अमेरिका की दादागिरी के माएने

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दिल्ली । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प नोबेल शांति पुरस्कार पाने के लालायित थे और बार- बार अपनी यह इच्छा सार्वजनिक कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने विश्व के तमाम संघर्षों के विराम का श्रेय लेने का प्रयास किया, रूस -यूक्रेन युद्ध समाप्त करवाने का प्रयास करते दिखे किन्तु नोबेल नहीं मिला।अब ट्रम्प इसकी खीझ विश्व के तमाम देशों पर उतार रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति का विभिन्न देशों के शासनाध्यक्षों के प्रति व्यवहार और दिए गए वक्तव्य अत्यंत हैरान करने वाले हैं। अमेरिका की दादागिरी वाली हरकतों से पूरे विश्व में उथल -पुथल होनी स्वाभाविक है। वेनेजुएला पर हमला कर वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरै और उनकी पत्नी का अपहरण कर, अमेरिका लाकर वहां की अदालत में पेश करना नैतिक मापदंडों के पूर्णतया विरुद्ध है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एशिया, यूरोप और लैटिन अमेरिकी देशों को धमका रहे हैं। उन्होंने कहा है कि अगर कोलंबिया, मैक्सिको, क्यूबा तथा ईरान ने रवैया न सुधारा तो कार्रवाई करेंगे, ग्रीनलैंड अमेरिका को अपने लिए चाहिए। यह भी समाचार आ रहे हैं कि वेनेजुएला के समुद्र से जो रूसी जहाज तेल लेकर आ रहे हैं उन पर अमेरिकी सेनाएं कब्जा कर रही हैं जिसके कारण क्षेत्र में व्याप्त तनाव गहरा गया है। सैन्यशक्ति के मद में चूर ट्रम्प शासनाध्यक्षों का मजाक उड़ा रहे हैं। ट्रम्प ने अपने फ्रांसीसी समकक्ष इमैनुअल मैक्रो का मजाक उड़ाते हुए कहा कि वह (मैक्रॉन) अधिक टैरिफ लगाने की बात पर गिड़गिड़ाने लगे थे। भारत -अमेरिका रक्षा सहयोग के विषय में बड़ा झूठ बोलते हुए कहा कि भारत द्वारा 68 अपाचे हेलीकाप्टर की खरीद में पांच साल की देरी हुई। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुझे फोन पर कहा सर क्या मैं आपसे मिल सकता हूं ? स्पष्ट है कि अमेरिका एक राष्ट्र की तरह नहीं वरन अपने आपको विश्व का मालिक और सबसे बड़ा व्यापारी तथा दूसरे देशों को अपना पिछलग्गू समझ रहा है।

इस घटनाक्रम में एक बड़ी बात यह दिख रही है कि अमेरिका के धुर विरोधी व विस्तारवादी प्रवृत्ति वाले चीन और रूस जैसे देश केवल अमेरिका की निंदा करने तक ही सीमित हो गए हैं या फिर यह भी कहा जा सकता है कि अमेरिकी विरोधी गुट के नेता अभी बहुत सावधानी व सतर्कता बरत रहे हैं ताकि तृतीय विश्वयुद्ध न छिड़ जाए। आज अमेरिका जिस मानसिकता से वैश्विक जगत को धमका रहा है उसी मानसिकता से उसने हिरोशिमा और नागासकी पर परमाणु बम गिरा दिए थे। आज वह विश्व को टैरिफ वार के सहारे अपने चरणों में गिराना चाहता है।

अमेरिका की हरकतों से विश्व अचंभित है। उसने रूस के साथ मित्रता रखने वाले ब्रिक्स देशों पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी है जिसके कारण भारत सहित विश्व के कई देशों का शेयर बाजार टूट रहा है । ट्रम्प ने सैक्शनिंग रशिया एक्ट ऑफ- 2025 के मंजूरी दी है जो रूस से पेट्रोलियम उत्पादों का आयात करने वाले देशों पर भारी -भरकम टैरिफ लगाने की अनुमति देता है। यह टैरिफ उन देशों पर लगाए जाएंगे जो रूस से यूरेनियम और पेट्रोलियम उत्पादों के आदान -प्रदान में जानबूझकर शामिल होते हैं। यह बिल भारत और चीन जैसे देशों से आयातित सामानों पर कम से कम 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने की अनुमति देता है।

