हिन्दू राष्ट्र पर श्री अरविन्द के विचार

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प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
दिल्ली । हिन्दू राष्ट्र पर श्री अरविन्द के विचार विस्तार से उनके अनेक निबंधों में दिये है। जिज्ञासुओं को इसके लिए उनके लिखें निबंधों के संकलन ‘‘फाउंडेशन आफ इंडियन कल्चर’ तथा ‘भारत का पुनर्जन्म’ एवं ‘आर्य’ पत्र में लिखें गये अनेक लेखों को स्वयं पढ़ना होगा। हम यहां केवल उसका सार ही दे सकते है अन्यथा इस विषय पर एक स्वतंत्र और नई पुस्तक ही बन जायेगी। एक प्रसिद्ध फ्रेंच लेखक द्वारा ‘भारत का पुनर्जन्म’ पुस्तक लिखित है और हिन्दी में प्रकाशित है तथा लेखक ने प्रकाशन से पूर्व हमारा अभिमत भी उस पुस्तक पर लिया था। नई दिल्ली में हम लोग आदरणीय श्री रामस्वरूप जी के कहने पर कई बार मिले थे।
श्री अरविन्द का कहना है कि ‘‘सनातन धर्म ही हिन्दुत्व है। उसका संबंध केवल भारतीय क्षेत्र से नहीं है अपितु सम्पूर्ण विश्वर और सम्पूर्ण मानव जाति से है। भारत में हजारों वर्षों से उसका पूरी व्यापकता से निरंतर पालन होता रहा है और ऐसा पालन करने वाले को इन दिनों हिन्दू कहा जाता है। परन्तु सत्य यह है कि संसार के किसी भी मनुष्य को सनातन धर्म का निषेध करने का कोई अधिकार नहीं है। क्योंकि सनातन धर्म का अर्थ है सार्वभौम मानव मूल्य – सत्य, अंहिसा, संयम, अस्तेय, अपरिग्रह, आंतरिक और बाहरी पवित्रता, संतोष, श्रेयस्कर जीवन और धर्म के लिए कष्ट सहन (तप), आध्यात्मिक सत्य के प्रतिपादक शास्त्रों का पठन-पाठन और मनन तथा विमर्श एवं सर्वव्यापी परम सत्ता की भक्ति। यह सम्पूर्ण विश्वं के सभी मनुष्यों का कर्तव्य है। इन कर्तव्यों का पालन नहीं करने वाले मनुष्य को दंडित करना राजधर्म है। ऐसे राजधर्म का पालन करने वाला राजा ही सनातन धर्म के पालक हिन्दू समाज का राजा कहा जा सकता है। हिन्दू धर्म का उत्थान ही, भारत का उत्थान है।’’
जहां तक इस्लाम की बात है, श्री अरविंद का स्पष्ट कथन है कि ‘‘इस्लाम का भारत के राष्ट्रीय जीवन में कोई भी श्रेयस्कर योगदान नहीं है। पैगंबर मुहम्मद ने परम सत्ता के समक्ष स्वयं को अर्पित किया, यह संभवतः योग की किसी अरब क्षेत्र में व्याप्त परम्परा का ही अनुसरण था। परन्तु उनके उपदेश केवल रेगिस्तान में रहने वाले घुमंन्तू बद्दुओं के लिए ही थे। शेष विश्वन के लिए उनका कोई उपयोग नहीं है। सभ्य समाज के लिए सुसंस्कृत जीवन और राज्य व्यवस्था का उनके उपदेश में कोई अवसर ही नहीं है। भारत में इस्लाम एक बर्बर और क्रूर व्यवहार की तरह ही देखा गया है। यहां उसका वहीं रूप प्रकट हुआ है। उसका कोई श्रेयस्कर रूप प्रकट होना बाकी है।’’
‘‘सनातन धर्म का प्रतिपादन वेदों में, सनातन के धर्म शास्त्रों में, उपनिषदों में, रामायण और महाभारत में, महान काव्य ग्रंथों और पुराणों में, चित्रकला, मूर्तिकला और साहित्य, संगीत तथा नाट्य में एवं विविध शिल्पों में हुआ है। भारत की सभ्यता का यह स्वरूप निर्विवाद है। वह दैहिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक जीवन की समन्वित एकता है। उसके सभी सिद्धांत, विचार, जीवन रूप और व्यवहार रूप सृष्टि में सामंजस्य को सदा बनाये रखने और गतिशील रखने वाले है। ऐसे सामंजस्य को ही धर्म कहा गया है। अन्य संस्कृतियों में ऐसा सामंजस्य नहीं