शिशु रंजन
दिल्ली । भारत जैसे विशाल और महान लोकतांत्रिक देश में पहली बार ऐसा हुआ है जब किसी भी राज्य में वामपंथी यानी की कम्युनिस्ट या सोशलिस्ट सरकार नहीं है। देश की स्वतंत्रता के बाद जब १९५१-५२ में पहले आम चुनाव हुए थे तो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया १६ सांसदों के साथ और सोशलिस्ट पार्टी १२ सांसदों के साथ देश में क्रमशः दूसरी और तीसरी बड़ी पार्टी थी। कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा का विकास कुछ इस कदर हुआ कि १९५७ में, यानी की पाँच वर्ष बाद ही EMS Namboodiripad के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया ने केरल में सरकार बना ली। वामपंथी या समाजवादी का खोल ओढ़ कर वामपंथियों ने अगले कई दशक तक देश के विभिन्न राज्यों में मज़बूत सरकार चलायी। और आज क्या संयोग है कि जब देश को केंद्रीय और राज्य सरकारें मिलकर लगभग नक्सल मुक्त कर चुके हैं, जनता ने भी वोट की चोट से देश को वामपंथ मुक्त कर दिया है।
यह अच्छा हुआ है या बुरा, इस प्रश्न को फिलहाल किनारे रख देतें हैं। चुकी छात्र राजनीति में रहते हुए हमारे कई अच्छे मित्र वामपंथी विचारधारा के रहे हैं और भारतीय परंपरा के अनुसार हम लोग उनके व्यक्तिगत ख़ुशी और दुख में साथ रहते हैं, आज जब वामपंथी विचारधारा की श्रद्धांजलि सभा रखी जाएगी तो अवश्य मेरे तरफ़ से भी उस सभा में दो पुष्प अर्पित किया जाएगा। और उस सभा को संबोधित करते हुए कम्युनिस्ट पार्टी के तथाकथित स्वर्णिम युग की याद कराते हुए यह अवश्य बताया जाएगा कि वामपंथी विचारधारा का इस देश से विदा हो जाने के पीछे के कारण क्या रहे हैं।
लोकोक्ति है कि समय बड़ा बलवान होता है। श्रद्धांजलि सभा में पुष्प तर्पण करने के बाद अगर संबोधन करने का अवसर मिलता तो अवश्य यह कहता कि यह समय ही तो है जिसके कारण अपने जीवनकाल में इस देश में वामपंथ की श्रद्धांजलि सभा होते हुए देख रहे हैं। वरना इस सभा को संबोधित करने की इच्छा तो जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भी रही होगी जो पहली लोकसभा में मात्र ३ सीट के साथ भारतीय राजनीति में राष्ट्रवादी राजनीति की शुरुआत कर रहे थे, वही वामपंथी दल रूस व चीन परस्त राजनीति की फसल खड़ी करने में लगे हुए थे। इस सभा को संबोधित करने की इच्छा डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी की भी रही होगी जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना उसी वर्ष की थी जब १९२५ में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया की स्थापना हुई। एक तरफ़ संघ का अखंड भारत का स्वप्न और दूसरी तरफ़ कम्युनिस्टों का उन तत्वों से प्रेम जो भारत को धर्म के आधार पर विभाजित करने का स्वप्न देख रहे थे। इस प्रकार की सभा को संबोधित करने का स्वप्न भारत रत्न श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी ने भी देखा होगा या विद्यार्थी परिषद से राजनीति में प्रवेश किये स्वर्गीय श्री अरुण जेटली जी ने देखा होगा क्यूँकि एक तरफ़ भाजपा हिंदुत्व के नीचे समाज को एकत्रित कर रही थी तो कम्युनिस्ट पार्टियां जाति के नाम पर समाज में विष घोल रहे थे। खैर, ऐसे सारे महापुरुष लोगों की पुण्यात्माएं उस श्रद्धांजलि सभा में जरूर आयेंगे क्यूँकि भारतीय परंपरा में विचारधारा के परे व्यक्ति दुख की घड़ियों में एकजुट होकर श्रद्धासुमन अर्पित करता है।
