कसार देवी से लौटकर

kasaar-devi-2-1024x576-1.png

अल्मोड़ा :जब कसार देवी को याद करता हूँ, तो सबसे पहले जो चीज़ मन में उतरती है, वह केवल उसका दृश्य नहीं, बल्कि उसका मौन है। अल्मोड़ा से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी। क्रैंक्स रिज नामक पहाड़ी। समुद्र तल से 2100 मीटर की ऊँचाई पर बसा यह स्थान बाहर से जितना साधारण लगता है, भीतर से उतना ही रहस्यमय है। मंदिर तक पहुँचने वाली चढ़ाई।आसपास फैली बाँज, देवदार और चीड़ की गंध। नीचे लहराती घाटियाँ। हवा की वह ठंडक, जो चेहरे को छूकर जैसे भीतर उतर जाती है। इन सबके बीच कसार देवी किसी छोटे धार्मिक स्थल की तरह नहीं, बल्कि एक जीवित अनुभव की तरह सामने आती है। यहाँ पहुँचकर लगता है कि पहाड़ केवल भूगोल नहीं, स्मृति का विस्तार भी हैं।

यात्राओं पर बने रहना सचमुच एक अलग अनुभव है। प्रकृति का यह अद्भुत जादू है कि वह मनुष्य को बिना कुछ कहे अपने भीतर उतार लेती है। शहर में हम अपने बारे में जितना भी सोचते हों, यात्रा के रास्ते हमें किसी दूसरे, अधिक सच्चे रूप से मिला देते हैं। कसार देवी में मुझे यही हुआ। ऐसा लगा कि इतने वर्षों तक मैं किसी और का जीवन छुपकर जी रहा था। इस यात्रा में पहली बार अपने जीवन की लय को सुन पाया। पर, यह लय या धुन कैसी थी?पहाड़ी हवा, चट्टान की गरिमा और मंदिर के मौन से उपजा हुआ अनुभव था।

कसार देवी मंदिर कुमाऊँ मंडल के अल्मोड़ा जनपद में स्थित है। कश्यप पहाड़ी पर बसा हुआ। स्थानीय परंपरा के अनुसार यह स्थान लगभग दो हजार वर्ष पुराना है। यहाँ मुख्य रूप से देवी दुर्गा के कात्यायनी स्वरूप की पूजा होती है। मंदिर परिसर में पहुँचते ही एक तरह की एकाग्रता महसूस होती है। शायद इसलिए कि यह जगह केवल आस्था की नहीं, साधना की भी भूमि रही है। यहाँ का वातावरण इतना पारदर्शी और शांत है कि हर आने वाला व्यक्ति अपने भीतर की आवाज़ अधिक साफ़ सुनने लगता है।

कसार देवी की चर्चा अक्सर उसकी चुंबकीय शक्ति के साथ की जाती है। स्थानीय मान्यताओं और कुछ शोधपरक चर्चाओं के अनुसार, यह स्थान पृथ्वी के उन दुर्लभ क्षेत्रों में गिना जाता है।यहाँ भू-चुंबकीय प्रभाव और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का विशेष संयोग माना गया है। कहा जाता है कि ध्यान के समय यहाँ मन अधिक स्थिर होता है।विचारों की दौड़ धीमी पड़ती है।भीतर एक अनोखी शांति उतरती है। इसी वजह से कुछ लोग इसे साधना के लिए अत्यंत उपयुक्त स्थान मानते हैं। लोकविश्वास में यह भी कहा जाता है कि मंदिर परिसर के भीतर एक स्थान को ‘जीपीएस-8’ के रूप में चिह्नित किया गया है।यहाँ भूगर्भीय चुंबकीय पिंड की उपस्थिति की बात की जाती है। इन दावों का वैज्ञानिक सत्यापन अलग विषय है।पर इतना निश्चित है कि इस स्थान का मानसिक और आध्यात्मिक प्रभाव अत्यंत गहरा महसूस होता है।

कई लोग यह भी मानते हैं कि ऐसे चुंबकीय और कॉस्मिक प्रभाव पूरी दुनिया में कुल जमा तीन स्थानों पर पाए जाते हैं। कसार देवी के साथ सामान्यतः स्टोनहेंज (ब्रिटेन) और माचू पिच्चू (पेरू) का उल्लेख किया जाता है। यह तुलना भले ही लोकप्रिय मान्यताओं का हिस्सा हो, पर इससे इतना तो साफ है कि कसार देवी को केवल स्थानीय आस्था तक सीमित नहीं रखा गया।इसे एक व्यापक, लगभग वैश्विक रहस्य-भूमि के रूप में देखा गया। यहाँ आने वाले कई यात्री इस स्थान को केवल मंदिर नहीं, ऊर्जा-क्षेत्र के रूप में महसूस करते हैं।

