सफलता की दौड़ में कहीं रिश्ते तो नहीं हार रहे

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– पंकज शर्मा
दिल्ली। समाज को झकझोर देने वाली कुछ घटनाएँ केवल समाचार नहीं होतीं, वे समय का नैतिक आईना बन जाती हैं। हरियाणा के सोनीपत से हाल में सामने आई एक घटना ने लाखों लोगों को भीतर तक विचलित किया। समाचारों के अनुसार एक वृद्ध पिता अपने जीवन के अंतिम दिनों तक अपनी बेटियों के एक फोन का इंतज़ार करते रहे। उनके निधन के बाद भी परिस्थितियाँ ऐसी रहीं कि अंतिम विदाई में उनकी बेटियाँ उपस्थित नहीं हो सकीं। इस घटना के सभी व्यक्तिगत पक्ष और परिस्थितियाँ सार्वजनिक रूप से पूरी तरह ज्ञात नहीं हैं। इसलिए किसी परिवार पर निर्णय देना न उचित है और न मानवीय। किंतु यह घटना एक ऐसे प्रश्न को हमारे सामने अवश्य रखती हैए जिससे बचना अब संभव नहीं- क्या हम आने वाली पीढ़ी को केवल सफल बना रहे हैं, या संवेदनशील भी?
आज हर माता-पिता का सपना है कि उनका बच्चा अच्छी शिक्षा पाए, ऊँचा पद हासिल करे, आर्थिक रूप से सक्षम बने और दुनिया में अपना नाम कमाए। इस सपने में कोई बुराई नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब सफलता की इस परिभाषा से संवेदनाएँ, कृतज्ञता और पारिवारिक उत्तरदायित्व धीरे.धीरे गायब होने लगते हैं। हम बच्चों को अंग्रेज़ी बोलना सिखाते हैं, लेकिन क्या उन्हें यह भी सिखाते हैं कि वृद्ध माता-पिता से रोज़ दो मिनट बात करना भी एक संस्कार है? हम उन्हें करियर बनाना सिखाते हैं, लेकिन क्या यह भी बताते हैं कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल ऊँचा वेतन नहीं, बल्कि अपने रिश्तों को सम्मानपूर्वक निभाना भी है, हम उन्हें दुनिया जीतने की प्रेरणा देते हैं, पर क्या यह याद दिलाते हैं कि जिस हाथ ने उन्हें चलना सिखाया उसे बुढ़ापे में सहारा देना भी जीवन का कर्तव्य है, यही वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर हमारा समाज तलाश रहा है।

आज शिक्षा का अर्थ अक्सर अंक, डिग्री और नौकरी तक सीमित होकर रह गया है। नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम में तो दिखाई देती है, लेकिन व्यवहार में कम होती जा रही है। हमारा संविधान हमें अधिकार देता है, हमारा समाज हमें अवसर देता है, लेकिन हमारे संस्कार हमें कर्तव्य सिखाते हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने पेशे में अत्यंत सफल है, लेकिन अपने माता-पिता के प्रति संवेदनशील नहीं रह पाता, तो क्या उसकी सफलता पूर्ण कही जा सकती है?

