जुबिन गर्ग की रहस्यमय मौत: सिंगापुर पुलिस ने लगाया सवालिया निशान

1500x900_77638-jubin-garg.webp

नव ठाकुरीया

गुवाहाटी: मशहूर असमिया गायक जुबिन गर्ग के लाखों प्रशंसकों के लिए सिंगापुर से आई ताज़ा खबर एक बार फिर निराशा लेकर आई है। पिछले वर्ष 19 सितंबर को सिंगापुर में हुई जुबिन गर्ग की रहस्यमय मौत को लेकर वहां की पुलिस ने अपनी जांच में इसे एक दुर्घटना (हादसा) करार दिया है। सिंगापुर पुलिस के अनुसार, जुबिन की मौत नशे की हालत में समुद्र में तैरते समय डूबने से हुई और इसमें किसी तरह की साज़िश या आपराधिक पहलू सामने नहीं आया।

दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी दैनिक द स्ट्रेट्स टाइम्स (The Straits Times) ने 14 जनवरी को प्रकाशित रिपोर्ट में बताया कि 53 वर्षीय जुबिन ने शराब पी रखी थी और यॉट से समुद्र में उतरने से पहले लाइफ जैकेट पहनने से इनकार कर दिया था। यह हादसा लाजरस द्वीप के पास हुआ, जहाँ तैरते समय वह डूब गए।

सिंगापुर पुलिस के जांच अधिकारी डेविड लिम ने कोरोनर की पूछताछ के दौरान गवाही देते हुए बताया कि जब जुबिन के दोस्तों ने उन्हें वापस यॉट पर लौटने के लिए मनाने की कोशिश की, तो वह अचानक अचेत हो गए। उन्हें तुरंत समुद्र से बाहर निकालकर यॉट पर लाया गया और प्राथमिक उपचार किया गया, लेकिन बाद में सिंगापुर जनरल अस्पताल में शाम 5.15 बजे (स्थानीय समयानुसार) उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। पुलिस ने दोहराया कि मौत का कारण डूबना ही था।

जांच में यह भी स्पष्ट किया गया कि जुबिन गर्ग पर न तो किसी तरह का दबाव था और न ही आत्महत्या जैसी कोई प्रवृत्ति सामने आई। यॉट के कप्तान ने उन्हें कई बार लाइफ जैकेट पहनने की सलाह दी थी, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, जुबिन के खून में प्रति 100 मिलीलीटर 333 मिलीग्राम अल्कोहल पाया गया था, जिससे उनके संतुलन और प्रतिक्रिया क्षमता पर गंभीर असर पड़ा होगा।

उल्लेखनीय है कि सिंगापुर में शराब पीकर वाहन चलाने की कानूनी सीमा मात्र 80 मिलीग्राम प्रति 100 मिलीलीटर खून है। यॉट के कप्तान ने अदालत को बताया कि मरीना में लगभग 15 लोग जहाज पर सवार हुए थे, जिनमें से कई—ज्यादातर असम एसोसिएशन सिंगापुर के सदस्य—पहले से ही नशे में थे। कप्तान के अनुसार, जुबिन इतनी लड़खड़ा रहे थे कि जहाज पर चढ़ते समय उनके दोस्तों को उन्हें सहारा देना पड़ा। हालांकि यह भी स्पष्ट किया गया कि किसी ने उन्हें शराब पीने या समुद्र में उतरने के लिए मजबूर नहीं किया था।

जुबिन 20 सितंबर को सिंगापुर के सनटेक कन्वेंशन एंड एग्ज़ीबिशन सेंटर में आयोजित चौथे नॉर्थ ईस्ट इंडिया फेस्टिवल (NEIF) में प्रस्तुति देने के लिए सिंगापुर आए थे। 19 से 21 सितंबर 2025 तक आयोजित यह कार्यक्रम भारत–सिंगापुर राजनयिक संबंधों की 60वीं वर्षगांठ और भारत–आसियान पर्यटन वर्ष के उपलक्ष्य में हुआ था। 

