तुलसी अणुव्रत सिंहनाद विशेषांक केन्द्रीय राज्यमंत्री श्री हर्ष मल्होत्रा को भेंट

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नई दिल्ली: माननीय श्री हर्ष मल्होत्रा केन्द्रीय राज्य मंत्री, सड़क परिवहन और राज मार्ग मंत्रालय, भारत सरकार को अणुव्रत आंदोलन के प्रवर्तक आचार्य श्री तुलसी के पावन जन्म की 111 वर्षीय परिसम्पन्नता प्रकाशित ‘तुलसी अणुव्रत सिंहनाद विशेषांक अणुविभा राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री प्रतापसिंह दुगड़ ने उपाध्यक्ष डॉ. कुसुम लुनिया, सहमंत्री श्री सुरेन्द्र नाहटा, कार्यसमिति सदस्य श्री बाबूलाल दुगड़ व अणुव्रत समिति दिल्ली ट्रस्ट के संगठन मंत्री श्री राजीव महनोत के संग भेंट किया।

माननीय मंत्री जी को अणुव्रत पत्रिका व बच्चों का देश पत्रिका के नवीनतम अंक भेंट किये तथा उनके संसदीय क्षेत्र की स्कूलों व पुस्तकालयों मे इन्हे प्रेषित करवानें में विशेष सहयोग का निवेदन किया।

आपने सकारात्मक संदेश देते हुए अणुव्रत विशेषांक के कलेवर की भूरी भूरी प्रशंसा की।

विशेष ज्ञातव्य रहे कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के विशेष निवेदन पर पूर्वी दिल्ली के लोकप्रिय सासंद श्री हर्ष मल्होत्रा जी ने अणुव्रत संसदीय मंच की सदस्यता भी ग्रहण की।

हिन्दू सम्मेलन भारतीय समाज में दे रहे हैं समरसता के भाव को मजबूती

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ग्वालियर : सितम्बर 1925 को विजयादशमी के पावन दिवस पर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना जिन मुख्य उद्देश्यों को लेकर हुई थी, उनमें भारतीय समाज में एकता, सद्भावना एवं समरसता का भाव मजबूत करना एवं भारतीय नागरिकों के बीच सनातन संस्कृति के संस्कारों के अनुपालन को बढ़ावा देना भी शामिल हैं। भारतवर्ष में धर्म का अनुसरण करते हुए, अपने जीवन में प्रत्यक्ष रूप से धार्मिक संस्कारों का आचरण करने वाली तपस्वी, त्यागी एवं ज्ञानी विभूतियां एक अखंड परम्परा के रूप में अवतरित होती आई हैं। इन्हीं महान विभूतियों के चलते ही भारत की एक राष्ट्र के रूप में वास्तविक रक्षा हुई है। अतः हम भारतीय नागरिकों को यह भली भांति समझना होगा कि भारतीय समाज को समर्थ, धर्मनिष्ठ, प्रतिष्ठित बनाने में हम तभी सफल हो सकेंगे जब हम भारत की प्राचीन परम्परा को युगानुकूल बनाकर एक बार पुनः इसे पुनर्जीवित करेंगे।

