भारत पर लगाए गए टैरिफ के बाद भी भारत से निर्यात 19 प्रतिशत बढ़े हैं

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दिनांक 27 अगस्त 2025 को, अमेरिका के ट्रम्प प्रशासन द्वारा, भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर, 50 प्रतिशत टैरिफ (25 प्रतिशत जवाबी टैरिफ एवं 25 प्रतिशत, रूस से तेल की खरीद के चलते, अतिरिक्त सेकेण्डरी टैरिफ के रूप में) लगा दिया गया था। भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर लगाए गए टैरिफ के चलते यह आंकलन किया जा रहा था कि इसके बाद भारत से अमेरिका को निर्यात बहुत कम अथवा लगभग समाप्त हो जाएंगे और भारत को अत्यधिक नुक्सान झेलना पड़ सकता है। भारत ने अमेरिका द्वारा टैरिफ सम्बंधी लिए गए उक्त निर्णय के बाद गम्भीरता से अपनी रणनीति बनाई एवं अपने मित्र देशों से सम्पर्क में रहते हुए अमेरिका को किए जाने वाले इन वस्तुओं के निर्यात को अपने मित्र देशों की ओर मोड़ दिया। यहां, यह ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस बीच भारत के किसी भी जिम्मेदार अधिकारी अथवा मंत्री ने दबाव में आकर अमेरिका के विरुद्ध किसी भी प्रकार का कोई सार्वजनिक ब्यान नहीं दिया। परंतु, सम्बंधित भारतीय अधिकारी एवं मंत्री शांत नहीं बैठे और अन्य मित्र देशों से विदेशी व्यापार सम्बंधी गम्भीर चर्चाएं करते रहे।

भारत सरकार की उक्त रणनीति का असर नवम्बर 2025 माह के भारत से विभिन्न वस्तुओं के निर्यात सम्बंधी जारी किए गए आंकड़ों में स्पष्ट रूप से देखने में आ रहा है। नवम्बर 2025 माह में भारत के निर्यात में 19.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि, अगस्त 2025 माह में ट्रम्प प्रशासन द्वारा भारत के उत्पादों पर अमेरिका में लगाए गए टैरिफ का कुछ असर अगस्त 2025 माह में ही होना दिखाई देने लगा था। जुलाई 2025 माह में भारत से विभिन्न उत्पादों का निर्यात 13.3 प्रतिशत की दर से बढ़ा था और अमेरिका को विभिन्न वस्तुओं का निर्यात 27.8 प्रतिशत की दर से बढ़ा था, जबकि अगस्त में यह वृद्धि दर गिरकर क्रमशः 5.8 प्रतिशत एवं 6.7 प्रतिशत तक नीचे आ गई थी। सितम्बर 2025 माह में तो अमेरिका को विभिन्न वस्तुओं की निर्यात में वृद्धि दर ऋणात्मक 11.9 प्रतिशत एवं अक्टोबर 2025 में ऋणात्मक 8.6 प्रतिशत की हो गई थी। परंतु, नवम्बर 2025 माह में आश्चर्यजनक रूप से बढ़कर 22.6 प्रतिशत की हो गई है। कहां गया, ट्रम्प प्रशासन द्वारा अमेरिका में भारत से विभिन्न उत्पादों के आयात पर थोपे गए 50 प्रतिशत टैरिफ का असर?

अमेरिका द्वारा भारत पर बनाए जा रहे दबाव की इस घड़ी में विश्व के कई देशों ने भारत से विभिन्न वस्तुओं का आयात अतुलनीय रूप से बढ़ाकर, भारत पर अमेरिका द्वारा निर्मित किए गए उक्त कृत्रिम दबाव को कुछ हद्द तक कम करने में मदद की है। नवम्बर 2025 माह में स्पेन को भारत से किए गए निर्यात में 181.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है तो फ्रान्स को किए गए निर्यात में 65.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इसी प्रकार, वियतनाम को किए गए निर्यात में 36 प्रतिशत, हांगकांग को 35.5 प्रतिशत, बेलजीयम को 30.9 प्रतिशत, जर्मनी को 24.9 प्रतिशत, ब्राजील को 21.3 प्रतिशत, आस्ट्रेलिया को 19 प्रतिशत, ब्रिटेन को 15.4 प्रतिशत, यूनाइटेड अरब अमीरात को 13.2 प्रतिशत, इटली को 8.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। और तो और, चीन को भारत से विभिन्न वस्तुओं के निर्यात में भी 90.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। कुछ देशों को भारत से विभिन्न वस्तुओं के निर्यात केवल नवम्बर 2025 माह में ही नहीं बढ़े हैं बल्कि अप्रेल 2025 माह से नवम्बर 2025 माह की 8 माह की अवधि के दौरान भी तेज गति से बढ़े हैं। इस सूची में शामिल देश हैं – स्पेन – 54.5 प्रतिशत, चीन – 32.9 प्रतिशत, हांगकांग – 22.4 प्रतिशत, वियतनाम – 14.7 प्रतिशत, अमेरिका – 11.4 प्रतिशत, जर्मनी – 9.3 प्रतिशत, यूनाइटेड अरब अमीरात – 6.7 प्रतिशत, ब्राजील – 5.1 प्रतिशत एवं बेलजीयम – 5 प्रतिशत। जबकि, भारत के इस अवधि में कुल निर्यात केवल 2.6 प्रतिशत से बढ़े है।

