असम में भूमि आंदोलन पर कार्रवाई की गूंज दुनिया तक

images-5-1.jpeg

नव ठाकुरीया

गुवाहाटी। असम में काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के निकट प्रस्तावित पर्यटन परियोजना का विरोध कर रहे भूमि अधिकार कार्यकर्ता प्रणब डोले की गिरफ्तारी ने स्थानीय विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है। दुनिया के कई मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े विशेषज्ञों ने डोले की गिरफ्तारी पर चिंता व्यक्त करते हुए उनकी तत्काल और बिना शर्त रिहाई की मांग की है। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण विरोध और आदिवासी समुदायों के भूमि अधिकारों की पैरवी करने वालों के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।

विवाद की शुरुआत तब हुई, जब असम सरकार ने UNESCO विश्व धरोहर स्थल काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के निकट इंगले पाथर क्षेत्र में लगभग 30 बीघा भूमि असम पर्यटन विकास निगम (ATDC) को आवंटित की। इस भूमि पर सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत एक लग्ज़री होटल और चाय बागान समुदाय की विरासत पर आधारित संग्रहालय विकसित करने की योजना है। सरकार का तर्क है कि इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे। दूसरी ओर, स्थानीय निवासियों और भूमि अधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि भूमि का वर्गीकरण बिना पर्याप्त जनपरामर्श के बदला गया, जबकि कई परिवार पीढ़ियों से उस क्षेत्र में खेती करते आ रहे हैं। उनका दावा है कि हाल के वर्षों में 60 बीघा से अधिक कृषि और सामुदायिक चरागाह भूमि का स्वरूप बदला गया है।

मिसिंग समुदाय से आने वाले सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता प्रणब डोले लंबे समय से प्रस्तावित हयात होटल परियोजना का विरोध कर रहे हैं। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) से स्नातकोत्तर डोले का कहना है कि यह परियोजना स्थानीय समुदायों के पर्यावरण, आजीविका और पारंपरिक अधिकारों को प्रभावित करेगी। उन्हें 12 जुलाई को गुवाहाटी के सुंदरपुर स्थित किराये के घर से हिरासत में लिया गया और बाद में बोकाखाट पुलिस को सौंप दिया गया। उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया, जिनमें आपराधिक साजिश, गैरकानूनी जमावड़ा, दंगा, सरकारी कर्मचारियों पर हमला और धमकी जैसे आरोप शामिल हैं। अगले दिन उन्हें औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया गया।
पुलिस का आरोप है कि 29 जून को इंगले पाथर में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान डोले प्रमुख आयोजकों में शामिल थे। शिकायत के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान निर्माण स्थल पर पहुंची भीड़ ने संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, कर्मचारियों को धमकाया और झड़प में दस से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए। डोले के साथ उनके दो सहयोगी अमित नाग और ब्रिजित कुतुम को भी गिरफ्तार किया गया, जबकि भास्कर सैकिया और राजीव पेगू ने स्थानीय अदालत में आत्मसमर्पण किया। अदालत के आदेश के बाद सभी पुलिस हिरासत में हैं।

भूमि विवाद अब न्यायालय तक पहुंच चुका है। कई किसान परिवारों ने मुआवजा स्वीकार कर लिया है, लेकिन कुछ अब भी अपनी जमीन पर दावा कर रहे हैं। कम से कम 12 याचिकाकर्ताओं ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि बिना पूर्व सूचना उनकी भूमि अधिग्रहित कर ली गई। जून में उच्च न्यायालय ने इस मामले में असम पर्यटन विकास निगम को नोटिस जारी किया था। इसी दौरान डोले और अन्य लोगों की गिरफ्तारी का असम नागरिक सम्मेलन, असम मजूरी श्रमिक यूनियन, भूमि अधिकार आंदोलन और ऑल इंडिया किसान मजदूर सभा सहित अनेक संगठनों ने विरोध किया।

