A.R. Rahman’s Revelation: Less Work in Bollywood Over 8 Years, But Not Due to Discrimination

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Mumbai : In a recent interview, A.R. Rahman mentioned receiving less work in Bollywood over the past 8 years, linking it to changes in power structures, the influence of non-creative people, and possibly a communal atmosphere. However, directly attributing this to “not getting work because he is Muslim under the Modi government” is factually incorrect and exaggerated.

Rahman’s statement pertains to Bollywood (a private industry), not government jobs or projects assigned by the Modi government. The government does not directly provide work in the film industry.

01. Rahman’s comment is about Bollywood (private industry), not government employment or projects given by the Modi government. The government does not directly assign work in films.

2. During the Modi government’s tenure, Rahman has received 3 National Awards (out of his total 7), which are government honors—this counters any claim of discrimination.

3. In Bollywood, Muslim superstars like Shah Rukh Khan, Salman Khan, and Aamir Khan remain at the top even today; many Muslim artists continue to work actively.

4. Rahman himself is busy with South Indian films and global projects (such as Ramayana)—the reduction is only in Hindi films, which appears linked to industry changes (corporatization, influence of music labels), not religion.

5. Associates like Javed Akhtar and others have stated there is no communal angle; work depends on talent and networks.

This claim, when given a political color, becomes exaggerated, while the facts point in the opposite direction.

रोजा से रामायण तक: एआर रहमान क्यों कहते हैं बॉलीवुड ने दूरी बनाई?

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मुम्बई। एआर रहमान के हालिया इंटरव्यू में बॉलीवुड में काम कम मिलने की बात ने चर्चा बटोरी है, लेकिन इसे सीधे मोदी सरकार या धार्मिक भेदभाव से जोड़ना अतिरंजित और तथ्यों से परे है।

रहमान ने बीबीसी एशियन नेटवर्क को दिए इंटरव्यू में कहा कि पिछले 8 सालों में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में उनके लिए काम कम हुआ है। उन्होंने इसे पावर स्ट्रक्चर में बदलाव से जोड़ा, जहां अब नॉन-क्रिएटिव लोग फैसले ले रहे हैं। उन्होंने “कम्यूनल थिंग” का जिक्र किया, लेकिन स्पष्ट किया कि यह उनके सामने नहीं, बल्कि “चीनी व्हिस्पर्स” की तरह सुना गया है। वे इसे व्यक्तिगत रूप से नहीं लेते और कहते हैं कि वे परिवार के साथ समय बिताने में खुश हैं, काम की तलाश नहीं करते।

यह बयान प्राइवेट इंडस्ट्री (बॉलीवुड) के बारे में है, न कि सरकारी नीतियों या मोदी सरकार द्वारा दिए प्रोजेक्ट्स का। फिल्म इंडस्ट्री में सरकार डायरेक्ट काम नहीं देती। उल्टा, मोदी सरकार के दौरान रहमान को 3 नेशनल अवॉर्ड्स मिले हैं (उनके कुल 7 में से), जो सरकारी सम्मान हैं और किसी भेदभाव की बात को खारिज करते हैं।

बॉलीवुड में आज भी शाहरुख खान, सलमान खान, आमिर खान जैसे मुस्लिम सुपरस्टार्स टॉप पर हैं और कई मुस्लिम कलाकार सक्रिय हैं। जावेद अख्तर और शान जैसे सहयोगी भी कहते हैं कि कोई कम्यूनल एंगल नहीं है—काम प्रतिभा, नेटवर्क और उपलब्धता पर निर्भर करता है।

रहमान खुद साउथ फिल्मों में व्यस्त हैं और ग्लोबल प्रोजेक्ट्स पर फोकस कर रहे हैं। वे रामायण (नितेश तिवारी की फिल्म) के लिए हंस जिमर के साथ संगीत बना रहे हैं, जो हिंदू-मुस्लिम-यहूदी कलाकारों का सहयोग है। अंतरराष्ट्रीय सफलता (ऑस्कर, ग्रैमी) और एआई जैसे विषयों पर भी वे खुलकर बोलते हैं।

कुल मिलाकर, बॉलीवुड में कमी इंडस्ट्री के बदलावों (कॉर्पोरेटाइजेशन, म्यूजिक लेबल्स का प्रभाव) से जुड़ी लगती है, न कि धर्म से। रहमान का बयान राजनीतिक रंग देकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है, जबकि तथ्य उनके करियर की विविधता और सरकारी सम्मानों से विपरीत दर्शाते हैं।

सत्यजीत रे से TVS तक: जब बंगाल ने भाषण चुना और तमिलनाडु ने आर्थिक नतीजे

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कोलकाता । शाम की सैर, ठंडी हवा, एक मासूम-सा मज़ाक, और अचानक एक कड़वी सच्चाई सामने आ गई।
पार्क की पगडंडी पर टहलते हुए मेरी मुलाक़ात हमारे बेहद तहज़ीबदार बंगाली बैंक मैनेजर, चटर्जी बाबू से हो गई। हल्के-फुल्के अंदाज़ में पूछ लिया,
“तो चटर्जी बाबू, 1 अप्रैल को रिटायरमेंट के बाद कोलकाता की ट्रेन पकड़ रहे हैं?”

वो जैसे ठिठक गए। भौंहें ऐसे उठीं, मानो बैलेंस शीट में कोई जानलेवा गलती पकड़ ली हो।
आधे मुस्कराते हुए बोले,

“अभी दिमाग़ EMI क्लोज़िंग मोड में नहीं गया है। बच्चे बेंगलुरु में सेटल हैं। फ्लैट है, लिफ्ट है, सिक्योरिटी है, पास में अस्पताल है। बंगाल में अब बचा ही क्या है? कुछ बचपन की यादें… कुछ धुंधली तस्वीरें… बस।”

बस, यही था वो अनकहा इक़रार। उस पूरी पीढ़ी का जो तरक़्क़ी की तलाश में घर से निकली और फिर पलटकर नहीं देख सकी। उनका इशारा साफ़ था, कौन लौटे उस ज़मीन पर, जहाँ तक़रीर बहुत है, तरक़्क़ी लंगड़ाती है, टकराव हमेशा रहता है और मौक़े थोड़े वक़्ती होते हैं?

यह मामूली-सी बातचीत एक बेहद असहज सवाल खड़ा करती है:
आख़िर कैसे पश्चिम बंगाल, जो कभी आज़ादी के बाद भारत की बौद्धिक, औद्योगिक और आर्थिक मशाल था, तमिलनाडु से इतना पीछे छूट गया, जबकि तमिलनाडु ख़ामोशी से तरक़्क़ी की पहली कतार में जा बैठा?

1950 के दशक में तस्वीर बिल्कुल अलग थी। पश्चिम बंगाल की साक्षरता दर तमिलनाडु से ज़्यादा थी। राष्ट्रीय औद्योगिक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी लगभग दोगुनी थी। प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से काफ़ी ऊपर थी। कोलकाता उद्योग, शिक्षा और संस्कृति का मरकज़ था। मद्रास प्रेसीडेंसी तब साफ़ तौर पर पीछे चल रही थी।

उस दौर का कोई भी अर्थशास्त्री या नीति-निर्माता यह सोच भी नहीं सकता था कि कुछ दशकों में यह समीकरण पूरी तरह उलट जाएगा।
लेकिन आज हालात बिल्कुल पलट चुके हैं। तमिलनाडु में साक्षरता 85 प्रतिशत से ऊपर है, मज़बूत मैन्युफैक्चरिंग बेस है, ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स के वर्ल्ड-क्लास हब हैं, और IT व सर्विस सेक्टर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। प्रति व्यक्ति आय ₹3 से 4 लाख के बीच पहुँच चुकी है।

वहीं पश्चिम बंगाल अच्छी-ख़ासी साक्षरता के बावजूद सिमटते उद्योग, घटते रोज़गार और ₹1.5 से 2 लाख के बीच अटकी आय से जूझ रहा है।
तो ग़लती कहाँ हुई?

