अखिलेश चौधरी
“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।”
— ऋग्वेद
अर्थात् :- एक साथ चलो, एक साथ बोलो और अपने मनों को एक करो।
भारतीय राजनीति के वर्तमान दौर में पश्चिम बंगाल और असम केवल चुनावी राज्य नहीं रह गए हैं, बल्कि वे भारत के वैचारिक संघर्ष के सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र बन चुके हैं। यहाँ की राजनीति अब केवल सत्ता परिवर्तन का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक अस्मिता, तुष्टिकरण, सीमाई सुरक्षा, अवैध घुसपैठ और जातिगत राजनीति जैसे प्रश्नों के इर्द-गिर्द घूम रही है। यही कारण है कि इन राज्यों के चुनाव परिणामों को समझने के लिए पारम्परिक जातीय समीकरणों से आगे बढ़कर उस व्यापक सामाजिक चेतना को समझना आवश्यक है, जो पिछले कुछ वर्षों में तेजी से उभरी है।
एक ओर वह विचारधारा है जो भारत को हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक सभ्यता के रूप में देखती है और राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानती है। दूसरी ओर कुछ ऐसे बुद्धिजीवी और राजनीतिक विश्लेषक हैं जो हर जनादेश को केवल जातिगत खांचों में बाँटकर देखने का प्रयास करते हैं। जब हिन्दू समाज सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय अखण्डता के प्रश्नों पर एकजुट होकर मतदान करता है, तो उसे अगड़ा बनाम पिछड़ा या जातिगत ध्रुवीकरण का नाम देना वस्तुतः उस सामाजिक परिवर्तन को नकारने का प्रयास है जो भारत में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
पश्चिम बंगाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कभी सांस्कृतिक और बौद्धिक चेतना का केन्द्र रहा बंगाल पिछले कई दशकों से राजनीतिक हिंसा, तुष्टिकरण और प्रशासनिक पक्षपात की घटनाओं से प्रभावित रहा है। सन्देशखाली जैसी घटनाओं ने सामान्य हिन्दू परिवारों के भीतर भय और असुरक्षा की भावना को गहरा किया। दुर्गा पूजा, रामनवमी और सरस्वती पूजा जैसे सांस्कृतिक आयोजनों को लेकर उत्पन्न विवादों ने भी यह सन्देश दिया कि राज्य की राजनीति बहुसंख्यक समाज की धार्मिक-सांस्कृतिक भावनाओं के प्रति संवेदनशील नहीं रही।
इसी के साथ पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठ और जनसांख्यिकीय परिवर्तन का प्रश्न भी लगातार राजनीतिक विमर्श के केन्द्र में रहा है। भारत-बांग्लादेश सीमा से सटे मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में जनसंख्या संरचना में आए बदलावों को लेकर लम्बे समय से बहस होती रही है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार मुर्शिदाबाद में मुस्लिम आबादी लगभग 66 प्रतिशत और मालदा में 51 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई थी। सीमावर्ती क्षेत्रों में नकली मुद्रा, पशु तस्करी और अवैध घुसपैठ से जुड़े मामलों पर केन्द्रीय एजेंसियाँ और सीमा सुरक्षा बल समय-समय पर चिन्ता व्यक्त करते रहे हैं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और BSF की रिपोर्टों में भी सीमा पार नेटवर्क और अवैध गतिविधियों का उल्लेख सामने आता रहा है।
स्थानीय समाज के एक बड़े वर्ग में यह भावना विकसित हुई कि राजनीतिक तुष्टिकरण के कारण सीमा सुरक्षा और नागरिक पहचान के प्रश्नों की उपेक्षा की गई। यही कारण है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं ने ऐसे राजनीतिक विकल्प की ओर रुख किया जो राष्ट्रीय सुरक्षा, नागरिकता और सीमाई नियंत्रण के मुद्दों को खुलकर उठाता है। बंगाल का जनादेश केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिन्ताओं की अभिव्यक्ति भी था।
