19 जनवरी 1597 महाराणा प्रताप का निधन : उनके रहते अकबर चित्तौड़ पर अधिकार कर नहीं पाया था…

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जयपुर: भारतीय इतिहास के एक प्रकाशमान नक्षत्र हैं चित्तौड़ के राणा प्रताप। जो न किसी प्रलोभन से झुके और न किसी बड़े आक्रमण से भयभीत हुये । उन्होंने स्वाधीनता और स्वाभिमान के लिये जीवन भर संघर्ष किया और अकबर को पराजित किया ।

मुगल सेना ने चित्तौड़ पर चार बड़े आक्रमण किये। लेकिन किसी आक्रमण में वह चित्तौड़ पर अधिकार न कर पाया। चित्तौड़ पर मुगलों अधिकार राणाजी के जीवनकाल के बाद ही हो पाया। अकबर ने चार संदेश वाहक भी भेजे भारी प्रलोभन के साथ इनमें तीन राजा टोडरमल, बीरबल और राजा मानसिंह थे । पर कोई भी प्रलोभन उन्हे न डिगा सका और न किसी धमकी से वे भयभीत हुये ।

उनका जन्म 9 मई 1540 को और चित्तौड़ में राज्याभिषेक 28 फरवरी 1572 को हुआ। उनके जन्म स्थान के बारे में इतिहासकारों के दो अलग-अलग मत हैं। जेम्स टाॅड ने राणा जी का जन्म स्थान कुम्भलगढ किला माना है। जबकि इतिहासकार विजय नाहर ने पाली के राजमहल को राणा जी का जन्म स्थान माना। पाली राजमहल राणा जी का ननिहाल था । उनकी माता जयवंति बाई पाली महाराज सोनगरा की बेटी थीं।

इतिहासकार विजय नाहर की पुस्तक हिन्दुवा सूर्य महाराणा प्रताप के अनुसार महाराणा प्रताप के पिता महाराणा उदय सिंह ने युद्ध की नयी पद्धति “छापामार युद्धप्रणाली” आरंभ की थी। इसका कारण यह था कि भारतीय राजाओं के पास साधन कम थे और लगातार आक्रमणों से शक्ति क्षीण हो गई थी। जबकि हमलावरों के पास तोपखाने थे। इसलिये छापामार युद्ध शैली विकसित हुई। इसका उपयोग करके ही महाराणा प्रताप, महाराणा राज सिंह एवं छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुगलों पर सफलता प्राप्त की ।

इतिहास कार विजय नाहर ने दावा किया है कि महाराणा प्रताप मुग़ल सम्राट अकबर से कभी नहीं हारे। उलटे मुगल सेनापतियो को धूल चटाई । हल्दीघाटी के युद्ध में भी महाराणा प्रताप ही जीते और अकबर पराजित हुआ । हल्दीघाटी में मुगल सेना के पराजित होने के बाद अकबर स्वयं वर्ष 1576 में जून माह से से दिसम्बर तक तीन बार विशाल सेना के साथ चित्तौड पर आक्रमण करने आया, परंतु अकबर और उसकी सेना महाराणा को खोज ही नहीं पाए, बल्कि महाराणा के जाल में फँसकर मुगल सेना को पानी भोजन का भारी अभाव का सामना करना पड़ा। थक हारकर अकबर बांसवाड़ा होकर मालवा चला गया। पूरे सात माह मेवाड़ में रहने के बाद भी जब महाराणा प्रताप पर विजय न पा सका तो हाथ मलता हुआ अफगानिस्तान की ओर चला गया। मुगलों की ये सेनायें तीन बार शाहबाज खान के नेतृत्व में चित्तौड़ आईं थीं। पर असफलता ही हाथ लगी । उसके बाद अब्दुल रहीम खान-खाना के नेतृत्व में सेना भेजी गई । यह सेना भी भारी नुकसान उठाकर लौटी। 9 वर्ष तक निरन्तर अकबर पूरी शक्ति से महाराणा के विरुद्ध चित्तौड़ पर आक्रमण करता रहा। नुकसान उठाता रहा अन्त में थक हार कर उसने मेवाड़ की और देखना ही छोड़ दिया। यह महाराणा प्रताप का ही भय था कि अकबर अपनी राजधानी लाहौर ले गया। महाराणा प्रताप की मृत्यु केबाद अकबर पुनः अपनी राजधानी दिल्ली ले आया।

