सच से कब तक मुंह मोड़ोगे?

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

कोलकाता : बांग्लादेश में हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की जिस बर्बरता के साथ हत्या की गई है। ब्लासफेमी का आरोप लगाकर उसे जिंदा जला दिया गया। क्योंकि वो हिंदू था। इस्ला-मिक आक्रांताओं ने ठीक इसी तर्ज़ पर ही ही भारत को रक्तरंजित किया है। हमारे असंख्य पूर्वजों की नृशंसता के साथ ‘हत्या-एं’ की। ये ध्यान रखिए कि भारत में ‘इस्-लाम’ , ख़ूनी तलवार के साथ ही आया था। वो कोई शांति का संदेश लेकर नहीं आया था। न ही अरब से कोई विकास की बयार लाया था। जैसा की तथाकथित गल्पकारों ने इतिहास की किताबों में पढ़ाया। इस्लामिक आक्रांताओं का उद्देश्य केवल लूट-मार नहीं था। केवल सत्ता पर कब्ज़ा करने का उनका इरादा नहीं था। बल्कि उनका विज़न शुरू से क्लियर था। वो ये कि — गैर मुस्लिमों को इस्लाम में कन्वर्ट करना था।‌जो कन्वर्ट नहीं होंगे उन्हें जीने का हक़ नहीं होगा। ये इतिहास की क्रूर सच्चाई है। इन बातों को स्वीकार किए बिना आप आगे नहीं बढ़ सकते। फ़ालतू का एकतरफा सेक्युलर तराना नहीं गा सकते। अगर गाते हैं तो ये सुसाइडल अटेम्प्ट है।

वस्तुत: बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के तख्तापलट के बाद जितने भी घटनाक्रम हो रहे हैं। हिंदुओं का नरसंहार हो रहा है। वो कोई निजी दुश्मनी नहीं है। बल्कि वो मज़हबी आतंक है। एक सोच है। एक साफ्टवेयर है। वो जिस हार्डवेयर में अपलोड होगा। वो ऐसा ही हो जाएगा। ये क्यूं भूलना कि जो आज मज़हबी उत्पात मचा रहे हैं। वो सब कन्वर्टेड ही हैं।
कन्वर्ट हुए तो उनका चेहरा-मोहरा, सोच-पहचान — सब बदल गई।‌ वो उन्हीं लोगों के दुश्मन हो गए जो कभी उनके पूर्वज थे। क्योंकि उनकी मज़हबी कट्टर सोच काफ़िर को जीने का अधिकार ही नहीं देती है।

जो मज़हबी तराने गाते हैं। वो पाकिस्तान, आज के बांग्लादेश को देख लें। उन्हें पता लग जाएगा कि मज़हबी मुल्कों में काफ़िरों का हश्र क्या होता है। ये भी ध्यान रखना चाहिए कि ये वही कृतघ्न बांग्लादेश है जिसका निर्माण ही भारत ने किया था। काश उस वक्त आयरन लेडी, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बंगभूमि का भारत में विलय करवा दी हुई होतीं तो ये नौबत ही न आती। लेकिन जो होना था वो नहीं हुआ। अब उस पर पछतावा, क्रोध और दुःख प्रकट करने के सिवाय कुछ और नहीं बचा है।

आज पाकिस्तान और बांग्लादेश में गैर मुस्लिमों के साथ जो हो रहा है। उसके दोषी केवल अकेले पंडित नेहरू नहीं हैं। बल्कि उसके प्रमुख विलेन में जोगेंद्र नाथ मंडल भी शामिल हैं। ये वही मंडल हैं जिन्होंने ‘दलित-मुस्लिम’ एकता का राग अलापा था। पाकिस्तान के प्रमुख पैरोकारों में से एक थे। पाकिस्तान बनाने में उनकी बड़ी भूमिका थी। जब पाकिस्तान बना तो वो वहां के पहले कानून और श्रम मंत्री भी बने। लेकिन उनका ‘दलित-मुस्लिम’ एकता वाला भ्रम भी बहुत जल्दी टूट गया। भारत विभाजन की त्रासदी के साथ ही लगातार हिंदुओं का कत्लेआम हुआ। हिंदू स्त्रियों के साथ अनाचार हुआ। वो पीड़ा इतनी क्रूर और मर्मांतक थी कि उसकी कल्पना भर से हृदय कांप जाए।

