चतुर्मास : व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण की अवधि

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भोपाल। भारतीय वाड्मय में चातुर्मास का विशेष महत्व है। यह आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से आरंभ होता है। जो इस वर्ष 25 जुलाई को पड़ रही है। इसका समापन कार्तिक माह शुक्ल पक्ष की एकादशी को होगा जो इस वर्ष 20 नवम्बर को होगी। मान्यता है कि इन चार माह में भगवान नारायण पाताल लोक में विश्राम करते हैं इसलिये कोई शुभ काम नहीं होते।

चातुर्मास में देवशयन का संदर्भ एक पुराण कथा से है जिसमें एक घटनाक्रम का वर्णन है। उसके अनुसार राजा बलि ने एक यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में भगवान नारायण स्वयं वामन रूप लेकर भिक्षा केलिये आये। उन्होंने तीन पग धरती माँगी। राजा बलि का अहंकार जागा, उसने हँसकर कहा जहाँ मन हो नाप लो। प्रभु ने दो पग में पूरी धरती नाप ली और पूछा तीसरा पग कहाँ रखूँ। तब राजा बलि को अपने अहंकार का आभास हुआ। बलि की पत्नि ने प्रभु को रक्षा का बंधन बाँधा और रक्षा का अनुनय किया। सब सामान्य हो गया। राजा बलि पाताल लोक चले गये और प्रभु ने उनकी रक्षा की। इस कथा में सबसे बड़ा संदेश नैतिकता और अहंकार से मुक्त अपने स्वभाव को विनम्र रखने का है। कथा के अनुसार इन चार माहों भगवान के शयन होता है।

 

इसलिये कोई शुभ कार्य नहीं होते लेकिन आश्चर्यजनक यह है कि सनातन परंपरा के गुरु पूर्णिमा, रक्षाबंधन, नागपंचमी, ऋषि पंचमी, गणेशोत्सव, जन्माष्टमी, संतान सप्तमी, करवा चौथ, हरियाली अमावस, पितृपक्ष, नवरात्र, दशहरा, दीवाली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज आदि सभी बड़े त्यौहार इसी अवधि में ही आते हैं। इन आयोजनों के विश्लेषण में मिल जाता है। इन चार माहों में आयोजित त्यौहारों की विशेषता यह है वे सब व्यक्ति, परिवार, समाज राष्ट्र और लोक कल्याण के हैं। जिन आयोजनों को रोका गया है उनमें विवाह, नामकरण, यज्ञोपवीत, नये घर का निर्माण आदि हैं। ये उत्सव केवल व्यक्ति या परिवार हित तक ही सीमित होते हैं। इनमें व्यक्तिगत संतोष और सुख तो मिलता है लेकिन परिवार, समाज और राष्ट्र का आंतरिक उत्थान नहीं होता। जबकि इन चार माहों में जिन आयोजनों के प्रावधान किये गये हैं उनका ध्येय बहुत व्यापक है। चातुर्मास की पूरी अवधि की दिनचर्या और उत्सव आयोजन व्यक्ति, परिवार, समाज एवं राष्ट्र के समृद्धिकरण के निमित्त हैं जो व्यक्ति को तन से, मन से, बुद्धि से और विवेक बल से समृद्ध होकर परिवार और समाज को सामूहिक बनाता है। चातुर्मास माह के त्यौहार व्यष्टि से समष्टि तक के एकाकार होने का माध्यम है। चतुर्मास की परंपरा में शरीर विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, मनोविज्ञान, प्राणी विज्ञान, वनस्पति विज्ञान ही नहीं अंतरिक्ष विज्ञान के निष्कर्ष भी समाहित दीखते है। जो बात आधुनिक विज्ञान ने आज कही है उसके निष्कर्ष का क्रियान्वयन भारतीय परंपराओ के प्रचलन अनादि काल से हो रहा है। आधुनिक विज्ञान ने अब जाना कि मनुष्य सहित चींटी से लेकर हाथी तक संसार के सभी प्राणीं एक दूसरे के पूरक हैं। और सृष्टि की नियामक शक्ति प्रकृति है। प्रकृति से समन्वय और संतुलन बनाकर ही धरती पर जीवन समृद्ध और दीर्घ जीवी होगा। इसे अनदेखा करके दुनियाँ ने विकास के नाम विनाश का मार्ग पकड़ लिया है। विज्ञान का दंभ भरने वाली दुनियाँ के सामने अब सत्य सामने आया है तो अब मार्ग बदलने की छटपटाहट है। लेकिन भारत ने यह सावधानी और प्रकृति से समन्वय के साथ जीवन के संचालन का प्रावधान सैकडों हजारों साल से कर रखा है। चतुर्मास में होने वाली उत्सव परंपरा में वे सभी सावधानियाँ हैं जिनमें व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र अपना विकास तो करे पर प्रकृति का संरक्षण भी साथ साथ चले। प्राणी को भोजन, पानी श्वांस और आरोग्य सब प्रकृति से मिलता है।