सम्राट अकबर किसी भी प्रकार राणा प्रताप को को अपने अधीन लाना चाहता था इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर 1572 ई. में जलाल खाँ प्रताप के पास गये । 1573 में राजा मानसिंह, और राजा, भगवानदास तथा राजा टोडरमल को प्रताप के पास समझाने के लिए भेजा। लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश किया । इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया । इसी के बाद हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध हुआ।

इतिहास कार विजय नाहर ने दावा किया है कि ऐसा कुअवसर प्रताप के जीवन में कभी नहीं आया कि उन्हें अकबर को सन्धि के लिए पत्र लिखना पड़ा हो। इन्हीं दिनों महाराणा प्रताप ने सुंगा पहाड़ पर एक बावड़ी का निर्माण करवाया और सुन्दर बगीचा लगवाया । महाराणा की सेना में एक राजा, तीन राव, सात रावत, 15000 अश्वरोही, 100 हाथी, 20000 पैदल और 100 वाजित्र थे। इतनी बड़ी सेना को खाद्य सहित सभी व्यवस्थाएँ महाराणा प्रताप करते थे। इतिहासकार का दावा है कि यह कुप्रचार अकबर की ओर से इतिहासकारों ने लिखा होगा कि अबकवर ने घास की रोटियाँ खाई और संधि प्रस्ताव भेजा । भवा बताइये यदि घास की रोटी खाते तच फिर ऐसा निर्माण कैसे हो सकता था जो उन्होंने किये । यदि संधि प्रस्ताव भेजते तो चित्तौड पर मुगलों का झंडा होता जो महाराणा जी जीवन में कभी न फहराया । उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में चित्तौड़ के किले की मरम्मत की, सम्पूर्ण मेवाड़ पर सुशासन स्थापित करते हुए उन्नत जीवन जिया ।

यदि राणा जी अकबर से पराजित होते या अभाव होता तो यह विकास और समृद्धि प्रयास संभव ही नहीं थे । अंततः 19 जनवरी 1597 में स्वाभिमान के साथ उन्होंने देह त्यागी। कहीं कहीं तिथि 29 जनवरी भी लिखी है।
कोटिशः नमन् परम् वीर यौद्धा राणा प्रताप जी को ।

जब एक बयान आईना बन जाए, सुबह की दो तस्वीरें, एक देश

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आगरा ज़िले के एक गाँव में सुबह होते ही गृह लक्ष्मी की आँख खुल जाती है। सूरज निकलते ही सबके लिए चाय बनानी है, फिर पंप चलाके पानी भरना, भैंस को चारा डालना, बच्चों के कपड़े धोना और ससुराल के लिए खाना बनाना। सिर पर दुपट्टा ठीक करते हुए वह दिन की फेहरिस्त मन ही मन दोहरा लेती है, खेत का काम, दोपहर का खाना, और शाम तक थकान से भरा एक और दिन। लक्ष्मी के लिए सुबह का मतलब सपनों की शुरुआत नहीं, ज़िम्मेदारियों की कतार है। स्कूल की किताबें कभी थीं, पर आठवीं के बाद वे अलमारी में नहीं, यादों में बंद हो गईं।

उसी वक़्त, चेन्नई के पास एक छोटे से क़स्बे में नागम्मा भी उठती है। वह जल्दी में है, मगर बेबसी में नहीं। नहाकर वह अपनी साड़ी संभालती है, मोबाइल पर बस का टाइम देखती है और माँ के हाथ की इडली खाकर दुकान के लिए निकल पड़ती है। वह एक रेडीमेड कपड़ों की दुकान में सहायक है। तनख़्वाह बहुत बड़ी नहीं, मगर अपनी है। शाम को उसे अकाउंट्स का छोटा सा कोर्स भी करना है। नागम्मा की सुबह में मेहनत है, मगर एक उम्मीद भी है, आगे बढ़ने की चाहत भी।

