इंस्टाग्राम से जंतर-मंतर तक, बदल गई सियासत नीट से निकला गुस्सा

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दिल्ली । नई दिल्ली का जंतर-मंतर बगावत के एक रंगीन मेले में बदल गया। जेन ज़ी के नौजवान गा रहे थे, नाच रहे थे, मीम्स बना रहे थे, ताकतवर नेताओं का मज़ाक उड़ा रहे थे और बर्गर, पिज़्ज़ा, भटूरे खाते हुए ऐसे मस्ती कर रहे थे, मानो राजनीति किसी कॉलेज फेस्ट में आ घुसी हो।
लेकिन इस हंसी-मज़ाक और शोर-शराबे के पीछे एक साफ़ और मज़बूत पैगाम था: जवाबदेही चाहिए। हिंसा भी इस आंदोलन का जोश कम नहीं कर सकी। युवाओं के नए जत्थे लगातार पहुंचते रहे। बेखौफ, पूरे हौसले के साथ। देखते ही देखते यह धरना लोकतंत्र के एक जीवंत उत्सव में बदल गया।
यह युवा आंदोलन भारत के लोकतांत्रिक सफर का एक अहम पड़ाव बन गया। शुरुआत परीक्षा व्यवस्था के खिलाफ गुस्से से हुई थी, लेकिन जल्द ही यह एक बड़े संदेश में बदल गई; देश के युवाओं की आवाज़ को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
जिस जन दबाव के बाद धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ना पड़ा, प्रधानमंत्री से इंस्टाग्राम पर सीधे युवाओं से संवाद की मांग उठी और नंदन नीलेकणी समेत विशेषज्ञों की टास्क फोर्स बनाने का फैसला हुआ, उसने एक बात साबित कर दी। शांतिपूर्ण, संगठित और स्पष्ट जनदबाव सरकारों को फैसले बदलने पर मजबूर कर सकता है।
इस आंदोलन ने सोशल मीडिया की असली ताकत भी दिखा दी। जो काम कभी बड़े मीडिया संस्थान तय करते थे, वह इस बार इंटरनेट ने किया। कहानी वहीं बनी, वहीं फैली और वहीं से पूरे देश तक पहुंची। पारंपरिक मीडिया को युवाओं के पीछे-पीछे चलना पड़ा।
जेन ज़ी की अपनी अलग भाषा थी; बेबाक, सहज, प्रतीकों और व्यंग्य से भरी। उसने राजनीतिक आंदोलनों के पुराने तौर-तरीकों को तोड़ दिया। यह आंदोलन किसी पार्टी का नहीं, बल्कि भरोसा खो चुके छात्रों और युवाओं का आंदोलन बन गया। पहली बार बड़ी संख्या में डिजिटल पीढ़ी ने लोकतंत्र को सड़क और स्क्रीन : दोनों पर एक साथ जिया।
सरकार ने समय रहते कुछ कदम उठाए, जिससे तनाव और नहीं बढ़ा। इस पूरे घटनाक्रम ने लोकतंत्र की एक पुरानी सच्चाई फिर याद दिला दी; शांतिपूर्ण जनआंदोलन लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत होते हैं।
नीट विवाद नरेंद्र मोदी सरकार के सामने केवल एक प्रशासनिक चुनौती नहीं था। यह भरोसे का संकट बन गया। करोड़ों परिवार शिक्षा को अपने बच्चों के बेहतर भविष्य की सीढ़ी मानते हैं। जब उसी व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, तो केवल परीक्षा नहीं, पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता कटघरे में खड़ी हो जाती है।
कई वर्षों तक नरेंद्र मोदी ने एक आत्मविश्वासी और सक्षम भारत की छवि गढ़ी। लेकिन नीट विवाद ने उस तस्वीर में दरार डाल दी। पेपर लीक, गड़बड़ियों और प्रशासनिक अव्यवस्था के आरोपों ने राष्ट्रीय परीक्षा की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
संकट आना किसी भी सरकार के लिए असामान्य नहीं होता। असली परीक्षा संकट के समय नेतृत्व की होती है। जनता गलती से कम, उसे छिपाने या टालने से ज़्यादा नाराज़ होती है। ऐसे समय में पारदर्शिता, संवेदनशीलता और तेज़ कार्रवाई ही भरोसा लौटाती है। लेकिन इस मामले में सरकारी प्रतिक्रिया अक्सर बचाव वाली ज़्यादा और समाधान वाली कम दिखाई दी। इससे लोगों का संदेह और गहरा हुआ।
संसदीय लोकतंत्र में मंत्री कई बार अपने विभाग की नैतिक ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हुए पद छोड़ देते हैं, चाहे व्यक्तिगत गलती सिद्ध न हुई हो। ऐसे फैसले लोकतंत्र को कमज़ोर नहीं, बल्कि मज़बूत करते हैं क्योंकि वे जनता को यह भरोसा देते हैं कि सत्ता जवाबदेह है।
इस विवाद ने एक और खतरे की ओर संकेत किया। लगातार चुनावी सफलताएं कई बार सरकारों को यह भरोसा दिला देती हैं कि जनता हमेशा उनके साथ रहेगी। यहीं से आत्मविश्वास और अति-आत्मविश्वास के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है। लोकतंत्र में सवाल पूछने वालों को विरोधी नहीं, चेतावनी देने वाला समझना चाहिए।
भारतीय परंपरा भी यही संदेश देती है। सत्ता के मद में चूर इंद्र को अंततः बालक कृष्ण के सामने झुकना पड़ा। नारद मुनि का अहंकार भी टूटा। रामायण का धोबी याद दिलाता है कि शासक सबसे साधारण नागरिक की आवाज़ भी अनसुनी नहीं कर सकता। इतिहास और पुराण दोनों कहते हैं, अहंकार निर्णय क्षमता को धुंधला कर देता है, जबकि विनम्रता रास्ता दिखाती है।
आज किसी भी सरकार की आंखें और कान केवल उसके अधिकारी नहीं होते। स्वतंत्र संस्थाएं, मीडिया, विशेषज्ञ और नागरिक समाज भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। जब ये आवाज़ें अनसुनी होने लगती हैं, तब सरकारें अपने ही बनाए घेरे में कैद हो जाती हैं। फिर केवल वही सुनाई देता है, जो अच्छा लगता है। असुविधाजनक सच बहुत देर से सामने आता है।
1975 का आपातकाल भी सत्ता और जनता के बीच बढ़ती दूरी की चेतावनी था। परिस्थितियां आज अलग हैं, लेकिन लोकतंत्र का सबक वही है; सत्ता का केंद्रीकरण, आलोचना की उपेक्षा और अति-आत्मविश्वास अंततः किसी भी सरकार को भारी पड़ सकते हैं।
नीट विवाद केवल एक परीक्षा की विफलता नहीं है। यह शासन व्यवस्था के लिए चेतावनी है कि किसी भी संस्था की साख पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही से बनती है। राजनीतिक ताकत की असली नींव अजेय होने का भ्रम नहीं, बल्कि जनता का भरोसा होती है।
नरेंद्र मोदी के सामने अभी भी अवसर है। मजबूत नेतृत्व का अर्थ यह नहीं कि उससे कभी गलती न हो। मजबूत नेता वह होता है, जो गलती स्वीकार करे, दोषियों को सज़ा दे, संस्थाओं में सुधार लाए और जनता की आवाज़ सुने।
जंतर-मंतर का यह आंदोलन शायद आने वाले वर्षों में केवल नीट विवाद के लिए याद न रखा जाए। संभव है, इतिहास इसे उस पल के रूप में याद करे, जब भारत की डिजिटल पीढ़ी ने पहली बार लोकतंत्र को नई भाषा, नई ऊर्जा और नई शैली दी। सत्ता बदलती रहती है, लेकिन जनता की आवाज़ अंततः सबसे ऊंची होती है। तालियां कुछ समय तक अहंकार का साथ दे सकती हैं, पर भरोसा केवल विनम्रता, ईमानदारी और जवाबदेही से ही जीता जाता है।