प्राणी और प्रकृति के बीच समन्वय

प्रकृति में जितने पदार्थ जिस अनुपात में हैं वे सब उसी अनुपात में मनुष्य देह के भीतर हैं। और यह सभी पदार्थ पाँच तत्वों से बने हैं। ये तत्व धरती, आकाश अग्नि जल और पवन हैं। यदि प्रकृति में इनके अनुपात में परिवर्तन होगा तो इसका प्रभाव प्राणी देह पर भी पड़ता है। इन चार महीने में इन पाँच तत्व के अनुपात में परिवर्तन आता है । यदि सावधानी से इस परिवर्तन के अनुरूप स्वयं को सक्षम न किया तो यह अवधि मनुष्य को रोग ग्रस्त बना देगी। चतुर्मास में भारतीय उत्सवों में न केवल इस अवधि के परिवर्तनों के अनुरूप स्वयं को सक्षम बनाना है अपितु इतना समृद्ध बनाना है कि फिर वर्ष भर तक कोई परिवर्तन व्यथित न कर सकेगा। इन चार माहों की त्यौहार परंपरा का नियमन करने पर मनुष्य में शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक रूप से सक्षमता तो आती ही है इसके अतिरिक्त उसका दृष्टिकोण सकारात्मक और सद्भाव से भरा होगा।

चतुर्मास की अवधि में उत्सव परंपरा को समझने के लिये तीन विषयों पर ध्यान देना होगा। एक मनुष्य की संरचना का रहस्य, दूसरा प्राणियों एवं वनस्पति का जीवन में उपयोगिता और तीसरा पुराणों में वर्णित कथाओं का संदेश । यदि कथाओं के रहस्य को समझेंगे तो पायेंगे कि उनमें प्रथम दोनों विन्दुओं के निष्कर्ष का समाधान है । इसके लिये हम मनुष्य को समझें । मनुष्य का व्यक्तित्व दो प्रकार का होता है । एक जो दिखाई देता है और दूसरा जो दिखाई नहीं देता। जैसे चेहरा हाथ पैर त्वचा, माँस हड्डियाँ हृदय, लीवर किडनी आदि सब देख सकते हैं पर मन, भाव विचार वृत्ति, विवेक, ज्ञान, मेधा, प्राण शक्ति आदि दिखाई नहीं देते। जैसे शरीर के रोग होते हैं वेसे ही मन, प्राण चित्त वृत्ति भाव आदि भी रोग ग्रस्त होते हैं। जिस प्रकार शरीर की व्याधियाँ और रोग मनुष्य के मन, वचन विवेक विचार वृत्ति सबको प्रभावित करतीं हैं उसी प्रकार मन, भाव विचारों की व्याधियाँ भी शरीर को प्रभावित करते हैं और इन सबका प्रभाव मनुष्य के जीवन ही नहीं वरन् पूरे वातावरण पर प्रभाव डालता है परिवार पर पड़ताहै समाज पर पड़ता है और देश भर भी पड़ता है ।

 

