कॉकरोच अपनी इन मुर्खताओं के लिए याद रखा जाएगा

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दिल्ली। जंतर मंतर पर चल रहा प्रदर्शन लोकतंत्र की आवाज है। युवा पीढ़ी, विशेषकर जेन-जी, जब किसी दल या व्यवस्था के खिलाफ सड़क पर उतरती है तो यह स्वागत योग्य है। विरोध का अधिकार संविधान प्रदत्त है और युवाओं का जागरूक होना राष्ट्र के लिए शुभ संकेत है। उनकी नाराजगी, सवाल और मांगें लोकतंत्र को मजबूत बनाती हैं।

परंतु विरोध का तरीका भी सभ्य होना चाहिए। हाल के प्रदर्शन में ढेर सारे अश्लील पोस्टर देखकर निराशा होती है। अश्लीलता और असभ्यता न तो विरोध को मजबूत बनाती है और न ही समाज को। ऐसे पोस्टर प्रदर्शन के उद्देश्य को कमजोर करते हैं, जनसमर्थन घटाते हैं और मुद्दे को हाशिए पर धकेल देते हैं। युवा ऊर्जा को रचनात्मक दिशा में लगाना चाहिए—तर्कपूर्ण नारे, सभ्य प्लेकार्ड और शांतिपूर्ण तरीकों से।


लोकतंत्र में असहमति का स्वागत है, अश्लीलता का नहीं। विरोध सभ्य रहे तो उसकी ताकत बढ़ती है। युवाओं से अपेक्षा है कि वे अपने आक्रोश को गरिमा के साथ व्यक्त करें, ताकि उनका संदेश समाज तक सही रूप में पहुंचे और बदलाव की दिशा मजबूत हो।

जो चरस बोई थी, उसमें अब फल आ गया है

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कायनात काजी

दिल्ली। करीब 20–25 साल पहले जब देश में FDI (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) को लेकर बहस चल रही थी, तब अनेक विद्वानों और विचारकों ने आशंका जताई थी कि विदेशी निवेश केवल पूंजी ही नहीं लाएगा, बल्कि अपने साथ जीवनशैली, सांस्कृतिक प्रभाव और मूल्य भी लेकर आएगा। उनका कहना था कि आर्थिक विकास के साथ-साथ हमारी सांस्कृतिक पहचान पर भी इसका असर पड़ेगा।

यह भी सच है कि FDI और उदारीकरण के बाद देश ने अभूतपूर्व आर्थिक प्रगति की। बड़े शहर विकसित हुए, आईटी सेक्टर का विस्तार हुआ, रोजगार के अवसर बढ़े और भारत विकासशील देशों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा हो गया। लेकिन विकास की इस दौड़ में हमने यह देखने की कोशिश कम की कि हमारी नई पीढ़ी किस प्रकार के सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण में तैयार हो रही है।


शिक्षा का तेजी से निजीकरण हुआ। विदेशी निवेश और पश्चिमी प्रभावों से संचालित अनेक संस्थान खड़े हुए। अंग्रेज़ी शिक्षा, आधुनिकता और वैश्विक अवसरों के आकर्षण में हमने यह मान लिया कि यही प्रगति का एकमात्र रास्ता है। लेकिन इसी के साथ अनुशासन, मर्यादा और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे प्रश्न धीरे-धीरे पीछे छूटते गए।

हमारे गांव में एक कहानी सुनाई जाती थी। एक महिला ने अपनी पड़ोसन से बदला लेने के लिए अपने बच्चों को गालियां देना सिखाया। उसका विश्वास था कि बड़े होकर वे पड़ोसन को अपमानित करेंगे। लेकिन जब बच्चे बड़े हुए तो वे यह भेद ही भूल गए कि गालियां किसे देनी हैं। परिणाम यह हुआ कि वही भाषा उनके अपने घर और परिवार तक पहुंच गई।

आज कभी-कभी लगता है कि हम भी उसी स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन क्या उसकी कोई मर्यादा नहीं होनी चाहिए? असहमति का अधिकार है, लेकिन क्या भाषा और व्यवहार की गरिमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण नहीं है?