ये दो औरतें किसी टीवी बहस का हिस्सा नहीं हैं, न ही किसी सियासी बयान का हवाला। फिर भी, इन्हीं दो सुबहों के बीच वह फ़ासला छुपा है, जिसने हाल ही में देश की राजनीति को गरमा दिया। यह फ़ासला उत्तर और दक्षिण के बीच किसी दुश्मनी का नहीं, बल्कि सोच, मौक़ों और प्राथमिकताओं का है।

चेन्नई के एक कॉलेज में दिया गया एक बयान और पूरा देश बेचैन हो उठा। डीएमके सांसद दयानिधि मारन की बातों को “अपमानजनक”, “विभाजनकारी” और “देश तोड़ने वाली” कहा गया। टीवी स्टूडियो गरम हो गए, सियासी बयानबाज़ी तेज़ हो गई। लेकिन इस शोर-शराबे के पीछे एक कड़वी हक़ीक़त छिपी थी, जिसे भारत बरसों से कालीन के नीचे दबाता आया है, हमारे देश में औरतों की हालत हर जगह एक जैसी नहीं है।

बात कहने का तरीका भले सख़्त था, लेकिन नाराज़गी इस बात की ज़्यादा थी कि आईना बहुत पास रख दिया गया। क्योंकि अगर भावनाओं को एक तरफ़ रखकर आँकड़ों को देखा जाए, तो सच साफ़ नज़र आता है, दक्षिण भारत की औरतें, औसतन, ज़्यादा पढ़ी-लिखी हैं, ज़्यादा कामकाजी हैं, और कुछ हद तक स्वतंत्र भी हैं, जबकि उत्तर भारत के बड़े हिस्सों में हालात अब भी पीछे हैं।

यह उत्तर बनाम दक्षिण की लड़ाई नहीं है। यह इतिहास, नीतियों और राजनीतिक नीयत का सवाल है।

सबसे पहले तालीम की बात करें, औरतों की मज़बूती की पहली सीढ़ी। देश में महिला साक्षरता बढ़कर करीब 75 फ़ीसदी हो चुकी है, लेकिन इलाक़ाई फ़ासला अब भी बहुत बड़ा है। केरल में महिला साक्षरता करीब 94 फ़ीसदी है। यह यूँ ही नहीं हुआ, सालों की समाज सुधार मुहिम, सरकारी निवेश और शिक्षा को प्राथमिकता देने का नतीजा है। तमिलनाडु में भी लड़कियों के लिए छात्रवृत्ति, मुफ़्त साइकिल, लैपटॉप जैसी योजनाओं ने पढ़ाई को सपना नहीं, हक़ बनाया।

इसके मुक़ाबले उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में महिला साक्षरता अब भी 55 से 63 फ़ीसदी के बीच अटकी हुई है। कम उम्र में शादी, घर का बोझ, सुरक्षा की चिंता और स्कूलों की कमी, ये सब मिलकर लड़कियों को जल्दी पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर करते हैं। दक्षिण में जहाँ लड़कों-लड़कियों के बीच पढ़ाई का फ़ासला कम है, वहीं उत्तर में यह खाई बहुत गहरी है। यह महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं, बल्कि सोच और सियासत का नतीजा है।

पढ़ाई से रोज़गार का रास्ता निकलता है। यहाँ भी दक्षिण आगे है। तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में औरतों के लिए काम के मौके ज़्यादा हैं, फ़ैक्ट्रियाँ, कपड़ा उद्योग, स्वास्थ्य, शिक्षा। तमिलनाडु में तो देश की लगभग आधी महिला मैन्युफैक्चरिंग मज़दूर काम करती हैं। क्रेच, हॉस्टल और अपेक्षाकृत सुरक्षित माहौल ने औरतों को घर से बाहर निकलने का हौसला दिया।

उत्तर भारत में हालात बदल रहे हैं, यह सच है। उत्तर प्रदेश में महिलाओं की कामकाजी हिस्सेदारी हाल के सालों में बढ़ी है, ख़ासकर स्वयं सहायता समूहों के ज़रिये। लेकिन ज़्यादातर काम अब भी असंगठित है, बिना तनख़्वाह, बिना सुरक्षा, बिना पहचान। मजबूरी में किया गया काम सशक्तिकरण नहीं, बस गुज़ारा है।