व्यक्ति के स्वास्थ्य का प्रभाव उसकी प्रगति, उसके कार्य और कार्य की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है । इसलिये भारतीय वाड्मय में शरीर के साथ मन बुद्धि ज्ञान विवेक के स्वास्थ्य और आत्म शुद्धि पर भी ध्यान दिया गया है । मनुष्य देह में मुख्यतया पाँच आयाम होते हैं। एक शरीर जो भोजन अर्थात अन्न से आकार पाता है इसे “अन्नमय कोष” जिसे शरीर कहते हैं । दूसरी चेतना जिससे शरीर सक्रिय रहता है इसे “प्राण मय कोष” कहते हैं। तीसरा मन जिसके संकेत पर प्राण शक्ति सक्रिय होकर शरीर को संचालित करती है इसे “मनोमय कोष” कहते हैं । चौथा ज्ञान जिससे उत्पन्न विवेक मन की इच्छाओं को संतुलित करता है इसे “ज्ञानमय कोष” कहते हैं। और अंत में आत्मा आत्मा जिसका संबंध परमात्मा (यूनीवर्स की इनर्जी) से होता है, इसे आत्ममय कोष कहते हैं । चतुर्मास के इन चार माहीनों में मनुष्य को चींटी से हाथी तक सभी प्राणियों, वनस्पति में नन्ही दूव से लेकर विशाल वट और पीपल वृक्ष तक और अंतरिक्ष के सभी गृहों के साथ समन्वय करके जीवन को समृद्घ बनाने का रहस्य छुपा हुआ है । ये चतुर्मास प्राणी के प्रकृति से एकाकार होने की महत्वपूर्ण अवधि है । यदि मनुष्य इस महत्वपूर्ण कालखंड में व्यक्तिगत उत्सव और कार्यों तक सीमित रहेगा तो कैसे स्वयं समुन्नत करेगा, इसलिए देव शयन की अवधारणा स्थापित कर मनुष्य को व्यक्तिगत प्रसन्नता के आयोजन से ऊपर उठकर, व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय उत्थान और साधना से जोड़ा गया है। यदि इन चार महीनों में पड़ने वाले तीज त्यौहार और परंपरा पर दृष्टि डालें तो गुरु पूर्णिमा व्यक्तित्व निर्माण, रक्षाबंधन परिवार समन्वय, भुजरियाँ कुटुम्ब समन्वय और सामाजिक समरसता, कावड़ यात्रा संपूर्ण राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का संकल्प, जन्माष्टमी विषमताओं के बीच जीवन की रक्षा, गणेशोत्सव नेतृत्व क्षमता का विकास, नवरात्र आत्मशक्ति को जाग्रत करना, विजयदशमीं शक्ति संपन्न होना, धनवन्तरि जयंति आरोग्य रहना, दीपावली आर्थिक समृद्धि, गोबर्धन पूजा पर्यावरण संरक्षण और भाई दूज परिवार समन्वय का अद्भुत संदेश है।

आधुनिक विज्ञान भी अनुसंधान के बाद भारत की इस परंपरा के प्रावधान से आश्चर्यचकित है कि यदि इन चार माह में निर्देशित चर्या के अनुकूल जीवन जिया जाय तो प्राणी पूरे वर्ष भर निरोग रहेगा, सशक्त रहेगा और आत्म विश्वास से भरा रहेगा । उसमें अद्भुत रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होगी, परिवार, समाज और राष्ट्र एक सूत्र में बंधा रहेगा ।

मेरी चिंता का स्वर भिन्न है …

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प्रवीण कुमार मकवाणा

अहमदाबाद। धर्मेंद्र प्रधान ने त्यागपत्र दे दिया। यह चिंता का विषय नहीं है। क्योंकि वह पद सदैव के लिए रिक्त नहीं हुआ है, उनके स्थान पर श्री प्रह्लाद जोशी आ गए हैं। मंत्रिमंडल में हेर-फेर होता, तब भी मंत्रालय बदलते ही हैं। फिर मोदी सरकार के कई मंत्रियों के तो मुझे नाम तक नहीं पता है।

दूसरा, चंद अराजक तत्त्वों के समक्ष सरकार ने घुटने टेक दिए। यह बात भी आहत नहीं करती। यह तो निश्चित है कि मुझ जैसे सामान्य नागरिक से कहीं अधिक जानकारी और इनपुट्स सरकार के पास रहे होंगे। सरकार ढेर सारे गुणा-भाग के बाद किसी निर्णय पर पहुँचती है। सरकार का एकमेव कार्य हमारे उत्साह को तुष्ट करना नहीं है।

हाँ, यह विरोधाभास अवश्य प्रतीत होता है कि यदि कुछ अराजक तत्त्व विरुद्ध खड़े थे, तो करोड़ों लोगों ने आपमें विश्वास प्रकट कर आपको स्टेट के नियमन का दायित्व सौंपा था। लेकिन, मेरी चिंता का विषय यह भी नहीं।

मेरी मूल चिंता विलग है। मैं सोचता हूँ कि जब कोई आंदोलन सफल होता है, तो उसमें प्रयुक्त चेहरों, विचारों और यहाँ तक कि नारों को भी एक प्रकार से वैलिडेशन मिलता है, परोक्षापरोक्ष रूप से।

एक धारणा, जो इस आंदोलन से जन्मी — शिक्षा महत्त्वपूर्ण है, हिंदू मुस्लिम फालतू मुद्दे हैं, बीजेपी अपनी राजनीति के लिए उपयोग करती है।

शिक्षा तो निर्विवाद रूप से महत्त्वपूर्ण है ही। लेकिन दूसरा विषय मात्र राजनीतिक नहीं, उसकी जड़ें साभ्यतिक विमर्श से जुड़ती हैं। कोई भी विमर्श जिसका संबंध सांस्कृतिक मूल्यों अथवा अस्तित्वगत चेतना से हो, वह व्यर्थ कैसे हो सकता है ?