मराठी में लिखे पत्र का हिंदी अनुवाद 

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आदरणीय मोहनजी,
सादर नमस्कार!
मनःपूर्वक धन्यवाद !!
२० तारीख से मैं कई लोगों को पत्र लिख रहा हूँ। यह आखिरी पत्र मैं आपको लिख रहा हूँ।
मोहनजी मुझे याद है, हमारी पहली मुलाकात कन्याकुमारी में हुई थी। उस समय आपकी संघ की बैठक थी और आप ‘अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख’ थे। तमिलनाडु प्रांत की वह बैठक ‘विवेकानंदपुरम’ में आयोजित की गई थी। उसी दौरान विवेकानंद केंद्र के ‘जीवनव्रती शिक्षार्थी’ के रूप में मेरा प्रशिक्षण भी चल रहा था। संजोग से, आप भोजन के लिए विवेकानंद केंद्र के भोजन कक्ष में आए थे। हम जब आपको खाना परोस रहे थे, तब आप जिस आत्मीयता से हमसे बात कर रहे थे, उस वक्त ऐसा लग रहा था मानो “हमारा ही कोई अत्यंत करीबी रिश्तेदार प्यार से मन की बातें कर रहा हो।” उसके बाद लगभग दो घंटे तक आपने हमसे गपशप की। राष्ट्रीय स्तर के एक बड़े संगठन का पदाधिकारी होने के बावजूद, आपने हमारे सभी सवालों के जवाब दिए। उस समय हम बमुश्किल २३-२४ साल के युवा थे। लेकिन, आपने जिस तरह से हमसे संवाद साधा, उससे मुझे पहली बार यह अहसास हुआ कि आपके मन में युवाओं के प्रति अगाध स्नेह और आत्मीयता है।
मोहनजी, मैंने आपसे पहला सवाल पूछा था कि, “जो धार्मिक परिवर्तन (Religious Conversion) हो रहा है और युवाओं में जो वैचारिक परिवर्तन आ रहे हैं—यानी हिंदू धर्म से ईसाई या मुस्लिम धर्म में होने वाला मतांतरण हो, या JNU जैसे विश्वविद्यालयों में लगातार चलने वाली ‘सत्ताविरोधी’ (Anti-establishment) विचारधारा हो—इन सब का मूल कारण क्या है?”
उस पर हमारा मार्गदर्शन करते हुए आप बोले थे कि, “धर्मांतरण करने वाली मिशनरी संस्थाएं या JNU के प्रोफेसर बहुत शक्तिशाली हैं इसलिए ऐसा हो रहा है, यह बात नहीं है; बल्कि हम ही उन लोगों तक पहुँच नहीं पा रहे हैं। हम JNU के छात्रों तक पहुँचने में कम पड़ रहे हैं।”
आपने मुझे गुजरात की एक बुजुर्ग दादी का उदाहरण दिया था। उन दादी का धर्मांतरण हो चुका था। संगठन का एक हिंदू कार्यकर्ता उनसे मिलने गया। उसने तीन-चार दिनों तक सिर्फ उन दादी के खाने-पीने और सेहत का हालचाल लिया। पांचवें दिन वही दादी (जो ईसाई बन चुकी थीं) सीधे गांव के गणेश मंदिर में आती दिखाई दीं। हमारे कार्यकर्ता ने अचरज से पूछा, “दादी, आप यहाँ कैसे?” इस पर दादी ने जवाब दिया, “मेरे अपने लोग मुझ तक नहीं पहुँच रहे थे, इसलिए मुझे दूसरों की मदद लेनी पड़ी। अब जब मेरे अपने लोग मेरे साथ हैं, तो मैं अपने विचारों के साथ ही रहूँगी।”
उसी दौर में महाराष्ट्र में शिवसेना का बहुत प्रभाव था और मैं खुद एक शिवसैनिक था। मैंने आपसे दूसरा सवाल पूछा, “मोहनजी, RSS शिवसेना की तरह आक्रामक हिंदुत्व को क्यों नहीं अपनाता?” उस पर आपने जवाब दिया था, “संघ का हिंदुत्व आक्रामक नहीं, बल्कि ‘सर्वसमावेशी’ है।”
उस समय मुझे उस वाक्य का पूरा अर्थ समझ नहीं आया था। लेकिन बाद में, श्री गुरुजी द्वारा अपने जीवन के अंतिम दिनों में दिए गए भाषणों को जब मैंने सुना, तब मुझे ‘सर्वसमावेशी हिंदुत्व’ का असली अर्थ समझ आया। गुरुजी ने उस भाषण में कहा था—
श्री गुरुजी कहते हैं……
“इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न करने के लिए कोई एक विशिष्ट श्रेष्ठ सिद्धांत, कोई एक भव्य लक्ष्य आवश्यक है। अधिक प्रकार की आवश्यकता को सोच-समझकर हम सब एक स्नेह-संबद्ध जीवन को संपूर्ण समाज के संवर्धन के लिए अपनी-अपनी क्षमता और शक्ति के अनुसार लगा दें। इस प्रकार का समाज में सामंजस्य उत्पन्न करना यह वह भाव भिनी-अवस्था है, जो हमारे समाज की संगठितता के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है। यही संगठित जीवन का आह्वान है।”
आपका दिया हुआ यह मंत्र और श्री गुरुजी के वे विचार हृदय में संजोकर हम ‘पूर्वांचल’ (पूर्वोत्तर भारत) में काम के लिए गए। वहाँ हमारे सामने बड़ी चुनौतियाँ थीं। ‘भारत मुर्दाबाद’ के नारे लगाए जाते थे, हमें ‘नेपक’ (गैर-स्थानीय/बाहरी) या ‘विदेशी’ कहकर चिढ़ाया जाता था। १५ अगस्त या २६ जनवरी को ध्वजारोहण के समय, वहाँ के युवा कुत्तों और सुअरों की पूंछ में पटाखे बांधकर मैदान में छोड़ देते थे। शिलांग की मिशनरी संस्थाओं के कॉलेजों में पढ़े युवा ही वहाँ के छात्र संगठनों का नेतृत्व करते थे।
महाराष्ट्र के ही ‘प्रेम गायकवाड़’ नाम का एक कार्यकर्ता धर्मांतरित होकर उधर ‘फादर’ बनकर आया था। वह बड़े पैमाने पर धर्मांतरण का काम कर रहा था। ‘Nagaland for Christ’, ‘Mizoram for Christ’, और ‘Greater Nagalim’ जैसे राष्ट्रविरोधी नारे शुरू हो गए थे। NSCN (National Socialist Council of Nagaland) के उग्रवादियों ने कई बार हमारी गाड़ियाँ रोककर उन्हें छीन लिया था। लेकिन, हमें एक ही सीख दी गई थी—”यह हमारे अपने ही लोग हैं, इन्हें प्यार से जीतना है।” इसलिए मैं प्रेम गायकवाड़ से बार-बार मिलता रहा, भले ही वह मुझे कई बार गालियाँ देता था।
