों के इस सफर में अतुल गंगवार ने भारतीय मीडिया के बदलाव को अपनी आँखों से देखा है, फिर भी साहित्य, संस्कृति और विचारपूर्ण कहानी कहने से जुड़े रहे। मैं निदाके लिए मिला राष्ट्रीय पुरस्कार उस करियर की सार्थक पहचान है, जो राष्ट्र की कलात्मक और बौद्धिक आवाज़ों को सहेजने और प्रस्तुत करने के लिए समर्पित रहा है।

क्या पूरे झारखंड आंदोलन में नेहा बोरा अकेली लड़की थी जो पढ़ रही है और बढ़ रही है

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गंगा महतो

रांची। छात्रों के तरफ से जो डेलिगेशन गया रहा सरकार से वार्ता करने को उसमें दो लड़कियां थी। एक नीतू कुजूर और दूसरी शालू कुमारी। इसके अलावे हजारों लड़कियां वहां प्रोटेस्ट में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर रही है। कहीं भी किसी ने भी किसी भी लड़की से कोई बदतमीजी की ?

लड़कों से ज्यादा हमने लड़कियों को ही इस मामले में ज्यादा मुखर देखा है। किसी ने भी लड़कियों की बिरादरी पूछी ? उसकी जाति पूछी ? उसका धर्म पूछा ?
नहीं.. कतई नहीं.. इनसे बस इनका विचार पूछा गया.. इनकी पीड़ा सुनी गई…!
पिछले 13 दिन से छात्र/छात्राएं डटे हुए थे आंदोलन में अपनी मांगों के साथ।
एक सिंगल बदतमीजी न देखी न सुनी गई।
लेकिन 14वें दिन नेहा बोरा आती है इंटर के बच्चों के कुछ भीड़ के साथ और विधानसभा की ओर मार्च करती है। बीच मार्च में एक लड़का आता है पीछे से और इसके ऊपर स्याही डाल देता है।
अब यहां से एक अलग ही लेवल का बहस शुरू हो जाता है।
“ये वही लोग हैं जिन्होंने माता अहिल्याबाई के ऊपर कीचड़ उछाले थे, गोबर फेंके थे….!”
“ये वही लोग हैं जिन्होंने गरीबों को, दलितों को, आदिवासियों को सदियों से शिक्षा से दूर रखा है…!”
“ये वही लोग हैं जिन्होंने कभी भी एक लड़की को आगे बढ़ते हुए नहीं देख पाया है….!”
“ये वही लोग हैं जो नारियों को सशक्त हुए कभी नहीं देखना चाहते है…!”
“ये वही लोग हैं जो स्त्रियों को दासी समझते है…..!”

मने कुछ इस प्रकार से ही कई एक बातें हैं जो बोली जा रही है…!
मतलब जो लड़कियां पिछले 13 दिन से आंदोलन को सफलतापूर्वक आगे बढ़ा रही थी/है वे सशक्त लड़कियां नहीं है.. सशक्त का प्रतिरुपा ये नेहा बोरा बन गई ??
पढ़ती हुई लड़कियों के ऊपर गोबर,स्याही फेंकने वाले लोग हैं ये…! कैसे भला ?
पढ़ती हुई लड़की केवल नेहा बोरा है ?? इनको पढ़ती हुई लड़कियों का प्रतिनिधि चुना गया है ?? तो जो जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में हजारों लड़कियां आंदोलनरत हैं वे पढ़ी-लिखी  नहीं है ??
ये पढ़ी-लिखी लड़कियां पिछले 13 दिनों से अपने से 10-12 गुना ज्यादा लड़कों के बीच में आंदोलन कर रही है, फिर क्यों किसी ने इनके ऊपर को अभद्रता नहीं की ? जब ऐसे लोग पढ़ती और बढ़ती हुई लड़कियों को देख नहीं सकते तो क्यों नहीं किसी ने ऐसी हरकत की लड़कियों के साथ ??