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं और यदि हम संघ की 100 वर्षों की यात्रा पर दृष्टि डालें, तो ध्यान में आता है कि संघ के स्वयसेवकों ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विचार और क्रियाशीलता के स्तर पर सक्रिय योगदान दिया है। वे अनेक क्षेत्रों में परिवर्तन के वाहक भी बने हैं। प्रारम्भ का सीमित संघ कार्य, समय के साथ व्यापक होता गया है। समाज की विभिन्न आवश्यकताओं को समझते हुए स्वयंसेवक विविध आयामों में अपने सहयोगियों के साथ क्रियाशील बने हैं। परिणामतः संघ के उद्देश्य के अनुरूप, देश में हिंदुत्व का जागरण करने की दिशा में विशेष प्रगति हुई है। हिंदुत्व के जागरण से, समाज में जाति, वर्ग, भाषा इत्यादि के आधार पर होने वाले अनेक प्रकार के भेदभाव, धीरे धीरे कम होने लगे हैं। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन, अयोध्या मंदिर में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा, कुम्भ जैसे विराट आयोजन इत्यादि अनेक ऐसे अवसर आए हैं – जहां हिंदू समाज का एक संगठित, भव्य और उच्च आदर्शों से युक्त स्वरूप सामने आया है। यह दृश्य समाज में आत्मविश्वास जगाने वाला बन रहा है। हम सब मिलकर देश के भविष्य को उज्जवल एवं सुदृढ़ बना सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सकारात्मक वातावरण निर्मित कर सकते हैं। इसलिए ये हमारी राष्ट्रीय एकात्मता को सुदृढ़ करने वाले आयोजन सिद्ध हुए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष केवल इतिहास की उपलब्धियां नहीं है, बल्कि भविष्य की दिशा का संकल्प हैं।

आज, जब हम राष्ट्रीयस्वयं संघ की 100 वर्षों की इस यात्रा को देखते हैं, तो यह भी स्पष्ट होता है कि हिंदुत्व और इसकी परम्पराओं पर लोगों का विश्वास बढ़ा है। समाज के अनेक लोग इस तथ्य को स्वीकार कर रहे हैं और इसका अनुभव भी कर रहे हैं। हिंदुत्व की इस जागृति के कारण लोग अब हिंदू होने में गर्व का अनुभव कर रहे हैं। एक समय था जब सार्वजनिक जीवन में हिंदू समाज की कमियों को ही उजागर किया जाता था, जिससे अनेक लोग हिंदुत्व की अच्छाईयों को पहचान नहीं पाए, किंतु अब स्थिति बदल रही है। लोग अपने पूर्वजों के धर्म और परम्पराओं को महत्व देने लगे हैं। वे अपने बच्चों के नामकरण से लेकर विवाह पद्धति तक में हिंदू संस्कारों का समावेश कर रहे हैं। घर की परम्पराओं को आदरपूर्वक अपनाया जा रहा है।