अब यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भारत की ओर अपना रूख करती हुई दिखाई दे रही हैं। जर्मनी, जो विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और जिसके सकल घरेलू उत्पाद का आकार 4.9 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर है एवं जिसकी जनसंख्या 8.4 करोड़ है, भारत में अपने निवेश को दुगुना करने पर गम्भीरता से विचार कर रही है। जर्मनी की विशाल बहुराष्ट्रीय कम्पनियां जिनमें सीमेंस, वोक्सवागन, बोश एवं बीएमडब्ल्यू जैसी कम्पनियां शामिल हैं, अपनी विनिर्माण इकाईयों की भारत में उत्पादन क्षमता को बढ़ाने पर विचार कर रही हैं। विशेष रूप से ऑटोमोबाइल, क्लीन इनर्जी, आरटीफिशियल इंटेलिजेन्स, ग्रीन इनर्जी हाईड्रोजन एवं सेमीकंडकटर के क्षेत्र में भारतीय कम्पनियों के साथ अपने सहयोग को बढ़ा रही हैं।

विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जापान, जिसका सकल घरेलू उत्पाद का आकार 4.29 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर है एवं जिसकी जनसंख्या 12.3 करोड़ है, एवं जो तकनीकी रूप से विश्व के कुछ मुख्य उन्नत देशों में शामिल है, भी भारत को अपने कूटनीतिक साझेदार के रूप में देख रहा है एवं जापान ने आज भारत की ओर अपना रूख कर लिया है। चीन के साथ जापान के सम्बंध भी बहुत अच्छे नहीं है एवं हाल ही के समय में इन दोनों देशों के बीच राजनैतिक सम्बन्धों में कुछ खटास पैदा हुई है। इसलिए भी जापान, भारत को अपना रणनैतिक साझीदार एवं हितैषी के रूप में देख रहा है। भारत में अहमदाबाद एवं मुंबई के बीच विकसित की जा रही बुलेट ट्रेन भी जापान के सक्रिय सहयोग से ही सम्भव हो पा रही है। इसके लिए जापान ने बहुत ही सस्ती दरों पर जापानी मुद्रा, येन, में भारत को ऋण उपलब्ध कराया है। जापान की अति विशाल बहुराष्ट्रीय कम्पनियों – टोयोटा एवं सोनी, आदि द्वारा भारत में अरबों डॉलर का निवेश किया गया है एवं ये कम्पनियां अपने निवेश को भारत में और आगे बढ़ा रही हैं।

विश्व की सबसे बड़ी छठी अर्थव्यवस्था युनाईटेड किंगडम, जिसके सकल घरेलू उत्पाद का आकार 3.73 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर हैं एवं जिसकी जनसंख्या 6.9 करोड़ है तथा जिसने भारत के साथ हाल ही में मुक्त व्यापार समझौता सम्पन्न किया है, ने भी अब भारत की ओर अपना रूख कर लिया है। युनाईटेड किंगडम, भारत के कुशल एवं प्रशिक्षित युवाओं को वीजा देकर अपने देश में आकर्षित एवं प्रोत्साहित करने का प्रयास कर रहा है ताकि उसकी डूबती अर्थव्यवस्था को किनारे पर लाया जा सके। हालांकि, युनाईटेड किंगडम के साथ सम्पन्न हुए मुक्त व्यापार समझौते के बाद भारत से रेडीमेड गारमेंट्स, जेम्स एवं ज्वेलरी, समुद्री उत्पाद, कृषि उत्पाद आदि का ब्रिटेन को निर्यात तेज गति से आगे बढ़ने की प्रबल सम्भावना व्यक्त की जा रही है। भारतीय कम्पनियों द्वारा भी युनाईटेड किंगडम में अपना निवेश बढ़ाया जा रहा है एवं हाल ही के समय में कई भारतीय कम्पनियों ने ब्रिटेन की कम्पनियों का अधिग्रहण कर लिया है।

दक्षिण कोरीया, 1.95 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था एवं 5.2 करोड़ की जनसंख्या वाला देश भी अपने भविष्य को ध्यान में रखते हुए भारत के साथ अपने व्यापारिक हितों को बढ़ा रहा है। दक्षिण कोरीया की सैमसंग, एलजी, हुंडाई, जैसी प्रसिद्ध बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भारत में अपनी उत्पादन इकाईयों की स्थापना की है एवं यह कम्पनियां भारत में स्थापित अपनी उत्पादन इकाईयों को विस्तार देने का प्रयास कर रही है। इलेक्ट्रॉनिक्स, स्मार्ट फोन जैसे उपभोक्ता उत्पादों के बाजार पर दक्षिण कोरियाई कम्पनियों का दबदबा भारत में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

विश्व की सबसे बड़ी सांतवी अर्थव्यवस्था फ्रान्स, जिसके सकल घरेलू उत्पाद का आकार 3.28 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर है एवं जिसकी जनसंख्या 6.6 करोड़ है, भी भारत को सुरक्षा के क्षेत्र में एवं क्लीन इनर्जी के क्षेत्र में, यूरोप के बाहर अपना रणनीतिक साझेदार मानता है। सुरक्षा के क्षेत्र में तो फ्रान्स ने राफेल लड़ाकू विमान उपलब्ध कराकर भारत के हाथ मजबूत ही किए हैं। हाल ही के समय में ट्रम्प प्रशासन द्वारा विभिन्न देशों से अमेरिका में होने वाले आयात पर लगाए गए टैरिफ से फ्रान्स सबसे अधिक नाराज देशों में शामिल है। फ्रान्स भारत के साथ ग्रीन तकनीकी, ग्रीन पावर, सुरक्षा के क्षेत्र में अपनी साझेदारी को और अधिक मजबूत करना चाहता है।