मिलता। वे अन्य राष्ट्र भी परम शक्ति के ही किसी न किसी रूप की अभिव्यक्ति हैं। परन्तु भारत राष्ट्र की शक्ति है ‘भारत शक्ति’। सनातन धर्म के प्रति निष्ठा ही ‘भारत शक्ति’ की अभिव्यक्ति है। यूरोप ने संघर्ष की जिस भौतिक शक्ति को अर्जित किया है वह उसे एशिया के सभी देशों के लिए आक्रामक बनाता है और उसमें एशिया को जीतने, अधीनस्थ बनाने और निगल लेने या पचा लेने का ही प्रयास किया है। इस प्रकार यूरोप की यह गति सनातन धर्म की विरोधी है। अपनी भौतिकवादिता और हिंसक आक्रामकता में यूरोप ने जीवन का आंतरिक सामंजस्य खो दिया है। भौतिक प्रगति और दक्षता ही उसके आराध्य देवता है जो उसे अन्यों से युद्ध के लिए निरंतर प्रेरित और उत्तेजित करते है। यूरोप ने भारत पर भौतिक विजय प्राप्त कर उस पर अपनी संस्कृति आरोपित करने का निरंतर प्रयास किया है। परन्तु संतोष की बात यही है कि ब्रिटिश शासन ने भारत को उसकी अपनी पहचान बनाये रखने के लिए भी कुछ अनुकूलता पैदा की है। इसका लाभ उठाकर भारत को अपनी धर्म सत्ता और सांस्कृतिक सत्ता पुनः प्रतिष्ठित करनी चाहिए और विजातीय ‘पेनेट्रेशन’ ( बलपूर्ण प्रवेश ) को समाप्त कर देना चाहिए ।’’
कुछ लोग प्रश्ना कर सकते है कि यह तो सुरक्षा और आक्रमण की भावना है। इसमें सामंजस्य और आदान-प्रदान की वृत्ति कहां है? क्या एक विश्वइव्यापी मानव संस्कृति के उभार के लिए काम नहीं करना चाहिए ? परन्तु तर्थ्य यह है कि भारत से जो कुछ छीना गया है, उसे फिर से पाना होगा और आक्रामक सभ्यताओं को रोकना ही होगा। ताकि सनातन धर्म के मूल जीवन रूप अखण्ड और पूर्णतः सुरक्षित रहे। इसमें पहले चरण में टकराव अनिवार्य है। इसके साथ ही यूरोप की अच्छाइयों से प्रतिस्पर्धा भी करनी होगी। यूरोपीय आक्रमण के स्थूल भौतिक रूप समाप्त होने पर भी संस्कृति की रक्षा का संघर्ष महत्वपूर्ण बना रहेगा। बल्कि उसका महत्व और अधिक बढ़ जायेगा। दूसरे चरण में सामंजस्य का प्रयास करना होगा और तीसरे चरण में उच्चतर चेतना में आरोहण के लिए अपेक्षित त्याग की वृत्ति आवश्याक होगी। यूरोप की भौतिकतावादी संस्कृति मानवता की मृत्यु का कारण बन रही है। इसके स्थान पर सनातन की साधना से सम्पूर्ण विश्वत ईश्वारीय राज्य का निवासी बनेगा और सबके जीवन में अखण्ड आनंद और सामंजस्य साकार होगा।’’
गांधी जी के विषय में श्री अरविंद ने यह लगातार कहा कि ‘वे झूठ को बढ़ावा देते है। भारत में इस्लाम झूठ और जहालत की ताकत से बढ़ा है। इस्लाम के जो मानवीय पक्ष बताये जाते है, उनका भारत में मुसलमानों ने एक तरह से उपहास ही उड़ाया है। मुसलमानों का राजनैतिक आचरण घोर असहिष्णु और भाईचारे का पूर्ण विरोधी रहा है। सच्चा भाईचारा तो एक उच्च आदर्श है। वह किसी भी रूप में असहिष्णुता का आधार नहीं बनता। गांधी जी जिस हिन्दू -मुस्लिम एकता की बात करते है वह झूठ से भरी कूटनीति है। लखनऊ पेक्ट और खिलाफ़त आंदोलन भयंकर राजनैतिक भूले रहीं है, जिन्होंने केवल अलगाववादी और हिंसक शक्तियों को बढ़ाया है और भारत का विभाजन इसी कारण हुआ है। अतः उस नीति को आगे ले जाना झूठ और अधंकार को ही बढ़ायेगा। इस्लाम की बर्बरता और क्रूरता के समक्ष समर्पण से न तो हिन्दू-मुस्लिम एकता संभव है और न ही शांति। गांधी की राजनैतिक पैतरेबाजी हिन्दुओं को कमजोर करती रही है और आगे भी वह नीति वही परिणाम लायेगी।’’