संयुक्त परिवार अब छोटे परिवारों में बदल रहे हैं। करियर के कारण बच्चे देश.विदेश में रहते हैं। यह
परिवर्तन स्वाभाविक है और आधुनिक जीवन की आवश्यकता भी। लेकिन भौगोलिक दूरी और भावनात्मक दूरी एक जैसी नहीं होती। आज वीडियो कॉल, मोबाइल और इंटरनेट ने संवाद को पहले से कहीं अधिक आसान बना दिया है। फिर भी अनेक बुज़ुर्ग पूरे दिन केवल एक फोन कॉल का इंतज़ार करते रहते हैं। उनकी सबसे बड़ी ज़रूरत महँगे उपहार नहीं, बल्कि यह एहसास है कि वे आज भी अपने बच्चों के जीवन में महत्वपूर्ण हैं।
यदि घर में बच्चे अपने माता-पिता को दादा-दादी का सम्मान करते, उनकी देखभाल करते और उनके साथ समय बिताते हुए देखेंगे तो यही उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बनेगा। लेकिन यदि वे यह देखेंगे कि बुज़ुर्ग केवल ज़िम्मेदारी हैं, सुविधा के अनुसार मिलने वाले रिश्ते हैं, तो वे भी अनजाने में वही सीखेंगे। समाज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हर पीढ़ी अगली पीढ़ी के व्यवहार की शिकायत करती है, जबकि उसका अधिकांश आधार पिछली पीढ़ी ही तैयार करती है।
बुज़ुर्गों की सुरक्षा के लिए कानून आवश्यक हैं, लेकिन कानून अपनापन नहीं दे सकते। समाधान परिवारों के भीतर शुरू होगा। प्रतिदिन माता.पिता से बातचीत, बच्चों को दादा-दादी के साथ समय बिताने के अवसर, परिवार में बुज़ुर्गों के अनुभवों को सम्मान, विद्यालयों में नैतिक शिक्षा को केवल परीक्षा का विषय नहीं, जीवन कौशल बनाया जाए, सफलता की परिभाषा में संवेदनशीलता और पारिवारिक उत्तरदायित्व को भी स्थान दिया जाए, तो शायद आने वाली पीढ़ी अधिक सफल होने के साथ-साथ अधिक मानवीय भी होगी।
हर माता-पिता अपने बच्चों से संपत्ति नहीं चाहते। वे चाहते हैं समय, वे चाहते हैं अपनापन, वे चाहते हैं यह विश्वास कि जिन बच्चों के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित किया वे उन्हें कभी अकेला महसूस नहीं होने देंगे।
किसी समाज की पहचान उसकी ऊँची इमारतों, तेज़ अर्थव्यवस्था या आधुनिक तकनीक से नहीं होती।
उसकी पहचान इस बात से होती है कि वह कमजोर, निर्भर और वृद्ध लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है? आज आवश्यकता केवल आर्थिक रूप से विकसित भारत की नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से भी समृद्ध भारत की है। यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे भविष्य में हमारा सम्मान करें, तो हमें आज उन्हें सम्मान का अर्थ सिखाना होगा। क्योंकि विरासत केवल संपत्ति की नहीं, संस्कारों की भी होती है, और इतिहास गवाह है,- जिस समाज में संस्कार कमजोर पड़ते हैं, वहाँ रिश्ते धीरे-धीरे औपचारिकता बन जाते हैं।
आइए, अपने बच्चों को केवल सफल नहीं, संवेदनशील भी बनाएं। यही भारतीयता है, यही संस्कृति है, और शायद यही हमारे समय की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।

नशे के विरुद्ध एक अभियान

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दिल्ली । देश को नक्सलवाद- माओवाद के आतंक से मुक्ति दिलाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने दो नये अहम अभियान प्रारंभ किये हैं -पहला, भारत को घुसपैठियों से मुक्त करना तथा दूसरा है, युवाओं को नशे की लत से मुक्ति दिलाना । भारत के किशोरों तथा युवाओं को हर प्रकार के नशे से मुक्ति दिलाने के लिए 2 अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री मोदी ने “नशा मुक्त युवा, विकसित भारत संकल्प अभियान“ का प्रारंभ करते हुए एक वीडियो संदेश जारी किया है।अपने सन्देश में प्रधानमंत्री मोदी ने कहाकि जो युवा नशे से लड़कर बाहर निकलते हैं वे कमजोर नहीं, बल्कि असली योद्धा होते हैं। समाज को उनका सम्मान करना चाहिए।
