निशाना भले ही ब्राह्मण पर हो, लेकिन निगाहें कहीं और हैं

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डाॅ. चन्द्र प्रकाश सिंह

दिल्ली । ब्राह्मण के विरोध में एक नया ज्वार आया है। आज हिन्दू शास्त्रों को मिथ (काल्पनिक) घोषित करने वाले एक विशेषज्ञ का लेख पढ़ रहा था, जिसमें उन्होंने बताया है कि पंद्रह सौ वर्ष पूर्व भारत में कोई ब्राह्मण नहीं था, हड़प्पा काल में भी भारत में कोई ब्राह्मण नहीं था। ब्राह्मण अपना घोड़ा लेकर यूरेशियाई देश से भारत आया और सूर्य के रथ में उन घोड़ों को जोत दिया। यही नहीं ब्राह्मण शेर भी भारत के बाहर से लाया था, जिसके ऊपर न केवल अपनी दुर्गा देवी को बैठा दिया, बल्कि उस दुर्गा से देशी भैंसे को मरवा दिया और देशी हाथी को शेर से कुचलवा दिया। उनका पूरा निहितार्थ यह था कि बहुत ही चालाकी से ब्राह्मण ने यहाँ के देशज प्रतीकों को अपने प्रतिमानों के साथ जोड़कर भारत में ब्राह्मणवाद फैला दिया।

यह बातें उन्हें बहुत अच्छी लगेंगी जिनके चिन्तन में जातिवाद के घेरे के अतिरिक्त और कोई विचार नहीं है और जिनके लिए जातियाँ राजनीतिक दांव-पेच की आधार ही नहीं हैं, बल्कि उनके लिए जाति के अतिरिक्त हमारे सांस्कृतिक चिन्तन में कुछ और है ही नहीं। बहुत लोग तो उनकी बातों का उद्धरण देकर यह भी बता देंगे कि जातियाँ को तो ब्राह्मणों ने ही बनाया है। आज कल ऐसे विचारक हिन्दू राष्ट्र के महारथियों को भी बहुत भाने लगे हैं।

लेकिन यह विषय जातियों का नहीं है, केवल एक जाति को लक्ष्य बनाकर यह हिन्दू संस्कृति के सम्पूर्ण चिन्तन और मेधा को मिथ्या और काल्पनिक घोषित करने की एक कुचेष्टा है।

जिस हड़प्पा सभ्यता की बात उन्होंने की है उसी में एक ऐसा चित्रांकन प्राप्त हुआ है, जिसमें दो पक्षी एक ही वृक्ष पर बैठे हुए हैं, उनमें से एक फल खा रहा है और दूसरा चुपचाप बैठा हुआ है। यह चित्र परमात्मा और जीवात्मा की अवस्था का वह चित्रण है जिसका वर्णन मुण्डकोपनिषद् के “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया” मंत्र में किया गया है।

उपनिषदों में ब्राह्मण शब्द का अनेक स्थानों पर उल्लेख आता है। वहाँ ब्राह्मण का अर्थ कोई जाति नहीं बल्कि अवस्था है।उपनिषदों में ‘ब्राह्मण’ का अर्थ जाति नहीं, बल्कि परमतत्व (ब्रह्म) और उस परम तत्व को जानने वाले ज्ञानी व्यक्ति दोनों के अर्थ में किया गया है।

तैत्तिरीयोपनिषद् में “आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्। न बिभेति कुतश्चनेति।” अर्थात् ब्रह्म के आनन्द को जानने वाला किसी से भयभीत नहीं होता। यहाँ ब्रह्मण का अर्थ पूर्ण व्यापक सनातन सत्ता से है। ऐसे ही बृहदारण्यक उपनिषद् में परमसत्ता के लिए तथा उसको जानने वालों के लिए ब्राह्मण शब्द प्रयोग किया गया है। छान्दोग्य उपनिषद् में तो सत्यकाम को केवल सत्य बोलने के आधार पर ब्राह्मण मान लिया गया।

ब्राह्मण जाति नहीं मानव की वह अवस्था है जो पूर्ण व्यापकता के साथ एकाकार थी, फिर ऐसे लोगों का समूह एक वर्ण के रूप में चिह्नित किया गया और बाद में वह वंशानुगत रूप में परिवर्तित होकर जाति बन गया।

आज इस आक्रमण का लक्ष्य केवल आज की वंशानुगत ब्राह्मण जाति नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मतत्व, ब्रह्मबोध और भारतीय मेधा के उस शिखर पर आक्रमण है जो मानव चिन्तन की पूर्णता को अभिव्यक्त करती है। यह एक व्यापक चिन्तन को जाति के रूप में खड़ा कर सम्पूर्ण संस्कृति को लांक्षित करने की एक कुचेष्टा है।