नारी से नारायणी: एक सौम्य यात्रा

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दिल्ली। भारतीय नारी की आंतरिक शक्ति का उत्सव 07 और 08 मार्च 2026 को दिल्ली के प्रतिष्ठित विज्ञान भवन में ‘भारती – नारी से नारायणी’ नामक एक ऐतिहासिक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है। यह सम्मेलन भारत की महिला विचारकों का पहला ऐसा बड़ा मंच है, जहाँ नारी को केवल परिवार की आधारशिला से आगे बढ़ाकर राष्ट्र निर्माण की मुख्य इकाई के रूप में स्थापित करने का गहन चिंतन होगा। भारतीय विद्वत परिषद, राष्ट्र सेविका समिति और उसकी सहयोगी संस्था शरण्या के संयुक्त तत्वाधान में यह दो दिवसीय महा-मंथन अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हो रहा है, जो महिलाओं की बहुआयामी क्षमता को भारतीय दृष्टिकोण से रेखांकित करता है।

इस सम्मेलन की विशेषता यह है कि यह पश्चिमी फेमिनिज्म की संघर्षपूर्ण अवधारणा से अलग, भारतीय परंपरा पर आधारित है। जहाँ पश्चिमी नारीवाद में पुरुष-नारी के बीच टकराव की बात होती है, वहीं भारतीय विचारधारा में नारी और पुरुष एक ही प्रकाश की दो ज्योतियाँ माने जाते हैं-समान, पूरक और सहयोगी।

राष्ट्र सेविका समिति, जो 1936 में लक्ष्मीबाई केलकर द्वारा दशहरे के पावन अवसर पर स्थापित हुई, पिछले 90 वर्षों से इसी सोच के साथ महिलाओं के बहुआयामी उत्थान के लिए कार्यरत है। समिति का कार्यक्षेत्र केवल महिलाओं तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के सकारात्मक विकास पर केंद्रित है।

शरण्या (2016 में स्थापित) वंचित वर्गों की महिलाओं और बच्चों को शिक्षा, कौशल और आत्मनिर्भरता प्रदान कर रही है, जबकि भारतीय विद्वत परिषद (2009 से सक्रिय) भारतीय शास्त्रों के अध्ययन को आधुनिक संदर्भों से जोड़ती है। इन तीनों संस्थाओं का संयुक्त प्रयास इस सम्मेलन को एक सशक्त और प्रामाणिक मंच प्रदान करता है।

सम्मेलन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु समापन सत्र की प्रमुख अतिथि होंगी, जबकि उद्घाटन दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता करेंगी। यह उपस्थिति सम्मेलन को राष्ट्रीय स्तर की गरिमा प्रदान करती है। विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी महिलाएँ-शिक्षा, राजनीति, प्रशासन, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, रक्षा, चिकित्सा, उद्योग, उद्यमिता, न्यायपालिका, अध्यात्म, खेल, मीडिया, साहित्य आदि-यहाँ एकत्र होंगी। विशेष रूप से महिला सांसदों का पैनल, महिला वाइस चांसलरों (कुलपतियों) का अलग सत्र और साध्वी संगम (महिला संतों का समूह) चर्चा को गहराई देगा।