समाचार एजेंसी PTI के अनुसार, यह फेस्टिवल ट्रेंड MMS द्वारा सिंगापुर स्थित भारतीय उच्चायोग, विदेश मंत्रालय, उत्तर-पूर्वी राज्यों की सरकारों तथा असम और नॉर्थ ईस्ट इंडिया एसोसिएशन के सहयोग से आयोजित किया गया था। इससे पहले NEIF बैंकॉक (2019, 2022) और हो ची मिन्ह सिटी (2023) में आयोजित हो चुका है। इस फेस्टिवल के प्रचार के लिए जारी एक प्रोमो वीडियो में भी जुबिन नजर आए थे, जो इंस्टाग्राम पर उपलब्ध है (https://www.instagram.com/p/DOq2U7ZgvKY/) । हालांकि सिंगापुर पुलिस की रिपोर्ट में जुबीन गर्ग की मौत को दुर्घटना बताया गया है, लेकिन असम में यह मामला एक बड़े जनआक्रोश का कारण बन गया।

जनता के दबाव में असम सरकार को मामले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) गठित करना पड़ा। SIT ने अब तक सात लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें NEIF के आयोजक श्यामकानु महंत, जुबीन के मैनेजर सिद्धार्थ शर्मा, संगीत सहयोगी शेखरज्योति गोस्वामी और अमृतप्रभा महंत, उनके चचेरे भाई संदीपान गर्ग और दो निजी सुरक्षा अधिकारी शामिल हैं।

जांच से जुड़ी अहम जानकारियाँ जुटाने के लिए असम पुलिस की एक टीम सिंगापुर भी गई। 12 दिसंबर को 2,500 से अधिक पन्नों का आरोपपत्र दाखिल किया गया और ट्रायल शुरू हो चुका है। सुरक्षा कारणों से सभी आरोपियों को कामरूप (मेट्रोपॉलिटन) जिला सत्र न्यायालय में वर्चुअल रूप से पेश किया जा रहा है।
इस बीच, जुबिन की पत्नी गरिमा सैकिया गर्ग ने असम सरकार और केंद्र सरकार से अपील की है कि सिंगापुर में चल रही अदालती प्रक्रिया पर कड़ी निगरानी रखी जाए, ताकि आवश्यक कूटनीतिक और कानूनी हस्तक्षेप किया जा सके। उन्होंने इस मामले में फास्ट-ट्रैक सुनवाई के लिए विशेष बेंच गठित करने की भी मांग की है, क्योंकि 300 से अधिक गवाहों की सुनवाई में वर्षों लग सकते हैं।

मामले ने राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है। कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा के उन बयानों की आलोचना की है, जिनमें उन्होंने जुबिन की मौत को साज़िशन हत्या बताया था। कांग्रेस का सवाल है कि जब सिंगापुर के अधिकारी लगातार इसे दुर्घटना बता रहे हैं, तो असम की जनता किस पर भरोसा करे।

विपक्ष की आलोचना पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री शर्मा ने अपना रुख बरकरार रखा और कहा कि असम पुलिस की जांच सिंगापुर पुलिस से अधिक गहन है। भले ही सिंगापुर जांच एजेंसियों को कोई आपराधिक पहलू न मिला हो, लेकिन असम पुलिस ने सात में से चार आरोपियों पर हत्या का आरोप लगाया है।

एक कानूनी जानकार के अनुसार, यदि सिंगापुर की अदालत का फैसला पहले आ जाता है, तो उसका असर भारत में चल रही न्यायिक प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है। ऐसे में न्याय की उम्मीद लगाए बैठे लाखों प्रशंसकों में गहरी निराशा फैलने की आशंका है। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले इस संवेदनशील मामले का राजनीतिक इस्तेमाल भी जुबिन के लिए न्याय की लड़ाई को कमजोर कर सकता है।

बड़ा सवाल अब भी कायम है—क्या सिंगापुर पुलिस की रिपोर्ट असम की SIT जांच और अदालत की प्रक्रिया पर निर्णायक असर डालेगी, या जुबिन के लिए न्याय की मांग यूँ ही उलझी रह जाएगी?

(पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार)

अगर इलाज नहीं करना था, तो बीमारी क्यों थमा दी?