मोहनजी, आपकी दी हुई इस विचारधारा के कारण मुझे एक बेहद गंभीर परिस्थिति का सामना करना पड़ा। अरुणाचल प्रदेश के विवेकानंद केंद्र विद्यालय में एक छात्र की गलत दवाई मिलने के कारण दुर्भाग्य से मृत्यु हो गई। अरुणाचल में ‘बच्चे के बदले बच्चा’ (जान के बदले जान) का नियम माना जाता था। “हमारा बच्चा चला गया, तो हम आपके प्राचार्य के बच्चे को मारेंगे!” ऐसी धमकी देते हुए लोग चढ़ आए। सब डर के मारे सन्न रह गए थे। अरुणाचली भाइयों के हाथों में ‘दाव’ (कोयते/हंसिया) थे। उग्र भीड़ स्कूल पर हमला करने ही वाली थी, यह तय था।
स्थानीय कार्यकर्ताओं ने मुझे बताया कि डर के मारे हमारे संगठन का कोई भी कार्यकर्ता उनके सामने जाने को तैयार नहीं है। मैंने खुद वहाँ जाने का फैसला किया। साथियों ने मुझे खतरे से आगाह करते हुए रोकने की कोशिश की। लेकिन, “हमें अपने लोगों तक पहुँचना ही चाहिए”, आपका यह मंत्र मेरे मन में बसा था। जान का जोखिम उठाकर मैं वहाँ गया। भीड़ बेहद गुस्से में मुझे देख रही थी। मैं शांति से मृत बच्चे के शव के पास जाकर बैठ गया। आधा घंटा मैं बिना कुछ बोले वहाँ बैठा रहा; लोग मुझे गालियाँ दे रहे थे।
बाद में कुछ लोगों ने मुझे बाहर बुलाया। वहाँ एक पढ़ा-लिखा लेकिन दुखी इंसान भड़ककर मेरी तरफ झपटा और गालियाँ देते हुए बोला—”तुम लोग हिंदू, हम लोगों को हिंदू बनाने के लिए आये हो! हमारा बच्चा हिंदू बनने के लिए तैयार नहीं था, इस वास्ते तुम लोगों ने मार डाला!”
दरअसल वह आदमी ईसाई मिशनरी का ‘पास्टर’ था और उसी ने लोगों को भड़काया था। कुछ दिनों पहले ही हमने ‘अपर सुबनसिरी’ जिले में एक बड़ा मुफ्त नेत्र चिकित्सा शिविर (Eye Camp) लगाया था, जिसे स्थानीय लोगों का बहुत अच्छा प्रतिसाद मिला था; उसी का गुस्सा उस पास्टर के मन में था।
उस पास्टर ने मुझसे कहा कि, “तू हिंदू है, तू हमें कन्वर्ट कर रहा है।” मैंने उनसे कहा कि, “भारत में रहने वाला हर इंसान हिंदू है। इस भूमि की संस्कृति को सहेजने वाला इंसान हिंदू है। इस भूमि के इतिहास को अपना मानने वाला इंसान हिंदू है। यहाँ के देवी-देवता, यहाँ के महान व्यक्तित्व… यहाँ की परंपराओं को अपना मानने वाला इंसान हिंदू है।”
मैंने उनसे कहा कि, “आप सूर्य-चंद्रमा की पूजा करते हैं। आप हिंदू कैसे नहीं हैं? हमारी परंपरा ही सूर्य-चंद्रमा की पूजा करना है। यह भूमि शंकर की है,” मैंने कहा, “अरुणाचल। हमें आपको हिंदू बनाने की क्या जरूरत है? आप तो पहले से ही (ऑलरेडी) हिंदू हैं।”
वह पास्टर चिढ़ गया और बोला, “तू हिंदू है… हम हिंदू हैं ना, तो हम गाय का मांस खाते हैं, तू गाय का मांस खाता है क्या फिर?”
मैंने कहा, “गाय का मांस खाने में क्या परेशानी है? हाँ, मेरे क्षेत्र में गाय का मांस खाने… न खाने का नियम है। हमारे यहाँ तो मांस ही नहीं खाने का नियम है, हमारे वारकरी संप्रदाय में। तो वहाँ गाय के मांस का सवाल ही कहाँ आता है? हम तो साधारण अंडा भी नहीं खाते।”
“हम गाय मांस खाते हैं, तुम बोलता है ना हम हिंदू हैं, हम गाय मांस खाते हैं, तुम खायेगा क्या?”
मैं बोला, “हमारे इसमें नियम है, लेकिन आप अगर बोलते हैं कि गाय मांस खाने से… हिंदू… मेरे गाय मांस खाने से आप यह स्वीकारेंगे कि आप भी हिंदू हैं, तो मैं खाने के लिए तैयार हूँ.”
“चलो,” “गाय मांस लाओ सर के लिए,” ऐसा कहकर उसने आसपास के बच्चों से कहा।
सच कहूँ तो मैं अंदर से पूरी तरह हिल गया था। मेरे मन में गाय का मांस खाने की हिम्मत नहीं थी। मैं अब भी पापभीरू (पाप से डरने वाला) हूँ। गाय मेरे लिए आज भी पवित्र है। मंदिर में माथा टेकने जाने का मन करता है मेरा।
मेरे साथी कह रहे थे, “प्रसादजी, आप चलो, निकलो।” मैंने कहा, “रुको, हमारे… हमारे ही लोग हैं ये।”
गाय का मांस लाया गया। वह गाय का मांस मेरे हाथ में रखा गया। मैंने आखिरी बार ईश्वर का स्मरण करके कहा, “मैं अब गाय का मांस खा रहा हूँ, यह मेरा आपद्धर्म है।”
मुझे उसी वक्त सूझा, मैंने उस पास्टर से कहा कि, “लेकिन मेरे वारकरी संप्रदाय में यह नियम है कि गाय मांस नहीं खाना चाहिए या मांस ही नहीं खाना चाहिए. लेकिन आप बोल रहे हैं ना आप मेरे भाई नहीं हैं ऐसा बोल रहे हैं, मैं आपका भाई नहीं हूँ ऐसा बोल रहे हैं, मैं सिर्फ आपके लिए गाय मांस खा रहा हूँ, मेरा नियम तोड़के.”
और जैसे ही मैंने हाथ गाय के मांस की तरफ बढ़ाया, उस आदमी ने झपटकर मुझे रोक लिया—”मत खाओ सर, मत खाओ!” ऐसा कहते हुए वह जोर-जोर से रोने लगा। उसने मुझे गले लगा लिया—”सर, मैं गलत था।”
पूरा माहौल ही बदल गया मोहनजी!
“बच्चे के बदले बच्चा, खून के बदले खून, और तुमको भून देंगे!”
