जेन-जी आंदोलन से उपजे कुछ सवाल

Protest-PTI-1784995055653.webp
सुरेंद्र चतुर्वेदी

जयपुर । देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ ही जेन – जी का छात्र आंदोलन समाप्त हो गया ! यह अलग बात और शोध का विषय है कि इस आंदोलन में कितने छात्रों ने भाग लिया ? हालांकि यह बात जरूर है कि *इस आंदोलन में आए युवाओं ने जिस प्रकार की भाषा और संस्कार का प्रदर्शन किया वो उनके शिक्षकों और परिजनों पर जरूर यह सवाल उठाता है कि इन युवाओं में शैक्षिक अनुशासन और पारिवारिक संस्कार कहाँ और किस मोड़ पर पीछे छूट गए ?* यह प्रश्न सरकारी शिक्षा व्यवस्था से भी पूछा ही जाना चाहिए कि क्या छात्रों को दी जाने वाली शिक्षा उनको जिम्मेदार और नैतिक नागरिक बनाने की दिशा में प्रेरित भी करती है ? यह आंदोलन अपने पीछे कुछ सवाल छोड़ गया है।

पहला सवाल तो सरकार के सामने ही है कि *देश में एक ऐसा युवा वर्ग भी है जिसके सामने जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है। वह सोशल मीडिया में अपना भविष्य देख रहा है। सरकार द्वारा उस वर्ग को साधने के लिए चलाई गई नीतियाँ चाहे वो स्किल इंडिया हो या प्रधानमंत्री मुद्रा योजना क्या वो अपने उद्देश्य में सफल रही ?* इसी के साथ यह भी पूछा ही जाना चाहिए कि ऐसे युवाओं को साधने के लिए सरकार किस योजना पर काम कर रही है जिससे इनमें व्याप्त निराशा को आशा में बदला जा सके, क्योंकि *यह याद रखा ही जाना चाहिए कि ऐसे युवाओं की संख्या लगातार बढ़ती ही जाने वाली है। आज तो सरकार ने इनका आंदोलन खत्म करा दिया परंतु किसी ठोस निदान के अभाव उनको फिर आंदोलन करने के लिए प्रेरित ही करेगा।*

दूसरा सवाल जो *नई पीढ़ी के शिक्षकों और परिजनों को चुनौती दे रहा है, वो ये है कि क्या उनमें और बच्चों में संवादहीनता आ रही है ? क्या बच्चे अपनी बात अपने परिवार या शिक्षकों से नहीं कर पा रहे हैं ? क्या हमने उन्हें इस भीड़ में अकेला छोड़ दिया है ?* जहाँ वो अपने प्रश्नों और समस्याओं के लिए नितांत अपरिचित लोगों और सोशल मीडिया के बीच खड़ा है और वो इसको जैसा बताते हैं वो वैसा ही कर रहा है ?

तीसरा सवाल विशेष रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आनुषंगिक संगठनों को चौंकाता ही होगा कि *बदलते और आगे बढ़ते भारत के इस नव युवा वर्ग के लिए नए कार्यक्रमों की रचना करना और उनको सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की धारा में जोड़ना कितना जरूरी काम है ! यह ऐसा वर्ग है जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विरोधी वामपंथी और अर्बन नक्सल विचार ने तेजी से अपनी पकड़ बनाई है।* जिसका प्रदर्शन पूरी दुनिया ने पिछले महीने जंतर मंतर पर देखा।

चौथा और अंतिम सवाल का जवाब निश्चित रूप से भाजपा को ही खोजना पड़ेगा कि क्या कारण है कि *देश का वंचित वर्ग हिंदू होने के बाद भी भाजपा के अस्तित्व विरोधी बहुसंख्य मुस्लिम समाज और धर्मांतरण में लिप्त ईसाई समाज के साथ लय मिला लेता है लेकिन वह भाजपा के साथ पूरे मन से खड़ा नहीं होता।* उनकी इसी कमजोरी का फायदा भाजपा विरोधी दलों को मिलता रहा है।