आप नैरेटिव तो ऐसे बना रहे जैसे केवल और केवल नेहा बोरा ही अकेली एक मात्र कृति है जो पढ़ती हुई लड़की है और जो आंदोलन में 13 दिन से टिकी हुई हैं वे ज़ाहिल और गंवार हैं।
कुछ तो आपके दामन में ऐसा होगा जो आपके पीछे पड़ गया हो ?
आप उमर खालिद और शरजील इमाम जैसों को एडवोकेट करेगी.. कहेंगी कि इन्हें बस बीजेपी आईटी सेल और गोदी मीडिया ने ट्रायल करके जेल में ठूंस दिया है.. और बेल तक नहीं दी जा रही है। लेकिन ये कभी भी सुप्रीम कोर्ट का ज़िक्र नहीं करेगी जहां बेल लेने गए इनके वकील से सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि आप स्वयं से पूछिये कि ये बेल के काबिल है ??
सुप्रीम कोर्ट बेल देने से मना कर देती है। लेकिन देश के तोड़ने के मंसूबों के पाले हुए ये सपोलों के लिए ये खूब समर्थन करेगी। और इन जैसे सपोलों के लिए न्यायिक रिफॉर्म की बात करेगी।
और इसके बदले में लोग इन्हें फूल मालाओं से स्वागत करेंगे ? है न ?
हिन्दू एकत्रीकरण से इसे समस्या है.. क्योंकि यदि हिंदू एकत्रित हो गए तो फिर इस देश का मुसलमान असुरक्षित हो जाएगा। कहने का मल्लब है कि देश का मुसलमान सुरक्षित रहे इसके लिए हिंदुओं का खंडित रहना अतिआवश्यक है।
और इसी भावना के साथ ऑफकोर्स फ्री फिलिस्तीन की कट्टर समर्थक है।
बचपन से स्कूल के टेम से सुनते आ रहा हूँ एक व्यवहारिक और नैतिक ज्ञान कि ‘टांगी का घाव तो कुछ दिनों में भर जाएगा लेकिन जिह्वा से दिया गया घाव जीवन भर नहीं भरता है।’
इसलिए जिह्वा का प्रयोग सोच-समझ कर करें।
वहीं जीवन में कोई कुछ भी कहे लेकिन जन्म देने वाले माता-पिता तुमसे गर बात नहीं करते हैं तो उससे बड़ा दुख कुछ और नहीं।
सामान्य व्यवहार की बात है ये।
नेहा बोरा के पिता नेहा से पिछले 10 साल से बात नहीं किये हैं। और इस बात को नेहा पूरे गर्व के साथ चेहरे पे विजयी भाव और मुस्कान लिए बताती है कि जब से मेरे पिता जी को पता चला कि मैं लेफ्ट की विचारधारा से जुड़ी हूँ तो वे मुझसे बात नहीं कर रहे हैं और अब ऐसा हुए 10 साल हो गया है।
इसका पिता इससे पिछले 10 साल से बात नहीं कर रहा है.. ऐसा तो नहीं हुआ होगा कि बस तुम लेफ्ट की राजनीति कर रही हो तो हम तुमसे बात नहीं करेंगे, बल्कि कई मर्तबा अपने बाप के ऊपर इसी तरह चिल्लाई होगी जैसा अभी चिल्लाती है, तब जा के इसका बाप इससे बात करना बंद किया होगा।
इसको जन्म देने वाला बाप इससे 10 साल से बात नहीं कर रहा है, तो इसके बाप को कितने धुरंधरों ने लानत भेजी कि ये वही लोग हैं जो अपनी पढ़ती हुई और बढ़ती हुई लड़कियों को देखना नहीं चाहते हैं ? ये वही ऑर्थोडॉक्स बाप हैं जो स्त्रियों को ग़ुलाम बना के रखना चाहते है ?? ये वहीं लोग हैं जो स्त्रियों को पैर की जूती समझते है ??
नहीं मल्लब होना चाहिए था न ऐसा कोई नैरेटिव ??
नहीं सेट किया आप लोगों ने इसके पिता जी के ऊपर ??