इस सम्पूर्ण प्रक्रिया का उद्देश्य है – एक सच्चरित्र, प्रामाणिक और संस्कारवान पीढ़ी का निर्माण करना। ऐसी पीढ़ी समाज का वातावरण सुधार कर घर और समाज में सुख शांति स्थापित कर सकती है। इसलिए, इन मूल्यों और संस्कारों को महत्व देने और उन्हें अपने जीवन में उतारने के प्रयास आज घर घर में होने लगा हैं। लोग अब ऐसे सभी मंचों और माध्यमों से जुड़ने के लिए प्रयत्नशील हैं जो इस दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी लोग इस दृष्टि से एक महत्वपूर्ण माध्यम मानते हैं और विश्वासपूर्वक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ने का उत्साह दिखा रहे हैं। जैसे जैसे हिंदुत्व पर विश्वास बढ़ रहा है, वैसे वैसे भारत के प्रति श्रद्धा और विश्वास, व्यापक और गहरा हो रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मानना है कि “वसुधैव कुटुंबकम्” के आदर्श पर चलकर भारत न केवल अपने समाज को सशक्त करेगा, बल्कि पूरी दुनिया को शांति, सद्भाव और सहयोग का संदेश देकर विश्वगुरु की भूमिका निभाएगा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा अपनी स्थापना के समय लिए गए संकल्पों को शीघ्र ही पूर्ण करने के उद्देश्य से अपने इस शताब्दी वर्ष में कुछ विशेष कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय समाज को अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति सजग करने, पर्यावरण के प्रति सचेत करने, नागरिकों में स्व के भाव को जगाने एवं स्वदेशी उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देने, कुटुम्ब प्रबोधन के माध्यम से पारिवारिक भावना जागृत करने एवं समाज में समरसता के भाव को सुदृद्ध करने के लिए गम्भीर प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2025 में विजयादशमी के पावन दिवस पर पूरे देश में संघ की समस्त शाखाओं (देश भर में संघ की 83,000 से अधिक शाखाएं चल रही हैं) के स्वयसेवकों द्वारा गणवेश में बस्ती स्तर पर, 2 अक्टोबर से 12 अक्टोबर 2025 की बीच, विशाल पथ संचालनों का आयोजन कर शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों का शुभारम्भ किया गया था। देश भर में आयोजित किए गए इन पथ संचलनों को समाज का भरपूर स्नेह प्राप्त हुआ था। दूसरे कार्यक्रम के रूप में संघ के स्वयसेवकों द्वारा अपनी बस्ती एवं मौहल्लों में हिंदू समाज के परिवारों के बीच, 15 नवम्बर से 30 नवम्बर 2025 की बीच, व्यापक गृह सम्पर्क अभियान को सफलता पूर्वक सम्पन्न किया गया है। अब तीसरे कार्यक्रम के रूप में पूरे देश में एक लाख से अधिक हिंदू सम्मेलनों का आयोजन, 20 दिसम्बर 2025 से 20 जनवरी 2026 के बीच, किया जा रहा है। हिंदू सम्मेलनों का आयोजन संघ द्वारा नहीं बल्कि सकल हिंदू समाज द्वारा बस्ती स्तर पर हो रहा है। अभी तक देश भर में सकल हिन्दू समाज द्वारा आयोजित किए गए हिंदू सम्मेलनों में भारतीय नागरिकों द्वारा भारी संख्या में भागीदारी देखने में आई हैं। विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में मंडल स्तर पर आयोजित किए जा रहे इन विराट हिंदू सम्मेलनों में ग्रामीण नागरिकों की भारी मात्रा में उत्साहपूर्वक भागीदारी दिखाई दी है।

उक्त हिन्दू सम्मेलनों में न केवल मातृशक्ति सहित सकल हिन्दू समाज की उत्साहपूर्वक भागीदारी हो रही है बल्कि साधु एवं सन्त महात्माओं द्वारा भी खुले हृदय से आशीर्वचन प्रदान किए जा रहे हैं। कुल मिलाकर इन हिन्दू सम्मेलनों की सकल हिन्दू समाज द्वारा भूरि भूरि प्रशंसा की जा रही है। इन सम्मेलनों का आयोजन दरअसल सकल हिन्दू समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा मिलकर किया जा रहा है जिससे समाज के समस्त अंगों में आपस में भाईचारा पुष्ट हो रहा है। छोटे छोटे आपसी मतभेद समाप्त हो रहे हैं एवं विशेष रूप से युवा नागरिकों को हिंदू सनातन संस्कृति के संस्कारों से अवगत होने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। इन हिन्दू सम्मेलनों के आयोजन का उद्देश्य भी सनातन संस्कृति, सनातन धर्म और सामाजिक एकता को सुदृढ़ करना है, जिसकी प्राप्ति होती हुई दिख रही है।

आज हिंदुत्व यदि सशक्त होता है तो यह न केवल भारत के लिए बल्कि पूरे विश्व के हित में होगा क्योंकि आज विश्व के विभिन्न देशों में फैली अशांति को दूर करने में केवल सनातन हिंदू संस्कृति ही सक्षम दिखाई दे रही है और इस विषय को विभिन्न देशों में फैले भारतीय मूल के नागरिकों के माध्यम से विकसित एवं अन्य देशों के नागरिक भलीभांति समझने लगे हैं क्योंकि इन देशों में निवासरत भारतीय मूल के नागरिक सनातन हिंदू संस्कृति के संस्कारों का अनुपालन करते हुए दिखाई देते हैं जिनमें “वसुधैव कुटुम्बकम” का भाव दिखाई देता है। इन देशों में समस्त भारतीय मूल के नागरिक शांतिपूर्वक अपना जीवन यापन करते हैं एवं वहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था में अपना सशक्त योगदान देते हुए दिखाई देते हैं। और फिर, भारत के भी आज विश्व के लगभग समस्त देशों के साथ दोस्ताना सम्बंध हैं, भारत ने कभी भी किसी देश की जमीन पर कब्जा करने के उद्देश्य से किसी देश के साथ युद्ध नहीं किया है। भारत सदैव से ही “जियो और जीने दो” के सिद्धांत का अनुपालन करता आया है। बल्कि, विश्व के अन्य देशों के नागरिक, जैसे, शक, हूण, कुषाण, पारसी, यहूदी, ईसाई एवं मुस्लिम भी भारत आकर आसानी से यहां रच बस गए हैं। आज पूरे विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जिसमें मुस्लिम समाज के समस्त फिर्के पाए जाते हैं।

