अधिक मास : आध्यात्म और विज्ञान के निष्कर्ष पर निर्धारण : समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संदेश भी

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भोपाल । इस वर्ष ज्येष्ठ शुक्लपक्ष एकम् 17 मई से अधिकमास आरंभ हो गया है जो सोमवती अमावस 15 जून तक रहेगा। अधिकमास को “पुरुषोत्तम मास” माना गया। पंचांग के अनुसार अधिक मास का यह विधान विज्ञान, आध्यात्म और सामाजिक मनोविज्ञान के निष्कर्ष पर आधारित है। विज्ञान की दृष्टि से अधिकमास का निर्धारण सूर्य और चंद्रमा की गति के बीच समन्वय बनाने केलिये किया गया है तो आध्यात्म की दृष्टि से यह आत्मशक्ति जाग्रत करने का समय है। जबकि इसमें व्रत पूजा उपासना के विधान समाज में सकारात्मक चिंतन को प्रभावी बनाने के अद्भुत सूत्र हैं।
जीवन के लिये विज्ञान और आध्यात्म एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों के संयुक्त निष्कर्ष से जीवन समृद्ध और सकारात्मक होता है। भारतीय परंपरा के विकास क्रम में धार्मिक उतसव के आयोजन हों अथवा तीज त्यौहारों का निर्धारण, यह परंपरा अथवा केवल उत्सव मनाने के प्रावधान भर नहीं हैं। इनमें विज्ञान के निष्कर्ष और आध्यात्म के बीच समन्वय बना कर जीवन को उन्नत बनाने के सूत्र हैं। ताकि समाज जीवन उन्नतिशील बने और परस्पर व्यवहारिक समन्वय भी सशक्त हो। यही सिद्धांत अधिकमास के निर्धारण में है। अधिकमास का निर्धारण केवल धार्मिक या केवल ज्योतिष का आधार नहीं है अपितु इसका आधार सूर्य और चंद्र की गति में संतुलन बिठाने के लिये किया गया है। चंद्रमा की तुलना में सूर्य गति तेज है। गति के इस अंतर के कारण वर्ष के अंत में समय का अंतर आ जाता है। अधिकमास के निर्धारण से इस अंतर को समायोजित किया जाता है। यह आश्चर्यजनक है कि हजारों वर्ष पहले भारतीय मनीषियों को इस अंतर की सटीक जानकारी थी। इसी आधार पर पंचांग का निर्माण हुआ। भारतीय पंचांग में वर्ष की अवधि का निर्धारण तो सूर्य की गति से होता है। जबकि प्रतिदिन पड़ने वाली तिथियों का निर्धारण चंद्रमा की गति से किया जाता है। यदि दोनों की गति की गणना की जाय तो चंद्रमा की गति के अनुसार वर्ष की अवधि 354 दिन, 8 घंटे और 34.28 सेकंड का होती है। जबकि सूर्य की गति के अनुसार वर्ष की अवधि 365 दिन, छह घंटे, 9.54 सेकंड होती है। इस प्रकार चंद्रमा और सूर्य की गति का यह अंतर वर्ष में 10 दिन, 21 घंटे और 35.16 सेकंड का हो जाता है। अंतर की इस अवधि की गणना करके यह सुनिश्चित किया गया कि जब यह अंतर 29 दिन 12 घंटे, 44 मिनट और 2.865 सेकंड से अधिक हो जाय तो अधिकमास का प्रावधान करके इस समयावधि का संतुलन बनाया गया है। सामान्यतः 19 वर्ष में सात अतिरिक्त मास के प्रावधान किये जाते हैं। अधिकमास का निर्धारण कब किया जाय इसका भी विधान सुनिश्चित किया गया है। सूर्य प्रत्येक राशि पर लगभग एक माह रहते हैं। सूर्य की राशि परिवर्तन की तिथि से अधिकमास प्रारंभ होता है। इस वर्ष 15 मई से सूर्य ने मेष राशि से बृष राशि में प्रवेश कर लिया है। लेकिन इस माह अमावस शनिवार 16 मई को थी इसलिये ज्येष्ठ शुक्लपक्ष एकम 17 मई से अधिकमास आरंभ हुआ जो 15 जून अमावस तक रहेगा।

अधिकमास का नामकरण “पुरुषोत्तम मास”

