फिल्मों से प्रभावित राजनीति के प्लॉट में सस्पेंस बरकरार है!!

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दिल्ली । अमित शाह की कथित “मास्टरस्ट्रोक” राजनीति ने बिहार में झंडा गाड़ दिया, अब सवाल यह है कि क्या वही हिंदुत्व की आंधी तमिलनाडु के द्रविड़ दुर्ग की मोटी दीवारों में दरार डाल पाएगी? या यह किला, हर बार की तरह, बाहरी हमलों को ठंडे आत्मविश्वास से झेल लेगा?

2026 का तमिलनाडु चुनाव किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं, बस फर्क इतना है कि यहाँ हीरो तय नहीं, विलेन भी साफ़ नहीं। भाजपा पूरी ताकत से मैदान में है, लेकिन जमीन अभी भी डीएमके की है। एम.के. स्टालिन सत्ता में हैं, पर आराम में नहीं। गठबंधन मजबूत दिखता है, पर भीतर ही भीतर दरारों की आवाज़ भी सुनाई दे रही है।

चेन्नई के सत्ता गलियारों में फुसफुसाहटें तेज़ हैं, लोग पूछ रहे हैं, क्या अमित शाह की चुनावी मशीनरी पहली बार दक्षिण में हांफेगी? क्या बिखरा हुआ विपक्ष मजबूरी में एकजुट होगा? और क्या कोई नया चेहरा, शायद कोई चमकता सितारा, राजनीति के इस थके हुए मंच पर अचानक स्पॉटलाइट चुरा लेगा?

तमिलनाडु 2026 में लड़ाई सीधी नहीं है। यह विचारधाराओं की कुश्ती है, पहचान की राजनीति है, और अहंकारों का टकराव है। यहाँ जीत उसी की होगी जो खुद को कम आँके, क्योंकि इस चुनाव में आत्मविश्वास से ज़्यादा ख़तरनाक है, आत्ममुग्धता।और यही वजह है कि यह चुनाव जितना रोमांचक है, उतना ही अनिश्चित भी। 

मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की डीएमके गठबंधन कागज़ पर सबसे मज़बूत ताकत है। धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन (एसपीए) में कांग्रेस, विग्नान केन्द्र चीफ कोऑर्डिनेशन (वीसीके) और लेफ्ट पार्टियाँ मिलाकर 158 सीटें हैं। सिर्फ़ नंबर्स देखें तो स्टालिन का दोबारा लौटना आसान लगता है। लेकिन सियासत इतनी सीधी कहाँ?

पाँच साल की सत्ता के बाद डीएमके पर साफ़ एंटी-इनकंबेंसी का दबाव है। शासन की शिकायतें, भ्रष्टाचार के इल्ज़ाम, वादों की सुस्त रफ्तार, और नीट (NEET) हटाने में नाकामी से बेचैनी फैल रही है।

मुख्य चैलेंजर है एआईएडीएमके, जो अब फिर से बीजेपी के साथ नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) में। 2024 लोकसभा के छोटे झगड़े के बाद पुराने साथी फिर एकजुट हो गए, ताकि एंटी-डीएमके वोट लामबंद हो सकें। बीजेपी के साथ पीएमके और डीएमडीके भी हैं।

अगर ये गठबंधन मज़बूती से चला तो भारी वोट शेयर हासिल कर सकता है। लेकिन एकजुटता ही इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। जयललिता युग के बाद एआईएडीएमके अपनी पुरानी ताकत वापस पाने में जूझ रहा है। बीजेपी बढ़ रही है, लेकिन तमिलनाडु की द्रविड़ और समाजिक न्याय की जड़ें रुकावटें हैं। पीएमके के घरेलू झगड़े गठबंधन को और कमज़ोर करते हैं। हिसाब अच्छा है; तालमेल नहीं।

इस माहौल में अनप्रेडिक्टेबल तत्व हैं नए सियासी उखाड़ू। एक्टर विजय का तमिलागा वेट्री कझगम (टीवीके) ने जेन ज़ेड को जोश भर दिया है, जो मतदाताओं का पाँचवाँ हिस्सा हैं। उनकी अपील है साफ़ इमेज, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ बयानबाज़ी, और फिल्मों से बनी भावनात्मक कनेक्शन।

