आगरा ताजमहल के लिए मशहूर है।
मोहब्बत की निशानी। लेकिन ज़रा शहर की गलियों में घूमिए। एक और “स्मारक” नज़र आएगा।
गालियों का स्मारक।
यहाँ तालीम मायने नहीं रखती।
तहज़ीब भी नहीं। दौलत भी नहीं।
आगरा में एक लोकतांत्रिक ज़बान है;
गालियों की ज़बान।
सब्ज़ी बेचने वाला। स्कूटर मिस्त्री।कॉलेज का छात्र। पान की दुकान पर बैठे बुज़ुर्ग। गुटके की पीक बौछार के साथ गालियों का मधुर रस!
लेकिन इस कहानी में एक अजीब मोड़ है।
ज़्यादातर गालियाँ औरतों के नाम पर टिकती हैं। माँ। बहन। बेटी ।
झगड़ा चाहे पार्किंग का हो या बिजली बिल का; इज़्ज़त किसी की माँ-बहन की ही उछलती है।
आगरा की हवा में भाषाई प्रदूषण तैरता है। लेकिन किसी को तकलीफ़ नहीं। लोगों को इसकी आदत पड़ चुकी है। जैसे सड़क का शोर।
औरतें भी पीछे नहीं। वे भी इस कला में कम उस्ताद नहीं। उम्र की कोई पाबंदी नहीं। दादी-नानी भी ऐसी शब्दावली चला सकती हैं कि ट्रक ड्राइवर भी शर्मा जाए।
एक ज़माना था जब बातों में नज़ाकत होती थी। मुहावरों से बात सजती थी।कहावतों से तर्क मजबूत होते थे।शेर-ओ-शायरी से बात में नूर आ जाता था।
आजकल ग़ुस्सा बढ़ा है। सब्र घटा है।और ज़बान गरीब हो गई है। जब लफ़्ज़ कम पड़ते हैं; गाली हाज़िर हो जाती है।
हर वाक्य में जिस्मानी इशारे। हर झगड़े में माँ-बहन का जिक्र। असल ग़ुस्सा ट्रैफिक पर होता है; लेकिन निशाना औरत बनती है।
यह सवाल शायद ही किसी को परेशान करता है। ग्रामीण आगरा हो या शहर, गाली कई लोगों के लिए ग़ुस्सा निकालने का सबसे आसान ज़रिया है।
ज़िंदगी मुश्किल है। नाइंसाफ़ी बहुत है। दिल में भड़ास भरी है। तो लोग गाली देते हैं। न खून-खराबा। न पुलिस केस। बस ज़बानी आतिशबाज़ी।
कुछ लोग तो इसे सामाजिक हथियार भी बताते हैं। “गाली एक तरह का अहिंसक विरोध है। गोली नहीं चलती। बस ज़बान चलती है।”
अजीब ख्याल है।
लेकिन पूरी तरह बेबुनियाद भी नहीं।
गालियाँ अक्सर उस ग़ुस्से की आवाज़ होती हैं जो व्यवस्था से निराश आम आदमी के भीतर जमा होता रहता है।
फिर भी एक सवाल बार-बार उठता है। हर गाली औरत के इर्द-गिर्द ही क्यों घूमती है? माँ। बहन। बेटी।
यह कैसी मानसिकता है जिसमें औरत को इज़्ज़त का बर्तन बना दिया गया है?
सामाजिक विश्लेषक श्रीवास्तव तो और आगे जाते हैं। उनका कहना है; समाज में बदलाव गोलियों से नहीं, गालियों से आता है। भारत जैसे अहिंसा-प्रिय समाज में गाली ग़ुस्से का वैध इज़हार है। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि गालियों का दायरा बढ़ना चाहिए।
नई तरह की, एलजीबीटी-दोस्त गालियाँ भी बननी चाहिए।
बात चौंकाने वाली है। लेकिन हमारी परंपरा भी कम अजीब नहीं।
उत्तर भारत की शादियों में दूल्हे की बारात का स्वागत औरतें लयबद्ध गालियों से करती हैं। सब हँसते हैं।मज़ा लेते हैं। एक सांस्कृतिक रस्म।
गली-मुहल्लों की मिली-जुली संस्कृति में भी गाली का अपना मुकाम है। चाय की दुकान। बाज़ार। बस अड्डा। हर जगह यह खुरदुरी भाषा सुनाई देती है।
पुलिस की नौकरी करनी हो तो शायद गाली-शास्त्र में पारंगत होना भी ज़रूरी है।
कवि खुसकेट अकबराबादी ने बरसों पहले लिखा था “जिसे गाली देना नहीं आता, उसकी ज़िंदगी अधूरी है।”
आगरा इस बात को पूरी शिद्दत से साबित करता है। यहाँ लोग लड़ाई में हथियार कम निकालते हैं। गालियाँ ज़्यादा।
जहाँ समाज बीमार होता है; वहाँ पिस्तौल चलती है।
जहाँ लोग थोड़े सभ्य होते हैं; वहाँ गाली से काम चल जाता है।
लेकिन आगरा की गाली संस्कृति पर एक नया खतरा मंडरा रहा है।
