अंग्रेजों ने धोखे से पीठ में गोली मारी थी

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भोपाल । भारत की अंग्रेजों से मुक्ति केलिये क्राँतिकारी आँदोलन में असंख्य ऐसे क्राँतिकारी हुये जिनसे अंग्रेजों को भी भय था। इनमें से एक हैं क्राँतिकारी अल्लूरी सीताराम जिन्हें पकड़ने केलिये पहले विश्वासघातियों को तैयार किया और फिर घेरकर पीठ से गोली मारी।

क्रांतिकारी सीताराम राजू ने एक ओर आंध्रप्रदेश के नगरों और वन में रहने वाले सैकडों नौजवानों में स्वत्व जाग्रत करके क्रांति का उद्घोष किया और दूसरी ओर पंजाब बंगाल तथा उत्तराखंड के क्रांतिकारियों से भी संपर्क करके एक बड़ा संगठन तैयार किया। उन्होंने गदर पार्टी के बाबा पृथ्वीसिंह से संपर्क किया। उन्होंने नल्लईमल्लाई की पहाड़ियों में नौजवानों गुरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण देने केलिए केन्द्र भी आरंभ किये। गोदावरी नदी के आसपास फैली इन पहा़डयों की समूची वन संपदा को अंग्रेजों के शोषण से मुक्त कर लिया गया था। अब व्यापारियों के कारिन्दे ही नहीं स्थानीय पुलिस भी नहीं घुस सकती थी। स्थानीय नौजवान इन पहाड़ियों के गुप्त रास्ते भी जानते थे जिनसे वे न केवल स्वयं ओझल हो जाते थे अपितु पुलिस पर तीर कमान से हमला भी कर देते थे। कयी बार पुलिस को यह पता भी नहीं चलता था कि तीरों का यह हमला किस दिशा से हो रहा है।

ऐसे महान क्रांतिकारी अल्लूरी सीताराम राजू का जन्म 4 जुलाई 1897 को विशाखापट्टणम जिले के अंतर्गत पांड्रिक गांव में हुआ था। परिवार की परंपरा ज्योतिष और आयुर्वेद विशेषज्ञ के रूप में थी। ज्योतिष के कारण ग्राम और नगरीय क्षेत्र में एवं वनोषधि के के कारण वनक्षेत्र में परिवार का अच्छा प्रभाव था। परिवार की परंपरा के अनुरूप क्रांतिकारी राजू की आरंभिक शिक्षा भी वैद्यक और ज्योतिष विषयों में ही हुई। ये दोनों विषय भारतीय परंपराओं और संस्कृति से जुड़े हुये थे लेकिन अंग्रेजों की नीति से वन उजड़ रहे थे और वनवासियों का शोषण हो रहा था। यह बात सभी को खटकती तो थी लेकिन इसका प्रतिकार नहीं हो रहा था। समाज को संगठित करके अपनी आवाज उठाने का बीड़ा अल्लूरी सीताराम राजू ने उठाया। छात्र जीवन से ही उन्होंने समस्त समाज को संगठित करना आरंभ कर दिया था। इसमें दोनों प्रकार के नौजवान थे। वनवासी भी और ग्रामवासी भी। नौजवानों में जाग्रति अभियान राजू ने ही आरंभ किया था लेकिन क्राँतिकारी संगठन के नेतृत्व का दायित्व क्राँतिकारी बीरैयादौरा को सौंपा जबकि समन्वय का काम स्वयं संभाला। एक विश्वासघाती के कारण वर्ष 1918 में बीरैयादौरा गिरफ्तार कर लिये गये तो संगठन के नेतृत्व का दायित्व अल्लूरी सीताराम राजू ने संभाला।