महिलाओं और पुरुषों के बीच अवसरों का अंतर कम होना एक सकारात्मक बदलाव है। महिलाओं ने संघर्ष, योग्यता और परिश्रम के बल पर अपनी जगह बनाई है। लेकिन सशक्तिकरण का अर्थ केवल बंधनों को तोड़ना नहीं, बल्कि अपनी गरिमा और आत्मसम्मान को बनाए रखते हुए आगे बढ़ना भी है।

भारत आज अपनी संस्कृति और सभ्यता के बल पर विश्व में ‘सॉफ्ट पावर’ बनने का दावा करता है। ऐसे में जब सार्वजनिक जीवन में भाषा, व्यवहार और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का स्तर गिरता दिखाई देता है, तो मन में प्रश्न उठता है कि क्या केवल आर्थिक विकास ही पर्याप्त है?

विकास आवश्यक है, लेकिन विकास के साथ विवेक, मर्यादा और सांस्कृतिक चेतना भी उतनी ही आवश्यक है। अन्यथा हम समृद्ध तो हो जाएंगे, परंतु अपने होने का अर्थ खो बैठेंगे।

जंतर-मंतर: अराजकता का अखाड़ा

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दिल्ली । यह जंतर-मंतर की सड़क है। यहां हर सुबह एक नई ‘क्रांति’ की बोली लगती है, और हर शाम उसकी लाश पर वैचारिक भाषणों के कसीदे पढ़े जाते हैं। जो लोग इतिहास और समाज के सतही पन्नों को पढ़कर संतुष्ट हो जाते हैं, वे इस जमावड़े को ‘जन-आक्रोश’ कह सकते हैं। किंतु यदि आप थोड़ा ठहरकर, भीड़ के कोलाहल को चीरते हुए उसके भीतर झांकें, तो आपको यथार्थ का वह घिनौना रूप दिखेगा, जहां नीट (NEET) के मासूम परीक्षार्थियों का भविष्य केवल एक मोहरा है, और असली खिलाड़ी परदे के पीछे बैठे विदेशी व राजनीतिक आका हैं।

‘आंदोलन’ तो व्यवस्था की सड़ी-गली नसों में न्याय की खौलती धारा प्रवाहित करने वाला वो महा-मन्थन है, जो सत्ता के अहंकार को पिघलाकर जन-आकांक्षाओं की नींव रखता है। किंतु जब असंतोष की यह पवित्र आग भाड़े के उपद्रवियों के हाथ की मशाल बन जाए, तो इतिहास बदलता नहीं, केवल लोकतंत्र का चीरहरण होता है। हमें यह कड़वा सच कबूल करना होगा कि व्यवस्था का विरोध और अराजकता का नग्न तांडव कभी एक नहीं हो सकते।

विरोध तो मर्यादा की ढाल पहनकर सत्य की ढली हुई शमशीर से लड़ा जाता है, जबकि यह अराजकता तो व्यवस्था की छाती को नोच-नोचकर अपनी राजनीतिक हवस मिटाने वाला वो खूंखार भेड़िया है, जिसकी लार में मासूमों के भविष्य का लहू मिला हुआ है।