जवाब क़िस्मत में नहीं, फ़ैसलों में छुपा है, राजनीतिक, वैचारिक और प्रशासनिक फ़ैसलों में।

आज़ादी के बाद तमिलनाडु ने व्यावहारिकता को चुना। सबसे पहले इंफ़्रास्ट्रक्चर पर ध्यान दिया, डैम, सड़कें, औद्योगिक क्षेत्र। शिक्षा संस्थानों का योजनाबद्ध विस्तार हुआ। 1958 में गिंडी इंडस्ट्रियल एस्टेट सिर्फ़ एक परियोजना नहीं था, बल्कि इरादों का ऐलान था।

1991 में उदारीकरण आया तो तमिलनाडु ने विरोध नहीं किया, उस पर टूट पड़ा। निर्यात आधारित उद्योग, IT पार्क, स्किल डेवलपमेंट और निवेश-अनुकूल माहौल ने राज्य को आर्थिक इंजन बना दिया।

द्रविड़ राजनीति को उत्तर भारत में अक्सर मज़ाक़ बनाया जाता है, लेकिन यहाँ उसे श्रेय देना होगा। उसने सामाजिक न्याय और कल्याण की बात की, मगर उद्योग से दुश्मनी नहीं पाल ली। शिक्षा और स्वास्थ्य को ख़ैरात नहीं, निवेश समझा गया। उद्यमिता को शैतान नहीं बनाया गया। TVS जैसे उद्योग समूह सिस्टम के बावजूद नहीं, बल्कि सिस्टम की वजह से फले-फूले। खेती, उद्योग और सेवाएँ, तीनों साथ आगे बढ़ीं।

बंगाल की कहानी ठीक उलटी है, दर्दनाक और ख़ुद की बनाई हुई।

दरारें जल्दी दिखने लगी थीं। फ़्रेट इक्वलाइज़ेशन पॉलिसी ने कोयला और स्टील जैसे प्राकृतिक फ़ायदों को कमज़ोर कर दिया। बँटवारे के बाद शरणार्थियों का भारी बोझ पड़ा।

असली झटका 1977 में लगा, जब लेफ़्ट फ़्रंट का 34 साल लंबा, बिना रुके शासन शुरू हुआ।

ईमानदारी से कहें तो शुरुआती सालों में नतीजे आए। ज़मीन सुधारों से किसान मज़बूत हुए। 1980 के दशक में कृषि वृद्धि शानदार रही, बंगाल चावल निर्यातक बन गया। ग़रीबी घटी, यह सच है।

लेकिन फिर कहानी वहीं ठहर गई, जैसे कोई सरकारी बंद। नक्सलवाद, लेनिनवाद, माओवाद, आक्रामक यूनियनवाद, बार-बार की हड़तालें, पूंजी के प्रति वैचारिक नफ़रत और “एंटी-इंडस्ट्री” राजनीति के रोमांटिक नारे, इन सबने निवेशकों को डरा दिया। फैक्ट्रियाँ बंद हुईं, पूंजी भाग गई। डी-इंडस्ट्रियलाइज़ेशन कोई हादसा नहीं था, बल्कि लापरवाही से बनी नीति थी।

धीरे-धीरे शासन एक “पार्टी-सोसायटी” में बदल गया, जहाँ पार्टी कार्ड ही नौकरी, ठेके और ज़िंदगी का पासपोर्ट बन गया। नवाचार दम घुटने लगा। प्रतिस्पर्धा शक़ के दायरे में आ गई। असहमति ख़तरनाक हो गई।

1990 के दशक में जब उदारीकरण की हवा चली, बंगाल खिड़की पर खड़ा हाथ बाँधे देखता रहा।
सिंगूर और नंदीग्राम अलग-अलग घटनाएँ नहीं थीं, वे लक्षण थे। गाँव नाराज़ हुए, मिडिल क्लास मायूस हुआ, और 2011 में सत्ता हाथ से निकल गई। मगर तब तक नुक़सान बहुत गहरा हो चुका था।

तो क्या बंगाल की तबाही के लिए सिर्फ़ कम्युनिज़्म ज़िम्मेदार है? यह सतही विश्लेषण है। केरल इस तर्क को तोड़ देता है। वहाँ भी वामपंथ रहा, लेकिन सत्ता बदलती रही, जवाबदेही बनी रही। शिक्षा और स्वास्थ्य पर लगातार निवेश हुआ। मानव विकास ऊँचा रहा, बिना उद्योग को तबाह किए। समस्या विचारधारा नहीं थी, समस्या थी अहंकार और सुधार से इनकार।

ऊपर से बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ का जटिल मसला। लाखों अवैध प्रवासियों ने सस्ता श्रम दिया, मगर स्थानीय रोज़गार पर दबाव बढ़ा, मज़दूरी घटी और सार्वजनिक सेवाओं पर बोझ पड़ा। पहचान की राजनीति तेज़ हुई, शासन और कमज़ोर हुआ। यह मूल कारण नहीं था, लेकिन जलती आग में पेट्रोल ज़रूर था।

नतीजा सख़्त और असुविधाजनक है:
तमिलनाडु आगे बढ़ा क्योंकि उसने वक़्त के साथ ख़ुद को बदला। बंगाल पीछे रह गया क्योंकि उसने बदलने से इनकार कर दिया।
लचीलापन जीता, जमी हुई विचारधारा हारी।

यह कहानी सिनेमा में भी उतनी ही साफ़ दिखती है, जितनी अर्थव्यवस्था में।
एक ज़माना था जब बंगाली सिनेमा भारतीय सिनेमा की आत्मा था। सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, ये सिर्फ़ फ़िल्मकार नहीं, संस्थान थे। सोच, संवेदना और सामाजिक यथार्थ, बंगाल ने मानक तय किए।

लेकिन धीरे-धीरे इकोसिस्टम टूट गया। संस्थागत समर्थन ख़त्म हुआ, बाज़ार की हक़ीक़तों को नज़रअंदाज़ किया गया।
दक्षिण भारत ने सिनेमा को उद्योग की तरह देखा। तकनीक, स्केल, मार्केटिंग, कहानी, हर चीज़ में निवेश किया। आज तमिल, तेलुगु और कन्नड़ फ़िल्में न सिर्फ़ बॉलीवुड से मुक़ाबला कर रही हैं, बल्कि कई मामलों में उसे पछाड़ भी रही हैं।

उद्योग से विचार तक, फैक्ट्रियों से फ़िल्मों तक, पैटर्न एक ही है।
बंगाल ने अतीत की यादों को चुना।
तमिलनाडु ने भविष्य को।
और चटर्जी बाबू?
वो बेंगलुरु में रिटायर होंगे, उन लोगों की तरह, जो कभी मानते थे कि कल का भारत बंगाल में जन्म लेता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारत का संविधान

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श्री गुरुजी की प्रतिबद्धता (1948)

दिल्ली । संघ पर प्रतिबन्ध हटने के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने श्रीगुरुजी को भारत के ध्वज एवं संविधान के प्रति निष्ठावान रहने का सुझाव दिया था। इसी से संघ का विरोध करने वालों को मौका मिल गया कि संघ को भारत के ध्वज एवं संविधान में आस्था नहीं है। जबकि श्रीगुरुजी पहले ही 2 नवम्बर 1948 को संविधान एवं उससे जुड़े सभी अवयवों के प्रति निष्ठा का स्पष्टीकरण दे चुके थे।