जनसंघ, जनतापार्टी और भाजपा के संस्थापक सदसय और कार्यकर्ताओं की अनोखी पीढ़ी तैयार की

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–रमेश शर्मा

दिल्ली । स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे भारत की ऐसी ऋषि परंपरा के वाहक रहे हैं। जिन्होंने अपनी साधना, तपस्चर्या और सेवा संकल्प से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी को कीर्तिमान स्वरूप प्रदान करने के लिये पूरा जीवन समर्पित कर दिया। आज यदि भारतीय जनता पार्टी ने अपने जन समर्थन और संगठनात्मक स्वरूप में पूरे विश्व में सबसे बड़ा राजनीतिक दल के रूप में आकार लिया है तो इसके पीछे कुशाभाऊ ठाकरे जैसे तपोनिष्ठ ऋषि तुल्य विभूतियों की साधना ही रही है।
कुशाभाऊ ठाकरे जी का जन्म 15 अगस्त 1922 को मध्यप्रदेश के धार नगर में हुआ था । आज उनकी शताब्दी वर्ष की पूर्णता के तिथि हैं। विक्रम संवत की दृष्टि से यह तिथि संवत् 1979 भाद्रपद माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी थी । यह अष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के अवतार की तिथि है, इसे जन्माष्टमी कहते है। तपस्या और त्यागमयी जीवन के साथ संस्कृति, समाज और राष्ट्रसेवा का व्रत उन्हें अपने परिवार के संस्कार में मिला था। उनके पिता डाक्टर सुन्दरराव जी ठाकरे अपने समय के सुप्रसिद्ध चिकित्सक थे जिन्होंने अहमदाबाद मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरी की डिग्री ली थी। प्लेग और अन्य महामारी के समय अपने प्राणों बिना परवाह किये पीड़ितों की सेवा करने के लिये सुविख्यात रहे हैं। ठाकरे जी का परिवार कोंकण के पाली गाँव का मूल निवासी था। किन्तु समय के साथ उनके प्रपितामह गुजरात के मेहसाणा में आ बसे थे। जहाँ उनकी गणना एक संपन्न और प्रतिष्ठित परिवार के रूप में होने लगी थी । पिता सुन्दरराव जी का जन्म मेहसाणा में हुआ। सुन्दरराव जी अपने छात्र जीवन से ही स्वदेशी आंदोलन से जुड़ गये थे । स्वदेशी अभियान के साथ ही उन्होने अपनी पढ़ाई की थी । वे मेडिकल की पढ़ाई करने अहमदाबाद मेडिकल कॉलेज गये। मेडिकल की पढ़ाई के बीच ही उनका विवाह धार के प्रतिष्ठित दिघे परिवार की बेटी शांता बाई के साथ हो गया था। पढ़ाई पूरी करने लौटे तो परिवार में संपत्ति बँटवारे पर कुछ खींचतान आरंभ हुई। तब पत्नि के परामर्श से अपने हिस्से की संपत्ति भी अपने भाई विनायकराव को देकर खाली हाथ एक जोड़ी कपड़े से धार आकर गये थे। धार में आधुनिक मेडिकल चिकित्सा पद्धति का कोई डाक्टर भी नहीं था। इसीलिए उन्हें अपना प्रतिष्ठित स्थान बनाने में अधिक कठिनाई नहीं हुई। महाराजा धार ने भी उनका स्वागत किया । कुशाभाऊ जी का जन्म यहीं धार में हुआ। उनकी आभा बहुत सौम्य और आकर्षक थी। उनका जन्म जन्माष्टमी को हुआ था। इसलिये उनके नाना ने इस नन्हे बालक को कृषा कहकर पुकारा। समय बीता । नामकरण संस्कार का समय आया। तब उनका नाम शशिकांत रखा गया। नाम भले शशिकांत रखा गया हो पर वे प्रचलन में “कृषा” और “कुशा” और कुशाभाऊ के नाम से ही जाने गये। समय के साथ बड़े हुये। धार के विद्यालय में शिक्षा आरंभ हुई। तब उनका पूरा नाम “शशिकांत सुन्दरराव ठाकरे” अंकित किया गया। उनका छात्र जीवन इसी नाम का रहा। औपचारिक रूप में भले उनका नाम शशिकांत ठाकरे रहा । पर घर बाहर और विद्यालय के मित्रों के बीच उनकी पहचान कुशाभाऊ नाम से प्रतिष्ठित रही ।