जरा इन उपद्रवियों के चेहरों को गौर से देखिए। हाथों में उछलते पत्थर, पुलिस की गाड़ियों पर बर्बरता से टूटती भीड़ और देश की सुरक्षा में तैनात वर्दी पर झपटते नापाक हाथ! क्या ये इस मुल्क का मुस्तकबिल गढ़ने वाले मेधावी छात्र हैं? क्या रातों की नींदें जलाकर जीवन-दान देने का ख़्वाब देखने वाले नौजवान अपने ही रक्षकों की हड्डियों को चटखाने पर आमादा होंगे? हरगिज नहीं! यह किसी परीक्षा का दर्द नहीं, यह तो ‘डीप स्टेट’ का बुना वो जहरीला सिंडिकेट है, जो हर जायज असंतोष को लाशों के ढेर में तब्दील करने का फन जानता है। पर्चा लीक होने से टूटे बच्चों के अवसाद की महज़ आड़ ली गई है। मक़सद साफ़ है, मासूमों के सीने पर अपनी सियासत की तोप रखना और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारत की आबरू का सौदा करना।

किंतु, इस पूरे ख़ूनी ड्रामे का सबसे नंगा, सबसे ज़लील दृश्य तब दिखा, जब सच का आइना लिए डटी एक निष्पक्ष महिला पत्रकार को उग्र भीड़ ने चारों तरफ से घेर लिया। ज़रा उस ख़ौफ़नाक लम्हे की आग को महसूस कीजिए, जब सच की तलाश में निकली एक बेटी पर भेड़ियों का झुंड टूट पड़ता है, जहां उसकी आबरू को तार-तार करने की हिंसक कोशिश होती है, जहां धक्के, अपशब्द और मॉब-लिंचिंग की सड़ांध उसकी सांसों तक पहुंचने लगती है! उस वक़्त सड़क पर केवल एक पत्रकार का उत्पीड़न नहीं हो रहा था, बल्कि लोकतंत्र की रीढ़ पर लात मारकर उसकी बची-कुची मर्यादा को लहूलुहान किया जा रहा था। जब सच बोलने वाली बेटी का गिरेबान खिंच रहा हो और कलम के मठाधीश ख़ामोश खड़े मुस्करा रहे हों, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र ज़िंदा नहीं, उसकी लाश का बाज़ार में सौदा हो चुका है!
उस वक़्त कहां दफ़्न हो गई थी निष्पक्षता के मसीहा बनने वाले इन मठाधीशों की आत्मा? अतीत में तमाचा खाकर जीवन भर ‘मज़लूमियत’ की भीख मांगने वाले आशुतोष हों, या रवीश, प्रसून और अजीत अंजुम जैसी पूरी जमात, सबकी बोलती पर ताले जड़े थे।

आंखों में अमानवीय शांति थी और मन में इस बात का घिनौना उल्लास कि शिकार उनके वैचारिक आकाओं के खेमे का नहीं था। जब थूककर चाटना ही पत्रकारिता का धर्म बन जाए, तो सहकर्मी की चीत्कार भी एजेंडे का संगीत लगती है। राजनीतिक आकाओं के जूठन पर पलने वाले इन नपुंसक चेहरों की रगों में अब निष्पक्षता का लहू नहीं, बल्कि चाटुकारिता का जहर दौड़ रहा है। जब कलम की स्याही सत्ता-विरोधी तुष्टीकरण और विदेशी फंडिंग के चेक से भरी जाने लगे, तो पत्रकार निर्भीक नहीं रहता, वह केवल एक वैचारिक भाड़े का टट्टू बनकर रह जाता है।
और इस पूरे अधर्म को खाद-पानी दे रही है आज की ‘रील-पीढ़ी’। इन राजनीतिक गिद्धों के लिए किसी छात्र की तबाह होती जिंदगी या किसी महिला पत्रकार की चीत्कार महज एक ‘डिजिटल अवसर’ है। मोबाइल का कैमरा ऑन हुआ तो बनावटी क्रांति का बाज़ार सज गया, और लाइव-स्ट्रीम बंद होते ही सारी वैचारिक निष्ठा कूड़ेदान में जा गिरी! इनके पास तर्कों का अकाल है, जबान पर गालियों का अमर्यादित शोर है, और न्याय की तड़प से बड़ा सोशल मीडिया का ‘एल्गोरिद्म’ हो चुका है। जो क्रांति, कैमरा ऑन होने पर शुरू और लाइव-स्ट्रीम बंद होने पर दम तोड़ दे, वह इतिहास की धारा नहीं मोड़ती… केवल डिजिटल कचरे का ढेर बनाती है!