उक्त वर्णित देशों के साथ ही, रूस के साथ भारत के सम्बंध पूर्व से ही बहुत मजबूत बने हुए हैं। रूस ने भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में सस्ती दरों पर कच्चा तेल उपलब्ध कराकर भारत की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में भारी मदद की है। दरअसल, रूस के साथ भारत के लगातार प्रगाढ़ हो रहे संबंधो के चलते ही अमेरिका ने भारत पर टैरिफ की दर को 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया है। अमेरिका चाहता है कि भारत, रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदे। वैश्विक स्तर पर तेजी से परिवर्तित हो रहे घटनाक्रम में अब चीन भी भारत के साथ अपने सम्बन्धों को सुधारने एवं मजबूत करने का लगातार प्रयास कर रहा है। विदेशी व्यापार के मामले में अमेरिका के बाद चीन ही भारत का सबसे बड़ा भागीदार है।

कुल मिलाकर, विश्व के कई विकसित देश आज भारत के साथ अपने सम्बन्धों को मजबूत करना चाहते हैं ताकि भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार में वे अपनी पैठ बना सकें एवं अपनी आर्थिक स्थिति को सुधार सकें। इससे, निश्चित ही भारत के आर्थिक हित भी सधते हुए नजर आ रहे हैं।

बलिदान दिवस पर श्रद्धासुमन: स्वामी श्रद्धानन्द की प्रेरक गाथा

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दिल्ली। स्वामी श्रद्धानंद उर्फ लाला मुंशीराम विज का जन्म फाल्गुन कृष्ण पक्ष, द्वितीया, 1912 विक्रम संवत्सर तदनुसार 22 फरवरी 1856को पंजाब प्रांत के जालंधर जिले के तलवन गांव में हुआ था। उनके पिता, श्री नानक चंद, ईस्ट इंडिया कंपनी में पुलिस निरीक्षक थे। स्वामीजी को मूल रूप से ‘बृहस्पति’ का नाम दिया गया, किन्तु उनके पिता उन्हें मुंशी राम से पुकारते थे और यही नाम उनकी पहचान बन गया और तब तक प्रचलन में रहा जब तक उन्होंने ‘संन्यास’ में दीक्षित होकर स्वामी श्रधाननंद नाम नहीं धारण कर लिया।

उनकी आरंभिक शिक्षा संयुक्त प्रांत के वाराणसी जनपद में शुरू हुई और कानून की परीक्षा पास करने के बाद लाहौर में समाप्त हुई। उनका विवाह श्रीमती शिव देवी से हुआ था। जब वह 35 वर्ष के थे तब उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई और वे अपने पीछे दो बेटे और दो बेटियां छोड़ गए। मुंशी राम ने नायब तहसीलदार के रूप में विधिक सेवा से अपना आरंभ किया किन्तु उन्होंने थोड़े समय के बाद इस पद को त्याग दिया।

बाद में, उन्होंने फिल्लौर और जालंधर में एक अधिवक्ता के रूप में अभ्यास किया किन्तु आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती की प्रेरणा से उन्होंने इस आकर्षक पेशे को भी छोड़ दिया और सनातन धर्म उत्थान तथा राष्ट्र सेवा कार्य से जुड़ गए। वे भारतीय शिक्षा प्रणाली के महान अधिवक्ता और स्वामी दयानंद सरस्वती की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करने वाले आर्य समाज के प्रचारक थे। उनके प्रमुख कार्यों में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय जैसे शिक्षण संस्थानों की स्थापना, 1920 के दशक में हिंदू सुधार आंदोलन, सनातन हिंदू धर्म के संगठन (समेकन) और शुद्धि (पुनः धर्म वापसी ) थे , जिसमें उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इसी लक्ष्य पर कार्य करते हुए बलिदान हो गए।

विस्तृत जीवनी

स्वामी श्रद्धानंदके बचपन का नाम बृहस्पति विज था, और वेसंयुक्त प्रांत क्षेत्र (अब उत्तर प्रदेश) में पुलिस निरीक्षक लाला नानक चंद के सबसे छोटे बेटे थे। उनका जन्म फाल्गुन कृष्ण पक्ष, द्वितीया 1912 विक्रम संवत – 22 फरवरी 1856 को भारत के पंजाब प्रांत के जालंधर जिले के तलवन गांव में हुआ था। उनके पिता उन्हें प्यार से मुंशीराम नाम से पुकारते थे और यही नाम उनके वास्तविक नाम से अधिक लोकप्रिय हो गया। यह नाम उनके पास तबतक रहा जबतक कि उन्होंने 1917 में सन्यास धारण करके स्वामी श्रद्धानंद के रूप में नया नाम नहीं अंगीकृत कर लिया।

स्वामी जी की आरंभिक शिक्षा ब्रिटिश भारत के संयुक्त प्रांत के वाराणसी जनपद में शुरू हुई और कानून की परीक्षा पास करने के बाद लाहौर में समाप्त हुई। मुंशी राम ने नायब तहसीलदार के रूप में विधिक सेवा से अपना आरंभ किया किन्तु उन्होंने थोड़े समय के बाद इस पद को त्याग दिया। बाद में, उन्होंने फिल्लौर और जालंधर में एक अधिवक्ता के रूप में अभ्यास किया उनका विवाह शिव देवी से हुआ था। जब वह केवल 35 वर्ष के थे तब उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई और वह अपने पीछे दो पुत्र हरिश्चंद्र और इन्द्र तथा दो बेटियाँ वेद कुमारी और एक अन्य को छोड़ गई।