इस मामले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तीखी प्रतिक्रिया उत्पन्न की। लंदन स्थित सर्वाइवल इंटरनेशनल ने कहा कि प्रस्तावित फाइव-स्टार होटल परियोजना से 45 से अधिक आदिवासी परिवार प्रभावित हुए हैं। संगठन की निदेशक कैरोलिन पियर्स ने आरोप लगाया कि काजीरंगा के आसपास की भूमि को निजी पर्यटन परियोजनाओं के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है और संरक्षण तथा पर्यटन को आदिवासी समुदायों के मौलिक अधिकारों से ऊपर रखा जा रहा है। उन्होंने डोले सहित सभी गिरफ्तार लोगों की तत्काल रिहाई की मांग की।

कोपेनहेगन स्थित इंटरनेशनल वर्क ग्रुप फॉर इंडिजिनस अफेयर्स (IWGIA) ने भी गिरफ्तारी की निंदा करते हुए कहा कि यह मानवाधिकारों की पैरवी और शांतिपूर्ण विरोध को दबाने का प्रयास प्रतीत होता है। फिलीपींस स्थित इंडिजिनस पीपल्स राइट्स इंटरनेशनल ने इसे आदिवासी भूमि अधिकारों के लिए आवाज उठाने वालों को अपराधी ठहराने की व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा बताया।

अमेरिका के एरिजोना स्थित इंडिजिनस पीपल्स लॉ एंड पॉलिसी प्रोग्राम की इंडिजिनस राइट्स एंड प्रोटेक्टेड एरियाज़ इनिशिएटिव ने केंद्र और असम सरकार से डोले के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा उन्हें कानूनी सहायता, परिवार और स्वतंत्र चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने की अपील की।

इसी तरह थाईलैंड स्थित एशिया इंडिजिनस पीपल्स पैक्ट, इंडिजिनस पीपल्स ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स नेटवर्क और प्लेटफ़ॉर्म फॉर एशिया इंडिजिनस पीपल्स टेरिटोरियल राइट्स ने भी गिरफ्तारी की आलोचना करते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदकों से मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया।

हाल ही में जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र के व्यवसाय और मानवाधिकार कार्य समूह ने भी डोले और चार अन्य लोगों की गिरफ्तारी पर चिंता जताई। विशेषज्ञों ने कहा कि इस प्रकार की गिरफ्तारियां नागरिक समाज की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती हैं और मानवाधिकार रक्षकों में भय का वातावरण पैदा कर सकती हैं। उन्होंने सरकारों से यह सुनिश्चित करने की अपील की कि मानवाधिकार रक्षक बिना प्रतिशोध या आपराधिक कार्रवाई के डर के अपना कार्य कर सकें।

राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे ने असम की राजनीति में हलचल पैदा की। असम कांग्रेस अध्यक्ष और लोकसभा में विपक्ष के उपनेता गौरव गोगोई ने राज्य सरकार पर लोकतांत्रिक असहमति को दबाने के लिए पुलिस का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। विधायक अखिल गोगोई ने भी विधानसभा परिसर में प्रदर्शन कर आदिवासी समुदायों की भूमि से जुड़े मुद्दे को उठाया और सरकार की कार्रवाई की आलोचना की।

हालांकि, असम सरकार अपने फैसले का बचाव कर रही है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का कहना है कि प्रस्तावित पर्यटन परियोजना से स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ निहित स्वार्थ परियोजना का विरोध कर रहे हैं। स्थानीय विधायक एवं मंत्री अतुल बोरा ने भी कहा कि संबंधित भूमि सरकारी है और चाय बागान समुदाय की विरासत को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के उद्देश्य से संग्रहालय विकसित किया जा रहा है। उनके अनुसार, इस पहल को स्थानीय लोगों का व्यापक समर्थन प्राप्त है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

नागा पहाड़ियों में विकास परियोजनाएं और अवैध खनन: असम की बाढ़ त्रासदी का कारण !