अंततोगत्वा फ़र्ज़ी दलित मुस्लिम एकता का अंतिम हश्र जोगेंद्र नाथ मंडल ने भी देखा। 8 अक्टूबर 1950 को जोगेंद्र नाथ मंडल पाकिस्तान सरकार से इस्तीफा देकर भारत चले आए। भारत के हिंदू समाज के साथ किए पापों के चलते 1968 में वो ख़ुद गुमनामी में मर गए। लेकिन उन्होंने जो अक्षम्य पाप किया — उसकी सज़ा आज भी पाकिस्तान और बांग्लादेश में बचा-खुचा हिंदू समाज ( सिख समाज) भुगत रहा है। दोयम दर्जे का जीवन जी रहा है। समाप्त होने की स्थिति में है। अपनी सांसों की गिनती गिन रहा है।

ख़ुद अपने इस्तीफे में जोगेंद्र नाथ मंडल ने पाकिस्तान में दलितों पर हुए अत्याचारों को लेकर विस्तार से लिखा था। उसका एक संक्षिप्तांश शायद ‘दलित-मुस्लिम’ एकता वाले पाखंड को लेकर आपकी आंखें खोल दे—

“खुलना जिले के कलशैरा में सशस्त्र पुलिस, सेना और स्थानीय लोगों ने निर्ममता से हिंदुओं के पूरे गांव पर हमला किया। मैंने 28 फरवरी 1950 को कलशैरा और आसपास का दौरा किया। वह स्थान खंडहर में बदल चुका है। लगभग 350 घरों को ध्वस्त कर दिया गया था। मैंने तथ्यों के साथ सूचना दी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। ढाका में नौ दिनों के प्रवास के दौरान मैंने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया। नारायणगंज और चटगांव के बीच रेल पटरियों पर निर्दोष हिंदुओं की हत्याओं ने मुझे अंदर से झकझोर दिया। मैंने पूर्वी बंगाल के मुख्यमंत्री से मुलाक़ात कर दंगा रोकने का आग्रह किया। 20 फरवरी 1950 को मैं बारिसाल पहुंचा। यहां बड़ी संख्या में हिंदुओं को जिंदा जला दिया गया। मैंने जिले के सभी दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया, मधापाशा के जमींदार के घर में 200 लोगों की मौत हुई। मैंने खुद वहां नरकंकाल देखे, जिन्हें गिद्ध और कुत्ते खा रहे थे। वहां पुरुषों की हत्याओं के बाद महिलाओं को आपस में बांट लिया गया। पूर्वी बंगाल के दंगे में 10,000 से अधिक हिंदुओं की हत्याएं हुईं। महिलाओं और बच्चों का विलाप देख मेरा दिल पिघल गया और मैंने स्वयं से पूछा, क्या मैं इसी इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान आया था ?”

आज जो लोग भी तुष्टिकरण, मोटे-मोटे फंड, स्वार्थ के चक्कर में हिंदुओं को बांट रहे हैं। ‘दलित मुस्लिम’ एकता के ‘भीम-मीम’ वाले नारे लगाते हैं। वो भी जोगेंद्र नाथ मंडल जैसे ही घातक रास्ते पर जा रहे हैं। जबकि बाबा साहेब अंबेडकर इस समस्या को अच्छी तरह से जानते थे। इसीलिए वो कभी भी इसके बहकावे में नहीं आए। उन्होंने ‘पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन’ पुस्तक में अल्पसंख्यक समस्या, मुस्लिम भ्रातृत्व, इस्लामिक मान्यताओं को लेकर सविस्तार लिखा था।सबको चेतावनी दी थी। हिंदू-मुस्लिम जनसंख्या की अदला बदली की बात भी कही थी। लेकिन पंडित नेहरू ने उनकी एक बात नहीं मानी। इस बात की कहीं खुलकर चर्चा नहीं होती। क्योंकि इससे एक विशेष एजेंडा सेट नहीं होगा। और तो और ख़ुद को बाबा साहेब अंबेडकर का अनुयायी कहने वाले तथाकथित नेता, दल — इसकी कभी चर्चा नहीं करते हैं।

बाबा साहेब अंबेडकर बता गए थे कि —“इस्लाम एक बंद निकाय की तरह है, जो मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच जो भेद यह करता है, वह बिल्कुल मूर्त और स्पष्ट है। इस्लाम का भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है। मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है।मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृत्व है। यह बंधुत्व है, परन्तु इसका लाभ अपने ही निकाय के लोगों तक सीमित है और जो इस निकाय से बाहर हैं, उनके लिए इसमें सिर्फ घृणा और शत्रुता ही है। इस्लाम का दूसरा अवगुण यह है कि यह सामाजिक स्वशासन की एक पद्धति है और स्थानीय स्वशासन से मेल नहीं खाता, क्योंकि मुसलमानों की निष्ठा, जिस देश में वे रहते हैं, उसके प्रति नहीं होती, बल्कि वह उस धार्मिक विश्वास पर निर्भर करती है, जिसका कि वे एक हिस्सा है।”
( बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय, खंड 15- संस्करण 2000)