बीजेपी हिंदुत्व के नाम पर वोट बटोरती है ? बिल्कुल। ठीक वैसे ही, जैसे कांग्रेस मुस्लिम वोट बटोरती रही है, सपा और तृणमूल कांग्रेस भी। यहाँ तक विषय राजनीतिक है।

लेकिन, प्रायः देखने में आएगा कि जो विपक्ष से जुड़े लोग हैं अथवा नई पौध है अथवा कुछ जातियाँ हैं, जो परंपरागत रूप से कांग्रेस आदि को वोट करती हैं, उनके नए लोगों के मन में धर्म के प्रति एक विद्रोह है, जिसकी जड़ें दार्शनिक अथवा विशुद्ध आध्यात्मिक चिंतना से न होकर, सतही तार्किक लगने वाले राजनीतिक वितान से जुड़ी हैं। यह स्थिति घातक है।

जब सांस्कृतिक चेतना के विषय में कोई राय राजनीतिक विमर्श के कारण बनती हो, वह अत्यंत सतही आधार पर खड़ी होती है।

ज़ेन-जी पीढ़ी रील देखती है। वह इस्लामिक थियोलॉजी नहीं पढ़ेगी; वह जगत भर में इस्लाम के प्रचार-प्रसार के आधारों का विवेचन नहीं करेगी; वह भारत विभाजन के देवबंदी अथवा दहलवी कोण तक नहीं जाएगी; कश्मीर, मोपला, बंगाल की कहानियाँ उसके लिए स्क्रॉल कर आगे बढ़ जाने योग्य बोरिंग सामग्री बनेगी।

हिंदू-मुस्लिम बीजेपी का मुद्दा है। लेकिन जब बीजेपी नहीं थी, तब भी हिंदू मुस्लिम एक मुद्दा था। यदि मुद्दा न होता, तो लाखों हिंदुओं के धर्मांतरण का कारण क्या रहा ? लाखों मंदिरों के देव-विग्रह तोड़ने के पीछे कौनसा अदृश्य कारण रहा ? खैर …

विश्वभर में रेडिकल इस्लामिक तत्त्वों को लेकर घनघोर अनादर और घृणा भाव पनप रहा है। वहाँ बीजेपी नहीं है।

आपने गालियाँ बकती कितनी मुस्लिम लड़कियाँ देखीं आंदोलन में ? लगभग नहीं के बराबर। वे सब हिंदू लड़कियाँ थीं। लेफ्ट हिन्दू लड़कियों को इस्लाम की थाली में परोसने के लिए तैयार करता रहा है। यह ऐतिहासिक और वैचारिक तथ्य है। विषय यहाँ तक सीमित नहीं है।

भारत विरोधी अथवा हिन्दू विरोधी जितनी भी बातें हैं, उन्हें लेकर रिपोर्ट्स हैं, सर्वे हैं, किताबें हैं, रिसर्च पेपर्स हैं; कुला जमा हिन्दू विरोध के लिए एक पूर्णतः अकादमिक खाका है। जिसके आधार पर किसी भी कथित पढ़े-लिखे को झांसे में लिया जा सकता है। प्रत्युतः कौन धर्मपाल जी को पढ़ेगा, किसके पास सीताराम गोयल को पढ़ने का समय है और फिर वीपी काणे जी कृत धर्मशास्त्र का इतिहास उठाने का दुस्साहस तो कौन ही करेगा ??