उनका वक्तव्य इस प्रकार था, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विषय में ध्वज सम्बन्ध में अत्यंत प्रत्यनपूर्वक भ्रम फैलाया जा रहा है। विधान परिषद ने यह निर्णय कर लिया है कि हमारे राज्य का कैसा ध्वज हो। स्वातंत्र्य प्राप्ति के पश्चात राज्य ने उस ध्वज को स्वीकार किया है और इस कारण वह ध्वज इस देश के नागरिकों का श्रद्धाभाजन है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अपना ध्वज है जोकि हिन्दू जाति की सांस्कृतिक एकता निर्माण करने के उद्देश्य का प्रतीक है और इस कारण वह स्वाभाविकतया पुरातन भगवाध्वज है जोकि हिन्दू संस्कृति के त्याग और आत्मसमर्पण की भावना का दिग्दर्शक है। सभी गैर-सरकारी संस्थाओं का अपना ध्वज है; कांग्रेस का भी है जो राजध्वज से भिन्न है। निःसंदेह ऐसा होना भी चाहिए।

राजध्वज का उपयोग केवल राजकीय कार्यों तथा उत्सवों में, राजकीय भवनों पर तथा अधिकृत राज्य अधिकारियों द्वारा ही होना चाहिए, किसी भी गैर-सरकारी संस्था अथवा व्यक्ति द्वारा नही। सचमुच किसी गैर-सरकारी दल अथवा संस्था को, चाहे वह कितनी बड़ी अथवा जनप्रिय ही क्यों न हो, राज्य ध्वज अथवा उसके समान किसी ध्वज को, जिसके कारण जनता के मन में भ्रम उत्पन्न हो जाए, उपयोग करने का अधिकार नहीं है। इस कारण अपने ध्वज के प्रति परिपूर्ण भक्ति रखते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, राज्य के अंग होने के कारण, राज्यध्वज के प्रति सम्पूर्ण श्रद्धा रखता है और मैं बिना किसी संकोच के कह सकता हूँ कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रत्येक सदस्य किसी भी आक्रमणकारी से राज्य ध्वज की रक्षा करने के लिए अपना जीवन सहर्ष दे देगा।”

श्रीगुरुजी ने भारतीय संविधान में निहित राष्ट्रीय ध्वज के प्रति संघ की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा था, “संघ के स्वयंसेवक अपने राज्य के ध्वज को वैसे ही सम्मान की दृष्टि से देखते है, जैसे दूसरे नागरिक; क्योंकि राज्य ध्वज का निर्माण राज्य ने किया है।”

महात्मा गांधी की हत्या के पश्चात संघ पर लगे प्रतिबन्ध के चलते श्रीगुरुजी को गिरफ्तार किया गया था। जेल में 10 जुलाई 1949 को अखिल भारतीय जनाधिकार समिति के अध्यक्ष, मौली चंद्र शर्मा ने बेतुल जेल में श्रीगुरुजी से मुलाकात की। वार्ता के पश्चात श्रीगुरुजी ने एक पत्र संघ के कार्यों की स्पष्टता हेतु लिखा। इसमें भारतीय संविधान में निहितराष्ट्रीय ध्वज पर निष्ठा की बात कहते हुए उन्होनें लिखा, “ध्वज का संरक्षण व सम्मान हर नागरिक के नाते हमारे लिए भी गौरवपूर्ण है।“

तिरंगा ध्वज (1947 से वर्तमान समय तक)

1947 के बाद से केंद्र की सभी सरकारों द्वारा बनाये नियमों से ध्वज भारत के नागरिकों के बीच लोकप्रिय नहीं था। इसलिए राष्ट्रीय पर्वो पर ध्वज फहराने की परंपरा संघ ही नहीं बल्कि किसी भी अन्य संस्था में नहीं बन सकी। अतः जब केंद्र सरकार ने समाधान की कोई पहल नहीं की तो न्यायपालिका ने इस सन्दर्भ में एक ऐतिहासिक कदम उठाया। 22 सितम्बर 1995 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि लोग अपने घरों पर ध्वज फहरा सकते हैं। न्यायमूर्ति डी.पी. वाधवा और न्यायमूर्ति एम.के. शर्मा ने उद्यमी नवीन जिंदल की एक याचिका पर यह आदेश दिया था। बाद में यह इस फैसलें को सर्वोच्च न्यायालय में भी चुनौती दी गयी लेकिन अंततः फैसला नागरिकों के पक्ष में आया। इस प्रकार देश में किसी भी संस्था द्वारा सबसे पहले ध्वज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक के.सी. सुदर्शन जी ने 26 जनवरी 2002 को नागपुर में संघ के मुख्यालय के भवन पर फहराया। तब से लेकर आजतक यह प्रक्रिया जारी है।

तिरंगा ध्वज के सम्बन्ध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी कहते हैं, “तिरंगे झंडे के जन्म से, उसके सम्मान के साथ संघ का स्वयंसेवक जुड़ा है। मैं आपको सत्य घटना बता रहा हूँ। निश्चित होने के बाद, उस समय तो चक्र नहीं था, चरखा था ध्वज पर। पहली बार फैजपुर के कांग्रेस अधिवेशन में उस ध्वज को फहराया गया था, अस्सी फीट ऊँचा ध्वजस्तंभ लगाया था। नेहरू जी उसके अध्यक्ष थे। झंडा बीच में लटक गया। ऊपर पूरा जा नहीं सका और इतना ऊँचा चढ़कर उसको सुलझाने का साहस किसी का नहीं था। एक तरुण भीड़ में से दौड़ा वह सटा-सट उस खंबे पर चढ़ गया, उसने रस्सियों की गुत्थी सुलझाई, ध्वज को ऊपर पहुँचाकर नीचे आ गया। तो स्वाभाविक लोगों ने उसको कंधों पर लिया और नेहरू जी के पास लेकर गए, नेहरू जी ने उसकी पीठ थपथपाई और कहा कि तुम शाम को खुले अधिवेशन में आओ तुम्हारा अभिनंदन करेंगे लेकिन फिर कुछ नेता आए और कहा कि उसको मत बुलाओ, वह शाखा में जाता है। जलगाँव में फैजपुर के रहने वाले श्री किशन सिंह राजपूत वह स्वयंसेवक थे। पाँच-छः वर्ष पहले उनका देहान्त हो गया। डॉ. हेडगेवार को पता चला तो वे प्रवास करके गए। उन्होंने उनको एक छोटा-सा चाँदी का लोटा पुरस्कार के रूप में भेंट कर उसका अभिनंदन किया। तिरंगा पहली बार फहराया गया तब से इसके सम्मान के साथ स्वयंसेवक जुड़ा है।“

प्रजा परिषद आन्दोलन (1948-2020)

स्वाधीन भारत में जम्मू और कश्मीर के पृथक संविधान के विरुद्ध पहली एवं निर्णायक लड़ाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने लड़ी।भारत की एकता, अखंडता और संविधान की सार्वभौमिकता को अक्षुण्णबनाए रखने के लिए न सिर्फ स्वयंसेवकों ने अपना बलिदान दिया बल्कि इसमें निर्णायक विजय भी प्राप्त की। यह स्वाधीन भारत में ‘प्रजा परिषदसत्याग्रह’ के नाम से पहला बड़ा एक आंदोलन था जिसका नेतृत्व जम्मू और कश्मीर के प्रेमनाथ डोगरा कर रहे थे।

भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे बलराज मधोक प्रजा परिषद के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘कश्मीर जीत में हार’ में इस सत्याग्रह बारे में लिखा है। उनके अनुसार 1947 में जम्मू इलाकें में सबसे प्रभावशाली संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ था लेकिन वह राजनैतिक नहीं था। इसकी पहली शाखा जम्मू नगर में 1940 में शुरू हुई। उस दौरान मधोक लाहौर में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। इस दौरान एक स्थानीय जगदीश अब्रोल भी संघ से जुड़ गये। मधोक लिखते है कि जगदीश अब्रोल ने ही पंडित प्रेमनाथ डोगरा को जम्मू का संघचालक बनने के लिए राजी किया था।