लेकिन विजय का सफर पहले ही उलझन भरा रहा। 2025 में कुरूर रैली में भगदड़ से कई मौतें हुईं, जो जांच़ के घेरे में है। समर्थक उन्हें एमजीआर जैसा हीरो मानते हैं, लेकिन आलोचक कहते हैं कि करिश्मा नीति की गहराई और संगठन की ताकत की जगह नहीं ले सकता।

सीमेन की नाम तमिल (एनटीके) भी एक फैक्टर है, जो तमिल राष्ट्रवाद और गुस्सैल मतदाताओं को लुभाती है। टीवीके और एनटीके मिलकर 15-20% वोट काट सकते हैं, ज्यादातर एंटी-डीएमके से, जिससे कई सीटों पर नतीजे प्रभावित होंगे।

तमिल सियासत में सिनेमा का असर पुराना है। एमजीआर से जयललिता तक, सिल्वर स्क्रीन के सितारे सत्ता तक पहुँचे। विजय भी वही रास्ता अपना रहे हैं , फैन क्लब को पार्टी यूनिट बनाकर, फिल्मों में राजनीतिक संदेश डालकर। लेकिन कमल हासन की नाकाम कोशिश याद दिलाती है कि शोहरत को विचारधारा और एडमिन विज़न चाहिए।

इधर बीजेपी सांस्कृतिक-धार्मिक मुद्दों से अपनी जादुई पहचान फैला रही है। डीएमके को एंटी-हिंदू , मंदिर प्रथाओं और सनातन धर्म के खिलाफ बताया जा रहा है। लेकिन तमिलनाडु ने धार्मिक ध्रुवीकरण को हमेशा ठुकराया है। समाजिक न्याय, क्षेत्रीय गर्व और तर्कवादी सियासत हिंदुत्व से भारी पड़ते रहे हैं।

जाति का खेल फैसला करेगा। दलित, थेवर, गाउंडर, वन्नियार और देवेंद्रकुला वेल्लालर इलाकों में अलग-अलग असर डालेंगे। गठबंधन इन्हीं समीकरणों पर बने हैं, जो टाइट मुकाबले में जीत दिला सकते हैं।

शासन के मसलों पर बेरोज़गारी, महंगाई और कल्याण योजनाएँ हावी हैं। डीएमके ने पोंगल पर नकद मदद, मुफ्त लैपटॉप और औरतों की स्कीमों में इज़ाफा जैसे ताज़ा कदम उठाए हैं। नाम समाजिक सहायता का, मकसद वोटर वफादारी का।

एक और विवादास्पद मसला है वोटर लिस्ट का बड़ा संशोधन, जिसमें करीब एक करोड़ नाम कटे। डीएमके को डर अल्पसंख्यकों और प्रवासियों के बहिष्कार का, विपक्ष कहता है नकली वोटर साफ़ हो रहे। टाइट रेस में ये फर्क डाल सकता है।
तो तमिलनाडु कहाँ खड़ा है?

डीएमके के पास संगठन की ताकत और गठबंधन की अनुशासन है। लेकिन विपक्ष की बिखरी-फिर भी जोशीली चुनौती, एक्टर विजय की वाइल्ड कार्ड एंट्री और मतदाता थकान इसे अनप्रेडिक्टेबल बनाते हैं। लटका हुआ सदन (त्रिशंकु) या इकतरफा सरप्राइज़ शिफ्ट मुमकिन है।

आखिरकार, पटकथा तमिलनाडु के मतदाताओं के हाथ है, खासकर युवा पहली बार वोट डालने वालों के। क्या वे द्रविड़ ढांचे पर टिकेंगे, या नई आवाज़ें आज़माएँगे? जवाब तय करेगा कि 2026 स्थिरता लाएगा या सियासी हलचल की शुरुआत।

साप्ताहिकअखबार ‘असम वाणी’ की अनचाहे मौत: असमिया पत्रकारिता के एक स्वर्णिम दौर पर विराम!

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नव ठाकुरीया

गुवाहाटी के असम ट्रिब्यून ग्रुप के अखबारों में कोविड-19 महामारी के बाद जो संकट और बढ़ गया, उसके बीच एक लोकप्रिय असमिया साप्ताहिक अखबार 2025 के आखिर में बंद हो गया। ‘असम वाणी’, जो दशकों तक असमिया रीडर्स के लिए मेनस्ट्रीम वीकली थी , पिछले साल सितंबर से बंद हो गई , क्योंकि मैनेजमेंट ने हर शुक्रवार को इसकी प्रिंटिंग जारी रखने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। भले ही सात दशक पुराना असमिया भाषा का वीकली अखबार की स्टॉल से खो गया, लेकिन मैनेजमेंट ने ‘असम वाणी’ के बारे में कोई बयान नहीं दिया। इसके पहले, वीकली अखबार को मीडिया हाउस के जाने-माने असमिया डेली ‘दैनिक असम’ के साथ शुक्रवार के सप्लीमेंट के तौर पर मर्ज कर दिया गया था।