स्याह झंडों और प्रायोजित सियासत के इस घिनौने खेल में आख़िर किसकी बलि चढ़ी? वही सच्चा छात्र! पचास हज़ार उपद्रवियों की एक घंटे की प्रायोजित हिंसा ने मुल्क की करोड़ों आंखों की स्वतःस्फूर्त सहानुभूति को एक ही झटके में जलाकर राख कर दिया। भीड़ में फेंका गया हर एक पत्थर व्यवस्था का कुछ नहीं बिगाड़ता, वह केवल किसी गरीब छात्र के घर में जलती हुई उम्मीद की मोमबत्ती को बुझा देता है। कल यह हिंसक भीड़ चली जाएगी, कुछ उग्र चेहरे नेता कहलायेंगे, कुछ डिजिटल दुनिया के सितारे बन जाएंगे और सियासी पार्टियां अपनी रोटियां सेंक कर निकल जाएंगी। लेकिन उस बदक़िस्मत छात्र का क्या? वह कल भी अपने कमरे में अधूरी किताबों और धुंधले भविष्य के साथ तन्हा बैठा था, और आज भी अनिश्चितता के अंबर तले अकेला ही अपनी किस्मत पर आंसू बहा रहा है!

रामायण के पन्ने पलटिए। रावण की दंभी सभा में जब सीता के सम्मान की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं, तब भी ज्ञानी कहलाने वाले मठाधीश चुपचाप उस अधर्म का आनंद ले रहे थे। आज का जंतर-मंतर उसी दंभी सभा का नया रूप है। लेकिन याद रखिए, गिद्धराज संपाती की तरह निष्पक्ष और दूरदर्शी सोच ही सत्य को बचाती है। रावण का अहंकार और उसकी सभा का सन्नाटा उसे महाविनाश से नहीं बचा पाया था।

फंडिंग के चेक एक दिन रीते होंगे, सियासी आकाओं का हाथ सिर से हटेगा और पत्थरों के दम पर खड़ा यह प्रायोजित तमाशा ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। सत्य का सूरज भले ही प्रायोजित बादलों में छुप जाए, लेकिन जब वह प्रकट होता है, तो झूठी क्रांतियों के सारे टिमटिमाते चिराग़ों को बेनूर कर देता है। जो आंदोलन न्याय की जगह ‘वायरल’ होने की होड़ में अपनी मर्यादा बेच देते हैं, वे कभी इतिहास का अमर पृष्ठ नहीं लिखते… वे महज इतिहास का सड़ता हुआ कचरा बनकर रह जाते हैं!

सामयिक घटनाक्रम पर कैलाश जी डागा की महत्वपूर्ण टिप्पणी

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दिल्ली । कोई यह नहीं पूछ रहा है कि कौन है ये अभिजीत दीपके ? कहां से आया, पहले क्या कर रहा था..? कैसे अचानक रातोंरात इतना लोकप्रिय हो गया कि सप्ताह भर में 2 करोड़ से ऊपर फॉलोअर्स हो गए। क्या है इसकी पृष्ठभूमि..?

केजरीवाल की पार्टी में मीम बनाने की नौकरी करने वाला अत्यंत साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि वाला अभिजीत अचानक नौकरी छोड़कर अमेरिका में जर्नलिज्म की पढ़ाई करने चला गया। बन्दा पढ़ाई करके नौकरी की तलाश में वहां बेरोजगार घूम रहा था।