ये समय ही तो है कि आज साथ में जन्म लेने वाला आरएसएस संगठन अपना स्वर्णिम शताब्दी वर्ष मना रहा है और वामपंथ श्रद्धांजलि सभा। वही वामपंथ जिसके अनुयायी संघ को जड़ से समाप्त करने के लिए सौगंध खाते थे, भाजपा को हरा दे इसके लिए कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस जैसी अपनी दुश्मन दलों के गोद में बैठने से परहेज नहीं की, संघ के अनुयायी व विद्यार्थी परिषद और भाजपा के कार्यकर्ताओं का सार्वजनिक मजाक उड़ाते हुए अपमानित करना पसंदीदा शगल हुआ करता था, आज उस वामपंथी विचारधारा की श्रद्धांजलि सभा लगाने के लिए भी पर्याप्त लोग नहीं जुटेंगे। आज उस विचारधारा के लोगों की आत्मा पर दुख का कितना बड़ा पहाड़ टूटा होगा जब वो अटक से कटक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश को भगवामय देख रहे होंगे। कामरेड सीताराम येचुरी जी की आत्मा तो इस बात से प्रसन्न होगी कि यह दिन देखने के पहले “राम नाम सत्य है” का उद्घोष करवाते हुए वो इस पृथ्वीलोक से विदा हो गए। इसीलिए, इस भयंकर पीड़ादायी वेदना में हमसब का कर्तव्य बनता है कि उनके साथ हम संवेदना प्रकट करें।
श्रद्धांजलि सभा में संबोधन समाप्ति के पहले अवश्य उन कारणों पर भी बात करता जिसके कारण यह दुर्दिन देखना पड़ा हो। चिरंजीवी रहने के लिए हमे बीमारी से बचना होता है। कम्युनिस्ट सामाजिक बीमारी को गले लगाते थे। वो बीमारियाँ कौन सी थी।
पहली, अपने विचारधारा में इस देश को ढालने की जिद। यह देश में वेद का भी स्थान है और बुद्ध का भी। इसलिए सिर्फ़ एक विचार से देश चलाने वालों में बीमारी लग जाएगी और यही कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों के साथ हुआ।
दूसरा, क्षद्म धर्मनिरपेक्षता जिसकी आड़ में मुसलमानों और ईसाइयों का तुष्टिकरण। भारत की आम जनता इस बीमारी के कारण कम्युनिस्टों से दूर होती गई।
तीसरा, समाज का जाति में विभक्तीकरण। वोट पॉलिटिक्स के चक्कर में हिंदू समाज को जातियों में बाँटकर उन्हें एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा करके कम्युनिस्ट और समाजवादी पार्टियाँ भारत के लोगो को जड़ो से काटने का कार्य कर रही थी जिसे आम जनमानस ने देर से ही सही पर पहचान लिया।
चौथा, जनमानस को अपने बिचार समझाने के बजाय सभी संस्थानों पर अपने आदमी बिठा कर सिस्टम पर कब्जा करने की प्रवृति। भारतीय संस्कृति में एकाधिकार पसंद नहीं किया जाता, इसका कई उदाहरण हमारे हजारों वर्ष पुराने इतिहास का हिस्सा है।
और पाँचवाँ, अहंकार तो जब रावण का नहीं रहा तो भला कामरेड लोग का कैसे रहता। ये तो बस समय का खेल है। अहंकार वश जब कम्युनिस्ट भगवान राम का अपमान करते थे, ये आस्तिक जनमानस पर नास्तिक विचारों को थोपने जैसा था जिसे समाज कब तक बर्दाश्त करता। कालांतर के वामपंथियों में विचारधारा का न पढ़ना किंतु विचारधारा को समझने का ढोंग करना आत्मघाती सिद्ध हुआ। मजदूर वर्ग की भलाई के नाम पर उद्योग धंधे बंद करवाने वाली विचारधारा अपने मजदूर हित के प्रति ईमानदार नहीं थी, वरना उद्योगपति उनके दुश्मन नहीं बल्कि, उनके साथी रहते। प्रतिस्पर्धा के प्रति उनके विचारधारा की घृणा प्रतिभाशाली लोगों को इनसे दूर करती रही। आरक्षण को सामाजिक प्रगति का पर्याय बनाने के बजाय इसे वोटबैंक राजनीति के टूल की तरह उपयोग करना इसका उदाहरण है। इन सब में वैचारिक भटकाव में इन्हें पता ही नहीं चला कि कुल्हाड़ी ये स्वयं के जड़ो पर चला रहे थे।
खैर, जो हुआ वो इतिहास है और इतिहास की विवेचना सत्ता करती है। रहा न कोई रोवन हारा कहावत चरितार्थ होने पर है। परंतु, इन सब के बीच हमे यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कम्युनिस्ट पार्टी के विचार के बीज जीवित है। हम सब के मध्य। अमरलता के बेल की भाँति। आप अपने इर्द गिर्द देखिए, आपको दिखेंगे। आँखे बंद कर लेने से समस्या का अंत नहीं होता है। वामपंथियों रेवड़ियों को देखिए क्या वो नए अवतार में हैं? तुष्टिकरण पर नजर रखिए। सत्ता के दुरुपयोग पर नजर रखिए। अहंकार पर नजर रखिए। अपने अंदर के वामपंथी पर नजर रखिए। १०० वर्ष बाद जब पुनः इतिहास का अवलोकन होगा, किसकी श्रद्धांजलि सभा होगी, ये देखने के लिए न हम रहेंगे न आप। पर हमारे विचार अवश्य रहेंगे।