और ये लड़की और इनके जैसे लोग जो अपने बाप के दस साल से बात नहीं करने को भुनाना जानती हो वो भला एक शोषणकारी उपनामधारी वाले के हाथों स्याही से नहा के चुप बैठेगी ?? अरे, वो तो बस ऐसे ही अवसर की तलाश में थी, और मिला इसे। बाप को भुनाई और अब ये शोषणकारी के स्याही को भुनायेगी जम के।
बाकी नारी हितैषियों ने दिखा दिया कि नीतू कुजूर, शालू कुमारी और तमाम हजारों लड़कियां पढ़ी-लिखी और आगे बढ़ती हुई लड़कियां नहीं है बल्कि अब ये नेहा बोरा के बोरा में मड़ुआ के दाने की तरह समा गई हैं।

हसीना की प्रेस मीटिंग से कुछ खास नहीं निकला सिवाय बांग्लादेश लौटने की पुष्टि

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नवा ठाकुरीया
गुवाहाटी। भारत की राजधानी नई दिल्ली में बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर काफी चर्चा थी, लेकिन कई मीडिया आउटलेट्स द्वारा लाइव-स्ट्रीम किए गए इस कार्यक्रम में अवामी लीग प्रमुख के साथ केवल ऑडियो बातचीत हुई। इसमें उन्होंने बस यही दोहराया कि वह आने वाले दिसंबर में अपने देश लौटना चाहती हैं। वहां मौजूद कई पत्रकारों ने हसीना से बांग्लादेश लौटने के रोडमैप के बारे में जानने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने किसी खास तारीख या यात्रा के साधन का खुलासा नहीं किया। हालांकि, 5 अगस्त 2026 को ‘फॉरेन कॉरेस्पोंडेंट्स क्लब ऑफ साउथ एशिया’ द्वारा आयोजित इस प्रेस ब्रीफिंग के दौरान हसीना के बेटे साजीब वाजेद जॉय अमेरिका से लाइव जुड़े। उन्होंने माना कि अवामी लीग सरकार के खिलाफ छात्रों के बड़े पैमाने पर हुए विद्रोह के बाद, जब उनकी मां ने ठीक दो वर्ष पहले ढाका छोड़ा था, तब से भारत उन्हें लगातार समर्थन दे रहा है।
78 वर्षीय हसीना, जो 5 अगस्त 2024 से नई दिल्ली में स्वैच्छिक निर्वासन का जीवन बिता रही हैं, ने घर लौटने को लेकर वही बातें दोहराईं, जो पहले ही कई अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों द्वारा प्रकाशित की जा चुकी थीं। दो वर्षों में पहली बार वर्चुअल माध्यम (असल में केवल ऑडियो) से सार्वजनिक रूप से संबोधित करते हुए बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की बेटी ने कहा कि ‘चाहे किस्मत में कुछ भी हो’, उन्हें वापस लौटना ही है। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान अपने पिता के संघर्ष और अनगिनत मुक्तियोद्धाओं (स्वतंत्रता सेनानियों) के बलिदान को याद करते हुए हसीना ने भावुक स्वर में कहा कि जान का डर उनके बांग्लादेश लौटने के फैसले को नहीं बदल सकता। उन्होंने दिसंबर में लौटने का फैसला इसलिए किया क्योंकि यह विजय का महीना है। 16 दिसंबर 1971 को इस्लामाबाद के आत्मसमर्पण के बाद पाकिस्तान से बांग्लादेश का जन्म हुआ था।
अपने देश में जुलाई-अगस्त 2024 के विद्रोह का उल्लेख करते हुए हसीना ने आरोप लगाया कि कुछ विशेष मकसद वाले लोगों ने नौकरी में कोटा सुधार आंदोलन में घुसपैठ की और इसे उनके इस्तीफे की मांग तक सीमित कर दिया। उनके अनुसार, शुरुआत में शांतिपूर्ण रहा विरोध-प्रदर्शन जल्द ही हिंसक हो गया, जिसमें प्रदर्शनकारियों ने बड़े पैमाने पर हत्याएं, आगजनी तथा सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और कानून-प्रवर्तन एजेंसियों पर हमले किए। हसीना ने कहा कि सुनियोजित विरोध-प्रदर्शन ने उन्हें बांग्लादेश छोड़ने पर मजबूर किया, लेकिन इससे उन्हें अपने प्रिय देश और वहां के लोगों से अलग नहीं किया जा सका। उन्होंने यह भी दावा किया कि 12 फरवरी 2026 के राष्ट्रीय चुनाव पहले से तय नतीजों वाले थे, क्योंकि उनकी पार्टी अवामी लीग को इसमें हिस्सा लेने की अनुमति नहीं दी गई। उनके अनुसार, बांग्लादेशी नागरिक आज भी भय, दमन और आर्थिक तंगी के साये में जीवन बिता रहे हैं।