अचानक भारत के चीफ जस्टिस ने उसे रोजगार दे दिया। 15 मई 2026 को भारत के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने फर्जी डिग्री से वकालत का पेशा अपनाने वाले वकीलों की परजीवी और कॉकरोच से तुलना क्या कर दी, मानो न्यूटन के सर पर सेब गिरा, ज्ञान चक्षु खुले और अगले ही दिन 16 मई 2026 को दीपके ने कॉकरोच जनता पार्टी बनाने की सोशल मीडिया में घोषणा कर दी और देखते ही देखते भारत ही नहीं एशिया, यूरोप, अमेरिका में उसके लाखों करोड़ों फॉलोअर्स हो गए।

रातों-रात इतने फॉलोअर्स हो जाना क्या अचम्भे का विषय नहीं है..? कल तक बिल्कुल गुमनाम रहे आदमी को 7 दिनों में दो करोड़ फालोवर्स मिल गए..!

उससे पूर्व 3 मई को हुई नीट परीक्षा में पेपर लीक हो गया था लेकिन सात समंदर पार बैठे दीपके को 1 जून को स्वप्न आया कि देश की जनता को, खासतौर पर जेन-जी को उसके नेतृत्व की सख्त जरूरत है… और इंडिया जाकर नीट पेपर लीक के ख़िलाफ़ आंदोलन किया जाए… और परधान जी का इस्तीफ़ा मांगा जाए..!
और वह 6 जून को दिल्ली इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर उतरा…
पूरी दिल्ली में कहीं कोई सुरसुराहट सुगबुगाहट नहीं हुई… यहां तक कि गलियों में घूमते श्वानों ने भी आसमान की तरफ मुंह करके उसका स्वागत नहीं किया…

6 जून से 20 जून तक और फिर 25 जून के मध्य नितांत अनजान लोगों के बीच प्रेम की कोंपलें प्रस्फुटित हुईं और प्रेम परवान भी चढ़ा, जब 25 जून को सोनम वांगचुक ने सीजेपी के बैनर तले नीट पेपर लीक के विरोध में धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र तक के लिए 28 जून से भूख हड़ताल पर बैठने की घोषणा की।

आश्चर्यजनक यह है कि कोई यह नहीं पूछ रहा कि;-

अभिजीत दीपके का सोनम वांगचुक के साथ संपर्क कैसे हुआ..?

किसने सोनम वांगचुक को नीट परीक्षा लीक मामले को लेकर भूख हड़ताल पर बैठने को तैयार किया..?

किसने सौरव दास, आशुतोष रांका, विजेता दहिया को दीपके के साथ जोड़ा..?

किसने सीजेपी के मंच पर अरविंद केजरीवाल, प्रकाश राज, योगेंद्र यादव, अरुंधति राय जैसे वामपंथी अराजकतावादियों को भेजा।

कौन था जिसने शबाना आज़मी, स्वरा भास्कर, सोनाक्षी सिन्हा, अदिति हैदरी, दिया मिर्जा, अनुराग कश्यप, विशाल ददलानी, नसीरुद्दीन शाह जैसे फिल्मी सिकुलर्स को इस भूखहड़ताल को प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देने को कहा.?

कौन था जिसने सपा के अखिलेश यादव, डिंपल यादव, गुमनाम आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर रावण, टीएमसी की महुआ मित्रा, सागरिका घोष, सीपीआई एम से जॉन बिट्रास, आदमी पार्टी के संजय सिंह, एनसीपी से शरद पवार और सुप्रिया सुले को इस नाटक का हिस्सा बनने के लिए मजबूर किया..?

किसने जेएनयू के टुकड़े-टुकड़े गैंग, वामपंथी संगठन आईसा, डफली वालों को जंतर मंतर भेजा..?

किसने नाटक का आकर्षण बनाए रखने के लिए लेस्बियन्स, गे’ज, फेमिनाईन्स, स्वयं को विपरीत लिंगी मानने वाले “मीठाें” को प्रतिदिन वहां भेजने का प्रबंध किया..?

कौन है जो कल तक अजनबी रहे इन लोगों को एक मंच पर जुटा रहा है..?

कौन है जो पर्दे के पीछे से आग को भड़का रहा है..?