अमेरिका यह बिल रूसी सरकार व उनके मित्र राष्ट्रों को दंडित करने के उद्देश्य से लाया है क्योंकि रूस ने यूक्रेन के साथ शांति समझौता करने से इंकार कर दिया है। अमेरिका भारत के खिलाफ टैरिफ लगाने की जो धमकी दे रहा है उसके पीछे का प्रमुख कारण भारत का तीव्रता के साथ आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर होना है। अमेरिका ने जब भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया तब भी भारत की अर्थव्यवस्था व ग्रोथ पर कोई बहुत बड़ा असर नहीं हो पाया। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने पांच सौ प्रतिशत टैरिफ वाला बिल ट्रम्प के साथ मिलकर तैयार किया है। ग्राहम का कहना है कि यह बिल उन देशो को दंडित करेगा जो सस्ता रूसी तेल खरीदकर पुतिन को ईंधन दे रहे हैं। इसमें विशेष रूप से चीन, ब्राजील और भारत को निशना बनाया गया है यह सभी देश रूसी तेल के बड़े आयातक हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि रूस -यूक्रेन युद्ध तो एक बहाना भर है दरअसल अमेरिका को भारत की आर्थिक उन्नति पसंद नहीं आ रही है। आज पूरा विश्व भारत की मजबूत होती अर्थव्यवस्था को देखकर हैरान है। विश्वभर के निवेशक भारत में निवेश करना चाहते हैं । ऐसा प्रतीत हो रहा है कि ट्रम्प की यह नीति भारत की इस सफलता को कुंद करने की कोशिश है। जारी अनुमानों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025- 26 में भारत की जीडीपी ग्रोथ 7.4 प्रतिशत रहने की संभावना है, यह विगत वर्ष की 6.5 प्रतिशत ग्रोथ से अधिक है। प्रमुख आर्थिक समाचार पत्रों के अनुसार भारत यह उपलब्धि वैश्विक चुनैतियों जैसे अमेरिकी टैरिफ और मुदा्रस्फीति के बावजूद प्राप्त कर रहा है। यह ग्रोथ भारत को एशिया में ही नहीं वैश्विक जगत में भी मजबूती प्रदान कर रही है।
ट्रम्प की नीतियों को सरसरी तौर पर देखा जाए तो यह रूस -यूक्रेन युद्ध से जुड़ी लग सकती हैं किन्तु गंभीरता से देखने पर पता चलता है कि यह भारत की आर्थिक स्वतंत्रता पर हमला है। ट्रम्प ने चुनाव अभियान में भारत को टैरिफ किंग कहा था और दावा किया था भारत अमेरिका से अधिक टैरिफ वसूलता है।अब रूस से तेल खरीद को बहाना बनाकर ट्रम्प भारत पर दबाव बना रहे हैं लेकिन यदि भारत ने रूस से तेल खरीद कम कर ली है तो फिर धमकी क्यों दी जा रही है ? ट्रम्प की नीति भारत को कमजोर करने की लग रही है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था में मुद्रस्फीति और बेरोजगारी है,अमेरिका में महंगाई चरम सीमा पर है। कुछ दिन पूर्व ही वहां सबसे बड़ा शटडाउन हो चुका है। अमेरिका में नया निवेश आ नहीं रहा है जबकि भारत में निवेश बढ़ रहा है।
एफडीआई में वृद्धि और अब उसमें विदेशी निवेश शत प्रतिशत कर दिया गया है। भारत का स्टॉक मार्केट नई ऊँचाई की ओर जा रहा।
यहां पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि अमेरिका जिन देशों को धमका रहा है उन सभी देशों का विकास व जन्म अमेरिका के ही कारण हुआ है। अमेरिका जिन देशों को धमका रहा है वह परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र नहीं है। वेनेजुएला जैसे देशो की सत्ताएं भ्रष्टाचार व आर्थिक अव्यवस्था का अड्डा बन चुकी हैं । अमेरिकी राष्ट्रपति जिन देशों को धमका रहे हैं उन सभी देशों के शासनाध्यक्षों ड्रग्स तस्करी का आरोप लगा रहे हैं। अगर भारत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र न होता और उसके पास अपनी ब्रहमोस, पिनाका और प्रलय तथा अग्नि जैसी मारक मिसाइलें न होती तब आज विश्व में भारत की क्या स्थिति होती?