इन बातों पर गंभीर विमर्श होना चाहिए। क्योंकि ये ज़रूरी नहीं बल्कि अनिवार्य है। इतिहास को यथावत देखना। उस पर चर्चा करना कभी भी हानिकारक नहीं होता है। इस्लामिक आक्रमण से लेकर भारत विभाजन, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ हो रही मर्मांतक त्रासदी — इन पर चर्चा करने से कोई तनाव नहीं बढ़ता है। कोई क़ौम ख़तरे में नहीं आती है। बल्कि सच जानेंगे। मानसिकता समझेंगे तो इस भयावह समस्या का समाधान मिलेगा। अन्यथा न जाने कितने दीपू चंद्र दास भारत से बाहर और अन्दर मारे जाते रहेंगे। सिर्फ़ इस अपराध के चलते कि वो हिंदू थे। पहलगाम का आतंकी हमला भी वही है। स्थान और तौर-तरीके बदले थे। कॉन्सेप्ट एक ही था।

साथ ही ये तथ्य भी मत भूलियेगा कि बांग्लादेश में जिसके राज में हिंदुओं का अभी नरसंहार हो रहा है। उसे नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। यानी शांति की परिभाषा और पश्चिम के जितने भी प्रतिष्ठित पुरस्कार होते हैं। उसके पीछे की मंशा क्या हो सकती है? इसे समझने में आसानी होगी। क्योंकि पश्चिमी देशों के पुरस्कार एक तरह से — उनके वैश्विक एजेंडे का पर्याय बनते जा रहे हैं। उस प्रतिष्ठा के आधार पर पश्चिमी देश – हर जगह अपने उन मोहरों को लॉन्च कर रहे हैं। जो उनके मॉड्यूल को आगे बढ़ा सकें। ऐसे में जो वर्तमान में अवार्ड धारी गैंग है। उसकी कही, लिखी बातों को केवल इस आधार पर सच नहीं मानना चाहिए कि उसे नोबेल पुरस्कार, रैमन मैग्सेसे, बुकर जैसे अवार्ड मिले हैं। क्योंकि अवार्ड केवल एक टूल हो सकता है। उनके एजेंडे की वैलिडिटी का। ठीक वैसे ही जैसे मोहम्मद युनूस बांग्लादेश में हैं।

सत्य तो ये है कि भारत सेक्यूलर इसीलिए है क्योंकि यहां अभी हिंदू समाज है। जहां-जहां हिंदू घटेगा, बंटेगा… वहां वहां कटेगा; ये कोई पॉलिटिकल नारा नहीं है। ये कोई बीजेपी, RSS का नारा नहीं है। बल्कि वो कड़वी सच्चाई है जिससे लोग मुंह मोड़ते हैं। जानते हैं लेकिन तुष्टिकरण के लिए भाईचारा में ‘चारा’ बनने के लिए मुंह नहीं खोलते हैं। लेकिन कब तक? आप ओर संकट में हैं फिर भी नहीं बोलेंगे? भला ऐसी क्या मजबूरी है? अगर वक्त लगे तो चिंतन मंथन कीजिए। क्योंकि ऐसा करने से आप ‘हिन्दू मुस्लिम’ नहीं करते हैं बल्कि सही अर्थों में सेक्युलर होने की अर्हता पूरी करते हैं। सच के क़रीब जाते हैं। अपने अस्तित्व को पहचानते हैं।

भारत ने पॉक्सो के लंबित मामलों का बोझ किया कम: पहली बार दर्ज मामलों से ज्यादा मामलों का हुआ निपटारा

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• भारत में पॉक्सो मामलों की निपटान दर अब 109 प्रतिशत हुई। यानी एक वर्ष में दर्ज होने वाले मामलों से अधिक मामलों का हुआ निपटारा
• एक शोध के अनुसार 4 वर्षों में सभी लंबित मामलों को खत्म करने के लिए 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतों की जरूरत
• यह अध्ययन इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन की पहल पर सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज फॉर चिल्ड्रेन ने तैयार किया

