लाज़िम है कि हम भी देखेंगे… I repeat एक भी दंगाई नहीं बख़्शे जाएंगे !   

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

रायपुर। —•मासूम छात्रों के कंधों के सहारे प्रोटेस्ट की आड़ में जो उपद्रव, हिंसा, अराजकता फैला रहे थे। पुलिस वालों और पत्रकारों की लिंचिंग कर रहे थे। ख़ू-नी संघर्ष उत्पन्न कर रहे थे। सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट कर रहे थे। अब वो संविधान और क़ानून का पाठ ज़रूर सीखेंगे। क्योंकि ‘न्याय’ तो संविधान के अंतर्गत ही होगा। देशभर में उन्हें चिन्हित किया जा रहा ऊ।

—• जो स्टूडेंट्स शांतिपूर्ण #protest कर रहे थे, वो सुरक्षित हैं। उनके ख़िलाफ़ कहीं कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। इन दंगाइयों में कोई भी #neetexam का #aspirants या पीड़ित नहीं है। वो बच्चे अपनी पढ़ाई में जुटे थे। नीट एग्जाम की सफलता का जश्न मना रहे थे।

•— हां, जो ये कह रहे थे कि — “भाजपा और Rss के गुंडे हिंसा फैला रहे थे।”— उन्हें तो ख़ुश होना चाहिए न! क्योंकि Rss और भाजपा वाले किसी भी दंगाई का बचाव करने नहीं आ रहे हैं। सो, मत बौखलाइए।

—• ख़ैर, ये जान लीजिए कि भीड़ तंत्र के ज़रिए जो भी संविधान और क़ानून को हाथ में लेते हैं, अराजकता फैलाते हैं। उसी हमारी सांविधानिक व्यवस्था अच्छे से क़ानून का पाठ पढ़ाती है।

•— ये भी ध्यान रखिए कि बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान ने ऐसी व्यवस्था की है कि —कोई ढफली गैंग, कोई टुकड़े-टुकड़े गैंग और नेता कितना भी चिंघाड़ें। भारत के क़ानून के अंतर्गत सबको नतमस्तक होना पड़ता है।

—• विदेशी फंडिंग के ज़रिए जो भी देश-समाज में अराजकता फैला रहे थे। भारत को अस्थिर करने के अभियान में जुटे हुए हैं। अब उन पर नकेल कसने के लिए FCRA संशोधन बिल आने जा रहा है।

पांच बातें सीधी और साफ कहना चाहूंगा

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दिल्ली। 2014 की विजय में मोदी जी का प्रभाव तो था ही, लेकिन एक महत्वपूर्ण फैक्टर था, सोशल मीडिया में राइट विंग की बढ़त या उनका एकछत्र राज। लेकिन 12 साल बाद स्थिति उल्टी हो गई है, साफ तौर पर दिख रहा है कि राइट विंग की पकड़ कमजोर हो चुकी है।

कारण क्या है?

पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारण, जिन लोगों ने सोशल मीडिया पर 2014 में पकड़ मजबूत करने में सबसे ज्यादा काम किया था उनको शायद ही रिवॉर्ड मिला। ज्यादातर जीत के बाद साइड लाइन कर दिए गए। आज स्थिति यह है कि वे विरोधी हो गए हैं और नए समर्थकों के निशाने पर रहते हैं। लेकिन उनमें आज भी क्षमता है और वे लोगों को प्रभावित भी करते है, पर उल्टे तौर पर।

दूसरा, राइट विंग के पास इंटेलेक्चुअल्स की गंभीर कमी है। बौद्धिक व्यक्ति के लिए उनके एनवायरमेंट में सरवाइव करना मुश्किल होता है। लेकिन नई पीढ़ी के सामने अपनी बात तर्क के साथ रखने की क्षमता बहुत जरूरी है, वे रिलिजन और हिस्ट्री से ज्यादा लॉजिक से कनविंस होते हैं। आपको आज भी लेफ्ट में ज्यादा इंटलेक्चुअल्स मिलेंगे, क्योंकि वहां उनकी कद्र होती है, सुना जाता है।