स्वामी दयानंद जब आर्य समाज द्वारा आयोजित एक सभा में व्याख्यान देने बरेली आए तो उन्हें उनसे मिलने का अवसर मिला, क्योंकि उनके पिता एक पुलिस इंस्पेक्टर थे, जो आयोजन की सुरक्षा व्यवस्था संभालने के प्रभारी थे। इस कार्यक्रम में कई प्रमुख हस्तियों और वरिष्ठ ब्रिटिश अधिकारियों ने हिस्सा लिया था, इसलिए उनके पिता ने उन्हें इस कार्यक्रम में भाग लेने की सलाह दी। नास्तिक होने के कारण वह शुरू में घटना को खराब करने की मंशा से आयोजन में गए लेकिन स्वामी दयानंद के साहस, कौशल और दृढ़ व्यक्तित्व ने उन पर गहरी छाप छोड़ी। इस घटना के बाद वह औपचारिक रूप से आर्य समाज से जुड़ गए।

आर्य समाज शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय था और वैदिक व्यवस्था पर आधारित शिक्षा के भारतीयकरण के लिए दयानंद एंग्लो वैदिक (डीएवी) के नाम से लोकप्रिय कई स्कूल खोले थे। 1892 में डीएवी कॉलेज लाहौर में वैदिक शिक्षा को मुख्य पाठ्यक्रम बनाने के विवाद के बाद आर्य समाज दो गुटों–गुरुकुल गुट और डीएवी गुट के बीच बंट गया। श्रद्धानंद गुरुकुल गुट के समर्थक थे। उन्होंने संगठन छोड़कर पंजाब आर्य समाज का गठन किया। इसी बीच 1897 में जब लाला लेख राम की हत्या हो गई तो श्रद्धानंद ने उनका स्थान लिया। उन्होंने ‘पंजाब आर्य प्रतिनिधि सभा’ का नेतृत्व किया और अपनी मासिक पत्रिका ‘आर्य मुसाफिर’ की शुरुआत की।

वेद , वैदिक जीवन और वैदिक शिक्षा के पुनुरुत्थान में योगदान

जब उन्होंने अपनी ही बेटी वेद कुमारी को ईसाई मिशन संचालित स्कूल में पढ़ते हुए ईसाई धर्म के प्रभाव में आते देखा, तो उन्होंने देश भर के बच्चों को बाहरी संस्कृति के प्रभाव से दूर रखने और प्राचीन वैदिक आदर्शों और राष्ट्रीय दृष्टिकोण से ओतप्रोत अच्छे और अनुशासित नागरिकों का निर्माण करने के लिए संस्थागत प्रयास करने का मन बना लिया।समान विचारधारा वाले भारतीय उनका समर्थन करने के लिए आगे आए और आर्य समाज द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों में अच्छी शिक्षा के शैक्षिक अभियान को एक उच्च स्तर तक ले जाने के गर्जनापूर्ण संकल्प का आरंभ किया।

उन्होंने 16 मई 1900 को पश्चिमी पंजाब के गुजरांवाला में पहले गुरुकुल की स्थापना की, जो अब पाकिस्तान में है। स्वामी श्रद्धानन्द उर्फ लाला मुंशीराम ने 35 वर्ष की आयु में वानप्रस्थ आश्रम (जीवन के चार चरणों में से तीसरा चरण, सेवानिवृत्त गृहस्थ) में दीक्षा ली और वे महात्मा मुंशीराम बन गए।

बाद में गुरुकुल को हरिद्वार के निकट कांगड़ी में खोला गया। जिसके पीछे अंतर्निहित विचार प्राचीन वैदिक आदर्शों और राष्ट्रीय दृष्टिकोण से ओतप्रोत समुदाय में अच्छे और अनुशासित नागरिकों का उत्पादन करना था। यह गुरुकुल (प्राचीन भारत में प्रचलित एक आवासीय विद्यालय प्रणाली, जहां जीवन के सभी क्षेत्रों पर शिक्षण, आध्यात्मिक अभ्यास सहित, गुरुओं या संतों द्वारा किया जाता था)प्राचीन भारतीय शिक्षा की पुनर्स्थापना की दिशा में एक अभूतपूर्व प्रयास था।

शुरुआत में उनके पुत्र, हरिश्चंद्र और इंद्र उनके छात्र थे और महात्मा स्वयं आचार्य (शिक्षक) बने। वर्तमान में हजारों छात्र वहां पढ़ रहे हैं और गुरुकुल कांगरी अब एक विश्वविद्यालय है। यह वह संस्था है जिसकी ओर महात्मा गांधी पहली बार दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए आकर्षित हुए थे और जहां वे भारत लौटने पर रहे। यह वह संस्था थी जिसने गांधीजी को ‘महात्मा’ की उपाधि प्रदान की थी।1962 में, भारत सरकार ने गुरुकुल को एक मानद विश्वविद्यालय घोषित किया।