शायद यही कारण है कि इस स्थान से स्वामी विवेकानंद का संबंध इसे और भी महत्त्वपूर्ण बनाता है। वे वर्ष 1890 के आसपास यहाँ आए थे। अपनी यात्रा-स्मृति में इस स्थान की शांति और प्रभाव का उल्लेख किया था। कहा जाता है कि उन्होंने यहाँ ध्यान किया। इस क्षेत्र की एकाग्र कर देने वाली नीरवता से गहराई से प्रभावित हुए। विवेकानंद की उपस्थिति कसार देवी को केवल एक तीर्थ नहीं रहने देती, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी में बदल देती है। उनके साथ जुड़ी गुफा आज भी लोगों की स्मृति और श्रद्धा का केंद्र है। उस गुफा में जाकर लगता है कि समय मानो कुछ देर के लिए ठहर गया हो।

कसार देवी के समीप ही भगवान शिव का एक अनूठा मंदिर है।पास में ही रामकृष्ण मिशन का आश्रम भी। यह इस पूरे परिसर को साधना और सेवा की एक व्यापक परंपरा से जोड़ता है। मंदिर के आसपास का वातावरण, आश्रम की उपस्थितिऔर विवेकानंद से जुड़ी स्मृतियाँ मिलकर इस स्थान को खास बनाती हैं। यहाँ आस्था, विचार और अनुशासन एक साथ उपस्थित होते हैं। यहाँ की शांति महज़ बाहरी नहीं, बल्कि भीतरी है। इसी कारण यह जगह बार-बार लौटने के लिए खिंचती है।

इतिहास की दृष्टि से देखें, तो कसार देवी का महत्व केवल भारतीय साधकों तक सीमित नहीं रहा। 1960 और 70 के दशक में यह स्थान हिप्पी आंदोलन से जुड़े यात्रियों और पश्चिमी साधकों के बीच भी चर्चित हुआ। तब इसे ‘क्रैंक रिज’ के नाम से जाना जाने लगा। यह वह दौर था जब दुनिया के अनेक युवा शांति, ध्यान, संगीत और आत्मान्वेषण की खोज में भारत आए। कसार देवी उनके लिए भी एक आकर्षण बनी। बॉब डायलन और टिमोथी लीरी जैसी कुछ चर्चित विदेशी हस्तियों के यहाँ आने की चर्चाएँ प्रचलित हैं। इस समय कसार देवी एक ऐसे सांस्कृतिक मोड़ पर थी, जहाँ स्थानीय पवित्रता और वैश्विक जिज्ञासा एक-दूसरे से मिल रही थीं।

फिर भी कसार देवी की असली शक्ति किसी प्रसिद्ध नाम से नहीं बनती। उसकी शक्ति उस सहज जीवन में है जो पहाड़ के लोग यहाँ जीते हैं। मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए, पास की दुकानों पर बैठकर चाय पीते हुए, या सामने फैली घाटियों को चुपचाप देखते हुए जो अनुभव मिलता है, वह किसी भी प्रचार से बड़ा है। यहाँ की हवा में एक ऐसी निर्मलता है, जो मनुष्य को थोड़ा धीमा कर देती है। शहर से आए लोग शुरुआत में उसे खालीपन समझ सकते हैं। पर वह खालीपन नहीं, एक गहन उपस्थिति है। वहाँ समय अपनी तेज़ी खो देता है, और मन अपने मूल स्वरूप की ओर लौटने लगता है।

संभवत: कसार देवी से जुड़े रहस्य भी इसी कारण आकर्षक हैं। कुछ लोग इसे चुंबकीय क्षेत्र कहते हैं। कुछ ब्रह्मांडीय ऊर्जा। कुछ साधना का प्रभाव।और कुछ केवल पहाड़ की विशिष्ट शांति। संभव है कि इन सबमें थोड़ा-थोड़ा सच हो। पर्वतीय स्थलों का प्रभाव केवल वैज्ञानिक माप से नहीं समझा जा सकता। वहाँ का मौसम, ऊँचाई, हवा की गति, दृश्य की खुली रचनाऔर मनुष्य की अपनी तैयारी,ये सब मिलकर अनुभव को विशेष बनाते हैं। कसार देवी ऐसा ही स्थान है, जहाँ विज्ञान और आस्था के बीच कोई कठोर दीवार नहीं दिखती।