आज भारत आर्थिक और सामरिक रूप से सशक्त और समृद्ध है साथ ही उसके पास नरेंद्र मोदी जैसा वैश्विक पकड़ वाला नेतृत्व है। आज का भारत अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की धमकियों से डरने और झुकने वाला नहीं है। अगर भारत ने आँखें फेर लीं तो अमेरिका को भी भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है । अमेरिका दादागिरी दिखा रहा है जबकि भारत, “वसुधैव कुटुम्बकम” की राह अपनाकर चल रहा है । अमेरिकी दादागिरी कुछ समय के लिए तो विश्व को उसके पक्ष में ला सकती है किंतु विश्व के समक्ष अंतिम विकल्प भारत का “वसुधैव कुटुम्बकम” का भाव ही होगा ।

पहले काला पानी की सजा फिर जेल से लौटकर डाक्टर बनीं

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कोलकाता । स्वाधीनता आंदोलन में डाक्टर की डिग्री लेकर राष्ट्र और समाज के लिये अपना जीवन समर्पित कर देने के उदाहरण तो अनेक हैं पर क्रांतिकारी आंदोलन में एक नाम ऐसा भी है जिन्हे पहले काला पानी का कारावास मिला फिर वे देश की प्रख्यात डाक्टर बनीं ।

यह नाम है डाक्टर सुनीति चौधरी का। उनका जन्म 22 मई 1917 को हुआ। वे अभी स्कूल की विद्यार्थी थीं कि उन्होंने मात्र 14 वर्ष की आयु में अपनी साथी शाँति घोष के साथ मिलकर 24 दिसम्बर 1931 को मजिस्ट्रेट बी जी स्टीवेंसन उनके कार्यालय में घुसकर गोली मारी। दोनों बालिकाओं ने मिलने की अनुमति मांगी और कमरे में पंहुचते ही गोली चला दी । निशाना अचूक था, स्टीवेंसन वहीं मर गया। दोनों वीर बालाएं गिरफ्तार कर ली गयीं । 27 फरवरी 1932 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा घोषित करके कालापानी भेज दिया गया। इधर पुलिस ने परिवार पर अत्याचार किये जिसमें एक भाई की मौत हुई । परिवार बिखर गया । अंततः 6 दिसंबर,1939 को द्वितीय विश्व-युद्ध के पहले आम माफी की वार्ता के अंतर्गत वे रिहा हुईं ।

तब सुनीति 22 वर्ष की हो गई थीं । जेल से रिहा होकर उन्होंने पहले अपनी आजीविका के कयी काम आरंभ किये और जोरशोर से पढ़ाई आरंभ की । बंगाल के आशुतोष कॉलेज से प्री-यूनिवर्सिटी कोर्स प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और 1944 में मेडिसिन एंड सर्जरी में डिग्री के लिए कैम्पबेल मेडिकल स्कूल में प्रवेश लिया। डाक्टरी परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद क्रांतिकारी प्रद्योत कुमार घोष से विवाह कर लिया । विवाह के बाद चंदननगर बस गयीं और शीघ्र ही ख्याति प्रतिष्ठित डॉक्टर के रूप में हो गई । स्वतंत्रता के बाद डॉ. सुनीति घोष को कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनों राजनैतिक दलों की ओर से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव आया पर उनकी रुचि राजनीति में नहीं थी वे पूरी तरह समाज की सेवा को समय देना चाहतीं थीं । और 12 जनवरी, 1988 को 71 वर्ष की आयु इस क्रांतिकारी महिला ने संसार से विदा ले ली ।

संस्कृति और आत्मगौरव के लिए नोएडा में दो भव्य कार्यक्रमों का आयोजन

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दिल्ली । आज दिनांक 11 जनवरी 2026 दिन रविवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष में नॉएडा में दो भव्य हिंदू सम्मेलनो का आयोजन किया गया। 15 फरवरी तक नॉएडा में 140 हिन्दू सम्मलेनों का आयोजन होगा।