कभी सतीश चंद्र काकती, तिलक हज़ारिका, फणी तालुकदार, निरोद चौधरी, होमेन बरगोहेन, चंद्रप्रसाद शैकिया जैसे जाने-माने असमिया पत्रकार-लेखकों द्वारा एडिट किए जाने वाले इस वीकली के आखिरी एडिटर दिलीप चंदन थे, जिन्होंने लगभग तीन दशकों तक ‘असम वाणी’ में काम किया। 1 जुलाई 1955 को मशहूर असमिया एंटरप्रेन्योर राधा गोविंद बरुआ ने इसे शुरू किया था। इस वीकली ने असमिया मीडियम (स्कूलों में पढ़ाई का) मूवमेंट, असम में घुसपैठ के खिलाफ आंदोलन, अलगाववादियों के असर वाली बगावत का अचानक बढ़ना, सामाजिक अशांति, क्षेत्रीय राजनीति का उभरना और स्थानीय आबादी के बीच इसकी घटती लोकप्रियता सहित कई ज़रूरी सामाजिक-राजनीतिक घटनाक्रमों को देखा और रिपोर्ट किया।

जैसे ही महामारी ने असम ट्रिब्यून ग्रुप द्वारा पब्लिश किए जाने वाले सभी अखबारों के सर्कुलेशन पर बुरा असर डाला, इसका असर कमर्शियल कंपनियों से मिलने वाले विज्ञापन रेवेन्यू में कमी के रूप में देखा गया। पूरे भारत में कई दूसरे मीडिया संस्थानों की तरह, असम ट्रिब्यून ग्रुप को भी गंभीर फाइनेंशियल संकट का सामना करना पड़ा, जिसका असर वर्किंग जर्नलिस्ट समेत कर्मचारियों को अनियमित सैलरी मिलने में दिखने लगा। कर्मचारी यूनियन रिटायर्ड कर्मचारियों के बकाया पेमेंट समेत कई मुश्किलों को लेकर जनता के सामने आई। यूनियन नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि उनके ग्रुप को स्टेट इन्फॉर्मेशन एंड पब्लिक रिलेशन्स डायरेक्टरेट से (पब्लिश किए गए विज्ञापनों के बदले) भारी रकम नहीं मिल रही थी।

जल्द ही पूरे मीडिया ग्रुप के शहर के किसी दूसरे टेलीविज़न हाउस को बेचे जाने की अफवाहें फैल गईं। लेकिन असम ट्रिब्यून मैनेजमेंट ने इसे गलत बताते हुए इसका कड़ा खंडन किया। एक ऑफिशियल बयान में, मैनेजमेंट ने ‘अपनी एडिटोरियल इंडिपेंडेंस, जर्नलिस्टिक इंटीग्रिटी और अपने रीडर्स, एडवरटाइजर्स और स्टेकहोल्डर्स को लगातार सर्विस देने’ का पक्का वादा किया। मैनेजमेंट ने सभी संबंधित लोगों से ‘ऐसी बेबुनियाद अटकलों पर ध्यान न देने और गलत जानकारी फैलाने से बचने’ की भी अपील की। यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि इसका मेन न्यूज़ आउटलेट द असम ट्रिब्यून, जो 4 अगस्त 1939 को शुरू हुआ (पहले एडिटर लक्ष्मीनाथ फुकन थे) और आज भी नॉर्थ-ईस्ट इलाके में सबसे ज़्यादा सर्कुलेट होने वाला इंग्लिश डेली है।

लेकिन प्रफुल्ल गोविंद बरुआ (RG बरुआ के दूसरे बेटे, जिनकी हाल ही में 14 दिसंबर को 93 साल की उम्र में मौत हो गई) की लीडरशिप वाले मैनेजमेंट के भरोसे ने उन्हें ‘दैनिक असम’ की ज़िम्मेदारी, जो अब छह दशक से ज़्यादा पुराना पब्लिकेशन है, सौंपने से नहीं रोका। युवा उद्यमी किशोर बोरा के मीडिया ग्रुप, जो एक असमिया न्यूज़ चैनल ND24 चलाता है, अब ‘दैनिक असम’प्रकाशित कर रहे हैं । यह डील पिछले साल 17 सितंबर को पब्लिक हुई, जिसके बाद नए मैनेजमेंट ने ‘दैनिक असम’ को पब्लिश करने की उत्तरदायित्व ली, लेकिन ‘असम वाणी’की ज़िम्मेदारी लेना पसंद नहीं किया। ‘दैनिक असम’ के सप्लीमेंट के तौर पर, ‘असम वाणी’ 12 सितंबर को आखिरी बार मुद्रित किया गया।