इस कथित आंदोलन के पीछे किसका दिमाग है..?

फैक्ट्स
राजस्थान में कांग्रेस की विगत अशोक गहलोत सरकार में एक के बाद एक 19 पेपर लीक हुए जो अब तक का एक रिकॉर्ड है लेकिन इनमें से कोई आंदोलनजीवी नहीं पहुंचा। उक्त में से किसी को भी युवाओं के करियर की चिंता-परवाह नहीं हुई.!

20 जुलाई को संसद के मानसून सत्र का पहला दिन था। विगत लगभग महीने भर से चल रहे सीजेपी के आंदोलन में 400-500 से ज्यादा की भीड़ किसी दिन नहीं जुटी लेकिन 20 जुलाई को 8 से 10000 लोग यकायक कहां से पहुंच गए..?

उनमें अधिकांश जेन-जी के बजाय अंकल लोग थे…

बैरिकेट्स हटाए गए… पुलिस की गाड़ियों पर, पुलिस पर पथराव हुआ…
अनेक पुलिस अधिकारी आईपीएस सहित घायल हुए अंततः लाठी चार्ज हुआ, आंसू गैस के गोले छोड़े गए… पत्थर बाजी हुई, हंगामा हुआ…
बच्चों के, बड़ों के वीडियो क्लिप बनाए गए…
इंटरव्यू लिए गए…

और वह सब कुछ हुआ जो आंदोलन के पीछे के दिमाग को चाहिए था…
महीने भर से असफल हो रहे आंदोलन को 20 के घटनाक्रम ने नई ऊर्जा दे दी…

लेकिन, लेकिन गौरतलब यह है कि जब लाठी चार्ज हो रहा था, आंसू गैस के गोले छोड़े जा रहे थे तब आंदोलन के प्रणेता अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका, सौरव दास, विजेता दहिया इत्यादि काकरोच कहां थे..?
इनमें से एक भी आंदोलनजीवी पुलिस की लाठी खाने के लिए वहां उपस्थित नहीं था…
कुछ लोग मंत्री महोदय से मिलने गये थे तो शेष कहीं वातानुकूलित कमरों में बैठ कर टीवी पर जेन-जी को पिटते देख रहे थे…

15 से 20 वर्ष की आयु के बच्चे भावुकता से भरे होते हैं, जिनकी सोचने समझने की क्षमता इतनी परिपक्व नहीं होती उन्हें बरगलाना सबसे आसान है।
वे ही पत्थरबाजी में और लाठियां खाने में आगे रहे…
उन्हीं के वीडियो बने…
आने वाले दिनों में कदाचित् कार्यवाही होगी…
हो सकता है बहुतों का करियर चौपट हो जाए…

लेकिन इससे आंदोलनजीवियों को क्या..?
वे तो अपने उद्देश्य में सफल हो ही रहे हैं। कंधे भले ही बदलते रहे हों, कभी भोली भाली जनता के, कभी किसानों के, तो कभी बच्चों के… केजरीवाल इसका जीता जागता उदाहरण है जिसकी एक के बाद एक दगाबाजियों के पश्चात जनता ने आंदोलनजीवियों पर विश्वास करना छोड़ दिया था।

एक विशेष बात…
वर्तमान प्रहसन का टाइटल था “नीट लीक”
लेकिन पन्ना पलटा तो अंदर लिखा था…
ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद, हिंदुत्व मुर्दाबाद, लेकर रहेंगे आज़ादी, सीता का पति, उमर खालिद को रिहा करो आदि आदि।
दीपके, सोनम या दहिया ने किसी को नहीं मना किया कि यह आंदोलन नीट लीक के विरोध में है…
न कि हिंदुत्व, ब्राह्मणवाद, सीता या राम के…
और न ही उमर खालिद और टुकड़े टुकड़े गैंग के समर्थन में…