अतः पंडित डोगरा ने 1948 में प्रजा परिषद् के माध्यम से जम्मू और कश्मीर के पृथक संविधान, प्रधानमंत्री और ध्वज के विरुद्ध अभियान छेड़ा,जिसे जनसंघ संस्थापक-अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने का भी पूर्ण समर्थन हासिल हुआ। इस सत्याग्रह के दौरान संघ के स्वयंसेवकों ने देशभर में जनसभाएँ की और प्रचार तथा जनजागरण का कार्य किया। गाँव-गाँव जाकर लोगों को भारत के साथ जम्मू और कश्मीर के पूर्ण अधिमिलन के महत्व के बारे में बताया। अवैध गिरफ्तारियों, लाठी-चार्ज और दमन के बावजूद भी स्वयंसेवकों ने आंदोलन को जीवित रखा। भारत के संविधान की सार्वभौमिकता बनाये रखने के इस अभियान में संघ के स्वयंसेवकों ने अपने प्राणों का भी बलिदान दिया।

यह सत्याग्रह जम्मू-कश्मीर के ‘प्रधानमंत्री’ शेख अब्दुल्ला की अलगाववादी नीतियों, जिन्हें भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का भी समर्थन मिला हुआ था, उसके विरुद्ध था। एक ही देश में दो प्रधानमंत्री, दो संविधान और दो ध्वज कैसे हो सकते है? इसलिए श्रीगुरूजी ने भी कहा था, “कश्मीर को सुरक्षित रखने का एकमात्र तरीका उसका भारतीय संघ में पूर्ण विलय है। अनुच्छेद 370 के साथ-साथ पृथक ध्वज एवं पृथक संविधान को समाप्त करना आवश्यक है।“

संघ ने शुरुआत से संविधान में निहित भारत की एकता एवं अखंडता बनाये रखने के उद्देश्य से ही जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी तत्वों का विरोध किया। अंतत इस लम्बी लड़ाई का सुखद नतीजा 2020 में आया, जब अनुच्छेद 370 को भारत की संसद ने सर्वसम्मति से निरस्त कर दिया। अतः संघ के कार्यकारी मंडल द्वारा भारत सरकार का अभिनंदन करते हुए कहा गया कि भारतीय संविधान को जम्मू कश्मीर राज्य में पूर्णरूप से लागू‌ करने एवं राज्य के पुनर्गठन का निर्णय एक स्वागत योग्य कदम है। देशवासियों से आवाहन किया गया कि संविधान की सर्वोच्चता एवं मूलभावना को स्थापित करने के लिए वे राजनैतिक मत-भिन्नताओं से ऊपर उठें और जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख की विकासयात्रा में बढ़-चढ़कर योगदान देते हुए राष्ट्र की एकता एवं अखंडता को पुष्ट करें।

श्रीगुरूजी का प्रथम गणतंत्र दिवस पर वक्तव्य (1950)

आज हमारा अपना संविधान कार्यान्वित हुआ है। ब्रिटिश राज्य मंडल से हमारे सम्बन्ध की अंतिम कड़ी भी टूट गई और ब्रिटिश शासन के प्रतीक ताज के स्थान पर अशोक चक्र स्थापित हो गया है। हम अब नैतिक या राजनैतिक किसी भी दृष्टि से उनसे बंधे हुए नहीं हैं। अब हम अपनी इच्छानुसार कार्य करने के लिए स्वतत्र हैं। आज 20 वर्ष के लंबे और सततसंघर्ष के बाद हमने अपने ध्येय की प्राप्ति की है। रावी के तट पर 20 वर्ष पूर्व औपनिवेशिक स्वराज्य को डुकराकर पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव हमारे आज के प्रधानमंत्री प. जवाहरलाल नेहरू द्वारा उपस्थित किया गया था और काग्रेस ने उसे स्वीकार किया था। उसके बाद प्रतिवर्ष 26 जनवरी को हम यह दिन ‘स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाते रहे, किंतु हमारे चारों ओर विदेशी प्रभुत्व बना रहा।

आज का अवसर हार्दिक आनंद का अवसर है और हमें इस बात के लिए हर्ष होना चाहिए कि यह हमारा महान सौभाग्य है कि हम अपने देश के इतिहास की ऐसी शुभ घडी पर उपस्थित हैं। हर्ष तो हमें अवश्य मनाना चाहिए, किंतु वह हर्ष और आनंद चहल-पहल बनकर ही समाप्त न हो जाए। देशभक्तों और बलिदानियों ने स्वतंत्र, सुखी और समृद्ध भारतमाता का जो उज्ज्चल चित्र अपने सम्मुख रखा था, उसके कुछ भाग सत्य सृष्टि में परिणत हो गए हैं, किंतु फिर भी चित्र अभी अधूरा है।

उस चित्र को पूर्ण करने के लिए हमें संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों से उत्पन्न उल्लास के साथ ही देश के सम्मुख उपस्थित समस्याओं का भी विचार करना चाहिए। हमारे बीच में करोड़ों बेघर, बेकार, दुखी तथा निर्वासित बंधु हैं। दरिद्रता और दीनता की समस्याएं चारों ओर खडी हैं। उन्हें सुलझाने के लिए हमें प्रत्येक अधिकार के साथ जुडा हुआ उसका अनिवार्य कर्तव्य स्मरण रखना चाहिए।

आज का दिन सहस्रो वर्षों की तपस्या का ही परिणाम है। जब भारतीय असंतोष के जनक लोकमान्य तिलक की मृत्यु के पश्चात्‌ यथार्थवादियों का यह देश निराशा और शोक से संतप्त था, तब गाँधी जी अपने साधु जीवन सहित सम्मुख आए और उन्होंने जनता के अंतः करण को नए साहस और नए विश्‍वास से भर दिया, जिसके परिणामस्वरूप स्वतंत्रता की प्राप्ति हो सकी।

स्वतंत्रता के बाद हमारे यहाँ गृहकलह न होने का कारण यही है कि हमारी विजय गौरवमय संघर्ष एवं त्याग के पश्चात्‌ प्राप्त हुई है। त्याग, त्याग और अधिक त्याग, प्रयत्न, प्रयत्न ओर अधिक प्रयत्न, आज यही हमारे नारे होने चाहिए। जब तक हिंदू सभ्यता को जीवन प्रदान करनेवाली संस्कृति का शक्ति-स्रोत यथापूर्व प्रवाहित नहीं होगा, तब तक हमारी समस्याओं का मूल कारण दूर नहीं होगा। संपूर्ण शक्ति लगाकर हमें संस्कृति की पवित्र जीवनधारा को अखंड रखना है, उसी से उत्थान की प्राप्ति हो सकेगी।“

पुर्तगाली आधिपत्य का उन्मूलन (1954-1961)

दादरा और नागर हवेली : यह एक दुर्भाग्य था कि 1947 में देश को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से मुक्ति तो मिल गयी लेकिन दादरा और नागर हवेली पर अभी भी पुर्तगाली औपनिवेशिक शासन का कब्जाथा। यहाँ न तो भारत का संविधान लागू हुआ और न ही उससे जुड़े कोई अन्य अवयव जैसे भारतीय ध्वज। अतः ऐसी स्थिति में यहाँ के निवासियों को स्वतंत्रता दिलाने सहित भारतीय संविधान से वहां शासन स्थापित करने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।

स्वयंसेवकों ने ही सर्वप्रथम स्थानीय लोगों के साथ संपर्क स्थापित कर उन्हें संगठित करने का कार्य प्रारंभ किया। गुप्त बैठकों के माध्यम से क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, पुर्तगाली चौकियों तथा प्रशासनिक व्यवस्था की जानकारी एकत्र की गयी।