मीडिया जानकारों का मानना है कि ट्रिब्यून हाउस आमतौर पर जानकारी, संपादकीय विचारों और दूसरे लेखों को फैलाते समय अपनी विश्वसनीयता बनाए रखता था, लेकिन हाल के दिनों में उन्हीं सिद्धांतों से काफी हद तक समझौता किया। उनके मुख्य अखबार (द असम ट्रिब्यून) ने 2019 में शुरू हुए नागरिकता संशोधन अधिनियम विरोधी आंदोलन का खुलकर समर्थन किया, जहाँ उसने उस जन आंदोलन को बहुत ज़्यादा जगह दी। इसने पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से भारत आने वाले सताए हुए हिंदू, सिख, बौद्ध, ईसाई परिवारों को समर्थन देने की केंद्र सरकार की पहल की निंदा की। इस अराजकता ने असम की ब्रह्मपुत्र घाटी को हफ्तों तक अपनी चपेट में ले लिया।

इसके अलावा, असम के लोगों को याद है कि असम ट्रिब्यून ने पांच साल पहले गुवाहाटी प्रेस क्लब चुनाव की पृष्ठभूमि पर खराब रिपोर्टें प्रकाशित कीं, जहाँ संपादकीय फोकस पक्षपाती, गैर-जिम्मेदार और प्रेस क्लब के पूर्व सचिव के चरित्र हनन से भरा हुआ था, जिससे इसकी ईमानदारी दांव पर लग गई। असम ट्रिब्यून मीडिया हाउस की मौजूदा वित्तीय स्थिति चिंताजनक बनी हुई है, लेकिन यह पूरी तरह से महामारी के कारण नहीं हुआ, बल्कि स्थिति को कुछ घमंडी मीडिया पेशेवरों ने जटिल बना दिया, जिन्होंने मीडिया हाउस में सभी उचित लाभों का आनंद उठाया, लेकिन अव्यवस्था पैदा करने की पूरी कोशिश की, और चौंकाने वाली बात यह है कि प्रबंधन टीम मूक दर्शक बना रहा।

जिन्ना है विभाजन का खलनायक और कांग्रेस की नजर में आज भी है ‘जी’

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । भारत के स्वतंत्रता संग्राम और विभाजन का इतिहास आज की हर देश भक्‍त को दर्द से भर देता है। मध्‍यप्रदेश के इंदौर में यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय भानु चिब द्वारा दिए गए बयान ने इसी इतिहास को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं का उल्लेख करते हुए ‘जिन्ना’ को सम्मानसूचक भाषा में याद करना वास्‍तव में शब्दों की चूक नहीं माना जा सकता। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इसे देश की स्‍वाधीनता के बलिदानियों के बलिदान का अपमान बताते हुए कांग्रेस की मानसिकता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। वस्‍तुत: यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कांग्रेस के ऐतिहासिक फैसलों, उसकी वैचारिक दिशा और विभाजन की त्रासदी में उसकी भूमिका को फिर से कठघरे में लाता है।

क्‍या यह भुलाया जा सकता है कि जिन्ना 1947 के विभाजन के मुख्य प्रतीक और सूत्रधार थे? ऐसे व्यक्ति को “महापुरुष” जैसी भाषा में याद करना उन लाखों लोगों के घावों को कुरेदने जैसा है, जिन्होंने विभाजन के दौरान अपना घर, परिवार और जीवन खो दिया। निश्‍चित ही भाजपा नेता आशीष ऊषा अग्रवाल ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को जोरदार ढंग से उठाया है। उनका ये कहना, “पहले ओसामा जी, अब जिन्ना जी- यह कांग्रेस की सोच का आईना है।” वास्‍तव में इस सोच को देखकर आज यही कहना उचित होगा कि कांग्रेस की राजनीति में राष्ट्र पहले नहीं, बल्कि तुष्टिकरण और वैचारिक भ्रम सबसे पहले आता है।