सम्मेलन की आठ मुख्य थीम्स हैं—विद्या, शक्ति, मुक्ति, चेतना, प्रकृति, संस्कृति, सिद्धि और कृति। ये थीम्स भारतीय नारी की आंतरिक यात्रा को दर्शाती हैं:

  • विद्या: ज्ञान ही शक्ति है। उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने, लड़कियों की ड्रॉपआउट समस्या, विशेष पाठ्यक्रम और सेल्फ-डिफेंस को अनिवार्य बनाने पर चर्चा होगी।
  • शक्ति: आत्म-बोध और आत्म-निर्भरता। वित्तीय साक्षरता, स्किल एजुकेशन और आर्थिक स्वावलंबन पर जोर।
  • मुक्ति: रूढ़ियों से मुक्ति। घरेलू हिंसा, सामाजिक बंधनों से बाहर निकलकर सम्मानपूर्ण जीवन।
  • चेतना: कार्यक्षेत्र में समान भागीदारी। नीति-निर्माण और निर्णयों में महिलाओं की बराबर भूमिका।
  • प्रकृति: महिलाओं की शारीरिक-मानसिक प्रकृति को सम्मान। कार्यस्थलों पर पीरियड लीव, मातृत्व अवकाश, शिशु-पालन सुविधाएँ और मेनोपॉज जैसी स्थितियों के लिए सहायक व्यवस्था।
  • संस्कृति: मजबूत जड़ें। परिवार और समाज में संस्कारों को संरक्षित रखते हुए आधुनिकता को अपनाना।
  • सिद्धि: सफल महिलाओं की प्रेरक कहानियाँ। उनकी उपलब्धियाँ समाज को प्रेरित करेंगी।
  • कृति: ठोस कार्य-योजना। विचारों को क्रियान्वयन में बदलना।

देश भर में पहले से चलाए गए अभियानों से प्राप्त सुझावों को मुख्य सम्मेलन में शामिल किया जाएगा। विभिन्न परिचर्चाओं से निकले सुझाव भारत सरकार के संबंधित विभागों को भेजे जाएंगे, ताकि नीतिगत स्तर पर उनका क्रियान्वयन हो सके।

 

यह सम्मेलन केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि ‘मौन शक्ति से रणनीतिक शक्ति’ की यात्रा का प्रतीक है। महिलाएँ सदियों से परिवार को संभालती आई हैं, परंपराओं को जीवित रखती हैं और समाज को मजबूती प्रदान करती हैं। अब समय है कि उन्हें राष्ट्र निर्माण की धुरी बनाया जाए। वैश्विक स्तर पर महिलाओं की भागीदारी को आवश्यक माना जाता है, और भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ इसे और सशक्त बना सकता है।

 

सम्मेलन का दृष्टिकोण स्पष्ट है-एक समावेशी मंच जहाँ महिलाएँ जुड़ें, सहयोग करें और समाधान तैयार करें। इससे आत्मनिर्भर और विकसित भारत का लक्ष्य मजबूत होगा। अपेक्षित परिणामों में शामिल हैं: सरकार को बहु-आयामी नीति सुझाव, ‘भारती’ को स्थायी मंच बनाना, महिला नेतृत्व नेटवर्क तैयार करना और भविष्य में वार्षिक आयोजन की रूपरेखा।

 

राष्ट्र सेविका समिति का 90 वर्षों का अनुभव, प्रचार से दूर रहकर सेवा का कार्य और विशुद्ध भारतीय विचारधारा इस सम्मेलन की सफलता की गारंटी है। जब विभिन्न पृष्ठभूमि, आयु और प्रदेशों की महिलाएँ एक साथ आती हैं, तो सामूहिक ज्ञान से बड़े परिवर्तन संभव होते हैं।

 