2 अगस्त 1954 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लगभग 100 स्वयंसेवकों ने दादरा और नगर हवेली की पुर्तगाली बस्तियों पर हमला कर दिया। इसका नेतृत्व पुणे के संघचालक विनायक राव आप्टे कर रहे थे। उन्होंने गुरिल्ला रणनीति के माध्यम से सिलवासा के पुलिस मुख्यालय पर धावा बोलकर वहां के 175 पुलिसकर्मियों को बिना शर्त आत्मसमर्पण करने पर विवश कर दिया।

मुक्ति के बाद स्वयंसेवकों ने क्षेत्र में अस्थायी प्रशासन की व्यवस्था करने में भी भूमिका निभाई। भारत के संविधान द्वारा प्रद्दत कानून-व्यवस्था बनाए रखना, जनता में विश्वास पैदा करना और दैनिक प्रशासन को सुचारु रूप से चलाना आवश्यक था। इस दौरान दादरा और नागर हवेली को ‘मुक्त क्षेत्र’ घोषित किया गया और यह स्थिति 1961 तक बनी रही, जब इसे औपचारिक रूप से भारत संघ में सम्मिलित कर लिया गया।

गोवा मुक्ति संग्राम : दादरा और नागर हवेली की मुक्ति की भांति ही गोवा मुक्ति अभियान में संघ के स्वयंसेवकों की अग्रणी भूमिका रही। स्वयंसेवकों के निरंतर प्रयासों से ही गोवा की मुक्ति संभव हो पाई और भारत के संविधान को वहां लागू करने में स्वयंसेवकों की भूमिका अग्रणी रही।

1944 में संघ के प्रचारक बने जगन्नाथ राव अनंत जोशी पहलेसत्याग्रहियों में से थे, जिन्होंने गोवा मुक्ति आन्दोलन के लिए संघर्षकिया। वे 25 जून 1955 को अखिल भारतीय जनसंघ के महामंत्री के तौरपर 147 सत्याग्रहियों के साथ भारतीय सीमा से गोवा में प्रवेश करने कीकोशिशे की, जिसमें से 140 सत्याग्रहियों को मारपीट कर पुनः भारतीयसीमा में धकेल दिया गया और 2 की मृत्यु हो गई। जगन्नाथ जोशी जी केसाथ महाराष्ट्र जनसंघ के उपाध्यक्ष अणणा साहेब कवडी भी थे। दोनों कोगिरफ्तार कर लिया गया।

गोवा की पुर्तगाली सरकार जनसंघ के सत्याग्रहियों के प्रति भयंकर एवंपाशविक अत्याचार कर रही है। जनसंघ के मंत्री जगन्नाथ राव जोशी तथामहाराष्ट्र जनसंघ के उपाध्यक्ष अण्णा साहेब कवड़ी को लोहे के हथौड़े सेबुरी तरह पीटा गया। भयंकर मार के कारण उनकी स्थिति अत्यंतचिंताजनक हो गई। परन्तु फिर भी उनकी चिकित्सा का कोई प्रबन्ध नहींकिया गया। इतना ही नहीं तो ओढने-बिछाने के लिए भी कोई कपड़ा नहींदिया गया।

श्रीगुरुजी ने गोवा में भारत सरकार से पुलिस कार्यवाही की मांग तथा उसेअविलंब विदेशी शासन से मुक्त कराने का आह्वान किया – “गोवाविमोचन समिति के नेतृत्व में 1955 से गोवा मुक्ति आंदोलन कास्वयंसेवकों द्वारा प्रारंभ करते हुए श्री गुरुजी ने मुंबई से एक परिपत्रप्रकाशित करते हुए कहा कि गोवा में पुलिस कार्यवाही करने का यह एकअच्छा अवसर है, इससे हमारी अन्तरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी औरआसपास के जो राष्ट्र सदा हमें धमकाते रहते हैं, उन्हें भी पाठ मिलजाएगा। भारत सरकार ने गोवा मुक्ति आन्दोलन का साथ न देने कीघोषणा करके मुक्ति आन्दोलन की पीठ में छुरा घोंपा है। भारत सरकारको चाहिए कि भारतीय नागरिकों पर हुए इस अमानुषिक गोलीबारी काप्रत्युत्तर दे और मातृभूमि का जो भाग अभी तक विदेशियों की दासता मेंसड़ रहा है, उसे अविलम्ब मुक्त करने का उपाय करे।“

श्रीगुरूजी कहते हैं कि मुंबई में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर जो गोलीचलाई, वह वीरता गोवा की सीमा पर दिखाई जाती, तो आठ दिनों मेंपुर्तगाली गोवा से भाग खड़े होते। घर के लोगों पर ही गोली चलाने में कोईवीरता नहीं है। प्रदर्शनकारियों को चाहिए कि वे हड़ताल और प्रदर्शन केसमय किसी भी अवस्था में शांति भंग न होने दें।

22 मई 1955 को जयपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस में दीनदयाल जी ने कहा, “यहबेहूदा बात है कि पुर्तगाली हमारी ही धरती पर, हमारी आँखों के सामनेहमारे लोगों पर अत्याचार करें। गोवा की मुक्ति में भारतीयों की भागीदारीपर सरकारी प्रतिबंध व्यर्थ है।“

गोवा में वर्ष 1955 में पहली बार तिरंगा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक स्वयंसेवक ने फहराया था। उनके इस कार्य के लिए पुर्तगालियों ने उन्हें 17 वर्ष लिसबन की एक जेल मैं कैद करके रखा। जबकि गोवा 1961 में मुक्त हुआ। इस दौरान संघ के कई स्वयंसेवकों ने पुर्तगालियों के खिलाफ हमलें में अपनी जान गंवाई। इसमें उज्जैन के स्वयंसेवक राजाभाऊ महाकाल और मथुरा के अमीरचंद गुप्त के नाम प्रमुख थे। गोवा को स्वाधीन करने के लिए जब देश भर से जत्थे गोवा की तरफ बढ़ रहे थे, उन्ही में से एक मध्य भारत से आये एक जत्थे का नेतृत्व ये दोनों कर रहे थे। पुर्तगालियों और स्वयंसेवकों के बेच आपसी झडपों में उन्हें भी गोली लगी। उनकी सहयोगी सहोदरा देवी, जिनके हाथ में तिरंगा था, वे भी घायल हो गयी। गोली लगने के बाद भी राजाभाऊ ने सहोदरा के हाथ से तिरंगा अपने हाथों में थाम लिया और इस प्रकार तिरंगा के साथ उन्होंने अपना अंतिम बलिदान दिया।

संविधान पर श्री गुरूजी के वक्तव्य (1947-1974)

संविधान का एकात्मक स्वरुप : “एक देश, एक संस्कृति एक परम्परा, समान श्रद्धा और समान आदर्शो की सुदृढ नींव पर प्राचीन काल से चले आए इस महान सनातन राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए हमारे जीवन को परिचालित करनेवाले ’राज्य’ को भी तदनुरूप ढालना आवश्यक है। समाज जीवन में छिन्न-विच्छिन्नता निर्माण करने वाले वर्तमान संघात्मक संविधान को एकात्मक स्वरूप प्रदान कर संपूर्ण देश के लिए एक राज्य, एक विधानपरिषद एवं एक कार्यपालिका का निर्माण समय की महती आवश्यकता है। एकात्मक शासन के द्वारा उत्पन्न हमारा यह सुसूत्र राष्ट्रीय जीवन ही देश में एकात्मता का भाव जागृत कर राष्ट्र के प्रति उत्कट श्रद्धा के भाव जगा सकेगा और यही राष्ट्रीय शक्ति हमें वैभव प्रदान कर समस्त विश्‍व में सम्मान और सुरक्षा प्रदान कर सकेगी।