स्वदेशी आंदोलन के प्रबल समर्थक और गाँधीजी के खादी आंदोलन में सहभागी रहे पिता डाक्टर सुन्दर राव का जुड़ाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हो गया था। इस नाते परिवार में संघ विचार का वातावरण था । कुशाभाऊजी किशोर वय में संघ और संघ विचार से परिचित हो गये थे। और उनका शाखा जाना आरंभ हो गया। 1939 में कुशाभाऊ जी ने धार से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। पिता अपने पुत्र को अपनी ही भांति डाक्टर बनाना चाहते थे। इसीलिए आगे की पढ़ाई के लिये ग्वालियर भेज दिया। कुशाभाऊ जी कुशाग्र बुद्धि थे। मैट्रिक परीक्षा उन्होंने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी । इसलिये ग्वालियर में सरलता से प्रवेश भी मिल गया। उन्होने 1941 में इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की और मेडिकल में दाखिला भी ले लिया । किन्तु नियति ने उनके लिये कुछ कार्य निर्धारित किया था । वे संघ विचार में ढल गये थे, शाखा के नियमित स्वयं सेवक थे । उन्होंने 1942 में संघ के शिक्षा वर्ग में प्रशिक्षण लिया और अपना पूरा जीवन राष्ट्र, संस्कृति और संघ को समर्पित कर दिया । उन दिनों संघ के शिक्षा वर्ग को “ओ टी सी” नाम से जाना जाता था । ओटीसी के बाद ठाकरे जी अपनी पढ़ाई छोड़कर संघ के प्रचारक निकल गये । पढ़ाई छोड़ने संघ का प्रचारक बनने की अनुमति परिवार से मांगी, जो सहज ही मिल गई । और 1942 से उनका संघ जीवन पूर्ण कालिक प्रचारक के रूप हो गया ।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने उन्हें मालवा और मालवा से लगे राजस्थान के क्षेत्र में संघ के विस्तार का कार्य सौंपा । उन्होंने नीमच को अपना केन्द्र बनाया और इसके चारों ओर धार, झाबुआ, रतलाम मंदसौर राजगढ़ शाजापुर से लेकर चित्तौड़ तक निरंतर प्रवास किये । उज्जैन, धार, झाबुआ, शाजापुर, रतलाम मंदसौर आदि जिलों का तो संभवतः कोई गाँव ऐसा शेष हो जहाँ ठाकरे जी ने संपर्क न किया हो, उन्होंने निरंतर प्रवास किये। जहाँ जो साधन मिला साइकल बस बैलगाड़ी जो मिला उसी से यात्रा निरंतर रही । हनुमान जी ने कभी कहा था “रामकाज कीजै बिना मोहि कहाँ विश्राम” संभवतः यही मंत्र ठाकरे जी का था अंतर केवल एक ठाकरे जी संकल्प था ” संघ कार्य कीजै बिना मोहि कहाँ विश्राम” । सुन्दर लाल पटवा, वीरेन्द्र कुमार सकलेचा और कैलाश जोशी जैसे सुपरिचित व्यक्तित्वों को उनकी युवा आयु में ठाकरे जी ने ही संघ से जोड़ा था । 1947 में सुन्दर लाल पटवा को संघ कार्य के लिये प्रचारक के रूप में ठाकरे जी ने ही तैयार किया था । और जब 1951 में राजनैतिक दल के रूप जनसंघ अस्तित्व में आया तब ठाकरे जी ने ही पटवा जी को मालवा में जनसंघ कार्य विस्तार का दायित्व दिया ।
समय अपनी गति से साथ दौड़ता रहा । समय के साथ संघ और जनसंघ का कार्य भी गति लेता रहा । समय के साथ परिवार की एक शाखा इंदौर आ गयी । इस नाते कुशाभाऊ जी को यहाँ परिवार से संघ कार्य में सहायता मिली । हो सकता है किसी को यह बात सुनने में सच न लगे किन्तु यह सत्य है कि ठाकरे जी ने संघ और जनसंघ के कार्य विस्तार में परिवारजनों का तो सहयोग लिया किंतु स्वयं परिवार की कभी सहायता न की । वे पाँच भाई एक बहन थे । स्वाभाविक है समय के साथ परिवार का और विस्तार हुआ । परिवार की शाखाएँ विभिन्न नगरों मे हैं । एक शाखा धार में भी । पर सभी सामान्य जीवन ही जी रहे हैं । ठाकरे जी का संगठन के प्रति, अपने कार्य के प्रति कितना समर्पण था इसका अनुमान इस घटना से भी लगाया जा सकता है कि 1953 में जब उनकी माता जी शाँताबाई मरणासन्न हुईं तब संदेश मिलने के बाद भी वे धार न जा सके । और अंतिम संस्कार में ही गये । यह ठाकरे जी की साधना का ही प्रभाव था कि मालवा क्षेत्र में संघ और जनसंघ की जड़ें तो गहरी हुईं ही, संघ कार्य विस्तार के लिये प्रचारक भी बड़ी संख्या में इस क्षेत्र से निकले । ठाकरे जी ने अपने कार्य विस्तार में परिवार का ही सहयोग नहीं लिया अपितु अपने मित्रों को भी संघ और जनसंघ के कार्य विस्तार में जोड़ा। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ग्वालियर के नारायण कृष्ण शेजवलकर हैं । वे ग्वालियर में इंटर की पढ़ाई के साथ ठाकरे जी के मित्र बने और पहले संघ से और फिर जनसंघ से जुड़े ।