‘नारी से नारायणी’ सम्मेलन महिलाओं की शक्ति का उत्सव है, जो उन्हें नेतृत्व की मुख्य धारा में लाकर राष्ट्र को मजबूत बनाएगा। यह एक सौम्य, सकारात्मक और भारतीय मूल्यों से ओतप्रोत प्रयास है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा। दिल्ली का विज्ञान भवन इन दो दिनों में न केवल विचारों का केंद्र बनेगा, बल्कि नारी शक्ति के नवजागरण का साक्षी भी।

गदर पार्टी के संस्थापक सदस्य : सेलुलर जेल में कठोर यातनाएँ मिलीं

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भोपाल । भारत की स्वाधीनता के लिये जितना संघर्ष भारत के भीतर हुआ संघर्ष केलियेउतना ही जन जागरण अभियान विदेशों में हुआ । असंख्य ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और क्राँतिकारी रहे जिन्होंने भारत के भीतर भी संघर्ष किया और जेल गये और भारत के बाहर भी स्वतंत्रता के लिये वातावरण बनाया । क्राँतिकारी पृथ्वीसिंह आजाद ऐसे ही स्वाधीनता सेनानी थे । वे गदर पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे ।

ऐसे चिंतक विचारक और क्राँतिकारी पृथ्वी सिंह आजाद का जन्म 15 सितंबर 1892 को पंजाब प्रांत के मोहाली क्षेत्र अंतर्गत ग्राम लालरू में हुआ था। इन दिनों इस क्षेत्र को साहिबजादा अजीतसिंह नगर के नाम से जाना जाता है । उनके शादीराम भी राष्ट्र जागरण अभियान से जुड़े थे। परिवार के संस्कार और राष्ट्रवादी वातावरण के चलते पृथ्वीसिंह किशोर अवस्था में ही राष्ट्रवादी आंदोलन से जुड़ गये थे। आगे चलकर वे लाला लाजपत राय के संपर्क में आये और युवकों को संगठित कर क्राँतिकारी आँदोलन के समर्थक हो गये । समय के साथ सक्रिय हुये और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की गिरफ्तारी और खुदी राम बोस के बलिदान के समाचार भी आये । उन्हें लगा कि भारत की स्वतंत्रता के लिये भारत से बाहर अंग्रेजों के विरोधियों का भी समर्थन आवश्यक है । अपने इस विचार से उन्होंने तत्कालीन वरिष्ठों को अवगत कराया और सहमति लेकर वे 1912 में अमेरिका गये। वे हिंदुस्तानी एसोसिएशन ऑफ पेसिफिक कोस्ट के संस्थापकों में से एक लाला हरदयाल से मिले । इसी संस्था को गदर पार्टी के नाम से जाना जाता था । यह संगठन अमेरिका में प्रवासी भारतीयों को संगठित कर भारत की अंग्रेजों से मुक्ति केलिये वातावरण बना रही थी । युवा पृथ्वीसिंह संस्था से जुड़े और इसके विस्तार के काम में लग गये । उन्होंने गदर पार्टी के मुखपत्र “गदर” का प्रकाशन और इसके विस्तार के काम में जुट गये ।
जब प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हुआ तो गदर पार्टी ने अपने अनेक कार्यकर्ताओं को भारत भेजा और अंग्रेजों से मुक्ति की सशस्त्र क्रान्ति को तेज किया और युवाओं से आव्हान किया कि अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंका जाये । भारत की स्वाधीनता का यही संकल्प लेकर पृथ्वीसिंह वह 29 अगस्त 1914 को लगभग 150 स्वतंत्रता सेनानियों के साथ भारत लौटे । उन्होंने पूरे पंजाब की यात्रा की और युवकों को संगठित करना आरंभ किया । जब यह समाचार अंग्रेजों को मिला तो 7 दिसंबर 1914 वे गिरफ्तार कर लिये गये। अंग्रेजों ने उन पर लाहौर षडयंत्र केस में भी आरोपी बनाया मौत की सजा सुनाई गई। लेकिन बाद में सुबूत के अभाव में मृत्युदंड तो बदला लेकिन आजीवन कारावास की सजा देकर सेलुलर जेल भेज दिया गया। और उन्हे 1922 में नागपुर जेल स्थानांतरित किया गया । इसके साथ उन्हें कलकत्ता, मद्रास आदि विभिन्न जेलों में 10 साल रखा गया । प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने अधिकांश राजनैतिक बंदी रिहा किये । इसका लाभ पृथ्वीसिंह जी को भी मिला और वे रिहा कर दिये गये । रिहाई वे रूस गये । और वहाँ रह रहे भारतीयों तथा अंग्रेज विरोधी विचार के लोगों से संपर्क किया तथा भारतीय समाज के दर्द का वर्णन किया उनके द्वारा दिये गये ये विवरण लेनिन पत्रिका में प्रकाशित हुये । बाद में उनके यह सभी संस्मरण एक पुस्तक के आकार में भी प्रकाशित हुये । भारत लौटने पर काँग्रेस से जुड़े और वे गांधी जी के नेतृत्व में आँदोलन की मुख्यधारा से जुड़ गये । विभिन्न आँदोलनों में जेल गये । नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने जब आजाद हिन्द फौज का गठन किया तो उसके समर्थक बने ।
स्वतंत्रता के बाद उन्होंने पंजाब से संविधान सभा का चुनाव लड़ा और जीते । भारत सरकार ने 1977 में उन्हे तीसरा सबसे सम्मानित पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया।
जीवन का अंतिम समय अस्वस्थता में बीता और 5 मार्च 1989 को क्राँतिकारी और विचारक पृथ्वीसिंह आजाद ने 96 वर्ष की आयु में संसार से विदा ली । उनकी जीवन गाथा दो आत्मकथाओं में उपलब्ध है । इनमें “क्रांति पथ का पथिक” का प्रकाशन 1990 में हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा किया गया । और “बाबा पृथ्वी सिंह आज़ाद, महान योद्धा, 1987 में भारतीय विद्या भवन द्वारा प्रकाशित की गई।