सेक्टर 12 में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य वक्ता राष्ट्र स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचार प्रमुख पदम् सिंह के संघ के सौ वर्षो की यात्रा और समाज में पंच परिवर्तन के महत्व के बारे में बताया। कार्यक्रम के अध्यक्ष गोपी शाह जी महाराज जी ने हिंदुत्व की विशेषता एवं वर्तमान चुनौती तथा समाधान पर उद्बोधन दिया। सामाजिक संस्था नेह नीड के बच्चों द्वारा शिव तांडव , भगवान श्री राम की जीवनी तथा पर्यावरण पर नाटक प्रस्तुत किये एवं रामचरित मानस सुंदरकांड समिति द्वारा भजन कीर्तन का आयोजन किया गया। सम्मलेन समिति की अध्यक्षा श्रीमती ऋतू चौहान ने हिन्दू समाज के एकता बल दिया। कार्यक्रम का संचालन बृजेश चौहान ने किया और विश्व हिन्दू परिषद् के जिला महामंत्री दिनेश महावर ने कार्यक्रम में सहयोग के लिए प्रशाषन को धन्यवाद् दिया।


सेक्टर 56 के सामुदायिक केन्द्र में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य वक्ता अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े श्रीमान गुणवंत सिंह कोटारी रहे जिहोने समाज को मार्ग दर्शन देते हुए पिछले सौ वर्ष के संघर्ष के बारे में बताया।कार्य्रकम की अध्यक्ष आचार्य मिथिलेश मिश्रा जी (भागवत मर्मज्ञ) रहे एवं मुख्य अतिथि श्रीमान विजय कुमार (प्रसिद्ध उद्योगपति) एवं विशिष्ट अतिथि श्रीमान ज्ञानेन्द्र अवाना (सेवा निवृत्त पुलिस उपयुक्त) थे।

कार्यक्रम के अंतर्गत 108 कुण्डीय यज्ञ, वैदिक मंत्रोच्चार एवं धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियाँ का भी आयोजन हुआ, जिससे क्षेत्र में आध्यात्मिक एवं सामाजिक चेतना का संचार हुआ।

जमानत मिली है, कोई युद्ध नहीं जीता गया

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अक्षय शर्मा

दिल्ली दंगों के आरोपियों के स्वागत ने फिर उन जख्मों को हरा कर दिया जो आज भी नहीं भरे

2020 का दिल्ली दंगा, एक ऐसी घटना जिसका जिक्र होते ही लोग आज भी सहम उठते हैं। यह महज एक आपराधिक घटना नहीं थी, बल्कि वह त्रासदी थी, जिसने देश की राजधानी में सामाजिक ताने-बाने को गहरे स्तर पर झकझोर दिया। फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में भड़की हिंसा में 53 निर्दोष लोगों की जान चली गई, सैकड़ों घायल हुए और असंख्य परिवार ऐसे नुकसान से गुजरे, जिसकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी है।

हाल ही में उसी हिंसा से जुड़े मामलों में जिन आरोपियों को अदालत से जमानत मिली है, उनके जेल से बाहर आते ही जिस तरह फूल-मालाओं से स्वागत किया गया, उसने उन तमाम सवालों को फिर सामने लाकर खड़ा किया है, जिन्हें समय ने अभी शांत नहीं किया है।

सबसे पहले यह तथ्य स्पष्ट होना चाहिए कि इन आरोपियों को बरी नहीं किया गया है। अदालत ने स्वयं जमानत देते समय यह टिप्पणी की है कि जमानत का अर्थ यह नहीं है कि आरोपों की गंभीरता कम हो गई है। न्यायिक प्रक्रिया जारी है, आरोप कायम हैं और अंतिम निर्णय आना अभी बाकी है। अदालत ने जमानत देते समय स्पष्ट किया कि आरोपी किसी भी प्रकार की सार्वजनिक सभा, प्रदर्शन या राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं लेंगे।
उन्हें सोशल मीडिया या किसी अन्य माध्यम से मामले से जुड़े तथ्यों पर टिप्पणी करने की अनुमति नहीं होगी।
अदालत के अनुसार आरोपी ट्रायल में पूरा सहयोग करेंगे और बिना अनुमति दिल्ली से बाहर नहीं जाएंगे।
किसी भी शर्त के उल्लंघन की स्थिति में जमानत रद्द की जा सकती है। इसके बावजूद सार्वजनिक स्तर पर ऐसा संदेश गया, जैसे कि किसी लंबे संघर्ष का अंत हो गया हो या किसी बड़ी जीत का उत्सव मनाया जा रहा हो।