संघ की दृष्टि बहुत स्पष्ट है कि सम्पूर्ण भारत की पहचान जिससे है, उस आध्यात्म आधारित एकात्म और सर्वांगीण जीवन दृष्टि को दुनिया हिंदुत्व अथवा हिंदू जीवन दृष्टि के नाते जानती है, उस हिंदुत्व को जगाकर सम्पूर्ण समाज को एक सूत्र में जोड़कर निर्दोष और गुणवान हिंदू समाज के संगठन का यह कार्य जो वर्ष 1925 में प्रारम्भ हुआ वह आज भी निरन्तर जारी है और आगे भी जारी रहे। सकल हिंदू समाज द्वारा आयोजित किए जा रहे हिन्दू सम्मेलन भी उक्त दृष्टि को ही साकार करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

सनातन संस्कृति, भारत एवं संघ के विरुद्ध गढ़े जा रहे हैं झूठे विमर्श

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ग्वालियर: भारत आज विश्व के आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक परिदृश्य को बदलने में अपनी प्रभावी भूमिका निभा रहा है। पश्चिमी देशों के वर्चस्व को पूर्वी देशों से चुनौती मिल रही है, जिसका नेतृत्व भारत करता हुआ दिखाई दे रहा है। इसलिए, अमेरिका के कुछ विघ्नसंतोषी संस्थानों सहित कुछ विकसित देश सनातन हिन्दू संस्कृति, भारत एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निराधार आरोप लगाकर झूठे विमर्श गढ़ने का लगातार प्रयास कर रहे हैं। दरअसल, पश्चिमी देशों की समस्या यह है कि वे केवल अपनी आधी अधूरी जानकारी को ही पूर्ण जानकारी मानते हुए अपने विचार तय करते हैं। जबकि, उनके विचार स्पष्टत: सत्यता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं। भारत पर आक्रांताओं एवं अंग्रेजो के शासनकाल में भी सनातन हिंदू संस्कृति एवं भारतीय संस्कारों पर जो विचार गढ़े गए थे, वे पूर्णत: गलत पाए गए थे। जैसे, सनातन संस्कृति के संस्कार रूढ़िवादी हैं एवं यह विज्ञान के धरातल पर खरे नहीं उतरते हैं, आदि, आदि। उनके द्वारा सनातन संस्कृति के बारे में गढ़े गए विचार पूर्णत: उनके आधे अधूरे ज्ञान पर ही आधारित थे। परंतु, आज सनातन हिंदू संस्कृति के संस्कार विज्ञान के धरातल पर खरे पाए जा रहे हैं। पश्चिमी देशों के तथाकथित विद्वानों में सनातन हिंदू संस्कृति, भारत एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में जानकारी का पूर्णत: अभाव है। अमेरिका से प्रकाशित न्यूयॉर्क टाइम्स नामक एक समाचार पत्र में हाल ही में प्रकाशित एक लेख में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में असत्य विचार प्रकट किए गए हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित यह आलेख न तो भारत के सामाजिक यथार्थ का परिपूर्ण चित्र प्रस्तुत करता है, न ही संघ की वैचारिक और संगठनात्मक वास्तविकता को। इस लेख में तथ्यों, आंकड़ों और स्वतंत्र स्रोतों का संतुलित उपयोग नहीं किया गया है और यह लेख पूर्णत: पूर्वाग्रहों पर आधारित दिखाई देता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास एवं संघ के स्वयंसेवकों द्वारा सम्पन्न किए गए अतुलनीय कार्यों के बारे में इन महानुभावों को कोई जानकारी ही नहीं है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में हुई थी और इसके साथ ही संघ ने देश के विभिन्न नगरों एवं ग्रामों में शाखाओं की स्थापना करते हुए भारत के युवाओं में राष्ट्रीयता के भाव को जागृत करना प्रारम्भ कर दिया था। वर्ष 1947 आते आते तो भारत में संघ के स्वयसेवकों की एक बड़ी फौज खड़ी हो चुकी थी। वर्ष 1947 में जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा को पार करने की कोशिश की थी तब संघ के स्वयसेवकों ने कश्मीर की सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर बिना किसी प्रशिक्षण के लगातार नजर बनाए रखी थी और तब पाकिस्तानी सेना को रोकने हेतु भारतीय सेना के जवानों के साथ संघ के कई स्वयसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दी थी। साथ ही, भारत में विभाजन के समय दंगे भड़कने के दौरान पाकिस्तान से जान बचाकर आए हिंदू शरणार्थियों की सहायता के लिए संघ के स्वयसेवकों ने 3,000 से अधिक राहत शिविर भारत में लगाए थे।