naga-hills-mining-development-assam-flood-crisis.jpg
नव ठाकुरीया
गुवाहाटी। पड़ोसी राज्य नागालैंड में हुई ज़बरदस्त बारिश ने असम के निचले इलाकों में कई दिनों तक भीषण बाढ़ की स्थिति पैदा कर दी। नागालैंड में कई वर्षों से चल रही विकास गतिविधियों के कारण वहां का पर्यावरण असंतुलित हो रहा है। इस बाढ़ के लिए केवल मॉनसून की भारी बारिश ही ज़िम्मेदार नहीं है, बल्कि नागा पहाड़ियों में कानूनी और अवैध कोयला खनन के कारण बड़े पैमाने पर हुई पेड़ों की कटाई भी एक बड़ी वजह है। इस कटाई ने पूर्वी असम की नदियों के जल-प्रवाह तंत्र (हाइड्रोलॉजी) को चुपचाप बदल दिया है। कभी घने जंगलों से आच्छादित और वर्षा जल को सोखने वाली स्थिर पारिस्थितिकी वाले नागा क्षेत्र धीरे-धीरे बंजर भूमि में बदल गए हैं। ये भूमि अब अधिक समय तक वर्षा का पानी नहीं रोक पाती, जिससे कीचड़युक्त पानी तेज़ी से बहकर असम की घाटियों में पहुंच जाता है। इसी का परिणाम है कि असम के मुख्यतः पूर्वी जिलों में बाढ़ की वर्तमान लहर आई है।
इस ताज़ा बाढ़ में शनिवार तक कम से कम 61 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें कुछ बच्चे भी शामिल हैं, जबकि कई लोग अब भी लापता हैं। असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (ASDMA) के अनुसार, इस बाढ़ से सबसे अधिक प्रभावित जिला शिवसागर रहा, इसके बाद चराइदेव, जोरहाट, गोलाघाट, डिब्रूगढ़, तिनसुकिया, होजई, नगांव, कार्बी आंगलोंग, विश्वनाथ, धेमाजी, कामरूप तथा कामरूप (मेट्रोपॉलिटन) जिले प्रभावित हुए। बाढ़ ने लगभग 935 गांवों में करीब 7.45 लाख लोगों को प्रभावित किया। इसमें लगभग 50,000 हेक्टेयर कृषि भूमि को नुकसान पहुंचा और 1.25 लाख से अधिक पालतू पशु (मुर्गी पालन के पक्षियों सहित) बह गए। संबंधित प्रशासन द्वारा कम से कम 250 बाढ़ राहत शिविर तथा अनेक राहत वितरण केंद्र स्थापित किए गए हैं।
राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF), राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF), सेना और वायु सेना के जवान स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों तथा स्वयंसेवकों के साथ मिलकर चौबीसों घंटे बचाव और राहत कार्य में जुटे हुए हैं। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने विशेष रूप से राज्य के मंत्रियों—बिमल बोरा, सुशांत बोरगोहेन, पीयूष हजारिका, केशव महंता और अजंता नियोग—को ज़मीनी स्तर पर इन अभियानों की निगरानी करने का निर्देश दिया है। हालांकि, हज़ारों प्रभावित परिवार अब भी पेयजल और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी आवश्यक राहत सुविधाओं से वंचित हैं, क्योंकि बड़ी संख्या में तटबंधों, सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचों को भारी क्षति पहुंची है।
18 से 20 जुलाई के बीच नागालैंड और असम में लगातार भारी बारिश हुई, जबकि नागालैंड के मोन, मोकोकचुंग, लोंगलेंग और वोखा जिलों से वर्षा का पानी भारी मात्रा में मलबे के साथ बहकर नीचे आया। मोन जिले में 137 मिमी तक वर्षा दर्ज की गई और सोमवार को भूस्खलन में नौ लोगों की मौत हो गई। नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बाढ़ की स्थिति का जायजा लिया और पीड़ित परिवारों के लिए 70 लाख रुपये की अनुग्रह राशि जारी की। नागा पहाड़ियों से निकलने वाली अनेक नदियों के कारण असम के आसपास के गांवों में अभूतपूर्व बाढ़ आ गई। इसके बाद नागालैंड में NEEPCO द्वारा संचालित डोयांग जलविद्युत परियोजना से पानी छोड़े जाने से निचले इलाकों में स्थिति और अधिक गंभीर हो गई।
शुरुआत में यह माना गया था कि नागालैंड के पहाड़ी इलाकों में बादल फटने से असम के मैदानी क्षेत्रों में तबाही मची, लेकिन भारतीय मौसम विभाग ने ऐसी खबरों का खंडन किया।
अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह घटना बादल फटने की श्रेणी में नहीं आती, जिसके लिए किसी छोटे भौगोलिक क्षेत्र में एक घंटे के भीतर कम से कम 100 मिलीमीटर वर्षा दर्ज होना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि उन दिनों नागालैंड और असम में दैनिक वर्षा की मात्रा इस सीमा से कम थी। असम की जीवनरेखा, विशाल ब्रह्मपुत्र नदी, कई स्थानों पर खतरे के निशान से ऊपर बह रही है, जबकि इसकी प्रमुख सहायक नदियां—बुढ़ी दिहिंग, दिसांग, दिखौ, डोरिका, धनसिरी, भोगदोई और कुशियारा आदि—भी विभिन्न स्थानों पर उफान पर हैं।
असम के राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य ने राज्यभर में बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए चल रहे राहत कार्यों का जायजा लेने के लिए लोक भवन में इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी (IRCS) की असम इकाई के पदाधिकारियों के साथ एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की। सशक्त और सक्रिय प्रतिक्रिया की आवश्यकता पर बल देते हुए राज्यपाल आचार्य ने संबंधित पक्षों से अपने आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र को और प्रभावी बनाने का आग्रह किया। साथ ही, उन्होंने बाढ़ के बाद जलजनित तथा मच्छरों एवं अन्य कीटों से फैलने वाली बीमारियों के संभावित प्रकोप से निपटने के लिए एहतियाती उपाय अपनाने पर भी ज़ोर दिया।
केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने पूर्वी असम में बाढ़ की गंभीर स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की और राज्य सरकार को हरसंभव सहायता का आश्वासन दिया। उन्होंने बताया कि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में असम की बाढ़ की स्थिति पर विस्तार से चर्चा की गई थी। सोनोवाल ने कहा कि केंद्र और असम सरकार स्थिति से निपटने के लिए निकट समन्वय बनाए हुए हैं। असम के पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि कृषि भूमि, पशुधन और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा है। उन्होंने दोहराया कि केंद्र सरकार असम के बाढ़ प्रभावित लोगों के राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण के लिए हरसंभव सहायता देती रहेगी।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी मुख्यमंत्री सरमा को फोन कर नई दिल्ली से हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया। उन्होंने यह भी बताया कि नुकसान का आकलन करने तथा आजीविका की पुनर्बहाली के लिए आवश्यक केंद्रीय सहायता निर्धारित करने के उद्देश्य से एक अंतर-मंत्रालयी केंद्रीय टीम असम का दौरा करेगी। इस बीच, मुख्यमंत्री सरमा ने संकट से निपटने के लिए चल रहे कार्यों की समीक्षा करने हेतु जिला आयुक्तों और अन्य संबंधित सरकारी अधिकारियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस की। इससे पहले उन्होंने चराइदेव, शिवसागर और जोरहाट जिलों के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर प्रभावित परिवारों से बातचीत की। असम सरकार ने बाढ़ में अपने परिजनों को खोने वाले प्रत्येक परिवार को चार-चार लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा पहले ही कर दी है।
हालांकि, असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई ने सरकार की अपर्याप्त प्रतिक्रिया की आलोचना करते हुए कहा कि पड़ोसी पूर्वोत्तर राज्यों के साथ उसका समन्वय बेहद कमजोर रहा है। बाढ़ प्रभावित अनेक क्षेत्रों का दौरा करते हुए जोरहाट के सांसद ने अधिकारियों से राहत और पुनर्वास कार्यों में तेजी लाने का आग्रह किया। असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के पुत्र ने दिसपुर में मौजूदा सरकार पर सड़कों और फ्लाईओवर के निर्माण को प्राथमिकता देने, लेकिन जल निकासी और बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रमों पर पर्याप्त ध्यान न देने का आरोप लगाया। शिवसागर के विधायक अखिल गोगोई ने भी बाढ़ प्रभावित अनेक क्षेत्रों का दौरा करने के बाद सरकार से आपदा तैयारियों को और मजबूत करने की मांग की। उन्होंने यह भी दावा किया कि नागालैंड में बेतरतीब निर्माण गतिविधियों, अनियंत्रित खनन और जंगलों के विनाश ने असम में बाढ़ की स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरणीय विषयों के विश्लेषक)