मध्यप्रदेश में जनसंघ की स्थापना के साथ उन्होंने पूरे मध्यप्रदेश की यात्राएं कीं। उन दिनों छत्तीसगढ भी मध्यप्रदेश का एक अंग था । मुरैना से बस्तर तक और झाबुआ से रीवा तक मध्यप्रदेश का ऐसा कोई नगर कस्बा नहीं जहाँ ठाकरे जी ने यात्रा न हो और कार्यकर्ता न खड़े किये हों । वे संघ प्रचारक के रूप में सर्वाधिक समय मालवा में रहे । जनसंघ को और बाद में भारतीय जनता पार्टी को सबसे अधिक सफलता इसी क्षेत्र से मिलती थी ।
वे जनसंघ और बाद में भाजपा के लगभग सभी महत्वपूर्ण पदों पर रहे । संगठन मंत्री, महामंत्री और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे ।
लेकिन पद उनके लिये महत्व पूर्ण न था । वे किसी भी पद पर रहे हों उनकी जीवन शैली सदैव एक सी रही । उन्होंने जीवन भर धोती कुर्ता पहना । खादी का कुर्ता उन्हें सदैव प्रिय रहा । वे बिना प्रेस के धोती कुर्ता पहनते थे और अपने हाथ से स्वयं धोते थे । और जब पार्टी के काम विस्तार हुआ तब उनके सहायक की वृद्धि हुई । बड़ी मुश्किल से उन्हे समझाया जा सका और वे तैयार हुये । वे चने मुरमुरे से शाम का अल्पाहार करते थे और मिठाई में इमरती उन्हे पसंद थी । वे बोलते कम थे । भोपाल में जनसंघ का प्रांतीय कार्यालय पहले चौक बाजार के पास लखेरापुरा में था फिर सोमवारा आया । वे भोपाल में जब भी रहते तो कार्यकर्ताओं से मिलने केलिये अधिक समय देते थे । प्रदेश चारों कौनों पर उन्होंने जिन कार्यकर्ताओं को जोड़ा वे सब प्रभावशाली और संगठन के लिये उपयोगी रहे । उस समय हिन्दु महासभा के अत्यंत प्रभावशाली नेता विदिशा के निरंजन वर्मा जी और भोपाल के भाई उद्धवदास जी मेहता को जनसंघ में लाने वाले ठाकरे जी थे । राजमाता जी के लिये जनसंघ में आने का मार्ग बनाने वाले ठाकरे जी थे । ठाकरे जी सुनते अधिक थे और बोलते कम थे । पता नहीं उनमें वह क्या विशेषता थी कि बातचीत के बाद कार्यकर्त्ता उनसे सदैव प्रसन्नचित्त और संतुष्ट भाव से ही लौटता था । दूरदराज से कोई कार्यकर्त्ता उनके पास कैसी भी शिकायत लेकर आता पर उनके सामने उसका सारा असंतोष निकल जाता और वह उत्साह के साथ संगठन के काम में जुट जाता । सारी बात सुनकर कार्यकर्ता का एक हाथ मोड़ कर पीठ पर घूँसा मारना मानों उनके आत्मीय स्नेह की वर्षा होती और कार्यकर्त्ता प्रसन्न और सन्तुष्ट होकर लौटकर जाया करते थे । जनसंघ के संगठन मंत्री के रूप में उन्होंने उड़ीसा, राजस्थान, गुजरात महाराष्ट्र आदि अनेक प्रातों में कार्य को विस्तार दिया । उन्होंने खंडवा लोकसभा क्षेत्र से लोकसभा के लिये दो चुनाव लड़े । पहले उपचुनाव में तो सफलता मिली पर दूसरी बार आमचुनाव में सफलता न मिल सकी । सबने आग्रह किया तो चुनाव लड़ लिया । न जीत की खुशी न हार का गम । वे जैसे पहले थे वैसे ही जीत के बाद भी और हार के बाद भी रहे । उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के पूर्व बीच में कुछ समय ऐसा भी बीता जब लगा ठाकरे जी एकाकी हो रहे हैं। वे भारतीय जनता पार्टी के दिल्ली कार्यालय के अंग के समीप के परिसर में ही रहा करते थे । पर तब भी उनके व्यवहार में विचार में कोई अंतर न आया था । जो भी मिलने जाता उससे उसके परिवार ही नहीं उसके मित्रों का भी हालचाल पूछते थे । उनकी स्मरण शक्ति भी अद्भुत थी। वे एक बार नाम पूछते तो सदैव स्मरण रखते थे । मध्यप्रदेश और देश के कितने कार्यकर्ता थे जिन्हे ठाकरे जी नाम लेकर ही पुकारते थे । वे विलक्षण विद्वान थे, कौनसा ऐसा विषय था जिसका वे समुचित समाधान न सुझा देते थे । वे मनोविज्ञान के तो मानों विशेषज्ञ थे । मन के भाव जानकर कार्यकर्त्ता को मार्गदर्शन देते थे ।