दिल्ली । पहली बार भारत ने एक वर्ष में दर्ज होने वाले पॉक्सो मामलों से अधिक मामलों का निपटारा किया है। यह न्यायिक प्रणाली में वर्षों से चले आ रहे लंबित मामलों के खिलाफ एक ऐतिहासिक बदलाव है। सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज (सी-लैब) फॉर चिल्ड्रन की रिपोर्ट ‘पेंडेंसी टू प्रोटेक्शन: अचीविंग द टिपिंग पॉइंट टू जस्टिस फॉर चाइल्ड विक्टिम्स ऑफ सेक्सुअल एब्यूज’ के अनुसार वर्ष 2025 में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े 80,320 मामले दर्ज हुए, जबकि 87,754 मामलों का अदालती सुनवाई के बाद निपटारा किया गया। इससे निपटाने की दर 109 प्रतिशत तक पहुंच गई। खास बात यह है कि 24 राज्यों में भी पॉक्सो मामलों की निपटान दर 100 प्रतिशत से अधिक रही है। रिपोर्ट में प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस (पॉक्सो) के तहत सभी लंबित मामलों को चार वर्षों के भीतर खत्म करने के लिए 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतों की स्थापना करने की सिफारिश की गई है।

मुकदमों को लेकर अक्सर “तारीख पर तारीख” की छवि से बदनाम भारत में 2023 तक पॉक्सो के 2,62,089 मामले लंबित थे। लेकिन अब एक अहम बदलाव देखने को मिला है क्योंकि निपटाए गए मामलों की संख्या दर्ज किए गए मामलों से ज्यादा हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार देश एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां न्यायिक व्यवस्था अब सिर्फ लंबित मामलों को संभालने के बजाय उन्हें सक्रिय रूप से कम करना शुरू कर रही है। साथ ही रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि लंबित पॉक्सो मामलों को पूरी तरह खत्म करने के लिए चार साल की अवधि में 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतें स्थापित की जाएं। इसके लिए लगभग 1,977 करोड़ रुपये का प्रावधान किया जाना चाहिए, जिसमें निर्भया फंड का भी उपयोग किया जा सकता है।

रिपोर्ट कुछ गंभीर चिंताओं की ओर भी ध्यान दिलाती है। लगभग आधे लंबित मामले दो साल से ज्यादा समय से लंबित हैं। दोषसिद्धि की दरों में भी लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है और अलग-अलग राज्यों में मामलों की स्थिति में बड़ा अंतर दिखाई देता है। उदाहरण के तौर पर, पांच साल से ज्यादा समय से लंबित पॉक्सो के सभी मामलों में अकेले उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 37 प्रतिशत के चलते सबसे बड़ी भागीदारी है। इसके बाद महाराष्ट्र (24 प्रतिशत) और पश्चिम बंगाल (11 प्रतिशत) का स्थान है। कुल मिलाकर देखा जाए तो पांच साल से अधिक समय से लंबित मामलों में लगभग तीन-चौथाई अकेले सिर्फ इन्हीं तीन राज्यों में है।

न्यायिक व्यवस्था के व्यापक संदर्भ में इन आंकड़ों के दूरगामी असर पर बात करते हुए इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन के निदेशक (शोध) पुरुजीत प्रहराज ने कहा, “भारत आज बाल यौन शोषण के खिलाफ अपने संघर्ष में एक बेहद संवेदनशील और निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। जब न्यायिक व्यवस्था दर्ज किए जाने वाले मामलों से अधिक पॉक्सो मामलों का निपटारा करने लगती है, तब यह सिर्फ आंकड़ों की उपलब्धि नहीं होती, बल्कि यह उस भरोसे की वापसी होती है, जो बच्चों ने व्यवस्था पर खो दिया था। हमारा शोध बार-बार यह दिखाता है कि न्याय में हर दिन की देरी, बच्चे के मानसिक आघात को और गहरा करती है। इसलिए इस गति को बनाए रखना केवल प्रशासनिक जरूरत नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है। ताकि हर बच्चे के लिए समय पर संवेदनशील और बाल-केंद्रित न्याय अपवाद नहीं, बल्कि हक़ीक़त बन सके।” इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन, बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए काम करने वाले नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) का सहयोगी है। जेआरसी 250 से अधिक सहयोगी संगठनों के साथ देश के 451 जिलों में बाल अधिकारों के लिए काम कर रहा है।

राज्यों में देखें, तो सात राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पॉक्सो के मामलों के निपटान की दर 150 प्रतिशत से अधिक रही है। वहीं, अन्य सात राज्यों में यह निपटान दर 121 से 150 प्रतिशत के बीच रही, जबकि 10 राज्यों ने 100 से 120 प्रतिशत तक की निपटान दर हासिल की। इन 24 राज्यों ने न सिर्फ 2025 में दर्ज हुए मामलों का निपटारा किया, बल्कि पिछले वर्षों से लंबित मामलों को भी काफी हद तक समाप्त करने में सफलता पाई। ये आंकड़े उन मामलों को दिखाते हैं जो कई साल पहले न्याय प्रणाली में दर्ज हुए थे, लेकिन अब तक उनमें कोई ठोस प्रगति नहीं हो पाई है। रिपोर्ट बताती है, “किसी मामले की प्रक्रिया के शुरुआती दौर से ही लंबित रहने की समस्या शुरू हो जाती है और व्यवस्था को तय समय सीमा के भीतर मामलों को आगे बढ़ाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।”

रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि पॉक्सो के लंबित मामलों को शीघ्र निपटाने के मकसद से प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हर साल मामलों के निपटान की दर 100 प्रतिशत से अधिक बनाए रखें। इसके साथ ही जो राज्य न्यायिक प्रक्रिया में पीछे हैं, उन्हें तकनीकी और प्रशासनिक सहयोग दिया जाए। साथ ही दोषसिद्धि और बरी होने की दरों की नियमित और बारीकी से निगरानी की जाए। रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि मामलों के बेहतर विश्लेषण और दस्तावेजों की त्वरित उपलब्धता के लिए एआई आधारित कानूनी शोध उपकरणों और दस्तावेज प्रबंधन प्रणालियों का उपयोग किया जाए, ताकि न्याय प्रक्रिया और अदालती कार्यवाही अधिक तेज व प्रभावी हो सके।
यह रिपोर्ट 2 दिसंबर 2025 तक उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित है, जिन्हें नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (एनजेडीजी), नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और लोकसभा में पूछे गए सवालों और उनके जवाबों से लिया गया है।

10 मिनट की डिलीवरी: क्विक कॉमर्स की चमक में डूबती किराने की दुकानें

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बृज खंडेलवाल

जयपुर : दरवाज़े पर दस्तक अब पड़ोसी की नहीं, ऐप की होती है। सब्ज़ी, दूध, दाल‑चावल से लेकर दवा और कपड़े तक, सब कुछ उँगली के एक क्लिक पर हाज़िर है। न बाज़ार जाने की झंझट, न पसीना, न मोलभाव की आवाज़ें। न दुकानदार की पहचान, न उधारी का भरोसा, न यह गुज़ारिश कि “भैया आज थोड़ा कम कर दो, धनिया‑मिर्च तो डाल दो।”

सहूलियत की इस चकाचौंध में समाज धीरे‑धीरे सुस्त पड़ता जा रहा है। लोग चलना भूल रहे हैं, आंटियां चारदीवारी में कैद होकर मोटापे और तन्हाई की शिकार हो रही हैं। मुहल्ले की दुकानें, जहाँ रिश्‍ते बिकते नहीं थे, बनते थे, दम तोड़ रही हैं। शॉपिंग अब तजुर्बा नहीं रही, बस एक डिलीवरी स्लॉट बन कर रह गई है। होम डिलीवरी सर्विस ने सिर्फ़ बाज़ार का नक्शा नहीं बदला, उसने बनियावाद की रूह, सौदेबाज़ी की तहज़ीब और इंसानी रिश्तों की गर्माहट पर सीधा वार किया है। सहूलियत की कीमत हम समाज से चुका रहे हैं।

सुबह‑सुबह, जब आगरा की गलियों में दूध, अगरबत्ती और बीती रात की धूल की मिली‑जुली खुशबू तैर रही होती है, हीरा लाल अपनी छोटी‑सी जनरल स्टोर की जंग लगी शटर उठाकर एक खामोश कॉलोनी में बैठ जाता है, उन क़दमों का इंतज़ार करते हुए जो अब आते ही नहीं। कभी यही सुबहें सलाम‑दुआ, गप्प‑शप्प, काउंटर पर सिक्कों की खनक और टॉफी को लेकर बच्चों की नोकझोंक से भरपूर होती थीं। आज बस डिलीवरी बाइकों की हल्की घरघराहट है, जो उसकी दुकान के सामने से बिना रुके निकल जाती हैं; राइडर की निगाहें मोबाइल पर होती हैं, दुकान की शीशे पर नहीं।
हीरा लाल देखता है कि कार्टन उसके पड़ोसियों के दरवाज़ों पर उतर रहे हैं, जबकि उसकी दुकान की शेल्फ़ों पर रखा माल जस का तस पड़ा है, रजिस्टर उसकी सब्र की तरह पतला होता जा रहा है।