तीसरी बात है, कि पहले यहां लोग राइट विंग के पक्ष में मोर्चा लेते थे तो उसे अपनी लड़ाई समझते थे। लेकिन बीते दशक में जो कोर समर्थक वर्ग है उसकी पर्याप्त उपेक्षा हुई है। अभी भी राष्ट्र के प्रति भावना के चलते वह समर्थन करता है लेकिन उसमें पहले जैसी धार नहीं है। नए  के चक्कर में पुराने को नहीं बिसराना चाहिए। आप लाख दोस्त बना लें, लेकिन भाई-भाई होता है।

चौथी है, बौद्धिक नवोन्मेष का अभाव, लगातार वही कंटेंट, वही घिसी पिटी बातें। हर बात के लिए गांधी नेहरू को जिम्मेदार ठहराना।  लगातार डर दिखाना थका देता है। बातें सही हो सकती हैं, लेकिन हजार बार कहने पर उकताहट होना स्वाभाविक है, धीरे धीरे लोग दूरी भी बना लेते हैं।

पांचवीं और सबसे खतरनाक चीज है, आईटी सेल की ट्रोलिंग, जिसने मित्र से ज्यादा शत्रु खड़े किए हैं। थोड़ी भी उदार बात करने वाले की बेइज्जती करना, स्ट्रेटजी बनाकर हमले करना, असहमति पर गालियां और कड़वी बातें करना। इस तरह आपने लोगों को चुप तो कर दिया लेकिन उनके अंदर रोष बना रहा जो मौका मिलने पर सामने आया। अब इसमें वास्तविक आईटी सेल कितना कर रही है, कितना छद्म लोग आईटी सेल की आड़ लेकर छवि खराब कर रहे हैं वह खोज का विषय है।

मैं बहुत राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूं, लेकिन इंसानों को समझता हूं, भावनाएं और रुझान पहचान लेता हूं। इसीलिए कहना चाहूंगा कि प्लेटफार्म बदलने से बात नहीं बनेगी, कंटेंट और तरीका बदलना पड़ेगा। अपने लोगों की कदर करनी पड़ेगी, बौद्धिक वर्ग को उसकी जगह देनी पड़ेगी।

कॉकरोच पार्टी को भाजपा की साजिश बताने वाले कांग्रेसी अंधभक्त

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रंगनाथ सिंह

दिल्ली। भाजपा आलाकमान छात्रों के अन्दर दबे आक्रोश को जज करने में चूक गया। सत्ता में रहने पर ज्यादातर लोग खुद को अपराजेय समझ लेते हैं। गौरतलब बात ये है कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी इस आक्रोश को समझने में काहिल निकला। सोशलमीडिया पर कांग्रेस के घोषित समर्थक ने 19 जुलाई तक कॉकरोच पार्टी को भाजपा और संघ की साजिश बताया। 20 जुलाई को जब अच्छी भीड़ जुटी तब कांग्रेसियों की आँख खुली। लेकिन इसके बाद भी राहुल गांधी जंतर-मंतर नहीं गये बल्कि उन्होंने अपना अलग मोर्चा खोला और छात्रों से उनके पीछे आने की उम्मीद की मगर ऐसा नहीं हुआ।

23 जुलाई को जब सोनम वांगचुक ने अनशन तोड़ा तो फिर से कांग्रेस के कुछ बुद्धिजीवियों ने उन्हें बिका हुआ बताना शुरू कर दिया। तब कांग्रेसी बुद्धिजीवियों ने कहा कि अब आन्दोलन जनता का हो चुका है इसलिए उसे ऐसे किसी व्यक्ति की जरूरत नहीं जबकि जमीनी सच ये है कि सोनम वांगचुक को जबरदस्ती अस्पताल में भर्ती कराने के बाद ही इस आन्दोलन में जान आई। उसके पहले वहाँ दो-चार हजार लोग ही जुट रहे थे। 20 जुलाई के संसद मार्च को सफल बनाने के पीछे भी आम आदमी पार्टी, सपा, भीम आर्मी की बड़ी भूमिका थी। कांग्रेसी इस लिस्ट में भी पीछे थे। अखिलेश यादव ने अपनी पत्नी डिंपल को वहाँ भेजकर ज्यादा समझदारी का परिचय दिया। 25 जुलाई को आए इस्तीफे से साफ हो गया कि वांगचुक को पहले ही उसके बारे में मौखिक रूप से आश्वस्त किया जा चुका था, तभी उन्होंने अनशन तोड़ा।