अरे, हम कितने लोग थे वहाँ? सिर्फ १०-१२! अपर सुबनसिरी जिले के बाहर के हम सब लोग थे। १०० के करीब लोग दाव और बंदूकें लेकर आए होते और हमें खत्म कर दिया होता तो कहीं भी हम… जंगल में हमें दफना दिया होता तो किसी को पता भी नहीं चलता।
मोहनजी, आपने जो बताया है, गुरुजी ने जो बताया है, विवेकानंद जी ने जो सिखाया है, उन विचारों पर विश्वास रखकर हम जिए और हमें सफलता मिली।
‘Love is life, hatred is death’ (प्रेम ही जीवन है, द्वेष ही मृत्यु)—स्वामी जी की सिखाई यह बात हमें आज भी समझ आती है। ‘ऐसी भावविभोर अवस्था निर्माण करना कि संपूर्ण समाज मेरा समाज है’—श्री गुरुजी की कही यह बात हमारे मन में पक्की बैठी हुई थी।
मोहनजी, आज भी, मुस्लिम हों, ईसाई हों, सभी समाजों के बीच मेरे दोस्त हैं और मैं उनसे दोस्ती रखता हूँ। मैं उनसे मतांतरण करने को नहीं कहता। हिंदू धर्म के भीतर भी अलग-अलग विचारों के लोगों से मेरी दोस्ती है। आर्थिक, सामाजिक, जातिगत सीमाओं से परे… राजनीति में भी दोस्त हैं, सामान्य दोस्त भी हैं। मैं उनके विचारों का सम्मान करता हूँ, मैं अपने विचारों का सम्मान करता हूँ। ‘यतो मत ततो पथ’ (जितने मत, उतने पथ) को मैं स्वीकार करता हूँ, जो रामकृष्ण परमहंस जी ने हमें सिखाया।
मोहनजी, अभिजीत तो मेरे दोस्त का बेटा है। हाँ, सब कहते हैं कि वह भटक गया है। लेकिन उसे सुधारने वाला, उसके साथ रहने वाला कौन है? हम ही रहेंगे ना? हाँ, मैंने उसकी पीठ थपथपाई, उसे ‘शाबाश’ कहा। अरे, कोई… कोई अगर कुछ सीखने की कोशिश कर रहा है, तो शाबाशी देनी ही पड़ेगी ना! जहाँ वह गलती कर रहा है, वहाँ गलतियाँ दिखानी ही पड़ेंगी ना! और साथ ही उसके मामले में अगर हमारे लोग कुछ गलती कर रहे हैं, तो वे गलतियाँ भी दिखानी ही पड़ेंगी ना!
मोहनजी, लेकिन एक मजे की बात है। संघ का स्वयंसेवक कभी भी ‘मोदी भक्त’ नहीं होता। जो हिंदुत्व को जीता है ना, वह कभी मोदी भक्त नहीं होता। वह संघ भक्त भी नहीं होता। वह केवल और केवल राष्ट्रभक्त – देशभक्त होता है। लेकिन मोहनजी, एक ऐसा बड़ा वर्ग है, जिसने संघ को कभी स्पर्श तक नहीं किया, लेकिन वह मोदी का भक्त है। मेरा ऐसा ही एक दोस्त है, जिसे संघ का रत्ती भर भी अनुभव या स्पर्श नहीं है, लेकिन वह मोदी भक्त है। मैंने अभिजीत का समर्थन किया, इसलिए उसने मुझे अपनी फ्रेंड लिस्ट से हटा दिया। उसी का भाई, जो मेरा दोस्त है, अन्ना के आंदोलन के समय उसने मुझे बहुत भला-बुरा कहा था। लेकिन मैंने उसे अपनी फ्रेंड लिस्ट से नहीं निकाला। आज भी वह मेरा पक्का दोस्त है।
ऐसी एक बड़ी जमात है जो मोदी भक्त है, जिन्हें संघ परंपरा और हिंदुत्व के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है।
दूसरी बात यह कि वे स्वयंसेवक जो सच में आचार, विचार और कर्म को भूल चुके हैं, ऐसे भी कुछ स्वयंसेवक हैं; जो इन सब बातों को समझते ही नहीं हैं।
मोहनजी, आज सुबह आपका वाक्य सुना, युवाओं के प्रति आपके जो विचार सुने तो मैं तुरंत १९९४-९५ के दिनों में लौट गया। जिस तरह आप १९९४-९५ में हमसे बात करते थे, हमें समझते थे, उसी तरह अब भी आप बदली हुई युवा पीढ़ी को समझ रहे हैं, यह बात मेरे ध्यान में आई।
मोहनजी, जब आप अंबाजोगाई आए थे, उस कार्यक्रम के आयोजन का मैं प्रमुख था। उस कार्यक्रम में आपने ‘निःश्रेयस’ और ‘अभ्युदय’ की इन दो अवधारणाओं को बहुत सुंदरता से समझाया था। सामूहिक अभ्युदय और सामूहिक निःश्रेयस की संकल्पना भी आपने बताई थी।
मोहनजी, इन पाँच दिनों में, नहीं… हर बार कोई काम करते समय यह विचार हमेशा दिमाग में रहता है। पिछले पाँच दिनों में आपकी याद ज्यादा आई। कन्याकुमारी के उस पल की याद सबसे ज्यादा आई। उस गोमांस खाने वाले वाकये की याद आई और हेबालकर सर के सहस्रचंद्रदर्शन के समय आपके द्वारा बताई गई सामूहिक निःश्रेयस और सामूहिक अभ्युदय की संकल्पना याद आई।
बदलती दुनिया और बदलते समाज के साथ तालमेल बिठाते-बिठाते, कालानुरूप अपने भीतर जो निरंतर… बदलाव करने होते हैं, वे बदलाव करते समय कुछ शाश्वत मूल्यों को मन में रखकर और वर्तमान के प्रति सजग रहते हुए भूतकाल की ओर देखना होता है, अंबाजोगाई के भाषण में दिया गया आपका यह संदेश हमारे लिए बेहद अनमोल साबित हुआ।
मोहनजी, वह भावविभोर अवस्था मैं अपने भीतर निर्मित कर रहा हूँ, प्रयास कर रहा हूँ। हमारे स्वयंसेवक मुझे ‘साने गुरुजी’ कह रहे हैं, कुछ दोस्त मुझे ‘भाऊ तोरसेकर’ के पास जाने को कह रहे हैं, कुछ लोग मुझे ‘अनालाइज़र’ के भाषण सुनने की सलाह दे रहे हैं, कुछ लोग दूर-दूर से… मुझ पर कमेंट कर रहे हैं, कुछ लोग कह रहे हैं कि तेरे बर्ताव पर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं… मुझे हँसी आती है मोहनजी!! कितने आभासी (Virtual) जगत में जी रहे हैं ये लोग!!
धन्यवाद,
आपका,
प्रसाद चिक्षे