प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि भारत में ड्रग्स की सप्लाई दुश्मन देशों की आतंकी साजिश का ही एक हिस्सा है। दुश्मन देश भारतीय युवाओं को नशे के जाल में धकेलना चाहते हैं ताकि भारत कभी भी एक सशक्त एवं विकसित देश के रूप में स्थापित न हो सके। इस साजिश को हम सबको मिलकर नाकाम करना होगा। विकसित भारत का लक्ष्य तभी पूरा होगा जब देश का युवा शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होने के साथ ही नशे से भी दूर रहेगा। अगले 100 सप्ताह तक हर रविवार को कला, संस्कृति, खेल और अन्य गतिविधियों के माध्यम से नशामुक्ति का संदेश देश भर में पहुंचाया जाएगा। नशे की लत युवाओं के सपनों और परिवार दोनों को ही तोड़ देती है। नशा केवल व्यक्ति या परिवार को ही नहीं बल्कि राष्ट्र की ताकत को भी कमजोर करता है।
इस अभियान का उद्देश्य युवाओं को नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित करना और उन्हें अपने समाज में बदलाव लाने के लिए आगे बढ़ाना है। प्रत्येक रविवार को देशभर में अलग – अलग कार्यक्रम होंगे जिसमें वॉकाथन और दौड़, खेल प्रतियोगिताएं,योग और ध्यान सत्र, सांस्कृतिक कार्यक्रम, नुक्कड़ नाटक, नशा विरोधी जागरूकता अभियान, चर्चा और संवाद कार्यक्रम, पेंटिग्स व आर्ट्स प्रतियोगिताएं तथा सामुदायिक सहभागिता कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे। यह अभियन 125 से अधिक आध्यात्मिक,सामाजिक तथा सरकारी संगठनों के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। ब्रहमकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, आर्ट ऑफ़ लिविंग, गायत्री परिवार, इस्कॉन से लेकर माताअमृतानंदमयी मठ जैसे संगठन इस अभियान से जुड़ कर कार्य कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वैचारिक संगठन विश्व हिंदू परिषद पहले से ही व्यापक स्तर पर नशामुक्ति अभियान चला रहा है।
युवाओं में नशे के विरुद्ध जागरूकता लाने के साथ ही गृहमंत्री अमित शाह ने भी नशे की जड़ों पर प्रहार करने का युद्ध छेड़ रखा हैं । ड्रग्स माफियाओं पर कार्रवाई कई गुना बढ़ गई है। तस्करी करके बड़ी मात्रा में विदेशों से आने वाली ड्रग्स की जब्ती बंदरगाहों तथा एयरपोर्ट्स की जा रही है और उसे नष्ट किया जा रहा है। वर्ष 2021 में 2988 किलो हेरेाइन, 2022 में 927 किलो गांजा, 2023 में 122 किलो मेफेड्रोन, 2024 में 770 किलो मेथाफाटेमाइन और 2026 में फिर 522 किलो गांजा बरामद किया जा चुका है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के अनुसार 2020 से मई 2025 तक तक 116 बड़े मामलों में कार्रवाई करते हुए 1,09,318किलोग्राम नशीले पदार्थ जब्त किए गए हैं और उनको नष्ट किया गया है।
वर्तामन समय में नशे का सबसे बड़ा केन्द्र पंजाब तथा पूर्वोत्तर के कई छोटे राज्य हैं। विदेशी आतंकी संगठनों द्वारा जम्मू -कश्मीर व पूर्वोत्तर के युवाओं को नशे की लत में धकेलने का प्रयास लगातार किया जा रहा है हैं। अपने कुत्सित प्रयासों को सफल बनाने के लिये ये लोग स्थानीय स्तर के अपराधियों व बिगडैल युवाओं का सहारा लेते हैं । पंजाब -हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब में नशे के संकट पर चिंता जताते हुए कहा था कि नशा राज्य के अस्तित्व पर खतरा बन सकता है।संगठित गिरोहों की जांच में पुलिस प्रशासन के साथ ही अदालत को भी सतर्क रहना होगा।