मुंशीराम ने लगातार 15 वर्षों तक गुरुकुल में सेवा की। बाद में वर्ष 1917 में, महात्मा मुंशीराम ने संन्यासाश्रम (जीवन के चार चरणों में से अंतिम, अर्थात् एक त्यागी का चरण) में दीक्षा प्राप्त की।दीक्षा समारोह के समय बोलते हुए उन्होंने कहा था कि मैं अपना नया नाम ग्रहण करूंगा। चूँकि मैंने अपना पूरा जीवन वेदों और वैदिक धर्मों का पालन-पोषण करने में लगा दिया है और भविष्य में भी ऐसा ही करता रहूंगा, इसलिए मैं अपना नाम श्रद्धानन्द रख रहा हूँ।

स्वाधीनता संग्राम में स्वामी श्रद्धानन्द की सक्रिय भागीदारी

देश को स्वतंत्र कराने का स्वामी श्रद्धानंद का योगदान अमूल्य था। पंजाब में ‘मार्शल लॉ’ और ‘रॉलेट एक्ट’ भारतीयों पर थोपा गया। उन्होंने कांग्रेस के साथ काम करना शुरू किया, उन्होंने 1919 में अमृतसर में कांग्रेस को अपना सत्र आयोजित करने के लिए आमंत्रित किया। इसके पीछे कारण जलियांवाला हत्याकांड था और कांग्रेस में किसी ने अमृतसर में सत्र आयोजित करने पर सहमति नहीं व्यक्त की। श्रद्धानंद ने सत्र की अध्यक्षता की। दमनकारी ‘रौलेट एक्ट’ के खिलाफ दिल्ली में आंदोलन हुआ। आंदोलन का नेतृत्व स्वामी श्रद्धानन्द कर रहे थे। तब जुलूस पर प्रतिबंध था। स्वामी जी ने प्रतिबंध को चुनौती देते हुए घोषणा की कि दिल्ली में जुलूस निकाला जाएगा। तदनुसार, चांदनी चौक पहुंचने तक हजारों देशभक्त जुलूस में शामिल हो चुके थे। गोरखा रेजीमेंट अंग्रेजों के आदेश पर तोपों, संगीनों आदि के साथ तैयार थी। श्रद्धानंद अपने हजारों अनुयायियों के साथ कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे। जब वे गोली मारने वाले थे तब वह निडर होकर आगे आए और जोर से दहाड़े कि पहले निर्दोष लोगों को मारने से पहले मुझे मार डालो। तुरंत संगीनों को नीचे उतारा गया और वह जुलूस शांतिपूर्वक आगे बढ़ा।

दिल्ली की जामा मस्जिद में वेद मत्रों का पाठ करते हुए भाषण

स्वामी श्रद्धानन्द ने 1922 में दिल्ली की जामा मस्जिद में भाषण दिया था। उन्होंने सबसे पहले वेद मंत्रों का पाठ किया और प्रेरक भाषण दिया।किसी मुस्लिम सभा में वेद मन्त्रों का पाठ करते हुए भाषण देने का सम्मान स्वामी श्रद्धानन्द को ही प्राप्त हुआ। यह विश्व के इतिहास में एक असाधारण क्षण था।

कांग्रेस छोड़कर हिंदू महासभा में सम्मिलित

जब स्वामी श्रद्धानंद ने स्थिति का ठीक से अध्ययन किया, तो उन्होंने महसूस किया कि कांग्रेस में सम्मिलित होने के बाद भी मुसलमान, मात्र मुसलमान ही रहता है, वे अपनी ‘नमाज’ के लिए कांग्रेस की बैठक को भी रोक सकते हैं। कांग्रेस में हिंदू धर्म अन्याय झेल रहा था। जब उन्हें सच्चाई का पता चला, तो उन्होंने तुरंत कांग्रेस छोड़ दी और मदनमोहन मालवीय की सहायता से ‘हिंदू महासभा’ की स्थापना की।

अछूतोद्धार की दिशा में स्वामी श्रद्धानंद का योगदान

स्वामी श्रद्धानंद ने अछूतों की सहायता करने के लिए कांग्रेस द्वारा श्रद्धानंद की वित्तीय मांगों को पूरा करने से इनकार करने के कारण उन्होंने कांग्रेस की उप-समिति से त्यागपत्र दे दिया था । यह राशि कल्याण कार्यक्रमों के लिए आवश्यक थी। कांग्रेस से त्यागपत्र के बाद, स्वामीजी ने हिंदू महासभा में सम्मिलित होने का निर्णय किया। इस प्रकरण को बाबासाहेब अम्बेडकर की ‘व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स?’ में कुछ इस प्रकार वर्णन किया है:

“क्या यह इसलिए था क्योंकि कांग्रेस की मंशा थी कि यह योजना बहुत साधारण होनी चाहिए जिसकी लागत दो से पांच लाख रुपये से अधिक न हो, लेकिन यह अनुभव किया कि उस दृष्टिकोण से उन्होंने समिति में स्वामी श्रद्धानंद को सम्मिलित करके गलती कर दी थी। स्वामी ने एक बड़ी योजना के साथ उनका सामना करने के लिए कहा जिसे कांग्रेस न तो स्वीकार कर सकती थी और न ही अस्वीकार कर सकती थी? कांग्रेस ने पहली बार में उन्हें संयोजक बनाने से मना करने और बाद में समिति को भंग करने और हिंदू महासभा को काम सौंपने के लिए बेहतर समझा होगा । परिस्थितियाँ इस तरह के निष्कर्ष के बिल्कुल विपरीत नहीं हैं। स्वामी अछूतों के सबसे महान और सबसे निष्ठावान पक्षधर थे। इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है कि अगर उन्होंने समिति में काम किया होता तो बहुत बड़ी योजना तैयार करते।”