कश्मीर के भारत में विलय के समय पाकिस्तान की सेना कबाईलियों के भेष में भारत की सीमा में घुस रही थी, ऐसे में तात्कालीन केंद्र सरकार यह फैसला नहीं ले पा रही थी कि इन परिस्थितियों के बीच क्या किया जाय क्योंकि उस समय कश्मीर के महाराजा श्री हरी सिंह जी भारत में कश्मीर के विलय सम्बंधी प्रस्ताव पर अपने हस्ताक्षर नहीं कर पाए थे। इन विकट परिस्थितियों के बीच सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री गुरु गोलवलकर जी से मदद मांगी और उन्हें कश्मीर में महाराजा श्री हरी सिंह जी से मिलने भेजा। श्री गुरु जी तुरंत कश्मीर गए एवं महाराजा श्री हरी सिंह जी को समझाया और कश्मीर के भारत में विलय सम्बंधी प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करा लिए और उसे दिल्ली भेज दिया। इस प्रकार उन्होंने पाकिस्तानी सेना के पूरे कश्मीर पर कब्जे को विफल करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान किया।

दादरा, नगर हवेली और गोवा को मुक्त कराते हुए भारत में विलय में भी संघ के स्वयसेवकों की प्रमुख भूमिका रही थी। 21 जुलाई 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया था, 28 जुलाई 1954 को नरोली और फिपारिया को मुक्त कराया गया और फिर राजधानी सिलवासा को मुक्त कराया गया था। संघ के स्वयसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुर्तगाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया था एवं दादरा नगर हवेली को पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त कराकर भारत सरकार को सौंप दिया था।

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु ने गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से साफ इंकार कर दिया था अतः वर्ष 1955 में संघ के स्वयंसेवकों ने श्री जगन्नाथ राव जोशी जी के नेतृत्व में गोवा पहुंच कर गोवा मुक्ति आंदोलन प्रारम्भ किया, जिसके परिणामस्वरूप जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कई कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाई गई। हालत बिगड़ते देख अंततः भारतीय सैनिकों ने हस्तक्षेप किया और वर्ष 1961 में गोवा को आजादी प्राप्त हुई।