प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने 8 अगस्त को सत्ता संभाली थी। यह तब हुआ, जब हसीना गणभवन (प्रधानमंत्री कार्यालय) से निकलकर भारत चली आईं, क्योंकि एक बेकाबू भीड़ ने वहां धावा बोल दिया था। इसके लगभग 18 महीने बाद हुए आम चुनाव में खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने जीत दर्ज की और पार्टी प्रमुख तारिक रहमान देश के नए प्रधानमंत्री बने। इस बीच, जुलाई-अगस्त 2024 के बड़े विद्रोह के दौरान मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोपों में इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (बांग्लादेश) ने हसीना को कई मामलों में दोषी ठहराया, जिनमें उनकी अनुपस्थिति में सुनाई गई मृत्युदंड की सजा भी शामिल है। उनकी पार्टी को देश में राजनीतिक गतिविधियां करने और चुनाव लड़ने से भी रोक दिया गया।
अंतरिम प्रशासन ने ढाका में लंबित मुकदमों का सामना करने के लिए शेख हसीना को भारत से वापस लाने की मांग भी की। प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस प्रशासन के नक्शेकदम पर चलते हुए बीएनपी सरकार ने भी नई दिल्ली से कई बार अनुरोध किया है कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच हुई संधि के तहत उन्हें प्रत्यर्पित किया जाए। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन शुरुआती वैश्विक नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने तारिक रहमान को बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने से पहले ही बधाई दी थी। हालांकि, नई दिल्ली ने अब तक हसीना के प्रत्यर्पण के मुद्दे पर कोई स्पष्ट सार्वजनिक रुख नहीं अपनाया है। इसकी झलक हाल में तारिक रहमान की पहली विदेश यात्रा में भी दिखाई दी, जिसमें भारत शामिल नहीं था, जबकि मलेशिया और चीन उनकी यात्रा सूची में थे। इसी बीच, उन्हें 12-13 सितंबर को होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए नई दिल्ली आमंत्रित किया गया है, लेकिन खबरों के मुताबिक अब तक ढाका की ओर से इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
ढाका ने शेख हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए कहा कि नई दिल्ली ने एक दोषी व्यक्ति को ऐसा कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि नरसंहार की आरोपी और फरार हसीना को मीडिया से सीधे संवाद का अवसर दिया गया, जहां ‘उन्होंने और उनके साथियों ने बांग्लादेश तथा वहां के लोगों के खिलाफ ज़हरीली बातें कहीं।’ मंत्रालय ने इसे ‘बांग्लादेश की संप्रभुता का अपमान और जुलाई क्रांति के शहीदों का गंभीर अनादर’ बताते हुए कहा कि इस कार्यक्रम को रोका जाना चाहिए था। बयान में यह भी कहा गया कि बांग्लादेश भारत के साथ संप्रभु समानता, पारस्परिक सम्मान, एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने और राष्ट्रीय गरिमा के आधार पर रचनात्मक, पारस्परिक रूप से लाभकारी तथा भविष्योन्मुखी संबंध बनाए रखना चाहता है।