1925 का वैकोम सत्याग्रह केरल के कोट्टायम के पास वैकोम में शिव मंदिर में केंद्रित था, जहां अछूतों को प्रवेश से वंचित कर दिया गया था। जब स्थानीय कांग्रेसियों और विद्वान हिंदू युवाओं ने इन सामाजिक बाधाओं का विरोध किया और इसके लिए गांधीजी का आशीर्वाद मांगा, तो वे झिझक गए। इसके विपरीत, स्वामी श्रद्धानंद ने अभियान को आशीर्वाद देने के लिए त्वरित निर्णय लिया और अपना समर्थन व्यक्त करने के लिए स्वयं वैकोम गए। कोई आश्चर्य नहीं कि डॉ. अम्बेडकर ने स्वामी को ‘अछूतों का सबसे महान और सबसे निष्ठावान’ कहा।

पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान

उन्होंने हिंदी और उर्दू दोनों में धार्मिक मुद्दों पर लिखा था। उन्होंने दो प्रमुख समाचार पत्रों- उर्दू ‘तेज’ और हिंदी ‘अर्जुन’ की भी स्थापना की। उन्होंने देवनगरी लिपि में हिंदी को बढ़ावा दिया, गरीबों की मदद की और महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा दिया।

स्वामी श्रद्धानन्द का धर्मांतरित हिन्दुओं के पुन: धर्म परिवर्तन का महान कार्य

हिंदुओं की तुलना में मुसलमानों की बढ़ती संख्या को रोकने के लिए उन्होंने परिवर्तित हिंदुओं को शुद्ध करने का एक पवित्र अभियान शुरू किया। उन्होने आगरा में एक कार्यालय खोला। आगरा, भरतपुर, मथुरा आदि स्थानों पर कई राजपूत थे जो उस समय इस्लाम में परिवर्तित हो गए थे; लेकिन वे हिंदू धर्म में वापस आना चाहते थे। 5 लाख राजपूत हिंदू धर्म स्वीकार करने के लिए तैयार थे। इस अभियान का नेतृत्व स्वामी श्रद्धानन्द कर रहे थे। उन्होंने इस उद्देश्य के लिए एक विशाल सभा का आयोजन किया और उन राजपूतों को शुद्ध किया। उनके नेतृत्व में कई गांव शुद्ध हुए। इस अभियान ने हिंदुओं में एक नई चेतना, एक नई ऊर्जा और उत्साह पैदा किया और हिंदू संगठनों की संख्या में वृद्धि हुई। कराची से अजगरी बेगम नाम की एक मुस्लिम महिला को हिंदू धर्म में दीक्षित किया गया था। इस घटना से मुसलमानों में कोहराम मच गया और स्वामी जी की विश्व भर में चर्चा हुई।

इस्लाम की प्राणघाती परंपरा का आखेट बने

अब्दुल रशीद नाम का एक मुस्लिम कट्टरपंथी पर 23 दिसंबर 1923 को दिल्ली में स्वामीजी निवास पर पहुंच गया , उस समय स्वामी जी गंभीर निमोनिया के संक्रमण से जूझ रहे थे और बिस्तर में पड़े थे। उसने कहा किवह स्वामीजी के साथ इस्लाम पर चर्चा करना चाहता है। उसने अपने आप को एक कंबल से ढक रखा था। उसने कंबल के अंदर बंदूक छिपा रखी थी। स्वामी जी की सेवा में लगे श्री धर्मपाल स्वामी जी उनके साथ थे। इसलिए वह कुछ नहीं कर सका। उसने एक गिलास पानी मांगा। उसे पानी पिलाने के बाद जब धर्मपाल गिलास लेकर बाहर गए तो राशिद ने स्वामीजी पर गोलियां चला दीं। धर्मपाल ने राशिद को पकड़ा था। जब तक लोग वहां एकत्रित हुए स्वामीजी जीवित नहीं रहे। राशिद के विरुद्ध कार्रवाई की गई। इस प्रकार स्वामी श्रद्धानन्द इस्लाम की प्राणघाती परंपरा के शिकार हुए; लेकिन उन्होंने वीरगति प्राप्त की और अपने नाम को अमर कर दिया। स्वामी श्रद्धानंद सशरीर भले ही हमारे बीच नहीं हैं किन्तु अपने एक क्रांतिकारी और समाज सुधारक योगदान के लिए वह आने वाली पीढ़ियों की स्मृतियों में सदैव जीवित रहेंगे ।

इस ‘कांग्रेसी’ पत्रकार का है, विवादों से पुराना नाता

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दिल्ली। अजीत अंजुम, जो खुद को एक स्वतंत्र पत्रकार बताते हैं, लेकिन उनकी छवि हमेशा से विवादों से घिरी रही है। वे न्यूज़ 24 और इंडिया टीवी जैसे चैनलों से जुड़े रहे, लेकिन बार-बार आरोप लगते रहे कि वे राजनीतिक पक्षपात करते हैं, खासकर कांग्रेस और विपक्षी दलों के पक्ष में। कई सोशल मीडिया पोस्ट और रिपोर्ट्स में उन्हें ‘कांग्रेस का दलाल’ कहा जाता है, जो फेक न्यूज़ फैलाकर भाजपा सरकार को बदनाम करने का काम करते हैं। उदाहरण के लिए, एक पोस्ट में उन्हें ध्रुव राठी, रवीश कुमार जैसे लोगों के साथ फेक न्यूज़ फैक्ट्री का हिस्सा बताया गया है, और सुझाव दिया गया कि ऐसे लोगों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