भारत में ड्रग्स की खेप कई रास्तों से आती है। बांग्लादेश -पाकिस्तान तथा नेपाल सीमा से ड्रग्स आसानी से आ-जा रहा है। गुजरात के समुद्री तट से भी नशे का कारोबार कंटेनर और समुद्री मार्ग से चलता आ रहा है हालांकि, सरकार के प्रयासों से कुछ रोकथाम हुई है किंतु खतरा बरकरार है। म्यामांर से भी ड्रग्स की तस्करी हो रही है। यही नहीं छोटे -छोटे देश मलेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, मालदीव, हांगकांग सहित तमाम देशों से ड्रग्स की सप्लाई अनेक प्रकार से हो रही है।पाक परस्त आतंकी संगठन ड्रोन आदि के माध्यम से सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रग्स, हथियार व धन को गिराते रहते हैं। इस प्रकार नशे की सप्लाई अनेक तरीकों से होती है और उन्हें भारत के किशोरों तथा युवाओं तक विभिन्न तरीकों से पहुंचाया जाता है।वर्ष 2025 में एम्स के सर्वे में पाया गया कि 11 से 14 वर्ष की उम्र में ही किशोर नशीले पदार्थों के संपर्क मे आ गए थे।
इन विषम परिस्थितियों को देखते हुए यह वृहद अभियान प्रारंभ किया गया है।नशे से आतंकवाद को पनपने में बहुत मदद मिलाती है इसलिए, यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के बाद 28 हजार से अधिक स्थानों पर एक करोड़ से अधिक युवाओं ने भाग लिया और एक साथ नशा मुक्त भारत की शपथ ली। नशामुक्ति का यह अभियान राजनीति से दूर रहकर चलना चाहिए तभी भारत के किशोर, युवा और परिवार तथा बहन -बेटियां सुरक्षित जीवन जी सकेंगी और वर्ष -2047 तक भारत विकसित भारत बनकर उभर सकेगा।

राष्ट्रधर्म सबको पढ़ना चाहिए: स्वतन्त्र देव सिंह

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लखनऊ। राष्ट्रधर्म मासिक पत्रिका के अगस्त माह के अंक का विमोचन प्रदेश के जल शक्ति मंत्री श्री स्वतन्त्र देव सिंह ने राष्ट्रधर्म कार्यालय में किया। श्री स्वतन्त्र देव सिंह ने इस अवसर पर पंडित दीनदयाल का स्मरण करते हुए कहा कि राष्ट्रधर्म पत्रिका सबको पढ़ना चाहिए। इस पत्रिका के लिए श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी, नानाजी देशमुख, भाऊराव देवरस, रज्जू भैया जैसी विभूतियों ने अपना सक्रिय सहयोग दिया है। अच्छी बात यह है कि इसमें विचार तो है ही, परिवार के सभी सदस्यों के लिए कुछ न कुछ पढ़ने के लिए अवश्य है।

जल शक्ति मंत्री ने कहा कि प्रदेश सरकार इस बात के लिए सतत प्रयत्नशील है कि हर व्यक्ति तक स्वच्छ जल पहुँचे। उन्होंने कहा कि श्रद्धेय अटल जी ने कहा था कि जल के लिए युद्ध होगा किन्तु भारत इस समया से बचा रहेगा।
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रधर्म का नवम्बर अंक ‘जल है तो कल है’ विशेषांक होगा।
इसके पूर्व जल शक्ति मंत्री का स्वागत राष्ट्रधर्म के निदेशक अभिनव भार्गव ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. ओमप्रकाश ने किया। राष्ट्रधर्म के प्रभारी निदेशक सर्वेश चन्द्र द्विवेदी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की।

गेटकीपर्स का दौर खत्म: सेल्फ पब्लिशिंग ने बदल दी किताबों की दुनिया

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मुंबई। सन् 1455 में जब योहानेस गुटेनबर्ग ने चल अक्षरों वाली मुद्रण मशीन का आविष्कार किया, तब शायद उन्हें भी अंदाज़ा नहीं था कि एक दिन किताबें छापना इतना आसान हो जाएगा कि हर लेखक अपना स्वयं का प्रकाशक बन सकेगा। गुटेनबर्ग के छापाखाने ने ज्ञान को राजमहलों और मठों की दीवारों से निकालकर आम लोगों तक पहुँचाया। अब, लगभग साढ़े पाँच सौ वर्ष बाद, सेल्फ पब्लिशिंग उसी क्रांति को एक नए मुकाम पर ले गई है।
आज हर तरफ सेल्फ पब्लिशिंग कंपनियों की भरमार है। सोशल मीडिया, गूगल और यूट्यूब पर हर रोज़ दर्जनों विज्ञापन दिखते हैं: “अपनी किताब छपवाइए”, “बेस्टसेलर लेखक बनिए”, “सिर्फ कुछ दिनों में अपनी पुस्तक प्रकाशित कराइए।” ये कंपनियाँ पांडुलिपि तैयार करने, संपादन, कवर डिज़ाइन, ISBN, ई-बुक, प्रिंटिंग, अमेज़न लिस्टिंग और प्रचार तक की सारी सुविधाएँ एक ही छत के नीचे उपलब्ध करा रही हैं। पैकेज लगभग ₹2,999 से शुरू होकर ₹50,000 या उससे अधिक तक जाते हैं। इतनी किफ़ायती और आसान प्रक्रिया देखकर कोई भी व्यक्ति सोच सकता है—“क्यों न मैं भी अपनी किताब प्रकाशित करूँ?”