पश्चिमी असर। शहर संस्कृति के जानकार एक पंडित दुखी हैं। उनका कहना है कि आज के नौजवानों ने गालियों की पूरी विरासत बरबाद कर दी। उनकी पूरी शब्दावली बस दो अंग्रेज़ी लफ़्ज़ों में सिमट गई है;
“ओह शिट।”
बस। न कोई तर्ज़। न कोई रंग।
आगरा की पुरानी गालियों में रचनात्मकता थी। लय थी। अदायगी थी। अब सब कुछ ग्लोबलाइजेशन की भेंट चढ़ रहा है।
फिर भी शहर चलता जा रहा है।
ताजमहल में दुनिया मोहब्बत देखने आती है। और बाहर गलियों में लोग ग़ुस्सा निकालते रहते हैं।
शायद बुज़ुर्ग ठीक ही कहते हैं; गालियां भाषा का श्रृंगार हैं। गालियाँ ज़बान में करंट भर देती हैं। बात में बेबाकी लाती हैं।
बस एक छोटी-सी गुज़ारिश है। अगली बार ग़ुस्सा आए: किसी की माँ को बख्श दीजिए। बेचारी भाषा में बहुत पहले ही शहीद हो चुकी है।
Full Post Style
दुश्मन कैसे बढ़ाएँ, दोस्त कैसे खोएँ , ट्रंप से सीखिए क्या ईरान बनेगा ट्रम्प का वाटरलू?
बृज खंडेलवाल
लखनऊ । क्या ईरान डोनाल्ड ट्रंप का वाटरलू बनेगा?
तारीख़ गवाह है कि इतिहास को ऐसे लम्हे बहुत पसंद आते हैं।
एक फैसला। एक जुआ। एक जंग।
और अचानक जो अजेय लगता था, वह भी कमजोर नज़र आने लगता है।
28 फरवरी 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने एक नाटकीय सैन्य कार्रवाई का हुक्म दिया: ऑपरेशन एपिक फ्यूरी। सब कुछ बहुत तेज़ हुआ। खामोशी से। लेकिन धमाकेदार अंदाज़ में।
अमेरिका और इज़राइल की संयुक्त फौजी कार्रवाई ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। मिसाइलें कमांड सेंटरों को चीरती हुई गुज़रीं। हवाई हमलों ने बेस और इन्फ्रास्ट्रक्चर को तबाह किया। फिर सबसे बड़ा झटका आया। ईरान के सुप्रीम लीडर अली खमेनेई इन हमलों में मारे गए।
पूरा मध्य-पूर्व सांस रोके खड़ा था।
वॉशिंगटन में जश्न। तेहरान में गुस्सा और आग। देखते देखते जंग दूसरे हफ्ते में दाखिल हो गई।
व्हाइट हाउस ने इसे मजबूत लीडरशिप बताया। एक बहादुर कदम। ज़रूरी कार्रवाई। सरकार का दावा था कि इससे ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम कुचल जाएगा। शायद हुकूमत भी बदल जाए।
खुद ट्रम्प का लहजा भरोसे से भरा था। “ताकत के ज़रिए अमन,” उन्होंने कहा। उनका कहना था कि यह टकराव “बहुत जल्दी खत्म” हो सकता है।
लेकिन जंगें अक्सर राष्ट्रपति की टाइमलाइन नहीं मानतीं। खासतौर पर मध्य-पूर्व में।
बिना तालियों की जंग
अगर ट्रम्प को लगा था कि अमेरिका में जबरदस्त देशभक्ति की लहर उठेगी, तो ऐसा नहीं हुआ। माहौल कुछ और है। बेचैनी। शक।और घबराहट।
सर्वे इस कहानी को साफ बताते हैं।
CNN/SSRS के सर्वे में
59% अमेरिकियों ने हमलों को गलत बताया। सिर्फ 41% ने समर्थन किया।
NPR/PBS/Marist के पोल में
56% लोग फौजी कार्रवाई के खिलाफ हैं। 44% इसके हक में।
Reuters/Ipsos का आंकड़ा और सख्त है। सिर्फ 27% लोग हमलों का समर्थन कर रहे हैं।
यह जोश नहीं है। यह हिचक है।
हमलों के बाद ट्रम्प की कुल लोकप्रियता भी गिरकर 40–45% के बीच आ गई है। इसे जबरदस्त समर्थन नहीं कहा जा सकता।
अमेरिका साफ-साफ बंटा हुआ है।
रिपब्लिकन पार्टी के करीब 84% लोग इस कार्रवाई के साथ हैं।
डेमोक्रेट्स में 86% लोग इसके खिलाफ हैं।
इंडिपेंडेंट मतदाता भी ज्यादातर विरोध में हैं।
कई सर्वे में 55–59% लोग जंग को बढ़ाने के खिलाफ दिखते हैं।
यह एकता नहीं है। यह गहरी ध्रुवीकरण की तस्वीर है। और बिना राष्ट्रीय एकता की जंग अक्सर सियासी दलदल बन जाती है।
झंडे के पीछे भीड़ नहीं
पहले की जंगों में जनता तुरंत साथ खड़ी हो जाती थी। 11 सितंबर के हमलों के बाद अफगानिस्तान युद्ध को 92% समर्थन मिला था। इराक युद्ध से पहले करीब 72% लोग समर्थन में थे।
आज?