गली के उस पार समोसे और नमकीन के लिए मशहूर नाश्ते वाला अपने ठेले से टेक लगाकर खामोशी से हामी भरता है। वह ठंडी साँस लेकर कहता है, “लोग अब भूख से ज़्यादा ऐप पर भरोसा करते हैं।” अब भूख की सुनवाई खुशबू से नहीं, एल्गोरिद्म से होती है। कॉलोनी के लोग अब भी खाते हैं, खरीदते हैं, खर्चा करते हैं, मगर अब उन लोगों से नहीं लेते जिनको वे जानते हैं।

हीरा लाल के लिए ये सिर्फ़ मुक़ाबला नहीं, अपना वजूद मिटने का एहसास है। बाज़ार कहीं और शिफ्ट नहीं हुआ, स्क्रीन के अंदर ग़ायब हो गया है, जिसने दुकानदारों को पुराना अवशेष बना दिया और मुहल्लों को बस डिलीवरी पॉइंट में बदल डाला।

भारत में क्विक कॉमर्स, यानी 10–30 मिनट में किराना और रोज़मर्रा का सामान घर पहुँचा देने वाले प्लेटफॉर्म्स, ने शहरों की ख़रीदारी की आदत पूरी तरह बदल डाली है। व्यस्त ज़िंदगी के बीच बेमिसाल सहूलियत देने वाले Blinkit, Zepto, Swiggy Instamart जैसे प्लेटफॉर्म, और Flipkart व Amazon की नई एंट्रीज़, इस तेज़ उछाल के बड़े खिलाड़ी बन चुके हैं। यह सेक्टर 2025 में तकरीबन 5.4 अरब डॉलर के क़रीब पहुँच चुका है और अन्दाज़ा है कि 2030 तक यह बढ़कर 35 अरब डॉलर तक जा सकता है।

आज यह बड़े खिलाड़ियों के बीच 95% से ज़्यादा मार्केट पर क़ब्ज़ा जमाए बैठा है , Blinkit के पास लगभग 46% हिस्सा, Zepto के पास 29% और Instamart के पास 25% के आसपास। 2025 के त्योहारी सीज़न में इन प्लेटफॉर्म्स पर ऑर्डर की तादाद 120% तक बढ़ गई, जिसकी वजह से ई‑कॉमर्स की कुल बिक्री के आँकड़े पहले ही हफ़्ते में 60,000 करोड़ रुपये से ऊपर चले गए। Blinkit, Zepto और Instamart अब इस तेज़ रफ़्तार, सख़्त मुक़ाबले वाले बाज़ार के लगभग तमाम हिस्से पर हावी हैं।

लेकिन इस तेज़ तरक़्क़ी और ग्राहक की ख़ुशी की कहानी के पीछे भारत की रिटेल रीढ़, मुहल्ले की किराना दुकानों का गहरा और दर्दनाक बिखराव छुपा है। तक़रीबन 1.3 से 1.5 करोड़ तक फैली ये पारिवारिक दुकानें भारत की ग़ैर‑औपचारिक अर्थव्यवस्था की जान हैं। ये लाखों लोगों को रोज़गार देती हैं और जीडीपी में करीब 45–50% तक की हिस्सेदारी मानी जाती है। ये सिर्फ़ दुकानें नहीं, भरोसे पर टिकी छोटी‑छोटी दुनिया हैं , लचीली उधारी, पीढ़ियों से बने रिश्ते और मोहल्ले की एक तरह की पंचायत। सिर्फ़ 2024 में ही 2 लाख से ज़्यादा किराना दुकानें बंद हो गईं, और सबसे ज़्यादा चोट शहरों और मेट्रो में पड़ी।

2024 के आख़िर में JP Morgan की एक स्टडी के मुताबिक़, मुंबई में 60% ऑफ़लाइन ग्रॉसरी स्टोर्स ने माना कि उनकी बिक्री सीधा‑सीधा क्यू‑कॉमर्स की “डार्क स्टोर्स” बढ़ने की वजह से गिरी है , ये वही छोटे‑छोटे गोदाम हैं जो रिहायशी इलाक़ों में जगह‑जगह खुल रहे हैं। शहरी किराना दुकानों की आमदनी और क़दमों की रौनक 2025 की फ़ाइनेंशियल ईयर में 12–30% तक घटी। सर्वे बताते हैं कि क्यू‑कॉमर्स यूज़ करने वाले 46% ग्राहकों ने किराना से ख़रीदारी कम कर दी और कम से कम एक चौथाई खर्च अब ऑनलाइन शिफ्ट कर दिया है।