AQI.jpg

दिल्ली । सुबह का अलार्म बजता है। प्राइवेट स्कूल के चपरासी बाबू लाल के मोबाइल की स्क्रीन पर “गुड मॉर्निंग” चमकती है, लेकिन उसके चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं। घर के आंगन में पड़े अख़बार के पहले पन्ने पर भारत की तेज़ रफ़्तार तरक़्क़ी की सुर्ख़ियाँ हैं, GDP, ग्रोथ, स्टार्टअप, ग्लोबल रैंक। घर के अंदर पत्नी ऊषा, रसोई में उबलता दूध भरोसे के साथ नहीं, शक के साथ देखती है। यह वही भारत है, जहाँ सपनों की उड़ान और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच की खाई हर दिन चौड़ी हो रही है।

सवाल यह नहीं कि देश आगे बढ़ रहा है या नहीं; सवाल यह है कि क्या इस दौड़ में “बाबू लाल” साथ चल पा रहा है, या वह बस आँकड़ों की परछाईं बनकर रह गया है?

डिजिटल इंडिया के इस दौर में आप एक इंसान नहीं, बल्कि नंबरों का जोड़ हैं, आधार, पैन, मोबाइल OTP, क्रेडिट स्कोर और वोटर ID, यानी आपकी ज़िंदगी से ज़्यादा क़ीमती आपका डेटा है। सिस्टम आपको पहचानता नहीं, स्कैन करता है। सुविधा मिली है, लेकिन साथ में यह एहसास भी कि आप हर पल देखे जा रहे हैं, नापे जा रहे हैं।

हर मंच से ‘विकसित भारत’ का नारा गूंज रहा है। मैक्रो आँकड़े वाक़ई दमदार हैं, 2024 में औसत GDP वृद्धि 6.3%, 2025–26 की दूसरी तिमाही में 8.2% की छलांग। भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, स्टार्टअप इकोसिस्टम में तीसरे स्थान पर। 2047 तक “हाई-इनकम कंट्री” बनने के लिए 7.8% की औसत वृद्धि चाहिए, यह सब प्रेज़ेंटेशन की स्लाइड्स में आकर्षक लगता है ।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह तरक़्क़ी आम आदमी की थाली, उसकी सेहत, उसकी सड़क और उसकी सांस तक पहुँची है ?

बाबू लाल टाइप आम आदमी की सुबह मोटिवेशनल कोट से नहीं, मिलावट के डर से होती है। दूध का पैकेट खोलते वक़्त भरोसा नहीं कि उसमें दूध है या केमिकल। मसाले रंगीन हैं, मगर स्वाद से ज़्यादा बीमारी परोसते हैं। मछली ताज़ा दिखती है, लेकिन ज़हर साबित होती है। 2025 में हर चार में से एक खाद्य पदार्थ सेफ्टी टेस्ट में फेल पाया गया। पिछले दस साल में 25% सैंपल नॉन-कन्फ़ॉर्मिंग निकले, 50% घटिया और 15% सीधे असुरक्षित। 2022 में 4,300 से ज़्यादा मिलावट के मामले दर्ज हुए, असल संख्या इससे कहीं ज़्यादा है। इंदौर जैसे “स्वच्छता मॉडल” शहर भी इस विडंबना से अछूते नहीं। यह कैसा विकास है, जहाँ हर कौर के साथ डर भी निगलना पड़े?

घर से बाहर कदम रखते ही दूसरी जंग शुरू होती है, सड़कों की। गड्ढे, खुले मैनहोल, उलटी दिशा में दौड़ते वाहन और ट्रैफिक नियमों का खुलेआम मज़ाक। पैदल चलना अब रोज़ का जोखिम बन चुका है। 2024 में सड़क हादसों में 1.77 लाख लोगों की मौत हुई, यानी रोज़ औसतन 485 जानें। साल-दर-साल 2.3% की बढ़ोतरी। उत्तर प्रदेश में 2025 के पहले 11 महीनों में ही 24,776 मौतें, 14% का उछाल। एक्सप्रेसवे की तस्वीरें होर्डिंग्स पर चमकती हैं, लेकिन मोहल्ले की सड़क आज भी टूटी है। यही है मैक्रो-डेवलपमेंट और माइक्रो-पेन का सबसे बेरहम टकराव, हर नागरिक अनजाने में ‘खतरों के खिलाड़ी’ बन चुका है।

