दिल्ली । दिलीप मंडल जिस तरह बंगाल की इस जीत को फिर जाति में बाँटने की प्रयास कर रहा है, वो सच में गलत है। कुछ दिन शांत रहा, फिर वही एससी, एसटी, ओबीसी वाला नैरेटिव शुरू कर दिया। हिंदुत्व की इतनी बड़ी जीत में भी जाति खोज लेना आखिर कैसी मानसिकता है?
हम स्वयं संघ के स्वयंसेवक हैं। ज़मीन पर जो बदलाव दिख रहा है, वो शायद ये लोग समझ ही नहीं पा रहे। आज हिंदू समाज का बड़ा वर्ग जाति को बस व्यक्तिगत पहचान तक सीमित कर रहा है। अब उसकी पहली पहचान धर्म बन रही है। यही सबसे बड़ा परिवर्तन है।
हिंदू समाज कभी किसी एक केंद्र पर नहीं टिका। उसकी ताकत हमेशा उसकी विकेंद्रीकृत व्यवस्था रही। जाति व्यवस्था का मूल उद्देश्य समाज को तोड़ना नहीं था, बल्कि कुल, वंश, परंपरा और सामाजिक दायित्वों को संभालना था। इसलिए हमारे यहाँ कुलधर्म, समाजधर्म और राष्ट्रधर्म की बात होती थी। व्यक्ति अकेला नहीं होता था, समाज का हिस्सा होता था।
लेकिन पिछले दो सौ साल में अंग्रेजों, कांग्रेस और वामपंथियों ने योजनाबद्ध तरीके से जाति को राजनीति का केंद्र बना दिया। क्योंकि उन्हें पता था कि हिंदू समाज को तोड़ना है तो उसकी सामाजिक संरचना पर हमला करना होगा। उसी का परिणाम है कि आज हर चीज़ जाति के चश्मे से देखी जाती है।
लेकिन अब परिस्थिति बदल रही है। हिंदू समाज फिर धर्म के आधार पर एकजुट हो रहा है। बंगाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लोकतंत्र में दस में से आठ हिंदुओं का एक दिशा में खड़ा होना साधारण घटना नहीं है। ये हिंदू चेतना का जागरण है।
ऐसे समय में अगर कोई ये कहे कि भाजपा इसलिए जीती क्योंकि फलाँ जाति ने वोट दिया, तो वो इस पूरी चेतना का अपमान है। बंगाल की जीत किसी जाति की जीत नहीं थी। वो सामूहिक हिंदू समाज की जीत थी।
सच कहें तो एससी, एसटी, ओबीसी और जनरल जैसी पहचानें पिछले कुछ दशकों में राजनीति ने हमारे ऊपर थोप दीं। हिंदू समाज की मूल सोच कभी ऐसी नहीं रही। ये वही विचार है जो समाज को स्थायी रूप से वर्गों में बाँटता है। दिलीप मंडल जैसे लोग उसी सोच को आगे बढ़ाते हैं, इसलिए उनका विरोध होना चाहिए। चाहे वो दिलीप मंडल हो, अजीत भारती हो या कोई और।
हिंदू समाज को अभी फिर से स्वधर्म, कुलधर्म, समाजधर्म और राष्ट्रधर्म को समझना बाकी है। जो समाज अपनी जड़ों से कट जाता है, उसकी रक्षा कोई केंद्रीकृत व्यवस्था लंबे समय तक नहीं कर सकती। सनातन धर्म इतने आक्रमण झेलकर भी इसलिए बचा रहा क्योंकि उसकी शक्ति किसी एक केंद्र में नहीं, पूरे समाज में बिखरी हुई थी। उसी व्यवस्था को तोड़ने के लिए जाति को अपराधबोध बना दिया गया।
आज हालत ये हो गई है कि हिंदू अपने ही समाज की संरचना को लेकर अपराधबोध में जी रहा है। जबकि आवश्यकता इससे बाहर आने की है। हिंदू समाज को आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से और मजबूत करना होगा। यही भविष्य का मार्ग है।
संघ का गीत भी यही कहता है
“युग के साथ मिल के सब, कदम बढ़ाना सीख लो,
एकता के स्वर में गीत गुनगुनाना सीख लो,
भूल कर भी सुख में जाति, पंथ की न बात हो,
भाषा प्रांत के लिए, कभी न रक्तपात हो,
फूट का भरा घड़ा है, फोड़ कर बढ़े चलो।।
भला हो जिसमें देश का, वो काम सब किए चलो।।
और इतिहास भी यही सिखाता है।
जोगेंद्र मंडल के साथ दलित पहचान के आधार पर पाकिस्तान गए हिंदुओं को आखिर में वहाँ से भागना पड़ा। जाति उन्हें बचा नहीं सकी। लेकिन जब वही लोग हिंदू बनकर खड़े हुए, तब पूरा राष्ट्र उनके साथ खड़ा हो गया।
यही हिंदू चेतना है।
यही उसकी असली ताकत है।
और यही बात दिलीप मंडल जैसे लोग कभी समझ नहीं पाएँगे।
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