इन सबके अलावा एक सबक जो भारत विरोधी ताकतों के लिए है कि भारत को श्रीलंका, नेपाल या बांग्लादेश समझने की भूल उनके हर षड्यंत्र और सामरिक रणनीति को ही विफल करेगी। कुछ युवाओं के अराजक और उत्पाती हो जाने से या राजनेताओं की कुंठाओं को हवा दे देने से भारत को दबाया या झुकाया नहीं जा सकता।

Delhi’s Century-Old Durga Puja Tradition Demands Dignified, Eco-Friendly Visarjan Facilities

4-1-2.jpeg

Delhi : Durga Puja is far more than a festival for Bengalis—it is the sacred homecoming of Maa Durga, who is believed to visit her earthly home for four cherished days. The rituals of welcoming and bidding farewell to the Goddess are rooted in centuries of mythology, faith, and tradition, making Visarjan one of the most sacred and emotional moments of the festival.

Delhi’s Enduring Cultural Heritage

Delhi has proudly celebrated this tradition for over 115 years, ever since its first community Durga Puja was established in 1910. For generations, lakhs of devotees have made Durga Puja an integral part of the city’s cultural heritage.

Balancing Environmental Protection with Ritual Dignity

As responsible citizens, we fully support protecting the Yamuna and are committed to ensuring our celebrations do not contribute to river pollution. However, the artificial immersion facilities provided in recent years have often lacked the dignity this sacred ritual deserves. Inadequate water, poor maintenance, unhygienic conditions, and improper management have forced devotees to immerse Maa Durga in shallow, dirty ponds, sometimes having to physically push the idol into the water. This is deeply distressing and diminishes the sanctity of a centuries-old tradition.

Traditions evolve, and we wholeheartedly support environmentally responsible solutions. But sustainability and cultural dignity must go hand in hand. We need to be provided clean, well-maintained, and properly managed immersion facilities that protect our rivers while allowing devotees to perform Visarjan with the reverence and respect it deserves. Protecting the environment and preserving our cultural heritage are shared responsibilities that must coexist.

अदृश्य सेवा का योद्धा: अरुण मुखर्जी

4-2-1.jpeg
 
दिल्ली। मूलतः कानपुर के निवासी अरुण मुखर्जी एक राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। लंबे समय तक उन्होंने पत्रकारिता की। आज वे दिल्ली में रहकर बंगाली समाज के अधिकारों के लिए निरंतर आवाज उठा रहे हैं। जब तृणमूल कांग्रेस के अत्याचारों से त्रस्त होकर बड़ी संख्या में परिवार पश्चिम बंगाल छोड़कर पलायन करने को मजबूर हो रहे थे, तब अरुण मुखर्जी ने दिल्ली में दो सौ से अधिक लोगों को अपने आश्रय में जगह दी। उन्होंने न केवल छत दी, बल्कि उनके पुनर्वास और सुरक्षा की व्यवस्था भी की।
लेफ्ट उदारवादी समूह अपने लोगों के छोटे-छोटे कार्यों का भी जोर-शोर से प्रचार करते हैं। अरविंद केजरीवाल जब संघ के स्वयंसेवक गोधिला जी के साथ काम कर रहे थे, तब उन्हें यह बात मानने में कठिनाई हुई कि समाज में ऐसे लोग भी हैं जो अपना पैसा खर्च करके निस्वार्थ सेवा करते हैं। अरविंद ने उन्हें एनजीओ और फंडिंग का गणित समझाया। गोधिला जी पुराने संघी थे, इसलिए उन्हें यह समझ नहीं आया कि समाज सेवा के नाम पर भी पैसा कमाया जा सकता है। अरविंद ने दिल्ली में रहकर न केवल धन अर्जित किया, बल्कि मुख्यमंत्री की कुर्सी भी हासिल की। दिल्ली की जनता के साथ उन्होंने क्या किया, यह लिखने की आवश्यकता नहीं।
अरुण मुखर्जी ने इतना कुछ करने के बावजूद कभी गर्व या अहंकार नहीं दिखाया। उनके अंदर कभी यह भाव नहीं आया कि “मैंने इतना बड़ा काम किया है।”
यदि यही काम किसी इरफान, गुफरान या मोहम्मद दीपक ने किया होता, तो अजीत अंजुम जैसे लोग ग्यारह हजार का शगुन देकर उनकी पंद्रह-बीस लाख की कमाई करा देते। कई यूट्यूबर ऐसे कामों से पैसा इकट्ठा कराकर अपना कमीशन भी लेते हैं। अजीत अंजुम कमीशन लेकर भी इतनी कमाई करा देते, तो लाभार्थी के लिए यह घाटे का सौदा नहीं होता।
यदि अरुण मुखर्जी ने भी बंगाल के पीड़ित हिंदुओं के प्रति समानुभूति न दिखाकर पचास बांग्लादेशी रोहिंग्याओं को अपने पास रख लिया होता, तो देशभर की मुख्यधारा की मीडिया और यू ट्यूबर्स के कैमरे उनकी ओर मुड़ जाते। अजीत अंजुम जैसा कोई अराजकता समर्थक यू ट्यूबर अरुणजी के लिए पैसे इकट्ठे कर रहा होता। वे कथित राष्ट्रीय नायक बन जाते। जो शाहीन बाग, किसान आंदोलन, जंतर मंतर जैसे किसी भी वामपंथ इको सिस्टम के इवेंट से दो—चार की संख्या में निकलते ही हैं। हो सकता था कि अरुण, रवीश कुमार के बाद एक और भारतीय पत्रकार के रूप में मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त कर लेते-पत्रकारिता के लिए नहीं, बल्कि रोहिंग्याओं को खिलाने के लिए।