स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत और भी अफ़सोसनाक है। सरकारी अस्पतालों में लंबी लाइनें, कम बेड और उससे भी कम संवेदनशीलता। भारत में प्रति 10,000 आबादी पर सिर्फ़ 20.6 हेल्थकेयर वर्कर हैं, जबकि WHO का मानक 44.5 का है। सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ख़र्च GDP का महज़ 1.3%। दवा मिल जाए तो किस्मत, इलाज मिल जाए तो करिश्मा। निजी अस्पताल हैं, लेकिन आम आदमी के लिए वे इलाज नहीं, आर्थिक सज़ा हैं। बीमारी सिर्फ़ शरीर नहीं तोड़ती, जेब और आत्मसम्मान भी छीन लेती है।

कामकाजी ज़िंदगी में भी राहत नहीं। औसतन 46.7 घंटे का वर्क-वीक, लेकिन 51% कर्मचारी 49 घंटे से ज़्यादा खटते हैं। 58% वर्कफ़ोर्स बर्नआउट का शिकार है। थकान को देशभक्ति का तमगा दे दिया गया है, 70 घंटे काम करो, सवाल मत पूछो। मेहनत से ज़्यादा चमचागिरी का मोल है। सम्मान योग्यता से नहीं, ओहदे और बैंक बैलेंस से तय होता है। असमानता की दीवार हर दिन ऊँची हो रही है।

डिजिटल इंडिया ने सुविधा दी, लेकिन नया डर भी। 60% भारतीयों को रोज़ कम से कम तीन स्पैम कॉल आते हैं। 2025 में डिजिटल ठगी से ₹26 अरब का नुकसान हुआ। बुज़ुर्गों के लिए यह दुनिया भूलभुलैया है, एक ग़लत क्लिक और जीवनभर की कमाई ग़ायब। तकनीक किसके लिए है, आम आदमी के लिए या उसे ठगने वालों के लिए?

और पर्यावरण, जिसे हमने विकास की वेदी पर कुर्बान कर दिया। 2025 में कई शहरों में AQI 500 के पार चला गया, दिल्ली समेत। देश की 27.77% ज़मीन बंजर होती जा रही है। 4.07 करोड़ लोग चरम मौसम की मार झेल रहे हैं। हवा ज़हर बन चुकी है, नदियाँ नाले, गर्मी जानलेवा और बारिश तबाही। यह प्रकृति का बदला नहीं, हमारी अपनी नीतियों का नतीजा है।

सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि हालात खराब हैं, बल्कि यह कि हमने उन्हें “नॉर्मल” मान लिया है। गड्ढों से बचकर चलना, मिलावट से डरकर खाना, इलाज के लिए क़र्ज़ लेना, स्पैम कॉल्स को गालियाँ देना, सब रूटीन बन चुका है। शिकायत अब ग़ुस्से में नहीं, थकी हुई बेबसी में होती है।
‘विकसित भारत’ का सपना तब तक अधूरा रहेगा, जब तक आम आदमी सिर्फ़ “सहन” करता रहेगा, “जीएगा” नहीं। असली विकास वही है जो सड़क पर दिखे, अस्पताल में महसूस हो, थाली में भरोसे के साथ परोसा जाए और हवा में सांस लेने लायक हो। वरना यह चमकता नारा एक दिन धुंध में खो जाएगा, और पीछे रह जाएगा एक थका, ख़ामोश समाज, जो बस यही पूछता रहेगा: अगर इलाज नहीं करना था, तो बीमारी क्यों थमा दी?