जिन पांच आरोपियों को जमानत मिली है, उनमें गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद शामिल हैं। अदालत ने प्रत्येक मामले को तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर परखा, लेकिन कहीं भी यह संकेत नहीं दिया गया कि आरोप समाप्त हो चुके हैं। इसके बावजूद स्वागत के दृश्य यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या न्यायिक राहत और सार्वजनिक महिमामंडन के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है।

फरवरी 2020 की हिंसा उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद, मौजपुर, करावल नगर, भजनपुरा, चांद बाग, खजूरी खास, गोकुलपुरी और सीलमपुर जैसे इलाकों में फैली थी। इन इलाकों में न केवल संपत्तियों को नुकसान पहुंचा, बल्कि आम नागरिकों का जीवन असुरक्षित हो गया। 53 मौतें केवल आंकड़े नहीं हैं, वे 53 परिवारों की टूटी हुई दुनिया हैं, जिनके लिए समय वहीं थम गया।

दंगे में अपनी जान गवाने वालों में इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी अंकित शर्मा भी शामिल थे। उनकी हत्या ने यह स्पष्ट कर दिया था कि यह हिंसा किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने राज्य और समाज दोनों को चुनौती दी। ऐसे में जब इसी हिंसा से जुड़े मामलों में आरोपियों का स्वागत होता है, तो यह स्वाभाविक है कि पीड़ित परिवारों के मन में पीड़ा और असहजता पैदा हो।

जमानत भारतीय न्याय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे दोष या निर्दोष के अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाता। यह केवल यह सुनिश्चित करने का माध्यम है कि ट्रायल के दौरान आरोपी न्यायिक प्रक्रिया में उपस्थित रहें। लेकिन जमानत को विजय के प्रतीक के रूप में पेश करना उस संतुलन को बिगाड़ देता है, जिस पर न्यायिक प्रणाली टिकी होती है।

दिल्ली दंगों के बाद के वर्षों में यह भी देखा गया कि कुछ आरोपी लगातार सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने रहे। कानूनी सहायता, सामाजिक अभियानों और वैचारिक समर्थन के माध्यम से उन्हें व्यापक मंच मिला। इस पूरे विमर्श में दंगों में मारे गए निर्दोष लोगों और उनके परिवारों की आवाज अपेक्षाकृत कमजोर पड़ती दिखाई दी। जिन लोगों ने अपने बेटे, पति या पिता को खोया, उनके लिए न्याय एक लंबी और थकाऊ प्रतीक्षा बन गया।

आज जब वे परिवार टीवी स्क्रीन और सोशल मीडिया पर यह देखते हैं कि दंगों से जुड़े मामलों में आरोपी व्यक्ति फूल-मालाओं के बीच खड़े हैं, तो यह केवल एक खबर नहीं होती, बल्कि उनके लिए उस दर्द की पुनरावृत्ति होती है, जिससे वे कभी बाहर नहीं आ पाए। उनके लिए यह दृश्य यह सवाल खड़ा करता है कि क्या न्याय की प्रक्रिया के बीच मानवीय संवेदनशीलता कहीं पीछे छूट रही है।

अदालत का संदेश संयमित और स्पष्ट है। आरोप गंभीर हैं, ट्रायल जारी रहेगा और अंतिम फैसला साक्ष्यों के आधार पर होगा। इसके विपरीत, सार्वजनिक स्तर पर जिस तरह की प्रतिक्रिया दिखाई देती है, वह भ्रम पैदा करती है और न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता को कमजोर करती है। यही वह बिंदु है जहां समाज को ठहरकर सोचने की जरूरत है।

दिल्ली दंगों की पीड़ा अभी समाप्त नहीं हुई है। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया, उनके लिए न्याय केवल एक कानूनी शब्द नहीं, बल्कि सम्मान और संतोष का प्रश्न है। जब तक अदालतें अंतिम निर्णय तक नहीं पहुंचतीं, तब तक ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार का उत्सव उन जख्मों को और गहरा ही करता है।

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