ऐसे आंदोलन गंभीर सांस्कृतिक चेतना की गति को कुंद करते हैं, वे सतही वस्तुओं और मुद्दों में आकर्षण उत्पन्न करते हैं। अराजक लोगों की सतही बातों में उजास नजर आने लगता है और ऋषि-वाक्यों में अनास्था दिखाई पड़ने लगती है।

खैर … प्रकृति में कुछ भी नित्य नहीं है।

मोदी जी हैं तो मुमकिन है…

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डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त

दिल्ली। राजनीति के मंच पर जब धर्मेंद्र जी का इस्तीफा हुआ तो विपक्ष ने सोचा कि किला फतह हो गया। लेकिन हमारे देश के मुख्य अभिभावक ने ऐसा दांव खेला कि सब देखते रह गए। बात सीधी है कि बच्चों की जिद के आगे जब घर का मुखिया हाथ जोड़कर मुस्कुरा दे तो इसे हार नहीं कहते। पिछले कुछ सालों से नीट को लेकर जो नासूर पनप रहा था उस पर आखिरकार मरहम लग ही गया। कुछ ज्ञानी कह रहे थे कि सरकार झुक गई लेकिन जो इंसान बारह साल से दिल्ली की गद्दी पर बैठा हो और तीन बार गुजरात का मुखिया रहा हो वह ऐसे ही नहीं झुकता। मोदी जी ने बस इतना किया कि जनता के गुस्से को समय रहते भांप लिया। उन्होंने देखा कि यह कोई पुराना झंडा उठाने वाला आंदोलन नहीं है बल्कि यह रील्स और मीम्स की दुनिया का नया तूफान है। जो युवा सब्सक्राइबर्स के लिए चलती ट्रेन के आगे कूद सकते हैं वे दिल्ली की सड़कों पर क्या कर गुजरते। इसलिए समय रहते अभिभावक की तरह बात सुनी और मानी।

असली तमाचा तो उस विपक्ष के मुंह पर पड़ा है जो खुद को धरनों का शहंशाह समझता था। राहुल गांधी पिछले बारह सालों से एक मजबूत आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए और जब कुछ महीनों पुरानी एक इंस्टाग्राम पार्टी ने बाजी मार ली तो वे क्रेडिट चुराने दौड़ पड़े। वेणुगोपाल और जयराम रमेश की टोली को समझ ही नहीं आया कि हवा किस तरफ बह रही है। दूसरी तरफ शीशमहल वाले अरविंद केजरीवाल और उनकी पूरी ब्रिगेड दिल्ली को अपनी जागीर समझती थी पर वे भी इस नए दौर में पूरी तरह चूक गए। अगर कोई इसे किसी की बी टीम भी कहे तो मानना पड़ेगा कि आपकी अपनी टीम अब एक्सपायर हो चुकी है। रोज सुबह सांड की फोटो पोस्ट करके या सस्ता व्यंग्य लिखकर जेन-जी के दिलों में जगह नहीं बनाई जा सकती। विपक्ष आज भी ट्विटर की बौद्धिक कुश्ती में उलझा हुआ है जबकि देश का युवा आगे निकल चुका है।

मोदी जी की खासियत यही है कि वे माहौल देखकर अपनी भाषा बदल लेते हैं। जब उन्होंने देखा कि जनमत अब मोबाइल स्क्रीन पर बन रहा है तो वे सीधे इंस्टाग्राम पर लाइव आ गए। चंद घंटों में दस लाख फॉलोअर्स जुड़ गए और दो दिन तक पूरी फीड पर उन्हीं का जलवा रहा। उन्होंने युवाओं की भाषा में संवाद किया और संदेश दिया कि देश का गार्जियन हर मोड़ पर उनके साथ है। विपक्ष को लगा था कि वे सरकार को घेर लेंगे लेकिन बाजी पलट गई। इसे मजबूरी कहने वाले कहते रहें पर सच तो यह है कि यह हारकर भी जीतने की वही कला है जो सिर्फ एक मंझा हुआ राजनेता ही दिखा सकता है। एक नया आंदोलन आया और पुराने दिग्गजों को जमींदोज करके चला गया पर हमारे अभिभावक अपनी जगह पर मुस्कुराते हुए अडिग खड़े रहे।

भोजशाला – ज्ञान की निरंतरता का प्रतीक

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  प्रशांत पोळ

भोपाल। ग्यारहवीं शताब्दी यह भारत के इतिहास का संधिकाल हैं। इस्लामी आक्रमण प्रारंभ हो चुके थे। पूरा गांधार (अफगानिस्तान), मुल्तान, पंजाब का कुछ हिस्सा इस्लामी शासन के अंतर्गत आ चुका था। यहां इस्लामी शासक राज कर रहे थे। किंतु फिर भी, 80% से ज्यादा भारत, हिंदू रीति-रिवाज, सनातन परंपराओं को निर्भीकता के साथ निभा रहा था। महमूद गजनवी ने मथुरा, कन्नौज और सोमनाथ पर आक्रमण किए थे। सोमनाथ को लूटा भी था। किंतु वह गुजरात पर राज न कर सका। वहां अभी भी सोलंकी राजवंश का ही राज था।