संविधान से खिलवाड़ के प्रति रोष : जब गुरूजी से यह पूछा गया कि आपको नहीं लगता कि हमारे संविधान में संशोधन की आवश्यकता है? तो इसका जवाब देते हुए गुरूजी ने कहा कि मुझे दुख इसी बात का है कि स्वतंत्र भारत के निर्माण के प्रारंभिक दिनों में ही सरकार अनुचित उदाहरण प्रस्तुत कर रही है। एक-एक कर लोगों की आस्थाओं और आदर के विषयों को कमजोर किया जा रहा। संविधान को देश को संगठित और शक्तिशाली बनाने का आधार बनाया जा सकता था। अपना संविधान बहुत विस्तृत बनाया गया है, जो समझने में काफी कठिन है। फिर भी यदि सरकार ने उसका पर्याप्त आदर किया होता तो वह आदरणीय हो सकता था। किंतु ऐसा होता हुआ दिखाई नहीं देता। उसमे हर वर्ष संशोधन किए जा रहे हैं। लोगों की ऐसी धारणा बन रही है कि संविधान के साथ मनचाहा खिलवाड़ किया जा सकता है। उसके प्रति पवित्रता के भाव का उल्लंघन किया जा रहा है।

16 जुलाई 1970 संविधान में संशोधन कर लोकतंत्र की हत्या करने वाले अधिकार प्राप्त करने के प्रयासों से जनता तथा लोक प्रतिनिधियों को सचेत रहने हेतु श्री गुरूजी द्वारा दिया गया वक्तव्य, “वृत्त-पत्रों मे प्रकाशित समाचार एवं प्रधानमंत्री द्वारा श्रीनगर में दिए गए भाषण से यह स्पष्ट हो गया है कि इंदिरा सरकार, अवैध गतिविधियों के विरुद्ध अधिनियम तथा भारतीय दंडसंहिता संशोधन विधेयक इसी अधिवेशन में पारित करवाकर विरोधियों को नामशेष करने हेतु लोकतंत्र तथा नीति-विरोधी अपवित्र मनोरथ पूर्ण करने हेतु अन्यायपूर्ण कानूनों के माध्यम से अनियंत्रित शक्ति संचय का प्रयास करनेवाली है।

भारत को खंडित कर अलग राज्यों के पुनर्गठन का प्रचार तथा तत्सम विघातक गतिविधियों को नियंत्रित करने के समस्त अधिकार सरकार को प्राप्त करा देना- यही प्रचिलत स्वरूप है, तथापि संविधान के उल्लंघन तथा इस देश से पृथक हो स्वतंत्र राज्यनिर्माण के खुल्लमखुल्ला करनेवालों के खिलाफ आज तक कोई भी कार्रवाई नहीं की गई।

अब इसी कानून में संशोधन कर देशांतर्गत राष्ट्रवादी शक्तियों का हनन करने हेतु इस कानून का उपयोग करने की इंदिरा सरकार की मंशा है, जो स्पष्ट रूप से सांमतशाही स्थापित करने का प्रयत्न है। यह स्पष्ट है सत्तारूढ़ दल का यह कदम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रहार करने की कुबुद्धि से उठाया जा रहा है। “नव-कांग्रेस” के दिल्ली के अधिवेशन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम कर उसपर प्रतिबंध लगाने की माँग से लेकर दिल्ली में सामुदायिक व्यायाम पर प्रतिबंध लगाने तक सारे कदम उठाए गए हैं एवं सरकार द्वारा संघ पर लांछनास्पद शब्द-प्रयोग एवं गालियों की बौछार करने का योजनाबद्ध दुष्कृत्य किया गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसी देशभक्त शक्ति को नष्ट करने हेतु ही यह जाल बुना जा रहा है, यह स्पष्ट हो गया है।“

आपातकाल में स्वयंसेवकों की भूमिका (1975-1977)

25 जून 1975 को देश में आपातकाल थोप दिया गया। 4 जुलाई 1975को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऊपर प्रतिबंध लगा दिया गया। आपातकाल के दौरान सत्याग्रह करने वाले कुल 1,30,000 सत्याग्रहियों में से 1,00,000 से अधिक स्वयंसेवक थे। मीसा के अधीन जो 30,000 लोग बंदी बनाए गए, उनमे से 25000 से अधिक संघ-संवर्ग के थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 कार्यकर्ता अधिकांशतः बंदीग्रहों और कुछ बाहर आपातकाल के दौरान बलिदान हो गए। उनमे संघ के अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख श्री पांडुरंग क्षीरसागर भी थे।

तत्पश्चात लोक संघर्ष समिति का गठन हुआ। समिति ने एक आपातकाल विरोधी संघर्ष का आयोजन किया जिसमें सत्याग्रह और एक लाख से अधिक स्वयंसेवकों की कैद शामिल थी। सरसंघचालक बालासाहब देवरस को 30 जून को नागपुर स्टेशन से गिरफ्तार किया गया।

उन्होंने अपनी गिरफ्तारी से पहले स्वयंसेवकों को प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि इस असाधारण स्थिति में, स्वयंसेवकों का यह कर्तव्य है कि वे अपना संतुलन न खोएं, सरकार्यवाह माधवराव मुले और उनके द्वारा नियुक्त अधिकारी के आदेशानुसार संघ के कार्य को जारी रखें और जनसंपर्क, जन जागरूकता एवं जन शिक्षा को यथाशीघ्र अपने राष्ट्रीय कर्तव्य का निर्वाह करने की क्षमता का निर्माण करें।

आपातकाल लगाने से उत्पन्न हुई परिस्थिति से देश को सचेत रखने के लिए तथा जनता का मनोबल बनाए रखने के लिए भूमिगत कार्य के लिए संघ के निम्न कार्यकर्ता तय किए गए :

• नागरिक स्वातंत्र्य के मोर्चे के लिए मा. रज्जू भैय्या
• आचार्या सम्मेलन के मोर्चे के लिए डॉ. आबाजी
• विदेशों में संपर्क के लिए बाला साहब भिड़े, चमनलाल जी, जगदीश मित्र सूद तथा केदारनाथ साहनी
• राजनीतिक क्षेत्र के लिए रामभाऊ गौड़, सुंदर सिंह भण्डारी, ओम प्रकाश त्यागी तथा उत्तम राव पाटिल
• कॉमन वैल्थ कॉन्फ्रेंस के लिए जगन्नाथ राव जोशी
• कानूनी मोर्चे के लिए डॉ अप्पा घटाटे
• साहित्य निर्माण के लिए दिल्ली में भानुप्रताप शुक्ल तथा वेद प्रकाश भाटिया। नागपुर में अनंतराव गोखले, मधु लिमए
• साहित्य प्रकाशन तथा दिल्ली केन्द्रित संपर्क के लिए बापुराव मोघे
• धर्माचार्य संपर्क के लिए दादासाहब आपटे
• पत्र-पत्रिकाओं से संपर्क के लिए जगदीश प्रसाद माथुर
• महिलायों से संपर्क के लिए लक्ष्मीबाई केलकर ‘मौसी जी’
According to Dr Shivaram Karanth, “When elections were announced the one anxiety that filled my mind was, who are the persons who will carry the message of freedom to the people and make them aware of the things at stake? The workers of RSS came forward in thousands and my anxiety was set at rest. Even prior to elections the main burden of the struggle was borne by them. It is they who had kept up people’s morale. More than 80 per cent of the fighting cadres had been drawn from the RSS. I have personally seen thousands of their young men solely inspired by a spirit of idealism, without any desire or expectation in return, plunging into the struggle. Often,they had nothing to eat, no place to rest, but their zeal remained unabated.”