अमेरिका की साम्राज्यवादी सोच के विरुद्ध बन रहे नए समीकरण

1-conservative-foreign-policy-military-GettyImages-1399203545.jpg.webp

दिल्ली । अमेरिकी ट्रम्प प्रशासन द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति श्री निकोलस मदुरो को रात्रि के समय में गिरफ्तार कर अमेरिका लाकर उन पर मुकदमा चलाया जाना एवं वेनेजुएला के तेल भंडार पर अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका का कब्जा स्थापित करने का प्रयास करना, अमेरिका की साम्राज्यवादी सोच को ही दर्शाता है। साथ ही, इसी क्रम में डेनमार्क द्वारा शासित ग्रीनलैंड द्वीप पर भी अमेरिका अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहता है। सोचनीय विषय है कि डेनमार्क नाटो का सदस्य देश होने के चलते वह अमेरिका का मित्र राष्ट्र है और मित्र राष्ट्र की सीमाओं में घुसकर उसके आधिपत्य वाले क्षेत्र को अमेरिका द्वारा बलपूर्वक अपने देश की सीमा में शामिल करने का प्रयास करना उचित कदम नहीं कहा जा सकता है। कुछ समय पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने कनाडा के राष्ट्रपति को धमकी दी थी कि अमेरिका कनाडा को अपना 51वां राज्य बनाना चाहते हैं। ध्यान रहे कनाडा भी अमेरिका के मित्र राष्ट्र के देशों की सूची में शामिल है। परंतु, जब अमेरिका जैसा देश साम्राज्यवादी सोच के आधार पर निर्णय लेने लगते हैं, तो मित्र राष्ट्र का ध्यान भी नहीं रह पाता है।

अमेरिका द्वारा हाल ही में ब्रिक्स के सदस्य देशों (भारत, रूस, चीन एवं ब्राजील) पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने की धमकी देना केवल अमेरिका की व्यापार नीति नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने की सीधी कोशिश है। 500 प्रतिशत का यह टैरिफ रूस, चीन, ब्राजील और भारत पर नहीं बल्कि ब्रिक्स के सदस्य देशों द्वारा डीडोलराईजेशन की ओर अपने कदम बढ़ाने को रोकने का एक प्रयास है। ब्रिक्स के सदस्य देश आपस में किए जाने वाले विदेश व्यापार का एक दूसरे को भुगतान अब स्थानीय मुद्रा में करते दिखाई दे रहे हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर पर दबाव बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा हैं। ब्रिक्स की मुद्रा व्यवस्था, स्थानीय मुद्रा व्यापार सम्बंध एवं डॉलर मुक्त भुगतान व्यवस्था अमेरिका के लिए एक रणनीतिक खतरे के रूप में उभर रही है। इसीलिए अमेरिका छोटे देशों की तरह ही बड़े देशों को भी अनुशासित करना चाहता है। परंतु, यहां अमेरिका यह भूल जाता है कि वेनेजुएला, डेनमार्क, क्यूबा, मेक्सिको आदि छोटे देश हैं जो अपनी जरूरतों के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं परंतु भारत, चीन, रूस एवं ब्राजील जैसे बड़े देशों पर अमेरिका का दबाव काम नहीं कर पाएगा। ट्रम्प प्रशासन की वर्तमान विदेश नीति को 20वीं सदी की “हस्तक्षेपवाद.2” की नीति कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। पिछले 250 वर्षों में अमेरिका ने विश्व के अन्य देशों में 400 बार हस्तक्षेप किया है। अमेरिका के लिए यह एक पैटर्न है आश्चर्य में डालने वाली घटना नहीं है। अमेरिका ने पूर्व में भी आर्थिक दबाव डालकर एवं सैन्य हस्तक्षेप के माध्यम से अन्य देशों में सत्ता परिवर्तन कराने में भी सफलता हासिल की है। और, यह पैटर्न आज भी जारी है। अमेरिका भारत एवं चीन पर केवल इस कारण से भी 500 प्रतिशत टैरिफ लगाना चाहता है क्योंकि ये देश रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल आयात करते हैं। आज के इस युग में अब अमेरिका निर्णय लेगा कि किस देश को कच्चा तेल किस देश से खरीदना है। यह साम्राज्यवाद अथवा अधिनायकवाद की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है?

इसी प्रकार, ट्रम्प प्रशासन द्वारा विश्व के 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों में अमेरिका की सदस्यता को समाप्त करना भी वैश्विक व्यवस्था का पुनर्निर्माण नहीं बल्कि अमेरिका का विश्व में एक छत्र राज्य स्थापित करने की सोच का नतीजा हो सकता है। अमेरिका किसी भी अन्य ब्लाक अथवा देश के साथ मिलकर विश्व पर अपना प्रभुत्व स्थापित नहीं करना चाहता है बल्कि अमेरिका केवल अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है। इस रणनीति के अंतर्गत वैश्विक संगठनों एवं संस्थाओं को कमजोर करने के एकपक्षीय अमेरिकी शक्ति मॉडल को लागू करना ही मुख्य लक्ष्य हो सकता है।