इसी प्रकार वर्ष 1962 में भी चीन के साथ भारत के युद्ध के समय संघ के स्वयसेवकों ने भारतीय सेना की भरपूर मदद की थी। संघ के स्वयंसेवक पूरे उत्साह के साथ सेना की मदद के लिए सीमा पर पहुंचे थे। स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी थी। सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद और ययां तक कि शहीदों के परिवारों की चिंता भी संघ के स्वयसेवकों ने की थी। संघ के इस महान योगदान को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु ने भी पहचाना था और 26 जनवरी 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में संघ के स्वयंसेवकों को शामिल होने का निमंत्रण दिया था। गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने के लिए महीनों की तैयारी की जाती है परंतु केवल 2 दिन पहिले मिले निमंत्रण पर संघ के 3,500 स्वयंसेवक गणवेश में गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल हुए थे।

वर्ष 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री को भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सहायता की आवश्यकता पड़ी थी। आपने देश में कानून व्यवस्था की स्थिति को सम्भालने और विशेष रूप से दिल्ली की यातायात व्यवस्था पर नियंत्रण स्थापित करने हेतु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अनुरोध किया था ताकि इन कार्यों में व्यस्त पुलिसकर्मियों का भारतीय सेना की मदद में उपयोग किया जा सके। युद्ध के इस कठिन समय में घायल जवानों को सबसे पहिले रक्तदान देने में भी संघ के स्वयंसेवक ही सबसे आगे रहे थे। युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ हटाने का कार्य भी संघ के स्वयसेवकों द्वारा ही सम्पन्न किया गया था।

भारत में शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने हेतु विद्या भारती, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, वनवासी कल्याण आश्रम, स्वदेशी जागरण मंच, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे संगठनों की स्थापना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने की। यह समस्त संगठन आज शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय कार्य करते हुए भारतीय संस्कृति के संस्कारों को भारतीय युवाओं के बीच ले जाने का कार्य सफलतापूर्वक कर रहे हैं। 1952 में गोरखपुर में प्रारंभ हुए प्रथम विद्यालय के साथ विद्या भारती वर्तमान में 12,830 औपचारिक विद्यालय तथा 11,350 अनौपचारिक केंद्र के साथ कुल 24,180 प्राथमिक, माध्यमिक, वरिष्ठ माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा स्तर पर संचालित करती है जिनमें अध्ययनरत छात्रों की संख्या लगभग 34,48,000 तथा शिक्षकों की संख्या 150,000 है।

वर्ष 1955 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा भारतीय मजदूर संघ की स्थापना की गई थी। भारतीय मज़दूर संघ विश्व का पहिला ऐसा मजदूर आंदोलन था, जिसने विध्वंस के स्थान पर निर्माण की धारणा की नीति अपनाई थी। विनिर्माण इकाईयों में विश्वकर्मा जयंती का चलन भारतीय मजदूर संघ ने ही प्रारम्भ किया था। आज भारतीय मजदूर संघ विश्व का सबसे बड़ा, शांतिपूर्ण और रचनात्मक मजदूर संगठन बन गया है।

सेवा भारती, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा चालित एक प्रकल्प है। यह मुख्यत: वनवासी क्षेत्रों में कार्य करता है। इसके मुख्य कार्य हैं – शिक्षा, संस्कार, सामाजिक जागरूकता, स्वरोजगार, धर्म-परिवर्तन से वनवासियों की रक्षा, आदि। सेवा भारती, भारत के दूरदराज और दुर्गम क्षेत्रों में 2 लाख से अधिक सेवा कार्य कर रहा है। लगभग 35,000 एकल विद्यालयों में 10 लाख से अधिक छात्र अपना जीवन संवार रहे हैं। सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद में अनाथ हुए 57 बच्चों के गोद लिया है जिनमें 38 मुस्लिम एवं 19 हिंदू बच्चे शामिल हैं।

वर्ष 1971 में ओड़िसा में आए भयंकर चक्रवात, वर्ष 1977 में आंध्रप्रदेश में आए चक्रवात, भोपाल गैस त्रासदी के दौरान, वर्ष 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों, वर्ष 2001 में गुजरात में आए भूकम्प, उत्तराखंड में आई भयंकर बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा में संघ के स्वयसेवकों ने राहत और बचाव कार्यों में हमेशा आगे रहकर भागीदारी की है।