इसी पृष्ठभूमि में बंगाल का हिन्दू मतदाता पहली बार व्यापक स्तर पर जातिगत सीमाओं से ऊपर उठता दिखाई दिया। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग और शहरी मध्यमवर्ग सभी के बीच एक साझा भाव विकसित हुआ कि यदि सांस्कृतिक अस्मिता और सुरक्षा संकट में है, तो जातीय पहचान गौण हो जाती है। यही कारण है कि आरक्षित सीटों पर भी राष्ट्रवादी राजनीति को बढ़ता समर्थन मिला। यह केवल चुनावी गणित नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक एकजुटता का संकेत था।
_जब राष्ट्र चेतना जागती है, तब जातियाँ पीछे छूट जाती हैं, और जब सभ्यता पर संकट आता है, तब समाज अपनी जड़ों की ओर लौटता है।_
कुछ विश्लेषक इस परिवर्तन को स्वीकार करने के बजाय उसे जातिगत दृष्टि से व्याख्यायित करने का प्रयास करते हैं। वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हिन्दू समाज कभी एक नहीं हो सकता और यदि कहीं एकता दिखाई दे रही है, तो उसके पीछे कोई सवर्ण वर्चस्व अवश्य होगा। यह दृष्टिकोण न केवल सामाजिक यथार्थ से दूर है, बल्कि लोकतांत्रिक जनादेश का भी अपमान है। लोकतंत्र में मतदाता को अपनी प्राथमिकताएँ तय करने का अधिकार है। यदि कोई मतदाता राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान या प्रशासनिक स्थिरता को प्राथमिकता देता है, तो उसे केवल जातिगत समीकरणों में बाँधकर देखना उसकी चेतना को कमतर आंकना है।
असम की स्थिति इस सन्दर्भ में और भी महत्वपूर्ण है। यहाँ दशकों से अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ का प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय चिन्ता का विषय रहा है। 1979 से 1985 तक चला असम आंदोलन इसी मुद्दे पर आधारित था, जिसमें लाखों लोगों ने विदेशी नागरिकों की पहचान और निष्कासन की मांग की थी। बाद में असम समझौता भी इसी संघर्ष का परिणाम बना।
असम के कई जिलों जैसे धुबरी, बरपेटा, नगांव, करीमगंज और हैलाकांडी आदि में जनसंख्या सन्तुलन में आए परिवर्तनों को लेकर लगातार राजनीतिक बहस होती रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार धुबरी जिले में मुस्लिम आबादी लगभग 79 प्रतिशत तक पहुँच गई थी। पूर्व मुख्यमन्त्री और वर्तमान नेतृत्व द्वारा समय-समय पर यह दावा किया जाता रहा है कि अवैध घुसपैठ राज्य की सांस्कृतिक संरचना और भूमि अधिकारों को प्रभावित कर रही है। सत्रों की भूमि पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई भी इसी व्यापक विमर्श का हिस्सा रही।
असम में भाजपा को मिला समर्थन इसी व्यापक भावना का परिणाम था। बोडो, अहोम, कार्बी और चाय जनजातियों सहित अनेक समुदायों ने मिलकर यह सन्देश दिया कि वे अपनी सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर एकजुट हैं। इसे केवल जातिगत ध्रुवीकरण कहना वास्तविकता को नकारना है। असम का जनादेश उस चिन्ता का प्रतिबिम्ब था जिसमें स्थानीय समाज को यह भय था कि निरंतर अवैध घुसपैठ भविष्य में राज्य की सांस्कृतिक संरचना को बदल सकती है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि सामाजिक न्याय और जातिगत राजनीति में मूलभूत अन्तर है। भारत जैसे समाज में वंचित वर्गों का उत्थान और समान अवसर अत्यन्त आवश्यक हैं। किन्तु सामाजिक न्याय का अर्थ समाज को स्थायी रूप से जातीय खांचों में बाँट देना नहीं हो सकता। जब राजनीतिक विमर्श केवल जाति आधारित प्रतिनिधित्व तक सीमित हो जाता है, तब वह समाज को जोड़ने के बजाय विभाजित करने लगता है। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में दलित, पिछड़े और आदिवासी समुदाय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साथ स्वयं को जोड़ते दिखाई दे रहे हैं। वे स्वयं को केवल जातीय पहचान तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि व्यापक हिन्दू और भारतीय पहचान का हिस्सा मानते हैं।