असल आज़ादी तो वहाँ से शुरू होती है जहाँ औरत ख़ुद तय करे, कब शादी करनी है, कितने बच्चे हों, अकेले बाहर जाना है या नहीं, घर में उसकी बात सुनी जाएगी या नहीं। इन पैमानों पर भी दक्षिण बेहतर नज़र आता है। वहाँ शादी की उम्र ज़्यादा है, बच्चे कम हैं और फैसलों में औरतों की भागीदारी भी ज़्यादा है। उत्तर भारत के कई हिस्सों में आज भी कम उम्र की शादी, ज़्यादा बच्चे और “इज़्ज़त” के नाम पर पाबंदियाँ आम हैं। हिंसा को भी कई बार चुपचाप जायज़ ठहरा दिया जाता है।

यह कहना उत्तर की औरतों का अपमान नहीं है। उल्टा, यह मानना है कि उनके पैरों में ज़्यादा बेड़ियाँ हैं और उन्हें तोड़ने के औज़ार कम दिए गए हैं।
अफ़सोस यह है कि पूरी बहस उत्तर-दक्षिण की सियासी तकरार बनकर रह गई। जबकि सच्चाई यह है कि लैंगिक समानता में भारत दुनिया में 131वें नंबर पर है, यह हम सबके लिए शर्म की बात है। सवाल यह नहीं कि दयानिधि मारन माफ़ी माँगें या नहीं। असली सवाल यह है कि उत्तर भारत अपनी बेटियों से कब माफ़ी माँगेगा?

अब उत्तर भारत में तेज़ सामाजिक सुधार की ज़रूरत है, और वह टाली नहीं जा सकती। लड़कियों की पढ़ाई में बड़ा निवेश, बाल विवाह पर सख़्ती, सुरक्षित यातायात, महिलाओं के लिए रोज़गार, और साफ़ सियासी पैग़ाम कि लड़की की जगह सिर्फ़ रसोई या गोद नहीं है।

दक्षिण भारत कोई नैतिक सर्टिफ़िकेट नहीं दिखा रहा, बस एक कामयाब मॉडल पेश कर रहा है। यह साबित करता है कि जब सरकार लगातार औरतों के साथ खड़ी होती है, तो समाज भी धीरे-धीरे बदलता है।

भारत के पवित्र तीर्थ स्थलों की रूह: कंक्रीट और कारोबारी बाजार को भेंट

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बनारस: तीन दशक पहले मुरैना के 85 वर्षीय सीताराम एक ऐसी यात्रा पर निकले थे, जो आज की पीढ़ी के लिए लगभग कहानी बन चुकी है। नंगे पाँव बद्रीनाथ तक पैदल। न कोई टाइम-टेबल, न ऑनलाइन बुकिंग, न वीआईपी पास। हिमालय की पथरीली पगडंडियाँ, होंठों पर भजन, और तारों से ढकी रातों में साथ चलते अनजान लोग, यही उनकी दौलत थी। रास्ते में सब मिलकर सादी रोटियाँ खाते, एक सुर में “ॐ जय बद्रीनाथ-हरि” गाते। थकान होती थी, पर मन हल्का रहता था। लौटकर उन्होंने गोवर्धन की 21 किलोमीटर की परिक्रमा की। हर कदम भक्ति था। हर ठहराव एक कथा। बुज़ुर्गों से कृष्ण की लीलाएँ सुनते और भीतर कुछ बदलता हुआ महसूस करते।

आज सीताराम उस दौर को याद कर गहरी साँस लेते हैं। तीर्थयात्रा अब पैरों की नहीं, मशीनों की हो गई है। भजन की जगह हॉर्न हैं। कीर्तन पर मोबाइल की घंटियाँ भारी हैं। ठहरकर मनन करने की जगह जल्दबाज़ी है, सेल्फ़ी, रील, चेकलिस्ट। जो यात्रा कभी आत्मा को छूती थी, वह अब पर्यटन पैकेज बन गई है। सुविधाजनक है, तेज़ है, पर भीतर से ख़ाली। आस्था अब भी है, मगर सामूहिक अनुभूति और वह सुकून कहीं खो गया है। भारत के प्राचीन तीर्थ, जिन्हें सदियों तक साधना का केंद्र माना गया, आज सुनियोजित ढंग से बाज़ारू पर्यटन स्थलों में बदले जा रहे हैं। नतीजा, पर्यावरण की तबाही, संस्कृति का क्षरण और एक गहरा आध्यात्मिक संकट।