सनातन धर्म के सबसे महान लड़ाका 

hindu-religion.jpg.webp
देवाशु झा
दिल्ली । कुछ लोगों को तगड़ा भ्रम है कि वे सनातन धर्म के सबसे महान लड़ाका हैं। उनसे बड़ा राष्ट्रवादी और देशभक्त कोई नहीं है। उन्हें बड़ी विनम्रता से याद दिलाना चाहता हूॅं कि इसी देश में 2014 से पहले यह हिन्दू जाति घुटनों पर थी। भिखमंगों जैसी हालत थी। पाकिस्तानी पिल्ले खखोरते काटते रहते थे। एक व्यक्ति अकेले अपने बूते इस मरे हुए समाज को नया जीवन दे रहा है। वह आप से कम देशभक्त और छोटा राष्ट्रवादी नहीं है? आप से लाख गुणा अधिक ताप झेलता है, तिकड़में काटता है, सुनिश्चित करना चाहता है कि यह देश आगे बढ़ता रहे।
आप आलोचक बनिए, कटहा कुकुर न बनिए। यह दुरदुराना, गरियाना, उपहास करना बंद कर देंगे तो बेहतर रहेगा। स्वस्थ आलोचना का सदैव स्वागत है। यह घड़ी-घड़ी जो उछल कर हुंकारते फिरते हैं ना कि मैं हूॅं महान सनातनी!-वह हास्यास्पद और दयनीय लगता है। आप से लाखों-लाख गुणा अधिक कष्ट ताप सहते हुए, दुर्धर्ष चुनौतियां झेलते हुए उन्होंने इस देश को जागृत किया है। आपको जितना विश्वास अपने आप पर है, उससे अधिक विश्वास उस व्यक्ति पर होना चाहिए।

अलगाववादियों ने खड़ा किया था कॉकरोच आंदोलन

images-4-1.jpeg

नरेन्द्र कुमार वर्मा

दिल्ली । दिल्ली के जंतर-मंतर पर चलने वाला कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद समाप्त हो गया। इस आंदोलन को देश के जेन जी आंदोलन के नाम पर खड़ा करने का प्रयास किया गया जो कुछ हद तक सफल भी रहा। नरेन्द्र मोदी सरकार के सामने इस आंदोलन ने कई अहम सवाल खड़े करने का काम किया। इन सभी सवालों के जवाब अगर नहीं तलाशे गए तो भविष्य में इससे भी बड़ा आंदोलन पृथकतावादी ताकतें खड़ा कर सकती है।

इस आंदोलन का इंफ्रास्ट्रक्चर इस तरह से तैयार किया गया कि देश की खुफिया एजेंसियों को भी भनक नहीं लगी। नेपाल, बंग्लादेश, श्रीलंका और हांगकांग में युवाओं के प्रदर्शन का विश्लेषण हमारी खुफिया एजेंसियों ने तो नहीं किया। मगर आम आदमी पार्टी ने पडोसी देशों में होने वाले इन आंदोलनों का बहुत गहराई के साथ विश्लेषण किया। आम आदमी पार्टी के कॉडर से जुड़े एंथ्रोपोलॉजिस्टों की टीम ने समाज को भ्रमित करने के लिए बेहद होशियारी के साथ डीएससी फॉर्मेट का इस्तेमाल किया। डीएससी यानि डिस्टर्बेंस (उपद्रव) सेंसिटिविटी (भावुकता) और कन्फ्यूजन (भ्रम) के व्दारा समाज के एक तबके को जंतर मंतर पर जुटाने का काम किया।