ये विस्थापन कैसे हो रहा है, तस्वीर काफ़ी साफ़ है। क्यू‑कॉमर्स के ये बड़े खिलाड़ी, जो वेंचर कैपिटल के गहरे जेबों से चलते हैं, इतने आक्रामक डिस्काउंट और ‘दाम तोड़’ ऑफ़र देते हैं कि छोटी दुकानें उस रेट पर माल बेच ही नहीं सकतीं। डार्क स्टोर्स का घना जाल डिलीवरी को तेज़ तो बनाता है, लेकिन इससे एक बंद‑सी, कंट्रोल की हुई सप्लाई चेन बनती है, जिसमें पारम्परिक डिस्ट्रीब्यूटर और होलसेलर हाशिए पर चले जाते हैं।
इंसानी क़ीमत और भी भारी है। कई पुश्‍तों से दुकान चलाने वाले अब घटते मुनाफ़े के दबाव में मजबूर होकर गिग इकॉनमी के कामों की तरफ़ धकेले जा रहे हैं , कई बार उन्हें उसी कंपनी के लिए डिलीवरी करनी पड़ती है, जो उनकी अपनी दुकान की कमर तोड़ रही है। इनके साथ‑साथ लोकल सप्लायर, पैकेजिंग वाले और दूसरे छोटे धंधे भी चुपचाप चोट खा रहे हैं। Kearney जैसी कंसल्टिंग फ़र्मों के विश्लेषण बताते हैं कि अब ताक़त बिखरे हुए, मोहल्ला‑स्तर के छोटे कारोबारियों के हाथ से निकलकर चंद बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों के पास सिमट रही है।

सांस्कृतिक नुक़सान भी कम नहीं है। किराना दुकान केवल सामान बेचने की जगह नहीं थी , यह गप‑शप, मोहल्ले की ख़बर, और मुसीबत में बिना ज़मानत के उधार देने वाली एक छोटी सामाजिक संस्था थी। उसकी जगह अब ऐप का ठंडा इंटरफ़ेस, एल्गोरिद्म की मेहरबानी और दरवाज़े पर दो मिनट की खामोश डिलीवरी ने ले ली है। यह नया मॉडल तात्कालिक, बेवजह ख़रीद बढ़ाता है, प्लास्टिक और पैकेजिंग का पहाड़ खड़ा करता है और उस स्थानीय, निजी लेन‑देन को मिटाता जाता है, जिसने सदियों से भारतीय मुहल्लों की रूह को पहचान दी थी । क्यू‑कॉमर्स कोई गुज़रता हुआ फैशन नहीं, शहरी रिटेल का बुनियादी ढाँचा बदलने वाली ताक़त है। ख़तरा ये है कि रफ़्तार और पैमाने की इस अंधी दौड़ में कहीं भारत अपने ही मोहल्लों की वह ज़िंदा, इंसानी पैमाने की अर्थव्यवस्था न खो दे, जो उसकी बस्ती को मज़बूती और चरित्र देती है।

भारत के नकली बाबा आस्था उद्योग को कैश मशीन बना रहे हैं!!!

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दिल्ली । शाम ढलते ही टेंट भीतर से भट्टी की तरह चमक उठता है। अगरबत्तियों का गाढ़ा धुआँ हवा में तैर रहा है, ढोल-नगाड़ों की थाप दिल की धड़कनों से होड़ ले रही है। बीचोंबीच ऊँचे सिंहासन पर बैठा है एक शख़्स, गेरूआ, रेशमी कपड़े, आँखें बंद, हथेलियाँ आसमान की ओर। आधा संत, आधा सेल्समैन।

एक-एक कर टूटे, हारे, थके लोग उसके सामने से गुज़रते हैं। वह उम्मीद में लिपटे जुमले फेंकता है, ताबीज़, भभूत और चमचमाते “चमत्कारी” सामान लहराता है, और इन्हें ‘आशीर्वाद’ कहकर थमाता है। “कैंसर भाग जाएगा। कर्ज़ खत्म हो जाएगा। भगवान ने तुम्हें चुन लिया है।”

भीड़ सिसकती है, आँखें नम होती हैं, और उसी रफ्तार से जेबें भी हल्की होती जाती हैं। कहीं मंत्र और कहीं मनी-काउंटर के बीच, आस्था का खनन हो रहा है। जब लाइटें बुझती हैं और “चमत्कार” का पर्दा गिरता है, ऐसे ठग बाबाओं की तिजोरियाँ भर चुकी होती हैं, और भक्त की जेब खाली।

भारत के आध्यात्मिक परिदृश्य में यह कोई इक्का-दुक्का मामला नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक सड़न है, नकली बाबाओं का तेज़ी से फैलता चलन। ये वे शोषक हैं जो मजबूर लोगों की बेबसी पर पलते हैं और श्रद्धा को गंदी कमाई का ज़रिया बना देते हैं। ग़रीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा और सरकारी नाकामी से जूझ रहे समाज में ये खुद को ईश्वर का दूत बताकर उतरते हैं।