मालवा के राजा भोज इन्हीं दिनों, राज्य व्यवस्था के आदर्श निर्माण कर रहे थे। सन 1010 में उनका राज्याभिषेक हुआ और अगले 45 वर्ष उन्होंने राज किया। यह सारा समय मालवा के लिए स्वर्णिम काल था। राजा भोज स्वत: ज्ञान के प्रेमी थे। कला के साधक थे। अभियांत्रिकी के सिद्धहस्त थे। वह ऋषितुल्य राजा के रूप में लोगों में लोकप्रिय हो रहे थे। उन्होंने अनेक विद्वानों को एकत्र किया। कुछ पुस्तकें उनसे लिखवाई और कुछ स्वतः लिखी। उन 45 वर्षों में लगभग 84 ग्रंथोंकी रचना की, जो आज एक हजार वर्ष के बाद भी विस्मय में डाल देती हैं। इनमें से अधिकांश ग्रंथ ‘विश्वकोश’ के स्तर के हैं। उन ग्रंथों के ज्ञान का स्तर कालातीत हैं।

धारानगरी (धार) राजा भोज की राजधानी थी। किंतु परमार वंश की पहले की राजधानी अवंतिका (उज्जयिनी, उज्जैन), यह हजारों वर्षों से ज्ञान का केंद्र था। गणित, खगोल शास्त्र जैसे विषयों पर यहां निरंतर अध्ययन हो रहा था। चौथी शताब्दी में वराहमिहिर, छठवीं शताब्दी में ब्रह्मगुप्त, आठवीं शताब्दी में लल्ल जैसे विद्वानों की परंपरा बनी हुई थी। यह शोध का, शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र अवश्य था, किंतु बड़े स्तर का विद्यापीठ (विश्वविद्यालय) नहीं था। राजा भोज के कालखंड में ही उज्जैन में श्रीपति, खगोल शास्त्र पर अद्भुत कम कर रहे थे।

राजा भोज ने उज्जयिनी की इस परंपरा को तो अक्षुण्ण रखा। किंतु उन्हे साहित्य, संस्कृत, अभियांत्रिकी आदि विषयों पर एक ज्ञान केंद्र का निर्माण करना था। यह सारे विषय राजा भोज के प्रिय विषय थे। इसलिए, यह ज्ञान केंद्र, जो एक छोटा विश्वविद्यालय था, बनाया गया राजधानी धारानगरी (धार) में। सन 1034 में बनकर पूर्ण हुए इस ज्ञान केंद्र का नाम रखा गया – *भोजशाला..!*

भोजशाला यह ज्ञान का केंद्र था, विद्या का निवास था, प्रज्ञा का अधिष्ठान था। स्वाभाविक हैं, विद्या की देवी सरस्वती की सुंदर सी प्रतिमा राजा भोज ने इस भोजशाला में स्थापित की। यही वह ‘वाग्देवी की प्रतिमा’ है जो लंदन के संग्रहालय में कैद हैं।

गुरुकुल के तर्ज में संचालित इस भोजशाला में संस्कृत भाषा तथा व्याकरण का गहन अध्ययन, अध्यापन होता था। भोजशाला के दीवारों और फर्श पर उकेरे गए शिलालेखों में संस्कृत व्याकरण के नियम और चार्ट दिखाई देते हैं।

यहां खगोल विज्ञान (Astronomy), आयुध विज्ञान (Weapons Science), विमान शास्त्र (Aviation) और वास्तुकला (Architecture) जैसे उन्नत विषयों पर विस्तृत शोध और अध्यापन होता था। इन विषयों पर पढ़ने के लिए देश-विदेश के छात्र आते थे।

उन्ही दिनों राजा भोज विभिन्न विषयों पर ग्रंथों की रचना कर रहे थे। ‘समरांगण सूत्रधार’, ‘युक्ति कल्पतरु’, ‘सरस्वती कंठाभरणम’, ‘श्रृंगार प्रकाश’, ‘राजमार्तंड’, ‘तत्वप्रकाश’, ‘व्यवहार समुच्चय’, नाममालिका’, ‘चारुचर्या’, ‘राज्यमृगांक’, ‘आयुर्वेद सर्वस्व’ यह सारे ग्रंथ उन्ही दिनों लिखे गए।