आपातकाल में मीसा में निरुद्ध रहे । जेल के भीतर सभी कार्यकर्ताओं को ढांढस बँधा कर गीत भजन में लगाना उनकी विशेषता थी। जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के बीच कुल कालखंड जनता पार्टी के रूप में भी बीता। उस काल खंड कुछ अन्य घटक समूहों ने अनावश्यक जनसंघ घटक के लोगों पर दबाना आरंभ किया । तब ठाकरे जी उनकी भी पूरी बातें सुनते और अपने कार्यकर्ताओं को संयम बनाये रखने की सलाह देते । अंततः वह स्थिति अधिक दिन न सकी । इसका आभास ठाकरे जी को था। आपातकाल के बाद 1977 में जनता पार्टी सत्ता में आई। किंतु 1979 से ही ठाकरे जी ने बिना कुछ कहे जनता पार्टी के भीतर जनसंघ घटक के कार्यकर्ताओं को सामाजिक और जनहित के मुद्दों पर सक्रिय कर दिया था । और अंततः 1980 में भारतीय जनता पार्टी अस्तित्व में आई । कौन कौन कार्यकर्त्ता मध्यप्रदेश से मुम्बई अधिवेशन में जायेगा इसका समन्वय स्वयं ठाकरे जी किया और मुम्बई में पाँडालों में ठहरे कार्यकर्ताओं की व्यवस्था को स्वयं जाकर देखा था । 1984 के लोकसभा और 1985 के विधानसभा चुनाव में आशातीत सफलता न मिलने के बाद जनहित के मुद्दों पर आंदोलन की रणनीति ठाकरे जी ने तैयार की । विशेषकर किसानों की समस्या पर आंदोलन का निर्णय ठाकरे जी ने लिया था । और 1990 में भारतीय जनता पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई ।

राजनैतिक उतार चढ़ाव कैसे भी रहे हों पर ठाकरे जी जीवन शैली विचार बीथि में कभी अंतर नहीं आया। वे संघ के प्रचारक रहे हों या भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हों। सदैव एक सी शैली में जिये। सेवा और संगठन का विस्तार उनका प्रमुख ध्येय था। उन्होंने कभी प्रशंसा आलोचना अथवा पद पाने, या न पाने की चिंता नहीं की । वे समान गति और समान चिंतन से ही जिये। आज देश में और विशेषकर मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी का जो भी स्वरूप है उसके आधार स्तंभ हैं ठाकरे जी । वे मानों प्राण शक्ति हैं संगठन की । 28 दिसंबर 2003 को उनका शरीर पंचतत्व में विलीन हुआ । पर वे आज भी संगठन में जीवन्त हैं सबकी स्मृतियों में हैं। संगठन की प्राण शक्ति में संवाहित हैं और सदैव रहेंगे ।