क़र्ज़ में डूबा किसान, इलाज के लिए भटकती माँ, परिवार से ठुकराई विधवा, या महानगर की झुग्गी में फँसा बेरोज़गार नौजवान , यही इनके सबसे आसान शिकार होते हैं। इनकी टूटन को हथियार बनाकर उसे अंधभक्ति में बदला जाता है। नेताओं का वरद हस्त, मीडिया का सहयोग, लोगों की मजबूरियाँ, राज्य और समाज की नाकामी, इन ठगों के लिए उर्वर ज़मीन तैयार करती है।

ऐसे कई स्वयंभू गुरु इस विकृति की मिसाल बन चुके हैं, जिनकी चमकदार सल्तनतें झूठ, डर और धोखे पर खड़ी रहीं। मगर ये सिर्फ़ चेहरे हैं। असली बीमारी है “गुरुगिरी” का यह उन्माद, जो एक खतरनाक सामाजिक लत की तरह पूरे देश में फैल चुका है।
आख़िर यह नकली रूहानियत इतना बड़ा कारोबार कैसे बन गई? इसकी जड़ में हैं भारत की गहरी असमानताएँ। तेज़ शहरीकरण, ग्लोबलाइज़ेशन और टूटती पारंपरिक संरचनाओं ने लोगों को भीतर से खाली कर दिया है। गाँव उजड़ रहे हैं, मोहल्ले बिखर रहे हैं, संयुक्त परिवार इतिहास बनते जा रहे हैं। सरकारी अस्पतालों की बदहाली, अनिश्चित नौकरियाँ और गिग इकॉनमी का असुरक्षित भविष्य, सब मिलकर इंसान को बेबस बना देते हैं।
यहीं से बाबाओं की एंट्री होती है। जहाँ विज्ञान और सरकार जवाब दे देते हैं, वहाँ ये “झटपट समाधान” बेचते हैं , कैंसर के लिए भभूत, शादी के लिए मंत्र, नौकरी और दौलत के लिए अनुष्ठान। यह आध्यात्म नहीं, बल्कि मजबूरी की मार्केटिंग है, पुरानी रहस्यमयी बातों को आसान, फ़ील-गुड नशे की तरह परोसना।

सोशल मीडिया ने इस फरेब को पंख लगा दिए हैं। आज के नकली बाबा टेक-सैवी शोमैन हैं , यूट्यूब लाइव “चमत्कार”, इंस्टाग्राम पर रील्स, ऑनलाइन दर्शन, दान के ऐप, ब्रांडेड माला-कड़ा और टी-शर्ट। आश्रम अब कॉरपोरेट ऑफिस बन चुके हैं और श्रद्धा एक सब्सक्रिप्शन मॉडल।

राजनीतिक संरक्षण इस आग में घी का काम करता है। कई बाबा नेताओं के लिए वोट-बैंक बन जाते हैं और बदले में मिलती है जांच से छूट। स्कैंडल सालों तक लटकते रहते हैं, इंसाफ़ रेंगता रहता है।

लेकिन यहाँ एक फर्क साफ़ करना ज़रूरी है। भारत की परंपरा में असली आध्यात्मिक नेतृत्व भी है , शंकराचार्य, प्राचीन मठों और अखाड़ों के प्रमुख, कुंभ और वाराणसी जैसी परंपराओं के संरक्षक। ये लोग तमाशा नहीं करते, चमत्कार नहीं बेचते। इनकी सत्ता वंश, तपस्या और शास्त्र से आती है, सेल्फ-प्रमोशन से नहीं। शिक्षा, सेवा और समाज इनके केंद्र में रहता है।

इसके उलट नकली बाबा अक्सर रातों-रात पैदा होते हैं , कल तक बिज़नेसमैन, कलाकार या चालबाज़, और आज “अवतार”। ये व्यक्ति-पूजा का कल्ट खड़ा करते हैं, सवाल पूछने पर पाबंदी लगाते हैं, परिवारों से तोड़ते हैं और पैसा निचोड़ते हैं।

यह आध्यात्म नहीं, बल्कि कई बार पोंज़ी स्कीम जैसा धंधा बन जाता है, जो अक्सर भगदड़, हिंसा और तबाही पर खत्म होता है।
अब वक्त है जागने का। आस्था और अंधविश्वास के फर्क को समझने का। इन शोषक नकली बाबाओं को बेनकाब करने का, कमज़ोरों को शिक्षा, विज्ञान और न्याय से मज़बूत करने का।

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