मुश्किल से आधा देश साथ है। कई जगह इससे भी कम। न कोई राष्ट्रीय उबाल। न देशभक्ति की लहर। बस चिंता।
अमेरिकियों को पिछली मध्य-पूर्व की जंगें याद हैं। और उनका अंजाम भी।
एक और सवाल व्हाइट हाउस का पीछा कर रहा है। आख़िर असली प्लान क्या है?
कई सर्वे बताते हैं कि अमेरिकियों को लगता है कि साफ योजना ही नहीं है।
क्या यह सीमित हमला है? क्या यह सरकार बदलने की कोशिश है? या फिर एक और अंतहीन जंग की शुरुआत?
वॉशिंगटन अभी तक भरोसे से जवाब नहीं दे पाया है। और अनिश्चितता डर को जन्म देती है।
एक और मसला संवैधानिक है। कांग्रेस ने इस हमले को मंजूरी नहीं दी थी। यह बात अहम है।
सर्वे बताते हैं कि 59% अमेरिकी मानते हैं कि फौजी कार्रवाई के लिए कांग्रेस की अनुमति जरूरी होनी चाहिए। आलोचकों का कहना है कि व्हाइट हाउस ने अकेले फैसला लिया।
हर जंग का एक अंधेरा पहलू होता है।
अब नागरिकों के हताहत होने की खबरें सामने आ रही हैं। एक अमेरिकी हमले में ईरान के शहर मिनाब में एक लड़कियों का स्कूल भी निशाने पर आ गया, ऐसा बताया जा रहा है।
विदेशों में नाराज़गी बढ़ी है। और अमेरिका में भी असहज सवाल उठ रहे हैं। युद्ध कक्षों में लक्ष्य और नक्शे होते हैं। जमीन पर इंसान होते हैं।
सबसे दिलचस्प असर ट्रम्प के अपने समर्थक खेमे में दिख रहा है। कुछ प्रमुख कंज़र्वेटिव आवाज़ें भी बेचैन हैं।
टीवी होस्ट Tucker Carlson ने गहरे फौजी दखल से सावधान रहने की बात कही है। उन्हें डर है कि यह एक और अंतहीन जंग बन सकती है।
यहाँ तक कि Laura Ingraham ने भी प्रशासन से नागरिक मौतों पर ज्यादा ईमानदार जवाब मांगा है। दरारें छोटी हैं। लेकिन दिख रही हैं।
अमेरिकी राजधानी में सियासी जंग तेज़ है। रिपब्लिकन इसे जरूरी कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि ईरान परमाणु खतरा बन चुका था।
डेमोक्रेट्स की राय बिल्कुल अलग है।
वे इसे “चुनी हुई जंग” कहते हैं। एक खतरनाक बढ़ोतरी। बिना साफ वजह के शुरू हुआ संघर्ष। बहस तेज़ है।कड़वी है। और बहुत जानी-पहचानी भी। अमेरिका यह बहस पहले भी देख चुका है।
वॉशिंगटन से बाहर भी माहौल उबल रहा है। कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर बहस आग की तरह फैल रही है।
समर्थकों का कहना है कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा ने कोई और रास्ता छोड़ा ही नहीं था।
विरोधियों का कहना है कि देश फिर से इराक वाली गलती दोहरा रहा है।
सच शायद हमेशा की तरह गोलियों और बमों के बीच कहीं दबा पड़ा है।
रणनीति से परे एक गहरा सवाल खड़ा है। जंग की कीमत क्या होती है? हर मिसाइल के साथ नतीजे आते हैं।अमेरिकी सैनिक खतरे में पड़ते हैं।ईरानी नागरिक तबाही झेलते हैं।पूरा इलाका अस्थिर हो जाता है। बमबारी शायद ही कभी नफरत खत्म करती है। अक्सर वह अगली जंग के बीज बो देती है। इतिहास इस बात का बेरहम गवाह है।
ट्रम्प के लिए ऑपरेशन एपिक फ्यूरी एक बड़ा जुआ है। अगर ईरान जल्दी ढह गया, तो वह इसे ऐतिहासिक जीत बताएंगे। लेकिन अगर जंग लंबी खिंची, तो सियासी कीमत बहुत भारी हो सकती है। जंगों ने पहले भी राष्ट्रपतियों की कुर्सी हिलाई है। और इराक और अफगानिस्तान की परछाइयाँ अभी भी अमेरिका की यादों में जिंदा हैं।
इसलिए सवाल अभी भी हवा में तैर रहा है। धीरे-धीरे। बेचैनी के साथ। क्या यह ट्रम्प की सबसे बड़ी जीत बनेगी? या वही पल जिसे इतिहास उनका वाटरलू कहेगा?