25 जुलाई 1880 सुप्रसिद्ध समाजसेवी गणेश वासुदेव जोशी का निधन

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इनके स्वदेशी आँदोलन से ही गाँधी जी को मिली थी खादी प्रचार की प्रेरणा..
अहमदाबाद । अंग्रेजी सत्ता ने भारत में अपनी जड़ों को गहरा करने के लिये व्यापार को माध्यम बनाया था । उन्होंने पहले विदेशी वस्तुओं का आकृषण पैदा किया फिर स्वदेशी उत्पाद का दमन किया । 1857 में क्रान्ति की असफलता के बाद इस तथ्य अनेक महापुरुषों ने पहचाना उनमें सबसे प्रमुख थे गणेश वासुदेव जोशी । इन्होंने न केवल समाज में स्वदेशी अपनाओ का अभियान चलाया अपितु स्वदेशी वस्तुओं के कुछ उत्पादन केन्द्र भी स्थापित किये । आगे चलकर जब गाँधी जी भारत लौटे तब उन्हें स्वदेशी और खादी प्रचार की प्रेरणा इनके आंदोलन से ही मिली ।
स्वत्व, स्वाभिमान और स्वदेशी के लिये अपना जीवन समर्पित करने वाले गणेश वासुदेव जोशी का जन्म 9 अप्रैल 1828 को सतारा में हुआ था । परिवार की पृष्ठभूमि शिक्षित और संपन्न थी । पिता ईस्ट इंडिया कंपनी में काम करते थे । इस कारण कंपनी के कामों और कूटनीति की चर्चा घर में होती थी । बालपन से ही बालक गणेश के मन में अंग्रेजों की चालाकियों और बारीकियों से अवगत हो गये थे । समय के साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और वकालत पास की । इसी बीज 1857 की क्रांति ने उन्हें झकझोर दिया । क्रान्ति के दमन के लिये अंग्रेजों के अत्याचार ने उन्हे विचलित कर दिया और वे मन ही मन अंग्रेज शासन को उखाड़ने का चिंतन करने लगे । वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे की कि अंग्रेज को उनकी शैली में उत्तर दिया जाना चाहिए। अंग्रेजों ने अपना राजतंत्र व्यापार से आरंभ किया था । इसलिए अंग्रेजों के व्यापार को कमजोर करने के लिये स्वदेशी वस्तुओं के प्रति पुनः आकर्षण उत्पन्न करना था ।
उस समय अंग्रेज सारा रा-मेटेरियल भारत से ले जाते थे और अपने कारखानों में बना हुआ समान भारत में खपाते थे । इससे उन्हे दो लाभ होते थे । एक तो भारत में शिल्प की मौलिकता घट रही थी और इससे उत्पन्न बेरोजगारी से उन्हे कामगार मिल रहे थे दूसरा उनका माल बिकने से उनका लाभांश बढ़ रहा था । दुनियाँ के हर देश में व्यापार का यही तरीका अंग्रेजों की सत्ता की नींव व्यापार था । इसलिये गणेशजी जोशी जी ने अंग्रेजों की इसी नींव पर सबसे पहले प्रहार करने का निर्णय लिया । उन्होंने युवाओं की एक टोली बनाई उनमें स्वाभिमान और स्वत्व का भाव जगाया और यह प्रचार आरंभ किया कि यदि सभी भारतीय फिर से अपने ही देश में निर्मित वस्तुओं का उपयोग करेंगे और अपनी आजीविका के लिये स्वयं अपने कुटीर उद्योग स्थापित करें तो अंग्रेज स्वयं कमजोर हो जायेंगे । इस टोली में दो युवा युवा माधव गोविन्द रानाडे और गोपाल कृष्ण गोखले भी जुड़े। इन युवाओं को आगे करके उन्होंने 1870 में एक संस्था “सार्वजनिक सभा” का गठन किया और इस संस्था का पूरे महाराष्ट्र क्षेत्र में विस्तार किया । इस संस्था का केन्द्र नागपुर को बनाया ।
इस संस्था में संयोजन का दायित्व माधव गोविन्द रानाडे के हाथ में था जो बाद में न्यायधीश भी बने । पर उन्होंने इस संस्था से अपना जुड़ाव न छोड़ा। जोशी जी ने पूना, नागपुर, सतारा और बंबई आदि अनेक स्थानों पर पर इस संस्था के संचालन केन्द्र बनाये और निराश्रित परिवारों को जोड़कर उनसे कुटीर उद्योग स्थापित कराकर स्वदेशी वस्तुओं का उत्पादन आरंभ कराया तथा विक्रय केन्द्र भी स्थापित किये । उनके द्वारा स्थापित इन कुटीर उद्योगों और उनके विक्रय केन्द्र में हाथ करघा और चरखे द्वारा कपड़ा और इस कपड़े से बने विभिन्न वस्त्र होते थे । काका ने अपना जीवन समाज सेवा के माध्यम से राष्ट्र को समर्पित कर दिया। उनकी बेटी गोपाल कृष्ण गोखले को ब्याही थी । जोशी जी की इस बेटी ने अपने पिता की प्रेरणा से माधव रानाडे की पत्नि रामाबाई रानाडे के साथ महिलाओं में जाग्रति और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्त्री “विचारवती सभा” ​​नामक संगठन का गठन किया ।
इस संस्था को भी कुटीर उद्योग से जोड़ा । जोशी जी इतने लोकप्रिय हुये कि सब उन्हें काका साहब कहते थे । इस प्रकार जोशी जी, उनका पूरा परिवार और उनके द्वारा जोड़ी गई युवाओं की टोली पूरी तरह स्वदेशी जागरण अभियान के लिये समर्पित थी । काका साहब जोशी जी अपने अभियान के लिये कितने समर्पित थे इसका उदाहरण 1877 के दिल्ली दरबार में देखने को मिला । वे उस दरवार में पूर्ण स्वदेशी निर्मित खादी के वस्त्र पहनकर पहुँचे और एक प्रश्न पूछकर सबका ध्यान अपने वस्त्रों की ओर आकर्षित किया । भारत में भारतीयों के लिये नागरिक सम्मान की सबसे पहले ध्यान आकर्षित करने वाले गणेश वासुदेव जोशी ही थे । उन्होंने बहुत विनम्रतापूर्वक कहा था – “महामहिम महारानी जी भारतीय प्रजा को वही राजनीतिक और सामाजिक दर्जा प्रदान करें जो उसकी ब्रिटिश प्रजा को प्राप्त है”।
यह कहा जा सकता है कि स्वतंत्र भारत के लिए जो अहिसंक और वैचारिक अभियान चला उसकी औपचारिक रूप से शुरूआत यही घटना थी । तब भारत में वायसराय लिटन हुआ करते थे । वे सतत अपने अभियान के प्रति समर्पित रहे । कभी न रुके और न कभी अवकाश लिया
25 जुलाई 1880 को हृदय रोग के कारण उन्होंने संसार से विदा ले ली । किन्तु भारत को स्वतंत्रता के लिये एक अहिसंक अभियान चलाने का सूत्र दे गये ।
बाद में स्वतंत्रता आंदोलन में स्वदेशी और खादी का जो अभियान चला उसका सूत्र यही आंदोलन था । आगे चलकर तिलक जी भी इसी संस्था से जुड़े । इस संस्था से संबंध गोपाल कृष्ण गोखले और तिलक जी ने ही गाँधी जी को खादी वस्त्र अभियान से अवगत कराया । जिसे गाँधी जी ने अपने स्वदेशी अभियान में जोड़ा । गाँधी जी गोपाल कृष्ण गोखले को अपना गुरुवत् मानते थे ।