वरिष्ठ पत्रकार और इंडियन रिवियू (मद्रास) के संपादक, एमसी सुब्रमण्यम ने अप्रैल 1977 के अपने एक अंक में लिखा, “जिन वर्गों ने निर्भीक लगन के साथ यह कार्य किया, उनमे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विशेषतः उल्लेखनीय है। उन्होने सत्याग्रह का आयोजन किया। अखिल भारतीय संचार तंत्र को बनाए रखा। आंदोलन के लिए चुपचाप धन एकत्र किया। बिना किसी विघ्न बाधा के साहित्य वितरण की व्यवस्था की। कारागार में अन्य दलों और मतों के संगी बंदियों को सहायता प्रदान की। इस प्रकार उन्होने सिद्ध कर दिया कि स्वामी विवेकानंद ने देश में सामाजिक और राजनीतिक कार्य के लिए जिस सन्यासी सेना का आवाहन किया था, उसके वो सबसे निकटतम पात्र हैं। वह एक परंपरावादी क्रांतिकारी शक्ति है।“

संविधान की रक्षा (1984)

मार्च 1984 में पंजाब में अलगाववाद के चलते अकाली दल द्वारा संविधान को जलाने की घटना का भी संघ ने अपनी अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में विरोध किया था। तब एक प्रस्ताव पारित कर कहा गया,“राष्ट्रद्रोही तत्वों द्वारा स्वर्णमंदिर में तथाकथित खालिस्तानी झंडे का फहराया जाना, अकाली दल द्वारा संविधान जलाने का निंदनीय कार्य करना, उग्रवादियों द्वारा सवारी गाडी को पलटने की चेष्टा करना,धर्मस्थानों में समाज-विरोधी तत्वों का आश्रय पाना – ये कुछ ऐसे तथ्य है जिनसे किसी भी धर्मप्रेमी और देशभक्त व्यक्ति का चिंतित होना स्वाभाविक है।“

नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता का अभियान (2024 से वर्तमान तक)

संघ ने अपनी शताब्दी वर्ष के निमित्त पांच विषयों को लेकर समाज में जाने का निर्णय किया है, उसमें एक विषय संविधान में निहित ‘नागरिक कर्त्तव्य’ है। ‘100 वर्ष की संघ यात्रा – नए क्षितिज’ व्याख्यानमाला के अंतर्गत 28अगस्त 2025 को सरसंघचालक जी के अनुसार, “संविधान की प्रस्तावना, नागरिक कर्त्तव्य, नागरिक अधिकार और मार्गदर्शक तत्व – इन चार विषयों की जानकारी विद्यालय के छात्रों को होनी चाहिए।“

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का मानना है कि देश के नागरिकों का कर्तव्य है कि वे अपने देश के संविधान व प्रतीकों तथा राष्ट्रीयता का सम्मान करें। दैनंदिन जीवन में संवैधानिक मूल्यों का पालन करें, उनके विषय में समाज को जागरूक भी करें, लोकतान्त्रिक कर्तव्यों का स्वयं पालन करें और अन्य को इस हेतु प्रेरित करें। सभी चुनावों में देशहित को प्राथमिकता देते हुए मतदान अवश्य करें तथा तुलनात्मक अध्ययन करते हुए पार्टी या लोकप्रतिनिधी का चुनाव करना भी प्रमुख नागरिक कर्तव्य है। देश की संप्रभुता, एकता, अखंडता के विरुद्ध कोई भी वाणी-कर्म ठीक नहीं है। देश के समक्ष उपस्थित विपरीत परिस्थिति में सकारात्मक एवं रचनात्मक बने रहना और उन चुनौतियों पर विजय प्राप्त करने में सहज सामूहिक प्रयत्नों को प्रेरित करना भी हमारे नागरिक कर्तव्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

संविधान के प्रमुख चिह्न और व्यक्तियों पर संघ के विचार

भारत के संविधान के अप्रतिम नायकों जैसे डॉ. बी.आर. आंबेडकर, के.एम. मुंशी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, और सरदार पटेल को भी स्वयंसेवकों ने अपने मार्गदर्शक के रूप में सहर्ष स्वीकार किया है। इसलिए सरसंघचालक डॉ. भागवत जी कहते है, “हमारे देश केमूर्धन्य लोगों ने, विचारवान लोगों ने एकत्रित आकर विचार करके संविधानका निर्माण किया है, वह ऐसे ही नहीं बना। जिन विचारवान लोगों ने इससंविधान का निर्माण किया उन्होंने उसके एक-एक शब्द पर बहुत मंथनकिया और सर्वसहमति उत्पन्न करने के पूर्ण प्रयास के बाद बनी सहमति केबाद यह संविधान बना।“

डॉ. आंबेडकर : श्रीगुरूजी के अनुसार पूर्वकाल में समाजसुधार के लिए तथा धर्म का स्वरूप विशुद्ध करने के लिए, न कि पृथक होने के लिए, भगवान बुद्ध ने तात्कालिक समाज-धारणाओं की आलोचना की तथा सद्यःस्थिति में भी डा. बाबासाहब अंबेडकर जी ने समाज की भलाई के लिए, धर्म के हित के लिए, चिरंजीवी समाज निर्दोष तथा सुदृढ़ होने के लिए कार्य किया। उनका यह कार्य समाज से पृथक होकर भिन्न पंथ-निर्माण करने के लिए नहीं है, ऐसी मेरी श्रद्धा है। इसलिए भगवान बुद्ध के इस युग के उत्तराधिकारी के नाते उनकी पवित्र स्मृति का मैं अंतःकरणपूर्वक अभिवादन करता हूँ।

मोहन भागवत जी के अनुसार “संविधान के कारण राजनीतिक तथाआर्थिक समता का पथ प्रशस्त हो गया, परन्तु सामाजिक समता को लायेबिना वास्तविक व टिकाऊ परिवर्तन नहीं आएगा, ऐसी चेतावनी पूज्य डॉ. बाबासाहब आंबेडकर जी ने हम सबको दी थी।“

सरदार वल्लभभाई पटेल : श्री गुरुजी सरदार वल्लभभाई पटेल को भारत माता का महान पुत्र मानते हैं और कहते हैं, “उनका संपूर्ण जीवन आसुरी शक्तियों से जूझने और स्वतंत्र एवं सुसंगठित राष्ट्रजीवन निर्मित करने के लिए अथक प्रयास करते हुए बीता। देश के स्वातंत्र्य-युद्ध में उनका प्रमुख भाग रहा है।“

श्रीगुरुजी कहते है कि “वे यह अनुभव करते थे कि देश बड़े संकटों से गुजर रहा है। अपनी संगठन-कुशलता से देश की विभिन्न शक्तियों को एक सूत्र में गूँथकर, जिस संस्था में वे कार्य करते थे उस संस्था को भी सुव्यवस्थित रखते हुए, सब संकटों का सामना करने के लिए राष्ट्र को एक सुदृढ शक्ति के रूप में खड़ा करने हेतु वे प्रयत्नशील थे।“

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी : डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विषय में अपने आदर भाव के कारण को बताते हुए श्रीगुरूजी कहते हैं कि डा. मुखर्जी की प्रांजलता और अपने से भिन्न मत भी सहानुभूतिपूर्वक समझने की पात्रता, इन गुणों से मैं बहुत प्रभावित हुआ। वे अपने सिद्धांतों पर चर्चा करने को तैयार रहते तथा अपने प्राणप्रिय मत के खंडन में दिए गए प्रभावी तर्को को मान लेते थे। ये गुण महान व्यक्तियों में ही पाए जाते हैं, डा. मुखर्जी को जन्म से ही स्वभावतः प्राप्त हुए थे। मैं उनके इन गुणों के प्रति, पहली भेंट में ही मुग्ध हुआ। तब से मेरे हृदय में उनके लिए अत्यधिक आदर था।

भारतीय संविधान में चित्रित प्रतीक : भारतीय संविधान की मूल हस्तलिखित प्रति (Original Constitution) केवल एक कानूनी ग्रंथ नहीं है, बल्कि उसमें बने चित्र भारत की सभ्यता, संस्कृति और ऐतिहासिक निरंतरता को भी दर्शाते हैं।

“हमने अपने प्रजातांत्रिक देश में एक संविधान को स्वीकार किया है। यहसंविधान हमारे लोगों ने तैयार किया और यह संविधान हमारा देश काconsensus है इसलिए संविधान के अनुशासन का पालन करना सबकाकर्तव्य है। संघ इसको पहले से ही मानता है।“