खाजा और खाते ही जा

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सच्चिदानंद जोशी

दिल्ली। जब नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल का कर्टेन रेजर IIC दिल्ली में हुआ था उस दिन किसी ने मज़ाक में आयोजक गंगा कुमार जी से कहा था ” खाजा तो खिलाएंगे न!” उस दिन बहुत आश्चर्य हुआ था। भला खाजा में ऐसी कौन सी बात है कि साहित्य उत्सव की चर्चा में भी उसका जिक्र हो। ये बात तब समझ में आई जब नालंदा होते हुए राजगीर पहुंचे और रास्ते में ” खाजा तीर्थ सिलाव” के दर्शन हुए।

वैसे खाजा हमारे जीवन में कभी न कभी आ ही जाता है। ग्वालियर मेले में बचपन में खाया खाजा याद है। छतरपुर में थे तो मेला जलविहार के प्रवेश द्वार पर स्वागत ही खाजा की दुकानों से होता था। तब एक जाते समय और एक आते समय खाजा लेना अनिवार्य था। तब ऑइली, फैटी, ऐसा कुछ भी नहीं लगता था। फिर बंगाल का खाजा , ओडिशा का खाजा ,छत्तीसगढ़ का खाजा सभी तरह का खाजा खाने का सौभाग्य मिला। जिन लोगों को ये सौभाग्य न मिला हो वो जगन्नाथ जी का प्रसाद खाते हुए खाजा का भक्षण कर ही लेते हैं।

खाजा के इन्हीं संदर्भों का स्मरण करते हुए जब सिलाव में उतरे तो चकित रह गए। एक लाइन से खाजा की ही दुकानें थी। अलग अलग नाम और ब्रांड के साथ मीठा और नमकीन खाजा मिल रहा था । और तो और चाट के ठेलों पर भी गोलगप्पों के साथ खाजा के ढेर भी बराबरी से थे।

अकेले जाते तो किसी भी दुकान से खरीद लेते। लेकिन साथ में अनंत आशुतोष जी थे जो है तो पुरातत्वविद लेकिन खाजा में विशेषज्ञता रखते दिखाई दिए।

” हम लोग काली साह का खाजा लेंगे । वो जी आई टैग प्राप्त है। ” उन्होंने बताया और हम आश्चर्यचकित हो गए।खाजा को जी आई टैग मिला इसकी तो जानकारी भी नहीं थी। फिर वो बोले ” बिहार में इस एक ही मिठाई को मिला है।”

खोजबीन करने पर जानकारी मिली कि खाजा का इतिहास पुराना है और मौर्यकाल में भी इसका संदर्भ मिलता है। भगवान बुद्ध के काल में भी संदर्भ मिलता है। यानी खाजा का इतिहास पंद्रह सौ वर्ष पुराना है।इतिहास में और उलझते इससे पहले अनंत आशुतोष जी ने उबार लिया और बताया कि हमें रास्ते के दूसरी तरफ जाना है। जी आई टैग वाली असली दुकान उधर अंदर तरफ है। तब सामने देखा तो मजा ही आ गया ।अधिकांश दुकानों पर काली साह ही लिखा था। मुझे शेगांव की कचौरी की याद हो आई। पहले शर्मा जी की कचौरी प्रसिद्ध थी जिनका बोर्ड नीले रंग का होता था। अब शेगांव में अधिकतर दुकानों के बोर्ड नीले हैं और सब पर शर्मा जी का नाम लिखा है।


सामने गली के अंदर एक भव्य बिल्डिंग थी जिसके द्वार पर खाजा मॉल लिखा था। अंदर गए तो एक भी टुकड़ा खाजा का दिखाई नहीं दिया। अनंत जी ने दुकान के मालिक संजीव जी से बात की और उन्होंने कहा कि वे अंदर से माल निकलवाते हैं। यहां रखने से ठंड के कारण सीरा जम जाता था।

जब तक अंदर से माल आए संजीव जी चर्चा की और अपना खाजा ज्ञान बढ़ाया। मालूम पड़ा कि दिन में तीन से चार सौ किलो का माल जाता होगा। और ये सिर्फ भारत में ही नहीं विदेशों में जाता है। ऑनलाइन भी मंगवाया जा सकता है। एक दो पीस टेस्ट करवाए जो मुंह में रखते ही घुल गए। देखा कई परतों वाला खाजा खाने में एकदम हल्का था। पफ बिस्किट से भी ज्यादा हल्का और खस्ता। मालूम पड़ा कि इसका कच्चा माल बनाने की खास विधि है। सबसे बड़ी बात की सिलाव के पानी में खास विशेषता है। ये स्वाद कही और नहीं आएगा। बात करते करते देख तो संजीव की प्रतिकृति उनके जुड़वां भाई भी अवतरित हो गए। फिर दोनों भाइयों ने मिलकर खाजा से जुड़े कई मजेदार किस्से सुनाए।