महात्मा गांधी ने वर्ष 1934 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक शिविर की यात्रा के दौरान वहां पूर्ण अनुशासन देखा और छुआछूत की अनुपस्थिति पायी। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से पूछताछ की और जाना कि वहां लोग एक साथ रह रहे हैं तथा एक साथ भोजन कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में इसी प्रकार के विचार बाबा साहेब अम्बेडकर के भी थे।

भारतीय सनातन हिन्दू संस्कृति, भारत एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में हमें अपनी जानकारी को सुदृद्ध करना चाहिए, इसके बाद ही हम उक्त के बारे में गढ़े जा रहे झूठे विमर्श को ध्वस्त करने में सफल हो सकेंगे।

बाथटब बनाम बाल्टी: भारत की तरक़्क़ी में छुपा सोच का फासला

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बृज खंडेलवाल

आगरा : दोपहर की तपती धूप। सड़क किनारे सरकारी पंप। फटे-कपड़ों में एक आदमी, जिसे देखने वाले ‘भिखारी टाइप’ कह सकते हैं, महीनों बाद पानी से बदन भिगो रहा है। तभी एक चमचमाती कार रुकती है। भीतर से उतरी एक संभ्रांत महिला नाक सिकोड़कर कहती है: “देखो, कितना पानी बेकार बहा रहा है!”

नहाने वाला चुप नहीं रहता। गुर्राकर जवाब देता है, “मैडम, आपके बाथटब से कम ही खर्च कर रहा हूँ।”

बस, यही एक पल भारत की असली कहानी कह देता है, फासला संसाधनों का नहीं, सोच का।

यही फासला आज विकास की बहस में भी झलकता है। क्या भारत से यह कहा जा रहा है कि वह साफ़ हवा और करोड़ों लोगों को भूख से आज़ादी, इन दोनों में से किसी एक को चुने? यही डर की कहानी है, जो ज़ोर-शोर से फैलाई जा रही है। हर फ्लाइओवर तबाही की निशानी बना दिया जाता है, हर फैक्ट्री की चिमनी को क़यामत का ऐलान। मानो तरक़्क़ी कोई गुनाह हो।

ज़रा ठहरकर देखिए। भारत की शहरी गाड़ी तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रही है, थोड़ी शोरगुल वाली, थोड़ी बेतरतीब, मगर रुकने वाली नहीं। जहाँ कभी खेत थे, वहाँ इमारतें हैं। सड़कें दूर-दराज़ इलाक़ों को बाज़ार और मौक़ों से जोड़ रही हैं। शहर फैल रहे हैं, भीड़भाड़ वाले, अव्यवस्थित, मगर ज़िंदा।
हाँ, शहरों की हवा भारी है। नदियाँ बीमार हैं। कूड़ा बढ़ रहा है। लेकिन इसे तरक़्क़ी बनाम तबाही की बहस बना देना बौद्धिक बेईमानी है। यह क़यामत नहीं, यह बदलाव का दौर है।

आर्थिक विकास ने आख़िरकार वही करना शुरू किया है, जिसका उससे वादा था, ग़रीबी को पीछे धकेलना। कारख़ाने चल रहे हैं, बंदरगाहों पर रौनक़ है, रोज़गार पैदा हो रहा है। करोड़ों लोग, जो दशकों तक हाशिए पर थे, अब मुख्यधारा का दरवाज़ा खटखटा रहे हैं। उन्हें घर चाहिए, सड़कें चाहिए, स्कूल और अस्पताल चाहिए, सफ़र की सहूलियत चाहिए, और सबसे ज़रूरी, इज़्ज़त।