मैसूरु की चामुंडी पहाड़ियाँ इस बदलाव की साफ़ तस्वीर हैं। 1,058 मीटर ऊँची यह पहाड़ी देवी चामुंडेश्वरी का धाम है। कभी भक्त पुराने पत्थरों की सीढ़ियाँ चढ़ते थे। अब यहाँ “सौंदर्यीकरण” के नाम पर 45 करोड़ रुपये की योजना उतर आई है। PRASHAD योजना, जो तीर्थ सुविधाएँ बढ़ाने का दावा करती है, यहाँ चौड़ी सड़कें, रोपवे, एम्फ़ीथिएटर और दो हज़ार गाड़ियों की पार्किंग ले आई। यह सब एक नाज़ुक पारिस्थितिकी पर, जहाँ ज़रा-सी छेड़छाड़ भूस्खलन बुला सकती है। स्थानीय लोग, पर्यावरणविद्, मंदिर प्रबंधन, सबने पर्यावरण प्रभाव आकलन की माँग की। पर काम चलता रहा। जनवरी 2026 में विरोध भड़का, तब जाकर रुका। हाईकोर्ट ने भी चेताया, 200 से ज़्यादा वनस्पतियाँ और संकटग्रस्त काला हिरण ख़तरे में हैं। सवाल सीधा है: क्या राजनीति इस पवित्र पहाड़ी को कंक्रीट का जंगल बना देगी?

यह कहानी एक जगह की नहीं। वाराणसी का काशी विश्वनाथ कॉरिडोर भीड़ तो बढ़ाया है, पर गंगा को साफ़ नहीं कर पाया। हज़ारों करोड़ खर्च हुए, फिर भी नदी में गंदगी बह रही है। जो गंगा शुद्धि की प्रतीक थी, वह कई जगह ज़हरीली जीवनरेखा बन चुकी है। वृंदावन में यमुना और भी बदहाल है, अमोनिया, झाग, मरी हुई मछलियाँ। फिर भी करोड़ों श्रद्धालु आते हैं। ढाँचा चरमरा रहा है, नदी दम तोड़ रही है।

चारधाम परियोजना ने हिमालय को और असुरक्षित बना दिया। रास्ते चौड़े हुए, पहाड़ कटे, विस्फोट हुए। नतीजा, भूस्खलन, धँसते गाँव, जोशीमठ जैसा संकट। पहाड़ों में विकास का मतलब अगर बुलडोज़र है, तो यह विकास नहीं, निमंत्रण है आपदा को।

धीरे-धीरे साधना लेन-देन बन रही है। केदारनाथ में हेलिपैड, आश्रमों की जगह लग्ज़री रिसॉर्ट। दर्शन समयबद्ध। वैष्णो देवी में लोग कहते हैं, आध्यात्मिक माहौल कम हो गया है। दुआ से ज़्यादा ध्यान तस्वीरों पर है। शांति पर शोर हावी है।

आर्थिक दावे भी अधूरे सच हैं। अयोध्या जैसे प्रोजेक्ट्स में कमाई का बड़ा हिस्सा बाहरी ठेकेदारों के पास जाता है। स्थानीय लोगों को मिलती है महँगाई। किराए तीन गुना तक बढ़ते हैं। जंगल कटते हैं, प्लास्टिक जमा होता है। पवित्र इलाक़ों में शराब-मांस की दुकानें घुस आती हैं। पुजारी मैनेजर बन जाते हैं। दर्शन एक जल्दबाज़ी का दृश्य बन जाता है। भीतर की यात्रा बस टिक-मार्क।

यह संकट सिर्फ़ भारत का नहीं। मक्का, वेटिकन, बोधगया, हर जगह भीड़, कचरा, प्रदूषण और आध्यात्मिकता का पतलापन। ओवर-टूरिज़्म भक्ति की आत्मा को घिस देता है।

हल हैं, आगंतुक सीमा, इको-ज़ोन, पैदल क्षेत्र, ज़ीरो-प्लास्टिक नियम, और समुदाय के हाथ में प्रबंधन। पर राजनीतिक इच्छाशक्ति कमज़ोर है। तात्कालिक फ़ायदे भारी हैं।

