दिल्ली । पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में अनेक बड़े नाम हुए, लेकिन कुछ ऐसे लोग भी रहे जिन्होंने कभी पद, प्रसिद्धि या सत्ता की इच्छा नहीं की। उन्होंने अपना पूरा जीवन केवल राष्ट्र और विचार के लिए समर्पित कर दिया। ऐसे ही एक कर्मयोगी थे माखनलाल सरकार, जिनका नाम हाल के दिनों में तब चर्चा में आया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक मंच पर उनके चरण स्पर्श कर उनका सम्मान किया।
लेकिन माखनलाल सरकार की कहानी केवल उस एक क्षण की नहीं है। यह कहानी उस पीढ़ी की है जिसने विभाजन, प्रतिबंध, संघर्ष और विरोध के बीच भी राष्ट्रवादी विचार को जीवित रखा।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहयोगी
माखनलाल सरकार उन शुरुआती कार्यकर्ताओं में थे जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रवादी आंदोलन को बंगाल की धरती पर मजबूत करने का कार्य किया। वे श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहयोगियों में गिने जाते थे और लंबे समय तक संगठन के विस्तार में सक्रिय रहे।
उस समय बंगाल की राजनीति पूरी तरह अलग दिशा में जा रही थी। राष्ट्रवादी विचारधारा के लिए जमीन तैयार करना आसान नहीं था। विरोध, हिंसा और राजनीतिक दबाव आम बात थी। लेकिन माखनलाल सरकार जैसे कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर लोगों को जोड़ते रहे।
राष्ट्रगान गाने पर हुई गिरफ्तारी
उनके जीवन का एक ऐसा प्रसंग आज भी लोगों को भावुक कर देता है। परिवार के अनुसार, एक समय ऐसा भी आया जब RSS पर प्रतिबंध लगा हुआ था और राष्ट्रवादी गतिविधियों को संदेह की दृष्टि से देखा जाता था। उसी दौरान माखनलाल सरकार को राष्ट्रगान गाने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया था।
आज की पीढ़ी के लिए यह कल्पना करना कठिन है कि कभी “वंदे मातरम्” और “राष्ट्रगान” भी संघर्ष का कारण बन सकते थे। लेकिन उस दौर में ऐसे हजारों स्वयंसेवकों ने जेल और प्रताड़ना झेली।
कश्मीर आंदोलन से बंगाल तक
1952 में जब कश्मीर आंदोलन 1952 चल रहा था, तब माखनलाल सरकार भी उस आंदोलन का हिस्सा बने। वे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ तिरंगा आंदोलन में शामिल हुए और इसी दौरान उन्हें गिरफ्तार भी किया गया।
उस समय “एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे” का नारा पूरे देश में गूंज रहा था। बंगाल के एक साधारण स्वयंसेवक के रूप में माखनलाल सरकार ने भी इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
संगठन निर्माण में बड़ी भूमिका
1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद बंगाल में संगठन विस्तार की जिम्मेदारी आसान नहीं थी। माखनलाल सरकार को पश्चिम दिनाजपुर, जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग क्षेत्रों में संगठनात्मक कार्य का दायित्व मिला।
बताया जाता है कि केवल एक वर्ष के भीतर उन्होंने हजारों नए कार्यकर्ताओं को संगठन से जोड़ा। लगातार सात वर्षों तक उन्होंने जिला अध्यक्ष के रूप में कार्य किया और बंगाल में राष्ट्रवादी राजनीति की मजबूत नींव रखने में योगदान दिया।
साधारण जीवन, असाधारण समर्पण
97 वर्ष की आयु में भी माखनलाल सरकार का जीवन बेहद साधारण बताया जाता है। न कोई विशेष सुरक्षा, न प्रचार, न राजनीतिक महत्वाकांक्षा। यही कारण था कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक मंच पर उनका सम्मान किया, तो वह दृश्य पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया।
वह केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं था—वह उन लाखों अनाम स्वयंसेवकों का सम्मान था जिन्होंने दशकों तक बिना किसी पहचान के संगठन और राष्ट्र के लिए काम किया।
बंगाल में विचार की जड़ें मजबूत करने वाले स्वयंसेवक
आज बंगाल में राष्ट्रवादी राजनीति जिस स्थिति में दिखाई देती है, उसके पीछे दशकों का संघर्ष और हजारों कार्यकर्ताओं का परिश्रम रहा है। माखनलाल सरकार उन लोगों में से थे जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी संगठन को जीवित रखा।
जब राजनीतिक हिंसा और विरोध अपने चरम पर था, तब भी वे लगातार लोगों के बीच जाते रहे। उनके लिए राजनीति सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र सेवा का मार्ग थी।
जिस प्रकार मोरोपंत पिंगले ने इतिहास और सांस्कृतिक चेतना के अभियानों को दिशा दी, जिस प्रकार एकनाथ रानाडे ने समुद्र के बीच चट्टान को राष्ट्रीय स्मारक बना दिया—उसी प्रकार माखनलाल सरकार जैसे स्वयंसेवकों ने विचार की ऐसी नींव तैयार की, जिस पर आज एक बड़ा संगठन खड़ा दिखाई देता है।
यह कहानी किसी बड़े पद या प्रसिद्धि की नहीं है। यह उस निष्ठा की कहानी है, जो दशकों तक बिना थके, बिना रुके केवल राष्ट्र के लिए कार्य करती रही।
और शायद इसी कारण, जब प्रधानमंत्री ने उनके चरण स्पर्श किए, तो वह दृश्य केवल सम्मान का नहीं—एक युग के संघर्ष को प्रणाम करने का क्षण बन गया।