उनकी सबसे ताजा विवादास्पद घटना बिहार से जुड़ी है, जहां जुलाई 2025 में उनके खिलाफ बेगूसराय में एफआईआर दर्ज हुई। आरोप है कि उन्होंने मतदाता सूची संशोधन (SIR) प्रक्रिया में दखल दिया, सरकारी काम में बाधा डाली, और साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने की कोशिश की। कहा गया कि वे BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) के काम में अनधिकृत रूप से घुसे और विपक्षी एजेंडा थोपने की कोशिश की। पुलिस का दावा है कि अंजुम ने गलत सूचना फैलाई, जिससे चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठे। यहां तक कि चुनाव आयोग ने ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही, और अंजुम को स्टेज्ड ऑडियंस के साथ वीडियो बनाने का आरोपी बताया गया। वे खुद को हीरो बताते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि यह उनकी पुरानी आदत है – 2019 में मुजफ्फरपुर अस्पताल के ICU में घुसकर मरीजों और डॉक्टरों को परेशान करने के लिए उन्हें TV9 से निकाला गया था।

अंजुम पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप भी लगे हैं। अप्रैल 2024 में एक ट्वीट में उन्हें सहकर्मियों का यौन शोषण करने वाला, पैसे लेकर खबरें चलाने या रोकने वाला, और कांग्रेस-Samajwadi Party से मोटी रकम लेने वाला बताया गया। कहा जाता है कि वे न्यूज़ 24 और इंडिया टीवी से इसलिए निकाले गए क्योंकि उनकी नैतिकता संदिग्ध थी। क्वोरा जैसे प्लेटफॉर्म्स पर यूजर्स उन्हें कांग्रेस के प्रति पक्षपाती बताते हैं, और उन्हें ‘प्रो-कांग्रेस यूट्यूबर’ कहता है जो भाजपा की आलोचना करके विपक्ष को फायदा पहुंचाते हैं।

उनकी ग्राउंड रिपोर्टिंग को कुछ लोग बहादुरी बताते हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में यह पक्षपाती और सनसनीखेज साबित हुई है। जैसे, बिहार में वे BLO से बात करके विपक्षी नैरेटिव फैला रहे थे, लेकिन असल में सरकारी काम में बाधा डाल रहे थे। अप्रैल 2024 में चरित्र हत्या की साजिश का दावा करके उन्होंने लीगल नोटिस भेजा, लेकिन खुद पर लगे आरोपों का कभी ठोस जवाब नहीं दिया। कुल मिलाकर, अंजुम की पत्रकारिता कम, राजनीतिक एजेंडा ज्यादा नजर आता है – फेक न्यूज़, पक्षपात, और विवादों से भरा करियर, जो भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाता है। ऐसे लोगों से सावधान रहना चाहिए, जो सच्चाई के नाम पर अपना खेल खेलते हैं।

धुरंधर की सच्चाई: ध्रुव राठी की आलोचना का तार्किक खंडन

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ध्रुव राठी का हालिया वीडियो ‘धुरंधर की सच्चाई’ सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसमें उन्होंने आदित्य धर निर्देशित फिल्म धुरंधर को “खतरनाक प्रोपेगेंडा” करार दिया है। उनका दावा है कि फिल्म असली घटनाओं का सहारा लेकर झूठा नैरेटिव गढ़ती है, दर्शकों को गुमराह करती है और अच्छी तरह बनाई गई होने के कारण यह अन्य ‘बकवास’ प्रोपेगेंडा फिल्मों से ज्यादा खतरनाक है। राठी ने निर्देशक आदित्य धर की तुलना नाजी फिल्ममेकर लेनी रीफेंस्टाहल से की और चेतावनी दी कि उनका एक वीडियो 300 करोड़ की इस ‘प्रोपेगेंडा फिल्म’ को बर्बाद कर देगा।

लेकिन क्या ध्रुव राठी के ये तर्क वाकई तार्किक हैं? या यह सिर्फ एक पूर्वाग्रह से ग्रस्त आलोचना है जो फिल्म की अपार सफलता से जलन का नतीजा है? आइए राठी के मुख्य आरोपों को देखें और समझें कि धुरंधर क्यों एक बेहतरीन सिनेमा का उदाहरण है, न कि कोई “झूठा प्रोपेगेंडा”।

पहला आरोप: फिल्म फैक्ट और फिक्शन को मिलाकर दर्शकों को गुमराह करती है

ध्रुव राठी कहते हैं कि फिल्म में रियल टेरर अटैक्स, डेट्स, लोकेशंस और फुटेज का इस्तेमाल किया गया है, जिससे दर्शक सच्चाई और कल्पना में फर्क नहीं कर पाते। यह तर्क हास्यास्पद है। फिल्म की शुरुआत में स्पष्ट डिस्क्लेमर है: “यह एक काल्पनिक कहानी है जो वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है।” यह बॉलीवुड की ज्यादातर हिस्टोरिकल या पॉलिटिकल फिल्मों में आम है। उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक (जो खुद आदित्य धर की फिल्म है), केसरी, सम बहादुर या हॉलीवुड की डंकर्क, ओपेनहाइमर जैसी फिल्में भी रियल इवेंट्स से प्रेरित हैं और ड्रामेटिक लिबर्टी लेती हैं। क्या इन सबको प्रोपेगेंडा कहेंगे? दरअसल, सिनेमा का काम ही दर्शकों को इमर्सिव एक्सपीरियंस देना है। अगर हर फिल्म में हर सीन के बाद “यह फिक्शन है” लिखा जाए, तो फिल्म देखना बोरिंग हो जाएगा। दर्शक इतने मूर्ख नहीं कि वे फिल्म को डॉक्यूमेंट्री समझ लें। धुरंधर की सफलता (500 करोड़ से ज्यादा कमाई) इसी बात का सबूत है कि लोग इसे एंटरटेनमेंट के रूप में एंजॉय कर रहे हैं, न कि कोई राजनीतिक लेक्चर। राठी का यह आरोप खुद उनकी हिपोक्रिसी दिखाता है – वे खुद अपने वीडियोज में ड्रामेटिक एडिटिंग, म्यूजिक और AI विजुअल्स इस्तेमाल करते हैं ताकि दर्शक “इमर्स” हो जाएं।