*इतिहास के उस संधिकाल में, जब भारत अत्यंत वैभव और संपन्नता के कारण शिथिल हो रहा था, तब राजा भोज ने समाज को ज्ञान मार्ग और ज्ञान परंपरा की ओर मोड़ने की पहल की। उसकी प्रतीक बनी ‘भोजशाला’।* आगे जाकर यूरोप में जो रेनेसॉं (Renaissance – पुनर्जागरण) हुआ, उसके तीन सौ – चार सौ वर्ष पहले, भारत में रेनेसॉं का प्रारंभ किया राजा भोज ने। भोजशाला के रूप में। (दुर्भाग्य से आगे जाकर इस्लामी आक्रमण बढ़ते गए। भारतीय शासक हारते गए और ये भारतीय रेनेसॉं वहीं समाप्त हुआ)

राजा भोज ने भोजशाला को सांस्कृतिक केंद्र के रूप में भी प्रस्थापित किया। उनके कार्यकाल में और उसके बाद के परमार शासको के काल में, यह विद्वानों और कवियों का प्रमुख मंच था। यहां नियमित रूप से साहित्य गोष्ठियां होती थी।

भोजशाला में नाटकों का मंचन होता था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को यहां ऐसे शिलालेख मिले हैं, जिनमें राजा भोज के उत्तराधिकारी दरबारी कवि द्वारा रचित दो अंक (एक्ट) के नाटक का वर्णन हैं।

राजा भोज ने लिखे हुए ग्रंथों का अध्यापन भोजशाला में होता था। समरांगण सूत्रधार में राजा भोज ने नगर नियोजन और वास्तु शास्त्र के बारे में विस्तार से लिखा हैं। भोजशाला के निर्माण के लगभग 116 वर्षों के पश्चात, अर्थात वर्ष 1150 में, धारानगरी (धार) से 3180 किलोमीटर दूर, कंबुज देश (कंबोडिया) में एक अत्यंत विशाल प्रार्थना स्थल का निर्माण हुआ। यही प्रसिद्ध ‘अंगकोर वाट’ हैं, जो सारे विश्व में सबसे बड़ा प्रार्थना स्थल हैं, और जो हिंदू मंदिरों का समूह हैं।

मजेदार बात यह, की अंगकोर वाट के निर्माण में जो सिद्धांत, आदर्श और संदर्भ लिए गए हैं, वह सारे समरांगण सूत्रधार में उपलब्ध हैं।

समरांगण सूत्रधार में वास्तुपुरुष मंडल का विस्तृत आलेख 11 से 14 अध्याय में दिया हैं। 14वें अध्याय का शीर्षक हैं – ‘पुरुषांङदेवता निघंट्वादी निर्णयः’। अंगकोर वाट का पूरा ढांचा, वास्तुपुरुष मंडल की ग्रिड प्रणाली पर आधारित हैं। इसमें ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रवाह को ध्यान में रखकर, केंद्र और दिशाएं तय की गई हैं।

समरांगण सूत्रधार में विभिन्न प्रकार के मंडलों का उल्लेख हैं। मंदिरों और राजमहलों के लिए 64 पदों के ‘मंडूक मंडल’ को महत्वपूर्ण माना जाता हैं। अंगकोर वाट के संपूर्ण मास्टर प्लान और उसके गर्भ गृह में ‘मंडूक मंडल’ का सटीक प्रभाव दिखाई देता हैं। अंगकोर वाट का सबसे अहम हिस्सा, जहां केंद्रीय शिखर स्थित हैं, वह 64 पद के मंडूक मंडल के केंद्र (ब्रह्मस्थान) को दर्शाता हैं। यह मेरु पर्वत की रचना हैं।

सूर्यवर्मन (द्वितीय) ने बनाए हुए इस विशाल मंदिर समूह में संस्कृत भाषा, भारतीय पंचांग, रामायण – महाभारत, मंदिर स्थापत्य, राजधर्म की अवधारणा… इन सभी की झलक स्पष्ट से दिखती हैं।

अब मात्र सौ – सवा सौ वर्षो में, समरांगण सूत्रधार में वर्णित रचना के आधार पर अंगकोर वाट का निर्माण हुआ होगा यह मानना कठिन हैं। समरांगण सूत्रधार में नया कुछ नहीं लिखा हैं। स्थापत्य शास्त्र के प्राचीन ग्रंथ मयमतम् (मयमतमुलाकला शास्त्र), मानसर शिल्पशास्त्र आदि ग्रंथों के आधार पर समरांगण सूत्र लिखा गया हैं। अंगकोर वाट भी इन्हीं प्राचीन स्थापत्य शास्त्रों के ग्रंथोंके आधार पर निर्मित हुआ हैं। अर्थात, हजारों किलोमीटर दूरस्थ रहकर भी, भारतीय ज्ञान परंपरा दोनों स्थानों पर प्रवाहित थी।