क्या उनसे कहा जाए कि “पहले हवा पूरी तरह साफ़ हो जाए, तब तक इंतज़ार करो”?
शहरीकरण कोई साज़िश नहीं, एक नतीजा है। गाँव खाली हो रहे हैं क्योंकि शहर बुला रहे हैं। ट्रेनें तेज़ हैं, हवाई जहाज़ सस्ते हैं, मोबाइल हाथ में है। आज एक घरेलू कामगार का बेटा दिवाली पर हवाई जहाज़ से घर आता है। किसान की बेटी दूसरे राज्य में पढ़ती है। यही समावेशन है, थोड़ा अव्यवस्थित, थोड़ा शोरगुल वाला, मगर ज़रूरी।

और यही बात कुछ ख़ास तबक़ों को बेचैन करती है।
“पर्यावरण संकट” का सबसे ऊँचा शोर अक्सर उन्हीं लोगों से आता है, जिनकी तरक़्क़ी उस दौर में हुई जब मुक़ाबला कम था। असली परेशानी हवा या पेड़ों से नहीं, हिस्सेदारी से है। जब आम लोग बराबरी माँगते हैं, तो ख़ास सुविधाएँ सिकुड़ने लगती हैं। सड़कें भर जाती हैं, हवाई अड्डे भीड़ से गूँज उठते हैं, मोहल्ले बदल जाते हैं , तभी तरक़्क़ी अचानक “ख़तरनाक” कहलाने लगती है।

खनन, ड्रेजिंग, इंफ़्रास्ट्रक्चर, सबको दुश्मन बना दिया जाता है। यह भुला दिया जाता है कि बिना कच्चे माल के उद्योग नहीं, बिना उद्योग के रोज़गार नहीं, और बिना रोज़गार के कल्याण भीख बन जाता है, सशक्तिकरण नहीं। विडंबना यह कि सामाजिक न्याय की बातें करने वाले लोग उसी प्रक्रिया का विरोध करते हैं, जो उसे संभव बनाती है।

हाँ, प्रदूषण है। झुग्गियाँ हैं। कचरा है। मगर भूख भी है, बेरोज़गारी भी है, और दशकों की उपेक्षा का दर्द भी। लोकतंत्र में समस्याएँ पैकेज में आती हैं। हल पीछे हटना नहीं, बल्कि समझदारी से आगे बढ़ना है।

डर और अतिशयोक्ति पर ज़िंदा रहने वाली विकास-विरोधी लॉबी हर चीज़ में प्रलय देखती है। एक पेड़ कटा नहीं कि सभ्यता ख़त्म। एक सड़क बनी नहीं कि “जन-विरोधी” का तमगा। मोमबत्ती जुलूस तस्वीरें देते हैं, समाधान नहीं। नदियाँ भाषणों से साफ़ नहीं होतीं, विज्ञान से होती हैं। धुआँ नारों से कम नहीं होता, तकनीक से होता है।

और तकनीक रास्ता दिखा रही है—स्वच्छ ईंधन, इलेक्ट्रिक वाहन, कचरे से ऊर्जा, स्मार्ट योजना। ये सपने नहीं, औज़ार हैं। भारत के पास लोग हैं, दिमाग़ हैं, अब संसाधन भी हैं। जिसकी ज़रूरत नहीं, वह है डर के कारण ठहर जाना।

बदलाव में तकलीफ़ होती है। हालात बेहतर होने से पहले बिगड़ते हैं। शहर चरमराते हैं। मगर अब रुक जाना निर्दयता होगी। जो लोग देर से आगे आए हैं, उनसे यह कहना कि “अभी नहीं”, यह ज़ुल्म है।

सड़क किनारे नहाता वह आदमी और बाथटब में डूबा आराम, यही भारत की असली बहस है। सवाल विकास का नहीं, सोच के फासले का है। रास्ता साफ़ है, बदलाव को अपनाइए, उसे बेहतर बनाइए, मगर उसकी राह मत रोकिए। भारत आगे बढ़ रहा है, सारी मुश्किलों के साथ। और इस बार, हर कोई इसमें शामिल होना चाहता है।

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