आज अमरीका में ट्रम्प प्रशासन इससे भी परेशान है कि आर्थिक शक्ति का केंद्र पश्चिमी देशों से पूर्वी देशों की ओर खिसकता जा रहा है। इससे ट्रम्प को पूरे विश्व में अमेरिका का आधिपत्य स्थापित करने की रणनीति को धक्का लगता हुआ दिखाई दे रहा है। संख्या, जनसंख्या, संसाधन एवं बाजार के आधार पर आगे आने वाला भविष्य पूर्व के आस पास दिखाई देता है, अमेरिका वैश्विक स्तर पर अपने प्रभुत्व को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता है। अमेरिका आज नहीं चाहता कि चीन, रूस एवं भारत मिलकर विश्व में शक्ति की एक धुरी बनें। साथ ही, ट्रम्प यह भी नहीं चाहता कि भारत वैश्विक स्तर पर अपनी रणनीतिक स्वायतत्ता बढ़ाने में सफल हो तथा डीडोलराईजेशन की व्यवस्था गति पकड़े और यूरोपीय यूनियन के देश अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए। यूरोपीय यूनियन के देशों पर अमेरिका अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है। परंतु, अब तो यूरोपीय यूनियन के देश भी अपने सुरक्षा बजट में अतुलनीय वृद्धि करते हुए दिखाई दे रहे हैं क्योंकि अमेरिका पर इन देशों का विश्वास कम हो गया है। ट्रम्प चूंकि बहुध्रुवीय व्यवस्था में विश्वास नहीं करते है और यह व्यवस्था उनके लिए असहनीय है अतः ट्रम्प समस्त देशों पर टैरिफ युद्ध छेड़कर उन्हें दबाव में लाना चाहते है ताकि अमेरिका पूरे विश्व में अपना एक छत्र राज्य स्थापित कर सके। इसीलिए ट्रम्प आज पूरे विश्व में नियंत्रित अशांति चाहता है। दरअसल, आज अमेरिका की आक्रामक साम्राज्यवादी टैरिफ नीति भी वैश्विक अस्थिरता की सबसे बड़ी जड़ के रूप में उभर रही है।

इसी क्रम में, अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड पर सैन्य कार्यवाही कर ग्रीनलैंड पर अपना आधिपत्य स्थापित करने की कार्यवाही नाटो जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थान को तोड़ सकती है। नाटो के सदस्य देशों ने स्पष्ट रूप से कहा भी है कि अमेरिका का ग्रीनलैंड पर हमला नाटो के सदस्य देशों पर किया गया हमला माना जाएगा। इससे यूरोपीयन देशों एवं अमेरिका के बीच दुर्लभ एवं खतरनाक तनाव दिखाई दे रहा है।

वैश्विक स्तर पर वर्तमान में उभर रही परिस्थितियों को सर्वांगी कूटनीतिक युद्ध की श्रेणी में रखा जा सकता है। इस सर्वांगी कूटनीतिक युद्ध में कच्चे तेल की उपलब्धता पर अपना नियंत्रण बनाए रखना, डॉलर पर अमेरिकी प्रभाव को बनाए रखने के प्रयास ताकि वैश्विक स्तर पर अमेरिका का मुद्रा पर नियंत्रण लगातार आगे भी बना रहे, समुद्री मार्गों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना, तकनीकी सम्पदा को अपने कब्जे में रखना, वैश्विक सप्लाई चैन को प्रभावित करना एवं आरटीफिशीयल इंटेलिजेन्स आदि के माध्यम से ट्रम्प अन्य देशों पर दबाव बनाकर उन्हें अपने प्रभाव में लेने का प्रयास करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसलिए आज प्रत्यक्ष युद्ध नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संरचना को पुनर्गठित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस रचना में ट्रम्प अपने आप को वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। वास्तव में अमेरिका चाहता है कि दुनिया फिर से उसी मोड में लौट आए, जहां वित्त, व्यापार, सैन्य गठबंधन और तकनीक सब उसकी चौखट पर खड़े हों। आज अमेरिका का लक्ष्य सम्भवत: तीसरा विश्व युद्ध नहीं बल्कि वैश्विक व्यवस्था को अमेरिका के प्रभुत्व में पुनर्गठित करना है।