इसी परंपरा को जीवित रखा भारतीय विद्यापीठों ने, विश्वविद्यालयों ने। तक्षशिला, नालंदा, उड्डयंतपुर (ओदंतपुर), विक्रमशिला, सुलोटगी, कांची आदि विश्वविद्यालयों ने यह परंपरा जारी रखी। भोजशाला भी इसी परंपरा की संवाहक थी। यह विज्ञान, कला और अध्यात्म का जीवंत केंद्र था, जहां हजारों छात्र अपनी बौद्धिक जिज्ञासा शांत करने आते थे।

ग्यारहवीं शताब्दी में महमूद गजनवी के साथ अरब का प्रवासी इतिहासकार अल्-बरूनी भारत आया था। अपनी ऐतिहासिक पुस्तक ‘तारीख-उल्-हिंद’ में राजा भोज, उसकी राजधानी धारानगरी और यहां के ज्ञान केंद्र के बारे में अल्-बरूनी ने लिख रखा हैं – ‘धारानगरी यह विद्वानों की नगरी हैं। यहां के ज्ञानकेंद्र में स्थापित वेधशाला अत्यंत सूक्ष्मता और सुस्पष्टता के साथ कार्य करती हैं।’ _(अल्-बरुनी के धारानगरी प्रवास के समय भोजशाला का निर्माण चल रहा था।)_ फरिश्ता और निजामुद्दीन अहमद जैसे तत्कालीन विदेशी इतिहासकारों ने भी धार और भोजशाला की प्रशंसा की हैं।

किंतु दुर्भाग्य से इस्लाम के आक्रमणों के कारण भारत के ज्ञान मंदिर, विद्यापीठ (विश्वविद्यालय) धीरे-धीरे समाप्त होते गए। वर्ष 1193 में बख्तियार खिलजी ने विश्व के तत्कालीन सबसे बड़े विश्वविद्यालय, नालंदा को बेरहमी से नष्ट किया। वहां का सारा ग्रंथ भंडार महीनों तक जलता रहा। विक्रमशिला के विश्वविद्यालय में पढ़ रहे 10,000 विद्यार्थियों को नृशंसता के साथ काट डाला। उनकी हत्या की।

ऐसा लगभग सभी विश्वविद्यालयों के साथ हुआ..!

भारत में उच्च शिक्षा, उन्नत ज्ञान की परंपरा लगभग खंडित सी हो गई। 1193 में नालंदा के विध्वंस के बाद अगले कुछ ही वर्षों में, लगभग सभी बड़े विश्वविद्यालय बंद होते गए। गुजरात का ‘वल्लभी’ तो आठवीं शताब्दी में ही इस्लामी आक्रांताओं के कारण जर्जर हो गया था। इन बाकी विद्यापीठों के साथ उसने भी अपनी अंतिम सांस ली।

किंतु अज्ञान के इस अंधकार में एक दिया टिमटिमा रहा था – भोजशाला का !

परमार राजाओं के शौर्य के कारण चौदहवी शताब्दी के प्रारंभ तक मालवा, इस्लामी आक्रांताओं से मुक्त था। अन्ततः वर्ष 1305 में, 271 वर्षों बाद, अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण करके भोजशाला को ध्वस्त किया। भारतीय ज्ञान परंपरा की अंतिम लौ भी बुझ गई। प्रवाहित होती हुई भारत की वैभवशाली ज्ञान परंपरा रुक गई। ठिठक गई।

अर्थ स्पष्ट हैं। भारत की ज्ञान परंपरा जहां पर रुकी थी, उसे वहीं से, उसी वैभव के साथ प्रवाहित करने की आवश्यकता हैं। जिस ज्ञान के आधार पर भारत विश्व में सबसे वैभवशाली, सबसे समृद्ध राष्ट्र बना था, उस ज्ञान परंपरा के पुनः संवाहक बनने की हमसे अपेक्षा हैं। भोजशाला को उसके प्राचीन भव्य स्वरूप में पुनः प्रस्थापित करने की आवश्यकता हैं।

यदि ऐसा होता हैं, तो ज्ञान परंपरा का यह प्रवाह पुनः अविरल प्रवाहित होने लगेगा..!

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