हमने लालच में तीन डिब्बे पैक करवा लिए । सोचा कई दिन तक खाते रहेंगे। लेकिन खाजा खाने से स्पीड इतनी ज्यादा है कि उन्हें बच्चों के लिए , जो तीन दिन के लिए वाराणसी गए है , बचाना मुश्किल हो रहा है। बच्चे छोटे थे तो उन्हें डांट कर कहते थे जरा दूसरों के लिए भी बचाया करो। खाजा को लेकर ऐसी ही डांट खुद को लगाने की इच्छा हो रही है।

सोचा था ऑनलाइन खाजा मंगवाना सिर्फ एक रूमानी ख्वाब होगा लेकिन ये तो बहुत जल्दी हकीकत में तब्दील होता नज़र आ रहा है।

आज ही के दिन 140 साल पहले कांग्रेस का जन्म हुआ था…

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विष्णु शर्मा

दिल्ली: दिसम्बर 28, 2025: कांग्रेस बनाने का आइडिया जिस अंग्रेज के दिमाग में आया, उसको सभी जानते हैं-ए ओ ह्यूम, एक अंग्रेजी सिविल सर्विस ऑफिसर. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उसने 1857 की क्रांति के 215 सिपाहियों को मारा था और कइयों को फांसी पर चढ़ा दिया था. वह यूपी के इटावा का तो डीएम रहा ही था, आधुनिक भारत में पक्षियों की प्रजातियों पर सबसे बड़ा और सबसे पहला काम ह्यूम ने ही किया था. ह्यूम के पिता इंगलैंड के सांसद थे और संसद में भारत को लेकर ब्रिटिश सरकार की आलोचनाओं के लिए जाने जाते थे. लॉर्ड लिटन की जब ह्यूम ने आलोचना की, तो ह्यूम को भुगतना पड़ा और ह्यूम को सचिवालय से हटा दिया गया. अब ह्यूम ने सोचा कि अपने दूसरे शौक यानी पक्षियों की प्रजातियों की गणना को समय दिया जाए. शिमला के अपने घर में वो इसी काम में व्यस्त हो गया.

कहानी यही प्रचलित है कि अचानक जब कई मैन्युस्क्रिप्ट्स खो गईं तो ह्यूम का मन उचट गया और उसे अपने अब तक के काम को नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम, लंदन को दे दिया. अब तक ह्यूम ने इस्तीफा नहीं दिया था, वरना तीन चार साल बिना नौकरी के भारत में खर्च कैसे चलता, 1882 में ह्यूम को सेवा से मुक्त कर दिया गया. कहीं ना कहीं ह्यूम के मन में मौजूदा ब्रिटिश सरकार और उसके अधिकारियों के खिलाफ नाराजगी थी, ऐसे में ह्यूम ने अपने गुस्से को दूसरी तरफ मोड़ा. 1 मार्च 1983 को ह्यूम ने कलकत्ता यूनीवर्सिटी के छात्रों को पत्र लिखा और आव्हान किया कि भारत के लोगों का अपना कोई राष्ट्रीय संगठन होना चाहिए.

लेकिन सच्चाई एओ ह्यूम के जीवनीकार विलियम वेडरबर्न ने ह्यूम की आत्मकथा में लिखी, जो ह्यूम ने खुद उन्हें बताई थी, दिलचस्प बात है कि विलियम बेडरबर्न बाद में कांग्रेस अध्यक्ष भी बने थे. वेडरबर्न के मुताबिक ह्यूम के सूत्रों ने उन्हें अहम जानकारी दी थी, ये सूत्र थे देश भर में फैले फकीर, साधु, बैरागी जो देश भर में घूमते रहते थे, ऐसे में उन्हें देश के माहौल का पता होता था. उन्होंने बताया कि कैसे देश के आम जनमानस में 1857 से भी बड़ी क्रांति की योजना बन रही है. ह्यूम के शब्दों में, “The evidence that convinced me at the time, (about fifteen months, I think before Lord Lytton left) that we were in imminent danger of a terrible , was this. I was shown seven large volumes (corresponding to a certain mode of dividing the country, excluding Burmah, Assam, and some minor tracts) containing a vast number of entries; English abstracts or translations- longer or shorter- of vernacular report of communication of one kind or another, all arrange according to districts (not identical with ours), Sub-districts, sub-divisions, and the cities, towns and villages included in these”. ह्यूम का दावा था कि इस रिपोर्ट में 30,000 लोगों से भी अधिक से मिली सूचनाएं हैं.