अमेरिका का 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अपने आप को अलग करने के क्रम में अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस से बाहर निकलना पूरे विश्व को स्पष्ट संदेश देता है कि अमेरिका की अब पर्यावरण के क्षेत्र में किए जाने वाले सुधार कार्यक्रमों में भी कोई दिलचस्पी नहीं है तथा वह इस अलायंस को दी जाने वाली अमेरिकी मदद को रोकना चाहता है और वैश्विक स्तर पर केवल अपने प्रभाव को बढ़ाने में ही अपनी पूरी शक्ति लगाना चाहता है। विश्व के भले की बात भी अब अमेरिका को नागवार गुजर रही है। जबकि आज जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक संकट को कम करने अथवा दूर करने में समस्त देशों का आपसी सहयोग अति आवश्यक है। भारत एवं फ्रान्स के संयुक्त नेतृत्व में बनाया गया यह मंच विकासशील देशों के लिए उम्मीद की किरण बन रहा है। विश्व के अन्य देशों में यह भावना विकसित हो रही है कि आज वैश्विक स्तर पर एक ऐसी दुनिया विकसित होती दिखाई दे रही है जिसमें अमेरिका अकेला खड़ा हो एवं विश्व के अन्य समस्त देश आपस में तालमेल रखते हुए अपने विकास को गति दें। वैसे भी, विश्व पहिले से ही इस मुहाने पर आकार खड़ा है जहां अकेले चलना बहुत मुश्किल है हर पग पर विभिन्न देशों को अन्य देशों के सहायता की अति आवश्यकता है। एक दूसरे के सहयोग के बिना सम्भवत: कोई भी देश आज आर्थिक विकास के पथ पर अपनी दौड़ को गति प्रदान नहीं कर पाएगा। इसीलिए वैश्विक स्तर पर आज नए नए समीकरण बनते हुए दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका को छोड़कर ये देश आपस में मुक्त व्यापार समझौते तेजी से सम्पन्न कर रहे हैं ताकि ये, अपने देश के आर्थिक विकास की गति को तेज कर सकें।

Yamuna – The Lifeline of Delhi: Pollution vs Solution

2-2-7.jpeg

New Delhi | Recognising the Yamuna River as the lifeline of Delhi and the urgent need for collective action to address its pollution, the 1st Annual Conference – “Yamuna: Pollution vs Solution” was organised today as a half-day, stakeholder-driven and action-oriented platform.

The conference was convened under the concept of “Yamuna Sangam”, envisioned as a collaborative platform to connect SMEs, government representatives, scientists, environmental experts, authors, media professionals, NGOs, educators, youth and community members actively engaged in the conservation and rejuvenation of the Yamuna River. The initiative brought together a true sangamof ideas, expertise and on-ground experience to deliberate on sustainable solutions.

The event was organised in collaboration with Bal Bharati Public School, Ganga Ram Hospital Marg, and was supported by the National Mission for Clean Ganga (NMCG), Ministry of Jal Shakti. The conference aimed to strengthen the transition from Jal Bhagidari to Jan Bhagidari, reinforcing river conservation as a Jan Andolan.

A key highlight of the conference was the address by Mohd Najeeb Ahsan, who shared valuable insights into the Namami Gange Mission and ongoing initiatives for river rejuvenation. Dr Gladbin Tyagihighlighted the health impacts of Yamuna pollution on communities, underlining the urgent need for integrated environmental and public health interventions. The event was graced by Capt Vikas Gupta, Chairman, UPCAR (MoS).

The conference witnessed the participation of a diverse audience, including Gen Z participants, students, NGOs and community volunteersworking across various Yamuna ghats. Beyond discussions, the conference successfully facilitated networking, dialogue and collaboration among stakeholders to enhance collective impact.

As a key outcome, working groups were formed for individual Yamuna ghats, enabling stakeholders to collaborate regularly on solution-oriented, on-ground initiatives at their respective locations. This approach was envisaged to ensure continuity, coordination and sustained engagement for the rejuvenation of the Yamuna.

Through Yamuna Sangam, the conference moved beyond dialogue to promote collective ownership, coordinated action and long-term partnerships, reaffirming a shared commitment to restoring the Yamuna River and safeguarding the ecological and public health future of Delhi.

scroll to top