मुझे वहाँ की वह साँझ अब भी याद है। सूरज सीधा नहीं, तिरछा पड़ रहा था। विदा होने की राह पर। मंदिर परिसर में कम लोग थे। थोड़ी देर पहले आई एक टुकड़ी चली गई थी और उनके जाने के बाद जगह और भी शांत हो गई थी। पास ही एक साधु चुपचाप बैठा था। कुछ दूरी पर एक परिवार अपने बच्चे को मंदिर का महत्त्वबता रहा था। हवा बहुत तेज थी।लेकिन उसमें पहाड़ की गंध साफ थी। उस क्षण लगा कि शायद शांति का सबसे सच्चा रूप वही है, जो किसी बड़े दावे के बिना अपने आप उपस्थित हो। कसार देवी उसी शांति का नाम है।

इस स्थान की एक और खूबी यह है। यहाँ धार्मिकता और प्रकृति का संबंध बहुत सहज है। यहाँ से नंदा देवी, त्रिशूल और पंचचूली जैसी बर्फ से ढकी हिमालयी चोटियों का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।मंदिर ऊँचाई पर है, लेकिन उसका प्रभाव नीचे तक फैला हुआ लगता है। रास्ते में पत्थर, झाड़ियाँ, छोटे घर, दूर दिखती घाटियाँ, खेत। स्थानीय लोगों की बातचीत,सब कुछ एक साथ मिलकर कसार देवी की छवि बनाते हैं। यहाँ कोई कृत्रिम भव्यता नहीं। इसकी गरिमा सहजता में है। यही कारण है कि यह जगह केवल दर्शन-स्थल नहीं, अनुभूति-स्थल भी है।

रोलिंग पहाड़ियों और खुली घाटियों वाला यह कुमाऊँ प्रदेश वैसे भी अपने भीतर एक विशेष सौंदर्य रखता है। यहाँ की भौगोलिक बनावट मन को लगातार गति और स्थिरता दोनों का अनुभव कराती है। जहाँ एक ओर ऊँचाई है, वहीं दूसरी ओर सघन वन हैं। एक ओर दूर तक फैला आकाश है, वहीं दूसरी ओर सीधी-सादी ग्रामीण ज़िंदगी है। कसार देवी इसी भूगोल का एक संकेंद्रित रूप है। उसके चारों ओर फैला परिवेश केवल दृश्य नहीं, संस्कार भी है।

जब मैं लौट रहा था, तब भीतर यह साफ था कि यह यात्रा केवल अल्मोड़ा के पास की एक पहाड़ी पर चढ़ने की यात्रा नहीं थी। यह अपने भीतर की चोटी तक पहुँचने की यात्रा थी। वहाँ जाकर यह समझ में आया कि मनुष्य का सबसे बड़ा रहस्य शायद उसकी अपनीलय या धुन है। कसार देवी उस लय को सुनने की जगह देती है। उसकी प्रसिद्धि, उसकी चुंबकीय आभा, विवेकानंद की स्मृति, हिप्पी दौर की कहानियाँ, रामकृष्ण मिशन की उपस्थितिऔर स्थानीय लोकमान्यताएँ, ये सब मिलकर उसे विलक्षण भूमि बनाते हैं।यहाँ इतिहास भी है, भूगोल भी।आत्म-लय की खोज भी।

वस्तुत: कसार देवी से लौटकर जो शेष रहता है, वह केवल याद नहीं होता। वह एक धीमी, स्थायी, गहरी उपस्थिति बन जाता है। और शायद यही हर बड़ी यात्रा का हासिल है। वह हमें बाहर से कम, भीतर से अधिक बदलती है। कसार देवी भी यही करती है। वह चुपचाप अपने पास आने वाले हर व्यक्ति को तनिक अधिक मनुष्यतर,पूर्णतर, कृतज्ञतरऔर थोड़ा अधिक अपना बना देती है।

Share this post

डॉ. देवेन्द्र नाथ तिवारी

डॉ. देवेन्द्र नाथ तिवारी

डॉ. देवेन्द्र नाथ तिवारी, राम लाल आनंद कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार के सहायक आचार्य हैं। वे मीडिया अध्ययन, हिंदी पत्रकारिता, समकालीन संचार-पद्धतियों, भोजपुरी भाषा, लोक संस्कृति और न्यू मीडिया के गंभीर अध्येता के रूप में अकादमिक जगत में सक्रिय हैं

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top