कभी पहाड़ विनम्रता सिखाते थे। नदियाँ नवजीवन का गीत गाती थीं। आज वे चेतावनी दे रही हैं। अगर बुलडोज़र यूँ ही चलते रहे, तो हम सिर्फ़ प्रकृति और विरासत नहीं खोएँगे, हम आस्था की रूह को कंक्रीट और नीयॉन के नीचे दफ़्न कर देंगे। चुनाव हमारे हाथ में है, इन स्थलों को आत्मिक परिवर्तन का केंद्र बनाएँ, या उन्हें कारोबार के हवाले कर दें। यही तय करेगा कि भारत की पवित्र विरासत ज़िंदा रहेगी, या सिर्फ़ उनसे जुड़े कहानी किस्से, यादों में।

हर व्यक्ति के आचरण में हो सामाजिक समरसता : श्री रामदत्त चक्रधर

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रायपुर | विश्व संवाद केंद्र छत्तीसगढ़ द्वारा प्रकाशित ‘समरस छत्तीसगढ़ विशेषांक’ का विमोचन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रान्त कार्यालय जागृति मंडल में शनिवार को सम्पन्न हुआ. इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप माननीय सह सरकार्यवाह श्री रामदत्त चक्रधर एवं कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रान्त संघचालक माननीय डॉ टोपलाल वर्मा जी ने की.

विमोचन के अवसर पर श्री रामदत्त चक्रधर जी ने कहा, भारत वर्ष का इतिहास एवं समाज जीवन की रचना अत्यंत प्राचीन है, जो समाज जितना प्राचीन होता है उतना ही उतार-चढ़ाव देखता है. समाज जब एक रस होता है तो उत्थान की ओर अग्रसर होता है. शरीर के अंगों के काम अलग-अलग हैं, लेकिन सबके अंदर एक रस है. किसी अंग को चोट लगती है तो हर अंग अपनी प्रतिक्रिया देता है. हमारे किसी भी ग्रन्थ में विषमता का कोई उल्लेख नहीं है. आदरणीय डॉ बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर भी यह बात कहते हैं. भारतीय साहित्य में कहीं विषमता और शोषण का उल्लेख नहीं है लेकिन फिर भी समाज में विकृति आई, उसके पीछे सबसे बड़ी वजह हम अपना स्वत्व और मूल राष्ट्रीय चरित्र को भूलना था. इस्लामिक एवं अंग्रेजों के शासन के समय समाज को तोड़ने का कार्य हुआ इसके बाद भी समाज में लोगों ने कठिन से कठिन कार्य स्वीकार्य कर लिया लेकिन धर्म और अपनी संस्कृति को नहीं छोड़ा.

पूज्य बाबा साहब के आदर्श, उनका चिंतन हमें स्मरण करना होगा. आज समाज में समरसता के विषय में बहुत अच्छे कार्य हुए, ऋषि मुनियों और महान पुरुषों के योगदान से विषमता कम हुई है लेकिन फिर भी समाज में समरसता हेतु प्रबोधन की आवश्यकता है.संत पूज्य रैदास, महान वीर सावरकर, पं मदन मोहन मालवीय जी समेत अनेक समाज सुधारकों व माँ भारती के सपूतों ने समरसता के लिए प्रयास किया जिससे आज हमारा समाज समरस है. पूज्य बाबा गुरु घासीदास ने मनखे-मनखे एक समान का मंत्र दिया, उसे देश ही नहीं विश्व को अपनाना होगा. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्धा शिविर में महात्मा गांधी संघ की शाखा में आए तो स्वयंसेवकों से परिचय किया. किसी ने जाति का परिचय नहीं दिया तो वह आश्चर्यचकित रह गए, उन्होंने शाखा कार्य पद्धति की प्रशंसा की. इसी तरह पूज्य बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर ने भी संघ की शाखा में सामाजिक समरसता का जो भाव देखा उसकी प्रशंसा की.
कार्यक्रम में प्रान्त प्रचारक श्री अभय राम जी, प्रान्त प्रचार प्रमुख संजय तिवारी, रायपुर महानगर संघचालक श्री महेश बिड़ला, सह प्रान्त प्रचार प्रमुख नीरज समेत बड़ी संख्या में प्रबुद्ध जन उपस्थित रहे.

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