कांग्रेस के बौद्धिक प्रकोष्ठ ने राहुल जी को समझाया कि कॉकरोच पार्टी इसलिए खड़ी की गयी है ताकि उनका छात्रों की गूँज कार्यक्रम किल किया जा सके। राहुल गांधी ने पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाना वाला कदम प्रधानमंत्री आवास पर जाकर उठाया। मेरी राय में वह बेहद अपरिपक्व हरकत थी मगर राजनेता पब्लिक का अटेंशन पाने के लिए बहुत कुछ करते हैं। इस प्रसंग को फिलहाल अनदेखा किया जा सकता क्योंकि वहाँ कोई अनहोनी नहीं घटी। मगर वहाँ भी राहुल जी पीएम और एचएम का इस्तीफा माँगने लगे। प्रधान के इस्तीफ के बाद जिस तरह जंतर-मंतर खाली हो गया उससे साफ है कि राहुल जी की माँग को छात्रों ने ज्यादा तवज्जो नहीं दी। बाद में राहुल जी ने पुराना स्टैण्ड बदल दिया और पीएम से माफी की माँग करने लगे। जाहिर है कि उनकी माँग को केवल कांग्रेस बौद्धिक प्रकोष्ठ सुन रहा है।

पिछली बार जब राहुल गांधी की आलोचना में एक छोटी सी पोस्ट लिखी तो कांग्रेस के एक अंधभक्त ज्ञान देने लगे कि राहुल जी को मेरे जैसों के सलाह की जरूरत नहीं। तब मैंने उनसे इतना ही कहा कि उनके लिए आप जैसों की सलाह ही काफी है। वह सज्जन भी आदतन सिर के बल खड़े होकर महीने भर कॉकरोच पार्टी को भाजपा की साजिश बताते रहे।

कांग्रेस अंग्रेजों के जमाने से सत्ता में है। सत्ता में रहने का उसका वर्क एक्स करीब 70 साल का है। भारत विभाजन के बाद करीब 60 साल वह एकछत्र राज कर चुकी है। यही कारण है कि देश के बौद्धिक और भद्र लोक में कांग्रेस की पकड़ गहरी है। मगर इसी वर्ग के कांग्रेसी अंधभक्तों द्वारा दी गयी सलाहों की वजह से कांग्रेस की जमीन से पकड़ कमजोर होती गयी और वह डिफॉल्ट एंटी-हिन्दुत्व वोट के सहारे अपना अस्तित्व बचाए हुए है।

इस आन्दोलन से भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस भी सबक ले सकती है कि जब युवाओं में धर्मेंद्र प्रधान के प्रति इतना आक्रोश था वह ऐसा कोई आन्दोलन क्यों नहीं खड़ा कर पायी जिसमें उनके पार्टी कैडर के अलावा सामान्य युवा भी शामिल होने के लिए आएँ। मुझे यकीन है कि कांग्रेस इन प्रश्नों पर विचार नहीं करेगी। कांग्रेस के अंधभक्त पिछले लोक सभा चुनाव की तरह पार्टी की हार को भी जीत समझकर जश्न मनाते नजर आएँ तो हैरत नहीं होगी। मगर यह बात कहीं तो दर्ज होनी चाहिए, इसलिए यह पोस्ट लिखी।

हार कर भी जीत गए मोदी….

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मृदुल त्यागी

मेरठ । धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया. अच्छा ही हुआ. 2024 में जब मोदी नई सरकार बना रहे थे, उससे पहले भी लिखा था- #परजीवियों से छुटकारा पाइये. ये भी लिखा था- प्रधान जैसे मंत्री #नीट_को_नासूर बना देंगे. किसी प्रकार से सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को ये गुमान हो गया कि आवश्यकतानुसार मंत्रिमंडल में बदलाव कमजोरी का संकेत देता है. ऐसा नहीं है. लेकिन प्रधान की जिस तरह से विदाई हुई, वह भी कमजोरी का संकेत नहीं है. जिन्हें ये लगता है कि मोदी को झुका दिया, डरा दिया. वे गलत हैं. क्या ये सत्तापक्ष की विफलता है ? नहीं.

ये विफलता विपक्ष की है. अब जबकि प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है, तो #राहुल_गांधी_से ये सवाल और ज्यादा पुख्ता तरीके से बनता है कि पिछले 12 साल में बतौर विपक्ष वह कोई ऐसा आंदोलन क्यों खड़ा नहीं कर पाए ?