अराजकतावादी इकोसिस्टम के निशाने पर क्यों हैं सोनम वांगचुक? पूरी पड़ताल…

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—कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

रायपुर : नीट पेपर लीक मामले में सोनम वांगचुक ने जबसे भूख हड़ताल अनशन तोड़ा है।‌ ठीक उसी समय से कांग्रेस, कम्युनिस्ट, AAP-सपा के पत्रकार-नेता-कार्यकर्ता , FCRA वाले NGO’s गैंग सब दुःखी हैं। सबके खेमे में मातम सा पसरा हुआ है। सोनम वांगचुक के कंधों पर अपनी बंदूक रखकर सियासी रोटियां सेंकने वाले लोग, अब उन्हें गाली दे रहे हैं। उन पर आरोपों की बौछार कर रहे हैं। उन्हें सर्टिफिकेट बांट रहे हैं।

•पंजाब चुनाव के मद्देनजर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में प्रोटेक्ट को लेकर हाईजैक और क्रेडिट की होड़ वाली नूराकुश्ती जारी है। सिर फुटौव्वल मचा हुआ है। इसी को कहते हैं प्रोफेशनल हिप्पोक्रेसी।

•लेकिन सोनम वांगचुक से अब कांग्रेसी, आपिए, सपाई और कम्युनिस्ट क्यों दुःखी हैं? सोनम वांगचुक को केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने जो भगवा पटका पहनाया, उससे क्यों दुःखी हैं? ये सब सोनम वांगचुक के अनशन तोड़ने से क्यों परेशान हैं?

उसके लिए एक सत्य कहानी जान लीजिए। यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि इस कहानी की सोनम वांगचुक से तुलना नहीं की जा रही है। सिर्फ़ ये उस इकोसिस्टम के पैटर्न को समझने के लिए बताई जा रही है। जो अपनी ज़िद के लिए किसी की भी जान लेने से पीछे नहीं हटता है।

कहानी यूं है —

गद्दार कम्युनिस्ट और उनको बैकिंग देने वाले राजनीतिक दल, नेता और संगठन हमेशा लाशों, रक्तपात-हिंसा के ज़रिए सत्ता तक पहुंचने की रणनीति पर काम करते हैं। कम्युनिस्ट जिन्हें भी अपना टारगेट सेट करते हैं, उनका ‘ज़िंदा और मुर्दा’ दोनों ढंग से इस्तेमाल करने और माइलेज लेने में पीछे नहीं रहते। कैसे अर्बन नक्सली अपना टारगेट फिक्स्ड करते हैं? उसे चारा-पानी देते हैं। फिर अपनी रणनीति के मुताबिक़ उसका इस्तेमाल करते हैं।

√ अगर उनका टूल-उनके एजेंडे में फिट नहीं बैठता है तो वो कैसे उसकी क्रेडिबिलिटी पर अटैक करते हैं। इस पैटर्न को समझिए।

•छत्तीसगढ़ के पूवर्ती गांव में नक्सलवाद-माओवादी आतंक के प्रकोप के बीच जनजातीय समाज के घर सालों पहले एक बालक पैदा हुआ। उसका नाम रखा गया माडवी हिड़मा। वो जैसे बड़ा हुआ, बालिग अवस्था में आया। माओवादियों ने उसे टारगेट फिक्स्ड किया और फिर क्या था? उसे नक्सली बना दिया गया।

• वो बच्चा जो—

अपने माता-पिता की आंखों का तारा होना चाहिए था। वो जवानों, मासूम लोगों की ह-त्या करने का कुख्यात चेहरा बन गया। उस खूं’खार माओवादी आ-तंकी पर पर 6 राज्यों ने तक़रीबन 1.80 करोड़ का ईनाम रखा था।18 नवंबर 2025 को लाल आतंक के पर्याय हिड़मा मारा गया।

— किन्तु इसके पहले छत्तीसगढ़ के डिप्टी सीएम विजय शर्मा उसके गांव गए। हिड़मा की माँ से मिले। भावुक अपील कराई कि अगर हिड़मा सरेंडर कर दे तो उसका पुनर्वास कराया जाएगा।

— लेकिन अर्बन नक्सलियों ने हिड़मा को जानबूझकर सरेंडर नहीं करने दिया। अंततोगत्वा एक मुठभेड़ में सैकड़ों लोगों का ह-त्यारा हिड़मा मारा गया। छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने संवेदनशीलता दिखलाई। हिड़मा के शव को अंतिम संस्कार के लिए उसके गांव भेजा।

— फिर क्या था?