श्रेय लेने का उतावलापन: सेल्फ़ी युग में सेवा कम, पोस्ट ज़्यादा
भोपाल : सेवा का काम शोर नहीं, असर होना चाहिए ।
लेकिन आज के समय में असर से पहले पोस्ट आ जाती है।
गौर से देखें, समाजसेवा भी कुछ-कुछ क्रिकेट मैच जैसी हो गई है। सबकी नज़र स्कोरबोर्ड पर है; किसने सबसे पहले ट्वीट किया। किसने फेसबुक पर “ब्रेकिंग” डाली। किसने फोटो के साथ लिखा ; “मेरे प्रयासों से…”
मुद्दा क्या था, यह बाद में याद आता है। पहले याद आता है : पोस्ट किसकी वायरल हुई।
आजकल सेवा कम, सेल्फ़ी ज़्यादा होती है।
किसी ने गड्ढे की शिकायत की। गड्ढा भरने से पहले पाँच पोस्ट आ गईं : “देखिए, मेरे प्रयास से नगर निगम हरकत में।”
नगर निगम बेचारा सोचता रह जाता है, गड्ढा हमने भरा, श्रेय किसी और ने भर लिया।
एक्टिविस्ट हैं या डिजिटल इन्फ्लुएंसर?
एक ज़माना था जब समाजसेवक चुपचाप काम करते थे। लोग बाद में बताते थे : “अरे, यह काम फलाँ व्यक्ति ने करवाया था।”
अब दौर उल्टा है। पहले घोषणा होती है। फिर पोस्ट होती है। फिर टैगिंग होती है। फिर हैशटैग चलता है।
काम कब होता है ?
यह कभी-कभी प्रशासन को भी बाद में पता चलता है।
अब एक्टिविस्ट और इन्फ्लुएंसर में फर्क करना मुश्किल हो गया है।
फर्क बस इतना है कि इन्फ्लुएंसर साबुन बेचता है और एक्टिविस्ट श्रेय बेचता है।
RTI: सूचना का अधिकार या श्रेय का अधिकार?
RTI एक शानदार औज़ार है। लोकतंत्र का एक्स-रे मशीन। सवाल पूछो, तो सरकार को जवाब देना पड़ता है।फाइलें खुलती हैं। सच बाहर आता है।
लेकिन हमारे यहाँ RTI का एक नया संस्करण भी आ गया है :
RTI = “Recognition Through Internet.”
यानी सूचना बाद में, पहचान पहले।
RTI लगाई नहीं कि पोस्ट तैयार :
“मेरी RTI से बड़ा खुलासा!” खुलासा क्या हुआ, यह तो बाद में पढ़ा जाएगा।
पहले यह देख लिया जाए कि पोस्ट पर कितने लाइक आए। कभी-कभी लगता है
RTI फाइल कम, प्रेस रिलीज़ ज़्यादा हो गई है। मुद्दा पीछे, चेहरा आगे, आजकल हर आंदोलन में दो मोर्चे होते हैं।
एक असली मोर्चा ; जहाँ समस्या है।दूसरा सोशल मीडिया मोर्चा ; जहाँ फोटो है।
पहले लोग वृक्ष बचाते थे।
अब लोग किनारे खड़े होकर
सेल्फ़ी बचाते हैं।
किसी ने सफाई अभियान में झाड़ू उठाई।
अगले ही पल फोटो पोस्ट ; “ शहर सफाई के लिए मेरी लड़ाई।” शहर बेचारा मन में सोचता होगा :
“भाई, झाड़ू चलाओ या कैमरा?”
श्रेय की राजनीति
हमारे समाज में श्रेय भी राजनीति जैसा हो गया है। सबको चाहिए। और तुरंत चाहिए। कुछ विशेषज्ञ छपास रोग को दोष देते हैं।
अगर कहीं कोई अच्छा काम हो जाए
तो पाँच लोग तुरंत प्रकट हो जाते हैं ,
“यह मेरे प्रयासों से हुआ।”
छठा व्यक्ति थोड़ा विनम्र होता है। वह लिखता है ; “मेरे छोटे से प्रयास का परिणाम।”
छोटा प्रयास इतना छोटा होता है कि कभी-कभी दिखता ही नहीं। लेकिन पोस्ट बहुत बड़ी होती है।
सेवा या व्यक्तिगत ब्रांडिंग?