आज हम यदि भारत विभाजन और इतिहास के आइने में देखें तो फिर से ये साफ हो जाता है कि जिन्ना का राजनीतिक जीवन विभाजनवादी था। आर.सी. मजूमदार अपनी ऐतिहासिक कृति The History and Culture of the Indian People में लिखते हैं कि 1937 के बाद जिन्ना ने मुस्लिम समुदाय के भीतर असुरक्षा और भय की भावना को राजनीतिक हथियार बनाया। यहीं से दो-राष्ट्र सिद्धांत को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया गया। यह सिद्धांत इस विचार पर आधारित था कि हिंदू और मुस्लिम अलग-अलग राष्ट्र हैं और साथ नहीं रह सकते। यह अवधारणा भारत की साझा संस्कृति और इतिहास को नकारती थी, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को भी गहरा करती थी।

1940 का लाहौर प्रस्ताव इस दिशा में निर्णायक कदम साबित हुआ। बिपिन चंद्र अपनी पुस्तक India’s Struggle for Independence में लिखते हैं कि यह प्रस्ताव भारत के एकीकृत राष्ट्रवाद पर सीधा हमला था। जिन्ना ने इसे मुस्लिमों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा का माध्यम बताया, लेकिन वास्तव में यह विभाजन की औपचारिक घोषणा थी। इसके बाद की राजनीति में समझौते की संभावनाएं लगातार कमजोर होती गईं।

विभाजन की ओर बढ़ते कदमों में सबसे भयावह अध्याय 16 अगस्त 1946 का ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ था। जिन्ना द्वारा घोषित इस आंदोलन का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस पर पाकिस्तान की मांग स्वीकार करने का दबाव बनाना था। रामचंद्र गुहा अपनी पुस्तक India After Gandhi में लिखते हैं कि इस दिन की हिंसा ने यह स्पष्ट कर दिया कि जिन्ना की राजनीति अब संवाद नहीं, बल्कि टकराव और हिंसा के रास्ते पर चल पड़ी थी। कलकत्ता से शुरू हुई हिंसा ने पूरे देश में आग की तरह फैलकर हजारों लोगों की जान ले ली।

यहां कांग्रेस की भूमिका भी सवालों के घेरे में आती है। स्वतंत्रता आंदोलन की अगुआ कांग्रेस विभाजन को रोकने में क्यों असफल रही? ए.जी. नूरानी (The Muslim League and the Partition of India) के अनुसार, कांग्रेस नेतृत्व जिन्ना की हठधर्मिता और ब्रिटिश सरकार की “फूट डालो और राज करो” नीति का सही आकलन नहीं कर पाया। कैबिनेट मिशन योजना, जोकि भारत को एक रखने का अंतिम अवसर थी, आपसी अविश्वास और राजनीतिक अहंकार की भेंट चढ़ गई।

1947 में माउंटबेटन योजना के तहत विभाजन को स्वीकार करना कांग्रेस का सबसे विवादास्पद निर्णय माना जाता है। जसवंत सिंह अपनी पुस्तक Jinnah: India, Partition, Independence में लिखते हैं कि सत्ता हस्तांतरण की जल्दबाजी ने कांग्रेस नेतृत्व को दीर्घकालिक परिणामों पर गंभीर विचार करने से रोक दिया। सीमाओं का निर्धारण जल्दबाजी में हुआ, जिससे अभूतपूर्व नरसंहार और विस्थापन हुआ। इस संदर्भ में उर्वशी बुटालिया की पुस्‍तक (The Other Side of Silence) भी देखी जा सकती है जो विभाजन को इतिहास का सबसे बड़ा मानवीय विस्थापन बताती हैं। करीब डेढ़ करोड़ लोग अपने घरों से उजड़ गए और लाखों मारे गए। यह त्रासदी सिर्फ जिन्ना की जिद का परिणाम नहीं कही जा सकती है, वास्‍तव में यह तो कांग्रेस की राजनीतिक कमजोरियों और गलत आकलनों का भी नतीजा थी।

आज, जब यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा जिन्ना का उल्लेख सम्मानजनक शब्दों में किया जाता है, तब यह इतिहास के उन तमाम घावों को फिर से हरा कर देता है जोकि संघर्ष, बलिदान और समर्पण से भरा हुआ है, इसमें असंख्‍य मासूमों की चीखें है, जिसके लिए निश्‍चित ही कांग्रेस कभी अपने को अपराध से मुक्‍त नहीं कर सकती है, क्‍योंकि वही इसके लिए पूरी तरह से जिम्‍मेदार है, क्‍योंकि नेतृत्‍वकर्ता भी उस वक्‍त वही थी।