हालांकि, नई दिल्ली ने स्पष्ट किया कि यह कार्यक्रम एक स्वतंत्र प्रेस क्लब द्वारा आयोजित किया गया था, जिसके सदस्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों से जुड़े पत्रकार हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि भारत सरकार की इस कार्यक्रम के आयोजन में कोई भूमिका नहीं थी और न ही वह प्रेस ब्रीफिंग के दौरान व्यक्त किए गए किसी भी विचार का समर्थन करती है। उन्होंने यह भी दोहराया कि भले ही शेख हसीना को भारत में शरण मिली हुई है, लेकिन उन्हें भारतीय भूमि का उपयोग किसी अन्य संप्रभु देश के खिलाफ राजनीतिक गतिविधियों के लिए करने की अनुमति नहीं है। माना जा रहा है कि नई दिल्ली हसीना पर भारत छोड़ने का दबाव नहीं बनाएगी और वह जब तक चाहें, यहां रह सकती हैं। जब तक ढाका की ओर से यह भरोसा नहीं दिया जाता कि बांग्लादेश लौटने पर उनके साथ कानूनी प्रावधानों के अनुरूप निष्पक्ष व्यवहार किया जाएगा, तब तक नई दिल्ली उनके प्रस्थान को लेकर कोई दबाव बनाने की संभावना नहीं रखती।
उसी दिन ढाका में प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने नोबेल शांति पुरस्कार विजेता प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस की मौजूदगी में ‘जुलाई विद्रोह स्मारक संग्रहालय’ का उद्घाटन किया। यह संग्रहालय शेर-ए-बांग्ला नगर क्षेत्र स्थित ‘गणभवन’ परिसर को परिवर्तित कर बनाया गया है, जहां 2024 के घटनाक्रम के दौरान तोड़फोड़ हुई थी। प्रोफेसर यूनुस ने कहा कि यह संग्रहालय 2024 की क्रांति में शहीद हुए हजारों लोगों के अदम्य साहस और बलिदान को प्रदर्शित करेगा। उनके अनुसार, इस क्रांति को अब बांग्लादेश में लोकतंत्र के लिए संघर्ष के रूप में व्यापक पहचान मिल रही है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक बांग्लादेशी नागरिक को इस संग्रहालय का दौरा करना चाहिए और ऐसे नए राष्ट्र के निर्माण के संकल्प से स्वयं को जोड़ना चाहिए, जहां फासीवाद और तानाशाही प्रवृत्तियों के लिए कोई स्थान न हो।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच, बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने शेख हसीना के स्वदेश लौटने के फैसले का समर्थन किया। दो वर्षों बाद उनके पहले सार्वजनिक ऑडियो संबोधन को सुनने के बाद तस्लीमा ने कहा कि बांग्लादेश में हसीना को निष्पक्ष और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीय न्यायिक प्रक्रिया की गारंटी मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वह स्वयं तीन दशकों से अधिक समय से निर्वासन का जीवन जी रही हैं, इसलिए देश से दूर रहने की पीड़ा को भली-भांति समझती हैं। उन्होंने हसीना के राजनीतिक जीवन के अगले चरण की सफलता की भी कामना की।
नई दिल्ली में आयोजित हसीना के कार्यक्रम की रिपोर्टिंग पर बांग्लादेश सरकार द्वारा मीडिया संस्थानों पर लगाए गए प्रतिबंधों की आलोचना करते हुए तस्लीमा ने इसे अलोकतांत्रिक करार दिया। उन्होंने अवामी लीग पर लगी रोक तत्काल हटाने की मांग करते हुए कहा कि पार्टी प्रमुख को अपने स्वदेश लौटने के संघर्ष की याद अवश्य होगी। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि जब शेख हसीना 18 करोड़ की आबादी वाले मुस्लिम बहुल देश में गणभवन से शासन कर रही थीं, तब कट्टरपंथी इस्लामी ताकतों के विरोध के कारण उन्हें स्वयं बांग्लादेश लौटने की अनुमति नहीं मिली थी। बाद के घटनाक्रम में, उनके अनुसार, शेख हसीना भी अंततः उन्हीं कट्टरपंथी ताकतों का शिकार हो गईं।
(लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार)
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