भारतीय राजनीति में यह परिवर्तन नया नहीं है। स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान भी अंग्रेजों ने “डिवाइड एंड रूल” की नीति के तहत जातीय और साम्प्रदायिक विभाजन को बढ़ावा दिया था। दुर्भाग्य से आज भी कुछ वैचारिक समूह उसी मानसिकता को नए रूप में आगे बढ़ाते दिखाई देते हैं। “दलित बनाम सवर्ण”, “उत्तर बनाम दक्षिण” या “स्थानीय बनाम प्रवासी” जैसे विमर्श प्रायः राजनीतिक लाभ के लिए खड़े किए जाते हैं। इसका उद्देश्य समाज में स्थायी असन्तोष बनाए रखना होता है ताकि एक साझा राष्ट्रीय चेतना विकसित न हो सके।
_समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,_
_जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।_
— रामधारी सिंह दिनकर
बंगाल और असम के चुनावों ने इस राजनीति को चुनौती दी है। विशेष रूप से हिन्दी भाषी और प्रवासी मतदाताओं की भूमिका ने यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रहित का प्रश्न क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर उठ चुका है। इन मतदाताओं ने आर्थिक विकास, सांस्कृतिक सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता के पक्ष में मतदान किया। उनके लिए यह केवल सरकार चुनने का विषय नहीं था, बल्कि उस भारत की परिकल्पना का समर्थन था जहाँ तुष्टिकरण के स्थान पर समान नागरिकता की भावना हो।
हालाँकि यह भी आवश्यक है कि राष्ट्रवाद का अर्थ किसी समुदाय के प्रति घृणा के रूप में प्रस्तुत न किया जाए। भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है, किन्तु विविधता तभी सुरक्षित रह सकती है जब राष्ट्र की सांस्कृतिक आत्मा और संवैधानिक ढाँचा सुरक्षित हो। हिन्दू एकजुटता का वास्तविक अर्थ किसी के विरुद्ध संघर्ष नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता, परम्पराओं और राष्ट्रीय अखण्डता की रक्षा के लिए सामूहिक चेतना का निर्माण है।
आज भारत का मतदाता पहले की तुलना में कहीं अधिक जागरूक और राजनीतिक रूप से परिपक्व दिखाई देता है। वह केवल जातिगत समीकरणों के आधार पर मतदान नहीं कर रहा, बल्कि सुरक्षा, विकास, सांस्कृतिक पहचान और वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा जैसे व्यापक प्रश्नों पर विचार कर रहा है। यही कारण है कि बंगाल और असम जैसे राज्यों के चुनाव परिणामों को केवल जातीय गणित के चश्मे से नहीं देखा जा सकता।
_राष्ट्र केवल भूगोल नहीं होता, वह साझा इतिहास, साझा संस्कृति और साझा चेतना का जीवंत स्वरूप होता है।_
अन्ततः यह स्पष्ट है कि भारत की राजनीति एक निर्णायक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। जातिगत विखण्डन की राजनीति धीरे-धीरे अपनी सीमाओं तक पहुँच रही है, जबकि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकता का विमर्श अधिक व्यापक होता जा रहा है। यह परिवर्तन लोकतन्त्र के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मतदाता को छोटी पहचानों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित के व्यापक दृष्टिकोण से सोचने के लिए प्रेरित करता है।
बंगाल और असम का संदेश स्पष्ट है कि जब समाज को अपनी सांस्कृतिक अस्मिता, सुरक्षा और राष्ट्रीय हित पर संकट दिखाई देता है, तब जातीय विभाजन पीछे छूट जाते हैं और राष्ट्र सर्वोपरि हो जाता है। यही भारत की लोकतान्त्रिक चेतना और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी शक्ति है।