जो दिखा वह यह है कि आंदोलनजीवियों को मुद्दों के बारे में स्पष्टता नहीं थी। वे तो शतरंज की बिसात पर खड़े किए गए प्यादे हैं, कठपुतलियां हैं, जिन्हें चला कोई और रहा है और इन कठपुतलियों की डोर, पर्दे के पीछे जिसके हाथ में है, उसका लक्ष्य मोदी सरकार के विरोध में माहौल खड़ा करना है, उसे अपदस्थ करना है, न कि विद्यार्थियों के किसी मुद्दे के समर्थन में आंदोलन करना…

कौन पैसा दे रहा है आंदोलन जीवियों को…
किसी स्थान पर एक साधारण सा कार्यक्रम करना हो तो आयोजकों के पसीने छूट जाते हैं, लाख-दो लाख जुटाने में…
20 जून से धरना और 28 जून से भूख हड़ताल चल रही है। महीने भर से टेंट, मंच, साउंड, खाना-पीना, नाच-गाना इत्यादि सब चल रहा है…

कोई तो है इन सब के पीछे…
लेकिन वह कौन है..? यक्ष प्रश्न यही है।

अब आगे क्या..?
आंदोलन के पीछे की शक्तियों ने जो रणनीति बनाई थी, वह 19 जुलाई तक तो फेल होती दिख रही थी लेकिन 20 जुलाई के घटनाक्रम ने उनकी रणनीति को कुछ हद तक सफल बना दिया। कदाचित् अब देश के विभिन्न हिस्सों से युवाओं को, आंदोलन जीवियों को एकत्रित कर दिल्ली में प्रदर्शन हेतु भेजा जाएगा। बांग्लादेश, नेपाल की भांति सत्ता पलटने का कुचक्र रचने वाले इस लाइन पर फिर सक्रिय हैं। भारत भी अब उनकी प्रयोगशाला में बदल चुका है।

आगामी वर्ष में यूपी, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में चुनाव होने वाले हैं। विपक्ष इन छिटपुट आंदोलनों की नैया में बैठकर चुनाव वैतरणी पार करना चाह रहा है। इस संसद सत्र में एफसीआरए बिल के आने से ऐसे अनेक एन जी ओ के विदेशी फंडिंग में प्रतिबंध लगाने की संभावना है जिनके तार विदेशों तक जुड़े हुए हैं। अतः इस आंदोलन के पीछे उनका हाथ होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए ‘कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना’ की कहावत चरितार्थ की जा रही है

किसी भी लोकतांत्रिक देश में विपक्ष का शांतिपूर्ण आंदोलन करना, जनता को एकजुट करना, उसके स्वस्थ होने का प्रतीक है। हां, देश को आंदोलन चाहिए लेकिन उद्देश्यपूर्ण… विरोध भी चाहिए लेकिन उत्तरदायित्व पूर्ण… विपक्ष चाहिए लेकिन वैकल्पिक दृष्टि वाला। लेकिन क्या भारत का विपक्ष इन मापदंडों पर खरा उतरता है..?

20 जुलाई के घटनाक्रम ने भारत के राजनीतिक परिदृश्य को गति प्रदान की है। मोदी-शाह की राजनीतिक चतुराई अभी तक सब ने देखी है। आने वाले दिनों में इन दोनों गुज्जुओं की इस आंदोलन से निपटने के तौर तरीकों और राजनीतिक चतुराई पर भारतीय मीडिया व राजनीति के विशेषज्ञों की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के कूटनीतिज्ञों और सात समंदर पार बैठे जॉर्ज सोरोस जैसे षड्यंत्रकारियों की भी नज़र रहेगी।

देखते हैं राजनीति का ऊंट किस करवट बैठता है..?

किंतु मुख्य प्रश्न फिर भी अनुत्तरित है और कदाचित अनुत्तरित ही रहेगा कि इस सारे नाटक का कौन सूत्रधार है..? ये कौन सूत्रधार है..?

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