एक समय था जब किताब लिखना ही काफ़ी नहीं था। असली परीक्षा किसी प्रकाशक को यह विश्वास दिलाना होता था कि आपकी पांडुलिपि छपने लायक है। लेखक वर्षों तक शोध करते, लिखते, बार-बार संशोधन करते और फिर भी अक्सर उनके हिस्से में केवल अस्वीकृति या खामोशी आती थी। न जाने कितनी उत्कृष्ट रचनाएँ पाठकों तक पहुँचने से पहले ही प्रकाशकों की मेज़ पर दम तोड़ देती थीं। पारंपरिक प्रकाशन ने साहित्य को बहुत कुछ दिया है; बड़े-बड़े लेखकों को पहचान मिली और अनगिनत कालजयी रचनाएँ दुनिया तक पहुँचीं। लेकिन यह भी सच है कि प्रकाशकों ने लंबे समय तक साहित्य के “दरबान” की भूमिका निभाई। वही तय करते थे कि किस लेखक की आवाज़ लोगों तक पहुँचेगी और किसकी नहीं।
सोचिए, अगर किसी ज़माने में शेक्सपियर, कालिदास, प्रेमचंद या एमिली डिकिंसन जैसे रचनाकारों की पांडुलिपियाँ किसी प्रकाशक की मेज़ पर ही ठुकरा दी जातीं, तो दुनिया कितना बड़ा साहित्यिक खज़ाना खो देती। शायद ऐसे न जाने कितने प्रतिभाशाली लेखक इतिहास के अंधेरे में गुम हो गए, जिनकी रचनाएँ कभी छप ही नहीं सकीं।
लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।
डिजिटल तकनीक, सस्ती प्रिंटिंग, प्रिंट-ऑन-डिमांड, ई-बुक्स और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म ने प्रकाशन की दुनिया में एक नई इंकलाबी हवा चला दी है। अब किसी लेखक को अपनी बात दुनिया तक पहुँचाने के लिए किसी प्रकाशक की इजाज़त का इंतज़ार नहीं करना पड़ता। वह अपनी किताब खुद प्रकाशित कर सकता है, उसकी कीमत तय कर सकता है, डिज़ाइन चुन सकता है और सीधे पाठकों तक पहुँच सकता है। साहित्य पर कुछ गिने-चुने लोगों का एकाधिकार अब टूट रहा है।
आंकड़े भी इसी बदलाव की गवाही देते हैं। अमेरिका में 2025 के दौरान चार मिलियन से अधिक किताबें प्रकाशित हुईं। इनमें लगभग साढ़े तीन मिलियन किताबें सेल्फ पब्लिशिंग के ज़रिए आईं। पारंपरिक प्रकाशकों की तुलना में अब स्वतंत्र रूप से प्रकाशित किताबों की संख्या पाँच गुना से भी ज़्यादा हो चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में जहाँ पारंपरिक प्रकाशन की रफ़्तार बेहद धीमी रही, वहीं सेल्फ पब्लिशिंग तेज़ी से आगे बढ़ी है।
पिछले कुछ महीनों में मेरी मुलाकात एक दर्जन से अधिक ऐसे लेखकों से हुई जिन्होंने अपनी किताबें स्वयं प्रकाशित कीं। उन्होंने मुझे अपने हस्ताक्षर वाली प्रतियाँ बड़े गर्व से भेंट कीं। उनके चेहरे पर आत्मविश्वास साफ़ झलक रहा था। वे किसी प्रकाशक की मंज़ूरी के मोहताज नहीं थे। उन्होंने अपनी रचनात्मक तकदीर खुद अपने हाथों में ले ली थी।
आज सेल्फ पब्लिशिंग केवल एक विकल्प नहीं रही, बल्कि हज़ारों लेखकों की पहली पसंद बनती जा रही है। अमेज़न किंडल डायरेक्ट पब्लिशिंग (KDP), अमेज़न, कोबो और गूगल प्ले बुक्स जैसे प्लेटफ़ॉर्म ने पूरी दुनिया को एक खुला बाज़ार बना दिया है। अब आगरा, मैसूर या कोच्चि में बैठा कोई लेखक अपनी किताब अपलोड करता है और कुछ ही मिनटों में न्यूयॉर्क, लंदन या सिडनी का पाठक उसे खरीद सकता है।