ऐसे में भाजपा नेताओं का कहना है कि यह कांग्रेस की वही पुरानी मानसिकता है, जो तुष्टिकरण के लिए ऐतिहासिक सच्चाइयों को धुंधला करती है, आज पूरी तरह से सही नजर आता है। उसके आचरण से तो यही भाव झलकता है कि कांग्रेस आज भी विभाजन के सबक से नहीं सीख पाई है। अब इस पर कांग्रेस यदि कोई सफाई भी देती है, तो ये बयान के मूल संदर्भ से चाह कर भी नहीं हटा सकती है। फिर प्रश्न शब्दों का नहीं, सोच का है, जोकि भारतीय स्‍वाधीनता आन्‍दोलन के बलिदानियों के साथ जिन्ना को “इतिहास का मुख्‍य पात्र” बनाकर ‘जी’ के सम्‍बोधन के साथ पेश करती है।

आज फिर कांग्रेस की वैचारिक दिशा पर गंभीर प्रश्न हैं। जिन्ना का नाम भारतीय इतिहास में विभाजन, हिंसा और अलगाव से जुड़ा रहेगा, इसे कोई कभी नकार नहीं सकता है, क्‍योंकि जब तक इतिहास का अस्‍तित्‍व है। जिन्‍ना भारत के लिए एक खलनायक ही है । कांग्रेस यदि आज भी इस सच्चाई को स्वीकार करने और अपनी ऐतिहासिक भूलों पर ईमानदार आत्ममंथन करने से बचती है, तब आज भी यही समझा जाए कि वह भारत से वास्‍तविक प्रेम नहीं करती। उसका आचरण देशभक्‍ति के संदर्भ में सिर्फ दिखावा है और यदि ऐसा है तब फिर हम सभी को विचार करना चाहिए कि कांग्रेस के साथ खड़े भी हों अथवा उससे दूरी रखना ही देश हित है!

सिंगल माल्ट इंद्री की बोतल पर लगी लाल बिंदी, कुछ कहती है

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गुरु
दिल्ली । जेसिका लाल हत्याकांड सिर्फ एक हत्या नहीं, बल्कि सिस्टम की परत-दर-परत नाकामी की कहानी है। 1999 की उस रात एक पब में शराब ना मिलने के कारण नेता विनोद शर्मा के बेटे मनु शर्मा(सिद्धार्थ) द्वारा सरेआम गोली चलाई जाती है, एक बेगुनाह लड़की मारी जाती है, गवाह मौजूद होते हैं, आरोपी पहचाना जाता है—फिर भी सत्ता, पैसे और डर के आगे कानून घुटनों पर आ जाता है। गवाह पलटते हैं, सबूत कमजोर पड़ते हैं और 2006 में मनु शर्मा उर्फ़ सिद्धार्थ बरी हो जाता है।
यह फैसला एक संदेश था: रसूख हो तो खून भी माफ़ हो सकता है। बाद में मीडिया के दबाव से सजा तो हुई, लेकिन सालों बाद फिर से हुई रिहाई ने फिर वही सवाल खड़े कर दिए—क्या इंसाफ पूरा हुआ?

रिहाई के बाद मनु शर्मा “इंद्री” लॉन्च करता है जो 800 करोड़ की कमाई के साथ ही आजकल भारतीय ब्रांड में नंबर वन सिंगल मॉल्ट के खिताब पर काबिज है, इसी ब्रांड के लोगो पर बनी लाल बिंदी के डिज़ाइन को लेकर लोगों के मन में शंका उत्पन्न हुई। यह सवाल उठता है कि यह बिंदी जेसिका लाल की उस एकमात्र तस्वीर में लगी बिंदी से मिलती-जुलती क्यों लगती है जो उस समय हर ख़बर में छपती थी। क्या यह महज़ एक संयोग है, या एक ऐसे अपराध की पीड़िता की स्मृति के साथ असंवेदनशील खेल?

कोई ठोस सबूत नहीं कि यह जानबूझकर किया गया डिज़ाइन है, लेकिन भारत में जहां प्रतीक भावनाओं से जुड़े होते हैं, वहां यह सवाल उठना लाज़मी है। सिस्टम जब जवाब नहीं देता, तो शक और गुस्सा अपनी जगह बना लेते हैं।

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