यह बात सारा देश जानता था कि कॉकरोच जनता पार्टी के चार प्रमुख चेहरे अभिजित दीपके, सौरभदास, विजेता दहिया और आशुतोष रांका आम आदमी पार्टी की बनाई पिच पर खेल रहे थे। दिलचस्प बात यह है कि देश की खुफिया एजेंसियों के पास इनके इतिहास से जुड़ी कोई जानकारी पूर्व में नहीं थी। इनके आंदोलन के शुरूआती दिनों में जब जंतर-मंतर पर भीड़ नहीं जुट पाई तो सरकार विरोधी रेमन मैग्सेसे पुरस्कार लॉबी सक्रिय हुई। जिसके बाद सोनम वांगचुक को एक डील के तहत अनशन के लिए लाया गया। इसके बाद बॉलीवुड सितारो को उनकी भारी भरकम फीस चुका कर जंतर-मंतर पर लाकर माहौल को तैयार किया गया। इसके बाद भी जब बात नहीं बनी तो एनआरसी और सीएए के विरोधियों को जंतर-मंतर पर पहुंचने को कहा गया।

आंदोलनकारियों ने पूर्व में ही इस बात का अध्ययन कर रखा था कि आंदोलन आरंभ होते ही दिल्ली पुलिस डिजिटल सेंसरशिप लगा देगी। लिहाजा आंदोलनकारियों ने बड़ी संख्या में ऐसे मोबाइल ऐप का इस्तेमाल भीड़ जुटाने के लिए किया गया जो बिना इंटरनेट के आसानी से चलते है। दिल्ली पुलिस की साइबर सेल अब इस बात का विश्लेषण कर रही है कि बड़ी संख्या में ब्रिजफाई, फायरचैट, बिट चैट और ब्रायर जैसे मोबाइल ऐप जंतर मंतर पर कैसे सक्रिय थे।

कॉकरोच जनता पार्टी ने अपने आंदोलन के दौरान 20 हजार से ज्यादा इंस्टाग्राम रिल्स को अपलोड किया। जिन्होंने समाज में एक बड़ा भ्रम फैलाने और सरकार के खिलाफ माहौल खड़ा करने का काम किया। दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान दुनिया का सबसे बड़ा छात्र संगठन कहे जाने वाला अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद इन इंस्टाग्राम रीलों के जवाब में चंद वीडियो भी नहीं बना पाया। दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी की सोशल मीडिया सेल भी पंगु हो गई और हाथ पर हाथ रख कर बैठी रही। मेजदार बात यह है कि बीजेपी की सोशल मीडिया टीम पर प्रति माह करोड़ो रूपया खर्चा होता है।

अब बात करते है इस आंदोलन की रीढ़ कहे जाने वाले जेन जी की। दरअसल 90 के दशक में पश्चिम देशों के कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित समाज शास्त्रियों ने जेन जी वर्ल्ड को इजाद किया। अपने अध्ययन में उन्होंने पाया कि 15 से 25 साल के युवा को रोजगार, शिक्षा, भाषा, खानपान, पहनावा, जीवन जीने के अंदाज और स्वयं फैसले लेने के आधार पर आसानी से भड़काया जा सकता है। उनके गुस्से और मुद्दों को हवा देकर सरकारों के सामने संकट पैदा किया जा सकता है। भारत में 1999 से 2012 के बीच पैदा होने वाले बच्चों को जेन जी के दायरे में रखा गया। दुनिया के कई देशों नें इस पीढ़ी के बाद अब एंथ्रोपोलॉजिस्ट जेन वाई और जेन एक्स की अवधारणा पर भी काम कर रहे हैं।