प्रिंट-ऑन-डिमांड तकनीक ने प्रकाशन का खर्च भी काफी कम कर दिया है। अब हज़ारों प्रतियाँ पहले से छापकर गोदाम भरने की ज़रूरत नहीं पड़ती। जब कोई पाठक ऑर्डर देता है, तभी उसकी प्रति छपती है। इससे आर्थिक जोखिम लगभग खत्म हो जाता है।
किताबों के प्रचार का तरीका भी पूरी तरह बदल गया है। पहले लेखक अपने प्रकाशक की मेहरबानी पर निर्भर रहते थे। आज सोशल मीडिया हर लेखक का अपना मंच बन चुका है। किसी किताब की अच्छी समीक्षा, एक पॉडकास्ट, यूट्यूब इंटरव्यू, इंस्टाग्राम रील या वायरल पोस्ट रातों-रात हज़ारों पाठकों तक पहुँच सकती है। मुँहज़बानी प्रचार अब एक क्लिक की रफ़्तार से पूरी दुनिया में फैल जाता है।
इस पूरी क्रांति में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) ने भी नई जान फूँक दी है। AI लेखक की जगह नहीं लेता, बल्कि उसका मददगार बन गया है। शोध, विचारों की रूपरेखा, भाषा सुधार, संपादन, प्रूफ़रीडिंग, किताब की सज्जा, कवर डिज़ाइन, चित्र, अनुवाद और प्रचार सामग्री तैयार करने जैसे कई काम AI कुछ ही मिनटों में आसान कर देता है। इससे समय और खर्च दोनों बचते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि नए लेखक अब तकनीकी झंझटों से डरते नहीं और आत्मविश्वास के साथ अपनी किताब प्रकाशित कर पा रहे हैं।
बेशक, AI कल्पनाशक्ति, संवेदनाएँ और जीवन के अनुभवों की जगह कभी नहीं ले सकता। एक अच्छी कहानी, गहरी सोच और सच्ची भावनाएँ अब भी इंसान ही रच सकता है। लेकिन AI उस सफ़र को कहीं ज़्यादा आसान ज़रूर बना देता है।
कई दशक पहले, जब फ़ोटोकॉपी मशीनें नई-नई आई थीं, तब ज़ेरॉक्स कंपनी के एक अधिकारी ने कहा था: “एक दिन हर व्यक्ति अपना खुद का प्रकाशक होगा।” उस समय यह बात किसी ख़्वाब जैसी लगती थी। आज वह भविष्यवाणी सच साबित हो चुकी है।
फिर भी यह समझना ज़रूरी है कि सेल्फ पब्लिशिंग कोई जादू की छड़ी नहीं है। अगर किताब कमज़ोर है तो केवल खुद प्रकाशित कर देने से वह बेहतरीन नहीं बन जाएगी। अच्छी संपादन प्रक्रिया, आकर्षक डिज़ाइन, सावधानी से की गई प्रूफ़रीडिंग और लगातार प्रचार आज भी उतने ही ज़रूरी हैं। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि अब लेखक इन सेवाओं को अपनी पसंद से चुन सकता है। उसे अपनी रचना का पूरा नियंत्रण किसी और के हवाले नहीं करना पड़ता।
सेल्फ पब्लिशिंग की सबसे बड़ी कामयाबी सिर्फ़ ज़्यादा किताबें छापना नहीं है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है रचनात्मक आज़ादी। अब क्षेत्रीय भाषाओं के लेखक, छोटे विषयों पर लिखने वाले लोग, भूले-बिसरे इतिहास, नए प्रयोग और अलग सोच रखने वाले रचनाकार भी बिना किसी रुकावट के अपनी बात दुनिया के सामने रख सकते हैं।
इतिहास में पहली बार किसी लेखक की सफलता इस बात पर कम निर्भर है कि कोई प्रकाशक उसे पसंद करता है या नहीं। अब फ़ैसला सीधे पाठक करते हैं। अगर रचना दमदार है तो वह अपनी जगह बना ही लेती है।
छापाखाने ने किताबों को जन्म दिया था। इंटरनेट ने उन्हें हर घर तक पहुँचा दिया। और सेल्फ पब्लिशिंग ने उन्हें सचमुच लोकतांत्रिक बना दिया है। शायद यही इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी साहित्यिक क्रांति है।
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