सोशल मीडिया ने एक नई चीज़ पैदा की है : “पर्सनल ब्रांड एक्टिविज़्म।”
यहाँ उद्देश्य समस्या हल करना नहीं, प्रोफ़ाइल चमकाना होता है। जैसे ही कोई मुद्दा ट्रेंड करता है, कुछ लोग तुरंत पहुँच जाते हैं।
एक फोटो। एक लंबा पोस्ट। दो-चार टैग। और अंत में लिखा ; “संघर्ष जारी रहेगा।”
संघर्ष कहाँ जारी है ; यह पता नहीं।
लेकिन पोस्ट जरूर जारी रहते हैं।
सच थोड़ा सादा होता है। सच यह है कि समाज का कोई भी काम एक व्यक्ति से नहीं होता। कई लोग मेहनत करते हैं। कुछ सामने दिखते हैं। कई लोग पर्दे के पीछे रह जाते हैं।
लेकिन आजकल पर्दे के पीछे रहना। किसी को पसंद नहीं। शायद बदबू आती है।
हर किसी को लगता है, इतिहास उसी से शुरू होता है। मर्यादा आजकल थोड़ा पुराना फ़ैशन लगती है।
संयम का मतलब है : काम होने दो,
फिर बोलो। लेकिन सोशल मीडिया का नियम है , पहले बोलो, फिर काम होने का इंतज़ार करो।
असली संतोष कहाँ है?
सच पूछिए तो सेवा का असली सुख, लाइक और शेयर में नहीं होता। वह उस दिन होता है, जब समस्या सच में हल हो जाती है।
ताली की आवाज़ दो सेकंड रहती है।परिवर्तन की गूँज वर्षों तक। लेकिन यह बात समझने के लिए थोड़ा धैर्य चाहिए।
और धैर्य…
सोशल मीडिया की दुनिया में, सबसे दुर्लभ संसाधन है।
मनु स्मृति पर सबसे बड़ा खुलासा
राकेश उपाध्याय
दिल्ली। मनु स्मृति कब लिखी गई से ज्यादा बड़ा सवाल है कि इसमें संशोधन या प्रक्षेपण कब-कब हुआ? षड्यंत्रकारी अंग्रेजों के संपादन से, उनकी प्रेस से छपकर जो देश भर में बांटा गया, वही असली मनु स्मृति है, इसे कैसे सत्य मान लें? भारत में प्रेस प्रौद्योगिकी के विकास के साथ इस ग्रंथ मनु स्मृति को ही सबसे पहले ब्रिटिश प्रेस ने क्यों प्रकाशित किया?
आंख मूंद कर, दिमाग बंदकर सब कुछ मानने का समय अब जा चुका है। अब तो हर मुद्दे पर सवाल उठकर ही रहेगा। कुछ बड़े लोग कुछ ज्यादा बोलने के आदी हो गए हैं, उनसे निवेदन है कि अब सावधान हो जाएं, बिना शोध और अनुसंधान के कुछ। भी बोलने से बचें। क्योंकि बोलेंगे तो सवाल भी उठेंगे। हर विषय को सवालों की तीखी बौछार से गुजरना होगा। सवाल उठाने से रोकना गैर-अकादमिक है।
सबसे बड़ा सवाल है कि मनु स्मृति के कथित विभेदकारी सूत्रों के बारे में अंग्रेजों के भारत आगमन के पूर्व के भारतीय बौद्धिक मन में कोई प्रश्न कभी भी क्यों नहीं उठा? क्यों भगवान बुद्ध से लेकर कामंदक, बाणभट्ट से लेकर रैदासजी, कबीर आदि तक किसी ने मनु स्मृति पर नाम लेकर कटाक्ष क्यों नहीं किए? आखिर मनु स्मृति के विभेदकारी सूत्रों पर भारतीय बौद्धिक मन का ध्यान अंग्रेजों के प्रकाशन के बाद ही क्यों गया? अंग्रेजों के पहले पूरे भारतीय भक्ति साहित्य या किसी अन्य साहित्य में बौद्ध-जैन आदि में मनु के विरूद्ध एक पंक्ति नहीं लिखी है तो क्यों नहीं लिखी है? क्या बुद्ध ने इसलिए मनु स्मृति के विरूद्ध बोलना उचित नहीं माना कि वह उन्हीं के कुल में जन्में थे? ध्यान रहे कि बुद्ध इक्ष्वाकु कुल के थे और इक्ष्वाकु कुल के मूल आदिपुरुष मनु महाराज ही बताए गए हैं।
तो इतना आसान नहीं है किसी निष्कर्ष पर पहुंचना।
सदैव ध्यान में रखिए कि मनु स्मृति का पहला प्रकाशन (लेखन नहीं) ब्रिटिश राज में प्रिंटिंग प्रेस आने के बाद 1776 में विलियम जोन्स ने कराया था। इसके पीछे बंगाल (ब्रिटिश इंडिया) के पहले गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स का सीधा निर्देश था।