पूरे अर्बन नक्सलियों के गिरोह के चेहरों में चमक आ गई। पूवर्ती में कैमरे, कलम, की-बोर्ड अपना काम करने लगे। ग्राउंड पर कुछ अर्बन नक्सली घड़ियाली आंसू बहाने लगे। माओवादी आ-तंक के पर्याय हिड़मा का ग्लैमराइजेशन शुरू हो गया। उसे पीड़ित,दमित बताया जाने लगा। अब हिड़मा को हीरो के तौर पर पूरे समाज में स्थापित करने की मुहिम शुरू हुई। इकोसिस्टम के किसी नेता ने संसद में कन्वर्जन के विरोधी धर्मरक्षक भगवान बिरसा मुंडा से हिड़मा की तुलना करने का अक्षम्य अपराध किया। वो इसलिए ताकि हमारा जनजातीय समाज — उद्वेलित रहे, हिंसा के रास्ते को Recall करता रहे। क्योंकि हम जैसे आदर्श चुनते हैं, हम वैसे ही बनते हैं।

— सोचिए अगर अर्बन नक्सलियों ने हिड़मा को सरेंडर करने दिया होता तो वो जवानों के हाथों नहीं मारा जाता। फिर क्या होता? हिड़मा – माओवादी आ-तंक फैलाने वाले अर्बन नक्सलियों के लिए स्थायी खाद-बीज न बन पाता। सो, इन सबने हिड़मा को सरेंडर नहीं करने दिया, उसे मरने के लिए मजबूर किया। शायद आपको इससे इस इकोसिस्टम के बारे में समझ आया होगा कि — ये समाज को हिंसा, अराजकता की आग में झोंकता है? इसका ये पैटर्न समझ आया?

—— अब पुनश्च आइए सोनम वांगचुक पर…

इन्होंने सबसे पहले एक ऐसे चेहरे को चुना समाज में जिसकी छवि को लेकर स्वीकार्यता हो। सोनम वांगचुक इसके लिए परफेक्ट चेहरे मिले। उन्होंने 28 जून 2026 को जंतर-मंतर में भूख हड़ताल शुरू की। और इधर इनके सियासी नफ़ा नुकसान के कैलकुलेशन शुरू हो गए।

— ये सब नहीं चाहते थे कि सोनम वांगचुक अपनी भूख हड़ताल तोड़ें। क्योंकि इनमें से कोई भी भूख हड़ताल नहीं कर रहा था।सबकी पिज्जा, बर्गर और नॉनवेज पार्टियों के वीडियो सबने देखे ही हैं। इसी के चलते सोनम वांगचुक को ये तक कहना पड़ गया था कि—“आप लोग यहां आकर ठूंस-ठूंस कर खा रहे हैं, मुझे यह देखकर बहुत दुख होता है।”

—• सो इकोसिस्टम ने ये तय किया कि – सोनम वांगचुक को भूख हड़ताल करने दीजिए। उनकी हालत नाज़ुक होने दीजिए। ताकि अगर उन्हें धोखे से कुछ हो जाए तो समाज में उस सहानुभूति, आक्रोश के ज़रिए ये अपना उल्लू सीधा कर सकें। देश को हिंसा, अराजकता, उपद्रव की आग में झोंक सकें।

•जैसा इनके समूह ने मूल‌ मुद्दे को पहले किनारे कूड़ेदान में फेंका। फिर 20 जुलाई 2026 को पुलिस की बिना अनुमति के ‘चलो संसद मार्च’ के ज़रिए व्यापक हिंसा को रणनीतिक हथियार बनाया। हिंसा, Moblinching करने ,
हिंदुत्व के ख़िलाफ़ विष-वमन, भारत के इ-स्लामीकरण के नारे, अश्लीलता, गालीबाजी फैलाने के संगठित प्रयास किए। जोकि अब भी जारी है।

— यानी ये पूरा इकोसिस्टम सोनम वांगचुक को शहीद बनाकर, उनके नाम पर राजनीतिक हिंसा और सत्ता का खेल खेलना चाहता था। जिस पर सोनम वांगचुक ने पानी फेर दिया। सरकार ने सोनम वांगचुक को पहले सफदरजंग अस्पताल इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट की निगरानी में गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में उन्हें भर्उती कराकर उपचार दिलाया। केन्द्रीय मंत्री जेपी नड्डा, जितेन्द्र सिंह ने प्रॉपर दो बार मुलाक़ात की। उन्हें वाजिब मांगों के लिए आश्वस्त किया। अंततोगत्वा सोनम वांगचुक ने अपना 23 जुलाई 2026 को अनशन तोड़ दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र
मोदी ने X पर लिखा भी —“मैं सोनम जी से आग्रह करता हूँ की वो डॉक्टरों की सलाह के अनुसार अपनी दिनचर्या रखें और जल्द से जल्द अपना पुराना वज़न फिर से प्राप्त करें।मैं प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि सोनम जी स्वस्थ रहें।”

इधर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी सख्त एक्शन को लेकर 23 जुलाई 2026 को रात्रि 12 बजे सोशल मीडिया में वीडियो जारी किया। पूर्व में ही गिरफ्तार सभी 13 आरोपियों के ख़िलाफ़ त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन को लेकर आश्वस्त किया। कोर्ट का गठन भी हुआ। शिक्षा, युवाओं के भविष्य को लेकर सरकार के कार्यों और प्रतिबद्धता की जानकारी दी। 24 जुलाई 2026 को शिक्षा मंत्रालय के सचिव हटाए गए। NTA के 47 अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया गया। दोषी अधिकारियों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने की बात कही गई। मोदी कैबिनेट ने पेपर लीक को रोकने से जुड़े एक सख़्त बिल को मंजूरी दी। जो कि संसद सत्र में पेश होकर पारित हो जाएगा। सरकार NEET समेत पेपर लीक से जुड़े मामलों में संसद में चर्चा भी करा रही है।