चंद महीने में एक इंस्टाग्राम पार्टी बनी और निर्णायक आंदोलन हो गया. राहुल गांधी ऐसा कोई आंदोलन क्यों पैदा नहीं कर पाए. जवाब वही है, वेणुगोपालों और जयराम रमेशों से घिरे राहुल गांधी जनाकांक्षाओं या विरोध के मुद्दों को न तो समझ पाते हैं, न पकड़ पाते हैं. हां, जिस तरीके से उन्होंने आंदोलन को चोरी करने की कोशिश की और सबके बाद जिस तरीके से क्रेडिट चोरी करने की कोशिश की, घिनौना है.
ये सवाल अन्य से भी है. क्या रोज एक सांड़ का फोटो ट्वीट कर देने से उनकी विपक्ष की जिम्मेदारी पूरी हो जाती है. या रोज एक निम्न स्तर का व्यंग्य पोस्ट कर देने से वह जेन-जी की आकांक्षाओं से खुद को जोड़ पाते हैं ? जवाब है नहीं.

आप भले ही सीजेपी को #AAP_की_बी_टीम कहें, लेकिन सबसे बड़ा #तमाचा तो ये अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी के मुंह पर है. जो दिल्ली को अपनी जागीर मानते थे, जो जंतर-मंतर और धरने के चैंपियन बनते थे, वे #शीशमहल में गुम हो गए. अगर सीजेपी उनकी बी टीम है, तो बात दूसरे गाल पर तमाचे वाली है. इसलिए कि आपने अपनी ए टीम यानी आआप को चुका हुआ मान लिया. आपने मान लिया है कि आपके चेहरों पर अब लोगों और देश के युवाओं को भरोसा नहीं है. आपके नए डमी चेहरे चाहिए.

ट्रांसफारमेशन जो हुआ है, वह मोदी का हुआ है. मोदी का जो व्यवहार है, वह देश के हर पेरेंट, गार्जियन के लिए सबक है. #सबक ये कि आप आज के युवा की किसी बात को ये कहकर नहीं टाल सकते कि बेटा अभी तुम कुछ नहीं जानते. उन्होंने बात सुनी, मानी. लोग कह रहे हैं कि तीस दिन तक इंतजार क्यों किया. इसलिए किया कि क्या वास्तव में यह देश के यूथ की आकांक्षा है. क्या देश के यूथ में कोई गुस्सा वाजिब तौर है. जो व्यक्ति तीन बार मुख्यमंत्री रहा, 12 साल से प्रधानमंत्री है, तमाम साजिशों के बावजूद सत्ता में है, उसे मैं राजनीति का ट्यूयोरियल देने लायक खुद को नहीं समझता. हां, ये देखकर खुशी हुई कि मोदी ने समय रहते पहचान लिया कि ये #इंस्टाग्राम_का_आंदोलन है. इस आंदोलन में युवा का गुस्सा जहां होगा, वहां होगा, लेकिन बड़ी बात ये थी कि रील-मीम का आंदोलन था. इस आंदोलन में बड़ी संख्या में वे लोग शामिल थे, जो सब्सक्राइबर, फालोअर और लाइक के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं. ट्रेन के आगे कूदने तक को तैयार हैं. फिर वे दिल्ली की सड़कों पर क्या कुछ नहीं कर गुजरते.
अब जनमत मोबाइल स्क्रीन से बनता है. ट्वीटर पर रोज बौद्धिक कुश्ती करते कथित बुद्धिजीवियों को लगता होगा कि दुनिया बस वही है. लेकिन नहीं. आभासी दुनिया अब रील्स है. मोदी को #संवाद ही तो आता है. इसलिए वह इंस्टाग्राम पर उतर आए. लाइव. उसी लैंग्वेज में कम्युनिकेट किया. मोदी की रील ने इंस्टाग्राम फीड पर दो दिन तक कब्जा किए रखा. ये कम बड़ी बात नहीं है. वन मिलियन फालोअर चंद घंटों में आ गए. मोदी ने गार्जियन वाला फर्ज निभाया. बात सुनी. मानी. आप इसे मजबूरी कह लें या कुछ और. लेकिन मोदी हारकर भी जीत गया और इस देश का कथित विपक्ष एक बार बुरी तरह हारा और चंद महीने पुरानी पार्टी के सामने जमींदोज हो गया.
संलग्न- वह पोस्ट जिसमें प्रधान के नीट को नासूर बना देने की आशंका जताई थी
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