कहते हैं कि इसके प्रकाशन के पहले विलियम जोन्स की सलाह से 11 बड़े पंडितों की कमेटी बनाई गई। रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल ने एक बड़े प्रोजेक्ट के अंतर्गत देश में तब तक मनु स्मृति की प्राप्त कथित पांडुलिपियों को जो भोजपत्र पर या ताड़पत्र पर अंकित थीं, उनका संकलन इस कमेटी के सुपुर्द किया। कहा गया कि न्याय को मानने वाली ब्रिटिश राज की कोर्ट हिंदू प्रजा को उसकी विधि से न्याय देगी, इसलिए हिंदुओं की विधि का संकलन, प्रकाशन आवश्यक है। मुस्लिम प्रजा को मुस्लिम विधि से न्याय दिया जाएगा। इसी घोषणा के द्वारा विभाजन के विषबीज को ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में रोप दिया।
इस समिति में पंडित तर्कवाचस्पति, तर्क पंचानन, न्याय पंचानन, बाणेश्वर विद्यालंकार (बर्दवान) आदि अनेक शाही संरक्षण में अथवा सरकारी धन पर आश्रित बंगाली पंडित सम्मिलित थे। इस कमेटी में काशी की विद्वत्त पंरपरा या काशी की वैदिक पंरपरा में शिक्षित कोई ब्राह्मण सम्मिलित नहीं किया गया। क्यों ऐसा किया गया? क्योंकि काशी गणराज्य में कभी भी कोई अछूत जाति इतिहास के किसी काल में नहीं रही। आज तो होने का कोई प्रश्न ही नहीं।
अंग्रेजी राज की पहली संपादन समिति विलियम जोन्स की अध्यक्षता में गठित की गई। इसमें जो 11 विद्वान थे, सभी बंगला भाषी, संस्कृत परंपरा से लिए गए। विधि के जानकार थे। सभी अंग्रेजों द्वारा उपकृत जमींदारों, राजपरिवारों की परंपरा से शिक्षा सेवा में जुटे थे, अनेक नए सरकारी स्कूलों में पद प्रतिष्ठित हो गए थे।
इस कमेटी के सभी विद्वानों को बड़ी भारी स्कॉलरशिप या फेलोशिप दी गई। मुंहमांगी कीमत दी गई। विलियम जोन्स ने इनके सामने एक समग्र विधि संग्रह और विशेष रूप से मनुस्मृति के प्रकाशन की अवधारणा प्रस्तुत की।
इसके नोट्स रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की जिल्दों में मिल सकते हैं, काफी सामग्री लंदन स्थित ऑफिस से मिल सकती है, जैसा कि मेरे गुरुदेव प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने मुझे बताया था कि मेधातिथि, कुल्लुक भट्ट की टीका या उनके भाष्य के साथ की कथित मनु स्मृति की पांडुलिपि की अनेक जीर्ण प्रतियां समिति को दे दी गईं। उनकी जांच परम आवश्यक है कि क्या वह सचमुच मनु स्मृति थी? वह प्रतियां विलियम जोन्स को सबसे पहले मिली तो कहां से मिली? किसने दी? उन प्रतियों का मिलान क्या दूसरी पांडुलिपियों से किया गया? केरल, कश्मीर, कोलकाता, काशी, जयपुर, पुणे, भुवनेश्वर, कांची, बदरीनाथ मठ, केदारनाथ, द्वारिका, उज्जैन से कौन कौन सी पांडुलिपियां मिलीं और क्या उनका भी मिलान किया गया? इन प्राचीन स्थानों से यदि मनु स्मृति की पांडुलिपि नहीं मिली तो क्यों नहीं मिली, और यदि मिली हैं तो वह कहां कहां सुरक्षित और संरक्षित हैं, आदि अनेक सवालों का उत्तर आज की नई पीढ़ी मांग रही है।
इस आरोप के संदर्भ में अनेक तथ्य प्रकाश में हैं कि इस संपादन प्रक्रिया में कालांतर में मनचाहे तरीके से भोजपत्रों के जीर्ण पन्ने इधर-उधर से लाकर मनु स्मृति के नाम पर घुसा दिए गए। और इसके लिए भी भारी षड्यंत्र सोसायटी के अंग्रेज अफसरों ने पहले ही रच रखा था।