दिल्ली में छठ महापर्व की भव्य तैयारियाँ: विश्व हिंदू परिषद व छठ समितियों का मंत्री कपिल मिश्रा से महत्वपूर्ण संवाद

4-3.jpeg

बृजेश कुमार राय
दिल्ली। आगामी छठ महापर्व को दिव्य, भव्य और सुव्यवस्थित रूप देने के लिए विश्व हिंदू परिषद के माननीय प्रांत अध्यक्ष एवं इंद्रप्रस्थ छठ पूजा महासंघ फाउंडेशन के संरक्षक आदरणीय श्री कपिल खन्ना जी के नेतृत्व में दिल्ली की विभिन्न छठ पूजा समितियों के प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली सचिवालय में दिल्ली सरकार के माननीय कला एवं संस्कृति मंत्री आदरणीय श्री कपिल मिश्रा जी से भेंट की। इस महत्वपूर्ण मुलाकात में समितियों की ओर से विस्तृत निवेदन-पत्र एवं सुझाव-पत्र सौंपा गया।
प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों से जुड़े कई आवश्यक मुद्दों को मंत्री जी के समक्ष रखा। इनमें घाटों की उचित व्यवस्था, स्वच्छता का विशेष ध्यान, पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम, पेयजल की उपलब्धता, चिकित्सा सुविधाएँ तथा अन्य मूलभूत सुविधाओं को सुनिश्चित करने की माँग प्रमुख थी। सभी प्रतिनिधियों ने इस बात पर जोर दिया कि छठ महापर्व के दौरान श्रद्धालु माताओं, बहनों और व्रतियों को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो।
माननीय मंत्री श्री कपिल मिश्रा जी ने सभी सुझावों को गंभीरतापूर्वक सुना और आश्वासन दिया कि माननीय मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता जी के नेतृत्व में दिल्ली सरकार इस वर्ष छठ महापर्व को पिछले वर्ष की तुलना में और अधिक दिव्य, भव्य, सुव्यवस्थित तथा श्रद्धामय स्वरूप में संपन्न कराने के लिए हर संभव सहयोग प्रदान करेगी। सरकार आवश्यक व्यवस्थाएँ सुनिश्चित करने के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है।
छठ महापर्व हमारी आस्था, संस्कृति, लोक परंपरा और सामाजिक समरसता का महान पर्व है। यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया की आराधना के माध्यम से परिवार, समाज और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। सभी श्रद्धालुओं को सुरक्षित, स्वच्छ और बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध हों, यही हम सबका सामूहिक संकल्प और प्रयास है। दिल्ली सरकार, विश्व हिंदू परिषद और विभिन्न छठ समितियों के संयुक्त प्रयासों से इस वर्ष का छठ महापर्व यादगार बनेगा।

scroll to top