जंजीरें तोड़ता भारत: बाल विवाह के खिलाफ निर्णायक जंग

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हैदराबाद की ऊँची इमारतों के बीच 28 साल की अनीता लैपटॉप पर झुकी है। वह सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। रात देर तक काम करती है। प्रमोशन चाहिए। बेहतर पैकेज चाहिए। अपने पैरों पर पूरी तरह खड़े होने का ख्वाब है। शादी? “अभी नहीं,” वह सुकून से कहती है। पहले करियर। फिर मुक़ाम।
राजस्थान के एक छोटे से गाँव में 15 साल की रानी की दुनिया अलग है। उसकी हथेलियों की मेहंदी सूखी भी नहीं कि वह ससुराल की ज़िम्मेदारियों में घिर गई। किताबें छूट गईं। खेल छूट गया। बचपन खामोशी से रुख़्सत हो गया।
दो लड़कियाँ। एक देश। फर्क सिर्फ हालात का।
शहरों में शादी अब एक पसंद है। गांवों में अब भी अक्सर मजबूरी। कहीं “सेटल” होने का इंतज़ार है। कहीं “बोझ” समझकर जल्दी विदाई। यही हमारा तल्ख़ सच है।
इसी मसले पर हाल में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में एक जागरूकता कार्यक्रम हुआ, “बाल विवाह मुक्त भारत: हमारी ज़िम्मेदारी।” डॉक्टरों, समाजसेवियों और शिक्षकों ने खुलकर बात की। साफ कहा; बाल विवाह कोई रस्म नहीं, यह बच्चों के हक़ पर वार है।
कानून साफ हैं। Prohibition of Child Marriage Act के अनुसार लड़की की शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल और लड़के की 21 साल है। Protection of Children from Sexual Offences Act नाबालिगों के साथ किसी भी तरह के शोषण को सख्त जुर्म मानता है। Juvenile Justice Act बच्चों की हिफाज़त और पुनर्वास की बात करता है।
और एक अहम नंबर; 1098, जो एक चाइल्ड हेल्पलाइन है। 24 घंटे काम करती है। कोई भी शख्स गुमनाम रहकर शिकायत कर सकता है। पैग़ाम साफ था; खामोशी ज़ुल्म को बढ़ाती है। आवाज़ उठाइए।
मगर कानून के बावजूद हक़ीक़त आसान नहीं।
डॉक्टरों ने बताया कि कम उम्र में गर्भधारण मां और बच्चे दोनों के लिए खतरनाक है। कमसिन लड़कियों में मौत का खतरा ज्यादा होता है। समय से पहले प्रसव, कम वजन के बच्चे, खून की कमी; ये आम समस्याएँ हैं। UNICEF के अनुसार भारत में हर साल लाखों लड़कियाँ 18 साल से पहले शादी कर दी जाती हैं।
National Family Health Survey-5 के आंकड़े बताते हैं कि 20 से 24 साल की उम्र की करीब 23 प्रतिशत महिलाओं की शादी 18 से पहले हो चुकी थी। पहले यह आंकड़ा और भी ज्यादा था। गिरावट आई है। मगर अभी सफर लंबा है।