पहला प्रकाशन 1776 में ही हो गया। किंतु बाद में ध्यान में आया कि बहुत कुछ नया कूट रचित श्लोक तो इसमें डाला ही नहीं जा सका। तो पुनः 1886 में, 1894 में मनु स्मृति का नए सिरे से ब्रिटिश प्रेस ने प्रकाशन किया।
यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों ने इस बीच मुंह मांगी कीमत पर देश के प्रत्येक राजमहल के पुस्तकालयों को खंगाल डाला और जहां भी पांडुलिपियां थीं, उन्हें संरक्षण देने के नाम पर रॉयल एशियाटिक सोसायटी के दफ्तर में अनिवार्य रूप से जमा कराने का आदेश सभी जिलाधिकारियों, ऑर्कियालॉजी या प्राचीन इतिहास पर काम कर रहे अंग्रेज विद्वानों को जारी कर दिया।
यह भी कहा गया कि सभी का प्रकाशन सजिल्द सोसायटी के द्वारा करवाकर सभी को संरक्षित और सुरक्षित कर दिया जाएगा। देश के अनेक भोले विद्वानों ने, अंग्रेजी कृपा और धन से संरक्षित लोगों ने पांडुलिपि की प्रतियां अंग्रेजों के हवाल कर दीं।
इस प्रकार षड्यंत्रपूर्वक प्रथम संपादक विलियम जोन्स जो कि उस समय की सर्वोच्च ब्रिटिश अदालत का जज था, उसने मनु स्मृति का प्रकाशन कराया। नियमानुसार वही इसका प्रथम लेखक और संपादक हुआ, इस मनु स्मृति की प्रथम प्रकाशक ब्रिटिश हुकूमत है।
इसमें जितनी मिलावटें की गईं, इनके विरोधाभासी श्लोक मनु स्मृति में मिलते हैं तो यही कारण है कि मिलावट की गई, जिसमें विलियम जोन्स ने संपादन किया।
मुझे मेरे गुरुदेव ने बताया था कि पूरे भारतीय वांग्मय में मनु स्मृति के भेदभाव परक श्लोक अन्य नीतिग्रंथों में या प्रमुख नीतिकारों के ध्यान में क्यों नहीं आए?
आखिर मनु स्मृति के श्लोकों पर महात्मा बुद्ध का ध्यान क्यों नहीं गया? क्यों कौटिल्य के ग्रंथ में भेदभाव का मनु स्मृति आधारित उल्लेख उद्धृत नहीं है? क्यों नीति मयूख में या कामंदकीय नीतिसार में जो पांचवीं सदी का नीति ग्रंथ है, या उसके बाद के नीतिकार सोमदेव सूरि के ग्रंथ में, वीर मित्रोदय में, मानसोल्लास में मनु स्मृति के भेदभावपरक श्लोक का कोई उल्लेख नहीं है?
क्योंकि अनेक नीति ग्रंथ अंग्रेजों का हाथ नहीं लग सके। कौटिल्य अर्थशास्त्र का प्रकाशन तो गणपति शास्त्री और शाम शास्त्री ने 1904-05 में किया। अंग्रेज खोजते रह गए लेकिन कौटिल्य अर्थशास्त्र उन्हें नहीं मिला।
वो उसे लेकर उसमें मिलावट कर पाते, उसके पहले ही मैसूर के महाराज ने उसे छाप दिया। अंग्रेज को काटो तो खून नहीं। इसलिए तब के अंग्रेज विद्वानों ने इस कौटिल्य अर्थशास्त्र को सच मानने से इंकार किया। ये तो बाद में एक पांडुलिपि बाली से मिल गई, कुछ मूल बौद्ध पांडुलिपियां श्रीलंका से मिलीं जिसमें कौटिल्य का जिक्र था, और इनका मूल से मिलान हुआ तब पता चला कि कौटिल्य अर्थशास्त्र सत्य है।
आज इन मौलिक प्रश्नों का उत्तर खोजा जाना अनिवार्य है कि
1-यदि मौजूदा मनु स्मृति सत्य है और इसमें मिलावट नहीं है तो इस तथ्य का स्पष्टीकरण दें कि आखिर बुद्ध, कौटिल्य, कामंदक, सोमदेवसूरि, बाण भट्ट, रामानुज, रामानंद, रैदास, कबीर आदि ने क्यों कभी मनु स्मृति पर प्रश्न नहीं उठाए? इसके उलट सभी ने मनु का नाम जब भी लिया है, आदर से लिया है। रैदास जी की वाणी में भी मनु का नाम आदर से लिया गया है।
2-यदि मिलावट नहीं है तो रॉयल एशियाटिक सोसायटी का मौजूदा ऑफिस सन् 1776 में प्रकाशित मनु स्मृति की मूल कॉपी को सार्वजनिक क्यों नहीं करता? क्यों पहली प्रति आउट ऑफ प्रिंट बताकर फिर से 1786, 1794 में मनु स्मृति का प्रकाशन किया गया?