ह्यूम ने आगे जो लिखा है, वो हिंदी में समझिए, उन्होंने लिखा कि, “गुप्त रूप से पुरानी तलवारें, भाले और तोड़ेदार बंदूकें एकत्र की जा रही हैं जो आवश्यकता पड़ने पर तैयार मिलेंगी. ऐसा कहा गया है कि अचानक हिंसा भड़केगी, चारों और अपराधों का बाजार गर्म हो जाएगा, अवांछित व्यक्तियों की हत्याएं होंगी, महजनों और बाजारों को दिन दहाड़े लूटा जाएगा, लोग तो इस समय अधनंगे, अधभूखे हैं हीं. ऐसी स्थिति में शुरूआती अपराध तो बड़े अपराधों के लिए संकेत मात्र होंगे. हो सकता है कि अराजकता फैल जाए और अधिकारियों व अभिजात्य वर्ग के लोगों का जीना ही दूभर हो जाए”. वो आगे लिखते हैं, “फिर इस शिक्षित समुदाय का एक छोटा सा वर्ग, जो इस समय शायद अकारण ही ब्रिटिश सरकार का विरोधी है, इस विद्रोह से जुड़ेगा, इसका नेतृत्व संभालेगा, आंदोलन में समन्वय स्थापित करेगा और राष्ट्रीय विद्रोह के रूप में उसका संचालन करेगा’.

ह्यूम को इन रिपोर्ट्स पर पूरा भरोसा था कि क्योंकि ये रिपोर्ट्स चेलों (शिष्यों) ने अपने गुरू को दी हैं, जो झूठ नहीं हो सकतीं. दरअसल अलग-अलग जगह से शिष्य अपने गुरूओं को उन क्षेत्रों की जानकारियां भेजते रहते थे, जहां का वो भ्रमण करते थे. इटावा का कलेक्टर रहते ह्यूम को संप्रेषण के इस साधन के बारे में जानकारी हुई थी, तभी वो ऐसे कई लोगों से सम्पर्क में रहता था. वेडरबर्न ने ह्यूम के हवाले से लिखा है कि, “All chelas are bound by vows and conditions, over and above those of ordinary initiates of low grade. No Chela would, I may almost say can deceive his Guru, in whom center all his hopes of advancement, no teacher will take on the chela cast off by another”. इससे साफ लगता है कि ह्यूम ने उस वक्त के सांधू, संन्यासी या बैरागियों की व्यवस्था को अच्छे से समझ लिया था.

खुद ह्यूम ने अपने जीवनीकार को बताया कि हमारे एक्शन से जो ताकतें उभर रही हैं, बढ़ रही हैं, उनको रोकने के लिए, ब्रिटिश साम्राज्य की अखंडता को बचाए-बनाए रखने के लिए सेफ्टी वॉल्व के तौर पर कांग्रेस से बेहतर कोई और उपाय था ही नहीं. ह्यूम के शब्दों में, “I have always admitted that in certain provinces and from certain points of view the movement was premature, but from the most vital point of view, the future maintenance of the integrity of the British Empire, the real question when the Congress started was, not, is it premature but us is too late- will the country now accept it?… A safety valve for the escape of great end growing forces, generated by our own action, was urgently needed, and no more efficacious safety valve than our Congress movement could possibly be devised”.

बात आगे बढ़ाने के लिए भारत में अंग्रेजी अधिकारियों को भी संतुष्ट करना जरूरी थी. लॉर्ड रिपन जाने से पहले नए वायसराय लॉर्ड डफरिन को कहकर गए थे कि भारत की वर्तमान परिस्थितियों को समझने के लिए एओ ह्यूम से मिलना बेहतर रहेगा. तब डफरिन ह्यूम से मिला. आरसी मजमूदार ने लिखा है कि पहले ह्यूम का विचार केवल सामाजिक संस्थाओं का मिलना था, लेकिन डफरिन ने कहा कि, ‘’ As the interests of the ruled that Indian politicians should meet yearly and point out to the Government in what respects the administration was defective and how it could be improved, and he added that an assembly such as he proposed should not be presided over by the Local Governor, for in, his presence the people might not like to speak out their minds”.

पूरी कहानी और भी दिलचस्प है, उसके लिए आपको ‘कांग्रेस प्रेसीडेंट्स फाइल्स’ पढ़नी पड़ेगी।

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