लेकिन बीरैयादौरा जेल में अधिक दिन न रहे, दीवार फाँदकर निकल गये। जंगल में पहुँच कर वे पुनः काँर्तिकारी आँदोलन में सक्रिय हो गये। लेकिन दल का नेतृत्व अल्लूरी सीताराम राजू के हाथ में रहा। बीरैयादौरा अपना नाम और पहनावा बदलकर गांव में रहने लगे। गुप्त रहकर वे रणनीतियाँ तैयार करते जिनका क्रियान्वयन अल्लूरी सीताराम राजू करते। इससे मुक्ति संग्राम और तेज हुआ। लेकिन एक बार फिर बीरैयादौरा विश्वासघात का शिकार बने और दोबारा गिरफ्तार कर लिये गए। लेकिन इस बार क्राँतिकारियों ने धावा बोलकर उन्हें मुक्त करा लिया। यह घटना बीरैयादौरा को पुलिस द्वारा अदालत ले जाते समय घटी। सीताराम राजू के नेतृत्व में क्राँतिकारियों ने धावा बोला दिया। बीरैयादौरा को मुक्त कराकर ले गये।

इस घटना को अंग्रेजी सत्ता ने अपने लिये एक बड़ी चुनौती माना। सेना बुलाई गई और क्रांति का दमन करने केलिये गांवों में दमनचक्र चला, जिस जंगल में क्राँतिकारियों के छिपे होने की सूचना मिलती उन जंगलों में आग लगाई जाने लगी। इसके साथ अल्लूरी और बीरैयादौरा को पकड़ने केलिये दस हजार रुपये इनाम घोषित कर दिया गया। वर्ष 1922 में यह धनराशि एक ब़डा प्रलोभन था। फिर भी दोनों क्राँतिकारी पकड़ न आ सके तब ब्रिटिश सरकार ने आन्ध्र पुलिस की सहायता केलिये केरल के मलाबार से अतिरिक्त टुकड़ी बुलाई। 12 अक्टूबर 1922 से नल्लईमल्लई की पहा़डयों में सघन अभियान चला। कुछ स्थानों पर मुठभेड भी हुई लेकिन दोनों क्राँतिकारी हाथ न सके। लगभग डेढ़ वर्ष तक यह अभियान चला। अंत में 6 मई 1924 को इस क्राँतिकारी दल का सघन मुकाबला सुसज्जित असम राइफल्स से हुआ। इसमें बीरैयादौरा सहित अनेक क्राँतिकारी बलिदान हो गये। लेकिन अल्लूरी राजू किसी प्रकार सेना के घेरे से निकल गये। लेकिन वे स्वयं को छिपा न सके। अगले ही दिन 7 मई 1924 को अकेले जंगल में घिर गये। पुलिस दल ने राजू पर पीछे से गोली चलाई। गोली उनकी पीठ में लगी। वे घायल होकर भूमि पर गिर प़डे। इसके बाद क्रूरतम यातनाओं का दौर चला। अन्य साथियों के नाम और शस्त्र सप्लाई का सूत्र पूछा गया। कठोर यातना सहकर भी उन्होंने किसी का नाम नहीं बताया। अंततः इन्हीं यातनाओं ने एक महान क्रांतिकारी को मृत्यु की गोद में पहुँचा दिया। उनके बलिदान के साथ ही गोदावरी नदी के अंचल और नल्लईमल्लई की पहा़डयों के वनक्षेत्र में क्राँति का दमन हो गया। इतिहास की पुस्तकों में अल्लूरी सीताराम राजू का उल्लेख बहुत कम है लेकिन लोक जीवन की गाथाओं में वे अमर हैं।

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रमेश शर्मा

रमेश शर्मा

श्री शर्मा का पत्रकारिता अनुभव लगभग 52 वर्षों का है। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों माध्यमों में उन्होंने काम किया है। दैनिक जागरण भोपाल, राष्ट्रीय सहारा दिल्ली सहारा न्यूज चैनल एवं वाँच न्यूज मध्यप्रदेश छत्तीसगढ प्रभारी रहे। वर्तमान में समाचार पत्रों में नियमित लेखन कर रहे हैं।

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