3-और जिन पांडुलिपियों के आधार पर मनु स्मृति प्रकाशित की गई, वह पांडुलिपियां आखिर रॉयल एशियाटिक सोसायटी ने क्यों जला दीं?
4-जिन पांडुलिपियों को संरक्षित करने के नाम पर लिया गया था, वह पांडुलिपियां यदि आज भी सुरक्षित हैं तो कहां हैं, और उन्हें क्योें कभी विद्वानों के लिए दोबारा सार्वजनिक नहीं किया गया? केवल अंग्रेजों द्वारा संकलित प्रति ही क्यों देश भर में बांटी जाने लगी या वितरित कराई गई, फिर जलाने और उसे लेकर सरकारी संरक्षण में गुलामी के समय में बहस आदि का प्रबंध कराया जाने लगा।
जबकि देश जानता है कि परंपरा से किसी हिंदू घर में कभी मनु स्मृति रखने का ही विधान नहीं रहा।
3-यह प्रश्न इसलिए क्योेंकि मेरे गुरुदेव् प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने अनेक अवसरों पर रॉयल सोसायटी के दफ्तर जाकर मूल पांडुलिपियों को देखने और पढ़ने की इच्छा प्रकट की थी जिनके आधार पर आज की मनु स्मृति विलियम जोन्स के संपादन और स्वामित्व में प्रकाशित की गई थी। लेकिन कभी मूल पांडुलिपि की प्रति उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई।
4-संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार Narendra Modi PMO India Gajendra Singh Shekhawat और आईसीएचआर-भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद और आईसीएसएसआर- भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद से मेरा विनम्र निवेदन है कि
-तत्काल अंग्रेजों के आगमन के पूर्व की मनु स्मृति की पांडुलिपि की खोज के लिए देश भर के समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित करना चाहिए।
-जिस पांडुलिपि के आधार पर संपादक विलियम जोन्स ने मनु स्मृति का पहला प्रकाशन कराया, उन पांडुलिपियों का पता लगाकर उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
-इस शोध आधारित अध्ययन के लिए वरिष्ठ विद्वानों की देख-रेख में समिति बनाकर इस कार्य के लिए सुदीर्घ प्रोजेक्ट स्वीकृत किए जाने चाहिए।
-शोध पूर्वक इनमें देखा जाना चाहिए कि ये पांडुलिपि मनु स्मृति की हैं भी या नहीं है? या बनावटी और जाली, फर्जी पांडुलिपियों के जरिए भारत में बंटवारे की राजनीति को ही पुस्तक के रूप में प्रथम प्रकाशित किया गया।
आईसीएचआर और आईसीएसएसआर में बैठे हुए बड़े विद्वान प्रोफेसरों से मेरा आग्रह है कि यदि उन्हें कठिनाई है तो मैं स्वयं इस कार्य में समय देने को तैयार हूं। और भी लोग हो सकते हैं जिनके संपर्क में विद्वान प्रोफेसरों की बड़ी टोली रहती है। उनमें से भी नाम लिए जा सकते हैं, क्योंकि यह राष्ट्रीय महत्व का कार्य है। जो इस कार्य को बड़े पवित्र रूप से, बिना किसी पूर्वाग्रह के करने को तैयार हैं और सारी शोध प्रक्रिया को पारदर्शी ढंग से करना जानते हैं, उन्हें इस कार्य में शीघ्र लगाया जाना चाहिए।
मनु स्मृति की वह मूल पांडुलिपि खोजने का यही सही समय है। वह पांडुलिपि जो कम से कम किसी इंग्लिश विद्वान के हाथ न लगी हो और कम से कम 300-400 साल पुरानी हो, तभी दूध का दूध पानी का पानी हो सकता है।
निवेदन है कि जब तक यह शोध कार्य समाप्त न हो जाए तब तक मनु के नाम से किसी भी पुस्तक को गलत तरीके से उद्धृत करने पर रोक लगाई जानी चाहिए। यदि ऐसा संभव नहीं है तो जो पुस्तक अंग्रेजी राज में षड्यंत्रपूर्वक संपादित, प्रकाशित है, उसे मनु स्मृति का नाम देने की बजाए विलियम जोन्स द्वारा संपादित कथित मनु स्मृति ही कहा और लिखा जाना चाहिए।
मेरे गुरुदेव प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी का निष्कर्ष था कि वर्तमान मनु स्मृति में बहुत से प्रक्षिप्त अंश संपादक विलियम जोन्स और वॉरेन हेस्टिंग्स के षडयंत्र का परिणाम है। रॉयल एशियाटिक सोसायटी ने अनेक पौराणिक ग्रंथ की पांडुलिपि जुटाकर उसमें गड़बड़ी पैदा की थी।