जब पृथ्वी के मौसम परिवर्तन का अध्ययन करने पर सूर्य और चंद्र की गति के अंतर का पता चला तब वर्ष की अवधि में सामंजस्य केलिये अधिकमास का निर्धारण हुआ। तब प्रश्न आया कि इसका नाम क्या हो और माह का स्वामी कौन होगा। इसके नामकरण की कथा श्रीमद्भागवत में भी है। चूँकि राशियाँ बारह होतीं हैं और सूर्य की यात्रा का निर्धारण इन राशियों के अनुसार होता है तब इस अतिरिक्त मास के लिये कोई राशि नहीं मिलक इस कारण इस अतिरिक्त मास को “मलमास” कहा जाने लगा। यह धारणा भी बन गई कि यह अवधि अशुभ होती है। इससे दुःखी होकर यह अधिकमास समुद्र के पास पहुँचा। समुद्र कोअपनी वेदना बताई तब समुद्र उसे लेकर भगवान विष्णु के पास गये। तब भगवान विष्णु ने स्वयं को इस मास को अपना नाम देकर “पुरुषोत्तम मास” निर्धारित किया और कहा कि इस मास में किये गये सभी आध्यात्मिक कार्यों का फल अधिक मिलेगा। यह प्रसंग श्रीमद्भागवत में है। पुरुषोत्तम मास का का उल्लेख श्रीमद्भगवद्गीता में भी है। तब से अधिकमास का नाम “पुरुषोत्तम मास” हुआ और इसके स्वामी श्रीमन्ननारायण माने गये । इसलिये इस माह में किये जाने वाले पूजन भजन से नारायण प्रसन्न होते हैं और पुण्य लाभ अधिक मिलता है। इसे यदि मनोविज्ञान की दृष्टि से देखे तो सकारात्मक कार्य करने से मन की अशांति दूर होती है, सकारात्मक कार्यों की गति तीव्र होती है तो स्वाभाविक है कि कार्य परिणाम अच्छे ही होंगे। इसके अतिरिक्त सामूहिक अनुष्ठान से परिवार और समाज के बीच समन्वय भी बनता है।

आरोग्य, आध्यात्मिक जागरण और सामाजिक स्वरूप

अधिकमास का निर्धारण विज्ञान के अनुसंधान के अनुसार सूर्य और चंद्र की गति के अंतर को समायोजित करने के लिये होता है तो वहीं उसकी पूजा उपासना विधि में आध्यात्म जागरण और सामाजिक सहभागिता से जोड़ा गया है। व्यक्ति के अस्तित्व में कुल पाँच आयाम होते हैं एक अन्नमय कोष अर्थात शरीर, दूसरा प्राणमय कोष यनि प्राण शक्ति, तीसरा मनोमय कोष यनि मन, चौथा ज्ञानमय कोष यनि बुद्धि, और पाँचवा आत्ममय कोष यनि आत्मा। हमारे आत्म जागरण और आरोग्य में इन पाँचों कोषों में ऊर्जा का समन्वय होना चाहिए। यदि किसी एक कोष में ऊर्जा अधिक हुई तो दूसरे कोष की ऊर्जा कमजोर होगी। आरोग्य की दृष्टि से यह असंतुलन रोगों का कारण होता है। जबकि आत्म चेतना न केवल शरीर, मन और बुद्धि को सशक्त बनाती है अपितु इन पाँचों कोषों में संतुलन भी बनाती है। अधिकमास में पूजन विधि और भोजन का निर्धारण इन पाँचों आयामों में ऊर्जा का संतुलन हो और समाज के सभी वर्गों में समन्वय बनाने केलिये किया गया है। इसकी झलक हमें अधिकमास के दौरान भोजन सामग्री और पूजन सामग्री में मिलती है ।
पुरुषोत्तम मास में गेहूं, चावल, सफेद धान, मूंग, जौ, तिल, मटर, बथुआ, ककड़ी, केला, घी, कटहल, आम, पीपल, जीरा, सोंठ, इमली, सुपारी, आंवला, सेंधा नमक आदि का सेवन करने और पूरे माह एक समय भोजन करने को कहा गया है । अधिकमास में शहद, चौलाई, उड़द की दाल, राई, प्याज, लहसुन, गोभी, गाजर, मूली और तिल का तेल का सेवन करने को मना किया गया है। इस भोजन निषेध और उपयुक्त भोजन सामग्री को पाप पुण्य से जोड़ा गया है। भोजन, पूजन और दिनचर्या का विधान कुछ इस प्रकार किया गया है जिससे मनुष्य में सकारात्मक भाव उत्पन्न हों। आदर्श नागरिक और समाज के आदर्श स्वरूप केलिये सकारात्मक चिंतन ही सबसे महत्वपूर्ण होता है।
इस प्रकार अधिकमास के निर्धारण एक त्रिवेणी है। विज्ञान का अनुसंधान है, आरोग्य एवं आध्यात्म जागरण है और सामाजिक सहभागिता भी है ।

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रमेश शर्मा

रमेश शर्मा

श्री शर्मा का पत्रकारिता अनुभव लगभग 52 वर्षों का है। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों माध्यमों में उन्होंने काम किया है। दैनिक जागरण भोपाल, राष्ट्रीय सहारा दिल्ली सहारा न्यूज चैनल एवं वाँच न्यूज मध्यप्रदेश छत्तीसगढ प्रभारी रहे। वर्तमान में समाचार पत्रों में नियमित लेखन कर रहे हैं।

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