— अब क्या हुआ? सोनम वांगचुक ने जैसे ही 23 जुलाई 2026 को मेदांता अस्पताल में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेन्द्र सिंह के हाथों अनशन तोड़ा, भगवा पटका पहना। देश में हिंसा, उपद्रव फैलाने वाले अराजकतावादियों के
सपने ढहने शुरू हो गए। इसीलिए कांग्रेस, आप, सपा और ढफली गैंग का AISA, SFI, ASIF ये पूरा इकोसिस्टम सोनम वांगचुक को अपराधी बताने, गाली देने और उन्हें सर्टिफिकेट देने में जुट गया। इकोसिस्टम की ओर से उनकी पत्नी डॉ गीतांजलि जे आंग्मो की हैसियत पूछी जाने लगी। उन पर ये आरोप लगाए जाने लगे कि- सोनम वांगचुक ने राहुल गांधी का नुक़सान करने के लिए अनशन तोड़ दिया है। हिंसात्मक प्रोटेस्ट को जारी रखने के लिए यूथ को प्रोवोक किया जाने लगा। जो राहुल गांधी कहीं नहीं दिख रहे थे वो पूरा प्रोटेस्ट हाईजैक करने लगे? वामपंथी पत्रकार सौरभ दास, AAP के प्रवक्ता रहे आशुतोष रंका, AAP के सोशल मीडिया हैंडलर, स्ट्रेटजिस्ट रहे – अभिजीत दीपके के चेहरे मलिन होने लगे। ये सब डायरेक्ट और इन डायरेक्ट सोनम वांगचुक पर सवाल खड़े करने लगे। उन पर ये आरोप लगाने लगे कि- आपने केंद्रीय मंत्रियों के हाथों जूस पीकर अनशन क्यों तोड़ा? ऐसे ढेर सारे सवाल उन पर अराजकतावादी इकोसिस्टम दागने लगा।

अपने ऊपर हो रहे इन्हीं हमलों के चलते सोनम वांगचुक ने एक वीडियो शेयर करते हुए कहा कि—“अभी जो मैं वीडियो बना रहा हूं वो थोड़ा हैरान, गम और गुस्से के साथ बना रहा हूं। मेरा वजन 11 किलो कम हो गया। लद्दाख के कड़कती ठंड से दिल्ली की तपती धूप में बैठकर ये सब करने के बाद क्या मुझे किसी के कैरेक्टर सर्टिफिकेट लेनी होगी कि मेरा अनशन कितना पवित्र था?”

इतना ही नहीं आगे सोनम वांगचुक ने अराजकता फैलाने वाले इकोसिस्टम को लताड़ लगाते हुए कहा कि— “अगर मुझे सौदा करना होता तो क्या 26 दिन भूखे रहता। कितनों ने डील किया है। क्या वो इस तरह से डील करते हैं। आलीशान कमरे में बैठकर डील होती है।धिक्कार है ऐसे देश पर जहां ऐसे दिमागों की उपज होती है जिसमें से ऐसे नीच ख्याल निकलते हैं।”

यानी सोचिए कि जिस प्रोटेस्ट को सोनम वांगचुक की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के कारण पहचान मिली। अब इस प्रोटेस्ट में शामिल राजनीतिक और अराजकतावादी मानसिकता के लोग बौखला गए हैं? ये उन्हीं सोनम वांगचुक को कठघरे में खड़े कर रहे हैं, जिन्होंने इन्हें पहचान दी?‌ इनकी ज़मीन तैयार की। ये इसलिए हो रहा है क्योंकि सोनम वांगचुक ने आखिर शिक्षा के सुधार के मुद्दे पर सरकार से सहमति क्यों जताई? ये इकोसिस्टम इसलिए भी बौखलाया है क्योंकि
सोनम वांगचुक ने एजुकेशन के मूल मुद्दे को सरकार के सामने क्यों एड्रेस किया? क्योंकि इनकी अराजकता फैलाने की मंशा पर पानी फेर दिया। इनके राजनीति हित कमजोर होते दिख रहे हैं।

इन सब बातों का अर्थ ये है कि—सोनम वांगचुक को ये इकोसिस्टम केवल अपने राजनीतिक हित साधने, खोई हुई ज़मीन तलाशने, हिन्दुत्व विरोध-मोदी विरोध के टूल के तौर पर इस्तेमाल करना चाहता था। ऐसे में ये अराजकतावादी इकोसिस्टम सोनम वांगचुक को शहीद बना देना चाहता, जो हो नहीं पाया। ये मौत के सौदागर हैं, जो ये कर नहीं पाए।
ऐसे में अब इनके पास हिंसा, उपद्रव, अश्लीलता, गालीबाजी, हिंदू द्रोह के अलावा कुछ बचा नहीं है। सो, अब खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की तर्ज़ पर अब ये सोनम वांगचुक पर अटैक कर रहे हैं। क्योंकि इस प्रहसन की किरदारों के पास शिक्षा, यूथ के लिए कुछ सकारात्मक करने की कोई सोच नहीं है।अब जब सुधार के सारे काम सरकार कर रही है, लगातार संवाद कर रही है।जो 20 मासूम बच्चों नहीं रह गए, उनके परिवार के साथ सरकार खड़ी है।

ऐसे में अराजकतावादी इकोसिस्टम ने जिस मूल मंशा से बाज़ार खड़ा किया है। वो फीका पड़ रहा है। क्योंकि जंतर-मंतर में लगातार हो रहे हिंदू आस्था के अपमान, हिंसा, उपद्रव, महिलाओं , पुलिस और पत्रकारों की Moblinching, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर अभद्रता, गालीबाज, अश्लीलता के चलते जनमानस की संवेदनाएं इनसे हट चुकी हैं।‌सबने इनके असली चेहरों को देख लिया है। इस अराजकतावादी इकोसिस्टम के पास अब छटपटाने के अलावा कुछ भी बचता नज़र नहीं आ रहा है।अब चारों ओर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और लेफ्ट पार्टियों, ढफली गैंग में हिस्सेदारी को लेकर जंग छिड़ी है। ऐसे में किसी न किसी तरीके से इस प्रहसन को खींचने की पूरी तैयारी है। क्योंकि सोनम वांगचुक का साथ छूटते ही इनका प्रोटेस्ट केवल प्रोटेस्ट के लिए बच चुका है। आम लोगों में और युवाओं, स्टूडेंट्स में जो भी सहानुभूति थी — वो सोनम वांगचुक के लिए देखने को मिली। ऐसे में जब ये अराजकतावादी इकोसिस्टम सोनम वांगचुक का सगा नहीं हुआ तो किसका सगा होगा? ये इकोसिस्टम ज़िंदा और मुर्दा दोनों परिस्थितियों में सिर्फ़ अपना शिकार ढूंढता है।इसे देश और समाज से कोई मतलब नहीं होता है। ये हम आप जितना जल्दी जान और समझ लें। ये उतना हमारे, समाज और राष्ट्र के लिए हितकारी होगा। अन्यथा हम आप केवल ट्रैप का शिकार होते रहेंगे।

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