दूसरा आरोप: फिल्म हिंसा को ग्लोरिफाई करती है और Desensitized करती है

राठी ने ट्रेलर रिलीज के समय भी फिल्म की हिंसा पर आपत्ति जताई थी, इसे ISIS वीडियोज से कंपेयर किया था। लेकिन धुरंधर एक स्पाई थ्रिलर है – जेम्स बॉन्ड, मिशन इंपॉसिबल या टाइगर सीरीज जैसी। इनमें एक्शन और हिंसा तो होगी ही। फिल्म टेररिज्म के खिलाफ भारतीय एजेंट्स की बहादुरी दिखाती है, न कि हिंसा को प्रमोट करती है। बल्कि यह टेररिज्म की भयावहता को हाइलाइट करती है। राठी की यह आलोचना सेलेक्टिव है। क्या उन्होंने कभी पाकिस्तानी सीरीज या हॉलीवुड की वॉर फिल्मों पर ऐसी ही टिप्पणी की? नहीं, क्योंकि उनका एजेंडा सिर्फ भारतीय राष्ट्रवाद को टारगेट करना है। फिल्म में हिंसा दिखाकर यह संदेश देती है कि टेररिज्म का जवाब मजबूती से देना जरूरी है – जो वास्तविकता भी है। भारत ने पुलवामा, उरी जैसे अटैक्स का जवाब सर्जिकल स्ट्राइक्स से दिया। अगर यह ‘Desensitized ‘ करता है, तो राठी के खुद के वीडियोज में दिखाए गए राजनीतिक विवाद या विदेशी प्रोपेगेंडा क्लिप्स क्या करते हैं?

तीसरा आरोप: फिल्म झूठा नैरेटिव गढ़ती है और राजनीतिक प्रोपेगेंडा है

राठी कहते हैं कि आदित्य धर झूठ बेच रहे हैं। लेकिन कौन सा झूठ? फिल्म में दिखाए गए टेरर अटैक्स तो रियल हैं – 26/11, पुलवामा आदि। भारतीय एजेंट्स की भूमिका को ड्रामेटाइज करना फिक्शन है। राठी का असली दर्द यह है कि फिल्म राष्ट्रवादी नैरेटिव दिखाती है, जो उनकी विचारधारा से मेल नहीं खाता। वे अन्य फिल्मों जैसे द केरला स्टोरी या द कश्मीर फाइल्स को “बकवास” कहते हैं क्योंकि वे कमर्शियल रूप से कम सफल रहीं, लेकिन धुरंधर को “खतरनाक” क्योंकि यह हिट है। यह जलन नहीं तो क्या है? आदित्य धर की पिछली फिल्म उरी भी इसी तरह प्रेरित थी और उसने राष्ट्रप्रेम जगाया। धुरंधर भी वही कर रही है – युवाओं में देशभक्ति की भावना। क्या यह प्रोपेगेंडा है? अगर हां, तो हर देशभक्ति फिल्म प्रोपेगेंडा है। राठी की नाजी कंपेयरिजन तो घोर अतिशयोक्ति है – यह उनकी क्रेडिबिलिटी की धज्जियां उड़ाती है। लेनी रीफेंस्टाहल नाजी रेजीम की ऑफिशियल फिल्ममेकर थीं; आदित्य धर एक इंडिपेंडेंट डायरेक्टर हैं जो स्टोरीटेलिंग कर रहे हैं।

धुरंधर एक मास्टरपीस है

धुरंधर न सिर्फ कमर्शियल सुपरहिट है, बल्कि टेक्निकल रूप से शानदार – रणवीर सिंह का परफॉर्मेंस, एक्शन सीक्वेंस, सिनेमेटोग्राफी सब वर्ल्ड क्लास। यह भारतीय सिनेमा की ताकत दिखाती है कि हम ग्लोबल लेवल की थ्रिलर बना सकते हैं। ध्रुव राठी की आलोचना पूर्वाग्रह से भरी है – वे राष्ट्रवादी कंटेंट को सहन नहीं कर पाते। उनकी तुलनाएं अतिरंजित हैं और तर्क कमजोर। अगर वे सच में ‘सच्चाई’ दिखाना चाहते हैं, तो बैलेंस्ड रिव्यू दें, न कि एकतरफा प्रोपेगेंडा। धुरंधर ने साबित कर दिया कि दर्शक सच्ची एंटरटेनमेंट और देशभक्ति चाहते हैं। राठी का वीडियो चाहे जितने व्यूज ले ले, फिल्म की सफलता अटूट है। यह भारतीय सिनेमा का गौरव है, न कि कोई ‘खतरनाक प्रोपेगेंडा’।

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