सीजेपी के आंदोलन में दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट के कुछ छात्र शुरूआत में अवश्य नजर आए। मगर धीरे-धीरे उन्हें समझ में आ गया कि यह आंदोलन नीट के मुद्दे पर है ही नहीं। छात्रों की संख्या घटने के बाद जामिया, जेएनयू के छात्रों ने मोर्चा संभाल लिया। इस दौरान बड़ी संख्या में एनसीआर से छात्र और राजनीतिक दलों के लोग जंतर मंतर पहुंचना शुरू हो गए। 20 जुलाई को सीजेपी के संसद मार्च के आव्हान से पूर्व कई नेताओं ने संसद के भीतर घुसने और पुलिस पर आक्रमण करने के लिए छात्रों का भड़काया। पुलिस के साथ झड़प में घायल छात्रों में कोई भी नीट या अन्य प्रतियोगिता परीक्षाओं का छात्र नहीं है पुलिस इसकी तस्दीर कर चुकी है।

दरअसल सीजेपी के आंदोलन के दो दिन बाद ही कानून व्यवस्था संभालने वाले अधिकारियों को इस बात का भान हो गया था। यह मूवमेंट नीट के लिए नहीं बल्कि सरकार के विरोध के लिए खड़ा किया गया। इस आंदोलन को इस तरह के डिजाइन किया गया कि पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। पहले से ही यह तय था कि पत्रकारों को कौन शिकार बनाएंगा। यूट्यूबर्स को कौन भगाएगा। सोशल मीडिया पर लगातार कितनी पोस्ट की जाएंगी। आंदोलन स्थल पर खान-पान की व्यवस्था को कैसे संभाला जाएगा। भीड़ को कैसे और किस-किस रास्ते से लाया जाएगा। कौन सा ग्रुप सरकार और मोदी विरोधी नारों की अगुवाई करेगा। कौन सा ग्रुप आंदोलन के समर्थक नेताओं को सुरक्षा चेन बना कर मंच तक लाएगा। मोदी विरोधी संगठनों से जुड़े नेताओं को कब-कब मंच पर लाया जाएगा। कौन सा ग्रुप किस तरह के पोस्टर बैनर बनाएंगा और हवा के खिलाफ बात करने वाले पत्रकारों और यूट्यूबर्स के खिलाफ कौन सा ग्रुप आवाज उठाएगा। इस तरह की सभी व्यवस्थाओं को आंदोलन के डिजानर्स ने बड़ी जिम्मेदारी से संभाला।

इस आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहे चार प्रमुख लोग अभिजित दीपके, आशुतोष रांका, सौरभदास और विजेता दहिया सभी विदेशों से पढ़े लिखे है। यह सभी विदेश में ही नौकरी पर थे। सभी आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे हैं। इस आंदोलन में भारत माता की जय, इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए गए और वंदे मातरम से परहेज किया गया। आंदोलन स्थल पर नरेन्द्र मोदी के खिलाफ घन-घोर आपत्तिजनक नारे लगाए गए जिन्हें पहले से ही तैयार करके लाया गया था।

अंत में बात करते है धर्मेन्द्र प्रधान के त्यागपत्र की। सरकार ने धर्मेन्द्र प्रधान का त्यागपत्र इसलिए लिया कि आंदोलनकारी हिंसक न हो जाएं। सरकार को इस बात की जानकारी मिली थी कि अगर कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया तो आंदोलनकारी हिंसक हो उठेंगे। आपको ध्यान होगा कि दिल्ली के जंतर-मंतर के 500 मीटर के दायरे में संसद, मंत्रियों के बंगले, सरकारी दफ्तर, पुलिस थाना और बहुत सारे कॉरपोरेट ऑफिस है।आंदोलनकारियों की मंशा इन्हें निशाना बनाने की थी। आंदोलनकारियों की भीड़ में बड़ी संख्या में वह लोग थे जिन्होंने 2020 में दिल्ली में दंगा कराने का साजिश रची थी। अगर सरकार धर्मेद्र प्रधान का त्यागपत्र नहीं लेती तो आंदोलनकारी किसी भी हद तक जा सकते थे। दुर्भाग्य से अगर ऐसा हो जाता तो नरेन्द्र मोदी की छवि का भारी नुकसान पहुंचता।

scroll to top