बाल विवाह सिर्फ सेहत का मसला नहीं। यह तालीम का भी सवाल है। शादी होते ही पढ़ाई रुक जाती है। लड़की आर्थिक तौर पर कमजोर रह जाती है। गरीबी का दायरा और फैल जाता है।
गांवों में यह समस्या ज्यादा है। वजहें भी साफ हैं; गरीबी, असुरक्षा का डर, दहेज की चिंता, समाज का दबाव। कई मां-बाप सोचते हैं कि जल्दी शादी कर देने से जिम्मेदारी खत्म। मगर असल में मुश्किलें शुरू होती हैं।
एक साल अतिरिक्त पढ़ाई से बाल विवाह का खतरा काफी कम हो जाता है। तालीम सबसे मजबूत हथियार है। जन्म पंजीकरण भी जरूरी है, ताकि उम्र की सही जानकारी रहे और धोखा न हो।
सरकार ने भी पहल की है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की “बाल विवाह मुक्त भारत” मुहिम 2030 तक इस बुराई को खत्म करने का संकल्प ले चुकी है। गांवों में शपथ कार्यक्रम हो रहे हैं। स्कूलों में जागरूकता अभियान चल रहे हैं। डिजिटल पोर्टल के जरिए शिकायत दर्ज की जा सकती है।
UNFPA और UNICEF जैसी संस्थाएँ किशोरियों को तालीम, सेहत और जीवन कौशल से जोड़ रही हैं। कुछ राज्यों में अच्छे नतीजे भी आए हैं। पश्चिम बंगाल की कन्याश्री योजना ने हजारों लड़कियों की शादी टालने में मदद की। राजस्थान के कुछ गांवों ने खुद को “बाल विवाह मुक्त” घोषित किया है।
फिर भी चुनौतियाँ कायम हैं। कई मामलों में शिकायत ही दर्ज नहीं होती। समाज का दबाव गवाहों को खामोश कर देता है। गरीबी अब भी बड़ी वजह है।
असल लड़ाई सोच की है। जब तक बेटी को बराबरी का हक़ नहीं मिलेगा, यह सिलसिला पूरी तरह खत्म नहीं होगा। पंचायत, स्कूल, पुलिस, समाज, सबको मिलकर काम करना होगा। मीडिया को भी जिम्मेदारी निभानी होगी।
अनीता और रानी के बीच की दूरी सिर्फ शहर और गांव की नहीं। यह अवसर और मजबूरी की दूरी है। ख्वाब और हक़ीक़त की दूरी है।
भारत बदल रहा है। बेटियाँ आगे बढ़ रही हैं। मगर यह बदलाव हर कोने तक पहुँचना चाहिए।
बाल विवाह तक़दीर नहीं। यह एक गलत फैसला है। और हर गलत फैसला बदला जा सकता है।
जरूरत है हिम्मत की। जागरूकता की। और इंसाफ़ की।
जिस दिन हर रानी को अपने सपनों का वक्त मिलेगा, उसी दिन सच में आज़ाद भारत की तस्वीर मुकम्मल होगी।
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