भारतीय संविधान में कुल 22 चित्र हैं। इन चित्रों का निर्माण प्रसिद्ध कलाकार नंदलाल बोस और शांतिनिकेतन के कलाकारों ने किया। प्रत्येक चित्र संविधान के अलग-अलग भागों की शुरुआत में दिया गया है।

संविधान की प्रस्तावना : ‘भविष्य का भारत’ पुस्तक में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी कहते हैं कि भारतीय संविधान की एक प्रस्तावना(प्रियम्बल) है। उसमें नागरिक कर्तव्य बताए गए हैं, उसमें ‘डायरेक्टिवप्रिंसीपल्स’ हैं और नागरिक अधिकार भी हैं। इसी क्रम में उन्होंने कहा, “मैंकेवल प्रियम्बल पढ़ देता हूँ – WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved to constitute India into a SOVEREIGN, SOCIALIST, SECULAR, DEMOCRATIC REPUBLIC (ये सोशलिस्ट सेक्यूलर शब्द बाद में आया है सबको पताहै लेकिन अभी है। इसलिए मैंने उसको भी पढ़ा है।) and secure to all its citizens JUSTICE, social, economic and political; LIBERTY of thought, expression, belief, faith and worship; EQUALITY of status and of opportunity.”

सरसंघचालक मोहन भागवत जी के वक्तव्य

डॉ. मोहन भागवत जी विजयादशमी उत्सव 2014 के अवसर पर कहते हैं कि “जीवन का भिन्न दृष्टि से विचार करने वाला तथा उस विचार केआधार पर विश्व का सिरमौर देश बनकर सदियों तक जगत का नेतृत्वकरने वाला अपना देश रहा है , इस तथ्य को निरंतर स्मृति में रखकरचलना पड़ेगा। उस दृष्टि में भारत में ही समस्त विश्व के कल्याण कासामर्थ्य विद्यमान है। उसका युगानुकूल आविष्कार नीतियों में प्रकट करनापड़ेगा। ऐसी नीतियाँ चलाकर देश के जिस स्वरूप के निर्माण कीआंकांक्षा अपने संविधान ने दिग्दर्शित की है उस ओर देश को बढ़ाने काकाम होगा, इस आशा और विश्वास के साथ सत्ता अपना कार्य करे इसकेलिये उनको समय तो देना पड़ेगा।“

डॉ. मोहन भागवत जी ने विजयादशमी उत्सव 11 अक्टूबर 2016 केअवसर पर दिए गए उद्बोधन में कहा कि “देश की व्यवस्था के नाते हमनेअपने संविधान में संघराज्यीय कार्यप्रणाली का स्वीकार किया है।ससम्मान व प्रामाणिकता पूर्वक उसका निर्वाह करते समय हम सभी कोविशेषकर विभिन्न दलों द्वारा राजनीतिक नेतृत्व करने वालों को यह निरन्तरस्मरण रखना पडे़गा कि व्यवस्था कोई व कैसी भी हो, सम्पूर्ण भारत युगोंसे अपने जन की सभी विविधताओं सहित एक जन, एक देश, एक राष्ट्ररहा है, तथा आगे उसको वैसे ही रहना है, रखना है। मन, वचन, कर्म सेहमारा व्यवहार उस एकता को पुष्ट करने वाला होना चाहिए, न कि दुर्बलकरने वाला।“

डॉ. मोहन भागवत जी विजयादशमी उत्सव (25 अक्तूबर 2020) केअवसर पर अपने उद्बोधन में कहते हैं कि “शासन-प्रशासन के किसी निर्णयपर या समाज में घटने वाली अच्छी बुरी घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया देतेसमय अथवा अपना विरोध जताते समय, हम लोगों की कृति, राष्ट्रीयएकात्मता का ध्यान व सम्मान रखकर, समाज में विद्यमान सभी पंथ, प्रांत, जाति, भाषा आदि विविधताओं का सम्मान रखते हुए व संविधान कानूनकी मर्यादा के अंदर ही अभिव्यक्त हो यह आवश्यक है। दुर्भाग्य से अपनेदेश में इन बातों पर प्रामाणिक निष्ठा न रखने वाले अथवा इन मूल्यों काविरोध करने वाले लोग भी, अपने आप को प्रजातंत्र, संविधान, कानून, पंथनिरपेक्षता आदि मूल्यों के सबसे बड़े रखवाले बताकर, समाज कोभ्रमित करने का कार्य करते चले आ रहे हैं। 25 नवम्बर, 1949 के संविधानसभा में दिये अपने भाषण में श्रद्धेय डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने उनके ऐसेतरीकों को “अराजकता का व्याकरण”(Grammer of Anarchy) कहाथा। ऐसे छद्मवेषी उपद्रव करने वालों को पहचानना व उनके षड्यंत्रों कोनाकाम करना तथा भ्रमवश उनका साथ देने से बचना समाज को सीखनापड़ेगा।“

इसी क्रम में वे आगे कहते हैं, “भारत की विविधता के मूल में स्थितशाश्वत एकता को तोड़ने का घृणित प्रयास हमारे तथाकथितअल्पसंख्यक तथा अनुसूचित जाति जनजाति के लोगों को झूठे सपने तथाकपोलकल्पित द्वेष की बातें बता कर चल रहा है। ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ ऐसी घोषणाएँ देने वाले लोग इस षड्यंत्रकारी मंडली में शामिल हैं, नेतृत्वभी करते हैं। राजनीतिक स्वार्थ, कट्टरपन व अलगाव की भावना, भारत केप्रति शत्रुता तथा जागतिक वर्चस्व की महत्वाकांक्षा, इनका एक अजीबसम्मिश्रण भारत की राष्ट्रीय एकात्मता के विरुद्ध काम कर रहा है। यहसमझकर धैर्य से काम लेना होगा। भड़काने वालों के अधीन ना होते हुए, संविधान व कानून का पालन करते हुए, अहिंसक तरीके से व जोड़ने के हीएकमात्र उद्देश्य से हम सबको कार्यरत रहना पड़ेगा। एक दूसरे के प्रतिव्यवहार में हम लोग संयमित, नियम कानून तथा नागरिक अनुशासन केदायरे में, सद्भावनापूर्ण व्यवहार करते हैं तो ही परस्पर विश्वास कावातावरण बनता है। ऐसे वातावरण में ही ठण्डे दिमाग से समन्वय सेसमस्या का हल निकलता है।“

संघ की शाखा एवं संविधान

“भारत राष्ट्र ही हामारा आराध्य देव है। राज्य बनते रहेंगे व बिगड़ते रहेंगे। किन्तु राष्ट्र स्थायी है। राष्ट्र सबल होगा तो राज्य भी सबल बनेगा। राष्ट्र दुर्बल होगा तो राज्य भी छोटे छोटे टुकड़ों में बंट जाएंगें और विदेशी शत्रु हमारे राष्ट्र को आक्रांत कर लेंगे। गत एक हजार वर्षों तक इसी कारण हमें पराधीन रहना पड़ा। गलतियाँ पुनः न दोहराई जाएं। अतः प्रत्येक भारतीय अपने मन मंदिर में अखंड भारत के चित्र को प्रतिष्ठित करे और वंदे मातरम कहते हुए सविधान की भावना को मूर्त रूप देने के कार्य में लग जाए।“

संविधान में प्रद्दत अन्य विषय और संघ

संघ ने संविधान द्वारा प्रद्दत सभी विषयों अथवा अवयवों जैसे राष्ट्रीय गीत,राष्ट्रीय गान, भाषाई विषय, राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता, लोकतंत्र,धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, आरक्षण, समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नागरिकों के आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक अधिकारों का हमेशा समर्थन किया है।

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